इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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रविवार, 14 दिसंबर 2025

सब बजारू होगे

विजेन्द्र कुमार वर्मा 

खीस-खीस दाँत निकाल के हाँसे ले काम नइ चलय।
खुशी मा दर्द छिपे हे उहू ला दिखाय ले पड़ही।

कब तक पर भरोसा म तीन परोसा खात रइही।
रीत रिवाज अउ दुनियादारी तको बताय ले पड़ही।  

अपन मरे बिना इहाँ सरग नइ दिखे संगवारी हो। 
नकाब ओढ़े हे तेकर मुख ले पर्दा हटाय ले पड़ही। 
 
प्यार हमदर्दी जज्बात इंसानियत सब बजारू होगे। 
काय करबे जान के तको भरोसा जताय ले पड़ही।

जमाना अइसे हे सच बोले म जिनगी नइ चलय विजय।    
जेती हवा चलत ओकरे दिशा मा आज जाय ले पड़ही।

नगरगाँव (धरसीवांँ)

कब तक चल ही ...?

          तुलेश्वर कुमार सेन 

आन बान शान कहिके फिजूल खर्ची करत हे।
नोनी बाबू दुनो अपन _अपन अकड़ मा मरत हे।।
आखिर कब तक चल ही मोर संगवारी हो....?
ये बाढ़े उमर अउ समझौता के बिहाव ले डरत हे।।

नोनी मन हा घर काम करत बढ़ पढ़ लिख डरे हे।
बाबू मन हा पढ़ाई लिखाई ला छोड़ काम धरे हे।।
जब आथे हाथ माँगे के पारी शरम लगथे काबर।
नोनी वाले मन हा बाबू मन ला रिजेक्ट करे हे।।

फैशन अउ नशा आज हर घर परिवार मा चलत हे।
नोनी मन ला कोन कहे बाबू मन घलो जलत हे।।
दिखे दिखाए के चक्कर मा ये दुनियां वाले मन।
चकाचौंध मा फंस के एक दुसर ला भारी छलत हे।।

घर परिवार, समाज अउ रिश्तेदार मन काय कही।
पता चलही ता हमर मन के काय इज्जत रही जही।।
बने _बने कहत अउ देखत समय हा पूरा निकलगे।
साबित करत निकलगे कोन गलत हे कोन सही।।

काय करबे बने पति, सास, बहू,दमाद नइ मिलिस।
जइसन खिलना रीहिस बगिया मा फूल नइ खिलिस।।
पति पत्नी दुनो करत हे नउकरी कमावत हे पइसा।
करत गिला शिकवा एक दुसर ले जिनगी जिलीस।। 

समय के राहत ले करो सब झन बने काम धाम।
उमर हे अठारह ले बीस येला झन करो बदनाम।।
उन्नीस बीस हो बे कर थे कोनो नइ होय संपूर्ण।
पहिली ले कर लो समझौता बाद मा होथे नाम।।

                         सलोनी राजनांदगांव

छत्तीसगढ़िया सब ले......?

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
अब  कइसे  के जनावत हे ?
हमरे घर  आ के, खा पी के
हमी  मन ल  धमकावत  हे !

जेंमा ओमन  खाथें / पिथें
छेदा करिन  उही पतरी ल
जूटहा मन  सब रोप डरिन
खेत,सड़क,तरिया-पचरी ल !

उँखर ह  देबी -देवता आय
अउ  हमर ह  होगे हे आन,
बाहिर ले  आ के  राज करे
अउ हम  हमरे घर  बिरान !

हमर  पुरखा के  मान नइ करे
तोला कइसे जनागे अपन बर,
अपन के बड़ई अउ हमर बुरई
अइसन कोन सहिथे अपने घर !

कब  तक  ले  गुलामी  करहू
वाह रे !  मोर  छत्तीसगढ़िया,
छत्तीसगढ़  के दुलरुवा  बेटा
कइसे बन गेव रे  परबुधिया !

