इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

छत्‍तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले इस पर जोर दें

        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नहीं थे। वे छत्तीसगढ़ आये,छत्तीसगढ़ को देख कर उन्हें लगा होगाा कि छत्तीसगढ़ में विकास के अपार संभावना है। वे छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के नीयत बना ली। उनकी नीति और नीयत साफ  थी, इसी का परिणाम था जैसे ही वे प्रधानमंत्री बने। छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बनाने की। तत्काल अमल में लाया गया और छत्तीसगढ़ राज्य बन गया। आज छत्तीसगढ़ में जो विकास और छत्तीसगढ़ के लोगों में बदलाव,उनके जीवन स्तर में सुधार, आर्थिक क्षेत्र में उन्नति दिख रहा है,वह सिर्फ और सिर्फ  माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन है।
        छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनाने के समय यह नहीं देखा गया कि कौन से क्षेत्र में साल - सागौन होता है। कौन से क्षेत्र में कोयला का भंडार हैै। कहां पर खनिज सम्पदा है, कहां धान, राहेर, चना, कोदो कूटकी हो व अन्य फसल होती है। सिर्फ यही देख गया कि कहां से ले कहां तक छत्तीसगढ़ी बोलने, समझने वाले लोग हैं। संभवत: इसी का निरधान किया गया और वहीं तक के क्षेत्र को छत्तीसगढ़ राज्य में शामिल कर लिया गया।
        मतलब साफ  है - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली कानिरधान किया गया फिर छत्तीसगढ़ राज्य के लिए क्षेत्र का निरधान किया गया। इतना सब कुछ होने के बाद भी हम आज तक छत्तीसगढ़ी को राजभासा की दर्जा क्यों नहीं दिलवा पायें? हमें आत्ममंथन करना होगा? आत्मचिंतन करना पड़ेगा। हमें इस पर भी चिंतन करना होगा कि हमारी नीयत साफ  है या फिर हमारी नीति और नीयत में खोंट है?
        वैसे ही छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने की चर्चा चली तो वे धुरंधर लेखक जिन्हें छत्तीसगढ़ी से दुराव था, वे ही सबसे बड़े हितैषी बनकर सामने आ गये। छत्तीसगढ़ी के वे सर्जक जो आजीवन छत्तीसगढ़ी में सृजन करते रहे, उन्हें नेपथ्य में धकेल दिया गया। वे लोग जिन्हें छत्तीसगढ़ी से लगाव नहीं था, छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण को लेकर विवाद की स्थिति पैदा कर रहे हैं जो छत्तीसगढ़ी भाषा के हित में नहीं लगता।
        छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण को लेकर भी अनेक बातें सामने आने लगी है। पूर्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बोली के रूप में किया जाता था इसी का परिणाम था कि जो जिस क्षेत्र का रचनाकार था वह अपने क्षेत्र के आमबोल चाल का उपयोग साहित्य मे करता था, जिससे छत्तीसगढ़ी में एकरूपता नहीं आ सकी यदि हम ईमानदारी के साथ छत्तीसगढ़ी को राजभाषा के रुप में देखना चाहतें हैं तो प्रथम छत्तीसगढ़ी राजभाषा की दर्जा दिलाने कमर कसनी होगी। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा की दर्जा मिलेगी फिर धीरे - धीरे एकरुपता आ ही जायेगी। इसके लिए विभिन्न जिले के छत्तीसगढ़ी  जानकारों, साहित्यकारों, विद्वानों को एक मंच पर ला कर निर्धारण करना हो
         राज्य के विचारों की परम्परा और राज्य की समग्र भाषायी विविधता के प्रचलन और विकास करने तथा इसके लिये भाषायी अध्ययन, अनुसंधान तथा दस्तावेज संकलन, सृजन तथा अनुवाद, संरक्षण, प्रकाशन, सुझाव तथा अनुशंसाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पारम्परिक भाषा को बढ़ावा देने हेतु शासन में भाषा के उपयोग को उन्नत बनाने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन किया गया है। आयोग के द्वारा प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है, जहां ऐसे लाखों रुपये खर्च दिए जाते हैं और परिणाम सिफर रहता है ऐसे उद्देश्यहीन आयोजनों का क्या औचित्य जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपयों की आहूति दे दी जाती हो, किस काम का?
        यदि हम वास्तव में छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने प्रतिबद्ध है तो अन्य - अन्य विषय पर बहस करके समय खराब नहीं करना चाहिए। हमें चाहिए कि हम सिर्फ और सिर्फ छत्तीसगढ़ी को राजकाज का दर्जा मिले इस पर जोर दें ...

सोमवार, 29 अगस्त 2016

पानी और वृक्ष, सब पर भारी। अब न चेते तो पछताना पड़ेगा

        प्यास से आकुल - व्याकुल संतान कहेगी - माँ, अब तो प्यास सही नहीं जाती। कहीं से भी एक घूंट पानी की व्यवस्था कर दो।''
       माँ कहेगी - '' कुछ देर और ठहर। तेरे पिता कांवर लेकर नदी गये हैं। झिरिया खोदकर पानी लाएंगे फिर जी छकते तक पी लेना।''  माँ जानती है - वह संतान को मात्र दिलासा दे रही है। नदी - नाले सूख गए हैं। बोर और कुँए के पानी का जल स्तर एकदम नीचे जा चुका है। जिस नदी पर बीता भर खोदते ही पानी आ जाता था, अब कमर तक खोदने पर भी बूंद भर पानी नहीं आता। सिवाय बालू के। नल में घंटों प्रतीक्षा के बाद भी बूंद भर पानी नहीं टपकता। कुँए और बोर सूख गए हैं। माँ अपनी संतान को लाख कोशिशों के बावजूद बूँद भर पानी नहीं दे सकती। फिर छकते तक पानी, वह अपनी संतान को कहाँ से, कैसे पिला सकेगी ?
       यदि अब भी हम अपनी आँखों से पट्टी नहीं हटाये तो यह दुर्दिन आने में देर नहीं। आज जिस तरह धड़ल्ले से वृक्ष कट रहे हैं। वृक्षारोपण का दिखावा मात्र किया जा रहा है। इसके कारण अवर्षा - खंडवर्षा की स्थिति निर्मित हो रही है। धरती के पानी का हम दोहन की जगह, शोषण कर रहे हैं। जगह - जगह धरती को छेदकर पानी पाने प्रयासरत हैं। इन तमाम कृत्यों का दुखद परिणाम आगामी समय में आये इसमें आश्चर्य नहीं।
       आप हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये गिन रहे हैं। नोटों की गिनती करते - करते आप पसीना से तरबतर हो गये हैं। गला सूख गया हैं। आप ग्लास भर पानी हलक से उतारना चाहते हैं। गला तर करना चाहते हैं। पर यदि ग्लास भर पानी मिलना तो दूर, यदि जिव्हा भी तर करने बूँद भर पानी न मिले तो ऐसी स्थिति में आपकी क्या गति होगी,इसका सर्वेक्षण आप स्वयं करें।
      लगातार हम पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं। वातावरण दूषित और प्रदुषित होते जा रहा है। आज पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति हमारी लापरवाही, हमें दूषित -प्रदुषित वातावरण में जीने बाध्य कर रही है। स्वच्छ वातावरण से मनुष्य स्वस्थ रहेगा। स्वच्छ वातावरण से हमें जीवनदायिनी पानी मिलेगा वरन विषैला खाद्य पदार्थ तो खा ही रहे हैं, आगामी समय में विषैला पानी पीने की बाध्यता से कोई रोक नहीं सकेगा।
      फसल पर हम सब का जीवन टिका हुआ है। बरसात के पूर्व किसान खेतों में फसल बोने की तैयारी करता है। खेतों की साफ - सफाई करता है। बादल उमड़ते - घुमड़ते हैं तो कई किसान वर्षा होने के पूर्व खेतों की जुताई करते हैं ताकि बन दुबी खत्म हो जाये और अच्छी फसल हो। फिर किसानों को वर्षा होने की प्रतीक्षा रहती है। प्रकृति से लगातार खिलवाड़ के परिणाम, बादल उमड़ - घुमड़ कर लौट जाता है। अवर्षा से किसान हताश - परेशान - निराश हो जाता हैं। जिन खेतों में फसलें लहलहाती, वहां सूखे की मार होती है और धरती फटती चली जाती है। इत्तफाकन फसल बोने लायक वर्षा हो गयी। बीज अंकुरित हो गये फिर वर्षा रुक गई तब  धरती पर उगी फसलें, फसलें नहीं रह जाती। धरती में जगह - जगह दरारें पड़ती हैं। अवर्षा हरियाली छीन लेती है। अकाल की मार सिर्फ किसानों को ही नहीं, सबको पड़ती हैं।
       '' जल ही जीवन है '' '' जल है तो कल है '' पानी बचाने के उद्देश्य से ऐसे अनेक नारे लगाए जाते हैं। पर क्या इसे जमीनी हकीकत में उतारने हम ईमानदारी दिखाते हैं। जहाँ एक ओर एक - एक बूंद पानी पाने पूरे परिवार जुटे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पानी का भारी मात्रा में दुरुपयोग किया जाता है। नल की टोटियां खुली रहती हैं और लाखों लीटर पीने योग्य पानी बहकर नालियों में समाहित हो जाता है। पेयजल पाने कितना युद्ध करना पड़ता है यह देखना हो तो आप ऐसे क्षेत्र में जाइये जहां एक - दो सार्वजनिक नल हो, पेयजल आपूर्ति के लिए टैंकर आता हो।
       छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है। यहां के अधिकांश परिवार का जीवन कृषि पर टिका हुआ है। कृषि पूर्णता: पानी पर निर्भर होता है। और यदि कृषि कार्य के लिए पानी न मिले तो क्या होगा इस पर विचार करें। आज हम पानी संरक्षण - सवर्धन की बातें तो बहुत करते हैं। भाषणबाजी करते हैं। सलाह मश्विरा देते हैं पर स्वयं पानी के संरक्षण और संवर्धन के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वृक्षारोपण की बातें कागजों पर सिमट कर रह जाती है। कितने ऐसे पौधे हैं, जिसका रोपण किया गया। उसके साथ फोटो खिचाया गया। अखबारों में प्रकाशित हुआ, वे वृक्ष का रुप ले पाए और आज जीवित है ? मात्र वृक्षारोपण कर देने, अखबारों में फोटो छपवा लेने से पौधा वृक्ष नहीं जाएंगे। भले एक ही पौधा क्यों न हो, उसका रोपण करने के साथ यह भी संकल्प लें कि उसे वृक्ष बनते तक संरक्षण एवं सवर्धन करेंगें।
       मुझे अपना बचपना याद आ रहा है। गाँव में हमारी थोड़ी सी खेती है। एक दिन मेरे पिताजी सेठ की दूकान से '' पैरी '' बीज ले आये। उन्होंने मेरी माँ से कहा - '' इसे, खेत की मेड़ में बो आओ। ''
       मेरी माँ और चाची खेत में गये। दातारी से मेड़ों की जुताई की और लगे पैरी बीज बोने। गाँव के लोगों ने देखा तो हंसी उड़ाते हुए कहा -  '' नूतन गुरुजी ल घलक रिकम -  रिकम के सुझथे। बहू बिचारी मन ल पइरी बोये बर भेज दे हे। अरे, दुनिया लीम, आमा, जाम लगाथे ता ये ला बबूल बोये के सूझे हवे। ''
       मेरे पिता जी की दृष्टिकोण एकदम साफ थी। वे जानते थे, आम - जाम के वृक्ष लगाने के बाद उसके देख रेख की आवश्यकता बहुत पड़ती है। बबूल एक ऐसा वृक्ष है जिसके देख - रेख की आवश्यकता उतनी नहीं पड़ती, हां, बीच - बीच में उसे सीधा ले जाने के लिए कटाई - छंटाई की जरुरत होती है। मैंने देखा कुछ ही दिनों में माँ और चाची द्वारा बोये बबूल बीज अंकुरित हो गये और धीरे - धीरे वह वृक्ष का रुप लेने लगा। आज भी हमारी उस खेत की मेड़ पर जो बबूल के वृक्ष है वे मेरी माँ और मेरी चाची द्वारा बोये पैरी बीज का ही वृक्ष है।
       हर वर्ष वर्षा ऋतु में वृहद मात्रा में वृक्षारोपण का कार्यक्रम चलाया जाता है, पर सोचनीय तथ्य यह है कि जिस पौधा का रोपण किया गया क्या वह वृक्ष बन पाया ? हमें वृक्षारोपण के साथ उसके संरक्षण एवं सर्वधन के प्रति पूरी ईमानदारी बरतनी पड़ेगी तभी हमारा वृक्षारोपण का वृहद कार्यक्रम सफल माना जायेगा। यदि हम समय रहते नहीं चेते, जागरुक नहीं हुए तो वृक्ष और पानी से खिलवाड़ हमें बहुत ही भारी पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ के कवि एवं गीतकार मुकुन्द कौशल की पंक्तियाँ :-
       लीम डँगाली चघे हे करेला के नार
       इतरावथे लबरा बादर, घेरी - बेरी नाचै रे बीच बाजार
       ये मीठलबरा ह,
       ठगुवा कस पानी ह ठगै अऊ मूड़ धरे बइठे किसान -
       ये हो भइया गा मोर, कइसे बचाबो परान।
       ये बिधाता गा मोर, कइसे बचाबो परान।।

