इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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गुरुवार, 23 जुलाई 2020

वरिष्ठ कवि एवं शिक्षाविद डा.अरुण सज्जन की षष्ठी पूर्ति के अवसर पर प्रखर पत्रकार श्री कन्हैया सिंह द्वारा लिया गया साक्षात्कार

प्रस्‍तुति : पदमा मिश्रा 
भगवती चरण वर्मा की काव्य चेतना शोध ग्रंथ, नीड़ से क्षितिज तक, संस्पर्श, उजास जैसे काव्य संग्रह, अक्षरों के इंद्रधनुष निबंध संग्रह जैसी कई पुस्तकों के रचयिता और कला संस्कृति, काव्य पीयूष, रामवृक्ष बेनीपुरी साहित्य अलंकरण सम्मान, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन पटना शताब्दी साहित्य सम्मान, सेवक साहित्य श्री सम्मान वाराणसी जैसे अनेक सम्मानों से सम्मानित डॉ अरुण सज्जन 60 वसंत पूरा कर चुके हैं. उनकी लेखनी से हिंदी साहित्य समृद्ध होता रहा है. आज भी लेखनी उसी गति से चल रही है.  इस पड़ाव में उन्होंने अपने साहित्यिक और वैयक्तिक जीवन की कई परतों को उजागर किया. थोड़ी पारिवारिक उलझन के बीच साहित्य सृजन करते रहे. पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश : 

सवाल : आप साहित्य सृजन में कब से जुड़े? सृजन के लिए किसे श्रेय देना चाहेंगे?
जवाब : बात वर्ष 1966-67 की है. मेरे पिता जी स्व. रामवृक्ष महाराज स्कूल में प्राध्यापक थे. उनके पास प्रेमचंद का कहानी संग्रह पांच फूल था. उस समय मैं पांचवीं-छठी में रहा हूँगा. मैंने यह पुस्तक पढ़ी. मुझे लगा काश ऐसा होता कि किसी पुस्तक में नीचे लेखक की जगह मेरा नाम भी होता अरुण कुमार सज्जन. तब मैंने चार चांद नाम से 4 कहानियों का संग्रह लिखा और नीचे लिख दिया अरुण कुमार सज्जन. इस तरह मेरा सृजन शुरू हुआ. इसका श्रेय प्रेमचंद को ही जाता है. वर्ष 1971 में बांग्लादेश बना. इसको लेकर इंदिरा गांधी काफी चर्चा में थीं. मैं आठवीं-नवमी का छात्र था. उस समय मैंने इंदिरा गांधी पर कविता लिखी, नारी में इंदिरा. जिसकी मूर्त रूप में पिताजी ने तारीफ की.

सवाल : साहित्य में आपके आदर्श कौन हैं और क्यों?
जवाब : आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री मेरे आदर्श हैं. वे मुजफ्फरपुर में रहते थे. मैं गया का रहने वाला हूँ. वर्ष 1984 में उनसे संपर्क हुआ. तब से जीवन भर जुड़ा रहा. ज्यों-ज्यों मैं निकट आता गया, रिश्ता पारिवारिक होता गया. शास्त्री जी एक निधि के रुप में हमेशा मेरे पास रहेंगे. उनकी पंक्ति मैं हमेशा गुनगुनाता रहता हूँ. उनमें कोई लाग-लगाव नहीं था. वे जमीनी व्यक्ति थे. 

सवाल : आप साठ के मुकाम पर कैसा अनुभव कर रहे हैं?
जवाब : साठ की उम्र रिटायरमेंट की होती है. व्यक्ति बूढ़ा हो गया होता है. मतलब अनुभव से बूढ़ा. यहाँ पहुँचकर अच्छा लग रहा है. अपने पराए से जो अच्छे-कड़वे अनुभव मिले, वह मेरे पास है. मुझे लगता है कि अपनी नीयत और नीति अच्छा रखें तो आप कभी भी डगमगाएंगे नहीं. अपने उसूल पर रहा. इसलिए  अकेलापन से कभी घबराहट नहीं हुई. जहाँ राम वहीं अयोध्या. अपने स्वभाव से आप किसी भी जगह को अयोध्या बना सकते हैं. नहीं तो घर में भी बेगाने हो जाएँगे.

सवाल : आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, आगे क्या योजना है? 
जवाब : मेरी प्रकाशित पुस्तकें 10 हैं. जिनमें तीन काव्य संग्रह, तीन आलोचना, दो पाठ्यपुस्तक और दो संपादित पुस्तकें हैं. इसके अलावा नौ पुस्तकें प्रेस में हैं. जो लॉकडाउन के बाद आ जाएँगी. वर्तमान में "मानस के स्त्री पात्र "का संपादन कर रहा हूं. यह अगस्त में ही आ जाएगी. आगे दशरथ मांझी पर कथा काव्य लिख रहा हूँ. यह भी इसी साल आ जाएगा. आधा काम हो चुका है. पिताजी के साहित्य जो पांडुलिपि में है, उसे रामवृक्ष महाराज : साहित्य सागर नाम से प्रकाशित करना है. 

सवाल : आज के साहित्य और साहित्यकारों पर आपके क्या विचार हैं?
जवाब : आज लिखने की होड़ है. आचार्य जानकीबल्लभ शास्त्री कहते थे कोई बेसुरा राग में गाता जा रहा है, उसे गीत कहोगे? साहित्य वह है जो हमें जगाए, सुलाए नहीं. इस दृष्टिकोण से देखें तो आज कौन साहित्य लिख रहा है! साहित्यकारों में विखंडन आया है. खेमे में बट गए हैं सभी. साहित्य माने हित के साथ. हम अपने लोगों (साहित्य बिरादरी) के साथ ही हित नहीं कर रहे. यह साहित्य नहीं हो रहा है. साहित्यकारों ने साहित्य को बांटने की कोशिश की. प्रगतिवाद तक सब ठीक रहा. 1950 के बाद का काल, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श का हो गया. यहीं से साहित्य का भला नहीं हो रहा है. 

सवाल : साहित्य में सम्मान का क्या महत्व है? आप साहित्यिक सम्मान पाकर कैसा महसूस करते हैं?
जवाब : मुझे लगता है सम्मान का अर्थ है संतोष. साहित्यिक पारितोषिक है यह. जो विश्वास जगाता है कि आपका काम सही दिशा में जा रहा है. इससे ज्यादा कोई बनाता है, योजनाबद्ध तरीके से सम्मान लेता है, इसे नियोजित करवाता है, तो दुख होता है. "सम्मान की वैशाखी से साहित्य नहीं चल सकता". कबीर, तुलसी को कितना सम्मान मिला. सम्मान में बाजार में नहीं आना चाहिए. कोई ऐसा कर रहा है तो गलत करता है.

सवाल : आपके रचनाकर्म में पारिवारिक साथ कैसा है?
जवाब : मेरा समय पारिवारिक त्रासदी में बीता. पुत्री अर्चना मेरा संबल है. पत्नी किरण का उत्साह हमेशा मिला. अभी भी पारिवारिक स्थिति प्रतिकूल ही है. इससे मुंह मोड़ नहीं सकता. पंत जी की पंक्ति "वियोगी होगा पहला कवि" मैं इस वाक्य को नहीं भूल सकता. वियोग में ही कविता का स्फुटन होता है. "फिर अकेला मैं खड़ा हूँ"में मेरे दर्द हैं. जहाँ तक पत्नी की बात है तो मेरी किसी भी रचना की प्रथम श्रोता वही होती हैं. वह बढ़िया समीक्षक हैं. रचना को पास-फेल करना उन्हीं के हाथ में है.
सवाल : आपको किस चीज से लगाव है? 
जवाब : मुझे प्रकृति से बेहद लगाव है.  नदी, पहाड़ के सामने खड़ा होता हूंँ तो लगता है कि मैं इसमें साकार हो गया हूँ। प्रकृति में खुद को देखता हूँ। मेरी विधा कविता है. जेहन में सबसे पहले कविता ही आती है.