छत्तीसगढ़िया  सबले  बढ़िया
बस  ये  नारा  म  झन भुलाहु ,
अपन असमिता के मान रखौ
नइ ते सीधा धारे- धार बोहाहु !

         -- राजकुमार 'मसखरे'

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

मया के गोठ...


कृष्ण कुमार अजनबी

 जिनगी आए दुएच दिन के मेला संगी।
आए हन अकेल्ला जाबोन अकेल्ला संगी।।
अमरित पी के कोनो नी आए हे इंहा।
एको दिन तो जाएच ल हे सबेला संगी।।
मया के गोठ ल तैं गोठियाले जी भर के।
कोंजनी आ जहि कब काल लेएला संगी।।
जिनगी के बारी म कमाले यश के केरा।
झन कमा कुयश के करू करेला संगी।।
काम क्रोध अउ मद लोभ के दैहान म।
झन जाबे कभू तैंहा चारा चरेला संगी।।
सच्चाई धरम अउ नियाय अहिंसा के।
कान फूंका के तैं बन आज ले चेला संगी।।
परेम पिरित बिना सुन्ना ए जिनगानी।
माटी कस घुरत हावय तन ढेला संगी।।
सत करम आए तोर सरग निसैनी।
कुकर्मी ल परथे नरक भोगेला संगी।।
गोदना गोदाय म फबथे सुग्घर तन।
मन के मइल ल उज्जर धोएला संगी।।
सुख अउ दुख आए जिनगी के दु रंग।
कभु हांसेला परथे कभु रोएला संगी।।
हाथ गोड़ म मेंहदी माहुर मुहूं म पान।
मया के रंग म रचा मन हे तेला संगी।।
संगवारी बिन सच रस नईए जीवन म।
भिड़ाले जोड़ी कहुंचो ले अलबेला संगी।।
कोन पतियाही तोर मन के बात ल अजनबी।
सब्बो झिन झेलत हे अपन झमेला संगी।।


देवभोग गरियाबंद (छ ग)
मोबाइल 9691194953

इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं

ईश्वर कश्यप "भास्कर" 
 इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं 
जो हमारे मन मंदिर को स्वच्छ बनाएं,
दुसरो के लिए भी प्रेम करुणा जगाएं
हृदय पर मानवता का भाव भर आये।

इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं 
भटके लोगों को 'सत् मार्ग' दिखलाएं,
आसुरी शक्तियों का तो नाश हो जाएं
इस धरती में खुशीयों के फूल खिलाएं।

इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं 
गरिबों के घर पर सुख, समृद्धि आये,
किसान का घर अनाजों से भर जाएं 
मजदूर भी अपने काम का दाम पाएं।

इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं 
हम हर एक चेहरों पर 'मुस्कान' लाएं,
बेसहारों के लिए भी सहारा बन जाएं 
हर एक घर में हम रौशनी को फैलाएं।

इस दिवाली एक दीपक ऐसा जलाएं 
हम सभी एक अच्छे इंसान' बन पाएं,
जाति, धर्म, संप्रदाय, का भेद मिटाएं 
चलों इस बार हम ऐसा दीप बन जाएं।


ईश्वर कश्यप "भास्कर" 
ग्राम-किरारी जिला-जांजगीर ✍️

आज हावे हमर गाँव मा देवारी

सबला आज के नेवता हावे संगवारी।
गाँव भर मिलके मनाबो हमन देवारी।।
सांहड़ा देव मा कर बो गोवर्धन पूजा।
पार ही दोहा ठाकुर मालिक मन भारी।।

जी मर के देवारी मा संगी खुशी मनाथन।
एक दुसर सन हम सुख दुख गोठियाथन।।
गोवर्धन माथ मा लगा के आशीष पाथन।
हाँसत बोलत सब कोई बिछड़ जाथन।। 

द्वापर ला सुरता करथन कृष्ण कन्हैया।
बाल गोपाल माखन चोर नाग नथैया।।
इंद्र के अहंकार ला क्षण भर मा तोड़ के।
गोवर्धन पर्वत के नीचे लाके खड़ा करैया।।

