इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

उपन्यास “लेकिन इतना ही सच नहीं”

 


उपन्यास “लेकिन इतना ही सच नहीं” (खंड–एक : अंकुरण) लेखक : नंदन | प्रकाशक : रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज। प्रथम संस्करण:2022

अंकुरण : स्मृति, श्रम और मनुष्यता का आलोक
(समीक्षा भाग: 01)
नंदन का यह उपन्यास “लेकिन इतना ही सच नहीं” चार खंडों में विस्तीर्ण है जिसका पहला खंड लगभग सवा दो सौ पृष्ठों में समाहित है। “अंकुरण” नाम से पहली पुस्तक “लेकिन इतना ही सच नहीं” स्मृति, समाज और संवेदना के ऐसे त्रिकोण पर खड़ा है, जहाँ एक व्यक्ति की कथा सामूहिक जीवन की गाथा में बदल जाती है। यह रचना आत्मकथात्मक स्वर रखती है, पर आत्मकेंद्रितता से बहुत आगे जाती है। शीर्षक “अंकुरण” भीतर से उठती उस हरियाली का संकेत देता है जो अनुभवों की मिट्टी में अपनी जड़ें फैलाती है।
कथाकार अपने गाँव नगपुरा को भूगोल से अधिक एक जीवित अनुभूति के रूप में रखता है। वहाँ मिट्टी, खेत, जंगल और वर्षा—सभी जीवन की गति में शामिल हैं। गाँव केवल स्थान रह जाने की सीमा से आगे बढ़कर स्मृति और पहचान का रूप ले लेता है। घर का छोटा-सा परिसर, रसोई की टिन-पेटी, धुएँ से काली पड़ी काँच की बोतल, ‘थौना’ और ‘घनौंची’ जैसे उपकरण—ये सब इतनी जीवंतता से उभरते हैं कि पाठक के मन में उनके दृश्य अपने आप बनते चले जाते हैं। शब्दों से गंध, रंग और स्पर्श निकलने लगते हैं।
लेखक की भाषा लोक की ऊष्मा और विचार की नमी से बनी है। उनके वाक्य, प्रदर्शन की मुद्रा से दूर रहते हुए आत्मीयता और संयम से चलते हैं। खड़ी बोली की गरिमा और लोकभाषा की सहजता एक-दूसरे को सहारा देती है। हर पंक्ति में मिट्टी की महक और श्रम की लय सुनाई देती है। यही कारण है कि पाठक कथा को केवल देखता नहीं, जीता है।
उपन्यास के केंद्र में माँ का चरित्र है। वह सीमित गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी पूरे समाज की संस्कृति का आधार बनती है। उसका मौन पीड़ा से आगे बढ़कर दृढ़ता का प्रतीक बन जाता है। जब वह अपने बेटे को मामा के घर पढ़ने भेजती है, उस पल में पूरे समाज की करुणा और आशा एक साथ प्रतिबिंबित होती है। यह दृश्य एक साधारण घर के भीतर से उठकर अपने एक समय का साक्षात्कार कराती है।
नंदन का समाज श्रम, आस्था और संघर्ष की जटिल बुनावट से बना है। उसमें विषमता भी है और आत्मगौरव की रोशनी भी। मनुष्य वहाँ संघर्ष से भागता नहीं; वह श्रम के भीतर अपना सम्मान गढ़ता है। यही संतुलन रचना को सच्चाई और गहराई देता है। लेखक किसी विचारधारा का झंडा उठाने की कोशिश से दूर रहता है; वह जीवन के पूरे रूप को अनुभव की दृष्टि से सामने रखता है। उसकी संवेदना किसी सीमित मत तक सिमटती नहीं, वह हर उस आवाज़ को स्थान देती है जो मनुष्य के श्रम और स्वाभिमान से जुड़ी हुई होती है।
कथानक स्मृति की परतों से बनता है। घटनाएँ किसी तय क्रम में बँधने के बजाय अनुभव के प्रवाह में खुलती हैं। अतीत और वर्तमान की यह आवाजाही ठहराव के बजाय गति का बोध कराती है। स्मृति यहाँ केवल स्मरण की क्रिया नहीं, जीवन के पुनर्जन्म का माध्यम बनती है। यही “अंकुरण” का सार है—अनुभव के भीतर से जन्म लेती चेतना।
यह उपन्यास प्रतीकों की सूक्ष्म रचना के सहारे अपने अर्थ-लोक को विस्तार देता है। जंगल आत्मा का घर बनकर उपस्थित होता है, मिट्टी स्मृति की देह का रूप ग्रहण करती है, वर्षा पुनर्जन्म का संकेत देती है, खेत श्रम की पहचान बनाते हैं और पाठशाला वह दहलीज़ बनती है जहाँ परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। इन प्रतीकों का सौंदर्य इस बात में निहित है कि वे जीवन-स्थितियों से स्वाभाविक रूप में उपजते हैं; शब्द किसी उपदेश की मुद्रा नहीं धरते, अनुभव के भीतर से अर्थ की लहर उठती है और पाठक के मन तक पहुँच जाती है।
स्त्री-उपस्थिति इस कथा की आंतरिक धारा है। माँ, बहन, बुआ और पड़ोस की औरतें घर-आँगन के कार्यों में लीन रहते हुए भी संस्कृति का भार सहजता से उठाती चलती हैं। उनके हाथों की गरमी, बुद्धि की दृढ़ता और रोज़मर्रा के आयोजन—ये सब मिलकर सामुदायिक जीवन की रीढ़ बनते हैं। लेखक स्त्री को उस स्वाभाविक ऊँचाई पर प्रतिष्ठित करता है जहाँ से घर, खेत और उत्सव एक ही लय में बँधते हैं। चूल्हे की आँच, बीज-संभार, ऋतु के अनुरूप भोजन, पर्वों की तैयारी—हर प्रसंग स्त्री-बुद्धि के विवेक और संवेदना का प्रमाण बनकर उभरता है।
कथात्मक तकनीक में स्मृति और वर्तमान की अदला-बदली बड़ी सधी हुई दिखाई देती है। एक दृश्य बचपन की ओर खिसकता है, दूसरा उसी समय परिपक्व चेतना से अर्थ ग्रहण कर लेता है। समय का प्रवाह रैखिक क्रम से आगे बढ़ने के स्थान पर वृत्त बनाता है; फसल के चक्र, पर्वों की आवृत्ति और गृहस्थी की दिनचर्या उस वृत्त को गति और गहराई देती है। इसी वृत्त में बार-बार घर, खेत और जंगल के बीच आवाजाही होती है और हर चक्कर में कोई न कोई परत नई रोशनी पकड़ लेती है—कहीं सामाजिक विषमता का चेहरा उभरता है, कहीं आत्मसम्मान की दीप्ति, कहीं शिक्षा के प्रति ललक, कहीं संबंधों की ऊष्मा।
भाषा इस उपन्यास की सबसे सशक्त साधना है। वाक्यों में लोकगीत जैसा अनुभव आकार लेता है; खड़ी बोली की शुचिता और लोक-बोलियों की सहजता मिलकर ऐसा ताल रचती हैं जिसमें अर्थ और रस साथ-साथ चलते हैं। रूपक संयम से आते हैं, पर आते ही स्मृति कक्ष रोशन कर जाते हैं। बहुल अलंकरण से दूरी बनी रहती है; शब्द फिज़ूल चमक-दमक छोड़कर अनुभव की ठोस देह ग्रहण करते हैं। पढ़ते समय पाठक को किसी तिक्त जटिलता का बोझ नहीं मिलता; विचार सहजता से उतरता है और हृदय के ताप से अर्थ व्यापक बनता जाता है।
आदिवासी जीवन की अनुभूति इस रचना का केंद्र है। जंगल और खेत के साथ मनुष्य का संबंध किसी बाहरी दर्शक का कौतूहल नहीं, स्वयं के भीतर का साक्षात्कार है। “जंगल पिता, खेत माँ”—ऐसा वाक्य उद्घोष से आगे चलकर , जीवन-पद्धति का निचोड़ बनकर आता है। इसी दृष्टि से अस्मिता, शिक्षा और विस्थापन जैसे प्रश्न एक ही पट पर उभरते हैं। पाठशाला उजाला खोलती है, साथ ही दूरी का बोध भी जगा देती है; परिवार सांत्वना देता है, पर भविष्य की राहें गाँव के बाहर तक फैल जाती हैं। कृति इन द्वंद्वों को टकराव की भाषा में प्रस्तुत करने के बजाय सहभागिता और विवेक की दृष्टि से देखती है—यही संतुलन उसे अकादमिक दुरूहता से अलग कर जीवित साहित्य की श्रेणी में खड़ा करता है।
समाप्ति की दिशा में उपन्यास व्यक्ति-केन्द्रित संस्मरण से उठकर समुदाय की आत्मकथा का रूप ले लेता है। करुणा उपस्थित रहती है, पर उसका स्वर दीनता तक सीमित होने के बजाय गरिमा रचता है। श्रम आत्मबोध की दीप्ति में बदल जाता है और वही प्रकाश पाठक के मन तक पहुँचता है। स्मृति यहाँ शोक की छाया से दूर आत्मबोध की उजली राह बन जाती है। यही बिंदु कृति को दीर्घजीवी बनाता है—क्योंकि यहाँ अनुभव सौंदर्य में रूपांतरित होता है और सौंदर्य मनुष्यता की रक्षा का तर्क बन जाता है।(क्रमशः..)

बुधवार, 20 अगस्त 2025

कल्याण पथ प्रदर्शक : तीर्थंकर महावीर" एक अनुपम कृति

 
                   सुभाष सेठिया
 

कृति- कल्याण पथ प्रदर्शक : तीर्थंकर महावीर
लेखक- अभिनन्दन गोइल
समीक्षक- सुभाष सेठिया


     शतरंग प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित वरिष्ठ साहित्यिकार श्री अभिनंदन गोइल जी की पुस्तक "कल्याण पथ प्रदर्शक : तीर्थंकर महावीर" एक अनुपम कृति है।
     वर्तमान समय में भाव विशुद्धि जैसे पुरुषार्थ सिद्ध कार्य पर लेखक ने गहनता से प्रकाश डाला है। भगवान महावीर के जन्म से निर्वाण तक के जीवन को आचार्य के संदर्भों और वैज्ञानिक विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करना, निःसंदेह कृतिकार की विद्वत्ता और गहन शोध को दर्शाता है।
   इस पुस्तक में श्री रामधारी सिंह दिनकर, आचार्य श्री विद्यानंद जी, श्री धर्मानंद कौशम्बी जी, डॉ. एस. एम.पहाड़िया जी, मुनि श्री प्रमाण सागर जी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ जैसे श्रेष्ठ जनों के संदर्भों का समावेश, इसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को और भी बढ़ा देता है
   जिनागम के सिद्धांतों, धर्म के दस लक्षणों, छह द्रव्यों के वैज्ञानिक विश्लेषण, सात तत्वों के विवेचन, आठ कर्मों के क्षय, रत्नत्रय (निश्चय और व्यवहार सहित) और मोक्ष मार्ग का विस्तृत वर्णन अत्यंत सराहनीय है। पुस्तक में विशेष रूप से, अनेकांत के सिद्धांत को जिस प्रकार जैन धर्म से जोड़कर प्रस्तुत किया है, वह वास्तव में अद्वितीय है। कर्म निर्जरा के लिए ध्यान की श्रेष्ठता पर बल, आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने वाले जीवों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।
   यह आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि यह मंगलकारी कृति अनेक भव्य जीवों को संयम और सम्यकत्व की ओर अग्रसर करने में सहायक सिद्ध होगी। इस लेखन से निश्चित रूप से समाज में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का संवर्धन होगा। इस अद्भुत साहित्यिक प्रयास के लिए लेखक और प्रकाशक को हार्दिक बधाई।