शनिवार, 29 नवंबर 2014

कथाकार कुबेर से यशवंत मेश्राम की भेटवार्ता

( हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में राजनांदगाँव की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहाँ की साहित्यिक परंपरा को ' सरस्वती ' के यशस्वी संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्त्बिोध, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, नन्दूलाल चोटिया जैसे विभूतियों ने परिपुष्ट किया है। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कथाकार विनोद कुमार शुक्ल इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कुबेर को इसी परंपरा की अगली कड़ी के रूप में रेखांकित करना अनुचित नहीं होगा। कुबेर को किसी ने ' संभावनाओं के कवि ' तो किसी ने 'संभावनाओं के साहित्यकार' के रूप में चिन्हित किया है। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से सृजनरत कुबेर की पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। कुबेर मूल रूप से व्यंग्यकार हैं। राज्य शासन ने उन्हें ' गजानन माधव मुक्तिबोध ' साहित्य सम्मान से विभूषित किया है। उभरते हुए समालोचक यशवंत ने कुबेर के साथ सार्थक बातचीत किया है। इस बातचीत में कुबेर ने कुछ मौलिक और विचारणीय मुद्दे उठाये हैं जिस पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। - संपादक)
यशवंत - अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि पर कुछ प्रकाश डालेंगे?
कुबेर - मेरा जन्म पाँच भाइयों के संयुक्त कृषक-परिवार में हुआ। परिवार बहुत अधिक संपन्न नहीं था फिर भी उस समय जो सबसे अच्छा हो सकता था वैसा हमने खाया और पहना। हमने न तो कभी सूखी रोटी खायी और न ही कभी फटे वस्त्र पहने। बचपन के जमाने में दो या तीन बार अनावृष्टि की वजह से भयानक दुर्भिक्ष पड़े थे। लोग दाने-दाने को मोहताज हुए थे। हमारे परिवार ने जरूरतमंदों की मदद की थी। तब के बचेखुचे लोग आज भी इस परिवार की गौरवगाथा सुनाते हैं। पर अब सिर्फ अतीत बचा है।
हमारे पिताजी पाँच भाइयों में तीसरे नंबर के थे। सबसे बड़े पिता जी और दोनों चाचा प्रायमरी तक पढ़े थे। बड़े पिता जी गाँव में सरकार की ओर से लगान वसूल करने का काम करते थे। मेरे पिताजी पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। पाँच भाइयों के परिवार में पहिली संतान मैं था, इसीलिए परिवार में; और पड़ोसियों में भी मैं सबका दुलारा था। मेरा लालन-पालन बड़े पिताजी और बड़ी माँ जिसे परिवार में हम सब भाई-बहन Óबड़की दाईÓ बुलाया करते थे, ने किया। वे ही मेरे असली माता-पिता थे। आज मैं जहाँ हूँ, जहाँ बैठा हूँ, वह सब उन्हीं का दिया हुआ है। जन्म देने वाले माता-पिता को तो मैंने नौ-दस साल की अवस्था में  पहचाना। इसका परिणाम हुआ कि; संयुक्त परिवार में, एक साथ रहते हुए भी, इस दौरान उनसे जो अजनबीपन पैदा हुआ था, वह अंत तक बना रहा।
यशवंत- साहित्य की ओर आप कैसे प्रवृत्त हुए?
कुबेर - जब मैं छोटा था, मेरे पिताजी का फुफेरा भाई महीने में दो-तीन बार हमारे घर जरूर आया करते थे। जरूरत पड़ने पर उन्हें संदेश भेजकर बुला लिया जाता था। वे वैद्य थे और हमारे परिवार की चिकित्सा का दायित्व वे ही निभाते थे। वे हमेशा कहा करते थे कि कुबेर को डॉक्टर बनाना है। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने जीव विज्ञान विषय का चयन किया था। परन्तु महाविद्यालय तक आते-आते हमारे परिवार का बिखराव शुरू हो चुका था। परिस्थितियाँ इतनी खराब हुई कि मैं पी. एम. टी. की परीक्षा नहीं दे पाया और आगे चलकर एम. एस-सी. भी मुझे बीच में ही छोड़ना पड़ गया। इसका मलाल मुझे आज भी है। परन्तु हिन्दी विषय में जब मैं साकेत और कामायनी जैसी कृतियों के अंशों को पढ़ता था; हमारे महान् साहित्यकारों की जीवनी पढ़ता था तो मेरे मन में भी उन्हीं के जैसा बनने की इच्छा होती थी, यही इच्छा अब मैं पूरी कर रहा हूँ।
यशवंत - आपने विज्ञान में स्नातक किया और साहित्य में स्नातकोत्तर; दोनों भिन्न विषय हैं। आप दोनों में सामंजस्य कैसे बिठा पाये?कुबेर - यदि मैं केवल समकालीन साहित्य तक ही सीमित रहूँ, जिससे कि मेरा नाता है, तो मैं कहूँगा; दोनों विषयों में अंतर तो है पर विरोध कहीं भी नहीं है, सहमति ही सहमति है, फिर सामंजस्य बिठाने की बात कहाँ? धर्म और साहित्य, दोनों को ही समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि चाहिए। कुछ ही समय पहले तक, बल्कि कहूँ तो बहुत कुछ अभी तक हमारे यहाँ साहित्य धर्म से ही जुड़ा हुआ है। दुनिया के प्राचीनतम् साहित्य वेदों में विज्ञान बहुत है। परन्तु आज तक यह धार्मिकों की बपौती बनी हुई है इसीलिए यहाँ पर मैंने धर्म को लाया। वैदिक गणित के बारे में अब हम जानते हैं क्योंकि पाठ्यक्रमों में अब यह आया है। साहित्य में भी हमने धार्मिक तत्वों को प्रतिष्ठित किया। साहित्य से विज्ञान को हमने हमेशा दूर रखा इसीलिए इसके अंदर अंध आस्था की जड़ें इतनी मजबूत हुई। विज्ञान हमें अंध आस्था से बचाता है क्योंकि चीजों को स्वीकारने से पहले यह उसकी सत्यता की पहचान करता है। विज्ञान में अविश्वास भी है और विश्वास भी। दोनों के बीच में तर्क और अन्वेषण है जो हमें प्रगतिगामी बनाता है। यहाँें मस्तिष्क है तो हृदय भी है जिसके समन्वय से दुनिया सुंदर बनती है। आप मेरा विरोध करेंगे कि विज्ञान में हृदय कहाँ? पर यह गलत है। दुनिया को सबसे अधिक प्रेम विज्ञान ने ही किया है। दुनिया को सबसे अधिक प्रेम विज्ञान ने ही दिया है और इसीलिए यहाँ न तो किसी प्रकार का बंधन है और न ही किसी प्रकार का मोक्ष है। जहाँ बंधन ही न हो, वहाँ मोक्ष कैसी? और यही प्रवृत्ति समकालीन साहित्य की भी है। इसीलिए मैं कहता हूँ, साहित्य और विज्ञान में विरोध कहीं भी नहीं है। धर्म में केवल विश्वास है, केवल हृदय है जो समानांतर तौर पर, जाने-अनजाने एक पक्षीय विश्व की रचना करता चला जाता है। और यही बातें मनुष्य को प्रतिगामी बनाती हैं। ध्यान रहे, प्रकृति द्विपक्षीय है जिसका एक पक्ष सृजन का है तो दूसरा पक्ष विध्वंश का। सृजन और विध्वंश के बीच का विस्तार ही जीवन है। बहुत पहले यह बात हमें श्रीकृष्ण ने बताई थी परन्तु इस वैज्ञानिक सत्य के ऊपर हमने धार्मिक आस्था का मोटा आवरण चढ़ाकर इसे आचरण में ढलने नहीं दिया और इसे केवल पूजा की वस्तु में बदल कर रख दिया। यही बात कबीर ने कही, परन्तु कबीर को आज तक किसी ने न तो कवि माना और न ही संत; फिर उनकी बातों को महत्व क्यों मिलना था? धर्म पहले तरह-तरह के काल्पनिक भय पैदा करके बंधनों का सृजन करता है और फिर स्वंय ही, अपने ही बनाये बंधनों से मोक्ष की बात करता है। यहीं से अड़चनें और बाधाएँ पैदा होना शुरू हो जाती हैं, जो शोषण और शोषकों के संसार का सृजन करती है। विश्व में जो भी, जिस रूप में भी है, चाहे जड़ हो या चेतन, चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल, चाहे दृश्य हो या अदृश्य सब एक व्यवस्था के अंतर्गत हैं। एक ही व्यवस्था के अंतर्गत सभी मर्यादित रूप से अपनी-अपनी जगह पर क्रियाशील हैं। प्रकृति की यही व्यवस्था विज्ञान है। विश्व में जो भी है, सब उसी के अंग हैं। सभी उस व्यवस्था का पालन करते हैं। परन्तु मनुष्य ने इस व्यवस्था का अतिक्रमण किया है। यह प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह है। लेकिन हमें समझ लेना चाहिए कि प्रकृति की शक्तियाँ अपराजेय है। प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह का नुकसान हमें ही होना है। आज लोग '' सेव द अर्थ '' का नारा देने लगे हैं। प्रकृति से खिलवाड़ बंद हो, प्रकृति के विरुद्ध चलना बंद करें, इसके पीछे शायद यही भावना हो। परन्तु इस नारे में छिपी हुई दो बातें - पहला हमारा दंभ और दूसरा हमारी घबराहट, बहुत स्पष्टता के साथ उभरकर कर आती है। हमें माल्थस की बातें याद करनी चाहिये।
यशवंत - हिन्दी साहित्य के विकास को आप किस तरह व्याख्यायित करेंगे?कुबेर - हिन्दी साहित्य के काल विभाजन में मैं राहुल सांकृत्यायन के मतों का पक्षधर हूँ। राहुल सांकृत्यायन ने जो हमें दिया है, जितना दिया है, उसका मूल्यांकन अभी तक नहीं हो पाया है। हिन्दी साहित्य में उनके जैसा विराट व्यक्तित्व अभी तक नहीं हुआ है। उन्होंने पालि और प्राकृत के कई विलुप्त-दुर्लभ साहित्य को ढूँढ कर हमें दिया है। अपभ्रंश के स्वयंभू और पुष्पदंत जैसे महान् कवियों का पता लगाया है। उनके अनुसार अपभ्रंश भाषा जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्राकृताभास कहा है, सातवीं शताब्दि तक प्रचलित थी और हिन्दी का विकास इसी भाषा से हुआ है। सिद्धों की भाषा अपभ्रंश ही थी। राहुल ने स्वयंभू रचित '' रामायण '' की भाषा अपभ्रंश और इसकी रचना काल 1464 ई. माना है। उन्होंने हिन्दी साहित्य के प्रथम काल अपभ्रंश काल को '' सिद्ध सामंत काल '' कहा है और इसका प्रारंभ उन्होंने सातवीं शताब्दि माना है। हिन्दी साहित्य के प्रारंभिक काल को '' सिद्ध सामंत काल '' नाम देने के पीछे राहुल के पास पर्याप्त कारण और तर्क हैं। अपभ्रंश के कवि सिद्ध होते थे। समाज में राजाओं और सामंतों का दबदबा था। सामंतों की संख्या अधिक थी। वे अपने स्वार्थों के लिए लड़ाइयाँ लड़ते थे। शेष समय भोग-विलास में व्यतीत करते थे। वे अत्यंत क्रूरता और निर्ममतापूर्वक जनता से कर वसूलते थे परन्तु जनता के दुख-दर्द से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता था। रासो काव्यों में अतिरंजनापूर्ण युद्ध वर्णनों का ही बाहुल्य है।
भक्तिकाल में, सामाजिक सरोकारों की दृष्टि से हो चाहे काव्य के तत्वों की दृष्टि से, किसी भी दृष्टि से देख लें; प्रेममार्गी सूफी कवियों और कबीर जैसे ज्ञानमार्गी कवियों की रचनाएँ जिनमें वैचारिक प्रतिबद्धता का बीजारोपण हुआ है, कहीं अधिक मूल्यवान हैं परन्तु वे अब तक गौण बने हुए हैं। लोगों को तुलसी और सूर के अलावा और कोई दूसरा नजर नहीं आया, क्योंकि धर्म को शोषण का हथियार बनाने वालों को यहाँ अधिक सुविधा मिलती है। यहाँ मानवीय मूल्यों से संबंधित संदेशों और उपदेशों की कोई कमी नहीं हैं जिससे समाज का कल्याण हो सकता था; परन्तु धार्मिक आस्था और रूढ़ मान्यताओं की अतिवृष्टि से आई प्रलय में ये सारे डूब गये, बह गये। धार्मिक आडंबरकारों का दावा है कि रामचरितमानस पढ़ने अथवा सुनने मात्र ही से जीव को भवसागर से मुक्ति मिल जाती है; तब फिर इसमें निहित सामाजिक और नैतिक मूल्यों की परवाह भला कौन मूर्ख करेगा?
भक्तिकाल को '' हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल '' कहने में लोगों ने बहुत जल्दबाजी की है। ऐसा कहने वालों ने रीतिकाल के बाद शायद हिन्दी साहित्य के इतिहास को समाप्त मान लिया था। पर यह गलत है। हिन्दी साहित्य रूपी सरिता का प्रवाह आज भी निर्बाध गति से जारी है। नदी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती जाती है, उसका स्वरूप विराट होता जाता है; वह अधिक कल्याणकारी होती जाती है। आधुनिक काल में हिन्दी साहित्य का स्वरूप पहले से विराट हुआ है। आधुनिक काल ने ही हिन्दी साहित्य को कोरे नैतिक उपदेशों, संदेशों, कल्पनाओं और आदर्शों की मायावी दुनिया से निकालकर इसे यथार्थ का ठोस वैचारिक धरातल दिया है। आधुनिककाल ने ही यह बताया कि संसार में केवल राजे-महाराजे, ईश्वर और भगवान ही नहीं होते हैं; केवल काल्पनिक स्वर्ग और नरक ही नहीं होते हैं; अपितु करोड़ों-अरबों की संख्या में यहाँ ऐसे लोग भी रहते है जिनके पास न तो रोटी है, न मकान है और न ही कपड़े हैं। नरक कल्पना नहीं वास्तविकता है और इसी धरती पर मौजूद है। रोटी, कपड़ा और मकान से वंचित किये गये सारे शोषित लोग इसी नरक में रहते है। ईश्वर भी है और उनका स्वर्ग भी है; और इसी धरती पर है, और ये सारे के सारे लोग शोषक हैं। इस धरती पर मौजूद स्वर्ग और नरक, दोनों ही, धरती के इन्हीं ईश्वरों की निर्मितियाँ है।