कान्हा जब अपन छीनी अंगरी लगाइस।
बाल गोपाल मन देख के लउठी टेकाइस।।
बाड़ ले मनखे संग गऊ माता ला बचाइस।
उही दिन ले गोवर्धन पूजा चालू कराइस।।

छोटे बड़े अउ ऊँच नीच के भेद ला पाटिस।
झन कर जुलुम इखर ऊपर इंद्र ला डाटिस।।
मिलजुल के नाच गा के सब खुशी मनाइस।
भगवान की लीला समझ सब पाँव लागिस।।

गऊ माता ला धोके करबो हम सब सिंगार।
पहिनाही राउत भइया मन सोहई के हार।।
बाज ही दमऊ,दफड़ा,सिंग,मंजीरा मोहरी।
सज के निकल ही पकड़ के तेंदू लाठी सार।।

आज घर- घर हम गोवर्धन पर्वत बनाबो।
मेमरी,सिलयारी,धान फूल ओमा सजाबो।।
दूध,भात,कोहड़ा,कोचई,रोटी भोग लगाबो।
गऊ माता के खुर मा खुंदा के माथ लगाबो।।

साल भर के तिहार ला हँसी खुशी ले मनान।
दारू गाँजा पी के गाँव मा झगड़ा झन मतान।।
कप,पउवा पी के बोतल के नशा झन बतान।
अपन परिवार के मनखे मन ला झन सतान।।

                         तुलेश्वर कुमार सेन 
                         सलोनी राजनांदगांव

आँय-बाँय बिजली बिल

अशोक कुमार यादव
 
कोरबा ल सब कहिथें संगी ऊर्जा के नगरी,
इहाँ कई ठन हवय कोइला के बड़का खदान।
बड़े-बड़े बाँधा ले उत्पन्न होवत हे जल विद्युत,
फेर ए बिजली बिल ह ले डरिस हमर परान।।

कतको झन के छितका कुरिया म बाघ गुर्राथे,
कई जनता मन हें रोज कमाने अउ खाने वाला।
दुबर ल दू आषाढ़ वाले काम करत हे सरकार,
लोगन हें गरीबी रेखा ले नीचे जीवन जीने वाला।।

बल्ब मन घलो हाँसत हें, पंखा मन मारत हें ताना,
स्मार्ट मीटर ले बिजली बिल निकलथे साँय-साँय।
हमर राज के बिजली कहाँ जाथे, पुछत हे जनता,
घरों-घर म बिजली बिल ह आवत हे आँय-बाँय।।

गरीब मन ह कहाँ लगवाए सकहीं सोलर पैनल ल,
बेंदरा मन ह जझरंग ले कूद के टोर दिहीं ओला।
अभी भी समय हे, हाफ बिजली बिल कर दे लागू,
जनता के गुस्सा भोगागे हे, धरा दिहीं तोला झोला।।

कवि-  मुंगेली, छत्तीसगढ़
अध्यक्ष यादव समाज सेवा समिति।

घुसखोरी आम कर दिहीं का ?

विजेन्द्र कुमार वर्मा 
 
भ्रष्टाचार के जड़ ह अइसे फइले हावय देश मा।
लगथे येमन देश ला एक दिन नीलाम कर दिहीं का?

पद पा के सुरा सुन्दरी मा मगन हें  इहाँ गद्दीदार।
अपने रंगत रंग नौकर शाही ला हम्माम कर दिहीं का?

घुस दे बिगर कोनों काम नइ होय सरकारी तंत्र मा।
अवइया योजना मा लगथे घूसखोरी आम कर दिहीं का? 

बाढ़ते हे सोना चाँदी अउ खाय पीये के जिनिस ह।
ढील देके लगथे बाजार ल अउ बेलगाम कर दिहीं का?

येकर मन के बस चलय त रोजमर्रा खाय के जिनिस ल तको ।
आम जन के पहुँच ले दूर कर काजू बादाम कर दिहीं का?