सुभाष सेठिया,
संपादक बघेरवाल दर्पण
61 गुमास्ता नगर, इंदौर

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

आदिवासी अंचल की खोज

आशीष मिश्र



आज यह सोचकर विस्मय होता है कि कभी मार्क्सवादी आलोचना ने नई कविता पर यह आक्षेप किया था कि ये कविताएँ ऐंद्रिक अनुभवों के आवेग में सामाजिक अनुभवों की उपेक्षा करती हैं। आज आधी सदी बाद जब काव्यानुभव में इंद्रियानुभव की हिस्सेदारी पर विचार करें तो मामला एकदम विपरीत मिलेगा। नई कविता के बाद, अंतिम बार आठवें दशक की कविता ने मानवीय अनुभव के ऐंद्रिक पक्ष को समझा था (ख़ासतौर से वीरेन डंगवाल ने)। उसके बाद की कविता में व्यक्तिगत, सामाजिक अनुभव बढ़ते गए, लेकिन ऐंद्रिक अनुभव सूखता गया है। इससे कविता के अनुभव-संसार में असंतुलन पैदा हो गया है। चाहे व्यक्तिगत उदासी, अवसाद की आत्मलिप्त कविताएँ हों चाहे ग़रीबी, जातिभेद, सांप्रदायिकता की मुखर सामाजिक अनुभवों की कविताएँ—दोनों अपने इंद्रियजन्य अनुभवों को पीठ दिए खड़ी रहती हैं। कविताओं में श्रव्य, घ्राण, स्वाद, स्पर्श-जन्य अनुभव दुर्लभ होते गए हैं। दृश्य बिम्ब अलबत्ता अतिरिक्त हैं, जो दृष्टिविहीन पर्यवेक्षण अधिक लगते हैं। पिछले दशकों में सैकड़ों संग्रह प्रकाशित हुए होंगे, हज़ारों कविताएँ लिखी गई होंगी, परंतु स्पर्श और गंध के दो-चार हृद्य-बिम्ब खोजने पर निराश होना पड़ता है। ऐसा लगता है कि काव्यानुभव में विचार—संवेदन—कल्पना के त्रिकोण से संवेदन का हत्था उखड़ चुका है।
आज लगभग आधी सदी बाद, यह कहने की ज़रूरत आन पड़ी है कि डिजिटल माध्यम ने जिस तरह वास्तविक गंध, स्वाद, स्पर्श के ठोस संवेदन और अनुभवों को हमसे छीनकर इसे कामुक तथा सनसनीख़ेज़ राजनीतिक छवियों से भर दिया है, उसमें वास्तविक संवेदनों की वापसी कविता का आवश्यक कार्यभार हो गया है। आख़िर इस डिज़िटल शीशमहल में कोई तो खिड़की होनी चाहिए जहाँ से हम वास्तविक संवेदनों तक जा सकें। ऐसे में न सिर्फ़ कविता बल्कि तमाम कला-माध्यमों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे मनुष्य के आनुभविक अंतर्लोक को बैलेंस करें।
ऐंद्रिक अनुभवों के देशनिकाला पाने से कविताएँ अपना भी देस खो देती हैं। क्योंकि कविता में देस-तत्त्व को पैदा करने वाली चीज़ विचार और कल्पना नहीं, इंद्रियबोध है। अधिकांश कवियों के भूगोल का अंदाज़ा नहीं लगता तो इसलिए कि कवि इंद्रिय-संवेदन की ज़मीन छोड़कर लोकप्रिय आख्यानों और धारणाओं के पुनरुत्पादन को कविता समझने लगे हैं। यही वे प्रश्न और बहसें हैं जहाँ पूनम वासम की कविताएँ अपनी क्षमता भर कुछ जोड़ती हुई दिखाई पड़ती हैं।
पूनम को पढ़ते हुए लगेगा कि यह उत्तर-आधुनिक अंतर्विरोधों के भीतर से आयासपूर्वक अपनी ज़मीन और संवेदन की तरफ़ लौटने की कोशिश नहीं है, बल्कि उनका कवि-व्यक्तित्व अनाधुनिक क़िस्म के उस आदिवासी सौंदर्यबोध का विकास है। यह व्यक्तित्व अपने परिवेश से कटकर फिर उसे ही ऑब्जेक्ट की तरह नहीं देखता, बल्कि उसी परिवेश का जैविक हिस्सा लगता है। इससे दो चीज़ें होती हैं। एक तो हिंदी कविता में वह उदासी-अवसाद-विषाद के सार्वत्रिक अनुभवों से बच जाती हैं। दूसरे, उनके व्यक्तिगत अनुभव भी सामुदायिक अनुभव और स्मृतियों में घुलने लगते हैं। यहाँ व्यक्तिगत अनुभूतियाँ नहीं हैं; प्रेम कविताएँ हैं, लेकिन वे भी एकांतिक अनुभव न होकर प्रकृति का उत्सव लगती हैं।
वर्षों पहले पूनम की कविताओं पर लिखते हुए मैंने कहा था कि ‘पूनम में सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता है’। अब उनका पहला कविता-संग्रह ‘मछलियाँ गायेंगी एक दिन पंडुमगीत’ पढ़ने के बाद मुझे अपने ही जुमले पर पुनर्विचार की ज़रूरत लग रही है। दरअसल, पर्यवेक्षण परिवेश से विलग व्यक्ति का सायास चुनाव है; जबकि पूनम के लिए यह परवेश उनकी अनुभूतियों का अनायास हिस्सा है। वह उसका तटस्थ पर्यवेक्षण करना भी चाहें तो यह कठिन होगा। जो नदी, जंगल, पहाड़, पेड़, फ़सल पूनम की कविताओं में इतने केंद्रीय चरित्र की तरह ससंज्ञ लौटते हैं, वे पर्यवेक्षण क्षमता का परिणाम न होकर अनुभवों का अनिवार्य अंशधारी हैं। पूनम के इस संग्रह में जितनी नदियों, पहाड़ों का नाम आता है; वह समकालीन कविता में दुर्लभ है। यह ठीक है कि नाम गिनवाना अपने आपमें कवीत्व नहीं है, लेकिन इससे कवि के कन्सर्न और कवि-व्यक्तित्व के बारे में पता ज़रूर चलता है। यही बात पूनम को अपने वय के बाक़ी कवियों से अलगाती है। हाल ही में पूनम के साथ जसिंता केरकेट्टा और अनुज लुगुन के भी संग्रह आए हैं। लेकिन जसिंता अपने प्रकृति-परिवेश के बजाय बहसधर्मी तार्किक भाषा की तरफ़ चली जाती हैं। अनुज लुगुन बिम्बों और प्रतीकों की काव्य-युक्तियों का सहारा लेते हैं, लेकिन उससे उनकी कविता का कोई भूगोल बनता हुआ नहीं दिखाई पड़ता है।
पूनम सिर्फ़ नदी, जंगल, पहाड़, पेड़, पौधों ही को नहीं लातीं; बल्कि सामुदायिक जीवन, जातीय स्मृतियाँ, लोकोक्तियों-मुहावरों, टोटेम, स्थानीय देवताओं, धार्मिक आचारों और संघर्ष की स्मृतियों का एक एथनिक और मानवशास्त्रीय संसार खड़ा कर देती हैं। इससे पाठक को धीरे-धीरे यह समझ में आने लगता है कि मनुष्य का अस्तित्व अनेक संदर्भों पर टिका हुआ है। वह मात्र आर्थिक राजनीतिक संदर्भ में ही नहीं रहता, वह मात्र प्राकृतिक संदर्भ में भी नहीं रहता, बल्कि परंपराओं, मान्यताओं और सामुदायिक व पारिवारिक स्मृतियाँ भी उसके अस्तित्व का आवयविक हिस्सा हैं। यह बात एक काव्य-शैली होने से ज़्यादा गहरी है। असल में यह हिंदी कविता में जुड़ रहा एक नया सौंदर्यबोध है, जिसमें अभी भले अपेक्षित सफ़ाई न मिले; लेकिन यह धीरे-धीरे निखरता जाएगा।
अगर आप इस संग्रह की कविताओं को ध्यान से पढ़ें तो वर्तमान और इतिहास, घटित और घटमान का संबंध कुछ असामान्य लगेगा। आपको लगेगा कि इस काव्यानुभूति में इतिहास और स्मृतियाँ वर्तमान से पीछे, उससे कटी हुई चीज़ें नहीं हैं, बल्कि वह निरंतर वर्तमान का हिस्सा हैं, उसमें लगातार शामिल हैं। आपको लगेगा कि इनकी सामुदायिक स्मृतियाँ वर्तमान से विच्छिन्न नहीं होतीं, बल्कि वर्तमान के अनुभव में आवयविक रूप से शामिल होकर उसे ढालती रहती हैं। इसलिए इतिहास भी वर्तमान के साथ ही जिया जाता हुआ लगता है। यह आधुनिक इतिहास दृष्टि से अलग वैकल्पिक इतिहासबोध है। कविता और भाषा में सामुदायिक स्मृतियों का ऐसा हस्तक्षेप कहीं और नहीं मिलता।
इस तरह पाएँगे कि पूनम की कविताएँ एक ऐसे अंचल की रचना करती हैं, जिसका भूगोल और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य एकदम साफ़ है। लेकिन यह अंचल किसी शून्य में नहीं है, उसके भी होने का एक संदर्भ है और जो उतना सुंदर नहीं है। पूनम को बस्तर अंचल के इस असुंदर वैश्विक संदर्भ का भी भान है। इसलिए कई कविताओं में इस अंचल पर आसन्न संकट भी साफ़ सुनाई पड़ता है। राज्य, उपभोक्तावाद और इस सबका प्रतिरोध—इस अंचल पर हर तरफ़ से एक साथ मारें पड़ रही हैं। इस संग्रह की कई कविताओं में यह बहुत मार्मिक ढंग से आया है। ‘बारूद पानी पानी हो जाए’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—
“तुम गुनगुनाने लगते हो तब
तुमसा कोई प्यारा, कोई मासूम नहीं है
कि तुम जान हो मेरी तुम्हें मालूम नहीं है
और खिलखिलाहट के साथ लाल हो उठता है
मेरा चेहरा शर्म से
तुम कसकर मुझे बाँहों में धर लेते हो कि
तभी बारूद की तीखी गंध से मेरा सिर चकराने लगता है
घनी झाड़ियों ऊँचे पहाड़ों को चीरती
एक गोली तुम्हारे सीने के उस हिस्से को भेदती हुई
गुज़र जाती है
स्वप्न की उसी टेक पर जहाँ अभी-अभी मैंने अपना
सिर टिकाया था”

इस ख़ूबसूरत स्वप्न में गोलियाँ चल रही हैं। ऐसी कई कविताएँ हैं, जहाँ स्वप्न में भय और संघर्ष एक साथ आते हैं। ऐसा लगता है कि अपनी नींद और सपनों में हर तरफ़ से आक्रांत और लड़ता हुआ अंचल सीधे उठकर कविता में चला आ रहा है। ऐसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि पूनम आंचलिकता के सौंदर्य से थोड़ी मुग्ध ज़रूर हैं, लेकिन इतनी मासूम नहीं हैं कि उसका अंतर्संघर्ष न महसूस सकें। लेकिन यह एक तथ्य है कि पूनम बस्तर के भूगोल और आंचलिकता में ज्यादा रमती हैं। उसके समाज-राजनीतिक विश्लेषण में उस तरह नहीं जातीं। समीक्षक यह नहीं कह रहा है कि सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण से ही कविता होती है। पर अगर कोई कवि अपने अनुभवों का समाजार्थिक संदर्भों में विश्लेषण करके उसके अनुसार अपना पक्ष नहीं तय करता, तो अनगिनत खंडों में टूटे हुए समाज में आपकी आत्मा दाएँ-बाएँ झूलता पेंडुलम बन जाएगी। पूनम के साथ यही हुआ है। वह तात्कालिक संवेदना को ही अपना पक्ष मानती हैं, इसलिए एक जगह उनकी संवेदना दाएँ भागती है तो दूसरी जगह बाएँ। कहीं वह आधुनिक राज्य और उपभोक्तावाद को आदर्श मानती हैं, तो दूसरी तरफ़ अनाधुनिक क़िस्म के सामुदायिक जीवन की तरफ़, तो कहीं माओवाद और राजकीय हिंसा के बीच एक आसान-सी आदिवासियत की तरफ़। इसलिए उनकी संवेदना कहीं बिखरी हुई है तो कहीं उलझ गई है, अतः कविताएँ सामान्यतः अपने संरचनागत कसाव को उपलब्ध नहीं कर पातीं। पूनम के कवि व्यक्तित्व को अभी यह वैचारिक अंतर्संघर्ष करना बाक़ी है।
इस संग्रह के उत्तरार्ध में कुछ कविताएँ ऐसी हैं, जिनकी भाषा और अंतर्वस्तु अब तक यहाँ चर्चित कविताओं से एकदम अलग है। ‘कैसे बचा’, ‘इच्छाएँ’, ‘कविता की भूख’, ‘थकान’, ‘मृत्यु’, ‘भाषा’ आदि कविताएँ ऐसी ही हैं। ये अपने परास में छोटी और गठी हुई हैं। इनमें वर्णन, पर्यवेक्षण, स्मृतियाँ छूट चुकी हैं; और विचार-प्रत्यय संसक्ति के साथ आता है। इस तरह पूनम वासम अपने इस संग्रह में दो रास्तों की खोज कर रही हैं। हो सकता है कि आगे वह आंचलिक काव्यानुभव की तरफ़ जाएँ, हो सकता है कि वैचारिक अन्वय की सामासिक संरचना की तरफ़ जाएँ या यह भी हो सकता है कि वह इन दोनों दिशाओं के समन्वय के साथ ज़्यादा वरेण्य काव्यपंथ की खोज करने में सक्षम हो पाएँ।

बुधवार, 22 नवंबर 2023

सुघ्घर संदेश समाय हे " पिंजरा के चिरई" म.

 समीक्षक -  ओमप्रकाश साहू" अंकुर"

      छत्तीसगढ़ी साहित्य ह अब्बड़ समृद्ध हे. छत्तीसगढ़ी म पद्य जादा लिखे गे हावय. पर अब गद्य विधा म घलो सरलग लेखन चलत हे.कहानी, व्यंग्य, उपन्यास, एकांकी,संस्मरण, चिट्ठी लेखन, रिपोर्ताज, समीक्षा ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के ढाबा ह लबालब छलकत हे.  छत्तीसगढ़ी म कहानी के बात करथन त 
चंद्रहास साहू छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक पोठ कहानीकार हे. भले अभी उम्र म छोटे हे पर अपन कहानी के माध्यम ले अपन एक अलगे पहिचान बनाय म सफल होहे.
      चंद्रहास साहू के सबो कहानी ह दमदार रहिथे अउ अपन कहानी के माध्यम ले एक सुघ्घर संदेश देथे. अइसने " पिंजरा के चिरई" कहानी म देखे ल मिलथे. ये कहानी"स्त्री विमर्श" के सुघ्घर उदाहरण हे.
      ये कहानी म  मुख्य पात्र गंगा एक गरीब घर के बेटी आय.  वोहा पढ़ई - लिखई म अब्बड़ हुसियार अउ व्यवहार शील लईका आय  . सब कक्षा म  अव्वल आथे. बारहवीं कक्षा पास होय के बाद गंगा के ददा ह कहिथे कि अब मंय ह तोला इंजिनियरिंग कालेज नइ पढ़ा सकंव बेटी. गरीब होना सबले बड़का पाप हरे.ये जगह के मार्मिक चित्रण कहानीकार ह करे हावय. आगू बढ़े के सपना देखे बर गंगा ह अपन ददा -दाई कर कइसे कलपथे. तहां ले दाई ह गंगा ल आगू बढ़ाय बर हामी भरथे. फेर  गंगा ल इंजिनियरिंग पढ़ाय बर बइला अउ गाड़ी ल बेचे के दृश्य ह पाठक मन ल झकझोर के रख देथे. आंखी ले आंसू बोहा जाथे.
      कालेज म गंगा के अब्बड़ मिहनत के संगे संग उंकर सहेली मन के बेवहार के वर्णन के सजीव चित्रण करे गे हावय कि कइसे कतको नोनी मन सहर म जाके अपन खान -पान  अउ बेवहार ल बिगाड़ डारथे.फेर कालेज पढ़ के गांव म आना अउ अपन बेवहार ले सब झन ल प्रभावित करे के बात ल उकेरे गे हावय.
   फेर कहानी म टर्निंग पाइंट आथे बिहाव के बाद. वोकर गोसइया राहुल खुद इंजिनियरिंग कॉलेज म प्राध्यापक हावय. बिहाव के समय राहुल ह वादा करे रिहिस कि गंगा के योग्यता के मान राखे जाही. वोला नौकरी करवाबो कहे रिहिस. पर ये का राहुल ह तो गंगा के सबो सपना के छर्री -दर्री कर दिस अउ गंगा ह पिंजरा के चिरई बन के रहिगे जेहा मन से न पिंजरा ले निकल सकय न उड़ सकय. धंधाय रहिगे पिंजरा म. आजो गंगा असन न जाने कतको गंगा ले वोकर गोसइया अउ ससुर- सास मन बिहाव होत ले आगू बढ़ाय के हामी भरे रहिथे तहां ले धीरे ले पिंजरा के चिरई कस धांध के राख देथे अउ गंगा मन के सबो सपना ह टूट जाथे.! अपन वादा ल भुलके गोसईया अउ ससुराल कोति के मन कहिथे कि तोला नौकरी करे के का सउंक पड़ गे हावय. तोर सब जरूरत ह तो हमर नौकरी / धंधा -पानी ले पूरा होवत हे कि नइ.कोनो कमी हे त बता! कतको झन मन ह कतको गंगा मन के नौकरी लगे रहिथे तहू ल छोड़ा के पिंजरा के चिरई कस धांध के रखना चाहथे. वोकर सबो प्रतिभा ल मुरकेट के रख देथे.कतको सास म अपन पढ़े लिखे बहू के आगू बढ़ई ल पचा नइ पाये. अपन दिन ल याद दिलाथे कि कइसे हमन आधा- एक किलोमीटर ले बोरिंग - कुवां ले पानी डोहारन. बहू ह भले महीना म बीस- तीस, चालीस - पचास हजार कमा के लाय तभो ले वोकर घर म हीनमान होथे. बहू ल ड्यूटी जाय म भले देरी हो जाय पर वोहा अपन खुद के पइसा ले घलोक घर के काम - काज बर काम वाले बाई नइ रख सकय. कतको नौकरी वाले गंगा मन के एटीएम ह वोकर पास नइ राहय. वोहर घर वाले मन बर खुद एटीएम बन जाय रहिथे. वोकर पैसा ल निकाले के बाद घलो नइ बताय कि पइसा के उपयोग का काम म करे जाही. पूछही त नंगत ले गाली खाही. 
      पर चंद्रहास साहू के गंगा ह अपन अधिकार बर जोम दे देथे. सास ससुर के अब्बड़ सेवा घलो करथे तेकर सेति वोला सास ससुर मन वोला बेटी बरोबर मानथे. गंगा के बने बेवहार ह वोला आगू बढ़े म मदद करथे. वोकर सास ससुर मन अपन लड़का राहुल ल वोकर बेवहार बर फटकारथे अउ अपन बहू गंगा ल नौकरी करे बर भेजथे. राहुल के आंखी ल खोलथे कि बेटा अपन वादा ल झन भुला.
  ये मामला म चंद्रहास साहू जी के गंगा ह अब्बड़ भाग्यशाली हावय. नि ते गोसईया , सास -ससुर के कतको सेवा करय लेय गंगा मन. पर वोला आगू बढ़ाय बर उंकर मन के कान म जुआं नइ  रेंगे. अउ बिहाव के बेरा के अपन वादा ल नेता मन कस भुला जाथे!
         एक धारदार अउ सीखपरक कहानी हे " पिंजरा के चिरई" ह. पात्र के हिसाब ले सुघ्घर भाषा के प्रयोग करे गे हावय. कहानी के शैली सरल,सहज अउ प्रवाहमयी हे. बोलचाल के अंग्रेजी शब्द मन के प्रयोग करे गे हावय. घर,कालेज अउ आफिस के सजीव चित्रण देखे ल मिलथे. एक बढ़िया अउ संदेशपरक कहानी बर कहानीकार  चंद्रहास साहू ल गाड़ा - गाड़ा बधाई अउ शुभ कामना हे.
 