भविष्य भूत की तुलना में हमेशा बेहतर होता है, यह प्रकृति का नियम है। काव्य में काल्पनिक कलात्मकता, आदर्शों की स्थापना अथवा काव्य तत्वों की प्रधानता को ही पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए। काव्य अथवा साहित्य का मूल उद्देश्य ईश्वर की स्थापना करना नहीं बल्कि मानवता और बेहतर समाज की स्थापना करना होना चाहिए और इसके लिए काल्पनिक आदर्शों की नहीं बल्कि विचारों की ठोस जमीन की आवश्यकता होती है। समकालीन साहित्य ईश्वरत्व की नहीं, मनुष्यत्व की सर्वोच्चता का उद्घोष करता है और मानवता की स्थापना का प्रयास करता है; इसलिये यह मुझे पिछले सभी कालों से बेहतर प्रतीत होता है।
यशवंत - आपने समकालीन साहित्य की बात की है। बहुत सारे विद्वानों ने इसकी व्याख्या की है और इसकी विशेषताओं को रेखांकित भी किया है। आप इसे किस प्रकार परिभाषित करना चाहेंगे?
कुबेर - न तो काल को परिभाषित किया जा सकता है और न ही काल के किसी खण्ड को। परन्तु प्रयोजन-विशेष के लिए लक्षणों के आधार पर काल को हम विभिन्न खण्डों में वर्गीकृत अवश्य कर सकते हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास जिस समय लिखा गया, और जब आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल का निर्धारण किया गया, ये तीनों काल बीत चुके थे। यह नामकरण इतिहास के इन कालखण्डों में लिखे गए साहित्य के लक्षणों और विशेषताओं के आधार पर किया गया है। अर्थात् आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल - ये सारे नाम लाक्षणिक हैं। परन्तु इतिहासकार को उसके समय में अर्थात् वर्तमान में लिखे जा रहे साहित्य के कालखण्ड को कोई लाक्षणिक नाम देना संभव नहीं हुआ होगा और उसने इसे आधुनिककाल का नाम दिया। आधुनिक काल के प्रारंभ में छायावादी कविताएँ लिखी गई। गद्य का विकास इसी काल में हुआ। साहित्य का कायाकल्प हुआ। कला, भाव, भाषा, शैली, छंद और विषय की दृष्टि से साहित्य का सर्वथा नया स्वरूप सामने आया जिसमें न तो कोरे उपदेश हैं, न तो आत्मा-परमात्मा का  चिंतन है और न जीव और ब्रह्म की खोज का झंझट है। यहाँ तो केवल बेहतर मानव समाज की खोज है, मानव जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास है, मानव और मानवतावाद की स्थापना करने वाले विचारों की प्रधानता है। यहाँ पर '' मैं कौन हूँ ''  की जगह '' हम कौन हैं '' पर चिंतन है। '' भवसागर से मुक्ति '' के स्थान पर '' सारे रूढ़ विचारों और अंध मान्यताओं से मुक्ति '' का प्रयास है। यहाँ किसी काल्पनिक ईश्वर के स्वर्ग की तलाश नहीं है, बल्कि इसी दुनिया में मौजूद गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता आदि से बजबजाती हुई वास्तविक नरक से मुक्ति के मार्गों की खोज है। यहाँ शब्दों को पाण्डित्य का लेप चढ़ाकर ममी बनाने का प्रयास नहीं किया जाता, बल्कि उपेक्षित, त्याज्य और मृतप्राय शब्दों को लाक्षणिक उपचार देकर जीवंत और शक्तिसंपन्न बनाया जाता है। क्या नाम दिया जाय ऐसे साहित्य को और ऐसे साहित्य के इस कालखण्ड को? प्रथमत: इसे ''छायावादेत्तर काव्य '' कहा गया परन्तु इस नाम को व्यापक समर्थन नहीं मिल सका। शायद साहित्यिकों में छायावाद और उससे पहले के सारे वादों के प्रति सम्मान-भाव का लोप हो चुका था। और फिर गद्य का विकास भी तो इसी काल में हुआ, और साहित्य के उपर्युक्त सारे लक्षण गद्य में भी तो मौजूद हैं। मुझे नहीं पता, '' समकालीन साहित्य '' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया। अनायास ही किया या ग्रह-नक्षत्रों का मिलान करके किया। परन्तु मुझे तो यह शब्द पूर्णत: यादृच्छिक लगता है। यादृच्छिक वे शब्द होते है जो लक्षणों या तर्कों के आधार पर नहीं होते हैं। समकालीन साहित्य के जिन लक्षणों की हमने चर्चा की उनमें से कोई भी लक्षण इस शब्द में ध्वनित नहीं होते है। ''समकालीन साहित्य '' के काल को '' समकाल '' मानेंगे। '' समकाल '' वर्तमानकाल तो नहीं हो सकता न। '' समकाल '' की कल्पना सर्वथा नई कल्पना है। पहले हमें यह समझना होगा कि '' समकालीन साहित्य '' और '' समकालीन '' दोनों दो भिन्न-भिन्न शब्द हैं। समकालीन होने का जो अर्थ है, उसे आप '' समकालीन साहित्य '' के साथ नहीं जोड़ सकते। यह केवल एक नाम है, जो '' समकाल '' में लिखे जा रहे साहित्य के लिए तय किया गया है।
अब! समकाल को कैसे समझें?
समकालीन साहित्य के जितने लक्षण हमने पहले देखा है, जैसे - यह मानवतावादी है, बेहतर और समतामूलक-शोषणविहीन समाज की स्थापना का प्रयास करता है, यह सारे सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों-अंधविश्वासों का विरोध करता है, यह शोषितों का पक्षधर है और शोषकों का विरोध करता है, यह व्यवस्था विरोधी है, यह शब्दों के द्वारा पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं करता, यह बिंबों और प्रतीकों के द्वारा नये सौन्दर्यशास्त्र की स्थापना करता है, आदि .....। आप पीछे मुड़कर देखेंगे तो पायेंगे कि ये लक्षण तो कबीर के साहित्य में भी मौजूद है। आप और पीछे देखेंगे तो ये लक्षण आदिकवि बाल्मीकि, केशकम्बली और सरहपाद (सरहपा) में भी मौजूद हैं। आदिकवि बाल्मीकि ने अपने विश्व प्रसिद्ध ''रामायण '' में जावालि जैसे तेजस्वी पात्र के माध्यम से कहा - '' राम, राजा को जहाँ जाना था, चले गये। तुम चलो और राज्य संभालो। श्राद्ध आदि व्यर्थ है, अन्न का अपव्यय है। देखो, मरा हुआ व्यक्ति क्या खाता है? यदि दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे व्यक्ति के शरीर में चला जाता हो तो, परदेश गये व्यक्ति के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उन्हें मार्ग के लिए भोजन की आवश्यकता नहीं होगी।''
केशकम्बली और सरहपाद (सरहपा) दोनों ही भिक्खु थे। केशकम्बली की भाषा पालि थी। सरहपाद अपभं्रश काल से संबंधित हैं। यज्ञ में बलि दिये गये पशु की आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होती है; ऐसा दावा करने वाले ब्रह्मर्षियों को लक्ष्य करते हुए केशकम्बली पूछता है - '' अग्निष्टोम यज्ञ में मारा गया पशु यदि स्वर्ग चला जाता है, तो यजमान अपने बाप का वध क्यों नहीं करता? ''
इसी तरह सरहपाद कहते हैं - '' यदि नग्न रहने से मुक्ति हो जाय, तो कुत्ते और सियार भी मुक्त हो जायेंगे। मोरपंख धारण करने से मुक्ति यदि संभव है तो मोर और चँवर भी मुक्त हो जायेंगे। शिला चुगकर खाने से यदि ज्ञान प्राप्त हो जाय तो कीटें और तुरंग भी ज्ञानी हो जायेंगे।''
तो कहने का तात्पर्य यह है कि वर्तमान में लिखे जा रहे समकालीन साहित्य की विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ भूत में रचित साहित्यों में भी विद्यमान हैं; और आगे भी रहेंगी। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं - वर्तमानकाल, जो बहुत ही क्षणिक होता है, स्वयं को भूत और भविष्य, दोनों ही कालों में विस्तारित करने की क्षमता रखता है। वर्तमान का यही विस्तार तो समकाल है।
यशवंत - आपने कहा - समकालीन साहित्य में '' मैं कौन हूँ '' की जगह '' हम कौन हैंं '' पर चिंतन होता है। इसे समझायेंगे?
कुबेर - बिलकुल! '' मैं कौन हूँ '' का चिंतन भारतीय दर्शन का केन्द्रबिन्दु रहा है। इसकी अवधारण नितांत वैयक्तिक है जो हमें अध्यात्म की ओर ले जाता है। जीवन के यथार्थ से या यथार्थ की दुनिया से इसका क्या संबंध है? अथवा इसका सामाजिक सरोकार क्या है?'' मैं नीर भरी दुख की बदली,'' में '' मैं '' की अभिव्क्ति नितांत निजता की अभिव्यक्ति हेै। क्या इसका कोई सामाजिक सरोकार बनता है? लेकिन निराला जब कहता है - '' ठहरो, अहो! मेरे हृदय में है अमृत, मैं सीेंच दूँगा। अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम, तुम्हारे दुख, मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।'' तब निराला का '' मैं '' दुनिया के उन तमाम विचारवान लोगों का '' मैं ' बन जाता है जो '' तुम '' अर्थात् दुनिया के सारे शोषितों और वंचितों के प्रति सक्रिय सहानुभूति रखते हैं। उनकी दुनिया बदलने के लिए कुछ करना चाहते हैं। उनकी पीड़ा को आत्मा की गहराई से अनुभव करना चाहते हैं। और इसी तरह जब मुक्तिबोध कहता है - '' मैं तुम लोगों से दूर हूँ, तुम्हारी प्रेरणओं से मेरी प्रेरणाएँ इतनी भिन्न है, कि जो तुम्हारे लिए विष है, वह मेरे लिए अन्न है।'' तब मुक्तिबोध का, तेलिया लिबास में काम करता हुआ मैकेनिक '' मैं '' दुनिया भर के गरीब-मजदूरों और शोषितों का प्रतिनिधि बन जाता है और उसका '' तुम '' दुनिया भर के शोषकों-वंचकों का प्रतीक बन जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, समकालीन साहित्य '' मैं '' का साहित्य नहीं है, '' हम '' का साहित्य है और इसीलिए मुक्तिबोध यहाँ पर मुक्ति '' मैं '' में नहीं '' हम '' में तलाशते हैं। समकालीन साहित्य आपको स्वर्ग और नरक के भूल-भुलइया में नहीं उलझाता। यदि आपका जीवन दुखों से भरा हुआ है तो उसका कारण भी इसी दुनिया में मौजूद है, और सुखमय जीवन के लिए आपको किसी स्वर्ग की जरूरत नहीं है। स्वर्ग भी इसी दुनिया में मौजूद है। समकालीन साहित्य एक बेहतर समाज की बात करता है।
यशवंत - क्या लेखक संघ-समूह के लेखक एक दूसरे से मतभेद रखते हैं? इतना क्यों रखते हैं कि एक-दूसरे के लेखन-अभिव्यक्ति को अपनी प्रतिभा में प्रकाशित करने से इन्कार कर देते हैं?
कुबेर - मतभेद से ही असहमति और विरोध का जन्म होता है। असहमति और विरोध, दोनों ही रचनात्मकता के लिए अनिवार्य हैं। जहाँ असहमति और विरोध नहीं होगा वहाँ नव-सृजन किस प्रकार होगा? इसीलिए मैं तो मतभेद, असहमति और विरोध को सकारात्मक दृष्टि से देखता हूँ। कबीर ने क्यों कहा - '' निंदक नियरे राखिए? ''
पहले लोगों ने कहा कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसके चारों ओर घूमता है। कुछ लोग इस सिद्धांत से असहमत हुए और एक नया तथ्य सामने आया। भविष्य में इससे भी कोई असहमत होगा और एक नया तथ्य फिर सामने आयेगा। ब्रह्मांड के रहस्य अनंत हैं। अभी तो हमने समुद्र के एक बूंद के बारे में जाना है। बाकी के बारे में जानना तो अभी बाकी है।
आपने पूछा है - क्या लेखक संघ-समूह के लेखक एक दूसरे से मतभेद रखते हैं? समकालीन साहित्य का मूलाधार एक सुदृढ़ और सुस्थापित विचारधारा है तो समकालीन साहित्य से जुड़े लेखकों और उनके समूहों में मतभेद किस बात पर होगी? पर नहीं! यह तो नये विचारधाराओं के सृजन का विचार मंच भी है। प्रकृति ने हर व्यक्ति को अपने आप में बेजोड़ बनाया है। सबकी अपनी अलग बुद्धि है, अपनी अलग सोच और सबके अपने अलग विचार हैं और इसीलिए सबके दृष्टिकोण भी अलग-अलग होंगे। विस्तार की दृष्टि से इनमें से कुछ सीमित सरोकारों वाले अर्थात निजी मान्यताओं से संबंधित विचार, संकुचित विचार और कुछ व्यापक अर्थात सामाजिक सरोकारों वाले विचार होते हैं। कोई समूह या संघ तब अस्तित्व में आता है जब व्यापक रूप से समान विचार और दृष्टिकोण वाले लोग आपस में जुड़ते है। तो उनमें मतभेद क्यों होंगे? यदि व्यक्तिगत संकुचित विचारों को जरा भी जगह मिली तो मतभेद भी होंगे और टकराहट भी होगी। इनमें वर्चस्व की लड़ाईयाँ जरूर हो सकती है।