***
       कलपत खेत, गोहारत हे तोला, आके अगास ला छादे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।
                      तरिया सुखागै, नंदिया सुखागै
                      कूआँ अंउटगे, बारी लसागै
                      झरगे जम्मों पेड़ के पाना
                      गाय - गरुवा के सिरागे रे दाना
       आजा रे आजा बजावत बाजा, छल छल पानी बोहा दे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।

                                                                                                                            संपादक
                                                                                                                           सुरेश सर्वेद

शनिवार, 28 मई 2016

पानी और वृक्ष सब पर भारी, अब नहीं चेते तो पछताना पड़ेगा

        प्यास से आकुल - व्याकुल संतान कहेगी - माँ, अब तो प्यास सही नहीं जाती। कहीं से भी एक घूंट पानी की व्यवस्था कर दो।''
       माँ कहेगी - '' कुछ देर और ठहर। तेरे पिता कांवर लेकर नदी गये हैं। झिरिया खोदकर पानी लाएंगे फिर जी छकते तक पी लेना।''  माँ जानती है - वह संतान को मात्र दिलासा दे रही है। नदी - नाले सूख गए हैं। बोर और कुँए के पानी का जल स्तर एकदम नीचे जा चुका है। जिस नदी पर बीता भर खोदते ही पानी आ जाता था, अब कमर तक खोदने पर भी बूंद भर पानी नहीं आता। सिवाय बालू के। नल में घंटों प्रतीक्षा के बाद भी बूंद भर पानी नहीं टपकता। कुँए और बोर सूख गए हैं। माँ अपनी संतान को लाख कोशिशों के बावजूद बूँद भर पानी नहीं दे सकती। फिर छकते तक पानी, वह अपनी संतान को कहाँ से, कैसे पिला सकेगी ?
       यदि अब भी हम अपनी आँखों से पट्टी नहीं हटाये तो यह दुर्दिन आने में देर नहीं। आज जिस तरह धड़ल्ले से वृक्ष कट रहे हैं। वृक्षारोपण का दिखावा मात्र किया जा रहा है। इसके कारण अवर्षा - खंडवर्षा की स्थिति निर्मित हो रही है। धरती के पानी का हम दोहन की जगह, शोषण कर रहे हैं। जगह - जगह धरती को छेदकर पानी पाने प्रयासरत हैं। इन तमाम कृत्यों का दुखद परिणाम आगामी समय में आये इसमें आश्चर्य नहीं।
       आप हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये गिन रहे हैं। नोटों की गिनती करते - करते आप पसीना से तरबतर हो गये हैं। गला सूख गया हैं। आप ग्लास भर पानी हलक से उतारना चाहते हैं। गला तर करना चाहते हैं। पर यदि ग्लास भर पानी मिलना तो दूर, यदि जिव्हा भी तर करने बूँद भर पानी न मिले तो ऐसी स्थिति में आपकी क्या गति होगी,इसका सर्वेक्षण आप स्वयं करें।
      लगातार हम पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं। वातावरण दूषित और प्रदुषित होते जा रहा है। आज पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति हमारी लापरवाही, हमें दूषित -प्रदुषित वातावरण में जीने बाध्य कर रही है। स्वच्छ वातावरण से मनुष्य स्वस्थ रहेगा। स्वच्छ वातावरण से हमें जीवनदायिनी पानी मिलेगा वरन विषैला खाद्य पदार्थ तो खा ही रहे हैं, आगामी समय में विषैला पानी पीने की बाध्यता से कोई रोक नहीं सकेगा।
      फसल पर हम सब का जीवन टिका हुआ है। बरसात के पूर्व किसान खेतों में फसल बोने की तैयारी करता है। खेतों की साफ - सफाई करता है। बादल उमड़ते - घुमड़ते हैं तो कई किसान वर्षा होने के पूर्व खेतों की जुताई करते हैं ताकि बन दुबी खत्म हो जाये और अच्छी फसल हो। फिर किसानों को वर्षा होने की प्रतीक्षा रहती है। प्रकृति से लगातार खिलवाड़ के परिणाम, बादल उमड़ - घुमड़ कर लौट जाता है। अवर्षा से किसान हताश - परेशान - निराश हो जाता हैं। जिन खेतों में फसलें लहलहाती, वहां सूखे की मार होती है और धरती फटती चली जाती है। इत्तफाकन फसल बोने लायक वर्षा हो गयी। बीज अंकुरित हो गये फिर वर्षा रुक गई तब  धरती पर उगी फसलें, फसलें नहीं रह जाती। धरती में जगह - जगह दरारें पड़ती हैं। अवर्षा हरियाली छीन लेती है। अकाल की मार सिर्फ किसानों को ही नहीं, सबको पड़ती हैं।
       '' जल ही जीवन है '' '' जल है तो कल है '' पानी बचाने के उद्देश्य से ऐसे अनेक नारे लगाए जाते हैं। पर क्या इसे जमीनी हकीकत में उतारने हम ईमानदारी दिखाते हैं। जहाँ एक ओर एक - एक बूंद पानी पाने पूरे परिवार जुटे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पानी का भारी मात्रा में दुरुपयोग किया जाता है। नल की टोटियां खुली रहती हैं और लाखों लीटर पीने योग्य पानी बहकर नालियों में समाहित हो जाता है। पेयजल पाने कितना युद्ध करना पड़ता है यह देखना हो तो आप ऐसे क्षेत्र में जाइये जहां एक - दो सार्वजनिक नल हो, पेयजल आपूर्ति के लिए टैंकर आता हो।
       छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है। यहां के अधिकांश परिवार का जीवन कृषि पर टिका हुआ है। कृषि पूर्णता: पानी पर निर्भर होता है। और यदि कृषि कार्य के लिए पानी न मिले तो क्या होगा इस पर विचार करें। आज हम पानी संरक्षण - सवर्धन की बातें तो बहुत करते हैं। भाषणबाजी करते हैं। सलाह मश्विरा देते हैं पर स्वयं पानी के संरक्षण और संवर्धन के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वृक्षारोपण की बातें कागजों पर सिमट कर रह जाती है। कितने ऐसे पौधे हैं, जिसका रोपण किया गया। उसके साथ फोटो खिचाया गया। अखबारों में प्रकाशित हुआ, वे वृक्ष का रुप ले पाए और आज जीवित है ? मात्र वृक्षारोपण कर देने, अखबारों में फोटो छपवा लेने से पौधा वृक्ष नहीं जाएंगे। भले एक ही पौधा क्यों न हो, उसका रोपण करने के साथ यह भी संकल्प लें कि उसे वृक्ष बनते तक संरक्षण एवं सवर्धन करेंगें।
       मुझे अपना बचपना याद आ रहा है। गाँव में हमारी थोड़ी सी खेती है। एक दिन मेरे पिताजी सेठ की दूकान से '' पैरी '' बीज ले आये। उन्होंने मेरी माँ से कहा - '' इसे, खेत की मेड़ में बो आओ। ''
       मेरी माँ और चाची खेत में गये। दातारी से मेड़ों की जुताई की और लगे पैरी बीज बोने। गाँव के लोगों ने देखा तो हंसी उड़ाते हुए कहा -  '' नूतन गुरुजी ल घलक रिकम -  रिकम के सुझथे। बहू बिचारी मन ल पइरी बोये बर भेज दे हे। अरे, दुनिया लीम, आमा, जाम लगाथे ता ये ला बबूल बोये के सूझे हवे। ''
       मेरे पिता जी की दृष्टिकोण एकदम साफ थी। वे जानते थे, आम - जाम के वृक्ष लगाने के बाद उसके देख रेख की आवश्यकता बहुत पड़ती है। बबूल एक ऐसा वृक्ष है जिसके देख - रेख की आवश्यकता उतनी नहीं पड़ती, हां, बीच - बीच में उसे सीधा ले जाने के लिए कटाई - छंटाई की जरुरत होती है। मैंने देखा कुछ ही दिनों में माँ और चाची द्वारा बोये बबूल बीज अंकुरित हो गये और धीरे - धीरे वह वृक्ष का रुप लेने लगा। आज भी हमारी उस खेत की मेड़ पर जो बबूल के वृक्ष है वे मेरी माँ और मेरी चाची द्वारा बोये पैरी बीज का ही वृक्ष है।
       हर वर्ष वर्षा ऋतु में वृहद मात्रा में वृक्षारोपण का कार्यक्रम चलाया जाता है, पर सोचनीय तथ्य यह है कि जिस पौधा का रोपण किया गया क्या वह वृक्ष बन पाया ? हमें वृक्षारोपण के साथ उसके संरक्षण एवं सर्वधन के प्रति पूरी ईमानदारी बरतनी पड़ेगी तभी हमारा वृक्षारोपण का वृहद कार्यक्रम सफल माना जायेगा। यदि हम समय रहते नहीं चेते, जागरुक नहीं हुए तो वृक्ष और पानी से खिलवाड़ हमें बहुत ही भारी पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ के कवि एवं गीतकार मुकुन्द कौशल की पंक्तियाँ :-
       लीम डँगाली चघे हे करेला के नार
       इतरावथे लबरा बादर, घेरी - बेरी नाचै रे बीच बाजार
       ये मीठलबरा ह,
       ठगुवा कस पानी ह ठगै अऊ मूड़ धरे बइठे किसान -
       ये हो भइया गा मोर, कइसे बचाबो परान।
       ये बिधाता गा मोर, कइसे बचाबो परान।।

***
       कलपत खेत, गोहारत हे तोला, आके अगास ला छादे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।
                      तरिया सुखागै, नंदिया सुखागै
                      कूआँ अंउटगे, बारी लसागै
                      झरगे जम्मों पेड़ के पाना
                      गाय - गरुवा के सिरागे रे दाना
       आजा रे आजा बजावत बाजा, छल छल पानी बोहा दे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।

                                                                                                                            संपादक
                                                                                                                           सुरेश सर्वेद

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

तब भी तिकड़ी थी, अब है, तो दोष कैसा मित्र?