सुघ्घर संदेश समाय हे  " पिंजरा के चिरई" म.
कहानी - पिंजरा के चिरई
कहानीकार - चंद्रहास साहू
 

मैं जोहिला : जोहिला के बहाने नर्मदा की कथा

 

अजय चन्द्रवंशी
 
     आदिम मनुष्य की जिज्ञासा वृति और सहज वृत्ति अपने भौगोलिक परिवेश के अनुरूप मिथकों और लोक कथाओं को जन्म देती रही है। तत्कालीन ज्ञान की सीमाओं के चलते भी मनुष्य की द्वंद्व से मुक्ति की सहज वृति भी इन लोक कथाओं की उत्पत्ति का एक कारण रही है। प्रकृति का मानवीकरण भौतिक वस्तुओं पर चेतना का आरोपण  सार्वभौम है, और इसने कई दिलचस्प लोक कथाओं को जन्म दिया है। इन लोक कथाओं, लोक विश्वासों की तार्किकताओं की अपनी सीमाएं और अंतर्विरोध भी हैं मगर ये तत्कालीन जनमानस की मनःस्थिति और इतिहास के बहुत से संकेत अपने में छुपाएं रहते हैं और कई बार इतिहास के महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने का काम भी करते हैं।
     माना जाता है कि इतिहास की 'मुख्य धारा' कई बार न्याय नहीं करती और बहुत बार जन सामान्य के नायकों की उपेक्षा कर जाती है, लेकिन लोक इन नायकों/नायिकाओं को पहचानता है और उचित महत्व देता है। बहुत से आदिवासी जननायकों या1857 के क्रांति के नायकों/नायिकाओं जिक्र 'मुख्य धारा' के इतिहास में नहीं मिलता लेकिन वे लोक कथाओं में अमर हैं। 
     इसलिए लोककथाओं/ विश्वासों में निंदा या सम्मान में चूक की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है। इसलिए यदि लोकविश्वास नर्मदा के पक्ष में है और जोहिला और शोणभद्र को लांक्षित करता है तो मानना चाहिए नर्मदा के पक्ष में यह सहानुभूति अकारण नहीं है।
नर्मदा-शोण(सोन)- जोहिला की भौगोलिक स्थिति की विलक्षणता लोकमानस में इस प्रेम त्रिकोण की कथा को विकसित होने के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा करती है। एक ही जगह(अमरकंटक पहाड़ी क्षेत्र) से निकलकर नर्मदा (पश्चिम) और सोन(पूर्व) का विपरीत दिशा में प्रवाह जन मानस में दोनो में अलगाव की कथा सृजित होने के लिए उपयुक्त था। उस पर जोहिला और शोण का संगम ने प्रेम त्रिकोण का रूप लिया।
     उपन्यासकार ने इस लोककथा को औपन्यासिक स्वरूप दिया है। वे उस परिवेश से जुड़े हैं और नर्मदा की लोक महत्ता से परिचित और प्रभावित हैं इसलिए उपन्यास का शीर्षक भले 'मैं जोहिला' है मगर कहानी मुख्यतः नर्मदा की है। ऐसा प्रतीत होता है जोहिला और शोण इस कथा के उपादान मात्र हैं और केन्द्रीयता नर्मदा की त्रासदी को व्यक्त करना है। यों लोककथा की सीमितता भी अधिक कहने का अवसर नहीं देती बावजूद लेखक ने अपेक्षित विस्तार का प्रयास किया है।
नर्मदा और जोहिला बचपन से सखी हैं। नर्मदा राजसी कन्या है और जोहिला सामान्य नागरिक की पुत्री फिर भी दोनो में गहरी मित्रता है। नर्मदा के व्यवहार से कहीं परिलक्षित नहीं होता कि वह ख़ुद को उससे या अन्य सखियों से उच्च मानती है। जोहिला भी कभी नर्मदा को गैर नहीं समझती या उसके राजसी कन्या होने से मित्रता में कभी असहज महसूस करती है। अवश्य युवावस्था की नैसर्गिक आकांक्षा जोहिला मे नर्मदा की अपेक्षा अधिक प्रकट होती है। नर्मदा के उदात्त चरित्र में यौनाकांक्षा भी संयमित है। यों जोहिला भी संयमित है मगर उसके अंदर नर्मदा के प्रति एक सहज मानवीय प्रतिस्पर्धा का भाव है जो अनायास प्रकट होते रहता है। वह कई बार महसूस करती है कि वह नर्मदा से अधिक रूपवती है मगर उसके अनुरूप उसे प्रतिष्ठा नहीं मिलती। जाहिर है इसका एक कारण सामाजिक स्थिति का अंतर भी है। मगर नर्मदा के अंदर कहीं पर श्रेष्ठताबोध अथवा जोहिला के प्रति प्रतिस्पर्धा भाव प्रकट नहीं हुआ है।
     लेखक ने कथा का माध्यम जोहिला को बनाया है मगर हम कह चुके हैं पूरे उपन्यास में नर्मदा व्याप्त है। घटनाक्रम की नाटकीयता और प्रेम का द्वंद जो उपन्यास के आखिरी हिस्से में है वह सहज नहीं जान पड़ता। नर्मदा के कहने पर जोहिला का शोण को देखने जाना और प्रथम मिलन में ही प्रेम में पड़ जाना तथा हमबिस्तर हो जाना उतना सहज नहीं जान पड़ता जितना उपन्यास में उसका औचित्य सही सिद्ध करने का प्रयास दिखाई पड़ता है।
      जोहिला का शोण को देखकर उसके मनुहार पर पिघलते जाना और आंतरिक रजामंदी कहीं गहरे उसके नर्मदा के प्रति अव्यक्त प्रतिस्पर्धा का प्रकटीकरण लगता है जिसकी झलक कई बार उसके अपने रुपाकर्षण के प्रकटीकरण से मिलती है। अवश्य उसमे हल्का सा द्वंद्व और 'अपराधबोध' दिखता है मगर वह उसके शोण के प्रेम निवेदन के आगे कुछ भी नहीं है। इससे विचित्र स्थिति शोण की है। वह कोमोमण्डल का राजकुमार है। अवश्य जागीर छोटी है, मगर है तो जागीर। वह रूपवान योग्य युवक है। नर्मदा के स्वयंवर की शर्त बकावली पादप लाने को कठिन परिस्थितियों में वह पूरा करता है। पूरी विवाह की तैयारी हो जाती है बरात नर्मदा के घर तक आ जाती है। शोण के मन मे कहीं कोई असमंजस या द्वंद्व नहीं दिखाई देता, जिससे लगे कि इस विवाह में उसके लिए कहीं कुछ गलत भी है। मगर जैसे ही वह जोहिला को देखता है। उसके रूप सौंदर्य पर मोहित होता है और तब नर्मदा के प्रति उसके बहुत से असमंजस प्रकट होने लगते हैं।
      शोण जिसे प्रेम कहता है वह सामंती अभिरुचि से गंभीर रूप से ग्रस्त है। वह प्रथमतः जोहिला को नर्मदा के साथ भी पाने को तैयार है, उसके लिए यहां कोई दुविधा नहीं है। उसका यह प्रथम दृष्टि का प्रेम दरअसल 'प्रकृतवाद' से प्रभावित है जो प्रथम मिलन में ही यौन सम्बन्ध से प्रकट हो जाता है। शोण अपने नर्मदा के प्रति असहजता के लिए जो तर्क गढ़ता है, वह बेहद लचर है। ये सारे तर्क जोहिला को.पाने के भ्रान्त तर्क प्रतीत होते हैं। वह कहता है नर्मदा के परिवेश और व्यक्तित्व और उसके परिवेश में काफी अंतर है जिसका कारण वह नर्मदा और उसके पिता के साम्राज्य की विशालता और अभिजात्य परिवेश को बताता है और स्वयं उससे कमतर मानता है। फिर आगे अपनी कद-काठी को नर्मदा की अपेक्षा कम जानकर हीनता महसूस करता है। आश्चर्य है उसे ये बातें पहले ध्यान नहीं आती! फिर क्या दाम्पत्य में  छोटी-मोटी असमानताएं नही होती? फिर यह बात शोण स्वयंवर जीतने के बाद स्पष्ट कर सकता था जिससे नर्मदा को इस तरह विवाह मंडप में आहत नहीं होना पड़ता। इस सम्बंध में शोण का तर्क कि "जब मैं बकावली लाने के लिए निकला, तब तक मैंने इस सम्बंध में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं सोचा था!बाद में जब जब इस ओर गया, तब तक बहुत विलंब हो चुका था।" दूसरे के जीवन से खिलवाड़ की कीमत पर यह असमंजसता कमाल का है!
शोण के इस तर्कजाल का अगला तर्क यह है; वह जोहिला से कहता है "आप ही मेरे व देवी नर्मदा के मध्य आजीवन सेतु का कार्य कर सकती हैं"। नर्मदा से दूर भी रहना है और नर्मदा जैसी स्त्री(जोहिला) की चाह भी है! आगे वह जोहिला से कहता है "क्या यह सत्य नहीं कि मेरी भांति आप भी मूलतः जनकन्या हैं"? एक छोटा सामंत भी अपने को आमजन कह सकता है! इसमे बुराई नहीं लेकिन आगे का तर्क "क्या यह भी सत्य नहीं कि हमारी जोड़ी भी आदर्श होगी, क्योंकि मैं आपसे तनिक लंबा हूँ" कमाल का तर्क है दाम्पत्य के लिए पुरूष का स्त्री से कद में लंबा होना जरूरी (आदर्श)है! कहाँ प्रेम का उदात्त रूप जहां वर्ण, जाति, शारीरिकता, खत्म हो जाता है, और कहाँ यह शारीरिक नाप-जोख!
     इस तर्कजाल में जोहिला का भी बराबर सहयोग है। कहती है "अपनी दुर्दशा के लिए नर्मदा परोक्षतः स्वयं दायी थी। मैने उसे कितना समझाया था कि विवाह जैसे नितांत व्यक्तिगत मसले को लोक कल्याण का उत्स न बनाये।....अब उसे आघात लगा तो वह उसका कारण खोजने के लिए स्वयं के अंतर में झांकने के बदले मुझे कोस रही थी...सोन के जीवन मे मैं नहीं आती तो कोई अन्य आता।"  इन सब बातों का ध्यान जोहिला को सोन से मिलने के पहले नही आया! माना विवाह व्यक्तिगत मसला है, मगर नर्मदा इसे जनकल्याण से जोड़कर कभी द्वंद्व में नहीं रही थी। वह अपना नायक जननायक चाही तो इसमे बुराई क्या है?फिर जिसने स्वयम्वर जीता उसे उसने सहज स्वीकारा। कहीं कोई दुविधा नहीं।न ही यह कोई बनावटी उपक्रम था। इसे बनावटी बताने का उपक्रम शोण और जोहिला कर रहे हैं। आगे एक स्थल पर जोहिला कहती है "यह यह ठीक था कि उसने(नर्मदा) अपने ही द्वारा पैदा की परिस्थिति का सामना ना कर उससे पलायन किया था, किंतु यह पलायन तो उसके जुझारू व्यक्तित्व के अनुरूप न था।" गजब का तर्क है अपने कार्य के औचित्य को सिद्ध करने के लिए दूसरे पर दोषरोपण कर दो! यह परिस्थिति नर्मदा के कार्य से नहीं जोहिला और शोण के परस्पर यौनाकर्षण से पैदा हुई थी।
     त्रासदी होनी थी, हो गई। जोहिला और शोण मिल गए। आहत नर्मदा उनसे दूर चली गई।जोहिला स्वीकारती भी है वह चाहती तो दोनों को नुकसान पहुंचा सकती थी, मगर उसने ऐसा नहीं किया, बल्कि एक तरह से उनके रास्ते से हट गई। उसके व्यक्तित्व की उदात्तता कहीं क्षीण नहीं होती। केवल एक जगह दोनो को अंतरंग सम्बन्ध में बंधे देखकर कर आवेशित होती है और अपशब्द कहती है, जो परिस्थितिवश बहुत असामान्य नहीं है।
     हमने ऊपर शोण और जोहिला के 'सहज प्रेम' के दावा को प्रश्नांकित करने का प्रयास किया है और 'प्रकृतवाद' से प्रभावित कहा है तो सम्भव है किसी को हमारे विवेचन में 'नैतिकतावाद' हावी दिखाई दे। इस सम्बंध में हमारा कहना है कि अवश्य प्रेम नैसर्गिक होता है, वह कहीं भी किसी से हो सकता है, मगर हर तात्कालिक आकर्षण जरूरी नहीं की प्रेम भी हो, उसमे ठहराव भी जरूरी है। प्रेम से शरीर जरूर अलग नहीं किया जा सकता मगर स्त्री-पुरूष के हर यौनाकर्षण को प्रेम नहीं कहा जा सकता। फिर मनुष्य ने अपने सामाजिक विकास के क्रम में उसके साथ कुछ मूल्य भी जोड़े हैं मसलन परस्पर समर्पण, त्याग, कर्तव्यबोध जो उसे और भी उदात्त बनाते हैं। अवश्य कई नकारात्मक मूल्यों ने सहज प्रेम में बाधा भी पैदा किया है, जिनके विरुद्ध प्रेमियों का संघर्ष हमेशा रहा है। हमारी समझ मे शोण और जोहिला का संघर्ष इन नकारात्मक मूल्यों के प्रति न होकर यौनाकर्षण अधिक है। आमुख में अनामिका जी ने लिखा है "पूर्णता का आदर हो सकता है पर उससे प्रेम पाना आसान नहीं, न ही उसके प्रेम का पात्र हो पाना आसान है। कहीं तो कुछ अधूरा हो तभी तो समर्पण की आस जगे। दो अर्धगोले ही मिलकर प्रेम का ग्लोब पूरा करते हैं-जैसे शोण और जोहिला ने किया।" इससे हमारी सहमति है मगर उपन्यास में नर्मदा का चरित्र उदात्त होकर भी मानवीय है और वह मानवीय आकांक्षाओं से भरी हुई है।अवश्य उसमे एक गरिमामय गोपन है। मगर विवाह के समय उसकी उत्सुकता उसकी मानवीयता को ही उजागर करती है।उसके व्यक्तित्व में ऐसी 'पूर्णता' नहीं है जिसमे कुछ भरा ही न जा सके और वह मानवीय आकांक्षाओं से परे हो।
     लेखक ने संक्षिप्त कथा को औपन्यासिक रूप देने का बेहतर प्रयास किया है और उसमे सफल भी है। नर्मदा के चरित्र में उदात्तता है मगर उसका चित्रण मानवीय है। सिर्फ एक जगह भविष्यवक्ता साधु के संदर्भ में इसके दैवीय रूप की झलक मिलती है जो हमारी समझ मे कथा-प्रवाह के लिए सहज नहीं है। इस तरह नर्मदा के दैवीय रूप दिखाने से आगे की उसकी त्रासदी 'लीलामात्र' प्रतीत हो सकती है क्योंकि इससे वह भूत-भविष्य की जानकर प्रतीत होने लगती है।
बहरहाल लेखक लोकमान्यता की सीमाओं से बंधा है, उसे उपन्यास का विस्तार उस दायरे में ही करना है, बावजूद इसके उसने कथानक का विस्तार बेहतर ढंग से करने का प्रयास किया है।पाठकों का संवेदनात्मक जुड़ाव भिन्न-भिन्न अभिरुचि, व्यक्तित्व और संस्कार के अनुरूप भिन्न-भिन्न पात्रों से हो सकता है।

कृति- मैं जोहिला(उपन्यास)
लेखक-प्रतिभू बनर्जी
प्रकाशन- नमन प्रकाशन, नई दिल्ली


कवर्धा(छत्तीसगढ़)
  मो. 9893728320

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

लोक मड़ईः अविरल कला यात्रा का ’ लोक मंच’