और यदि दो भिन्न-भिन्न विचारधारा वाले समूह होंगे तो उनके विचार आपस में टकरायेंगे और उनमें मतभेद भी जरूर होंगे। हम देखते हैं, बहुत सारे साहित्यकार मित्र हैं जो आज भी भक्तिकालीन प्रवृति वाले साहित्य के सृजन में लीन हैं। तो इनसे तो वैचारिक मतभेद होंगे ही। अभी कुछ दिन पहले की बात है, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक, दोनों ही माध्यमों में एक साहित्यकार महोदय की एकाएक खूब चर्चा होने लगी क्योंकि उन्होंने गीता के श्लोकों का हिन्दी के माध्यम से छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है। अनुवाद जरूर एक महत्वपूर्ण विधा है। पर हिन्दी में उपलब्ध कृतियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद तो बहुत महान् कार्य नहीं हुआ। फिर भी इनका एक बड़ा समर्थक वर्ग है। पर मैं समझता हूँ, समकालीन साहित्यकारों का इस तरह के कार्यों से शायद ही सहमति होगी।
आपने कहा है - लेखक संघ-समूह के लेखक एक दूसरे से इतना मतभेद रखते हैं कि वे एक-दूसरे के लेखन-अभिव्यक्ति को अपनी प्रतिभा में प्रकाशित करने से इन्कार कर देते हैं।
हर लेखक के पास अपनी प्रतिभा होती है। आपके पास भी है और मेरे पास भी है। मैं आपकी प्रतिभा का अनुसरण करूँ, या आप मेरी प्रतिभा का अनुसरण करें, क्या यह उचित होगा? पर प्रतिभा में मौलिकता हो तो दुनिया उसे स्वीकारती है, उसकी सराहना करती है। मैं पूछता हूँ, आज ऐसा कौन सा व्यंग्यकार होगा जिसके लेखन में परसाई या जोशी प्रकाशित नहीं होते होंगे? मुक्तिबोध और प्रेमचंद आज सिर चढ़कर क्यों बोल रहे हैं। क्या हमारे अंदर इनकी प्रतिभाएँ प्रकाशित नहीं हो रही हैं? क्या हम एक दूसरे की अच्छी रचनाओं की प्रशंसा नहीं करते हैं?
यशवंत - तो क्या परजीवी रचनाकार जन्म लेकर फलते-फूलते हैं?
कुबेर - परजीवी साहित्यकार किसे कहा जायेगा? इसे पहले स्पष्ट करना होगा। आज दुनिया का हर समकालीन साहित्यकार किसी एक सुस्थापित विचारधारा का अनुसरण कर रहा है। मुक्तिबोध ने कहा है कि आपको स्पष्ट करना होगा कि आप किस ओर खड़े हैं। वह विचारधारा जो साहित्यकार को दुनिया भर के शोषितों के पक्ष में खड़ा कर देता है, तो उस विचाधारा का अनुसरण करना परजीवी होना तो नहीं होगा न।
देखिये! आज बाजार जीवन के हर क्षेत्र में हावी है। बाजार के दबाव के चलते ही, मैं समझता हूँ, एक समानान्तर साहित्य विकसित हो चुका है। आप मनोरंजन परोसने वाले टी. व्ही. चैनलों पर प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों को देखिये। इन धारावहिकों का कथानक तैयार करने वाले और इसका स्क्रिप्ट लिखने वाले लोग भी तो अंतत: साहित्यकार ही हैं। वे तो वही लिखते होंगे जो उनका निर्माता और निर्देशक सुझाता होगा। क्या वहाँ पर शोषण के खिलाफ कुछ कहा जा रहा है? वहाँ तो केवल कल्पना की एक झूठी दुनिया है, पूँजी की सत्ता केन्द्र के चारों ओर की भूल-भलैया में दर्शकों को भटका कर उन्हें उनके वर्तमान जीवन की सचाइयों से कोसों दूर ले जाता है। तो अगर परजीवी साहित्यकार कोई होगा तो सबसे पहले मैं इस वर्ग में इन्हीं साहित्यकारों को देखना पसंद करूँगा। ये फलेंगे भी और फूलेंगे भी, पर इनके फूल और इनके फल दुनिया के लिए कभी सेहतमंद नहीं होंगे। इससे न तो दुनिया का पेट भरेगा और न ही दुनिया सुंदर बनेगी।
यशवंत - साहित्यकार अंतत: किसके साथ खड़ा रहता है?
कुबेर - मुक्तिबोध ने जिस मेहतर की कल्पना की है, मैं तो उसी ओर खड़ा होना पसंद करूँगा।
यशवंत - आपने एक प्रश्न खड़ा किया है, '' भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल '' मान लेने से इसके पूर्व और इसके बाद के साहित्य खारिज ही हो जाते हैं। इस संबंध में मेरा एक प्रश्न है। जो विभाजन भक्तिकाल का आचार्य शुक्ल ने किया वह तो संप्रदायवाद की ओर नहीं जाता? जैसे - भक्ति तो भक्ति ही है। विधिवत् शिक्षा कबीर की नहीं हुई उसे आचार्य ज्ञानमार्ग में डाल देते हैं। यह एक साजिश तो नहीं है? आपके विचार जानना चाहूँगा। 
कुबेर - मैंने कहा है - भक्तिकाल को '' हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल '' कहने में लोगों ने बहुत जल्दबाजी की है। ऐसा कहने वालों ने पूर्व के वीरगाथाकाल और बाद के रीतिकाल से जरूर इसकी तुलना की होगी। चाहे जैसा भी किया हो, पर एक बात तय है, इस तरह की घोषणा करके इन लोगों ने संभावनाओं को जरूर खारिज कर दिया है। यह मूर्खतापूर्ण है। इसीलिए मैंने कहा कि इस प्रकार की घोषणा करके इन लोगों ने हिन्दी साहित्य के इतिहास को समाप्त मान लिया था। आज के समीक्षकों-साहित्यकारों को इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए। आप देख रहे हैं, आधुनिक साहित्य का अपना अलग ही सौन्दर्य है। आपने कबीर की बात की है। कबीर को किसी मार्ग में डालने या बांधने की क्षमता किसी में नहीं है। वे तो मुक्त आत्मस्वरूप हैं। उनकी इच्छा, वे चाहे जहाँ खड़े हो जायें। वैसे कबीर को बाजार में खड़ा होना जयादा अच्छा लगता है। बाजार का संबंध लोक से है। कबीर लोक के आदमी हैं, वे लोक में ही जिन्दा हैं, और लोक के कारण ही जिन्दा हैं। पुराणवादियों ने तो उनके अवसान के अनेक अपाय कर लिए थे।
यशवंत - आपकी भोलापुर की कहानियाँ विसंरचनावाद में वर्चस्ववादियों का खात्मा करने का प्रश्न खड़ा करती है?
कुबेर - मैंने किसी के खात्मे की बात नहीं की है। प्रकृति में एक पहलू वाला कुछ भी नहीं है, सारे द्विपक्षीय हैं। एक पक्ष अच्छाई का है तो दूसरा पक्ष बुराई का है। जीवित समाज में ये दोनों बातें रहेगी ही, दोनों के बीच निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। दोनों के बीच विचलन होता रहता है। पर यदि बुराई के पक्ष में अधिक विचलन हो तो पलड़े को सम पर लाने के लिए बड़े संघर्ष की जरूरत होती है, जनआन्दोलन की जरूरत होती है। मैंने इसी संघर्ष की बात की है। छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न है। यहाँ के लोगों ने इसका संरक्षण किया है, दोहन कभी नहीं किया। अब इस संपदा को लूटने की होड़ मची हुई है। यहाँ के लोग तो किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में हैं। वे अपनी संपदा की रक्षा करें, या अपने स्वाभिमान की रक्षा करें या अपने अस्तित्व की रक्षा करें, उन्हें तो कुछ सूझ नहीं रहा है। यही तो भोलापुर की और उसके संघर्ष की कहानी है।
यशवंत - छत्तीसगढ़वासी वर्तमान में वर्चस्व संकट से गुजर रहे हैं; भोलापुर के कहानी में सुस्पष्ट है - तो आप किस-किस प्रकार के लेखन की अपेक्षा करते हैं? विशेषकर नये लेखकों से।
कुबेर - आप देख रहे होगें। छत्तीसगढ़ में आज कवियों और लेखकों की बाढ़-सी आई हुई है। छत्तीसगढ के लिए यह बड़ा शुभ संकेत है। यह बाढ़ इस बात का संकेत है कि आज के हमारे कवि और लेखक अपनी संपदा की रक्षा के लिए, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जाग चुके हैं। वे अपनी-अपनी कलम से अपने-अपने स्तर पर लड़ रहे हैं। अपने कवियों और लेखकों से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ। आवश्यकता संगठित होने का हैं। शासन ने राजभाषा आयोग बनाया है। क्या कर रहा है आयोग? असके पास छत्तीसगढ़ के कवियों और लेखकों की सूची है? असके पास छत्तीसगढ़ के साहित्य समितियों और उसके पदाधिकारियों-सदस्यों की सूची है। इनकी गतिविधियों के साथ उनका समन्वय है? आयोग आखिर किस लिए है? अपेक्षा मेरी इसी स्तर पर है।
यशवंत - किसी कृति की समीक्षा में कृति के अंदर परखना चाहिए या उसके आरपार देखकर?
कुबेर - किसी कला की समीक्षा में दो पक्ष होते हैं - पहला पक्ष कला और दूसरा पक्ष समीक्षक। किसी एक ही कला की समीक्षा में अलग-अलग समीक्षकों के निष्कर्ष अलग-अलग हो सकते हैं। सबकी आपनी दृष्टि और अपने दृष्टिकोण होते हैं। रचना के भी अनेक आयाम और अनेक पहलू होते हैं। सभी समीक्षक सभी आयामों और सभी पहलुओं तक नहीं पहुँच पाते हैं। इसीलिए मेरा मानना है कि कोई भी समीक्षा कभी भी पूर्ण नहीं होती। रह गई बात आरपार देखने की, तो आरपार देखना पारदर्शी वस्तुओं में ही संभव हो सकता है। इस तरह तो वस्तु के अंदर की बनावट और बुनावट को देखना कभी संभव नहीं हो सकता। वस्तु के अंदर की बनावट और बुनावट को देखने के लिए तो उसकी शल्यक्रिया करने की आवश्यकता होती है। तो समीक्षक के लिए यही काम जरूरी और महत्वपूर्ण है।
किसी भी समीक्षक के लिए जरूरी है, यदि वह रचना और रचनाकार के साथ न्याय करना चाहता है, सबसे पहले वह अपने सभी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त हो ले। समीक्षक एक साथ परीक्षक भी होता है और परीक्षार्थी भी। हर सवाल के लिए उसकी तैयारी पूरी होना चाहिए। हर रचना के पीछे रचनाकार का एक खास उद्देश्य होता है। समीक्षक का दूसरा काम हो जाता है, रचनाकार के इस उद्देश्य को वह पकड़े, समझे और अपने तर्कों के द्वारा सिद्ध करे कि रचनाकार अपने उद्देश्य में कितना और कहाँ तक सफल रहा। रचना और रचनाकार की कसौटी उद्देश्य प्राप्ति की सफलता होना चाहिए। किसी संयंत्र की स्थापना एक वस्तु विशेष का उत्पादन करना होता है। इस प्रक्रिया में कुछ सहउत्पाद भी बनते है। संयंत्र की सफलता उसके मुख्य उत्पाद की गुणवत्ता द्वारा निर्धारित होती है। उस रचना में रचनाकार की नई खोज क्या है जिसे वह समाज को देने जा रहा है, रचना की भाषा कितनी संप्रेषणीय है, पाठक के दिमागी कसरत के लिए उसमें कितनी गुंजाइश है, आदि बातें बाद में आती हैं।
यशवंत - क्या एक प्रतिबद्ध विचारधारा में किसी कृति को कसना एक प्रकार की तानाशाही होगी ही?
कुबेर - जरूर होगी। किसी लेखक या रचनाकार का एक प्रतिबद्ध विचारधारा से संबद्ध होना अच्छी बात है, पर बंधना अच्छी बात नहीं हो सकती। किसी प्रतिबद्ध विचारधारा से संबद्ध या बंधे हुए रचनाकार का दृश्यवितार और दृष्टिविस्तार उसी विचारधारा के दायरे में सिमटा हुआ होगा। इसके विपरीत यदि कोई रवनाकार किसी प्रतिबद्ध विचारधारा के अलावा भी, उसके दायरे से निकलकर, समाज के बीच जाता है और समाज के यथार्थ को भोगता है, देखता है तो यह अधिक महत्वपूर्ण होगा क्योंकि इसमें दृश्यवितार और दृष्टिविस्तार की अपार संभावनाएँ होगी। और इस तरह स्वचिंतन और स्वअनुभूति से लेखक का अपना स्वयं का कोई नया विचार प्रसूत होता हो तो यह रचनाकर्म के लिए और भी उपयोगी होगा। ऐसा होता ही है, इसलिए किसी एक प्रतिबद्ध विचारधारा में किसी कृति को कसना एक प्रकार की तानाशाही ही होगी?
यशवंत - तो धर्म-राजनीति समीक्षा में आदर्श क्यों नहीं माने जा सकते?
कुबेर - आज सारी चीजे यथार्थ केन्द्रित हो गई है। हमारे अतीत का यथार्थ क्या था, आज का यथार्थ क्या है-कैसा है और भविष्य का यथार्थ क्या होना चाहिए, आज का सारा चिंतन और लेखन इन्हीं पर आधृत हो गया है। हमारा भविष्य कैसा होना चाहिए, इस पर आज का हमारा चिंतन भी यथार्थ परक हो गया है, आदर्श परक नहीं। नैतिकता और आदर्श का उपदेश झाड़ते हुए ढाई हजार साल बीत गये। कितना लाभ हुआ? समाज में बुराइयों का स्तर कम हुआ, या बढ़ा? इसीलिए आज शिक्षाविदों का कहना है - बच्चों को नैतिकता और आदर्श का उपदेश देने के स्थान पर उन्हें यथार्थ का ज्ञान कराया जाना चहिए। व्यावहारिक तौर पर  नैतिक-अनैतिक और अच्छे-बुरे का निर्णय उन्हें स्वयं करने देना चाहिए। लोगों को धर्म और राजनीति का भी यथार्थ आज समझ में आ जाना चाहिए। यह तो होना ही चाहिए।
यशवंत - परतंत्रता उपनिवेशवाद-स्वतंत्रता उपनिवेशवाद में सत्ताकेन्द्र अपने लिए लेखकों की फौज तैयार की है। इसमें लेखन को लकवा मार जाता है। आपके विचार जानना चाहूँगा।
कुबेर - आप ठीक कहते हैं। आज उपनिवेशवादी ताकतों की ही सरकारें काम कर रहीं है और सारे राष्ट्राध्यक्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सी. ई. ओ. की भूमिका में आ गये हैं। भौतिक सुख की लालच में पड़कर लेखक भी उपनिवेशवाद की गुलामी करने के लिए आतुर हो गये हैं। टी. व्ही. के धारावाहिक क्या सिद्ध करते हैं?  पर सभी लेखक ऐसे नहीं हैं। लेखकों के साथ यह नहीं होना चाहिए।