विजेन्द्र कुमार वर्मा 
नगरगाँव (धरसीवांँ)

सोमवार, 15 सितंबर 2025

वक़्त का पहिया ---

‎श्रवण कुमार साहू, "प्रखर"
 
वक़्त का पहिया,घूमते रहता, 
‎देखो हर पल,दिन और रात|
‎सदा एक सा कभी ना होते, 
‎समझो जीवन में हालात||

‎कोई हँसता है उसी पल में, 
‎तो कोई फुटकर रोता है|
‎कहीं मिलन की बेला होती, 
‎तो कोई किसी को खोता है|
‎कितने रंग भरे हैं पटल पर, 
‎तो कहीं खाली है जज्बात---

‎वक्त के फेर में राजा बन गए, 
‎जो कभी,कहलाते थे रंक|
‎इसने किसी को शिखर दिया, 
‎तो किसी को किया निरंक||
‎वक़्त बदलते देख लोगों के, 
‎बदलते देखा है ख्यालात----

‎विधी का विधान बदल न सके, 
‎स्वयं ही जगत का विधाता|
‎जीवन-मृत्यु,यश-अपयश, 
‎उनके भी जीवन में है आता||
‎राम को वनवास मिला तो, 
‎कन्हाई जन्में थे हवालात---

‎वक़्त के मारे कोई न बचता, 
‎जरा समझो वक़्त की चाल|
‎सृजन वही है,प्रलय वही है, 
‎वक़्त है साक्षात महाकाल||
‎समय का चुका काम न आवे, 
‎ओह!क्या मानव,क्या बरसात---

‎लाख करवट बदले जिंदगी, 
‎हर रूप में उसे स्वीकार करो|
‎अजी दुःख मिले या सुख मिले, 
‎प्रभु इच्छा है अंगीकार करो||
‎चौरासी लाख योनि में उत्तम, 
‎समझ लो हे! मानुष तेरा जात---

‎शिक्षक/साहित्यकार,राजिम,गरियाबंद

हरिश्चंद्र जब ले साधे हे मौन

कुलदीप सिन्हा "दीप"

हरिश्चंद्र जब ले साधे हे मौन।
हे सच के इहाँ बोलइया कोन।

मस्त हवे गा सबो अपन में,
धरे हाथ मा मोबाईल फोन।

कोनो कखरो सुनय नहीं जी,
होगे हे ऊँचा अब सब के टोन।

करजा मा इहाँ सबो बूड़े हे,
ले के लोन के ऊपर लोन।

"दीप" सम्हल के हावय चलना,
हे आगू मा इहाँ खतरा जोन।



कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

नवमी के आथे मोर डोकरी दाई


ईश्वर कश्यप "भास्कर"

आज नवमी के पितर आहि मोर 
बड़का दाई अउ संग डोकरी दाई, 
मोर इंहा के हर उखर बर बनाही
बरा सोंहारी अउ साग म कोंचाई।

मोर डोकरी दाई हर जी कोंचाई
के साग ल तो अड़बड़ ग भावय,
जब कभु कोंचाई साग ल पावय
बढ़िया अमटहा मही म बनावय।

मोर 'बड़का दाई' मोर बर करय 
अड़बड़ मया आउ दूलार ल जी,
ओकर बिना अबड़ सुन्ना लागथे 
ये हमर घर अंगना अउ परिवार।

दाई ददा हर देहे हावय ग जनम 
पितर पानी देना हे ग हमर धरम,
पितर गोतर ल सब माना भैय्या
उकरे दे म चलत हे जीवन नैइया।


ग्राम-किरारी/जिला-जांजगीर 

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

पोरा हमर तिहार हे

अमिता रवि दुबे

पोरा  हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।
उछाह के आधार हे, भादों महिना ज्ञान मा।।

पूजा बइला के हरे, आथे घर -घर नाँदिया।
रोटी -पीठा ठेठरी, गठरी बाँधव मूठिया।।

 खन - खन घंटी बाँध दे, दउड़त  हावय शान मा।
पोरा हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।।