शत्रुघन सिंह राजपूत


       सुविख्यात मानस मनीषी डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र ने अपने शोध प्रबंध’ तुलसी दर्शन’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया है - ’ मानव समुदाय में सामान्यतः यही देखा जाता है कि लोग आम के फल खाते हैं, उसकी जड़ों का निरीक्षण नहीं करते, मधुर झरने का शीतल जल पीकर प्रसन्न होते हैं, उसके स्त्रोत की छानबीन नहीं करते। किसी सत्कवि की रचनाओं का सुरस चखना चाहते हैं परन्तु उसके व्यक्तित्व से अथवा उसकी जीवनी से वास्ता नहीं रखते’ यह उक्ति महाकवि तुलसीदास की जीवनी से संदर्भित है लोक - कलाकारों, लोक - कला साधकों और लोक संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों के प्रति भी यह कथन प्रासांगिक लगता है मड़ई उत्सव समिति आलीवारा डोंगरगाँव द्वारा सांस्कृतिक उत्सव ’ लोक मड़ई 2023’ के अवसर पर ’ स्मारिका ’ प्रकाशित की गई। इसमें अविभाजित राजनंदगांव जिला के लोक - कलाकारों, कला साधकों, लोक संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों के जीवन की संघर्षपूर्ण सांस्कृतिक यात्रा और उनकी उपलब्धियों का वर्णन है। स्मारिका वीरेन्द्र बहादुर सिंह के संपादन और राजेन्द्र यादव, मुन्ना बाबू के सह - संपादन में निकाली गई है। डोंगरगाँव विधानसभा क्षेत्र के लोक - कला प्रेमी विधायक दलेश्वर साहू अध्यक्ष लोक मड़ई उत्सव समिति आलीवारा जिला - राजनांदगांव इसके प्रकाशक हैं।  पुस्तक में डेढ़ दर्जन लेखकों के लेखों को संग्रहित किया गया है। मुख पृष्ठ पर लोक कलाकारों और कला साधकों के चित्रों को समायोजित किया गया है जो पाठकों को आकर्षित करता है।
       वैसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में कलाप्रेमी जनप्रतिनिधियों का भीषण अकाल है। इस विकराल अकाल में कला प्रेमी विधायक दलेश्वर साहू का प्रयास सावन के फुहारों की तरह आनंददायक है। वे साहित्यकारों और कलाकारों से सीधे जुड़े हैं। जिला भर के साहित्यकारों का विनम्र भाव से सम्मान कर चुके हैं। राजनीति की आपाधापी में भी ’ लोक - मंच ’ के लिए समय निकाल लेते हैं। यह प्रशंसनीय है। विगत 22 वर्षों से विभिन्न स्थानों में लोक मड़ई का आयोजन हो चुका हैं। अपने संपादकीय में वीरन्द्र बहादुर लिखते हैं - ’ लोक मड़ई के बीते वर्षों के आयोजन में पदम् विभूषण तीजन बाई, ऋतु वर्मा, उषा बारले, ( पंडवानी )देवदास बंजारे (पंथी नृत्य) श्रीमती ममता चंद्राकर ( लोकगीत) कविता वासनिक (लोकगीत) खुमानलाल साव ( चंदैनी गोंदा) दीपक चंद्राकर ( लोकरंग) जैसे दिग्गज कलाकार अपने साथियों सहित अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। नाचा, पंथी, कर्मा,पंडवानी,भरथरी, चंदैनी, देवार गीत, बांस गीत आदि  छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की प्रमुख विधाएं हैं। उनकी पारंपरिक लोक शैलियाँ लोक मड़ई के मंच पर साकार हो चुकी हैं। स्मारिका में दाऊ मंदराजी, दाऊ रामचंद देशमुख, खुमानलाल साव और हबीब तनवीर की अगुवाई में ग्रामीण से शहरी परिवेश, फिर देश विदेश तक नाचा और लोकनाट्य यात्रा की विकास गाथा सांस्कृतिक लोक सेवा की राह पर बिखरे शूल अधिक हैं। इसमें दक्षता के लिए तपस्या और समर्पण अनिवार्य है। अधिकाँश कलाकार कम पढ़े - लिखे, आर्थिक रूप से संघर्षशील किन्तु अभावों के बावजूद कला के प्रति समर्पित हैं। स्मारिका कला - जीवन का दस्तावेज है। लेखों में विविधता है। कला जगत के ये अनमोल छत्तीसगढ़िया सितारे अपनी कलाओं से छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना करते प्रतीत होते हैं। अब उनकी परवाह करना ही पड़ेगा। लेख पठनीय हैं,चंदैनी गोंदा, सोनहा बिहान,नवा बिहान लोरिक चंदा, दूध मोंगरा आदि लोक सांस्कृतिक संगठनों का छत्तीसगढ़ के लोक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्मारिका में बेजोड़ नाचा कलाकार लालूराम, मदन निषाद, ठाकुरराम, गोविंदराम निर्मलकर, बाबूदास, फिदाबाई सहित भुलवाराम ( उत्कृष्ट गायक) एवं अन्य कलाकारों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। सुविख्यात लोक संगीतकार खुमानलाल साव और उनकी टीम ने अपने संगीत के जादू से करमा, ददरिया, सुआ, गौरा, विवाह गीत, बसदेवा - गीत, सोहर,भोजली, पंथी और देवी जस गीतों को प्राणवान कर दिया। ’ चंदैनी गोंदा’ के संगीत निर्देशक के रूप में उन्होंने अनेक गायक - गायिका कलाकारों की प्रतिभाओं में नई चमक पैदा की है।  गिरजाकुमार सिन्हा को बेन्जो वादन में अद्भूत सिद्धि प्राप्त थी। उनका बहुमूल्य योगदान रहा है।  छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की स्वर कोकिला कविता वासनिक ने क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों में अपने गाए गीतों से ख्याति अर्जित की है। यह स्मारिका उन सभी कलाकारों का स्मरण चित्र है जिन्होंने देश - विदेश में अपनी कला का लोहा मनवाया है। हबीब तनवीर ने गाँव के गली कुचों के कलाकार्रों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। इससे उनका सम्मान बढ़ा। ’ छत्तीसगढ़ी नाचा के अनूठे साधक कलाकार मंदराजी’ शीर्षक लेख में लेखक जयप्रकाश ने छत्तीसगढ़ी नाचा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विवेचन किया है। वहीं देश दुनिया में रंगमंचीय सफलता का उल्लेख किया है। दाऊ मंदराजी के संबंध में उन्होंने लिखा है ’ मंदराजी दरअसल कला की कपट - दुनिया के स्वछंद नागरिक थे, सौन्दर्य और आनंद के अद्वितीय क्षणों के लिए सब कुछ लुटा देने को तैयार वे अनूठे कलाजीवी थे। विजय मिश्रा ’ अमित’ के लेख के अनुसार कविता वासनिक का मानना है - कलाकारों का सामाजिक सरोकार समाज को सब मिलकर और सुसंस्कृत बनाये रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। परंपराओं की हिफाजत भी एक इबादत है, मूल संस्कृति से दूर भागने की भूल समाज को गर्त में ले जा सकती है ... साधन आज बहुत बढ़ गए हैं पर साधना कम हो गई है। स्तुति बहुत हो रही है पर आराधना घट गई है। संगीत जगत में आने वाली नई पीढ़ी ऊर्जा से लबरेज है पर कठोर अभ्यास के मामले में कमतर लगती हैं। गौतमचंद जैन दूध मोंगरा गंडई के संस्थापक सदस्य हैं और वरिष्ठ लोक गायक हैं। डॉ. पीसीलाल के अनुसार वे विगत 45 वर्षों से लोक गीत गायन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ’ कनिहा म तोर करधन’ को धुरवा राम मरकाम और गौतमचंद जैन ने बारी - बारी से अपना स्वर दिया है। यह गीत प्रसिद्ध है। राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि मदन निषाद लोकनाट्य नाचा के दिग्गज कलाकार और अद्भूत अभिनेता थे। उन्होंने गम्मत ( कामेडी या प्रहसन) के माध्यम से नाचा शैली के पात्रों और चरित्रों को स्थापित किया। इसके अतिरिक्त स्व. ठाकुरराम, मंदराजी दाऊ, लालूराम, बाबूदास ने भी नाचा के कथ्य के कैनवास को विस्तार देने और लोचदार बनाने में योगदान दिया।
       संजीव तिवारी ने पद्मश्री गोविन्दराम निर्मलकर को लोककला का ध्वजवाहक निरूपत करते हुए लिखा है कि. शुद्ध उच्चारण और मंच के लिए अपेक्षित लोचदार आवाज के व्दारा गोविन्दराम चरित्र से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में दक्ष थे।  हबीब तनवीर के नया थियेटर में आते ही वे नायक की भूमिका में आ गए। वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने खुमानलाल साव को ’ चंदैनी गोंदा ’ के यशस्वी संगीत सर्जक लिखा है। सावजी निश्चय ही आजीवन लोक मंच पर संगीत निदेशक रहे। अनेक गायक गायिकाओं को उन्होंने तैयार किया। मुन्ना बाबू ने लिखा है कि भैयालाल हेड़ाऊ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ’ चंदैनी गोंदा ’ के गायकों में वे अग्रगण्य थे। खुमान लाल साव एवं गिरिजा कुमार के निर्देशन में भैयालाल हेड़ाऊ ने अनेक कर्णप्रिय छत्तीसगढ़ी गीत गाए जो लोक मंच की धरोहर है। सुरेश यादव ने अपने लेख में फिदाबाई मरकाम को छत्तीसगढ़ी लोक मंच ’ नाचा’ की प्रथम महिला उत्कृष्ट गायिका और कुशल नर्तकी बताया है। अशोक चन्द्राकर ने देवी लाल नाग को नचकारी ’ नर्तकी’ या परी में सिद्धहस्त, कुशल हारमोनियम वादक, कुशल गायक और कुशल संगीत संयोजनकर्ता लिखा है। अरूण कुमार निगम ने गिरिजा कुमार सिन्हा को विलक्षण संगीतकार की संज्ञा दी है। उन्होंने लिखा है कि हारमोनियम में खुमानलाल साव, बांसुरी में संतोष टांक, इलेक्टि्रक बेन्जो में गिरिजा कुमार सिन्हा, मोहरी में पंचराम देवदास, तबला में महेश ठाकुर, ढोलक में केदार यादव सिद्धहस्त रहे हैं। इन सभी कलाकारों का संगम ’ चंदैनी गोंदा ’ में हुआ। गिरिजा कुमार सिन्हा बेन्जो वादन में इतने सिद्धहस्त थे कि प्यानों, गिटार और मेंडोलियन जैसे वाद्य यंत्रों की हूबहू धुन वे बेन्जों से ही निकाल लेते थे। उनका बेन्जो वादन अद्भूत और चमत्कारी था।
       गंडई पंडरिया की दुखिया बाई को डॉ.पीसीलाल यादव स्वर कोकिला कहते हैं। दुखिया बाई निरक्षर थी। उसके गाए लोकगीत इतने लोकप्रिय हैं कि कोई भी ऐसा कला मंच नहीं, कोई भी ऐसा कलाकार नहीं जो दुखिया के गीतों को न गाता हो दुखिया बाई की यह प्रसिद्धि लोक की प्रसिद्धि है,लोक गीतों के खनकते स्वर की प्रसिद्धि है। आकाशवाणी रायपुर से बजने वाले गीतों में सर्वाधिक फरमाइश दुखिया बाई और धुरवा राम के गीतों की होती है। दीपक विराट बेजोड़ अभिनेता थे। डॉ.लोकेश शर्मा के लेख के अनुसार हबीब तनवीर के नया थियेटर में लगभग दो दशकों से जुड़े थे। एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार थे। अखिल भारतीय संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार 2017 से भारत के राष्ट्रपति महामहीम रामनाथ कोविंद से 6 फरवरी 2019 पुरस्कृत हुए। दीपक विराट ने अपनी रंगकर्मी पत्नी और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मंदराजी सम्मान से सम्मानित श्रीमती पूनम विराट के साथ मिलकर राजनांदगांव में ’ रंग छत्तीसा’ग्रुप बनाया। स्वयं पूनम विराट यशस्वी गायिका हैं। पूनम विराट, सुखीराम निषाद नाचा के प्रभावी कलाकार रहे हैं। मधुर संगीत, आकर्पक गीत नृत्य और गम्मत के कारण टिकटो में उनके चैरिटी - शो ’ नाचा’ होता था। विक्रम यादव को बांस गीत गायन में दक्षता हासिल है। न्यू थियेटर गु्रप से जुड़े रहे। राजेश मारू बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। हर्ष कुमार बिंदु ने अपने लेख में लिखा है कि राजेश मारू बैगा गु्रप के अध्यक्ष हैं। सांस्कृतिक जागरण में निरंतर जुटे हैं। छत्तीसगढ़ी लोककला और संस्कृति में आ रही विकृतियों को आडियो, वीडियो कैसेट के माध्यम से दूर करने प्रयासरत हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में पचास से अधिक आडियो, वीडियो कैसेट तैयार किया है। सुप्रसिद्ध गायिका कविता वासनिक समेत प्रमुख गायक गायिकाओं ने स्वर दिया है।
       
डॉ.नत्थू तोड़े ने लतमार दास चंदनिया पर लेख लिखा है। उसमें उल्लेख है कि आरंग क्षेत्र में राउत जाति में लोग बांस बजाकर शादी के अवसर पर लोक कथा चंदैनी का गायन करते हैं। चंदैनी लोक कथा मूलतः लोरिक और चंदा के प्रेम प्रसंग पर आधारित है। सभी पात्र मंच पर उपस्थित होकर इसे नाचा शैली में प्रस्तुत करते है। लतमार दास चंदनिया इसी लोक कथा के लोक गायक हैं। मुन्ना बाबू ने अपने लेख में पंडवानी गायक रेवाराम साहू के बारे में लिखा है कि प्रसिद्ध पंडवानी गायक झाडूराम देवांगन उनके प्रेरणा स्त्रोत थे। हबीब तनवीर उसके पंडवानी गायन से प्रभावित थे। डॉ.पीसीलाल यादव ने धुरूवाराम मरकाम के बारे में लिखा कि उसने संगीत की कोई शिक्षा नहीं ली थी। लोक और लोक कलाकारों को गुरू मानकर लोकसंगीत की साधना करते रहे। वे लोक गायक ही नहीं हैं बल्कि आशु कवि की तरह ’ ददरिया’ की रचना भी कर लेते हैं। उनके दर्जनों गीत लोक - मानस में प्रिय है। बरसाती भैया मूल नाम केशरी बाजपेयी ने रेडियो में जो चौपाल जमाया उसे घर - घर लोकप्रियता मिली। उन्होंने अनेकों कलाकारों को दिशा दी। जनता के ह्रदय में स्थान बनाया। अपने छत्तीसगढ़ी कार्यक्रम के बरसाती भैया बहुत ही लोकप्रिय हुए। लाल रामकुमार सिंह रंगकर्मी एवं आकाशवाणी के उद्घोषक रहे हैं। उनका छत्तीसगढ़ के लोक जीवन को बहुमूल्य योगदान मिला। दीपक विराट तिवारी एक मंजे हुए बहुमुखी प्रतिभा के धनी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कलाकार थे। उनकी पत्नी पूनम विराट के संबंध में सूर्यकांत मिश्रा लिखते हैं कि पूनम रंगमंच की बेजोड़ कलाकार है। नाचा और गम्मत दोनों में पारंगत है। कक्षा चार तक पढ़ी हैं, किन्तु गायन के क्षेत्र में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने में निपूर्ण है। ओमप्रकाश ’ अंकुर ’ ने लिखा है कि अभिनय कौशल में स्व. उदेराम श्रीवास ने नाचा के माध्यम देश विदेश में प्रमुख अभिनेता के रूप में ख्याति अर्जित की। प्रदेश स्तर पर उसे सरकार ने अनेक सम्मानों से सम्मानित किया। साकेत साहित्य परिषद, सुरगी, राजनंदगांव ने भी उसे सम्मानित किया। इस बेजोड़ कलाकार का समुचित सम्मान नहीं हो पाया। चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त स्वर्ण कुमार साहू कलाजीवी थे। उनकी नातिन उर्वशी साहू के अनुसार रवेली पार्टी का एक  सुप्रसिद्ध गम्मत था ’ पोंगवा पंडित’ सन 1953 में रिंगनी पार्टी में विलय के बाद इसे खेला गया, जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। उनका लिखा गीता ’ महराज बता देहू तुंहर कउन घराना आय’ जनप्रिय हुआ था। अनुसार इस लोक गीतकार को आजीवन आर्थिक संघर्स करना पड़ा। वे हबीब तनवीर से जुड़े। बड़ी प्रसिद्धि मिली। उसकी सुपुत्री गिरीश साहू भी आर्केस्ट्रा व लोक कला मंचों की गायिका थीं। दूध मोंगरा, गंडई से जुड़ी थीं। उर्वशी साहू छत्तीसगढ़ी फिल्म अभिनेत्री हैं। मुन्ना बाबू मालाबाई को छत्तीसगढ़ की लता निरूपित करते हैं। मालाबाई महज तेरह साल की उम्र से गीत गाती थीं। वह अपनी  जादुई आवाज श्रोताओं को मंत्र - मुग्ध कर देती थी। अभिनय कला में भी दक्ष थीं। देश विदेश में अनेक नाटकों में अभिनय की थी। शेखर कपूर की ’ बेंनडेट म्ीन’ में भी उसने काम किया। राजेन्द्र यादव ने दलेश्व्रर साहू को ’ लोक मड़ई ’ उत्सव के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में कार्य करने वाला बताया है। विगत तीन दशकों से वे इस कार्य में जुटे हैं। विशेष बात यह है कि वे प्रतिभाओं के पारखी हैं। स्व.खुमानलाल साव का एक लेख संग्रहित है जिसमें रवेली नाच पार्टी का सन 1928 से 1953 तक संक्षिप्त इतिहास है। रवेली नाच पार्टी स्व. दुलार सिंह मंदराजी के नेतृत्व में गठित नाच पार्टी का नाचा गम्मत की कला का महत्वपूर्ण इतिहास है। जो मंदराजी महोत्सव समिति,रवेली, राजनांदगांव द्वारा प्रकाशित ’ गम्मत’ संपादक- जयप्रकाश से साभार लिया गया है।