     मुक्तिबोध ने लिखा है - '' समस्या एक  - मेरे सभ्य नगरों और ग्रामोंं में, सभी मानव सुखी, सुंदर और शोषणमुक्त कब होंगे? '' सभी मानव सुखी, सुंदर और शोषणमुक्त हों। इसकी चिंता केवल साहित्यकारों को हो, तो इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है, सबका प्रयास और सबकी सहभागिता जरूरी है। मुक्तिबोध हमारे अपने शहर राजनांदगाँव के हैं, अपने हैं, जन - जन की चिंता करने वाले कवि हैं, यह सोचकर हमें गर्व होता है।
     पिछले दिनों भिलाई में एक साहित्यिक मित्र मिल गये थे। साहित्य की कुछ बातें हुईं। कुछ संक्षिप्त चर्चा के बाद उसने कहा -  ' राजनांदगाँव कभी साहित्य के केन्द्र में होता था।' उसके इस कथन में राजनांदगाँव की आज की साहित्यिक स्थिति पर अफसोस तो था ही पर इससे अधिक साहित्य के मामले में खुद की और उनके अपने शहर की श्रेष्ठता के भाव की अभिव्यंजना अधिक थी। मुझे लगा, इसका जवाब देना जरूरी है, यह बताना जरूरी है कि राजनांदगाँव से निकलने वाला साहित्य - त्रिवेणी का उत्स अभी भी सूखा नहीं है, अनवरत जारी है, और जवाब दिया भी गया।
     यहाँ एक आत्मिक मित्र हैं। बड़े जुजाड़ू हैं, साहित्य, संगीत, राजनीति, सब ओर उनकी नजरें होती हैं। खुद की उनकी उपलब्धि तो अब तक शून्य है पर स्वयं को वे यहाँ के साहित्यकारों का गॉडफादर समझते हैं। उन्होंने एक शिगूफा छोड़ रखा है कि -  ' राजनांदगाँव में आजकल सर्वेद ( अर्थात मैं), कुबेर और यशवंत की तिकड़ी गुटबाजी करने लगी है, साहित्य की राजनीति करने लगी है। ' आपको बता दूँ, सर्वेद, कुबेर और यशवंत जब मिलते हैं तो साहित्य की चर्चा तो होती ही है पर इसमें उस महोदय को गुटबाजी नजर आती है, तो यह उनका दृष्टिदोष होगा, रह गई बात साहित्य की राजनीति की, तो इसका अभिप्राय वे ही बता सकते हैं। फिलहाल, कोरबा में गत 19 - 20 फरवरी को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का चौंथा प्रांतीय अधिवेशन हुआ था। राज्यभर के साहित्यकारों का वहाँ मेला लगा होगा, यहाँ से भी काफी लोग उस मेंले में गये थे। हमारे उपरोक्त आत्मिक मित्र इस मेले में न जाते, संभव नहीं था।
     एक दिन हमारी तिकड़ी बैठी हुई थी। सम्मेलन से लौटकर आये लोग कुबेर को बधाइयाँ दे रहे थे, यह बताते हुए कि सम्मेलन में उनकी काफी चर्चा हुई है। मित्र के बारे में यह सुनकर मुझे आत्मिक खुशी हुई। तभी मेले से ही लौटे एक अन्य मित्र ने बताया - ' लेकिन यार, आपके उस आत्मिक मित्र (जिसकी चर्चा इस पैरा के प्रारंभ में किया गया है) ने तो होटल के कमरे में कुबेर सर को दोनों दिन रात - रातभर जमकर कोसा है। अपनी टिप्पणी में इनके बारे में काफी अभद्र भाषा और असभ्य शब्दों को प्रयोग किया है।'
     सुनकर कुबेर ने हँसते हुए कहा - यार! तब तो मैं जरूर बड़ा आदमी बन गया हूँ। क्योंकि ऐसी अहेतुक टिप्पणियाँ तो बड़े लोगों के बारे में ही होती हैं।' मैंने पूछा - इस ' अहेतुक टिप्पणी ' से आपका क्या मतलब है? उन्होंने कहा - मैंने उनका किसी तरह से नुकसान, अपमान तो कभी किया नहीं है, तो मेरे बारे में उनकी यह टिप्पणी अहेतुक ही कही जायेगी न ? ' वाह! क्या बात है।
     मुक्तिबोध तो स्वयं में साहित्य की एक संस्था ही थे। किसी महान् व्यक्ति की प्रतिभा के संबंध में जिस '' फ्लैश ऑफ इमैजिनेशन '' की बातें होती है, वह उनके पास था। उनके जैसा दूसरा कोई हो नहीं सकता। कोई एक व्यक्ति उनकी साहित्यिक परंपरा को ढो नहीं सकता। प्रयास जरूर किया जा सकता है और मुझे लगता है हमारी यह तिकड़ी ऐसा कर भी रही है। आज मैं इस तिकड़ी के कुबेर और यशवंत के बारे में कुछ बातें करना चाहूँगा।
     कुबेर राजनांदगाँव के उसी दिग्विजय महाविद्यालय के स्नातक हैं जहाँ कभी मुक्तिबोध अध्यापन किया करते थे। अब तक उनकी सात पुस्तकें, तीन हिन्दी में और चार छत्तीसगढ़ी में, प्रकाशित हो चुकी हैं। दो किताबें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। लेखन उनकी आजीविका का साधन नहीं है, उनका व्यवसाय नहीं है फिर भी पिछले ढाई दशक से वे निरंतर लिख रहे हैं।
     इस साल प्रकाशित उनके व्यंग्य संग्रह ' माइक्रोकविता और दसवाँ ' रस के बारे में व्यंग्यकार डॉ. सुरेशकांत ने अपने मित्रों को  संबोधित करते हुए अपने ब्लाग में लिखा है - '' क्या आप कुबेर को जानते हैं? जानेंगे भी कैसे? वे दिल्ली में जो नहीं रहते। वह दिल्ली, जिसने व्यंग्य - लेखकों को पुष्पित - पल्लवित - पुरस्कृत होने का मुंबई जैसी मायानगरी से भी ज्यादा मौका दिया। मुंबई अमिताभ जैसों को अमिताभ बच्चन बनने का मौका भले देती हो, पर यज्ञ शर्मा जैसा सतत लेखनरत व्यंग्यकार भी वहाँ नौसिखिये व्यंग्यकार की तरह गुमनाम मर गया। जबकि इधर दिल्ली में औसत दर्जे के व्यंग्यकार भी लिखने से ज्यादा दिखने के बल पर पहले धन्य और फिर मूर्धन्य होकर शीर्ष पर पहुंच गए तथा सारे इनामों - इकरामों पर हाथ साफ  करते रहे।
कुबेर का पहला व्यंग्य - संग्रह 'माइक्रो कविता और दसवाँ रंस '  पढ़ने के बाद से मेरे मन में यह सवाल कौंधता रहा है कि दिल्ली की तुलना में छोटी जगह पर रहकर लिखने वाले व्यक्ति के लिए उसकी यह स्थिति किस कदर अभिशाप है!
     दीपावली के दूसरे दिन की बात है, कुबेर को किसी सज्जन का फोन आया। लगभग दस मिनट की लंबी बातचीत हुई। आखिर मैंने पूछा - कौन था? कुबेर ने कहा - शंकर पुणतांबेकर, व्यंग्यकार। 'माइक्रोकविता और दसवाँ रस ' के बारे में चर्चा कर रहे थे।
     कुबेर की रचनाओं को पढ़कर उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को समझा जा सकता है। उनकी भाषा में प्रवाह है, आकर्षण है; स्पष्टता है और संप्रेषणीयता है; शैली में नवीनता है, जो उन्हें भीड़ से अलग करती है। 
     हमारी तिकड़ी के दूसरे सदस्य हैं - उभरते हुए समीक्षक, यशवंत। किसी कृति की समीक्षा के लिए अपना पैमाना और अपना निकर्ष वे स्वयं बनते हैं। पिछले कुछ महीनों से वे भावनात्मक-भ्रष्टाचार की बातें कर रहे हैं। भावनात्मक और भ्रष्टाचार - ये दोनों शब्द अपने पृथक - पृथक अर्थों में सुपरिचित शब्द हैं। परन्तु समकालीन - साहित्य जैसे पद की तरह एक पद के रूप में भावनात्मक - भ्रष्टाचार मेरे लिए सर्वथा अपरिभाषित शब्द है। मैंने उनसे इसका अर्थ पूछा। उन्होंने मुझे समझाया - ' यह तो आजकल चारों ओर व्याप्त है। समझ लो, ईश्वर घट - घट में बसते हैं, तो यह नीयत - नीयत में बसता है। व्यापार, व्यवहार, सरकार, दफ्तर और परिवार, सबके नियंता यही हैं।' उनकी यह व्याख्या मुझे संतुष्ट न कर सकी। बाद में कुबेर ने माइक्रों कविता और दसवाँ रस में अपने मन की बात में इस शब्दावलि की अच्छी खबर ली है।
     यह तिकड़ी यहाँ की साहित्यिक परंपरा के प्रति मुझे पूर्ण आश्वस्त करती है।
संपादक

सोमवार, 31 अगस्त 2015

का हम छत्‍तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये खातिर ईमानदार हन

        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये के उदिम म महूं सामिल हो गेंव। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये सेती दू ठन बड़का - बड़का आयोजन करे रिहीस। एक रायपुर म अउ दूसर भिलई म। ये आयोजन म सामिल होय के घलोक मोला नेवता मिले रिहीस पर पहुंच नइ पायव। तीसर बड़का  आयोजन बिलासपुर म आयोजित करे गीस तिहां महूं संगी - संगवारी मन संग पहुंच गेंव।
        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये बर हमर भासनबाज नेता किसम के कलमकार अउ सासन सत्ता म बइठे नेता मन कतका ईमानदार हवे, मंय इही ल परखना चाहत रहेंव। पहिली तो मन म अइस कि दू दिन के भूंके म का वास्तव म छत्तीसगढ़ी राजकाज के भासा बन जाही। पर सिरिफ दू दिन के आयोजन के बात तब मोला समझ म अइस जब बिलासपुर म देखेंव कि छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर सकलाये लोगन मन कइसे सरकारी पइसा के धुर्रा उड़ावत हवै। जिंहा तक मंय समझथौं , ये दू दिन म जतका रुपिया बोहाये गीस ओतका रुपिया म कम से कम तीन ठन बेटी के बिहाव हो जातीस। छत्तीसगढ़ी के पन्‍द्रह - बीस ठन किताब छप जतिस।
        बिकसस तभे संभव होथे जब मुंहूं म पैरा गोंज के काम करे जाथे पर मंय देखेंव, छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर जुरयाये लोगन मन कार्यक्रम के जघा म बकर करिन, ठोसलगहा पेट भरिन, उचहा लाज म रुकिन, थैली भरिन अउ बिन डकार मारे लहुंट गे।
        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नई रिहीन। उन हर छत्तीसगढ़ अइन अउ छत्तीसगढ़ ल देख के उन ल लगीस होही कि छत्तीसगढ़ म बिकास के अपार संभावना हवै। उन हर तभे छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के नीयत बना लीन। उंकर नीति अउ नीयत साफ रहै के परिणाम, जइसे उन देश के प्रधानमंत्री बनीन, छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के घोषणा कर दीन। आज छत्तीसगढ़ म जउन बिकास अउ छत्तीसगढ़ के लोगन म बदलाव के रुप दिखत हवै ओहर सिरफ अउ सिरफ माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन आवै।
        जब छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के बेरा ये नइ देखे गीस कि कते क्षेत्र म साल - सागौन होथे। कते क्षेत्र म कोइला के भंडार हवै। कते मेर धान अउ कोदो - कूटकी होथे। सिरिफ इही देखे गीस कि कतिहा ले कतिहा तक छत्तीसगढ़ी बोलइया, समझइया मन बगरे हवै। इही ल निरधान करिन अउ उहें तक ल छत्तीसगढ़ राज म सामिल कर ले गीस।
        मतलब साफ हवै - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली के निरधान होइस फेर छत्तीसगढ़ राज बर क्षेत्र के निरधान करे गीस। अतका सब कुछ होय के बाद भी हम मन ल आज छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा देवाये खातिर काबर आयोजन करे के जरुरत होवत हवै? हमला आत्ममंथन करे ल पड़ही,आत्मचिंतन करे ल परही का हमर नीति अउ नीयत साफ हवै या फेर हमर नीति अउ नीयत म खोंट हवै?
        आज छत्तीसगढ़ के बड़का - बड़का पद म ओमन बिराजमान हवै जउन मन के खानदान न कभू छत्तीसगढ़ी पढ़े होही, न लीखे होही मंय तो कहिथौं कतको झन के खानदान छत्तीसगढ़ी बोले घलक नइ होही? अइसन मन काबर छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनन दीही? कहूं अइसन आयोजन उंकरे मन के खेल तो नोहय?
गांव म खेल देखाये सेती मदारी आथे। डमरु बजाथे। गाँव वाले मन जुरिया जाथे। मदारी खेल देखाथे। गाँव वाले मन तारी पीटथे। रुपिया दू रुपिया सकेल के मदारी चले जाथे। कहूं हम मन घलक अइनेच तो नइ करत हवन? हम मन ल सोचे ल परही, गुने ल परही ....। 
सम्‍पादक

शनिवार, 29 नवंबर 2014

सिर्फ लेखन के लिए ही बहाना क्यों ?