समझन संस्कृति सार हे, बात ग्यान के रोट हे।
हो थे गर्भाधान हे, दाना भरथे पोट हे।।

खेती काम महान के,  प्रतीक पुरुष महान मा।,
पोरा हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।।

लोढ़ा जाता सील मा,रंधना गुधना पीसना ।
नोनी मन के काम ला, कहिथें  खेलत सीखना।।

अक्ती- भक्ति हे शक्ति के,जग भोले  गुनगान मा।
पोरा हमर तिहार हे, भरथे रस अब धान मा।।

जतका रीति रिवाज हे, आपन गाँव समाज के।
मानत जुन्ना मन सबो,नवा नेवरिया आज के।।

धरती दाई देत हे,धन - दौलत खलिहान मा।।
पोरा हमर तिहार हे, भरथे रस अब धान मा।।

दू अउ दू हा होथे चार

कुलदीप सिन्हा "दीप"


दू अउ दू हा होथे चार।
      पेलथस काबर मुड़ के भार।
चुप रेहे ले तोर कुछु नइ बिगड़े,
      गली गली झन पार गोहार।
ज्यादा अतलंग जेन हा लेथे,
       उही मन बोहाथे धारे धार।
भाई भाई के झगरा मा भइया,
        परिया पर गे हे खेतिखार।
जेन हा भुंजथे छानी मा होरा,
       जर जाथे वोखर घर-बार।
जेब ला टमर के खर्चा करबे,
        कखरो कर झन हाथ पसार।
घर सबो के जे करथे अंजोर,
         वोखरे तरी हा होथे अँधियार।
चतुरा ला केकरा नइ चाबे,
          कोनो नइ पावे वोखर पार।
झूठ लबारी के पौबारा हे,
           ईमान बेचागे बीच बाजार।
अउ आगू का होही "दीप"
           हे सारी दुनिया करत विचार।
**********

कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

घूस

दूजराम साहू 'अनन्य '

धंधा भ्रष्टाचार के, होगे हे आसान ।
माल मिले चोखा बने , होय खूब सम्मान ।।1।।

अफ़सर नेता मन मिले , बाबू देवय साथ ।
गड्डी मोटा देख के , पुलिस मिलावय हाथ  ।।2।।

माल तोल के लेत हे , बिना तराजू तोल ।
रिश्वत के बाजार मा ,बिकत हवय बिन मोल ।। 3।।
नइ खावय जे घूस ला , करय न भ्रष्टाचार।
अइसन सिधवा जीव हा , पीड़ा सहे हजार ।।4।।

मानय बने तिहार वो, लेथे जेहर घूस ।
सत के रद्दा जे चले,करजा लेवय ठूस ।।5।।

हूम - धूप हर  नेंगहा , भाव -भक्ति हे सार ।
करजा कर जोंगा करय ,माने तभे तिहार ।।6।।

भीख मंँगइया के घलो, होथे बड़ सम्मान ।
बाना सत के जे धरे, वो होवत हिनमान ।। 7।।

बाढ़त भ्रष्टाचार हे ,जिम्मा लेही कौन ।
अफ़सर आंँखी मूंँद लिन ,नेता मन हे मौन‌।। 8।।
    

निवास- भरदाकला (खैरागढ़)

सोमवार, 18 अगस्त 2025

अब का पानी गिरही ग

कवि प्रभात
निटोर देहे निच्चट बादर, अब का पानी गिरही ग?
दूरगत होही जतने धान के, सपना जम्मो मरही ग 

खातू माटी के करजा बाड़ही,
काकर माथे उबरबो 
साँसो के मारे का जीबो,
का हम चैन के मरबो
बड़ सुग्घर इ जिनगी हमर, फांदा जी के बनही ग
दूरगत..

खाय कमाय जाये बर लागहि,
छोड़ के घर, बारी ल
छोड़ के घाट, घटऊँधा सुन्दर
दई, लइका, नारी ल
उन्हों दुख रंग रंग के पाबो, जिनगी हम ल तरही ग
दूरगत..