आलोचना का लोकधर्म : आलोचना की लोकदृष्टि

 अजय चन्द्रवंशी
  बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली जी कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब मे मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं। ऐसे कई मौके मैं जानता हूँ जब उन्होने एकमुश्त पचास से अधिक किताबें खरीदी हैं। वे कब किसी दुर्लभ या अल्पज्ञात पुस्तक अथवा आलेख की फोटोकॉपी आपको अपने झोले से निकालकर देंगे, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
    ज़ाहिर है पुस्तकों से उनका इतना प्रेम अध्ययन के प्रति उनकी रुचि के कारण हैं। वे खूब पढ़ते हैं और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उम्र के इस पड़ाव तक जितना गद्य उन्होंने लिखा है, उनके अध्ययन का दशांश भी नहीं है। वे चर्चाओं और बहस में ही जो बातें कहते हैं उसी को लिखते चले जाएं तो काफी सामग्री हो जाएगी।यह सुखद है कि वे अब इस तरफ ध्यान दे रहे हैं और लिख रहे हैं। बहरहाल 'आलोचना का लोकधर्म' से इसकी शुरुआत हो गई है।
    'आलोचना का लोकधर्म' शाकिर जी की पहली आलोचना कृति है। अवश्य इसमे एक निश्चित योजना के तहत आलेख नहीं रखे गए हैं; बल्कि अब तक के उनके लिखे सभी आलेखों को एक साथ पुस्तकाकार दिया गया है। ये आलेख 1975 से लेकर 2018 तक के हैं। साथ ही इसमे उनके द्वारा किए गए दो महत्वपूर्ण आलेखों का अनुवाद भी है। इसके अतिरिक्त परिशिष्ट में  'पहल' सात(1976) में प्रकाशित उनके आलेख 'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र' पर हुए विवाद के पक्ष -विपक्ष में प्रकाशित रिपोर्टों और प्रस्तावों को प्रकाशित किया गया है, जिससे तत्कालीन समय के साहित्यिक राजनीति की कुछ झलक मिलती है।
    ये आलेख,जैसा कि हमने ऊपर कहा है, भले किसी सुनिश्चित योजना के तहत न हो मगर इनमे एक तारतम्यता है जो पुस्तक के नाम से प्रकट हो जाता है, 'आलोचना का लोकधर्म'। शाकिर जी के लिए आलोचना लोकधर्म है ; स्वभावतः उनकी दृष्टि लोकधर्मी है। वे प्रतिबद्ध लेखक हैं, जो मानते हैं कि साहित्य समाज के बेहतरी के लिए प्रेरित कर सकता है,करता है।यों तो अमूमन हर साहित्य में समाज को बेहतर बनाने का भाव निहित होता है मगर वर्गीय समझ और दृष्टिकोण के अभाव में अधिकतर महज सद्कामना भर रह जाते हैं। शाकिर अली की आलोचना दृष्टि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से पगी लोकतन्त्र, बहुलतावादी संस्कृति, भाषा की विविधता, श्रम की महत्ता का सम्मान करती है, और साहित्य में भी ऐसे लेखकों का पक्ष लेती है जिनका रचनाकर्म  इनसे संपृक्त हैं।
     इस पुस्तक में जिन कवियों के कविताओं की व्यवहारिक समीक्षा की गई है उनकी कविताओं की लोकधर्मिता पर सहमति-असहमति हो सकती है ; युवा आलोचक उमाशंकर परमार ने एक-दो कवियों की लोकधर्मिता पर प्रश्न उठाया भी है। हमारी पाठकीय सीमा यह है कि समीक्षित सभी कवियों के कविताओं को सम्यक रूप से अभी तक नहीं पढ़ पाए हैं।बहरहाल आलोचना में वाद-विवाद- संवाद होते रहे हैं, होते रहेंगे, यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है शाकिर अली की आलोचना दृष्टि स्पष्ट है।पुस्तक में जिन कवियों की कविताओं/संग्रह पर लिखा गया है वे हैं- कमलेश्वर साहू,अग्निशेखर, त्रिलोक महावर, केशव तिवारी, मोहन डहेरिया, हरिओम राजोरिया, रूपेंद्र पटेल, संजीव बख्शी, सुधीर सक्सेना, माताचारण मिश्र , चिरंजीव दास । इनमे से अधिकांश की अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है।लोक जीवन से जुड़े इन कवियों के अलग-अलग रंग हैं, परिवेश हैं, शैलियां हैं। शाकिर जी इनके काव्यगत विशेषताओं के साथ-साथ व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलुओं का भी विश्लेषण करते जाते हैं।
   गद्य आलोचना मे कुछ सैद्धांतिक निबन्ध हैं तो कुछ पुस्तक समीक्षा और व्यक्ति चित्र। चाहे काव्य आलोचना हो या गद्य आलोचना शाकिर अली की पद्धति संस्मरणात्मक ढंग से शुरू होती है। वे पहले समीक्षित कवि/लेखक से सम्बंधित अपने संस्मरण सुनाते चलते हैं, जिससे दोनों के व्यक्तित्व के कई पहलू उजागर होते हैं। इसके बाद वे कथ्य में प्रवेश करते हैं। संकलित आलेख मुख्यतः मंडनात्मक हैं, विवादी स्वर कम हैं। एक जगह विजेंद्र जी के निबन्ध 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता' के विश्लेषण के संदर्भ में  उन्होंने लिखा है " भारतीय चित्त में निर्माण में उर्दू भाषा एवं साहित्य की महती भूमिका का जिक्र करना भूल जाते हैं"। बहुधा यह देखा गया है कि जो उर्दू साहित्य को व्यापक हिंदी साहित्य का अंग समझते हैं वे भी हिंदी साहित्य का इतिहास अथवा  साहित्य की चेतना के निर्माण और साहित्य की प्रवृत्तियों में उसका उल्लेख नहीं करतें।बच्चन सिंह जी ने 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' में कुछ हद तक इसे किया है। इस कार्य को और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
   असहमति का एक दूसरा स्वर 'युवा कविता :वाद-विवाद-सम्वाद: में है, जिसमे उन्होंने आलोचक विजय कुमार की ज्ञानोदय में प्रकाशित टिप्पणी 'कवित्त ही कवित्त' के कपितय मान्यताओं से असहमति जताई है। अपने आलेख में विजय जी ने नई पीढ़ी के कवियों की 'मौलिकता' पर प्रश्न उठाये थें, जिनका शाकिर जी ने प्रतिवाद किया है और दिखाया है कि नए कवियों में केवल 'नकल' नहीं है; कइयों ने अपनी अलग राह बनाई है।
   शाकिर जी के शुरुआती निबन्ध महत्वपूर्ण हैं, जिसमे उन्होंने  'आधुनिक भारत और नेहरू', 'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र', 'हरबर्ट मारक्यूज निषेधात्मक द्वंद्ववाद का दर्शन' 'वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य और हमारे काम' निबन्ध लिखे हैं या कॉडवेल की पुस्तक 'इल्यूजन एंड रियलटी' के प्रथम अध्याय 'बर्थ ऑफ पोएट्री' का 'कविता का जन्म' शीर्षक से संक्षिप्त अनुवाद किया है।'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र' में उन्होंने  मार्क्सवादी दृष्टि से भारतीय इतिहास में सामन्तवाद की पूंजीवाद तक की यात्रा और उसमें जाति की भूमिका को संक्षिप्त में रेखाँकित किया है।इसमे उचित ही सामंती अवशेष के खात्मे को जाति उन्मूलन के बिना संभव न हो सकने पर बल दिया गया है।एक समय यह सोचा जाता रहा कि पूंजीवाद के प्रसार से जाति का वर्ग में रूपांतरण होता चला जाएगा मगर यह  नहीं हो सका है और वह नए-नए चेहरों में प्रकट हो रही है।इसके लिए द्वंद्वात्मक अध्ययन के साथ जाति उन्मूलन की नई रणनीति की तलाश की आवश्यकता है।
  'आधुनिक भारत और नेहरू' में आधुनिक भारत के निर्माण में नेहरू जी के योगदान को रेखांकित करते हुए  'राष्ट्रभाषा की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने' में उनकी भूल को भी दिखाया गया है।' हरबर्ट मारक्यूज निषेधात्मक द्वंद्ववाद का दर्शन' में मारक्यूज के निषेधात्मक द्वंद्ववाद का खंडन किया गया है। यह दर्शन नव वामपंथ ने नाम पर "कला चिंतन में व्यतिवादी निराशा का ही राजनैतिक-दार्शनिकीकरण है, जो मार्क्स -पूर्व की मृत बुर्जुआ विचारधाराओं को ही ढोता है"। 'रंगीन साहित्य बनाम स्वस्थ साहित्य' की समस्या आज भी बनी हुई है। रंगीन साहित्य का स्थान आज बहुत हद तक दृश्य चैनलों ने ले लिया है, मगर काम वही है "रंगीन साहित्य के लिए वह नशीली दवाओं की तरह आदी हो जाता है। इस प्रकार उसे वर्तमान आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक तनावों से मुक्ति पाने का रास्ता सरलता से उपलब्ध रंगीन व्यवसायिक साहित्य उसे मनोरंजन व समय काटने के साधन के रूप में स्वीकार्य हो जाता है"।
 ' डॉ प्रमोद वर्मा की स्मृति में' में प्रमोद जी का आत्मीय स्मरण है साथ ही उनके रचनाकर्म के कुछ पहलुओं का जिक्र है। इसी तरह 'परंपरा की अनवरत खोज का नाम है : विष्णु चन्द्र शर्मा' में विष्णु जी के लोकधर्मी दृष्टि से किए गए निराला, मुक्तिबोध, ग़ालिब,रवीन्द्रनाथ आदि के विश्लेषण का उल्लेख है। लोकधर्मी कवि-आलोचक विजेंद्र जी के निबंध 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता' के बहाने सौंदर्य के वस्तुगत आधार तथा हिंदी साहित्य के इतिहास में लोकवादी सौंदर्य दृष्टि की विजेंद्र जी की पड़ताल की विवेचना है। ध्यातव्य है की विजेंद्र जी सौंदर्यशास्त्र पर लगातार लिखते रहे हैं।मार्क्सवादी आलोचकों ने सौंदर्य के आत्मगत आधार के बरक्स वस्तुगत आधार की प्रतिष्ठा की है। सौंदर्य दृष्टि दोनों के द्वंद्वात्मकता में है। विजेंद्र जी इस चिंतन को आगे बढ़ाते हैं।
    'ठाकुर का कुआँ :प्रेमचन्द, एक विमर्श' में प्रेमचन्द जी की चर्चित कहानी 'ठाकुर का कुआँ' के विश्लेषण द्वारा प्रेमचन्द की दलितों के प्रति सहानुभूति और तत्कालीन सामाजिक संरचना में उनकी निम्न स्थिति को दिखाया गया है। प्रेमचंद ने इस कहानी में स्पष्ट रूप से सवर्णवाद और सामंती सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की है। उनकी  'कफ़न', 'पूस की रात', आदि कहानियों से इसे जोड़कर देखने से स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। परिस्थितियों से विद्रोह के अलावा परिस्थियों के भयावहता का चित्रण का भी अपना महत्व होता है। शाकिर जी ने उचित ही कहा है कि कहानी में हरदम  'हीरो' की तलाश उचित नहीं है।
   'भारत मे अंग्रेजी राज(प.सुंदरलाल) का महत्त्व' आलेख महत्वपूर्ण है। 1929 में प्रकाशित यह पुस्तक भारत मे अंग्रेजी राज की 'प्रगतिशीलता' के भ्रम को तोड़ती है। यह पुस्तक अंग्रेजो द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को नष्ट करने तथा समावेशी संस्कृति को भेदकर फुट डालो और शासन करो की नीति के तहत वैमनस्यपूर्ण इतिहासबोध पैदा करने के षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है। डॉ रामविलास शर्मा ने भी कई जगह इस पुस्तक का जिक्र किया है। शाकिर अली जी ने उचित ही इस पुस्तक का मण्डन किया है।
      'डॉ राजेश्वर सक्सेना :व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म' में प्रसिद्ध आलोचक राजेश्वर सक्सेना जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन है। डॉ सक्सेना छत्तीसगढ़ क्षेत्र से समर्थ मार्क्सवादी आलोचक हैं। मार्क्सवाद की सैद्धांतिकी और उत्तर आधुनिकता पर उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके कार्यों को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उनकी पुस्तकों की उपलब्धता आसान बनाने तथा उनके योगदान का मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। शाकिर जी अपने ढंग से यह कार्य कर रहे हैं, तथा आगे उन पर उनकी पुस्तक लिखने की योजना है। प्रस्तुत निबन्ध में संक्षिप्त रूप में ही बातें आ पायी हैं।
     डॉ रामविलास शर्मा पर अपने संक्षिप्त लेख में शाकिर जी ने डॉ शर्मा के लेखन के बहुत से आयामों को छू लिया है। डॉ शर्मा ने मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय साहित्य और परम्परा का बृहत मूल्यांकन किया है। वे ऋग्वेद से निराला तक भारतीय साहित्य के श्रमवादी  परंपरा को भी रेखाँकित करते हैं। इस क्रम वे भाववादी प्रवृत्तियों का तीव्रता से खण्डन करते हैं। डॉ शर्मा का कार्य बहुत विस्तृत है, यह निबन्ध केवल परिचयात्मक है। शाकिर अली डॉ शर्मा की आलोचना के कपितय पहलुओं से असहमत रहे हैं, जिसका जिक्र वे बातचीत में करते रहे हैं, हालांकि यहां उनका जिक्र नही है।वे प्रश्न लगभग वही हैं जो कई आलोचकों  द्वारा उठाये जाते रहे हैं; मसलन हिंदी-उर्दू के प्रश्न, मुक्तिबोध का मूल्यांकन, परम्परा का मूल्यांकन,नवजागरण आदि।महत्वपूर्ण यह है कि शाकिर जी समग्र निषेधवाद में नही जाते। उम्मीद है आगे वे इस पर और काम करेंगे।
     'ओम प्रकाश वाल्मीकि का चले जाना' में दलित कवि-आलोचक वाल्मीकि जी का आत्मीय स्मरण है। दलित साहित्य की प्रतिष्ठा में वाल्मीकि जी का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी आत्मकथा 'जूठन' काफी लोकप्रिय हुई है। शाकिर जी की शब्दो मे " 'जूठन' दलित चेतना के निर्माण का हिंदी साहित्य में एक दहकता हुआ दस्तावेज है"। आलेख में शाकिर जी ने उनकी कविताओं और कुछ कहानियों का विश्लेषण किया है।
  'यह मेरा लोक अनुरागी समय और हबीब तनवीर' आलेख तनवीर जी के महत्व को रेखांकित करता है। भारतीय नाट्य परंपरागत में हबीब तनवीर का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने रंगमंच में लोक नाट्य और लोक संस्कृति का सफल प्रयोग कर एक प्रतिमान स्थापित किया। शाकिर जी ने नाट्य वर्कशाप में उनके साथ गुजारे समय और उनके नाट्य कौशल का रोचक वर्णन किया है।इस क्रम में वे अपने बचपन के दिनों के संस्मरण में तत्कालीन समावेशी लोक परम्परा का वर्णन किया है।
     'यात्रा से पहले यात्रा' की समीक्षा में प्रभाकर चौबे जी की रचनाधर्मिता और व्यक्तित्व का चित्रण भी है। इस पुस्तक में लोकसंस्कृति और लोकाचार का जीवंत चित्रण है।परिवेश बुन्देलखण्ड का है मगर इसमे सभी क्षेत्र के पाठकों को अपनी संस्कृति से जोड़ देने की क्षमता है।
     सुधीर सक्सेना जी पर दो आलेख हैं जिनमे उनके व्यक्तिव और कृतित्व का मूल्यांकन है।सुधीर जी चर्चित पत्रकार और कवि हैं; साथ ही उनमे यायावरी प्रवृत्ति भी है जिसके कारण वे देश-विदेश की यात्रा करते रहे हैं। इन यात्राओं ने उनकी कविता को समृद्ध किया है और उसमें एक वैश्विक परिदृश्य उपस्थित किया है।लेखक का  सुधीर जी से लंबा संपर्क और आत्मीयता रही है, जिसकी बानगी इस आलेख में है।
      अनुवाद खण्ड में दो महत्वपूर्ण आलेख तथा सुकान्त भट्टाचार्य की एक बंगाली कविता 'सिगरेट' का हिंदी अनुवाद है। प्रसंगवश इधर शाकिर जी बंगला कविताओं का लगातार अनुवाद कर रहे हैं जो 'दुनिया इन दिनों' मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रही हैं। पहला अनुवाद प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक क्रिस्टोफर कॉडवेल की पुस्तक 'इल्यूजन एंड रियलटी' के प्रथम अध्याय 'बर्थ ऑफ पोइट्री' का 'कविता का जन्म' शीर्षक से संक्षिप्त अनुवाद है। कॉडवेल की यह पुस्तक  आलोचना जगत में काफी चर्चित रही है और कविता के यथार्थवादी समझ के लिए जरूरी समझी जाती रही है। शाकिर जी की पूरी पुस्तक का अनुवाद करने की योजना रही है, जिसे वे अभी तक पूरा नही कर पाये हैं। उम्मीद है आगे वे इस काम को पूरा करेंगे।हालांकि भगवान सिंह जी ने इस पुस्तक का अनुवाद किया है।
   दूसरा अनुवाद 'भारतीय मुसलमान : सार्थक भूमिका की तलाश' ए. रहमान के अंग्रेजी आलेख का अनुवाद है। आलेख में रहमान जी ने भारतीय मुसलमानों के वैश्विक संदर्भ में वैचारिक विकास और अंतर्विरोध, संस्कृति और सभ्यता में उनकी देन तथा वर्तमान की चुनौतियों के लिए यथार्थवादी  दृष्टि के विकास पर बल दिया है।
 पुस्तक में 'आशीर्वचन' और 'भूमिका' के रूप में दो महत्वपूर्ण आलेख हैं। 'आशीर्वचन' में राजेश्वर सक्सेना जी ने अपने और शाकिर जी के वैचारिक यात्रा का उल्लेख किया है, तथा लोहियावाद के  'ज्ञान के अराजकतावादी दृष्टिकोण' का खंडन किया है। आगे उन्होंने शाकिर जी के कुछ आलेखों का विश्लेषण किया है। 'भूमिका' में युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने समग्र आलेखों का लोकवादी दृष्टि से विवेचन किया है और इसे उचित ही 'अस्मिता में संदर्भ में संतुलित लोकधर्म' कहा है।
   इस तरह 'आलोचना का लोकधर्म' शाकिर जी आलोचक रूप का प्रकटीकरण है।हम कह आये हैं कि यह उनके अलोचनाकर्म का एक पहलू भर है; उनके अध्ययन की सीमा काफी विस्तृत है जिसे अभी लिखा जाना है। उन्होंने शुरुआत कर दी है,उम्मीद कर सकते हैं कि आगे वे हिंदी के लोकधर्मी आलोचना और चिंतन को समृद्ध करेंगे।