इस सम्पादकीय को लिखने के पीछे मेरी मंशा यह कतई नहीं है कि मैं अपने मित्र की पीड़ा को उजागर कर रहा हूँ। मेरी मंशा न तो मित्र की पीड़ा को बताने की है और न ही उनके पारिवारिक बंधन में बंध जाने की उनकी विवशता और कमजोरी को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की। मैंने केवल इस बात की ओर इंगित करने का प्रयास किया है कि हमारी लेखनी हमसे कैसे छूटती जा रही है।
एक लंबे अतंराल, लगभग बीस वर्ष के बाद, मैं अपने एक मित्र के घर गया। दरवाजा खटखटाने पर मित्र की पत्‍नी ने कीवाड़ खोला। वह उनींदी थी। मैंने पूछा - जयंत घर पर हैं ।''
जयंत के घर पर होने की स्वीकृति देते हुए उसने मुझे अंदर आने के लिए कहा। मैंने जयंत के घर में प्रवेश किया। छपरी तक पहुँचा। तब तक जयंत भी जाग चुका था। समय दोपहर का था। संभव है, खेती - किसानी के काम से थककर वह आराम कर रहा होगा। जयंत रुम से चलकर छपरी में आ चुका था। हम एक - दूसरे को पहचान गये।
एक लम्बे समय बाद हमारी मुलाकात हो रही थी। मन के भीतर एक अजीब सा रोमांच था। दुआ - सलाम हुई। कुर्सी पर बैठते हुए मैंने कहा - ''बहुत दिनों बाद मुलाकात हो रही है। और क्या हाल चाल है?''
- ''खेती - किसानी चल रही है।'' जयंत का संक्षिप्त उत्तर मिला।
मैंने बताया - '' आजकल मैं राजनांदगाँव में रहता हूँ। गाँव आना - जाना लगा रहता है। वर्तमान में मैं '' विचार वीथी '' नामक एक साहित्यिक पत्रिका निकाल रहा हूँ। तुम अच्छी कहानी लिखते हो। पत्रिका के लिए तुमसे कहानी लेने आया हूँ।''
आज भी मैं उसके भीतर संकोच और लज्जापन महसूस कर रहा था। उसने कहा - ''लम्बे समय से लेखन नहीं किया हूंँ। खेती - किसानी और घर - परिवार की जिम्मेदारी इतनी अधिक हो गई है कि लिखने का अवसर ही नहीं मिलता।''
यह वह मित्र है, जिसके बारे में बताऊंँगा तो सहज रुप से विश्वास नहीं होगा। पर यह सत्य है। तब मैं अपने गृहग्राम भंडारपुर में रहता था। कहानियाँ लिखता और राजनांदगाँव से लेकर दिल्ली तक के पत्र - पत्रिकाओं में छपता। आकाशवाणी के रायपुर केन्द्र से मेरी कहानियाँ प्रसारित होती। तब मैंने जयंत की भी एक -  दो कहानी राजनांदगाँव से प्रकाशित '' सबेरा संकेत '' में पढ़ी थी। कई रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ता, उसी कड़ी में जयंत की भी कहानी पढ़ी होगी। तब मुझे यह पता नहीं था कि जिस जयंत की मैंने एक - दो कहानी पढ़ी है, वही जयंत मेरी लेखनी से प्रभावित है। इसी प्रभाव के चलते वह मुझसे मिलने मेरे गाँव तक आया पर मुझसे मिले बगैर ही लौट गया। इसकी जानकारी मुझे तब हुई जब मुझे उसका पत्र मिला। इस बात पर मुझे घोर आश्चर्य हुआ। पत्र में इस घटना का उल्लेख करते हुए उसने लिखा था - ''मैं आपसे मिलने आपके गाँव गया था। गाँव पहुँचने के बाद भी मैं आपसे मिलने का साहस जुटा नहीं पाया और बिना मिले लौट आया। संभवत: मेरे भीतर भय था कि आप इतने बड़े साहित्यकार मुझसे मिलना पसंद करेंगे भी या नहीं। मैं आपको अपना साहित्य गुरु मानता हूँ। आपकी रचनाशैली से प्रभावित होकर कुछ कहानियाँ मैंने भी लिखी है जो स्थानीय अखबारों में छपी भी हेैं।''
पत्र की लाइनें पढ़ कर मुझे दुख हुआ। मुझसे मिलने की इच्छा लेकर मेरे गाँव तक पहुँच चुका व्यक्ति मुझसे मिले बगैर ही लौट गया था।
इस तरह की झिझक और संकोच केवल जयंत तक ही सीमित नहीं है। किसी अधिकारी या अपने से बड़े किसी व्यक्ति से मिलने के लिए यहाँ के अधिकतर ग्रामीणों के मन में एक अज्ञात भय आज भी विद्यामान है। संभवत: जयंत भी इसी भय से ग्रस्त रहा होगा। मुझे घोर आश्चर्य तो इस बात की थी कि मुझसे मिले बगैर ही मैं उससे मिलना पसंद करूँगा या नहीं जैसे प्रश्र उसके समक्ष खड़ा हो गया था। वह समय ही कुछ ऐसा था। वरिष्ठ साहित्यकार, नवोदित रचाकारों को हिकारत की दृष्टि से देखा करते थे। उसके मन में इस तरह की झिझक और संकोच पैदा होने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि उसने किसी रचनाकार से मिलने का प्रयास किया हो और वहाँ उसको असफलता मिली हो।
मैं उसके इस भ्रम को तोड़ना चाहता था। मैं स्वयं एक दिन उसके गाँव कसारी गया। वह मुझसे मिलकर गद़गद् हो गया। फिर हमारी मुलाकात तब तक होती रही जब तक मैं अपने गृहग्राम भंडारपुर में रहा ...।
खैर, जयंत ने खेती - किसानी और घर - परिवार की जिम्मेदारी का हवाला देकर लेखनी से हाथ झाड़ लिया। अकेले जयंत ही नहीं, बहुत सारे, अच्छे - अच्छे लिखने वालों की लेखनी सामाजिक - पारिवारिक दायित्व के समक्ष दम तोड़ देती है, ऐसा क्यों ? क्या पारिवारिक - सामाजिक दायित्व के साथ मात्र लेखनीय दायित्व का निर्वहन करने में ही बाधा उत्पन्न होती होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस तरह का बहाना बनाकर हम लेखन कार्य से अपना पिण्ड छुड़ाना चाहते हैं ?  यदि नहीं तो अन्य कामों की तरह लेखन कार्य को भी हम अपनी प्राथामिकता की कड़ी में क्यों नहीं रख सकते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम लिखना तो चाहते है पर लिखने के लिए हमारे पास विषय नहीं होते। या फिर हम उस तरह की रचना नहीं कर पाते हैं जिससे स्वयं को संतुष्टि मिले। यह तो सरासर लेखक की असफलता है जिसे वह पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी की व्यस्तता के आवरण में छिपाना चाहता है। आत्मसंतुष्टि नहीं मिलने के कारण हमारी लेखनी छूटती है और इसके लिए हम अपने पारिवारिक - सामाजिक जिम्मेदारियों का बहाना बनाते हैं। ऐसा करके अपने आप को कहीं हम लेखन कार्य से बचाना तो नहीं चाहते हैं ?
आज निश्चित तौर पर देखा जाए तो हमारी लेखनीय दिशाहीन हो गई है। इस दिशाहीनता के लिए न तो परिवार जिम्मेदार है और न ही सामाज। साहित्य समाज का दर्पण होता है। आज परिभाषा पलट गई है। आज साहित्य समाज को दिशा प्रदान करने में अक्षम हो गयी है। समाज, साहित्य को मार्गदर्शन देने लगा है। आज साहित्य, समाज के पीछे चल रही है, साहित्य के पीछे समाज नहीं। ऐसे दुर्दिन क्यों  आये ? क्या इसी तरह की बहानेबाजी के कारण ? सिर्फ लेखन के लिए ही बहाना क्यों ? इस पर पूरी गंभीरता और पूरी ईमानदारी के साथ विचार करने की आवश्यकता है।
मैं जयंत से कह कर आया हूँ कि वह अपनी पुरानी रचनाएँ मुझे भेजे। हो सके तो नई रचना भिजवाए। परंतु जयंत अपने पारिवारिक - सामाजिक जिम्मेदारी के साथ अपनी साहित्यिक जिम्मेदारी को भी पूरा करने में ईमानदारी से प्रयास करता  है या नहीं यह तो समय ही बताएगा।
संपादक