पता 
शंकरपुर,वार्ड नं. 7, गली नं. 4 
राजनांदगांव (छ.ग.) 491 441

शनिवार, 22 नवंबर 2014

अभी तो सफर जारी है - इरफान

अजय ब्रह्ममात्मज
अजय : अपनी फिल्मी सफर के बारे में बतायेंगे ?
इरफान : सीखते-सीखते यहां तक तो आ गया। मैंने जो प्रोफेशन चुना है,वह मेरे मकसद और लक्ष्य के करीब पहुंचने के लिए है। उसमें मदद मिले तो ठीक है। बाकी शोहरत,पैसा,नाम ़ ़ य़ह सब बायप्रोडक्ट है। यह सब तो मिलना ही था। यह सब भी मिल गया। इनके बारे में सोच कर नहीं चला था। जयपुर से निकलते समय कहां पता था कि कहां पहुंचेंगे ? अभी पहुंचे भी कहां हैं। सफर जारी है। मुझे याद आता है एक बार बेखयाली में मैंने मां से कुछ कह दिया था। थिएटर करता था तो मां ने परेशान होकर डांटा था - यह सब काम आएगा क्या ? मैंने अपनी सादगी में कह दिया था कि आप देखना कि इस काम के जरिए मैं क्या करूंगा ? मेरे मुंह से निकल गया था और वह सन्न होकर मेरी बात सुनती रह गई थीं। उन्हें यकीन नहीं हुआ था। तब यह मेरा इरादा था। पता नहीं था कि कैसे होगा ़ ़ ़क्या होगा ? हर मां तो ऐसे ही परेशान रहती है। उन्हें लगता है कि हम वक्त बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने जो दुनिया नहीं देखी है,उसमें जाने की बात से ही कांप जाती हैं। अपने देश में हर मां-बाप की चिंता रहती है कि बच्चे कैसे और कब कमाने लगेंगे ?  कब अपने पांव पर खड़े हो जाएंगे। यह बच्चों और मां-बाप दोनों के लिए कैद है। वे बच्चों से पहले डरने लगते हैं कि उनका क्या होगा? इस चक्कर में वे बच्चों को एक्सप्लोर करने का मौका नहीं देते। मेरे बेटे ने अभी कहा कि मुझे फिजिक्स के बदले एनवॉयरमेंट साइंस पढ़ना है? मैंने पूछा - क्यों बदलना चाहते हो? आगे जाकर क्या करोगे? उसका जवाब था,मुझे नहीं मालूम। उसने यह भी बताया कि बाकी बच्चों को मालूम है कि उन्हें क्या करना है ? मुझे नहीं मालूम है। मैं उसे यह नहीं कह सकता कि तुम्हें पता होना चाहिए। मुझे नहीं पता था कि थिएटर करने से क्या होगा? उसे नहीं पता कि एनवॉयरमेंट साइंस पढ़ने से क्या होगा ? मुझे तो इतना ही लगता है कि आप जो भी करें , उसे रुचि से करें। बाकी जिंदगी तय करेगी। बिल्कुल नई दुनिया में प्रवेश कर सकेंगे। मेरा अपना शहर ही मेरे लिए छोटा पड़ गया था। हम अपने माहौल से बड़े हो जाते हैं। हमारे सपने शहर में नहीं समा पाते।
अजय : क्या वास्तव में सिनेमा बदल गया है क्या यह काल फिल्मों के लिए संक्रमणकाल है ?
इरफान : अभी सिनेमा बदल गया है। करने लायक कुछ फिल्में मिल जाती हैं। अगर पिछली सदी के अंतिम दशक जैसा ही चलता रहता तो माहौल डरावना हो जाता। हमें कुछ और सोचना पड़ता। सिनेमा संक्रमण के दौर में है। निर्देशकों की नई पौध आ गई है। वे ताजा मनोरंजन ला रहे हैं। दर्शक भी उन्हें स्वीकार कर रहे हैं। उनसे हमारी दुकान चल रही है। अगर यह बदलाव नहीं होता तो हम अभी भी कैरेक्टर एक्टर कर रहे होते। प्रतिदिन के हिसाब से यानी दिहाड़ी पर काम कर रहे होते। ढेर सारे पुराने एक्टर दिहाड़ी पर काम करने लगे थे। कहने लगे थे ़ ़ ़भाई हमें दिन के हिसाब से दे दो। किसी कलाकार के लिए वह डरावनी स्थिति है। हमारी बिरादरी में कुछ लोगों को दिहाड़ी में ही किक मिलता है। मेरे  लिए अगर मैं खुद को एवं दर्शकों को सरप्राइज न करूं तो मजा नहीं आता। हमारा मुख्य उद्देश्य एंटरटेन करना है। उसके साथ आप कितनी चीजें लेयर में डाल दो। विदेशों में देखें क्रिस्टोफर नोलन एंटरटेनिंग फिल्में बनाते हैं,लेकिन उसके अंदर कैसा फलसफा डालते हैं। आप समझ सकते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है ? दुनिया से उस फिल्म का कनेक्शन क्या है ? सारी चीजें मिल रही होती हैं। उस तरह का एंटरटेनमेंट हमारे यहां नहीं है। मुझे उम्मीद है कि हो जाएगा। हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं। अभी पूरी दुनिया का समागम तेजी से हो रहा है। लंचबॉक्स तो इसी समागम का उदाहरण है। उसकी लोकप्रियता की एक वजह है कि उसमें इतने देशों के तकनीशियन साथ आए। इतनी प्रतिभाओं ने साथ काम किया। डायरेक्टर रितेश बत्रा का विजन सही तरीके से बाहर आया।
आप देखिएगा, अभी अनेक एक्टर आएंगे। लोग मेरा नाम लेते रहते हैं , लेकिन जल्दी ही तादाद बढ़ेगी। हमारे एक्टर हालीवुड में भी काम करेंगे। मेनस्ट्रीम हालीवुड की फिल्मों में भी हमारी मांग बढ़ेगी। अफसोस है कि हिंदी का कमर्शियल सिनेमा अभी तक इन प्रतिभाओं को जगह नहीं दे पा रहा है। उनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। हिंदी सिनेमा एकपरतीय,लाउड और मेलोड्रामैटिक बना हुआ है। सभी लकीर के फकीर बने हुए हैं। अच्छी बात है कि कम ही सही लेकिन दूसरी तरह का सिनेमा भी बन रहा है। उन्हें दर्शक पसंद कर रहे हैं। वे सफल भी हो रही हैं। हां , अभी वैसी फिल्मों की सफलता का प्रतिशत बहुत कम है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हम एक्टर कम ही खप पाते हैं। सब कुछ पॉपुलर स्टार पर आश्रित और केंद्रित है।
अजय : अपने केरियर के संबंध में बतायेंगे।
इरफान :मेरे करियर को देखें तो वॉरियर मुझे तोहफे के रूप में मिला था। सालों की तपस्या का फल था। उन दिनों मैं सीरियल कर रहा था। एकरसता से ऊब चुका था। कुछ फिल्में की थीं , लेकिन उनमें नोटिस नहीं हो पाया था। टीवी और फिल्मों को लेकर मेरा असंतोष खौल रहा था। पक रहा था। बेचैनी थी। मुझे लगता है कि कुछ नया होने के पहले की बेचैनी थी। वॉरियर मेरे रास्ते में आ गई। सच कहूं तो वह फिल्म मुझे परोस कर दी गई थी। मैं ऑडिशन के लिए जाने को तैयार नहीं था। तिग्मांशु धूलिया ने फोर्स किया। उसने कहा कि तू जाकर खाली मिल ले। मैं गया। कमरे में घुसा और कुछ हो गया। एहसास हुआ कि यह कुछ स्पेशल है। निर्देशक आसिफ कपाडिया के साथ अपनी पसंद की फिल्मों की बातें चल रही थीं। इस बातचीत में ही तारतम्य बैठ गया। उसने मुझे फिल्म का एक सीन पढने के लिए दिया। वह मुझे झकझोर गया। फिर प्रोड्यूसर से बात हुई। मैंने इतना ही कहा था कि इस फिल्म में कुछ मैजिक है। वह क्यों निकला मेरे मुंह से मुझे पता नहीं। उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ। बताया गया था कि फिल्म कान फिल्म समारोह में जाएगी। कुछ अन्य गतिविधियां भी होनी थीं। यह 2001 की बात होगी। उसका कोई ठोस नतीजा नहीं दिखा।
इस बीच हिंदी फिल्मों में मेरी स्थिति कुछ ठीक हो गई थी। हासिल आ गई थी। कुछ और फिल्में मिल गई थीं। फिर मीरा नायर की नेमसेक आई। वह फिल्म मुझे मिली। बिल्कुल अलग किरदार था। मुझे प्रौढ़ बंगाली का किरदार निभाना था। मैंने वह चांस लिया। मुझे पहले अंदाजा नहीं था कि मेरा किरदार प्रधान हो जाएगा। मुझे लगता था कि वह काल पेन की फिल्म है। उन्होंने गोगोल का किरदार निभाया था। मीरा ने कुछ इस तरीके से एडिट किया कि मैं मेन लीड हो गया। नेमसेक फेस्टिवल में घूम रही थी। तब्बू फिल्म के साथ जा रही थीं। मुझे नहीं बुलाया जाता था। मैंने खीझ कर मीरा को एक पत्र भी लिखा कि मुझे पता ही नहीं चल रहा कि मैं क्या कर रहा हूं ? उन्हीं दिन न्यूयॉर्क में एक शो हुआ। आदित्य भट्टाचार्य ने वहां फिल्म देखी। मैंने उन्हें फोन करके पूछा कि क्या लग रहा है ? आदित्य ने बताया कि फिल्म खत्म होने पर एक ही कैरेक्टर याद रह जाता है और वह तुम्हारा कैरेक्टर है। मैंने कहा कि यह तो मैजिक हो गया। फिर उसके बाद कुछ अवार्ड भी मिले। इस फिल्म के बाद फिर से सब कुछ ठहर गया।
मीरा नायर की जब फिल्म मिली थी, उसके ठीक पहले मैंने नेमसेक किताब पढ़कर खत्म की थी। मुझे लगा कि कुछ दैवीय हस्तक्षेप हो रहा है। अभी मैंने किताब खत्म की और अभी मुझे यह रोल मिल रहा है। किताब में तो मेरा किरदार पृष्ठभूमि में ही रहता है। जिंदगी बार - बार उसका इम्तिहान ले रही है। शुरू में मीरा ने मुझसे तीन महीने का समय ले लिया था। तब कोंकणा सेन शर्मा फिल्म में थीं। फिर पता चला कि तब्बू कर रही हैं। बीच में उन्होंने अभिषेक बच्चन को भी लाने की कोशिश की। शूटिंग टलती रही और मेरा समय बर्बाद होता रहा। छह महीने के  इंतजार के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। तब मुझे कुल 15 लाख रुपए मिले थे। मैंने तय कर लिया था कि नेमसेक करनी है। मैं टिका रहा। मैं कुछ मांग कर नहीं सकता था। उसके पहले मैंने कभी अमेरिका की यात्रा नहीं की थी। उसके पहले माइटी हार्ट आ गई थी। उसके सिलसिले में मैं कान फिल्म समारोह गया था। मैंने अपनी मैनेजर पर दवाब डाला था कि तुम मेरे लिए हॉलीवुड के निर्माताओं से बात करो। उसने मुझे समझाया कि हॉलीवुड के निर्माता तभी तुम्हें अपनी फिल्मों में लेंगे, जब तुमसे उन्हें तुरंत लाभ हो। समझ लो कि वे तुम में निवेश नहीं करेंगे। मेरी निराशा बढ़ती जा रही थी। मेरे साथ एक अच्छी बात रही है कि जब भी निराश और हताश हुआ हूं तो कोई नई राह निकल पड़ती है। जिस चीज के लिए परेशान रहता हूं, वह तो नहीं मिलती, कोई और चीज मिल जाती है। मेरी लाइफ में यह पैटर्न बन गया है। मुझे लगता है कि हर आदमी अपनी जिंदगी के कचरे को हटाकर देखे तो उसे एक पैटर्न दिखाई पड़ेगा। मैंने देखा है कि जब भी मैं कोई दावा करता हूं तो वह पूरा नहीं होता। यहां तक कि बच्चों के साथ खेलते समय भी हार जाता हूं।
वॉरियर जब कान फिल्म समारोह में नहीं ली गई तो बहुत झटका लगा। मैंने तो पूरा प्लान बना लिया था। पता चला कि फिल्म ही नहीं चुनी गई। फिर मैंने खुद को समझाया कि मेरे लिए कोई प्लान काम नहीं करता। समय की धारा में मैं चलता रहूं तो राहें मिलती रहती हैं। मैं सिर्फ काम करता रहूं। कोई भी प्लानिंग न करूं तो सब कुछ मिलता चला जाता है। बीच में स्लमडॉग मिलियनयेर और स्पाइडरमैन जैसी फिल्में जरूर आईं, लेकिन असल प्रभाव तो लंचबॉक्स का रहा। इसके प्रभाव के दो पहलू हैं- एक तो यह फिल्म पूरी दुनिया में चली है। अभी तक किसी भारतीय फिल्म ने विदेशों के स्थानीय दर्शकों को आकर्षित नहीं किया है। लंचबॉक्स जहां भी गई, वहां के दर्शकों ने इसे पसंद किया। पहली बार किसी भारतीय फिल्म ने इंटरनेशनल पहचान बनाई हंै। यह बड़ी बात हुई है। फिल्म की कमाई भी हुई है।
 इस बीच  एक अमेरिकी टीवी शो इन ट्रीटमेंट किया था। उस टीवी शो में मेरी भयंकर तारीफ हुई। यूं लगा, लोग तारीफ में कविताएं लिख रहे हैं। कसीदे पढ़े गए। वह रोल मेरे लिए बहुत चैलेंजिंग था। मेरी जिंदगी के अनुभव कम पड़ गए थे। उस किरदार के दर्द को जीने में मजा आया। शूटिंग के आनंद के बावजूद मैं दर्द के उस अनुभव से निकलना चाहता था। हिंदी फिल्मों में याद करने की आदत खत्म हो जाती है। वहां पूरे - पूरे एपिसोड याद करने पड़ते थे। टीवी शो में रीटेक नहीं होता। अगर रीटेक हो गया तो यों समझें कि 15 पेज फिर से बोलना होगा। तीन तरफ से कैमरे लगे रहते थे। ऑनलाइन एडिटिंग होती रहती थी। उस शो को देखने के बाद परितृप्ति हुई। इन ट्रीटमेंट के बाद स्पाइडर मैन आई। उस फिल्म में ऐसा कुछ खास नहीं था। शुरू में हॉलीवुड की फिल्म करते समय अंग्रेजी से लड़ता था। उसे साध नहीं पाता था। हिंदी फिल्मों के हीरो जैसे हिंदी नहीं साध पाते, वैसे ही मैं हॉलीवुड की फिल्म में भाषा साध नहीं पा रहा था। किसी भी फिल्म में जब आप संवाद बोलते हैं तो उस भाषा का रस दर्शकों तक जाना चाहिए। फिल्में करते - करते इसे मैंने सीखा और साधा। अभी एक जापानी टीवी शो कर रहा हूं। यह पर्ल हार्बर पर हुए आक्रमण से संबंधित है। तब जापान पर मुकदमा चला था। केवल एक भारतीय जज ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट डाला था। उसी जज की भूमिका मिली है। अगर तारीखें वगैरह मैच कर गईं तो वह शो करूंगा। बाकी कुछ फिल्में भी मिली हैं, जिनकी स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूं।