श्री शाकिर अली अब दिवंगत हैं, नवम्बर 2021में उनका आकस्मिक निधन हो गया

कृति- आलोचना का लोकधर्म
लेखक- शाकिर अली
प्रकाशन- उद्भावना, गाजियाबाद
मूल्य- 200/ (पेपर बैक)
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●, कवर्धा (छ. ग.)

सोमवार, 14 अगस्त 2023

चार खंडों का आत्मकथात्मक उपन्यास - लेकिन इतना ही सच नहीं!

 

डॉ. परदेशीराम वर्मा

    एक प्रसिद्ध कहावत है आजमाये को आजमाना मूर्खता है। समाज की अव्यवस्था, शासन में फैले भ्रष्टाचार, धर्म क्षेत्र में पसर रहे व्यापारिक ढंग-रंग, प्रगति के शोर के बीच ऊंच नीच की छबियाँ , समता के उद्घोष का उपहास उड़ाता विषम वर्तमान और हताशा, उन्माद, जड़ता से पी़डित नई पीढ़ी के सम्बन्ध में प्रायः हम उपन्यास कहानी, कविता पढ़ते हैं।
    दूसरों के दुख को जान और सुनकर शब्दों में पिरोने वाले बड़े साहित्यकार अपने वर्ग से उपर उठकर दलितों आदिवासियों पर भी प्रभावी लेखन कर यश प्राप्त करते हैं। लेकिन आज भी आदिवासियों के बीच से निकलकर कम ही लोग धीरज के साथ शब्दों की दुनियाँ में आकर पहचान ही नहीं बनाते बल्कि एक मानक भी बनाते हैं। इन दिनों एक ऐसे ही रचनाकार ने मुझे चार खंडों के जीवनी परक उपन्यास से प्रभावित किया है।
    वे हैं डा. सुखनंदन धुर्वे। बिलासपुर जिले के एक छोटे से गाँव में जन्मे सुखनंदन नंदन नाम से लेखन करते हैं। वे पिछले वर्ष ही केन्द्रीय विद्यालय धमतरी के प्राचार्य पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर मुक्त हुए हैं। कविता कहानी लेखन की निंरतंरता बनाए रखते हुए नंदन ने केन्द्रीय विद्यालयों में तबादलों की भार सहते हुए आगे की यात्रा की।
    अंततः अति तबादले और अस्त व्यस्त दिनचर्या से आजिज आकर नंदन ने लेखन के लिए स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर रायपुर में घर बना लिया। उसने एल. एल. बी. सम्भवतः इसीलिए किया था कि बावन तिरपन की जवान उम्र में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति हो तो रोजगार का कोई सुविधाजनक विकल्प भी हो।
    वे अब रायपुर में वकालत करते हैं और भिड़कर लेखन करते हैं। बिलासपुुर जिले के गाँव नगपुरा में 05 अक्टूबर 1969 को आदिवासी परिवार में जन्में नंदन की रचनाएं कथादेश, आकंठ, असुविधा जैसी पत्रिकाओं में छपती रही हैं। समकालीन कविता काव्य संकलन का उन्होंने संपादन भी किया है।
    दैनिक लेाकसदन समाचार पत्र में वे झांपी नामक छत्तीसगढ़ी विशेष पृष्ठ का साप्ताहिक संपादक कार्य भी सम्हलाते हैं। मूल रूप से वापंथी नंदन जनवादी लेखक संघ से भी सतत जुड़े रहे हैं। देश के विभिन्न प्रान्तों में वे केन्द्रीय विद्यालय के शिक्षक के रूप में गए । नागालैंड, मिजोहिल्स, मेघालय, मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्र, झाबुआ, छत्तीसगढ़ के धुर आदिवासी जिला दंतेवाड़ा में वे सेवा देकर धमतरी जैसे चातर राज में आए और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के संकल्प पर अमल  करते हुए स्वतंत्र हो गए । नंदन ने आत्मकथात्मक उपन्यास के एक हजार पृष्ठों को डूबकर चार खंडों में लिखा है।
    हर खंड को एक नाम भी दिया है। अंकुरण, पल्लवन, पुष्पन और प्रसरण। प्रसरण चौथा खंड है। चौथे खंड को समाप्त करने पर ही मैने शीर्षक पर ध्यान दिया। पुस्तक “लेकिन इतना ही सच नहीं” शीर्षक से प्रकाशित है। सचमुच मुझे एक हजार पृष्ठ पढ़कर लगा कि पांचवें खंड से ही कथा की सही शुरूवात हो सकती है। चारों खंडों में नंदन ने गरीब आदिवासी घर में अपने जन्म, किसी तरह श्रमिक पिता और जिद्दी माँ की छाया में रहकर कठिन स्थितियों में की गई पढ़ाई। अभाव के बावजूद खुश रहकर हर परिस्थिति से लड़ते हुए आगे बढ़ने का हौसला, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और पी. एच. डी. की डिग्री। केन्द्रीय विद्यालय में नौकरी। नौकरी के दौरान होने वाली परेशानी। निराधार तबादले। तरक्की के बंद रास्ते, विवाह, घर-गृहस्थी। गरीब परिजनों के बीच अपेक्षाकृत थोड़ी सी सम्पन्नता के कारण दाता बनने की कठिन भूमिका। स्वजातीय लड़की देखकर विवाह करने के फैसले से आहत, जिद्दी माँ, ईमानदार और हिम्मती पिता। सीधी सादी जीवन संगिनी, साथ देने वाले सहयोगी और षड़यंत्रकारी विभागीय साथी। बेहद ऊबाऊ, दूरदराज की यात्राएँ। अनजानी सी जगहों में पदस्थापनाएँ। संकटो से निजी कौशल से उबार और कामयाबी का आस्वाद लेखन इन चार खंडों में है। चारों खंड पढ़ने के लिए पाठक को सम्मोहित करते हैं। नंदन के पास आरूग भाषा है। छत्तीसगढ़ी का शब्द है आरूग।
    प्रख्यात कलाकार देवदास बंजारे की मेरे द्वारा लिखित जीवनी का शीर्षक है आरूग । उस जीवनी को मध्यप्रदेश शासन का माधवराव सप्रे सम्मान प्राप्त है। आरूग का अर्थ है पवित्र। अनछुवा, बेदाग । यही बेदाग आरूग भाषा नंदन के पास है । नंदन के पास कहने को बड़ी कथा है। यह किताब तो केवल भूमिका है। उसने जीवन ही ऐसा जिया है कि जीवन भर उसे लिखने के लिए विषय की कभी कमी शायद ही हो। नंदन ने जीवनी में यह बताया है कि वैचारिक दृष्टि से वामपंथी होते हुए भी किस तरह एक व्यक्ति समाज के आगे झुकने पर मजबूर हो जाता है। पाखंड से संचालित कर्मकांड, त्याग योग्य झूठी परंपरा, दिखावा, धर्मन्धता से उबर नहीं पाता।
    एक वैचारिक व्यक्ति या तो समाज परिवार से लड़कर अकेला हो जाय या इमानदारी का रास्ता छोड़कर वैचारिक साथियों के बीच ऊपहास का पात्र बने। उगलत-निगलत पीर धनेरी इसी स्थिति को कहते हैं। नंदन ने देश भर में विभिन्न प्रांतों में नौकरी की। पूरी साहस के साथ उसने स्थितियों का सामना किया। बाबरी मस्जिद को टूटते हुए देखकर उसके भीतर भी बहुत कुछ टूट सा गया। भाई चारे की गंगा-जमुनी तहजीब वाला यह सुन्दर देश धीर धीरे किस तरह धर्मान्धता की जकड़ में आकर हांफने लगा यह भी उसने महसूस किया। देश का कोई भी प्रान्त हो हर कहीं अंध क्षेत्रीयता, जातीयता, धर्म में उसका बँटा हुआ डरावना स्वाभाव हर कहीं उद्वेलित करता है । दिनकर की पंक्ति यहां याद आती है प्यारे स्वदेश खाली आऊँ या हाथों में तलवार धरूं।
    अब नंदन को जमकर लिखने का पूरा अवसर है उसने आर्थिक दृष्टि से मजबूत स्थिति बना लेने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लिया। चारों खंडों में छत्तीसगढ़ की पंरपरा, आदिवासियों की पंरपरा का खूब वर्णन है। हर छत्तीसगढ़ी व्यक्ति को दीगर प्रान्त में अपेक्षाकृत अधिक चतुर व्यक्तियों, समाजों का अतिक्रमण डराता है। छत्तीसगढ़ का न कोई देवता बड़ा है, न इसकी किसी नदीे को दर्जा प्राप्त है । न यहाँ का श्रम सराहनीय है, न छत्तीसगढ़ी सरलता को प्रशंसा की दृष्टि से देश देखता है।
    गहरी निराशा के बीच लिखने पढ़ने वाले वे लोग जो वामपंथ पर आस्था रखते हैं अपनी बात अपने ढंग से कहते हैं ओर ऐलान करते हैं लेकिन सचमुच में इतना ही सच नहीं है। गैर छत्तीसग़ढियों के द्वारा छत्तीसगढ़ को लूटने, धमकाने, डराने और उनका अकसर, सुख, सम्मान छीन लेने का लंबा इतिहास है। लेकिन अब राजनीति का क्षेत्र भी निरापद नहीं रहा। जो लोग क्षेत्रीयता की बात करते हुए सत्ता में आते हैं वे छत्तीसगढ़ी भी स्थायित्व और वर्चस्व तथा जीत के लिए कारगर, विजय मंत्र के जानकार बाहुबली बाहरी लोगों को लठैती कराने मे हिचकते नहीं  सत्ता अपने ढंग से अपना चेहरा चमकाती है लेकिन कमलेश्वर ने यूं ही नहीं कहा है कि सत्ता अपनी मृत्यु नहीं देख पाती। सत्ता अपनी मृत्यु इसलिए नही देख पाती क्योंकि उसे पता ही नहीं है कि “इतना ही सच नहीं है।” सच्चाई ऐसी है जिसका खुलासा धीरे धीरे ही हो सकता है। जो सच्चाई को जानते हैं वे उसे बता नहीं पाते जो नहीं जानते वे झूठ को सच की तरह परोस कर अपनी कारीगरी पर इतराते र्हैं।
    नंदन के समकालीन साथी कविता कहानी उपन्यास लिखने में पूरे मन से लगे हैं। ऐसे समय में नंदन नें जीवनीपरक उपन्यास लिखकर एक लोकप्रिय और पठनीय विधा को समृद्ध करने का बीड़ा उठाया। इन चारों खंडों में पहला खंड बचपन पर दूसरा खंड, नौकरी मिलने और नौकर हो जाने के बाद की परेशानियों पर, तीसरा खंड नौकरी से बंधे रचनाकार के धुवांधार तबादले की धूप पर और चौंथा खंड समकालीन राजनीति, छत्तीसगढ़ की वर्तमान स्थिति, दक्षीणपंथी राजनीतिक चोचले और पिसते हुए गरीब समाज पर है।
    राजनीति ने किस तरह आम आदमी को केवल इस्तमाल की वस्तु बनाकर रख दिया इस पर गहरी टिप्पणियाँ इस खंड में है। नंदन का यह पहला साहसिक रचनात्मक प्रयास प्रशंसनीय है। यह आम छत्तीसगढ़ी या कहिए हिन्दुस्तानी नौजवान की कहानी है। नंदन ने बहुरंगे समाज और भलाई से भरे अपने आसपास के लोगों को देखा है तो अपनी कुंठा और गलत सोच के कारण लगातार पी़डित करने वाले करीबी लोगों के गुण दोष को भी खूब परखा है।
    मनुष्य न किसी जाति और परिवार में जन्म लेने के लिए स्वतंत्र है। न ही वह जिस परिवार में जन्म लेता है उससे बिलग होकर स्वतंत्र ढंग से विकसित होने के लिए मुक्त हैं। उसे घुट घुट कर अपने चारों ओर के दबावों के बीच ही जीना और विकसित होना पड़ता है यह नंदन के इस चार खंडों वाली कथा पढ़कर हम बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।
    सर्वेश्वर जी ने लिखा है -
मैं सारी जिन्दगी सहारे की
तलाश में भटकता रहा
और अंत में मुझे अपनी हथेलियों से
बेहतर जगह दूसरी नहीं मिली ।
    अपने पुरूषार्थ से बिगड़ी बना लेने वालों पर गर्व करने का अवसर इस कथा से हम पाते हैं ।
    बहुत अधिक ब्यौरों के कारण ये चार खंड बने हैं। ब्यौरों और बारीक विवरणों से बचकर इस कथा को दो खंडों में भी समेटा जा सकता था। मगर मन भरने की बात है। प्रेमचंद ने लिखा है कोई रचना रचयिता के मनोभाओं का, उसके चरित्र का, उसके जीवनादर्श का आईना होती है।
    रचनाकार खुद से मुक्त होकर रचना नहीं कर सकता वह अपनी रचनाओं में ठीक उसी तरह रहता है जिस तरह मेंहदी के हरे पत्तों में रंग छुपा होता है।
अभी हमें नंदन से काफी आशाएँ हैं।
*********
आलोचक - डा. परदेशीराम वर्मा
पुस्तक - लेकिन इतना ही सच नहीं
चार खंड
मूल्य 600 प्रत्येक
प्रकाशन:
रूद्रादित्य प्रकाशन प्रयागराज
लेखक डा. सुखनंदन सिंह धुर्वे नंदन