शनिवार, 30 अगस्त 2014

समाज की भाषा, परम्परा, संस्कृति,लोकसाहित्य और लोकगीत किसी की बपौती नहीं

 इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद हो 
कुछ साल पहले एक आडियो-वीडियो एलबम बाजार में आया, जिसका नाम है - चुलबुली। इस एलबम में एक युगल गीत है -
'' हाय-हाय तोर लाल फीता, देख के मोला चढ़ गे निशा।
हाय रे मोर मनीषा, हाय रे मोर मनीषा।''
गीत के बोल श्रृृँगारिक हैं, सुंदर हैं। छत्तीसगढ़ में यह एलबम बहुत लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुआ था; और कमोबेश आज भी लोकप्रिय है। परन्तु इस गीत में बहुत सारी बातें मन-मस्तिष्क को चुभने-झकझोरने वाली हैं, आपत्तिजनक हैं; गीत-संगीत की लय में बहकर जिसे शायद हम नजरअंदाज कर जाते हैं। समाज में दूषित वातावरण पैदा करने वाली इस तरह की बातों को नजरअंदाज करने के पीछे क्या है हमारी मजबूरी ? मजबूरी कुछ भी नहीं है। आमजन के लिए क्या कहें, यहाँ के बुद्धिजीवी-साहित्यकार, हम सभी अपने खिलाफ हो रहे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और तमाम तरह के शोषणों को सहने और चुप रहने के लिए कंडीशण्ड हो चुके है। किसी कवि ने कहा है - '' जिंदा आदमी सोचता है, बोलता है। नहीं सोचने, नहीं बोलने से आदमी मर जाता है। '' हमने सोचना और बोलना बंद कर दिया है। क्या हम सब मरे हुए हैं ? जिस मुद्दे की ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करने जा रहा हूँ वह एक सामाजिक मुद्दा है, उसका संबंध शायद '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' से भी हो और इस कारण यह एक राष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिये, परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा से सम्बद्ध होने के कारण इस मुद्दे को मैं विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियों की अस्मिता के साथ ही जोड़कर देखना चाहूँगा।
इस गीत में मुद्दा है नायिका की वेशभूषा (कस्ट्यूम), उसका अभिनय, गीत के दृश्य तथा इस गीत के फिल्मांकन की। नायिका की वेशभूषा प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की है। बालिका की दोनों चोंटियाँ लाल फीतों से बंधी हुई हैं जो इस एलबम के प्रौढ़ नायक के जेहन में प्यार का नशा पैदा करते हैं। नायिका के पीठ पर बस्ता लदा हुआ है; जाहिर है, इस गीत की नायिका प्राथमिक शाला अथवा पूर्व माध्यमिक शाला में पढ़ने वाली कोई बालिका है। या तो वह घर से स्कूल जाने के लिए निकली है या स्कूल से घर लौट रही है। रास्ते में उसका वयस्क प्रेमी (प्रेमी की वेशभूषा छात्रों वाली नहीं है।) मिल जाता है और उसके साथ प्रेमालाप करते हुए छेड़छाड़ युक्त संयोग श्रृँगार का गीत गाने लगता है। प्रेम-अभिसार का आमंत्रण देने वाले प्यार भरे कुछ मीठे प्रतिरोधों के बाद नायिका भी नायक का सुर अलापने लगती है। प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की अवस्था बारह-तेरह वर्ष की होती हैं। किसी अवयस्क छात्रा के साथ इस तरह का फिल्मांकन क्या आपत्तिजनक नहीं है? बालिका हो अथवा बालक, यह अवस्था प्यार-मुहब्बत करने की अवस्था नहीं होती है। किशोर-मन सदा मधुर भावनाओं, कल्पनाओं और स्वप्नों के संसार में विचरण कर रहा होता है। प्यार भरे छेड़़छाड़ से युक्त इस गीत का और इस गीत के प्रेमालापों से युक्त दृश्यों का किसी किशोर-मन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, इसकी सहज कल्पना किया जा सकता है। क्या यह गीत अवयस्क बालिकाओं के प्रति यौन हिंसा को बढ़ावा देने वाला, इसके लिए दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? क्या यह गीत छात्र-छात्राओं के मन में शाला और कक्षा के प्रति प्रतिकर्षण और अरूचि पैदा कर उन्हें कल्पनाओं और अपराध की दुनिया की और दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? अवयस्क बालिका के साथ इस तरह की छेड़छाड़ या छेड़छाड़ का दृश्यांकन करना क्या गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं है? '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' के अनुसार स्कूली छात्र-छात्राओं से किसी भी प्रकार का श्रम करवाना तथा उन्हें शारीरिक, मानसिक अथवा भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करना अपराध है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि इस एलबम के निर्माण के समय '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' नहीं था, निर्माता को बख्श देना चाहिए?
भाषा और संस्कृति का अटूट संबंध होता है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है। इन लोकगीतों में यहाँ की परंपराओं, रीतिरिवाजों और यहाँ के लोकसमाज की भावनाओं आशाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति होती है। इन लोकगीतों का कलात्मक सौन्दर्य आह्लादकारी और मनोहारी होता है। इनमें भाषा का सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य होता है। परन्तु खेद का विषय है कि एक अर्से से, छत्तीसगढ़ी गीतों के आडियो-वीडियो एलबम जो जारी हो रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ की भाषा और यहाँ की लोकसंस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करने की एक विकृत परंपरा विकसित हुई है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने की होड़ सी मची हुई है। छत्तीसगढ़ी गीतों के इन एलबमों की भाषा में भाषा के सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य का स्थान, आपत्तिजनक फूहड़ता और कामुकता ने ले लिया है। एलबम निर्माताओं की दलील होती है - '' हम वही माल तैयार करते हैं, बाजार में जिसकी मांग होती है, ग्राहक जिसे खरीदना चाहता है।''
बाजार अब इन निर्माताओं के घर की इज्जत की मांग कर रही है। ग्राहक अब इनकी मां, बहन, बहू और बेटियों की इज्जत खरीदना चाहता है। इनकी मां, बहन, बहू और बेटियाँ इनका निजी मामला है, संभव है, ये इन्हें भी बेंच देंगे। लेकिन समाज की भाषा, समाज की परंपरा, समाज की संस्कृति, लोकसाहित्य और लोकगीत इनकी बपौती नहीं है; ये इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद करे।
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संपादक

गुरुवार, 22 मई 2014

छत्‍तीसगढ़ी के साहित्‍यकार : अपना उत्‍तरदायित्‍व समझें

अंतत: किसी कवि ने कहा है - ’छत्तीससगढ़ में सब कुछ है, पर एक कमी है स्वाभिमान की। मुझसे सही नहीं जाती है, ऐसी चुप्पी वर्तमान की।’ कविता की इन पक्तियों में कवि की एक ओर जहाँ छत्तीसगढ़ के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और अटूट आस्था अभिव्यक्त होती है वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के शोषण और अपमान के प्रति उनका क्षोभ भी दिखाई देता है। स्वाभिमान को तार-तार करने वाला, छत्तीसगढिय़ों का अनावश्यक व कायराना भोलापन और उनकी चुप्पी के प्रति आक्रोश के भाव की अभिव्यंजना भी होती है। पर इस तथ्य से इन्‍कार करना मूर्खता होगा कि अमीर धरती के गरीब छत्तीसगढिय़ों की इस दीन-हीन स्थिति के लिए कोई और कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि  उनका यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, उनकी अनावश्यक व कायराना चुप्पी ही उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
छत्तीसगढिय़ों के लिए कहा जाता है - ’पहिली जूता पाछू बात, तब आवै छत्तीसगढिया हाथ’। खेतों और खदानों में पुरूषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करने वाली यहाँ की श्रमशील हमारी माताओं और बहनों को अपमानित करने के लिए कहा जाता है - ’छत्तीसगढ़ की औरतें छत्तीस-छत्तीस मर्द बनाती हैं’। शोषको के इसी मानसिकता का परिणाम है कि ’अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’ जैसी कविताएँ कवि मंचों पर रस ले-लेकर कही और सुनी जाती हैं। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के लिए जो परिभाषा इस पंक्ति में गढ़ी गई है, यहाँ की आराध्य देवी के लिये जो मुहावरा कहा गया है; छत्तीसगढ़ी भाईयों और यहाँ की माताओं-बहनों के लिए जो बातें पहले से ही कही जाती रही हैं, उसे सिर्फ और सिर्फ यही के लोग बेशर्मी के साथ सुन और सह सकते हैं; सुनकर भी मुर्दों के समान चुप्पी साधे रह सकते हैं। हमारा यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी हमारी नेतृत्व क्षमता पर भी दिखाई देती है। हमारा नेतृत्व यहाँ के बहुंख्यक समुदाय के हाथों में कभी नहीं रहा; आयातित नेतृत्व का अनुचर और अनुगामी की भूमिका ही हम हमेशा पसंद करते रहे हैं, इसी में संतुष्ट होते रहे हैं। ऐसा आखिर कब तक ?
यहाँ की इस स्थिति के लिए यहाँ की आम जनता से अधिक  दोषी यहाँ के बुद्धिजीवी, कवि और साहित्यकार  हैं। माना कि साहित्य से क्राँतियाँ नहीं होती, पर क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग, तो यहीं से पैदा होती है। छत्तीसगढ़ में कवियों और साहित्यकारों की कमी नहीं है, देश की आजादी की लड़ाई  समय से ही यहाँ साहित्यकारों की एक समृद्ध परंपरा रही है। इनके साहित्य में क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग भड़काने की अद्भुत क्षमता भी होती थी, पर कवि-साहित्यकारों की आज की पीढ़ी, अपनी इस समृद्ध साहित्यिक विरासत को संभालने, सहेजने और आगे बढ़ाने में विफल रही है। छत्तीसगढ राज्य बनने के बाद तो यहाँ कवियों की भीड़ दिखाई देने लगी है। विचार वीथी के हर अंक के लिए छत्तीसगढ़ के सहित्यकारों के द्वारा नियमित रूप से मुझे पर्याप्त मात्रा में नई प्रकाशित पुस्तकें प्राप्त होती रहती हैं, परन्तु प्रारंभ में कविता की जिन पँक्तियों का मैंने उल्लेख किया है, उस तरह की कविता, उस तरह के कवि और क्राँति का मशाल जलाने के लिए जिस चिंगारी की आवश्यकता है, और क्राँति के लिए दिलों में आग पैदा करने के लिए साहित्य में जिस आग की जरूरत है, उसे पैदा करने वाला आज न तो कोई कवि ही दिखाई देता है और न ही वैसी पँक्तियाँ ही पढऩे को मिलती हैं।
विचार वीथी के पहले के अंकों में भी मैंने यह मुद्दा उठाया था। अपने आदरणीय साहित्यकारों से मैं पुन: निवेदन करना चाहता हू कि वे अपने साहित्यिक उत्तरदायित्व को समझें। समकालीन साहित्य की अवधारणाओं और प्रवृत्तियों को समझें। कोरी कल्पना का उड़ान भरना छोड़ें, यथार्थ की कड़वी और कठोर धरातल का दामन थामें, हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी पर प्रहार करने वाली, उसे तोडऩे वाली रचनाओं का सृजन करें।
याद रखें, हमारा नेतृत्व करने के लिए नेताओं का आयात करने की जरूरत नहीं है, हमारे नहीं चाहने पर भी वे आयातित होते रहेंगे, हमें मिलते रहेंगे; परन्तु वे हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी को और अधिक स्थायी बनाने का प्रयास ही करेंगे, क्योंकि इसी में उनका हित सधता है। हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व
कायराना चुप्पी को तोडऩे वाला तो हममें से ही कोई पैदा हो सकता है। चर्चा जारी रहेगा .........।
संपादक

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

न छत्‍तीसगढ़ी में कुछ सोचो, न ही कुछ लिखो बस छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्‍त रहो ?

'' चढ़ने '' का मतलब समझते  है राजभाषा आयोग के सचिव.......?