कुछ महीने पहले जुरासिक पार्क की शूटिंग करके लौटा हूं। मुझे पता चला कि स्टीवन स्पीलबर्ग मेरे साथ काम करना चाहते हैं। महीने, दो महीने के बाद पता चला कि वे खुद इस फिल्म को डायरेक्ट नहीं कर रहे हैं। वे निर्माता बन गए। स्पीलबर्ग ने नए डायरेक्टर के ऊपर छोड़ दिया कि वह चाहे तो मुझे ले या हटा दे। बहुत मजा आया, क्योंकि बहुत ही मजेदार और खिलंदड़ा किरदार है मेरा। पहली बार ऐसी यूनिट दिखाई पड़ी, जहां दो - ढाई महीने साथ काम करने के बाद भी एक - दूसरे को देखकर खुश होती थी। दोस्ताना माहौल था। यहां पर अनुराग कश्यप और निशिकांत कामत के सेट पर ऐसा माहौल रहता है। अब देखें फिल्म पूरी होने के बाद मेरा रोल कितना रह जाता है। जुरासिक पार्क में मैं पार्क ओनर का रोल कर रहा हूं। मेरा किरदार थोड़ा दिखावटी और शो-ऑफ करने वाला है। हमेशा जोश में रहता है। मिशनरी है। कुछ करना चाहता है, लेकिन उसकी सोच में गहराई नहीं है।
अजय : आप आर्ट फिल्म करना चाहते हैं या कामर्शियल ?
इरफान : यहां की बात करूं तो 2014 का पूरा साल स्पेशल एपीयरेंस में ही चला गया। पहले गुंडे किया और फिर हैदर। अभी पीकू कर रहा हूं। मुझे यह पता है कि दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं। वे मुझ से उम्मीद कर रहे हैं। मैं यही कोशिश कर रहा हूं कि वे निराश न हों। मैं कुछ सस्पेंस लेकर आ सकूं। आर्ट  फिल्म करने में मेरा यकीन नहीं है,जिसमें डायरेक्टर की तीव्र संलग्नता रहती है। ऐसी फिल्में आत्ममुग्धता की शिकार हो जाती हैं। आर्ट हो है , पर वैसी फिल्म कोई करे जिसमें कुछ नया हो। ना ही मैं घोर कमर्शियल फिल्म करना चाहता हूं। फिर भी सिनेमा के बदलते स्वरूप में अपनी तरफ से कुछ योगदान करता रहूंगा। पीकू के बाद तिग्मांशु के साथ एक फिल्म करूंगा। और भी कहानियां सुन रहा हूं। सुजॉय घोष के साथ कुछ करना है। संजय गुप्ता के साथ भी बात चल रही है। वह ऐश्वर्या के साथ है। अभी उस पर काम चल रहा है। मैंने हां कह दिया है, लेकिन अभी देखें कहानी क्या रूप लेती है? निश्चित होने के बाद बात करने में मजा आता है। अभी लगता है कि फिल्म का प्री - प्रोडक्शन ठोस होना चाहिए। हिंदी फिल्मों में दर्शक मुझसे कुछ अतिरिक्त चाहते हैं। मैं चालू किस्म की फिल्में नहीं कर सकता। मुझे अपने रोल में कुछ अतिरिक्त दिखना चाहिए। हां, अगर डायरेक्टर पर भरोसा हो तो हां कर सकता हूं। वेलकम टु कराची का अनुभव के बाद ज्यादा सावधान हो गया हूं। मूल फिल्म किसी और दिशा में घूम गई थी। चीजें बदलती हैं तो समझ में आ जाती हैं। वेलकम टु कराची में क्लब सौंग डाल दिया था। क्लब सौंग तो अक्षय कुमार गा सकते हैं, उसमें मैं क्या करूंगा ? जो मेरा पिच नहीं है, वहां क्यों खेलने के लिए भेज रहे हो ? कमर्शियल फिल्मों में मैं आप को मजा दे सकता हूं, लेकिन मुझे अपना मैदान तो दो। मेरा मैदान, मेरा बल्ला दो, देखो मैं छक्का मारता हूं।
अजय :
एक कलाकार के लिए पैसे अहमियत रखता है या कला ?
इरफान :
विज्ञापनों में मेरी अलग पहचान बनी है। उसके लिए मैंने काफी लंबा इंतजार किया। वोडाफोन करने के बाद मेरे पास सारे ऐड एक ही प्रकार के आ रहे थे। सब उसी के एक्सटेंशन थे। एक-दो करने के बाद लगा कि ये तो निचोड़ लेंगे। फिर मैंने मना कर दिया। पैसो से ही संतोष नहीं होता। काम से भी संतोष होना चाहिए। मैंने उन लोगों को समझाया कि आप मुझे दोहराएंगे तो आप के प्रोडक्ट को कौन नोटिस करेगा? सीएट के साथ मेरी छह महीने तक बैठकें होती रहीं। मैंने उनसे कहा कि ऐड में कैरेक्टर डालो। ऐड में इतना जरूर ख्याल रखता हूं कि तंबाकू और नशे वगैरह के ऐड न करूं।
मैं अपनी जिंदगी में हर प्रकार के काम से जल्दी ऊब जाता हूं। अगर ऊब गया तो पागल हो जाऊंगा। इस लाइन में इसलिए आया कि अलग - अलग काम करता रहूंगा। मुझे किसी भी फिल्म या रिश्ते में संलग्न होने में वक्त लगता है। मैंने महसूस किया है कि सारे रिश्ते एक समय के बाद आप को तन्हा छोड़ देते हैं। कितना भी नजदीकी रिश्ता हो, उसमें घूम फिरकर आप अकेले हो जाते हो। अगर लिया गया काम मुझे व्यस्त रखे। इंटरेस्ट बना रहे। तब तो मैं लगा रहूंगा। नहीं तो कुछ और कर लूंगा। मैं अपनी तनहाई से घबरा जाता हूं। पैसों से भी ऊब जाता हूं। मेरे बच्चे मुझे डांटते रहते हैं कि गाड़ी बदल लो। मुझे लगता है कि महंगी गाड़ी लेकर पैसे क्यों बर्बाद करूं ? उन पैसों से अपने भाइयों की मदद कर सकता हूं। मुझे नई कार चाहिए, लेकिन उस कार के लिए कोई फिल्म नहीं कर लूंगा। उस लालसा से मैं निकल गया हूं। कभी था मैं उसमें। प्रलोभन मुझे डिगा नहीं सकते। मोटी रकम के ऑफर ठुकराने में मुझे वक्त नहीं लगता। दरअसल मैं तनाव में नहीं रहना चाहता। ऐसी फिल्में खोने से कुछ पाने का एहसास होता है।
नए एक्टर मेरी तरह बनना चाहते हैं। मुझे लगता है अपने काम और व्यवहार से मैं कोई सिग्नल दे रहा हूं। जिस नए एक्टर का एंटेना चालू होगा, वह मुझ से ग्रहण कर लेगा और फिर मुझ से आगे निकल जाएगा। मैंने खुद ऐसे ही दूसरों के सिग्नल पकड़े थे। चलते - चलते यहां तक आ गया। मेरे लिए एक्टिंग सिर्फ पैसा कमाने और सुरक्षा का साधन नहीं है। पैसे और सुरक्षा तो हैं, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, वह हमारे काम का बाय प्रॉडक्ट है। अभी कुछ दिनों पहले किसी ने कहा कि आप की पान सिंह तोमर देखने के बाद मुझे जीने का मकसद मिल गया। उसने हाथ भी नहीं मिलाया। कहा और निकल गया। मुझे लगा इससे ज्यादा पवित्र तारीफ नहीं हो सकती। अपने जीवन के लिए इसे महत्वपूर्ण मानता हूं। आप गौर करेंगे कि अपनी फिल्मों से मैं खुद के लिए जाल नहीं बुन रहा हूं। अपने काम से मुझे आजादी मिलती है। मैं यहां फिल्म करता हूं। किसी और देश के किसी शहर में कोई हिल जाता है। वह मेरे किरदार से कुछ सीख लेता है। उस सीख को मैं वैल्यू देता हूं। वह अनमोल है।
अजय : आपके व्यक्तित्व में किसका योगदान मानेंगे ?
इरफान : मेरे व्यक्तित्व में सबसे बड़ा योगदान एनएसडी का है। मैं अपने आप भी एक्टर बन सकता था। मेरे अंदर वह चीज थी, लेकिन फिर 15 साल लगते। मालूम नहीं तब कहां होता ?  क्या करता फिरता? जयपुर में मैं जमरू नाटक कर रहा था। मेरे साथ और भी लोग थे। मालूम नहीं वह कर के मैं कहां पहुंचता ? आप को बताऊं कि मैं जयपुर में फट रहा था। समझ में आ गया था आगे बढ़ना है तो कुछ सीखना पड़ेगा। एनएसडी ने सब कुछ घोल कर पिला दिया। तीन साल खत्म होने के बाद मुझे लगा कि एनएसडी भी कम पड़ गया। खुद से मैंने सवाल पूछा कि क्या यही स्टैंडर्ड हम आगे बढ़ाएंगे ? एनएसडी से निकलने के बाद तक मुझे पता नहीं था कि किसी इमोशन में कैसे प्रवेश करते हैं ? मुझे यह तो बताया गया कि अगर किसी कैरेक्टर में गिल्टी फील करना है तो आप स्टेज पर गिल्टी फील करो। मुझे यह नहीं बताया गया कि मैं गिल्टी कैसे फील करूं। वे संप्रेषण बता रहे थे। एहसास नहीं बता पा रहे थे। बमुश्किल एक या दो क्लास नसीर साहब के मिल पाए थे। वहां से निकला तो गोविंद निहलानी के साथ जजीरें जैसी फिल्म की। सभी तारीफ करते थे, लेकिन मैं खुद से नफरत करता था। जजीरें फिल्म की शूटिंग का आखिरी संवाद बोलते समय मुझे अपना किरदार समझ में आया। तब तक तो फिल्म बन चुकी थी। अब वह झुंझलाहट मैं किसे बताता ? मेरे लिए अभिनय अपने काम में जिंदा होना है। जिंदा होने का अपना एक्साइटमेंट होता है। कमर्शियल फिल्मों में अगर मुझे वह मिलने लगे तो वह भी करूंगा। सिर्फ पैसे कमाकर क्या करूंगा ?
अजय : आपका सोशल सर्कल है या नहीं ?
इरफान : मेरा सोशल सर्कल नहीं है। कुछ लोग मुझे अहंकारी समझते हैं। मैं इसकी परवाह नहीं करता। किसी कमरे में आप केवल चुपचाप बैठ जाएं तो देख लें बाकी नौ आप के बारे में क्या - क्या बातें करने लगते हैं। सभी के अपने निर्णय और दृष्टिकोण होंगे। किसी को लगेगा कि यह मारने वाला है। कोई कहेगा अहंकारी है। किसी को मैं प्यारा लगूंगा। तीसरा या चौथा कहेगा कि कोई स्कीम कर रहा है। नौ लोग होंगे तो नब्बे कहानियां बनेंगी। मुझे इस पचड़े में रहना ही नहीं है। अगर मुझे चुप रहना अच्छा लग रहा है तो मैं चुप रहूंगा। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।
पिछले दिनों एक नया एक्टर मिला। वह मेरे पास आया और मुझसे चिपक कर रोने लगा। मैं हतप्रभ। समझ में नहीं आया। फिर मुझे अपना वाकया याद आया। एनएसडी में मेरा एडमिशन हो गया था। संध्याछाया नाटक मैं देखने गया था। सुरेखा सीकरी और मनोहर सिंह उसमें अभिनय कर रहे थे। सुरेखा ने मुझे इतना अभिभूत किया कि नाटक खत्म होने के बाद मैं ग्रीन रूम में चला गया। मैंने उनके पांव पकड़े और रोने लगा। कोई इतना अच्छा अभिनय कैसे कर सकता है ? मुझे अपना वह इमोशन याद आया। एक सुकून सा मिलता है कि आप किसी को इंस्पायर कर रहे हैं। आप के एक्ट से कुछ हो जा रहा है। अब ऐसा न हो कि आप कुछ होने के लिए आप एक्ट करने लगे। सब कुछ नैसर्गिक होना चाहिए। हम सब की लाइफ इतनी शर्तों में बंधी रहती है कि हम लगातार प्रलोभन में फंसते रहते हैं। कुछ पाने के चक्कर में सब कुछ खोते रहते हैं। कुछ हासिल करना चिपचिपा है। उसमें फिसलन है। दुनिया चाहती है कि आप उसी में अटके रहें। मुझे लगता है कि मेरे अंदर के इन एहसासों की वजह से ही मुझे अलग ऑफर मिलते हैं। किसी ने कहा है कि आप जो चाहते हैं, वही होता है। हमारे फैसले ही हमारा भविष्य बनाते हैं। सारी चीजें आंतरिक रूप से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि चार साल या चालीस साल पहले लिए फैसले का नतीजा अभी सामने आए।
अजय : आपकी कौन सी फिल्म आने वाली है?
इरफान : प्रोडक्शन में अभी हमने मदारी फिल्म पूरी कर ली है। उसके निर्माता शैलेष सिंह हैं। उसके निर्माताओं में सुतपा, शैलेष और शैलेष की पत्नी हैं। तीसरी फिल्म भी तैयारी में है , जिसमें मीरा नायर का नेफ्यू काम कर रहा है। उसमें मैं नहीं हूं। हिंदी फिल्मों की जमीन अभी बहुत ऊपजाऊ हो गई है। आप किसी भी कहानी का पुष्ट बीज डालें तो अच्छी फसल मिलेगी। देखना यह है कि फिल्म नियंत्रित बजट में बने और मुनाफा कमाए। लंचबॉक्स ने अगर ज्यादा बिजनेस कर लिया है तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि मैं मोटी रकम मांगने लगूं। निर्माता फायदे में रहें।