बुधवार, 31 मई 2023

राजनीति के मायाजाल को उजागर करती कविताएं…

 

         बुद्धिलाल पाल की कविताएं अपने समकालीन कवियों के बीच एक अलग ही अंदाज और मिजाज के साथ मौजूद है। जिसका अपना ही एक राजनैतिक स्टैण्ड और भाषिक मुहावरा है। इनकी कई कविताओं में राजा को प्रतीक बनाकर राजनीति का जो चरित्र प्रस्तुत किया गया है। उनसे उन राजनीतिक प्रवृत्तियों की शिनाख्त होती है। जिससे वर्तमान राजनीति का स्वरूप निर्मित है। इन कविताओं से उन राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जटिलतों को भी समझने की दृष्टि मिलती है। जिसके माध्यम से वर्तमान राजनीति के चेहरे को साफ-साफ देखा जा सकता है। उसका सिंहावलोकन किया जा सकता है। यह कविताएं इस अंधेरे में उस ज्योति बिम्ब की तरह है। जो राजनीति में छिपे उसके मायाजाल को बहुत ही तीव्रता और सामर्थ्य के साथ उद्घाटित करती है - 'राजा यानि/राजा का प्रजामुख/सुख यानि/जय-जयकार के नारे/जय यानि/राजा का घमंड/घमंड यानि/जनता से व्यभिचार/व्यभिचार यानि/राजा का न्याय!
'वह राजा है/जादूगर की तरह/रस्सी पर चढ़ता है/हमें दिखाई नहीं देता है/दिखता है/सिर्फ उसका मायाजाल/उसके रोने/चीखने, चिल्लाने की/आवाज सुनाई देती है/जैसे कि वह/जनता के लिये/बहुत ही खतरे में हैं!'
'राजा का धनबल, बाहुबल/से सराबोर होता है/कूटनीति उसके चरित्र में होती है/राजा से उपजे/बाहुबल की पीड़ा/जनता हमेशा सहती है/राजा का खजाना/कुबेर का खजाना होना चाहता/धनपतियों को संरक्षण देता है/राजा की कूटनीति/जनता को छलना/राजा का यश फैलाना होती है।'
              यह कविताएं राजनीति की कूटनीति और संवेदनहीनता को जिस सहजता से पकड़ती और व्यक्त करती है उसका असर सीधा पाठक के हृदय पर होता है। यह कविताएं पाठ के स्तर पर अत्यंत संप्रेषणीय होने के बावजूद किसी मधुमति भूमिका में नहीं ले जाती न कोई रोमानी आश्वासन देती है बल्कि भीतर से बैचेन कर देती है। यह बैचेनी राजनीतिक विसंगतियों, विडम्बनाओं, जटिलताओं से उत्पन्न तनाव, विक्षोभ, अंतर्व्यथा और खीझ के रूप में कविता की अंतवस्तु में उभरती है। जो सत्ता के मंतव्य को स्पष्ट करते हुए उन राजकीय सम्मानों की पोल खोलती है जो वस्तुतः नैतिक दायित्व से विमुख कर दरबारी संस्कृति का पोषण करती है - 'दिल अवसाद से/भर जाता है/उन राजकीय सम्मानों से/जिसमें एक दरबारी/और बढ़ जाता है/राजा के रागदरबारियों में/और यह राजा के लिए/एक आर्दश स्थिति/राजा के डंका सी/राजा का ढोल पीटती!'
               दरअसल यह एक ईमानदार कवि के भीतर की बैचनी है जो अपने समय के संकट से लगातार जूझ रहा है और अपनी भूमिका के निर्वाह की निरर्थकता की अनुभूति में उबल रहा है। किन्तु इनकी कविता में कहीं भी कातरता नहीं है जो काल्पनिक या रोमांटिक यथार्थवादियों में मिलती है। वे अपनी प्रतिबद्धता को लेकर किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। कवि की यही निष्ठा उनकी ‘निष्ठा’ शीर्षक कविता में उभरकर आती है- 'राजा पर संकट हो तो/जनता व्यथित होती है/जनता राजा के/हर दुख में शामिल होती है/जनता राजा के लिए/हमेशा ही दुआ करती है/पर क्या राजा भी कभी/जनता के लिए ऐसा ही होता है ?'
                यहां कवि की सबसे बड़ी चिंता इस सत्ताचक्र के बीच उस आम आदमी की प्रासंगिकता को लेकर है। जिसने कभी कोई सुख नहीं भोगा। नून, तेल, लकड़ी के लिए जो जीवन भर कोल्हू के बैल की तरह खटते रहे, जिनकी आंखें मृत्यु तक रोटी, लंगोटी के लिए ही भटकती रही है। यह चिन्ता ही इन कविताओं का मूल स्वभाव है। जिसे वे सीधे अपनी कविता में व्यक्त करते हैं- 'कबिलाई युद्धों में/कबीले के सरदार/राजा होते हैं/जातियों में उनके सामंत/राजा होते हैं/धर्मों में उनके महानायक/राजा होते हैं/इन सबके बीच/गरीब आदमी/कहीं नहीं होता।'
'जिनकी बांहों में/रात की रंगरैलियों में/पूरा शहर सिसकता रहा/जिनकी प्लेटों में/शेर का मांस तक/सजता रहा/जिनके कटोरों में/सिर्फ मदिरा का यौवन ही छलकता रहा/वे ही/हमारी किस्मत लिखते रहे/बार-बार/हर बार।'
               कवि यहां राजनीतिक यथार्थ की वास्तविकता को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है। इसीलिए वह तथ्यों को कला के आवरण में छुपाने की कोशिश नहीं करता। उसकी संवेदनशीलता जिस विचार से जन्म लेती है। वह उसके प्रति पूरी तरह आश्वस्त है। यही कारण है कि इन कविताओं में ईमानदारी की महक को सहजता से महसूस किया जा सकता है।
              इस संग्रह की कविताएं जिस मानवीय जमीन से सृजित है वह बहुत ही उर्वर है। कवि की यही मानवीयता इतिहास के उन अभिजात्य मिथकों तोड़ने का प्रयास करती है। जिसने राजा की दुनिया को ही स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई। वे राजा की दुनिया कविता में कहते हैं-  'देवता/कभी भी नहीं रच सके/आदमी की दुनिया/उन्होंने/हमेशा ही रची एक राजा कीदुनिया/ इन्द्रलोक के/वैभवशाली सुख के लिये/वे करते रहे इंद्र की रक्षा/रखते रहे राजा को जिन्दा।'
             वह राजा जिसकी मूल व्यवस्था समर्थों की रक्षा करना और वर्चस्ववादी संस्कृति का पोषण ही रहा है। जिस व्यवस्था में सदा से ही जनता और जनता के हित नदारत रहे हैं। जहां जाति, धर्म, ईश्वर, पाखण्ड और भय का विस्तार वस्तुतः उसकी सत्ता के विस्तार के औजार के रूप में ही प्रयोग हुए है - 'वे कोई सूरमा नहीं थे/ऐसा कहने के लिए/उनके पास कुछ था भी नहीं/उनके पास थे/-ललचाने वाले दानों के कुछ चुग्गे/कुछ हथकण्डें कुछ हथकड़ियां/कुछ अनर्थ वाले भय/इन्हीं को उन्होंने/खूब फैलाया/और हमेशा ही अविजित रहे/किसी सूरमा की तरह।'
              इन्हीं विसंगतियों से निर्मित वर्तमान राजनीति आज विकृत और कुंठित होकर चारों तरफ बजबजा रही है। राजनीतिक आकांक्षायें आज इतनी अराजक, अमानवीय और क्रूर हो गई है कि कवि को कहना पड़ता है- 'राजा/और राक्षस में/फर्क सिर्फ इतना/राक्षस के सींग/दिखाई देते हैं/राजा के नहीं'
                 कवि की वैश्विक दृष्टि राजा की इसी प्रवृत्ति को वैश्विक स्तर पर भी देखती हैै। जिसका नया चेहरा नव साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद के रूप में आज हमारे समाने है। और वह नया राजा अमेरिका है। जो भूमंडलीयकरण, बाजारीकरण, उदारीकरण और सैन्यीकरण जैसे रास्तों से संपूर्ण विश्व को अपना उपनिवेश बनाना बनाना चाहता है। बोसनिया, बेरूत,अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, फिलिस्तीन, यूक्रेन आदि की तबाही  इसका जीवंत उदाहरण है। जिसे ’नया राजा‘ कविता में कवि  व्यक्त करते हुए लिखता है- 'देखो, वो देखो/आंधी की तरह धूल उड़ाता/चला आ रहा है वह/बम धमाकों के साथ/मानवाधिकार की दुहाई देता/हम सबका/हमारी पूरी दुनिया का नया राजा/सात समुन्दर पार से/पूरे ठाठ-बाट से।'
                जिसकी दुनिया का सर्वमान्य नियम प्रतिस्पर्था है। जिसका चिंतन ज्यादा लाभ, ज्यादा शोषण है। जिसकी घोषणा इतिहास और विचार का अंत है। यानि एक नये जंगलराज की शुरूआत है। जिसमें चिड़िया, कबूतर और आदमी के लिए कोई जगह नहीं हैं। यह चिंता अगर कहीं है तो बुद्धिलाल पाल जैसे ईमानदार और संवेदनशील कवियों की कविताओं में जो वर्तमान राजनीति की अमानवीयता, बर्बरता, हिंसा और क्रूरता के बरअक्स मानवीय संवेदना का प्रतिसंसार रचते है। उस सन्नाटे को तोड़ते हैं। जो जीवन को मुर्दा और इस जगत को मरघट में तब्दील करती जा रही है। वे इन सभी विसंगतियों और विकृत प्रवृत्तियों पर नकेल कसते हुए कहते हैं- 'मर्द जो औरत को/दोयम दर्जे की नागरिकता देता है/सवर्ण जो दलित को घृणा की नजरों से देखता है/अमीर जो गरीबों का शोषण करते हैं/अतिधार्मिक व्यक्ति जो/पृथ्वी को जकड़कर बैठे हैं/इन सबके नाक में/नकेल जरूरी है।'
            क्योंकि इन विसंगतियों को दूर किये बगैर एक बेहतर दुनिया की परिकल्पना करना संभव नहीं है।  इन कविताओं के भीतर  कवि की संवेदना की जड़े बहुत गहरी है जो अंधेरे से रस ग्रहण कर अंधेरे के विरूद्ध कविता को मजबूती से खड़ी करती है।
              इस दृष्टि से बुद्धिलाल पाल की कविताएं अपनी साफ वैचारिक राजनीतिक दृष्टि और संश्लिष्ठ संरचना में अनूठी है। क्योंकि सरल, सहज भाषा में संश्लिष्ठ कहना उन्हीं कवियों के लिए संभव हो पाता है, जो यथार्थ की वास्तविकता को पूरी समग्रता में स्पष्टता के साथ देख पाते हैं तथा जिनकी संवेदना विषयवस्तु के साथ एकाकार हो पाती है। वे कविता में मितकथन के कलात्मक आदर्श को न केवल शब्दों में चरितार्थ करते हैं बल्कि तीव्र व्यंग्यात्मक विरोध द्वारा जीवन के उच्चतर मानवीय मूल्यों की स्थापना भी करते हैं। इन कविताओं में व्यंग्य की धार इतनी तेज है जो यथार्थ के तल को भेदते हुए आत्मा में चुभ जाती है। कविता की लय-ध्वनि और शब्दों का चुनाव कुछ इस प्रकार है कि एक के बाद एक पंक्ति अगली पंक्ति को बल प्रदान कर प्रतिध्वनित करती चलती है। जिससे कविता अंत तक पहुंचते-पहुंचते अपनी पूरी शक्ति अर्जित कर यथार्थ की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती नजर आती है।
             जहां आज कवि बाजार में बने रहने के लिए कविता के आकर्षक मेनेफेक्चरिंग में लगे हुये हैं या फिर यथार्थ को अमूर्त करते जा रहे हैं। ऐसे मुश्किल समय में बुद्धिलाल पाल की कविताओं को पढ़ना किसी रचनात्मक अनुभूति से गुजरने से कम नहीं है। जिन्हें न तो पिछड़ जाने की चिंता है, न ही खारिज या  बाजार से बाहर कर दिये जाने का भय। जो आज भी सहज सौन्दर्यता के साथ कविता को सक्रिय बनाये रखने की जिद में कायम है। यह कविताएं कविता का वह रूप है जो पाठक को किसी आनंद लोक की अनुभूति में निमग्न नहीं करती बल्कि उसका वैचारिक एवं बौद्धिक विकास कर सामाजिक, राजनैतिक परिवर्तन में अहम भूमिका अदा करती है।
             कवि प्रतीकों के माध्यम से अतीत से लेकर वर्तमान राजनीति की जिस सच्चाई को उजागर करना चाहता है। वह सच्चाई इतनी बड़ी है कि उसे एक-दो कविता में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसलिए कवि यहां अलग-अलग कविताओं के माध्यम से राजनीति के यथार्थ  का कोलाज रचता है। जो उसकी सच्चाई को खंड-खंड में प्रतिबिम्बित करती है। जो अपने भीतर दो दुनिया को समेटे हुए है। एक दुनिया राजा की है तो दूसरी सदियों से वंचित और शोषित जनता की। जिसके पक्ष में ये कविताएं प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते हुये विसंगतियों को उद्घाटित करने के साथ ही इतिहास और भविष्य कि प्रति विवेक संगत सजगता पैदा करती चलती है। क्योंकि कवि यह अच्छी तरह जानता है कि बुद्धिसंगत विवेक के निरंतर विकास के द्वारा ही इस भयावह दौर को अतिक्रमित किया जा सकता है।
              इस मायने में यह महत्वपूर्ण कविताएं है । इधर जिस तरह की स्वीकार्य, सुग्राह्य, सुपाच्य किस्म की कविताएं लिखी जा रही हैं। जो पढ़ने में तो अच्छी तो लगती है परंतु बदलाव के स्तर पर भीतर कोई बैचनी पैदा नहीं करती। या फिर यथार्थ को अपने कलात्मक शिल्प से ढंकने का प्रयास करती है। जी आंखों से गुजर जाती है दृश्य की तरह लेकिन भीतर कहीं ठहरती नहीं। उसे किसी हद तक यह कविताएं तोड़ने का प्रयास करती है।
              इस रूप में बुद्धिलाल पाल की कविताएं अपनी साफ वैचारिक राजनैतिक दृष्टि, जनता के साथ गहरी संपृक्ति रखने और सरलता का नया सौन्दर्यशास्त्र रचने वाली कविताएं है। जो इस भयावह समय की  जटिलताओ, विसंगतियों और अंतर्विरोधों के  यथार्थ को समझने की  दृष्टि  प्रदान करती हैं।
             - अंजन कुमार