बिहा नोनी के नई होवे,
बाबू कईसे पड़ही
घर के भिथिया दिखे भसकउल,
चम्मासे मं ओदरही
बिना दवई के डोकरी दाई, बेमारी में घिलरही ग
दूरगत..

लागा बनिया के नई चुके,
ब्याज लगाहि नावा
करिहा किलौली त नरियाही
"त मोर पईसा लावा"
आही घेरी बेरी तगादा, इज्जत माटी मिलहि ग
दूरगत..

नहर के पानी जे खेत आही,
लुही ओहा सोना
ओकर मतलब के हो जाहि,
पेलत जांगर रोना
देख के ओकर छलकत कोठी, मोर मन आगी बरही ग
दूरगत..


ग्राम-कटगी (छत्तीसगढ़

नारी हे तब नर हे जग मा,

कुलदीप सिन्हा "दीप"

 नारी हे तब नर हे जग मा,
         नर हे तब तो नारी जी।
दोनों हावे गा एक बरोबर
         करो न कखरो चारी जी।।ध्रुव पद।।
जग गाये हे नारी के महिमा,
          नर के गा कब गाही जी।
इहाँ एक दूसर के बिना दोनों,
         पहिचान कहाँ ले पाही जी।
का होही गा दुनिया मा जब,
         सब रहि जाही ब्रम्हचारी जी।।1।।
जम्मो नारायण होये हे पैदा,
         नारी के गा तन ले जी।
फेर बिन नर के कइसे होही,
        वो पैदा नारी मन ले जी।
तब काबर कहिथे दुनिया हा,
        नारी ले देवता हारी जी।।2।।
सती सावित्री अनुसुइया जइसे,
        अउ होये हे कतको नारी जी।
फेर इंखरे मन ले मिले हवे गा,
         नारी मन ला चिन्हारी जी।
उही समय ले होये हे जग मा,
         नारी के महिमा उजयारी जी।।3।।
नर नारी दोनों मिल के संगी,
         सृजन सृष्टि के गा करे हे।
तब ले ज्यादा नारी के किस्सा,
         सद्ग्रंथ मन मा जी भरे हे।
एखरे सेती सोंचत हे नर मन "दीप"
        इहाँ कब आही हमरो बारी जी।।4।।


कुकरेल ( सलोनी )

किताब अउ मोबाइल के गोठ

मोबाइल कहिस-
मँय 4G,,,5G ले भरपूर हँव
तोला....दुनियादारी  देखाहुँ
बस चार्जिंग म कमजोर हँव!

किताब कहिस-
मँय बिन बैटरी के चलथंव
जतका  बार  तँय ह पढ़बे
वोतका बार चार्जिंग होथंव !

मोबाइल कहिस-
मोर स्क्रीन म गेम खेल लेबे
फेसबुक अउ व्हाट्सएप म
लइका  जइसन  झूम लेबे !

किताब कहिस-
मोर  पन्ना  पलट  के  देख
ग्यान  मिलही  भर,भर के
मिलही  जिनगी  के  लेख !

मोबाइल  बड़  चमकावय
कभू  हैंग  मँय  हो जाथंव,
ये  क़िताब  ह  मुसकावय
मँय सरलग काम आथंव !

सच म
ये मोबाइल ह  जेब ल भारी करथे
अउ 
क़िताब दिमाग ल उजियारी करथे !

          राजकुमार 'मसखरे'

कुकुर सहराय अपन पुछी

 

चन्द्रकांत खुंटे' क्रांति'
 