24 और 25 फरवरी को राजधानी के रवीन्द्र सांस्कृतिक सभागार, कालीबाड़ी स्कूल परिसर में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का द्वितीय ’प्रांतीय सम्मेलन 2014’ संपन्न हुआ। कहा जा रहा है कि इस दो दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ के लगभग 500 विद्वान-साहित्यकार, कलाकार एवं पत्रकार एकत्रित हुए। छत्तीसगढ़ में और भी बहुत से विद्वान हैं जिनका उल्लेख न तो आयोग द्वारा छपवाए गए आमंत्रण-पत्र में हुआ है और न ही जो पाँच सौ विद्वानों-कलाकारों की भीड़ थी उसमें नजर ही आये। पिछले आयोजन में भी ऐसा ही कुछ नजारा देखने में आया था। साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद की आशंका को जन्म देने वाली ऐसी घटना क्या अनजाने में हो रही है, या किसी नीति के तहत हो रही हैं ? जैसा भी हो, पर है यह दुखद।
दो दिनी इस आयोजन में उपस्थित साहित्यकारों को अपनी बातें कहने के लिये और विभिन्न मुद्दों-विषयों पर गहन चर्चा-विमर्श करने के लिये कुल सात सत्रों (समापन सत्र को मिलाकर) का आयोजन किया गया था। उम्मीद थी कि इन सत्रों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों पर और इन उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्त करने के विभिन्न उपायों और प्रयासों पर चर्चाएँ होगी, और इस हेतु योजनाएँ भी बनाई जायेगी। परंतु खेद का विषय है कि इन सत्रों के लिये निर्धारित विषयों में से ’छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’ गठन के पीछे का उद्देश्य और लक्ष्य पूरी तरह गायब थे, चर्चाएँ क्या खाक होती। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के वेब साइट पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के पीछे निम्न उद्देश्यों और लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है -
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग
(छत्तीसगढ़ शासन)
उद्देश्य/लक्ष्य
राज्य के विचारों की परम्परा और राज्य की समग्र भाषायी विविधता के परिरक्षण, प्रचलन और विकास करने तथा इसके लिये भाषायी अध्ययन, अनुसंधान तथा दस्तावेज संकलन, सृजन तथा अनुवाद, संरक्षण, प्रकाशन, सुझाव तथा अनुशंसाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पारम्परिक भाषा को बढ़ावा देने हेतु शासन में भाषा के उपयोग को उन्नत बनाने के लिए ‘‘छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’’ का गठन किया गया है। आयोग के प्राथमिक लक्ष्य एवं उद्देश्य निम्नांकित हैं:-
1. राजभाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कराना
2. राजकाज की भाषा में उपयोग
3. त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करना
ऐसे उद्देश्यहीन आयोजनों का क्या औचित्य जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपयों की आहूति दे दी जाती हो?
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाये जाने के संबंध में हो अथवा प्राथमिक कक्षाओं के लिए शिक्षण का माध्यम बनाने के विषय में हो, चाहे आयोजन के किसी सत्र में इस पर कोई चर्चा न की गई हो, परंतु सत्र के बाहर और मंच के नीचे उपस्थित लगभग हर साहित्यकार परस्पर केवल इन्हीं विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही ये ऐसे बहुचर्चित विषय रहे हैं जो चर्चा के रूप में पढ़े-लिखे लोगों के बीच हर जगह और हर मौके पर उपस्थित रहते आये हैं और जिसके लिए किसी विशेष चर्चा-गोष्ठी के आयोजनों की दरकार भी नहीं है। पर इस प्रकार की चर्चाएँ मूल्यहीन होती है। पान ठेलों में गपियाते हुए, बाजारों, सड़कों और सफर के दौरान टाईम पास करने के उद्देश्य से चर्चा करते हुए ऐसे बहसों का वह मूल्य तो कदापि नहीं हो सकता जो राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित इन आयोजनों के विभिन्न सत्रों में विद्वानों के बीच होने से होता। 
पर ठहरिये। जरा सोचें। कल्पना करें कि बच्चा बिगड़ा हुआ है, किसी चीज के लिए मचल रहा है। अभिभावक को काम करने में बाधा पड़ रही है। समझदार अभिभावक बच्चे को उसकी इच्छित वस्तु देकर चुप करा देता है। बच्चे का ध्यान अब अपने अभिभवक की ओर से हटकर झुनझुना बजाने की ओर चला जाता है। तब अभिभावक अपनी मनमानी करने के लिये स्वतंत्र हो जाता है।
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने अथवा त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करने की बातें, ऐसा ही एक झुनझुना है। छत्तीसगढ़ के लोगों, न तो छत्तीसगढ़ी में कुछ सोचो और न ही कुछ लिखो; बस, छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्त रहो।
छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों के बीच साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद जैसी लकीर खीचने वाले और यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों को छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना पकड़वाने वाले ऐसे आयोजनों को आप असफल कह सकते हैं?
तब भी छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी को मातृतुल्य प्रेम करने वाले ऐसे छत्तीसगढ़िया साहित्यकारों की कमी नहीं है जो पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले से ही ( और कई उसके बाद में भी ) छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों, गाँवों और कस्बों के स्तर में साहित्यिक संस्थाएँ बनाकर बिना किसी शासकीय अनुदान के ही ( क्योंकि मांगने पर भी इन्हें आश्वसनों के अलावा कुछ मिलता ही नहीं ) अपनी प्रिय मातृभाषा छत्तीसगढ़ी की सेवा और साहित्य सृजन में निरंतर रत हैं। इनमें से कई साहित्यिक संस्थाएँ पंजीकृत भी हैं। इन संस्थाओं को अपने दम पर चलाने वाले समर्पित और जुनूनी साहित्यकारों के द्वारा निरंतर साहित्यिक संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, जिनका स्तर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा करोड़ों रूपयों के आयोजन के स्तर से कही लाख दर्जे की होती हैं। ये लोग अपनी खून-पसीने की कमाई खर्च करके अपनी पुस्तकों को छपवाते हैं और छपवाकर मुफ्त में बाँटते भी हैं।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पास ऐसी कितनी साहित्यिक संस्थाओं की और उनसे जुड़े हुए कितने साहित्यकारों की जानकारी है ? आयोग अपने प्रान्तीय सम्मेलनों में इनमें से कितनी संस्थाओं को सहभागी बनाता है अथवा कम से कम उन्हें आमंत्रित ही करता है ? क्या आयोग ने ऐसी संस्‍थाओं को कभी वित्तीय सहायता भी प्रदान किया है ?
छत्तीसगढ़ी भाषा कहावतों और मुहावरों की भाषा है। छत्तीसगढ़ी में कहावतों और मुहावरों को हाना कहा जाता है। बात-बात में हानों का प्रयोग करना छत्तीसगढ़ी बोलने वालों का स्वभाव है। एक हाना है - ’’ किसी के ऊपर या किसी की माँ-बहन के ऊपर चढ़ना ’’ जिसका अर्थ होता है माँ-बहन की इज्जत से खेलना अथवा बलात्कार करना। गौरव की बात है कि देश ही नहीं विदेशों में भी समादृत हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध  कवि पदश्री डॉ. सुरेन्‍द्र दुबे छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सचिव है। डॉ. दुबे जी वर्षों से छत्तीसगढ़ के हर कवि सम्मेलन में एक कविता सुनाते आ रहे हैं जिसकी कुछ पक्तियाँ इस प्रकार हैं - ’’बस्तर ले निकल, अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’’ माँ बमलई न केवल छत्तीसगढियों की़ अपितु संसार भर में निवासरत अनेक हिन्दुओं की आराध्या देवी हैं। डोगरगढ़ की पहाड़ियों में स्थित माँ बमलेश्वरी मंदिर की गिनती हिन्दुस्तान के प्रमुख शक्तिपीठों में होती है। मंचों पर काव्यपाठ करते हुए और बड़े गर्व के साथ ’बमलई म चढ़’ कहते हुए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के यशस्वी सचिव व हमारे प्रदेश के महान साहित्यकार डॉ. सुरेन्द्र दुबे को तनिक भी लाज नहीं आती होगी ? क्या छत्तीसगढ़ की प्रमुख आराध्या देवी के लिये इस हद दर्जे की कविता लिखने वाले और छत्तीसगढ़ के सवा दो करोड़ लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले ऐसे तथाकथित महान कवि-साहित्यकार को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव पद पर बने रहने का अधिकार भी बनता है?
सोचिये।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सम्‍पादकीय

संस्‍कारधानी राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं को कोई नकार नहीं सकता। जो यह कहता है राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्‍य है उसे शायद यह नहीं मालूम की संस्‍कारधानी में आज भी साहित्‍य की वह धारा यथावत बह रही है जो डॉ पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी, डॉ बल्‍देव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध के समय बहती थी। मैं तो कहता हूं उन दिनों की अपेक्षा वर्तमान में साहित्यिक धारा कुछ अधिक ही वेग में बह रही है यही कारण है कि आज राजनांदगांव के  साहित्‍कारों के अनेक पुस्‍तकें छप कर आ रही है।

सोमवार, 16 सितंबर 2013

उपेक्षा और अनादर का दंत झेलती प्रतिभाएं

अपनी प्रतिभाओं को कब पहचानेगी छत्‍तीसगढ़ सरकार

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के  बाद ऐसा प्रतीत होने लगा था कि वर्षों से दबी कुचली छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएँ मुखरित होंगी और मान-सम्मान पाने में उनक  लिए कहीं कोई रूकावट पैदा नहीं होंगी। मैं छत्तीसगढ़ी लोकसंस्‍कृति, कला और साहित्य के क्षेत्र में नि:स्वार्थ भाव से सृजनरत विभूतियों की ओर छत्तीसगढ शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। इन क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएँ पहले भी मुखरित होती रही हैं परन्तु पृथक राज्य बनने के बाद तो इन्होंने अपनी प्रमिभा का पुन: पूरे दमखम के साथ लोहा मनवाया है। छत्तीसगढ़ में ऐसी-ऐसी प्रतिभाएँ हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पूर्व से ही छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति, कला और साहित्य के उत्थान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी लोक संस्‍कृति,कला और साहित्य के इन प्रतिभाओं का सम्मान न हो पाना हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? विद्वानों ने कहा है - जो राज्य अपनी प्रतिभाओं का सम्मान करना नहीं जानती, उसका पतन अवश्यंभावी है।
’ विचार वीथी ’ के पिछले कई अंकों में मैंने इस मसले को उठाया है, पर चाटुकारों से घिरी सरकार के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी। इस विषय पर पुन: कलम चलाने के पीछे मेरा उद्देश्य सही प्रतिभाओं को सामने लाने का है ताकि स्मृतिहीनता तथा दृष्टिहीनता की शिकार शासन का ध्यान इन प्रतिभाओं की ओर जा सके।
छत्तीसगढ़ का ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति , लोक साहित्य तथा इनसे जुड़ी प्रतिभाओं को भव्य मंच प्रदान कर  इसकी  चमक और आभा को राज्य ही नहीं देश के कोने कोने में बगराने वाली संस्था ’चंदैनी गोंदा’ के बारे में न जानता हो ? छत्तीसगढ़ का बच्चा-बच्चा इसके बारे में जानता है, नहीं जानती है तो केवल यहाँ की सरकार, और सरकार  चलाने वाले लोग। इस संस्था के अमर शिल्पी दाऊ रामचंद्र देशमुख को शासन की ओर से क्या वह सम्मान मिल पाया जिसका कि वे हकदार हैं। छत्तीसगढ़ी नाचा के मदन निषाद, फिदाबाई जैसे अनेक अमर कलाकार जिनकी प्रतिभाओं के आगे बॉलीवुड के भी बड़े-बड़े अभिनेता और निर्देशक नतमस्तक होते थे, क्या उन्हें अब तक वह सम्मान मिल पाया है जिनका कि वे हकदार हैं? नाचा में जब खड़े साज का युग था तब से कमर में हारमोनियम बांधकर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को मधुर स्वर देने वाले खुमान साव आज भी संगीत साधना में लीन हैं, उन्हें आज कौन नहीं जानता। अब तक छत्तीसगढ़ शासन उन्हें सम्मानित क्यों नहीं कर सकी है ? पच्यासी वर्ष की अवस्था में भी संगीत-साधना में रत तथा दाऊ रामचंद्र देशमुख की अमर कृति ’चंदैनी गोदा’ को जीवित रखने वाला संगीत का यह महान साधक अपने आत्मस्वाभिमान को ताक में रखकर शासन से सम्मान की याचना करे, छत्तीसगढ़ शासन क्या यही चाहती है? छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति कला और साहित्य को शिखर तक पहुँचने वाले खुमानलाल साव की प्रतिभा आखिर और कब तक तिरस्‍कृति, उपेक्षित और अनादरित होती रहेगी?
छत्तीसगढ़ में तिरस्‍कृत, उपेक्षित और अनादरित होने वाली प्रतिभाओं में छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार भी शामिल हैं। जब पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का मानचित्र भी परिकल्पना में नहीं आया था, जब यहाँ के तथाकथित शिष्ट लोग छत्तीसगढ़ी को भाषा तो क्या बोली मानने और बोलने में भी अपमानित महसूस करते थे, उस समय छत्तीसगढ़ी संस्‍कृति और सभ्यता को छत्तीसगढ़ी भाषा में ही सहेज कर रखने के प्रयास में और छत्तीसगढ़ी भाषा की अस्मिता के लिये संघर्ष के आह्वान में, छत्तीसगढ़ी भाषा में ’गरीबा’ महाकाव्य की रचना करने वाले राजनांदगाँव जिला के ग्राम भंडारपुर करेला के निवासी पं. नूतन प्रसाद शर्मा आज भी साहित्य साधना में रत हैं, पर ऐसी प्रतिभा को पूछने वाला आज यहाँ कौन है?
टेलिविजन आज सामाजिक जीवन का आवश्यक और अभिन्न अंग बन चुका है। भारत के हर क्षेत्रीय भाषा का अपना कम से कम एक चैनल तो अवश्य है, परंतु बड़े खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ी भाषा का अपना कोई भी चैनल टेलिविजन पर मौजूद नहीं है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित इंटरनेट की पत्रिका ’गुरतुरगोठ’ के संपादक संजीव तिवारी का हमें आभारी होना चहिये। विगत पाँच वर्षों से वे अपने अभियान में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं। इस कार्य हेतु 14 - 15 सितंबर 2013 को वे नेपाल की राजधानी काठमांडु में वहाँ के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित होने जा रहे हैं, हमें संजीव तिवारी पर गर्व है, उन्हें कोटिश: बधाइयाँ। हमें उस दिन और अधिक गर्व महसूस होगा जिस दिन छत्तीसगढ़ की सरकार उन्हें सम्मानित करेगी। पता नहीं हमारी प्रतिभाओं के लिए ऐसा दिन आयेगा भी या नहीं ।
राज्योत्सव के अवसर पर बालीवुड के सितारों को चंद घंटे की  प्रस्तुतिकरण के लिए राजकोष से करोड़ों रूपये बाँटने वाली छत्तीसगढ़ की सरकार पता नहीं कब अपनी प्रतिभाओं को पहचान पायेगी, सम्मानित कर पायेगी। सम्‍पादक
अगस्‍त 2013

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

क्यों हो जाता है उत्तर जटिल ... ?