दिल्‍ली काे पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिले : मनीष सिसोदिया

आम आदमी पार्टी के महत्‍वपूर्ण नेता मनीष सिसोदिया से डॉ. संजीत कुमार की बातचीत 

 
मनीष सिसोदिया के साथ विचार वीथी के कार्यकारी संपादक डॉ. संजीत कुमार
डॉ. संजीत: सबसे पहले बात कर लेते हैं कि दिल्ली में चुनाव आने वाले हैं। सभी पार्टियां चुनाव में जा रही हैं। आम आदमी का प्रदर्शन कैसा रहने की संभावना है?
मनीष सिसोदिया : पिछली बार न्यू पार्टी सिंड्रोम बहुत काम कर रहा था। मीडिया बार - बार प्रोजेक्ट कर रहा था कि नई पार्टी है। चार - पॉच सीटे मिल जाए तो बहुत है। इससे पार्टी का काफी नुकसान हुआ। मीडिया के लोग एक लाईन पकड़कर कहने लगे, नई पार्टी है, वोट ही काटेगी इससे नुकसान हुआ। वह इस बार नहीं होगा। 49 दिन की सरकार में हमने दिखाया कि किस तरह से मंहगाई कम हो सकती है, रिश्वतखोरी कम हो सकती है, बिजली सस्ती हो सकती है, प्राईवेट स्कूल भी कंट्रोल हो सकते हैं। ये सब बातें हमारे पक्ष में जाएगीं।
डॉ.संजीत : पिछली बार आप की सीधी लड़ाई कांग्रेस से थी और इस बार बीजेपी से है। क्या इस कारण आपकी रणनीति भी बदलेगी?
मनीष सिसोदिया: ऐसा नहीं हैं। हम कांग्रेस को ही टारगेट कर रहें थे , आपने देखा होगा, हम शीला दीक्षित को टारगेट कर रहे थे तो विजय गोयल को भी। कुल मिलाकर हमारा दुश्मन न तो कांग्रेस है न भाजपा। हमारा दुश्मन तो भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार के कारण हो रही समस्याएं है। भ्रष्टाचार कांग्रेस में भी था तो भाजपा की एम.सी.डी. और केन्द्र की सरकार में भी है । जे.पी. नड्डा जैसे लोगो को हेल्थ मिनिस्टर बनाया गया है। संजीव चुतर्वेदी जैसे ईमानदार अधिकारियों को हषवर्धन जैसे मंत्री हटा रहे है। शीला दीक्षित 5 हजार की इस्ट्रीट लाईट को 27 हजार में खरीद रही थी। भाजपा नगर निगम में 32 हजार में खरीद रही है। ये सारी चीजे हम जनता के सामने रखेगें।
डॉ. संजीत: इसका अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार आपका मुख्य ऐजेण्डा है?
मनीष सिसोदिया: भ्रष्टाचार और मंहगाई लोगों के जीवन को इन दोनों ने बहुत प्रभावित किया है।
डॉ. संजीत : मैनें कहीं आपका साक्षात्कार देखा था, जब आप शिक्षा मंत्री बने थे। आपने कहा था कि लोगों की जिन्दगी आसान करेगें। क्या फार्मुला है आपके पास लोगों की जिन्दगी आसान करने का? 
मनीष सिसोदिया: आम आदमी ज्यादा कुछ नहीं चाहता।  आज स्कूल के एडमिशन में रिश्वत देनी पड़ती है। अस्पताल में बेड के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। नौकरी, व्यापार यहां तक कि दुकान खोलने तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। ये चीजे ठीक हो जाए तो लोगों की जिन्दगी थोड़ी आसान हो सकती हंै। ऐसा नहीं है कि लोग मेहनती नहीं हैं। वे मेहनत करने को तैयार हैं। सरकार लोगों की स्थितियां बेहतर कर के दे तो लोगों के जीवन में सुधार आ जाएगा।
डॉ. संजीत: आपने 49 दिन की सरकार में बिजली के बिल 50 प्रतिशत तक कम किए थे। पानी माफ  किया था। तो क्या इस बार भी ये सब करेगें?
मनीष सिसोदिया: फिर से वही करेगें और इस बीच तो ऑडिट रिर्पोट भी आ जाएगी। शायद फिर ऑडिट के हिसाब से होगा। ऑडिट में बहुत सा भ्रष्टाचार सामने आ रहा है।
डॉ. संजीत: अगर बिजली कंपनियां दागी निकलती है तो सरकार क्या कारवाई करेगी?
मनीष सिसोदिया: इनके खिलाफ  कार्रवाई करेगी और बिजली अपने आप सस्ती हो जाएगी।
डॉ. संजीत: क्या इनके लाइसेंस कैंसल हो सकते हैं?
मनीष सिसोदिया: हाँ, इनके लाइसेंस कैंसल हो सकते है, और ऐसा नहीं है कि सभी प्राईवेट कंपनियां भ्रष्ट हैं। देश में ईमानदार कंपनियां भी हंै। वो तो नेता इनसे रिश्वत लेते हैं। अगर नेता इनसे रिश्वत लेना बंद कर दें तो ये कंपनियां भी ईमानदारी से काम करने को बाध्य हो सकती हैं।
डॉ. संजीत: आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार की मुख्य उपलाब्धियां क्या बताना चाहेंगे?
मनीष सिसोदिया: सबसे बड़ा काम था पूरी दिल्ली के सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी बंद हो गई थी। दिल्ली पुलिस और दिल्ली नगर निगम जैसे विभागों में भी रिश्वत बंद हो गई थी। लोग कहते थे कि भ्रष्टाचार लोगों की नसों में समा गया है इसे रोका नहीं जा सकता। हमारी पार्टी ने ये करके दिखाया। लोग कहते हंै कि मंहगाई एक बार बढ़ गई तो कम नहीं हो सकती। हमने कम करके दिखाया। हमने बिजली पानी के बिल कम करके दिखाए, प्राईवेट स्कूलों को कंट्रोल किया, सरकारी विद्यालयों का स्तर सुधारा, प्राईवेट स्केलों में डोनेशन प्रथा बंद करा दी। लोग मिलते हैं तो बताते हैं कि हमारे बच्चे का एडमिशन बिना डोनेशन और सिफारिश के हो गया। रोजगार के क्षेत्र में हमने एक और बड़ा काम किया कि 36,000 कान्ट्रेक्ट कर्मचारियों के स्थायी होने का रास्ता साफ  किया। इसमें अध्यापक शामिल नहीं है। अगर शिक्षकों को स्थायी किया जाए तो 50,000 शिक्षक और स्थायी हो सकते हैं।
डॉ. संजीत: दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले कई सालों से हजारों शिक्षक एडहोक्जिम का शिकार हैं। ये किसी भी संस्था के लिए शर्म की बात हैं। इस विषय पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? 
मनीष सिसोदिया: जो दिल्ली विश्वविद्यालय के अपने कॉलेज है उनमें सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। लेकिन जो कॉलेज हमारी फण्डिग से चलते हैं। वहां हम चाहेंगे कि सभी एडहोक शिक्षक परमानेंट हों क्योंकि जो आदमी चार साल से आपके पास काम कर रहा है। उसे आप अचानक से गेटलास्ट कैसे कह सकते हो। वह बेचारा कहां जाएगा।
डॉ. संजीत: दिल्ली का जो भूगोल है वह बड़ा अजीब है। एक तरफ  आप राजधानी में है। आपकी विधानसभा भी है। कुछ संस्थाएं आपके पास है। कुछ आपके पास नहीं हैं जो अपने आप में एक समस्या है इस पर आप क्या कहना चाहेगें?
मनीष सिसोदिया: दिल्ली एक तरह से मल्टीप्लिसिटी आफॅ गर्वनेंस की शिकार है। यहां खंभो की जातियां है, नालियों की जातियां है, ये पी.डब्लू की जाति का खंभा है। ये डी.डी.ए. की जाति की नाली है, ये नगर निगम की सड़क है अब आदमी तो नहीं पहचानता कि किस संस्था के पास जाए व्यक्ति एक पास जाता है तो वह कहता है कि दूसरे के पास जाए दूसरे के पास जाने पर दूसरा तीसरे के पास भेज देता है। ये सारी मल्टीप्लिसिटी खत्म होनी चाहिए। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। दिल्ली पुलिस और डी.डी.ए. भी दिल्ली सरकार के कंट्रोल में आना चाहिए। पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा तो ये मल्टीप्लिसिटी भी खत्म होगी।
डॉ. संजीत: पूर्ण राज्य के दर्जे की बात तो कांग्रेस और बीजेपी भी अपने मेनिफेस्टों में करते रहे है पर किया कभी नहीं। आम आदमी पार्टी भी इसे ठंडे बस्ते में तो नहीं डाल देगी?
मनीष सिसोदिया: दोनों सरकारों ने दिल्ली के अधिकारों को कमजोर किया। गृह मंत्रालय का आर्डर आता है कि दिल्ली विधानसभा केन्द्र से पूछे बिना कोई कानून नहीं बना सकती। पहले दिल्ली पुलिस का फाइनेंसियल पावर दिल्ली सरकार के पास रहती थी इन्होनें एक और आर्डर पास किया कि दिल्ली पुलिस की फाईनेंसियल पॉवर दिल्ली सरकार के पास नहीं रहेगी। ऐन्टी करप्शन ब्यूरो को कमजोर किया ये पार्टियां भाषणों में कुछ भी कहती रहे पर इनके कर्म दिल्ली को लूटने वाले है।
डॉ. संजीत: पूर्ण राज्य के दर्जे के बगैर दिल्ली में काम करना बड़ा कठिन कार्य है। ये तो सभी को समझ में आता है अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनती है तो क्या पार्टी पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग केन्द्र सरकार से करेगी।
मनीष सिसोदिया: हालांकि लोगों को इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि दिल्ली पूर्ण राज्य हो या न हो। वे चाहते हैं कि उनके काम हो। वे थाने जाए तो उनकी एफ .आई . आर. लिखी जाए। एम.एल.ए. से शिकायत करे तो उसकी सुनवाई हो। डी.डी.ए. से कोई काम हो तो उसकी सुनी जाए और पूर्ण राज्य का दर्जा मिलता है तो इस तरह की सभी समस्याओं पर काम करना आसान हो जाता है।
डॉ. संजीत: अर्थात आप यह कहना चाहते हैं कि पूर्ण राज्य का दर्जा एक आदर्श स्थिति होगी तो अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में आती है तो इस स्थिति को पाने के लिए पार्टी की क्या स्ट्रेटजी होगी?
मनीष सिसोदिया: अब तक तो हम बहुमत में नहीं थे लेकिन जैसे ही हम बहुमत में आएगें हम केन्द्र से पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करेगें और अगर वे नहीं करते तो इसके लिए हम आंदोलन खड़ा करेगें।
डॉ. संजीत: पहले आप एक्टिविस्ट थे, पत्रकार थे, अब जबसे पार्टी बनी है आपकी व्यस्तताएं बढ़ गई है। किस तरह के बदलाव आप महसूस करते है अपने जीवन में?
मनीष सिसोदिया: वैसे तो हर वक्त काम करता रहा हूं लेकिन अब निश्चित रूप से चीजे बदली तो है। पहले पढ़ने लिखने का टाईम मिलता था अब नहीं मिल पाता । पहले मैं अखबारों के लिए ब्लाग आदि भी लिख लिया करता था अब समय नहीं मिल पाता। अभी बस ट्विटर पर ही लिखता हूं वह भी राजनीतिक ही होता है।
डॉ. संजीत: अभी हाल ही दिल्ली चुनाव से ठीक पहले दिल्ली में दंगे हुए। आम आदमी पार्टी की क्या प्रतिक्रिया है?
मनीष सिसोदिया: दंगे समाज के कोढ़ है। दुनियाँ कहां से कहां निकल गई है। हम अभी भी हिंदू - मुस्लमान में लगे हुए है। चुनाव के लिए जो भी ये सब हरकते कर रहे हैं ये सब शर्मनाक है। हमें बहुत दुख: है कि त्रिलोकपुरी दंगो की आग में जली लेकिन अंत में इंसानियत की जीत होगी।
डॉ. संजीत: लोग कह रहे हैं कि आप की झाड़ू मोदी ने छीन ली। इस पर आप क्या कहना चाहते हैं?
मनीष सिसोदिया: अच्छी बात होगी, मोदी जी थोड़ा राजनीति में भी झाड़ू लगाएँ। मोदी जी नेताओं को समझाए कि वे सफाई करें लेकिन फोटो खिचांऊ सफाई न करे।
डॉ. संजीत: आरक्षण पर पार्टी के नजरिए को लेकर लोगों में एक संदेह की स्थिति है। इस पर आप क्या कहना चाहेगें?
मनीष सिसोदिया: आरक्षण समाज की जरूरत थी। इससे कुछ हद तक दलितों की स्थिति में भी सुधार हुआ। लेकिन जितना आरक्षण देते वक्त सोचा था उतना उत्थान दलितों का हो नहीं पाया। कई जगह द्वेष भी पैदा हुआ। गैर दलितो फर्जीवाड़ा की सहायता से आरक्षण का लाभ उठाया। बीजेपी के एक विधायक ने फर्जीवाड़े से आरक्षण का लाभ उठाया। आज भी आरक्षण समाज की जरूरत है। सदियों से जिन जातियों का उत्पीड़न किया इसके लिए धर्म, पंरपरा, साहित्य हम सभी दोषी हैं। इनके उत्थान के लिए आरक्षण ही काफी नहीं और साथ ही साथ जो परिवार रोजी रोटी को मोहताज हैं लेकिन स्वर्ण होने के नाम पर उपेक्षित हैं ऐसे जरूरतमंदों की भी मदद की आवश्यकता है। एक तरफ  आरक्षण का फायदा उठाकर एक दलित आई.ए.एस.बना फिर उसके बच्चे भी आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं। तीन चार पीढ़ियाँ इसका फायदा उठा रही हैं। वहीं एक गरीब दलित रिक्शा चलाता है और उसका बेटा भी रिक्शा चलाने के लिए अभिशप्त है। इस पर खुली रूप से बहस होनी चाहिए।
डॉ. संजीत: कांग्रेस और बीजेपी की इॅकनामिक पॉलिसी एक तरह की है। आम आदमी सरकार अगर बहुमत में आती है तो इस देश की इॅकनामिक पॉलिसी क्या रहने वाली है?
मनीष सिसोदिया: एक तो पहलू ये है कि टेक्स से जो पैसा आता है उसको आप कहां खर्च करेगें। सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सरकार को सारे व्यापारों से अपने को अलग कर लेना चाहिए। ये व्यापारी के कार्य हैं। किसी व्यापारी को भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़े ये जिम्मेदारी सरकार की है। ऐसी स्थितियां पैदा करनी पड़ेगी कि व्यापार में उन्नति हो, उत्पादन बढ़े लेकिन साथ - साथ यह भी करना पड़ेगा कि जब रेवेन्यू आएं तो कहां खर्च किया जाए। यह भी इॅकनामिक पॉलिसी का हिस्सा हो। एक बढ़ी चीज हमारे यहां पिट रही गई है और कानसेप्ट में ही नहीं आती और लगता है इस देश के चिन्तन में ही नहीं है, वह है - शिक्षा । क्या हमारे देश की इॅकनामिक पॉलिसी में शिक्षा पर बात नहीं होनी चाहिए? क्या इॅकनामिक पॉलिसी के सवाल शिक्षा नीति से जुड़े नहीं होने चाहिए? जब मैं एजुकेशन मिनिस्टर बना तो मैनें अधिकारियों को बुलाया और शिक्षा से जुड़े डेटा की मांग की। उनके पास रेडिमेड डेटा भी नहीं था। दिल्ली में हर साल लगभग 5 लाख बच्चे नर्सरी में एडमिशन लेते हैं और एनुअल आउटपुट 2.5 लाख है । 2.5 लाख बच्चे शिक्षा के रेडार से गायब हो जाते हैं। आप बजट में स्कूल को प्राथमिकता नहीं देते हो। आप घरों को मेट्रो को पुलों को प्रायोरिटी देते हो। मेट्रो बनाने में पुल बनाने में कम्पीटिशन है, स्कूल बनाने में कोई कम्पीटिशन नहीं है। ये कोई नहीं कहता कि हमने स्कूल की बिल्डिंग जल्दी बना दी। मेट्रो फेस दो - दो महीनें में तैयार हो जाता है स्कूल जहां पीढ़ियों का निर्माण होता है, उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस देश की इॅकनामिक पॉलिसी में एजुकेशन को सबसे ज्यादा तरजीह दी जानी चाहिए क्योंकि ये ही नेक्स्ट जेनरेशन के ब्रिज है। दिल्ली में मात्र 90,000 बच्चो के लिए उच्च शिक्षा की व्यवस्था है। बाकी1,60,000 बच्चे कहां जाएगें इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। ये व्यवस्था जब तक नहीं होगी तब तक समाज में चेन स्नेचर, गुंडे मवाली पैदा होंगे।
डॉ. संजीत: लाखों बच्चे 12 वीं पास करके आते हैं। एक या दो परसेंट से वो सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने से रह जाते हैं। जहां सरकारी कॉलेज कम पैसे में अच्छी शिक्षा दे देते हैं वहीं प्राईवेट कॉलेज मंहगी फीस वसूलते हैं इस पर क्या करेगें ?
मनीष सिसोदिया: मैं यही बात कह रहा था जैसे मैनें कहा कि व्यापार का काम सरकार का नहीं है लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी पिलाने का काम सरकार का है। शिक्षा शुद्ध रूप सरकार का काम होना चाहिए ताकि अगली पीढ़ी को पढ़ा लिखा कर तैयार करे। लेकिन दुर्भाग्य से शिक्षा को बाजार के हवाले छोड़ दिया है। इसे बाजार के हवाले नहीं छोड़ना चाहिए।
डॉ. संजीत: भारत में स्कूलों की जिस तरह से संरचना है वे अपने आप में एक वर्ग भेद की तरफ  इशारा करते हैं। हालांकि ये एक यूटोपिया हो सकता है। पर क्या ऐसा कभी भारत में संभव हो पाएगा कि सभी स्कूलों के स्टेण्डर्ड एक जैसा हो?
मनीष सिसोदिया: इसकी जरूरत है लेकिन इसके लिए ईमानदार राजनीति, एक कमिटिड राजनीति की जरूरत है। ये सब भाषण से नहीं होगा। मैं जब शिक्षा मंत्री बना तो मैंने शिक्षा के कानून को बदलने की पहल की। मैंने देखा कि दिल्ली में एक बोर्ड है जो 1973 के कानून के अन्दर आता है। उसमें 15 लोग होते हैं जिनमें एक मिनिस्टर और दो डायरेक्टर और बाकि 12 प्राईवेट स्कूल के मालिक हैं। उसमें कोई एजुकेशनिस्ट, रिफारमर, थिंकर,पत्रकार, साहित्यकार नहीं है। इस तरह के लोग इसमें जुड़ेगें तब ही शिक्षा का भला होगा। 12 प्राईवेट स्कूलों के मालिकों को बोर्ड में शामिल कर आप सोचते हैं कि शिक्षा मंत्री शिक्षा पॉलिसी बनाएगा। वो तो प्राफिट मेकिंग करेगें। मैं तो ऐसे समय की कल्पना कर रहां हूं कि हमारे देश का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर को बुलाकर पूछे कि इतना क्राईम बढ़ रहा है आप क्या कर रहे हो और साथ ही साथ एजुकेशन डायरेक्टर से पूछे कि हमारी अगली जेनरेशन में क्रिमनल पैदा न हो इसके लिए तुम लोग क्या करोगे। ये हमारा सपना है। अब आप इसे इॅकनामिक पॉलिसी में ले जाओ, एजुकेशन पॉलिसी में लो, नेशनल पॉलिसी में ले जाओ, कहीं ले जाओ, जब तक हम इस तरफ  नहीं बढ़ेगे तब तक कुछ नहीं होने वाला और हम ऐसी स्थिति लाना चाहते हैं। यहीं हमारा सपना है। 