कुछ लोगन होथे जिद्दी मुफट
ककरो कहे बरजे नी मानय
कोनो ल अपन नी जानय
घातेच देखा ले अपनापन
कतको परछो दे गन-गन
फेर अपन आदत नी छोड़य
ककरो तिर हाथ-पाँ नी जोड़य
खुद ला मानथे निचट ऊपर
बाखा निकले हे,चाहे कूबर
अपन खामी नी देखय
बोल-बानी मा अब्बड़ सरेखय
जेला नही तेला परेड़य
नाम ले-लेके गिनय
जेकर नही तेकर ला छिनय
सकलाय नदिया कमतर पानी
पुरा आवय छीन भर जुवानी
तेसने बुद्धु लोगन होथे
दुसरा पर परिया दोस थोपे
जइसे कुकुर सहराय अपन पुछी
घात लगाइ अउ अहिंसक सुझी
एसना कभु नी होवय,
जेन पतियाही तेन रोवय।।

चन्द्रकांत खुंटे 'क्रांति'
जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)

मैंने एक गरीब देखा

श्रवण कुमार साहू, "प्रखर"
 
मैंने एक गरीब देखा, 
जो गरीबी रेखा की, 
राशन कॉर्ड से राशन ले, 
जिंदगी जीता है किंतु, 
दस लाख का चुनाव, 
बड़े ही शान से लड़ता है|
फिर भी गरीबी रेखा का, 
मुफ्त आवास का लाभ, 
बड़े ही निर्लज्जता से लेता है--
मैंने एक गरीब देखा---
जो मॉल में पाँच रुपये, 
का समोसा पचास में, 
बड़े शान से खरीदता है, 
ये जताने के लिए की, 
वो कैसी हैसियत वाले हैं|
लेकिन दो रुपये की, 
भाजी के लिए बाजार में, 
एक दिहाड़ी मजदूर से, 
भारी मोल भाव करता है---
मैंने एक गरीब देखा---
जो कर्मकांड पूर्वक, 
एक पत्थर की पूजा, 
करके छप्पन भोग, 
ऐसा लगाता है जैसा
वही सबसे बड़ा भक्त है|
लेकिन अपने ही घर में  , 
बूढ़े माँ बाप को भोजन, 
कुछ इस प्रकार से देता है
जैसा माँ-बाप कोई नौकर हो--
मैंने एक गरीब देखा--
जो घर में आए भिखारी को, 
मुट्ठी भर चावल देने के बजाय, 
उसे ऐसे दुत्कारता है जैसे, 
कोई कोरोना की बीमारी हो, 
और दान करता है उस ट्रस्ट को, 
जो देश का आयकर खा जाता है--
मैंने एक गरीब देखा---
जो मंदिर के बाहर, 
प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द, 
दिन रात भूखा प्यासा रहकर, 
पापी पेट के लिए दामन फैला, 
भीख मांगता है ताकि, 
जरूरत मंदों के लिए भंडारा, 
करा सके इस गरज से, 
ताकि कोई तो अमीरजादा, 
कभी इस जगह आकर देख सके, 
कि गरीब और गरीबी रेखा, 
की जरूरत किसे होती है----
सोचता हूँ क्या मेरा देश, 
अब भी  इतना गरीब है, 
कि गरीबी रेखा का कार्ड, 
बनवाना बहुत जरूरी है? 
 यदि,हाँ तो किसके लिए? 
मॉल वाले उस अति गरीब
भाई साहब के लिए या, 
भीख मांग कर भंडारा, 
कराने वाले उस अकिन्चन के लिए, 
फैसला आप कीजियेगा-----
 
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम गरियाबंद (छ.ग.)

नियत


नरेन्द्र नन्द

 
नियत रहे साफ अउ सच्चा
गोठ लागही करेजा अच्छा
चेहरा म नहीं मन ले देखही
उजियार बन अंधियार नही

नियत हर जब परेम ले भरे
बईर नही कोनो हर तब घरे
जोन चाही त बुराई हरही
ओकर रद्दा म कांटा नीरही

नियत ले करम ह निखरथे
बिन बोले असर ह उभरते
जेकर करेजा हे नेक इरादा
मनोकामना  जल्दी मिलथे

नियत म होय उजियारा
वोला न डर न कोई सहारा
सच के डोर थमके चलथे
वो हर सबले ऊंच सितारा।


जान्हवी सदन
अम्बेडकर वार्ड

धमतरी,छत्तीसगढ़
84588 06946