डां. बख्शी एवं श्री नायक को आदरांजलि
साहित्य की नगरी राजनांदगांव की साहित्यिक यात्रा डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानंद माधव मुक्तिबोध, डां. बल्देव प्रसाद मिश्र, तक पहुंच कर क्यों ठहर जाती है ? क्या इन तीन साहित्य मनीषियों के बाद एक भी ऐसा साहित्यकार पैदा नहीं हुआ जो इस यात्रा को आगे बढ़ा सके ? जब यह साहित्य की नगरी कहलाती है और स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे,डां. मेघनाथ कनौजे, डां. नन्दूलाल चोटिया, रमेश याज्ञिक, कृष्णकुमार नायक और लक्ष्मण कवष का नाम तो लिया जाता है इसके बावजूद ऐसी क्या बात है कि इन्हें  तीन के बाद वह स्थान क्यों नहीं दिया जाता ? जिसके हकदार है। यह प्रश्न मुझे कई दिनों से साल रहा था। अंतत: एक दिन मैंने चित्रकार कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी के समक्ष अपनी जिज्ञासाïï व्यक्त कर ही दिया। मेरी जिज्ञासा को तौलते हुए गुरूजी ने कहा - सर्वेद, तुम्हारा प्रश्न निरर्थक नहीं पर इसका उत्तर जटिल है ...।
आज तक मैंने प्रश्न की जटिलता सुनी थी पर यहां तो गुरूजी ने उत्तर को ही जटिल करार दिया। मैं प्रतीक्षा में था कि वे कुछ आगे और बोलेगे पर वे चुप्पी साधे रहे... नितांत चुप्पी। फिर मैंने ही उकेरा तब गुरूजी की चुप्पी टूटी। बोले - यहां बहुत सारे लोगों ने साहित्य के क्षेत्र में अपना जीवन होम किया मगर दुर्भाग्य कि रास्ता तीन साहित्यकारों तक ही पहुंचकर खत्म हो जाता है। मुझे तो लगता है, रास्ता तो है मगर तीन के बाद किसी चौथे तक जाने का रास्ता धुंधला हो जाता है ...?
बात आई, गई और हो गई।
एक  दिन मैंने चर्चा के दौरान गुरूजी को बताया कि च्मई 2008ज् में विचार वीथि पत्रिका च् दूसरे वर्ष ज् में प्रवेश कर रही है। गुरूजी ने सलाह दी - इस अंक का साइज बढ़ा दो। उनकी सलाह मुझे जंच गयी। मैंने अपनी बात रखी - मई माह में साहित्य वाचस्पति डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जयंती है इस अंक को उन्हीं को समर्पित करना चाहता हूं, साथ ही चाहता हूं कि इस अंक को किसी ऐसे साहित्यकार को भी समर्पित कर दूं जिसने अपना जीवन साहित्य के क्षेत्र में होम कर दिया और नेपथ्य में चला गया। नगर के अनेक साहित्यकारों से रायशुमारी बात निर्णय हुआ कि इस अंक को डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक को भी समर्पित कर दिया जाए।
और मैं भिड़ गया स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक के रचना संसार, उनके व्यक्तित्व की खोज में। सर्वप्रथम मैंने एक पत्र बनाया। उस पत्र को उन लोगों को दिया जो श्री नायक के साथ साहित्यिक विचार आदान - प्रदान करते थे। मैंने उनसे उनकी रचना के साथ संस्मरण की भी मांग की। मेरे आग्रह को किसी ने नहीं अस्वीकारा मगर समस्या यह थी कि श्री नायक को इस असार - संसार से विदा लिए एक लम्बा समय व्यतीत हो चुका था। उनकी रचनाएं स्मृति से लगभग लुप्त हो चुकी थी। मैंने श्री नायक के परिवार वालों से संपर्क किया परन्तु वहां भी उनकी एक भी रचना नहीं मिली। अब मेरे समक्ष विकट प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या बिना उनकी रचना के मात्र उनका संस्मरण ही प्रकाशित कर देने से पाठकवर्ग संतुष्टï हो जाएंगे ? मैंने अपनी समस्या काका चंद्रकांत ठाकुर के समक्ष रखी। मुझे मालूम था कि श्री नायक  लम्बे समय तक समाचार पत्र च् छत्तीसगढ़ झलक ज् से जुड़े रहे। श्री ठाकुर बोले - सर्वेद, उनकी कुछ रचनाएं मेरी डायरी में हो सकती है। मना करने के बावजूद कुछ रचनाएं उन्होंने मेरी च् डायरीज् में लिख दी थी।
मुझे स्मरण आया, जब मैं अपने गृहग्राम च् भंडारपुर ज् में था तब मुझे साहित्यिक परिशिष्टï सहेज कर रखने का शौक था। संभवत: ऐसी कुछ पत्र - पत्रिकाएं पटाव में रखी उस पेटी में होगी जिसमें श्री नायक की रचनाएं छपी होगी। पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि मैंने कहीं न कहीं श्री नायक की रचनाएं पढ़ी है और उसे सहेजकर भी रखी है। मैं अपने गांव जा पहुंचा और च् पटाव ज् में रखी उस च् पेटी ज् को खंघालने लगा जिसमें मैंने बहुत सी पत्र - पत्रिकाओं का साहित्यिक परिशिष्टï सहेज कर रखा था। मेरा विश्वास और मेहनत निरर्थक नहीं गया। उस पेटी से मुझे श्री नायक की च् चार रचनाएं ज् प्राप्त हुई।
मैं राजनांदगांव पहुंचते ही काका चंद्रकांत के पास पहुंचा। उनको बताया कि मुझे श्री नायक की चार रचनाएं मिल चुकी हैं तो काकाजी खुश हो गये। बोले - मैंने भी च्डायरी ज् खोज निकाली है। उसमें नायक की तीन रचनाएं है।
मैं चाह रहा था मुखपृष्ठï पर डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के साथ कृष्णकुमार नायक की भी तस्वीर लगे। गुरूजी तो आवरण मेरी मंशा के अनुरूप बनाने तैयार थे पर नायक की तस्वीर न उनके परिवार वालों के पास थी और न ही अन्य श्रोतों से मिलने की संभावना नजर आ रही थी पर खोज जारी थी। मैंने बहुत पहले आचार्य सरोज द्विवेदी द्वारा सम्पादित पत्रिका च् राजनांदगांव 77 ज् की मांग श्री द्विवेदी जी से की थी। इसी बीच श्री द्विवेदी ने च्राजनांदगांव 77 ज् नामक पत्रिका उपलब्ध कराई। मैंने पन्ने पलटने शुरू किए और उस पत्रिका में श्री नायक की न सिर्फ दो रचनाएं मिली अपितु तस्वीर भी मिल गई। मेरे लिए तो वह हीरे से भी बेसकीमती थी। अब जाकर मुझे समझ आया कि गुरूजी ने क्यों उत्तर को जटिल कहा था।
उक्त संपादकीय लिखने के पीछे मेरी मंशा किसी साहित्यकार के मान - सम्मान को ठेस पहुंचाने की कदापि नहीं। यह अंक साहित्य वाचस्पति डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एवं कवि, $ग$जलकार कृष्णकुमार नायक को आदरांजलि स्वरूप समर्पित है। यह अंक कैसा लगा  आपके विचार की प्रतीक्षा रहेगी ...।                                        संपादक

कौन करे आभार व्य I, प्रकाशक संपादक या लेखक ?

मन खिÛ था.समझ से परे था कि किस विषय  पर इस बार की सम्पादकीय  लिखा जाये.सम्पादकीय  से ही सम्पादक की महत्ता समझ आती है इसमें संदेह नहीं इसलिए संपादक सदैव कोई ऐसी संपादकीय  लिखना चाहता है जिस पर पाठक वगर् चिंतन - मनन कर सके.
संपादकीय  लेखन पर विचार कर ही रहा था कि डाकिया ने एक पत्र लाकर दिया.पत्र गुरूर से आया था और उस पत्र को पे्रषित किए थे कहानीकार भावसिह हिरवानी. पत्र पढ़ने के बाद मुझे लगा इस पर ही यिों न संपादकीय  लिख लिया जाये. पत्र लिखा गया था कि  विचार वीथि का पहला अंक मिला. आपने पत्रिका में मेरी कहानी प्रकाशित की उसके लिए  मैं हृदय  से आभारी हूं.आपने डाँ महम„ की कविता प्रकाशित की उसके लिए धन्य वाद. पर प्रश्न य ह उठता है कि यिा सिफर् और सिफर् संपादक व प्रकाशक ही धन्य वाद के अधिकारी होते हैं.यिा सिफर् और सिफर् लेखक ही आभारी हो सक ते हैं. यिा प्रकाशक संपादक का दायि त्व नहीं बनता कि हम उन लेखकों को ही यिों न हृदय  से आभार व्य I करें जिनकी रच ना शैली के बदौलत हमारे द्वारा प्रकाशित पत्र - पत्रिका में जान आती है.वह पठनीय  बन पाती है.आभार तो संपादक प्रकाशक को रच नाकार का व्य I करना चाहिए मगर ऐसा होता कहां हैं.संपादक प्रकाशक तो मात्र किसी रच नाकार की रच ना प्रकाशित कर ऐसा महसूस करते हैं मानों वे  रच नाकार पर एहसान कर दिये मगर सत्य  य ह है कि  पत्र - पत्रिका की  महत्ता रचाकार की मेहनत, उसकी लेखनीय  शैली, उनके विचार से बढ़ती - घटती है.किसी भी पत्र पत्रिका में चार चांद लगाने का कोई काम करता है तो वह है रच नाकार की रच ना. 
इस अंक के संपादकीय  से कुछ पत्र - पत्रिकाओं के संपादकों - प्रकाशकों को उजर हो सकती है मगर इसकी चिंता कतई नहीं.वास्तव में देखा जाये तो संपादकों प्रकाशकों को उन रच नाकारों का हृदय  से आभारी होना चाहिए जिनकी लेखनीय  ताकत के बदौलत प्रकाशित पत्र - पत्रिकाओं का महत्व बढ़ जाता है.

                        संपादक

बुधवार, 11 सितंबर 2013

क्या वास्तव में राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ थम गई है ?

क्या वास्तव में साहित्य की नगरी राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ फीकी पड़ गई है या फिर ऐसा प्रचार उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्हें राजनांदगांव जिले में चल रही  साहित्यिक गतिविधियों का ज्ञान नहीं या फिर किसी के कहने पर इस तरह की खबरें फैलाने की  चेष्ठïा अनावश्यक की जाती  हैं। वास्तव में देखा जाए तो हमें राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ शून्य है या फिर फीकी पड़ गई है इसका मूल्यांकन सिर्फ राजनांदगांव शहर की साहित्यिक गतिविधियों को ही देखकर ही नहीं करना चाहिए वरन हमें राजनांदगांव जिले को देखकर करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि आज भी राजनांदगांव जिले में कई ऐसी प्रतिभाएं हैं जो न सिर्फ राजनांदगांव जिले या फिर छत्तीसगढ़ प्रदेश तक ही अपनी लेखनी को सीमित रखें है अपितु राष्टï्रीय स्तर पर भी अपनी लेखनी का लोहा मनवा रहे हैं।
राजनांदगांव के कहानीकार शत्रुघनसिंह राजपूत,गिरीश बख्शी,नरेश श्रीवास्तव,कवि एवं गीतकार डां. बहलसिंह पवार,अनिलकांत बख्शी, कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी, वीरेन्द्र बहादुर सिंह,मुन्ना बाबू,आत्माराम कोशा, चन्द्रकुमार जैन,नरेश कुमार वर्मा, शोभा श्रीवास्तव, कुबेरसिंह,खैरागढ़ के डां. जीवन यदु , डां. रमाकांत श्रीवास्तव,महावीर अग्रवाल,संकल्प यदु, भंडारपुर तहसील खैरागढ़ के नूतन प्रसाद,गोपालदास साहू,गंडई के पीसीलाल यादव, छुईखदान के डां. रतन जैन, है वहीं राष्टï्रीय स्तर के समीक्षकों में जय प्रकाश का माना हुआ नाम है, अर्थात ऐसे सैंकडों नाम है जो आज भी राजनांदगांव जिले की शान को साहित्य के क्षेत्र में जीवित रखें हुए हैं मगर दुर्भाग्य ही कहा जाए कि ऐसे रचनाकारों को स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों से दूर रखकर छदम लोग सामने आ जाते हैं और ढिंढोरा पिटवा दिया जाता है कि साहित्यकार गजानंद माधव मुक्तिबोध, डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी,डां. बल्देव प्रसाद मिश्र की कर्मस्थली राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्य है।
राजनांदगांव की साहित्यिक  जमीं, साहित्यिक जमीं के रूप में ही बरकरार रहे इस दिशा में हमने भी एक छोटा सा योगदान देने का प्रयास किए हैं। यही कारण है कि त्रैमासिक पत्रिका विचार वीथि का प्रकाशन किया जा रहा है और इस पत्रिका को पूरे प्रदेश में अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इस पत्रिका में न सिर्फ राजनांदगांव अपितु दुर्ग,रायपुर, महासमुन्द, रायगढ़,जांजगीर चांपा, कवर्धा, जिले के रचनाकार भी अपनी रचनाएं भेज रहे हैं।
अब यह कहने की आवश्यकता नहीं कि राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं में पूरी तरह सन्नाटा नहीं है अपितु अब भी यहां साहित्यकार अपना योगदान देने में डंटे हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन रचनाकारों को  स्थानीय कार्यक्रमों में छदम साहित्यकारों से अधिक महत्व दिया जाये।

छत्तीसगढ़ी राजभाषा और एकरूपता ?