रविवार, 15 सितंबर 2013

छत्तीसगढ़ का आईना हैं 'चंदैनी गोंदा '

खुमान साव
संगीतकार खुमानलाल साव के 05 सितंबर 2013 , 
को 85 वें जन्मदिन पर से विशेष बातचीत
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के क्षेत्र में श्री खुमानलाल साव एक जाना-पहचाना नाम है। लगभग सात दशक से संगीत साधना में रत श्री साव वर्तमान में छत्तीसगढ़ की भव्य एवं युगान्तरकारी प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा '  के निर्देशक हैं। पांच सौ से ज्यादा गीतों को संगीतबद्ध करने वाले श्री साव के संगीत का जादू आज भी सिर चढ़कर बोलता है। अपने समय की किवदंती बन चुके छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के 'जिंदा इतिहास ' श्री साव से गत दिनों उनके गृह ग्राम ठेकवा (राजनांदगांव)में वरिष्ट साहित्यकार वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने   लंबी बातचीत की। उनके साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश-


-  वीरेन्द्र बहादुर सिंह  -
संगीत की ओर आपका रूझान कैसे हुआ?
संगीत वस्तुत: मुझे  विरासत के रूप में मिला। मेरे चाचा श्री राम रतन साव एवं फूफा श्री तीजूराम अच्छे लोकनर्तक थे। नाचा के पुरोधा स्व. दाऊ दुलार सिंह मंदराजी मेरे मौसेरे भाई थे। जो रवेली नाच पार्टी के नाम से कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। उनकी प्रस्तुतियों को देखकर मेरा रूझान लोककला एवं संगीत की ओर हुआ।
संगीत की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
प्रकृति स्वयं संगीत की जननी है। चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की सुरीली तान और खेतों में काम करने वाले श्रमिकों के सुरीले स्वर ने ही मुझे संगीत की ओर प्रेरित किया। घर में रखे हारमोनियम पर बचपन से ही ऊंगलियां फिराने का परिणाम है कि मैं आज संगीतकार के रूप में आपके सामने मौजूद हूं।
आपकी संगीत यात्रा की शुरूआत कैसे हुई।
संगीत के प्रति बचपन से ही मेरा रूझान था। घर में पिताजी की हारमोनियम में बचपन से ही ऊंगलिया चलाने की आदत पड़ी। हारमोनियम के मधुर स्वर से मैं सम्मोहित हो गया और बचपन से हारमोनियम पर ऊंगलियॉं फिराने की आदत आज 84 वर्ष की उम्र में भी जारी है।
क्या आपने नाचा पार्टियों में भी संगीत दिया है?
प्रारंभ में मैं नाचा पार्टियों से ही जुड़ा। मैंने 1944 में पहली बार बसंतपुर तथा माटेकसा के बुजुर्ग नाचा कलाकारों के साथ गले में हारमोनियम बांधकर रात भर उसे बजाया। तब खड़े साज का प्रचलन था और नाचा के कलाकार खड़े होकर कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे और साजिन्दे अपने वाद्य यंत्रों को अपने कमर में बांधकर बजाते थे। इसके अलावा मैंने 1949 में जीवनलाल चंद्राकर एवं बंशीलाल देवदास के निर्देशन में कुरूद नाचा मंडली, धरमलाल कश्यप के निर्देशन में जांजगीर नाचा मंडली, 1944 से 50 के बीच भरोसा एवं सीताराम के निर्देशन में बसंतपुर नाचा मंडली, 1948, 52 एवं 53 में लाला फूलचंद श्रीवास्तव के निर्देशन में रायगढ़ नाचा मंडली तथा 1944 से 1955 तक स्व. दाऊ दुलारसिंह मंदराजी के निर्देशन में रवेली नाचा पार्टी में हारमोनियम वादक के रूप में काम किया। इसके अलावा 40 एवं 50 के दशक में मंैने रायपुर एवं बिलासपुर संभाग के अनेक छोटी - बड़ी नाचा मंडलियों में छिटपुट काम किया।
नाचा में काफी समय तक जुड़े रहने पर उसमें सुधार के लिए आपने क्या प्रयास किया?
मैं जिस समय नाचा से जुड़ा वह खड़े साज का युग था। धीरे-धीरे बैठकर बजाने की परम्परा शुरू हुई। उस समय नाचा प्राय: अनगढ़ हुआ करते थे। मंैने नाचा के कथानक, भाषा एवं शिल्प में सुधार की जरूरत महसूस की।  इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मंैने 1950 और 1951 में अपने गृहग्राम खुर्सीटिकुल में आठ-आठ दिनों की नाचा पार्टियों का शिविर लगाया, जिसमें पांच छह नाचा मंडलियों ने भाग लिया। इस शिविर में छह दिनों तक नाचा कलाकार नाचा की विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करते थे। नाचा मंडलियों में इस शिविर का बेहतर नतीजा सामने आया। शिविर के माध्यम से नाचा में मैंने गाये जाने वाले गीतों को अपने संगीत से व्यवस्थित किया। साथ ही नाचा के कथानकों को भाषागत रूप से सुधारा। इसके अलावा नाचा के शिल्प में सुधार के लिए मैंने दस-बारह वर्षों तक लोक सहज अनुशासन विकसित करने का अभियान चलाया और नाचा की विकृतियों को दूर करने का प्रयास किया।
नाचा से आप आर्केस्ट्रा की ओर कैसे मुड़े?
सन् 1948 के आसपास मैं अपने जन्म स्थान खुर्सीटिकुल को छोड़कर राजनांदगांव आ गया था। शहरी परिवेश में फिल्मी गीतों के प्रति लोगों की रूझान को देखते हुए सन् 1949-50 में मैंने राजनांदगांव  की प्रथम आर्केस्ट्रा खुमान एंड पार्टी का गठन किया। 1952 में शारदा संगीत समिति एवं 1957 में सरस्वती कला संगीत समिति तथा कालान्तर में राजभारती आर्केस्ट्रा का गठन आगे की कड़ी थी।
क्या प्रारंभ में आपकी इच्छा फिल्म संगीतकार बनने की थी?
हां, इस दिशा में मैंने सिर्फ एक बार प्रयास किया था। 1957-58 में फिल्म फेयर की ओर से मुंबई में फिल्म फेयर टैलेंट कांटेस्ट के साक्षात्कार हेतु मैं गया था। इसके निर्णायक मशहूर फिल्मकार स्व. गुरूदत्त, स्व. विमल राय और स्व. के. अब्बास थे लेकिन वहां अभिनय की प्रतियोगिता होने के कारण मैं मुंबई से वापस लौट आया और फिर दोबारा प्रयास नहीं किया।
आर्केस्ट्रा चलाने के कारण जब आपकी रूचि फिल्म संगीत की ओर थी तब अचानक आपका रूझान लोक संगीत की ओर कैसे हुआ?
एक बार मैं अपने खेतों की ओर जा रहा था। वहां खेत में काम कर रही एक श्रमिक महिला को मंैने एक फिल्मी गीत को तन्मयता के साथ गुनगुनाते हृुए सुना। इस घटना से मेरा मन विचलित हो गया। मैने सोचा कि जहां ददरिया के स्वर गूंजने चाहिए वहां फिल्मी गीतों के प्रवेश से हमारी संस्कृति लुप्त हो जाएगी। तभी से मैंने लोक संगीत के क्षेत्र में काम करने का मन बनाया और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को संगीतबद्ध करने की दिशा में जुट गया।
अभी तक आपने कितने गीतों को स्वरबद्ध किया है?
अब तक मंैने पांच सौ से ज्यादा छत्तीसगढ़ी गीतों को संगीतबद्ध किया गया है। इसके अलावा पंजाबी, मराठी और रविन्द्र संगीत के तहत बंगला गीतों को भी संगीतबद्ध किया गया है।
आपने संगीत रचना कब से शुरू की?
लगभग आठ वर्ष की उम्र से मैं संगीत साधना में जुटा हुआ हूं। 14 वर्ष की उम्र में मंैने पहली बार एक गीत को संगीतबद्ध किया।
क्या आपने आकाशवाणी के लिए छत्तीसगढ़ी गीत तैयार किया है?
जी हां, सन् 1969 में मैंने पहली बार आकाशवाणी रायपुर के लिए छह छत्तीसगढ़ी गीतों की रिकार्डिंग करायी थी जो काफी लोकप्रिय हुए। इसके पूर्व आकाशवाणी रायपुर के चौपाल कार्यक्रम में सिर्फ बांसगीत बजता था। बाद में बरसाती भइया के दो गीत आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित होते थे। कालान्तर में आकाशवाणी रायपुर से सुर श्रृंगार कार्यक्रम प्रारंभ होने पर मैंने 1972 में 27 छत्तीसगढ़ी गीतों की रिकार्डिंग करायी जो आकाशवाणी से प्रसारित हुए और उसे श्रोताओं ने काफी पसंद किया। बाद में आकाशवाणी में गीतों की रिकार्डिंग कराने का सिलसिला प्रारंभ हो गया।
आपने रायपुर दूरदर्शन में कितने बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया?
रायपुर दूरदर्शन के शिलान्यास एवं उद्घाटन के अवसर पर मैंने क्रमश: आधे-आधे घंटे का दो बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसके बावजूद दूरदर्शन केन्द्र रायपुर ने कभी भी मुझे कार्यक्रम प्रस्तुत करने का आमंत्रण नहीं दिया। विधिवत आमंत्रण नहीं मिलने के कारण मैंने भी अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया।
क्या आपको दिल्ली दूरदर्शन पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर मिला?
मेरे निर्देशन में अब तक सन् 1977, 1982, 1984 एवं 1999 में चार बार दिल्ली दूरदर्शन में छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया गया है।
क्या आपने शास्त्रीय संगीत भी सीखी है?
प्रारंभ में मैंने संबलपुर (उड़ीसा) के संगीत शिक्षक रामसुमरन से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने मुझे सुर और ताल से अवगत कराया। बाद में मैने छुईखदान वाले सियारामदास वैष्णव से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। राजनांदगंाव के ठाकुर हीरासिंह गौतम और रामरतन सारथी के सानिध्य का लाभ भी मुझे मिला।
चंदैनी गोंदा से आप कैसे जुड़े?
सन् 70 के शुरूआती दशक में ग्राम बघेरा निवासी दाऊ रामचंद देशमुख एक कालजयी सांस्कृतिक कार्यक्रम 'चंदैनी गोंदा ' की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए समूचे छत्तीसगढ़ में कलाकारों की खोज कर रहे थे। उन्हें एक ऐसे संगीतकार की तलाश थी जो  उनकी परिकल्पना को साकार कर सके। उस समय मैं राजभारती आर्केस्ट्रा का संचालन कर रहा था, दाऊजी आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित भैयालाल हेड़ाऊ के स्वर में प्रसारित गीत से काफी प्रभावित थे। चंदैनी गोंदा का बैनर बनवाने के लिए वे राजनांदगांव  में प्रसिद्ध चित्रकार ठाकुर हीरासिंग गौतम के पास आये थे। चर्चा के दौरान उन्होंने ठाकुर साहब को अपने मन की बात बतायी। ठाकुर साहब ने दाऊजी को मेरा नाम सुझाया। इसी के चलते उन्होंने मुझसे भी संपर्क किया तथा चंदैनी गोंदा में संगीतकार के रूप में शामिल होने का प्रस्ताव रखा। चूंकि उनकी परिकल्पना में छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति एवं लोकसंस्कारों को एक साथ कथानक में जोड़ा गया था इसलिए मैंने श्री देशमुख के प्रस्ताव पर हामी भर दी और संगीतकार के रूप में 'चंदैनी गोंदा' में शामिल हो गया।
चंदैनी गोंदा का संदेश क्या है?
चंदैनी गोंदा में एक ऐसे कथानक को प्रस्तुत किया गया है जो देश की एकता और अखंडता को केन्द्र में रखकर छत्तीसगढ़ के दुख दर्द को उकेर सके। छत्तीसगढ़ अंचल के सुख-दुख को अपने में समोकर उसे  मार्मिकता से अभिव्यक्त करने का युगान्तरकारी परिणाम है 'चंदैनी गोंदा'। चैंदैनी गोंदा न तो नाटक है न गम्मत और न ही नाच बल्कि यह समग्र छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का मंच पर प्रस्फूटन है।
चंदैनी गोंदा की शुरूआती दौर में कैसा प्रसाद मिला?
किसानी जीवन की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करने वाला चंदैनी गोंदा रातभर चलने वाला एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है। इसके माध्यम से लोकमंच, जनभाषा एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति को परिष्कृत एवं परिमार्जित किया गया है। चंदैनी गोंदा की प्रारंभिक प्रस्तुतियों में ही इसे हजारों लोगों ने देखा और सराहा। चंदैनी गोदा के जन्म ने लोकरंग कर्म आंदोलन को एक नया रूप दिया। दिल्ली के अशोका होटल एवं यूरेस्को भोपाल में आयोजित अखिल  भारतीय लोककला महोतव में चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति ने देश विदेश के कला पारखियों से प्रशंसा प्राप्त की एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का परचम लहराया।
चंदैनी गोंदा में प्रारंभ में कुल कितने कलाकार थे?
07 नवम्बर 1971 को बघेरा (दुर्ग) में जब चंदैनी गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ उस समय 63 कलाकारों ने सहभागिता निभायी थी। चंदैनी की सफलता वस्तुत: उन 63 कलाकारों के सम्मलित प्रयास पर परिणाम है। चंदैनी गोंदा का प्रथम व्यवसायिक प्रदर्शन 1972 के आखिर में गुंडरदेही के समीप ग्राम पैरी में हुआ था जिसमें हजारों की संख्या में दर्शक जुटे थे। इसके पूर्व 1972 में ही राजनांदगांव  के म्युनिस्पिल स्कूल मैदान में आयोजित तीन दिवसीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समापन अवसर पर चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन किया गया था जिसे देखने बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। इस प्रदर्शन  को साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने काफी सराहा।
चंदैनी गोंदा में वर्तमान में कितने कलाकार है तथा दर्शकों का सहयोग कैसा मिलता है।
चंदैनी गोंदा में वर्तमान में 40 से 50 कलाकारों की टीम है। चंदैनी गोंदा एक ऐसी अनूठी प्रस्तुति है जिसने पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ अंचल  के सांस्कृतिक परिवेश को अपने प्रभात में समेट लिया है। चंदैनी गोंदा ने छत्तीसगढ़ के जनमानस को अपने इन्द्रजाल में बांध रखा है यही कारण है कि चंदैनी गोंदा की प्रासंगिकता आज भी निर्विवाद है तथा उसके प्रदर्शन पर हजारों की भीड़ अब भी उमड़ती है।
चंदैनी गोंदा की अब तक कितनी प्रस्तुतियां हो चुकी है?
07  नवम्बर 1971 को चंदैनी गोंदा रूपी जिस पौधे का रोपण किया गया था वह आज विशाल वृक्ष के रूप में आपके सामने है। दाऊ रामचन्द्र देशमुख के निर्देशन में 1981 तक चंदैनी गोंदा की कुल 99 प्रस्तुतियां हुई थी। उसके बाद 1982 से मैं स्वतंत्र रूप से चंदैनी गोंदा का संचालन कर रहा हूं। अब तक चंदैनी गोंदा की हजारों प्रस्तुतियां हो चुकी है।
कुछ वर्ष पूर्व चंदैनी गोंदा के विसर्जन  की भी खबर उड़ी थी, इस पर आपका क्या कहना है।
यह खबर कुछ विघ्न संतोषियों द्वारा उड़ायी गयी थी। 'चंदैनी गोंदा' कोई देव प्रतिमा नहीं है जिसका पूजन के बाद विसर्जन कर दिया जाए। जब तक छत्तीसगढ़ के लोगों का स्नेह मिलता रहेगा, चंदैनी गोंदा की अविराम यात्रा जारी रहेगी।
चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन को बेहद खर्चीला कहा जाता है? एक गरीब प्रदेश के लिए यह कहां तक उचित है?
छत्तीसगढ़ में आज जितनी भी प्रमुख चर्चित सांस्कृतिक मंडलिया हैं उनके प्रदर्शन का खर्च लगभग एक समान है। अत: चंदैनी गोंदा पर यह आरोप सरासर गलत है। वैसे भी अगर देखा जाए तो कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों की तुलना में चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन काफी सस्ता है। क्योंकि ऐसे सुनता हूं कि कवि सम्मेलनों में अखिल भारतीय स्तर का एक ही कवि 40 से 50 हजार रूपये ले लेता है और उसकी एवज में दस कविताएं भी नहीं सुना पाता। जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में 40 से 50 लोगों की टीम रहती है जो रात भर दर्शकों का मनोरंजन करती है। इस दृष्टि से चंदैनी गोंदा का आयोजन सस्ता है।
चंदैनी गोंदा का संगीत इसकी जान है। इसका श्रेय किसे जाता हैं?
चंदैनी गोंदा में पारम्परिक गीतों के अलावा अनेक साहित्यकारों के गीतों का समावेश किया गया है। मैंने अपनी परिकल्पना से उन गीतों को संगीतबद्ध किया है। मेरी संगीत परिकल्पना में साजिन्दों ने भी अहम भूमिका निभायी है। गीतों के शब्द और मधुर संगीत का संयोजन अगर लोगों को पसंद आता है तो मैं सभी कलाकारों की टीम भावना और अपने प्रयास को सफल मानता हूँ तथा सुधी श्रोताओं के प्रति आभार ही व्यक्त कर सकता हूँ।
चंदैनी गोंदा के गीतों को कंपोज करने  में आपको कितना समय लगा?
मैंने चंदैनी गोंदा के सभी गीतों को कंपोज करने में लगभग दो माह का समय लिया। सभी गीतों की कम्पोजिंग मैंने दाऊ रामचंद देशमुख के बघेरा स्थित निवास में रहकर किया। इस दौरान सुप्रसिद्ध  गायक केदार यादव ने मुझे काफी सहयोग दिया। कलाकारों के दो माह की दिन रात की मेहनत और अथक प्रयास के बाद ही चंदैनी गोंदा मंच पर प्रस्तुत हुआ।
आपने अब तक कितनी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संगीत दिया है?
मैंने अब तक कुल सात छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संगीत दिया है जिसमें मंैना, पिंजरा के मैना, मया के बंधना, पुन्नी के चंदा, जय बम्लेश्वरी मईया और डांड़ शामिल है।
आपके संगीत संयोजन में अब तक कितने आडियों कैसेट निकले हैं?
मेरे संगीत निर्देशन में अब तक सैकड़ों आडियों कैसेट एवं ग्रामोफोन रिकार्ड जारी हो चुके हैं।
चंदैनी गोंदा के किस गीत को संगीतबद्ध करते हुए आपको सर्वाधिक संतुष्टि मिली?
रविशंकर शुक्ल द्वारा लिखित चंदैनी गोंदा का शीर्षक गीत 'चंदैनी गोंदा फूलगे' का संगीत मैंने एक रात में तैयार किया। इससे मुझे सर्वाधिक संतुष्टि मिली।
किसी कलाकार के सम्मान में आपने कोई आयोजन का दायित्व उठाया है?
सन् 1988 में मैंने लखोली (राजनांदगांव) में तीन दिवसीय लोकोत्सव का आयोजन किया था। इसके अलावा विगत बीस वर्षों से मैं दाऊ मंदराजी के जन्मस्थान रवेली (राजनांदगांव) में ग्रामवासियों के सहयोग से उनकी जयंती पर एक अप्रैल को सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन कर रहा हूँ। 1992 में मैंने रवेली में दाऊ मंदराजी की प्रतिमा स्थापित करने में योगदान दिया।
क्या आपको कोई पुरस्कार सम्मान मिला है?
मेरी पचास वर्षों की संगीत साधना के दौरान अनेक संस्थाओं ने मेरी साधना का सम्मान नागरिक अभिनंदन के साथ किया है। शासन स्तर पर पुरस्कार सम्मान के लिए मैंने अब तक अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया और न ही भविष्य में करूंगा।
कोई और बात जो आप कहना चाहते हों?
मेरी इच्छा है कि छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की सुरभि समूचे देश में बिखरती रहे तथा कलाकार अपने प्रदर्शन के द्वारा छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रचार प्रसार करते रहें।
पता : बल्देव बाग (बाल भारती स्कूल के पीछे)
राजनांदगांव  (छत्तीसगढ़)
मो. 9407760700