आखिरकार छत्तीसगढ़ी को संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने से जो  खुशी छत्तीसगढी के जानकारों को हुई उतनी ही पीड़ा उन्हें हुई जो यह कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले। अब आवश्यकता है छत्तीसगढ़ी को समृद्धिशाली बनाने का। इसके लिए छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को छत्तीसगढ़ी में साहित्य लिखने के अतिरिक्त उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान पर भी छत्तीसगढ़ी में सृजन आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि समाचार पत्रों, फिल्मों में भी छत्तीसगढ़ी शब्दों का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाये। बेहतर तो यही होगा कि आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा छत्तीसगढ़ी पर ही विविध कार्यक्रम रखा जाये जिससे आम जन तक छत्तीसगढ़ी सही मायने में पहुंच सके। इसके लिए दूरदर्शन केन्द्र को भी ध्यान देने होगें इसके अतिरिक्त प्राथमिक शिक्षा से ही छत्तीसगढ़ी को पाठï्यक्रम में शामिल किया जाये।
छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण को लेकर भी अनेक बातें सामने आने लगी है। पूर्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बोली के रूप में किया जाता था इसी का परिणाम था कि जो जिस क्षेत्र का रचनाकार था वह अपने क्षेत्र के आमबोल चाल का उपयोग साहित्य मे करता था  जिससे छत्तीसगढ़ी में एकरूपता नहीं आ सकी मगर अब जबकि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई है तो छत्तीसगढ़ी में एकरूपता लाना आवश्यक है क्योंकि अलग अलग जिलों में अलग - अलग छत्तीसगढ़ी वाक्यों, शब्दों का प्रयोग किया जाता है। अब मानकीकरण करके एकरूपता लाने से ही छत्तीसगढ़ी का विकास संभव है। तथा इसी से ही छत्तीसगढ़ी को 8 वीं अनुसूची में शामिल कर पूर्ण रूप से राजभाषा का दर्जा दे पाना संभव है।इस हेतु विभिन्न जिले के छत्तीसगढ़ी  जानकारों, साहित्यकारों, विद्वानों, को एक मंच पर लाना होगा और उनके द्वारा ही निर्धारण करना होगा।
राजकाज की भाषा बनने के लिए एकरूपता आवश्यक है। छत्तीसगढ़ी के अनेक रूप है। छत्तीसगढ़ के अन्य - अन्य क्षेत्रों में अलग - अलग प्रकार के छत्तीसगढ़ी का प्रयोग किया जाता है। मगर अब छत्तीसगढ़ी को प्रशासनिक, तकनीकी, वाणिज्य, बैंकिंग, कृषि, कानून कोर्ट, कचहरी, आदि आदि क्षेत्रों में प्रयोग में लाना है। इसके लिए जल्द से जल्द मानककोष बनाने की जरूरत है ताकि पूरे छत्तीसगढ़ में एक ही प्रकार के छत्तीसगढ़ी को इन स्थानों में प्रयोग में लाया सके।
बहरहाल,संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत छत्तीसगढ़ी को अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया सरकार द्वारा की गई वह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है तथा सरकार बधाई के पात्र है ......।

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

एक ही विधा पर लेखन सफलता दिलाती है

विभिन्न अवसरों पर नगर में आयोजित कवि गोष्ठियों में मुझे बकायदा आमंत्रित किया जाता है। मैं वहां उपस्थित भी होता हूं। मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है। मैं असमंजस की स्थिति में रहता हूं। मेरा विषय कविता लेखन नहीं अपितु कहानी लेखन है। भला कविता कहां से और कैसे सुनाऊ ? अन्य लेखक मित्र ताना मारते हैं कहानी के साथ कविता क्यों नहीं लिखते ? अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी विधा कहानी लेखन है न कि कविता लेखन। एकाध अवसर पर इस बात का खुलासा भी किया मगर वे हंस कर टाल गये। कह गए कि जो कहानी लिख सकता है वह कविता क्यों नहीं लिख सकता। मेरा तो यह मानना है कि जो लेखक विभिन्न विधाओं पर लिखने का प्रयास करता है वह निश्चित रुप से किसी भी विधा में पारंगत हासिल नहीं कर सकता। उनकी लेखन शैली में न कविता होती है न कहानी न अन्य विधा। ऐसी स्थिति में वह किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा नहीं निखार सकता। और फिर जब कोई लेखक  विभिन्न विधाओं पर लिखकर किसी भी क्षेत्र का नहीं रह जाता इससे अच्छा तो किसी एक विधा पर ही सतत लेखन ही श्रेष्ठ है न ?
एक हमारे मित्र है, कई वर्षों से लेखन कार्य कर रहे हैं। पर वह दिशाहीनताा के कारण कभी कहानी लिखने बैठ जाता है, कभी कविता, कभी गीत तो कभी $गज़ल यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर लेख, समसामायिक लेख लिखने का भी वे प्रयास किए मगर अब तक एक भी रचना को पूरी तरह नहीं लिख पाये हैं। वे कुछ दिन पूर्व ही मुझे बताये कि वे व्यंग्य लिखने का प्रयास कर रहे हैं मगर मेरा दावा है कि उनका व्यंग्य लेखन भी अपूर्ण ही रहेगा। मेरा तो विचार है कि किसी विधा पर लेखन किसी जनरल स्टोर्स में समान बेचने वाले व्यापारी के समान नहीं है जो अपनी एक छोटी सी दुकान में भी विभिन्न प्रकार के समान रखता है और उसे मालूम होता है कि कौन समान कहां पर रखा है, उसका मूल्य क्या है। लेखन तो एक ऐसी क्रिया है जो एक विधा पर लेखन करेगा वही सफल लेखक होगा। चोटी के किसी भी लेखक को देख लो सफलता उसी ने हासिल की है जो एक ही विधा पर लेखन कार्य किये है।

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

कहीं हम अंग्रेजी का मोह त्यागने से कतराते तो नहीं ?


19 दिसम्बर 1934 ई. को कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद द्वारा राष्ट्रभाषा और उसकी समस्याएं को लेकर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास के चतुर्थ उपाधि महोत्सव के अवसर पर दिया गया दीक्षांश भाषण का अंश प्रस्तुत है।
आपकी सभा ने पन्द्रह - सोलह साल के मुख्तसर समय में जो काम कर दिखलाया है, उस पर मैं आपको बधाई देना चाहता हूं। खासकर इसलिए कि आपने अपनी ही कोशिशों से यह नतीजा हासिल किया है। सरकारी इमदाद का मुँह नहीं ताका। जो अगरेंजी आचार - विचार भारत में अग्रगण्य थे और है। वे लोग राष्टï्रभाषा के उत्थान पर कमर बाँध लें तो क्या कुछ नहीं कर सकते ? और यह कितने बड़े सौभाग्य की बात है कि जिन दिमागों ने एक दिन विदेशी भाषा में निपुण होना अपना ध्येय बनाया था, वे आज राष्टï्रभाषा का उद्धार  करने पर कमर कसे नजर आ रहे हैं और जहां से मानसिक पराधीनता की लहर उठी थी, वहीं से राष्टï्रीयता की तरंगे उठ रही है। और गत वर्ष यानि दल के नेताओं के भाषण सुन कर मुझे यह स्वीकार करना पड़ना है कि वह क्रिया शुरू हो गई है।
अगर हमारे नेता और विद्वान जो राष्टï्रभाषा के महत्व से बेखबर नहीं हो सकते, राष्टï्रभाषा व्यवहार कर सकते, तो जनता में उस भाषा की ओर विशेष आकर्षक होगा। मगर यहां तो अंगरेजियत का नशा सवार है। प्रचार का एक और साधन है कि भारत के अंगरेजी और अन्य भाषाओं के पत्रों कोहम इस पर आमदा करें कि वे अपने पत्र के एक - दो कॉलम नियमित  रूप से राष्टï्रभाषा के लिए दे सके।
एक स्थान पर कथासम्राट ने कहा है कि राष्टï्र की बुनियाद राष्टï्र की भाषा है। नदी, पहाड़ और समुद्र राष्टï्र नहीं बनाते। भाषा ही वह बंधन है जो चिरकाल तक राष्टï्र को एक सूत्र में बांधे रहता है, और उसका शीराजा बिखरने नहीं देता। अगर हम एक राष्टï्र बनकर अपने स्वराज के लिए उद्योग करना चाहते हैं तो हमें राष्टï्रभाषा का आश्रय लेना होगा और उसी राष्टï्रभाषा के बख्तर से हम अपने राष्टï्र की रक्षा कर सकेगें। आप उसी राष्टï्रभाषा के भिक्षु हैं, और इस नाते आप राष्टï्र का निर्माण कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी राजभाषा संशोधन विधेयक को महामहिम राज्यपाल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा स्वीकृति प्रदान कर दी गई है। छत्तीसगढ़ी के विरोधियों ने भारत सरकार से प्रस्ताव भेज कर निवेदन किया गया कि भारतीय संविधान की 8 वीं अनुसूची में किसी और भाषा को शामिल न किया जाय।
प्रेमचंद ने अपने इसी दिन के भाषण में कहा है कि एक अच्छा सा राष्टï्रभाषा का विद्यालय तो हम खोल नहीं सके। हर साल सैकड़ों स्कूल खुलते हैं जिनकी मुल्क को बिलकुल जरूरत नहीं। उसमानिया विश्वविद्यालय काम की चीज है अगर वह उर्दू और हिन्दी के बीच की खाई को चौड़ी न बना दे। फिर भी मैं उसे विश्वविद्यालयों पर तरजीह देता हूं। कम से कम अंगरेजी की गुलामी से तो उसने अपने आपको मुक्त कर लिया।
कथा सम्राट प्रेमचंद का चिंतन आज भी यथास्थान पर है। आज भी हम राष्टï्रभाषा को सर्वव्यापी बनाने युद्ध कर रहे हैं। ऐसा क्यों ?  हम पूर्ण रूप से हिन्दी को राष्टï्रभाषा नहीं बना पाये हैं ? कहीं हम आज भी अंगरेजी का मोह त्यागने से कतराते तो नहीं। ऐसा तो नहीं कि  हम सम्मेलनों या अन्य स्थानों पर पीठ थपथपवाने के उद्देश्य से ही हिन्दी की महत्ता पर भाषण भर ठोकना जानते है ,उसे अमल पर लाने से परहेज करते हैं ?