आलोचना का लोकधर्म : आलोचना की लोकदृष्टि

अजय चन्द्रवंशी,
      बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी शाकिर अली जी कवि, आलोचक, एक्टिविस्ट कई रूपों में दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब मे मुझे उनका विद्यार्थी रूप सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है। ज्ञान की भूख और किताबों से उनका प्रेम, उनको निकट से जानने वाले ही जान सकते हैं। ऐसे कई मौके मैं जानता हूँ जब उन्होने एकमुश्त पचास से अधिक किताबें खरीदी हैं। वे कब किसी दुर्लभ या अल्पज्ञात पुस्तक अथवा आलेख की फोटोकॉपी आपको अपने झोले से निकालकर देंगे, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
     ज़ाहिर है पुस्तकों से उनका इतना प्रेम अध्ययन के प्रति उनकी रुचि के कारण हैं। वे खूब पढ़ते हैं और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उम्र के इस पड़ाव तक जितना गद्य उन्होंने लिखा है, उनके अध्ययन का दशांश भी नहीं है। वे चर्चाओं और बहस में ही जो बातें कहते हैं उसी को लिखते चले जाएं तो काफी सामग्री हो जाएगी।यह सुखद है कि वे अब इस तरफ ध्यान दे रहे हैं और लिख रहे हैं। बहरहाल 'आलोचना का लोकधर्म' से इसकी शुरुआत हो गई है।
'आलोचना का लोकधर्म' शाकिर जी की पहली आलोचना कृति है। अवश्य इसमे एक निश्चित योजना के तहत आलेख नहीं रखे गए हैं; बल्कि अब तक के उनके लिखे सभी आलेखों को एक साथ पुस्तकाकार दिया गया है। ये आलेख 1975 से लेकर 2018 तक के हैं। साथ ही इसमे उनके द्वारा किए गए दो महत्वपूर्ण आलेखों का अनुवाद भी है। इसके अतिरिक्त परिशिष्ट में  'पहल' सात(1976) में प्रकाशित उनके आलेख 'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र' पर हुए विवाद के पक्ष -विपक्ष में प्रकाशित रिपोर्टों और प्रस्तावों को प्रकाशित किया गया है, जिससे तत्कालीन समय के साहित्यिक राजनीति की कुछ झलक मिलती है।
      ये आलेख,जैसा कि हमने ऊपर कहा है, भले किसी सुनिश्चित योजना के तहत न हो मगर इनमे एक तारतम्यता है जो पुस्तक के नाम से प्रकट हो जाता है, 'आलोचना का लोकधर्म'। शाकिर जी के लिए आलोचना लोकधर्म है ; स्वभावतः उनकी दृष्टि लोकधर्मी है। वे प्रतिबद्ध लेखक हैं, जो मानते हैं कि साहित्य समाज के बेहतरी के लिए प्रेरित कर सकता है,करता है।यों तो अमूमन हर साहित्य में समाज को बेहतर बनाने का भाव निहित होता है मगर वर्गीय समझ और दृष्टिकोण के अभाव में अधिकतर महज सद्कामना भर रह जाते हैं। शाकिर अली की आलोचना दृष्टि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से पगी लोकतन्त्र, बहुलतावादी संस्कृति, भाषा की विविधता, श्रम की महत्ता का सम्मान करती है, और साहित्य में भी ऐसे लेखकों का पक्ष लेती है जिनका रचनाकर्म  इनसे संपृक्त हैं।
इस पुस्तक में जिन कवियों के कविताओं की व्यवहारिक समीक्षा की गई है उनकी कविताओं की लोकधर्मिता पर सहमति-असहमति हो सकती है ; युवा आलोचक उमाशंकर परमार ने एक-दो कवियों की लोकधर्मिता पर प्रश्न उठाया भी है। हमारी पाठकीय सीमा यह है कि समीक्षित सभी कवियों के कविताओं को सम्यक रूप से अभी तक नहीं पढ़ पाए हैं।बहरहाल आलोचना में वाद-विवाद- संवाद होते रहे हैं, होते रहेंगे, यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है शाकिर अली की आलोचना दृष्टि स्पष्ट है।पुस्तक में जिन कवियों की कविताओं/संग्रह पर लिखा गया है वे हैं- कमलेश्वर साहू,अग्निशेखर, त्रिलोक महावर, केशव तिवारी, मोहन डहेरिया, हरिओम राजोरिया, रूपेंद्र पटेल, संजीव बख्शी, सुधीर सक्सेना, माताचारण मिश्र , चिरंजीव दास । इनमे से अधिकांश की अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है।लोक जीवन से जुड़े इन कवियों के अलग-अलग रंग हैं, परिवेश हैं, शैलियां हैं। शाकिर जी इनके काव्यगत विशेषताओं के साथ-साथ व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलुओं का भी विश्लेषण करते जाते हैं।
      गद्य आलोचना मे कुछ सैद्धांतिक निबन्ध हैं तो कुछ पुस्तक समीक्षा और व्यक्ति चित्र। चाहे काव्य आलोचना हो या गद्य आलोचना शाकिर अली की पद्धति संस्मरणात्मक ढंग से शुरू होती है। वे पहले समीक्षित कवि/लेखक से सम्बंधित अपने संस्मरण सुनाते चलते हैं, जिससे दोनों के व्यक्तित्व के कई पहलू उजागर होते हैं। इसके बाद वे कथ्य में प्रवेश करते हैं। संकलित आलेख मुख्यतः मंडनात्मक हैं, विवादी स्वर कम हैं। एक जगह विजेंद्र जी के निबन्ध 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता' के विश्लेषण के संदर्भ में  उन्होंने लिखा है " भारतीय चित्त में निर्माण में उर्दू भाषा एवं साहित्य की महती भूमिका का जिक्र करना भूल जाते हैं"। बहुधा यह देखा गया है कि जो उर्दू साहित्य को व्यापक हिंदी साहित्य का अंग समझते हैं वे भी हिंदी साहित्य का इतिहास अथवा  साहित्य की चेतना के निर्माण और साहित्य की प्रवृत्तियों में उसका उल्लेख नहीं करतें।बच्चन सिंह जी ने 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' में कुछ हद तक इसे किया है। इस कार्य को और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
       असहमति का एक दूसरा स्वर 'युवा कविता :वाद-विवाद-सम्वाद: में है, जिसमे उन्होंने आलोचक विजय कुमार की ज्ञानोदय में प्रकाशित टिप्पणी 'कवित्त ही कवित्त' के कपितय मान्यताओं से असहमति जताई है। अपने आलेख में विजय जी ने नई पीढ़ी के कवियों की 'मौलिकता' पर प्रश्न उठाये थें, जिनका शाकिर जी ने प्रतिवाद किया है और दिखाया है कि नए कवियों में केवल 'नकल' नहीं है; कइयों ने अपनी अलग राह बनाई है।
शाकिर जी के शुरुआती निबन्ध महत्वपूर्ण हैं, जिसमे उन्होंने  'आधुनिक भारत और नेहरू', 'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र', 'हरबर्ट मारक्यूज निषेधात्मक द्वंद्ववाद का दर्शन' 'वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य और हमारे काम' निबन्ध लिखे हैं या कॉडवेल की पुस्तक 'इल्यूजन एंड रियलटी' के प्रथम अध्याय 'बर्थ ऑफ पोएट्री' का 'कविता का जन्म' शीर्षक से संक्षिप्त अनुवाद किया है।'वर्ण से लेकर वर्ग तक की यात्रा का समाजशास्त्र' में उन्होंने  मार्क्सवादी दृष्टि से भारतीय इतिहास में सामन्तवाद की पूंजीवाद तक की यात्रा और उसमें जाति की भूमिका को संक्षिप्त में रेखाँकित किया है।इसमे उचित ही सामंती अवशेष के खात्मे को जाति उन्मूलन के बिना संभव न हो सकने पर बल दिया गया है।एक समय यह सोचा जाता रहा कि पूंजीवाद के प्रसार से जाति का वर्ग में रूपांतरण होता चला जाएगा मगर यह  नहीं हो सका है और वह नए-नए चेहरों में प्रकट हो रही है।इसके लिए द्वंद्वात्मक अध्ययन के साथ जाति उन्मूलन की नई रणनीति की तलाश की आवश्यकता है।
       'आधुनिक भारत और नेहरू' में आधुनिक भारत के निर्माण में नेहरू जी के योगदान को रेखांकित करते हुए  'राष्ट्रभाषा की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने' में उनकी भूल को भी दिखाया गया है।' हरबर्ट मारक्यूज निषेधात्मक द्वंद्ववाद का दर्शन' में मारक्यूज के निषेधात्मक द्वंद्ववाद का खंडन किया गया है। यह दर्शन नव वामपंथ ने नाम पर "कला चिंतन में व्यतिवादी निराशा का ही राजनैतिक-दार्शनिकीकरण है, जो मार्क्स -पूर्व की मृत बुर्जुआ विचारधाराओं को ही ढोता है"। 'रंगीन साहित्य बनाम स्वस्थ साहित्य' की समस्या आज भी बनी हुई है। रंगीन साहित्य का स्थान आज बहुत हद तक दृश्य चैनलों ने ले लिया है, मगर काम वही है "रंगीन साहित्य के लिए वह नशीली दवाओं की तरह आदी हो जाता है। इस प्रकार उसे वर्तमान आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक तनावों से मुक्ति पाने का रास्ता सरलता से उपलब्ध रंगीन व्यवसायिक साहित्य उसे मनोरंजन व समय काटने के साधन के रूप में स्वीकार्य हो जाता है"।
       ' डॉ प्रमोद वर्मा की स्मृति में' में प्रमोद जी का आत्मीय स्मरण है साथ ही उनके रचनाकर्म के कुछ पहलुओं का जिक्र है। इसी तरह 'परंपरा की अनवरत खोज का नाम है : विष्णु चन्द्र शर्मा' में विष्णु जी के लोकधर्मी दृष्टि से किए गए निराला, मुक्तिबोध, ग़ालिब,रवीन्द्रनाथ आदि के विश्लेषण का उल्लेख है। लोकधर्मी कवि-आलोचक विजेंद्र जी के निबंध 'सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता' के बहाने सौंदर्य के वस्तुगत आधार तथा हिंदी साहित्य के इतिहास में लोकवादी सौंदर्य दृष्टि की विजेंद्र जी की पड़ताल की विवेचना है। ध्यातव्य है की विजेंद्र जी सौंदर्यशास्त्र पर लगातार लिखते रहे हैं।मार्क्सवादी आलोचकों ने सौंदर्य के आत्मगत आधार के बरक्स वस्तुगत आधार की प्रतिष्ठा की है। सौंदर्य दृष्टि दोनों के द्वंद्वात्मकता में है। विजेंद्र जी इस चिंतन को आगे बढ़ाते हैं।
'       ठाकुर का कुआँ :प्रेमचन्द, एक विमर्श' में प्रेमचन्द जी की चर्चित कहानी 'ठाकुर का कुआँ' के विश्लेषण द्वारा प्रेमचन्द की दलितों के प्रति सहानुभूति और तत्कालीन सामाजिक संरचना में उनकी निम्न स्थिति को दिखाया गया है। प्रेमचंद ने इस कहानी में स्पष्ट रूप से सवर्णवाद और सामंती सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की है। उनकी  'कफ़न', 'पूस की रात', आदि कहानियों से इसे जोड़कर देखने से स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। परिस्थितियों से विद्रोह के अलावा परिस्थियों के भयावहता का चित्रण का भी अपना महत्व होता है। शाकिर जी ने उचित ही कहा है कि कहानी में हरदम  'हीरो' की तलाश उचित नहीं है।
'भारत मे अंग्रेजी राज(प.सुंदरलाल) का महत्त्व' आलेख महत्वपूर्ण है। 1929 में प्रकाशित यह पुस्तक भारत मे अंग्रेजी राज की 'प्रगतिशीलता' के भ्रम को तोड़ती है। यह पुस्तक अंग्रेजो द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को नष्ट करने तथा समावेशी संस्कृति को भेदकर फुट डालो और शासन करो की नीति के तहत वैमनस्यपूर्ण इतिहासबोध पैदा करने के षड्यंत्र का पर्दाफाश करती है। डॉ रामविलास शर्मा ने भी कई जगह इस पुस्तक का जिक्र किया है। शाकिर अली जी ने उचित ही इस पुस्तक का मण्डन किया है।
       'डॉ राजेश्वर सक्सेना :व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म' में प्रसिद्ध आलोचक राजेश्वर सक्सेना जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन है। डॉ सक्सेना छत्तीसगढ़ क्षेत्र से समर्थ मार्क्सवादी आलोचक हैं। मार्क्सवाद की सैद्धांतिकी और उत्तर आधुनिकता पर उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके कार्यों को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उनकी पुस्तकों की उपलब्धता आसान बनाने तथा उनके योगदान का मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। शाकिर जी अपने ढंग से यह कार्य कर रहे हैं, तथा आगे उन पर उनकी पुस्तक लिखने की योजना है। प्रस्तुत निबन्ध में संक्षिप्त रूप में ही बातें आ पायी हैं।
       डॉ रामविलास शर्मा पर अपने संक्षिप्त लेख में शाकिर जी ने डॉ शर्मा के लेखन के बहुत से आयामों को छू लिया है। डॉ शर्मा ने मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय साहित्य और परम्परा का बृहत मूल्यांकन किया है। वे ऋग्वेद से निराला तक भारतीय साहित्य के श्रमवादी  परंपरा को भी रेखाँकित करते हैं। इस क्रम वे भाववादी प्रवृत्तियों का तीव्रता से खण्डन करते हैं। डॉ शर्मा का कार्य बहुत विस्तृत है, यह निबन्ध केवल परिचयात्मक है। शाकिर अली डॉ शर्मा की आलोचना के कपितय पहलुओं से असहमत रहे हैं, जिसका जिक्र वे बातचीत में करते रहे हैं, हालांकि यहां उनका जिक्र नही है।वे प्रश्न लगभग वही हैं जो कई आलोचकों  द्वारा उठाये जाते रहे हैं; मसलन हिंदी-उर्दू के प्रश्न, मुक्तिबोध का मूल्यांकन, परम्परा का मूल्यांकन,नवजागरण आदि।महत्वपूर्ण यह है कि शाकिर जी समग्र निषेधवाद में नही जाते। उम्मीद है आगे वे इस पर और काम करेंगे।
       'ओम प्रकाश वाल्मीकि का चले जाना' में दलित कवि-आलोचक वाल्मीकि जी का आत्मीय स्मरण है। दलित साहित्य की प्रतिष्ठा में वाल्मीकि जी का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी आत्मकथा 'जूठन' काफी लोकप्रिय हुई है। शाकिर जी की शब्दो मे " 'जूठन' दलित चेतना के निर्माण का हिंदी साहित्य में एक दहकता हुआ दस्तावेज है"। आलेख में शाकिर जी ने उनकी कविताओं और कुछ कहानियों का विश्लेषण किया है।
       'यह मेरा लोक अनुरागी समय और हबीब तनवीर' आलेख तनवीर जी के महत्व को रेखांकित करता है। भारतीय नाट्य परंपरागत में हबीब तनवीर का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने रंगमंच में लोक नाट्य और लोक संस्कृति का सफल प्रयोग कर एक प्रतिमान स्थापित किया। शाकिर जी ने नाट्य वर्कशाप में उनके साथ गुजारे समय और उनके नाट्य कौशल का रोचक वर्णन किया है।इस क्रम में वे अपने बचपन के दिनों के संस्मरण में तत्कालीन समावेशी लोक परम्परा का वर्णन किया है।
'यात्रा से पहले यात्रा' की समीक्षा में प्रभाकर चौबे जी की रचनाधर्मिता और व्यक्तित्व का चित्रण भी है। इस पुस्तक में लोकसंस्कृति और लोकाचार का जीवंत चित्रण है।परिवेश बुन्देलखण्ड का है मगर इसमे सभी क्षेत्र के पाठकों को अपनी संस्कृति से जोड़ देने की क्षमता है।
       सुधीर सक्सेना जी पर दो आलेख हैं जिनमे उनके व्यक्तिव और कृतित्व का मूल्यांकन है।सुधीर जी चर्चित पत्रकार और कवि हैं; साथ ही उनमे यायावरी प्रवृत्ति भी है जिसके कारण वे देश-विदेश की यात्रा करते रहे हैं। इन यात्राओं ने उनकी कविता को समृद्ध किया है और उसमें एक वैश्विक परिदृश्य उपस्थित किया है।लेखक का  सुधीर जी से लंबा संपर्क और आत्मीयता रही है, जिसकी बानगी इस आलेख में है।
      अनुवाद खण्ड में दो महत्वपूर्ण आलेख तथा सुकान्त भट्टाचार्य की एक बंगाली कविता 'सिगरेट' का हिंदी अनुवाद है। प्रसंगवश इधर शाकिर जी बंगला कविताओं का लगातार अनुवाद कर रहे हैं जो 'दुनिया इन दिनों' मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो रही हैं। पहला अनुवाद प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक क्रिस्टोफर कॉडवेल की पुस्तक 'इल्यूजन एंड रियलटी' के प्रथम अध्याय 'बर्थ ऑफ पोइट्री' का 'कविता का जन्म' शीर्षक से संक्षिप्त अनुवाद है। कॉडवेल की यह पुस्तक  आलोचना जगत में काफी चर्चित रही है और कविता के यथार्थवादी समझ के लिए जरूरी समझी जाती रही है। शाकिर जी की पूरी पुस्तक का अनुवाद करने की योजना रही है, जिसे वे अभी तक पूरा नही कर पाये हैं। उम्मीद है आगे वे इस काम को पूरा करेंगे।हालांकि भगवान सिंह जी ने इस पुस्तक का अनुवाद किया है।
       दूसरा अनुवाद 'भारतीय मुसलमान : सार्थक भूमिका की तलाश' ए. रहमान के अंग्रेजी आलेख का अनुवाद है। आलेख में रहमान जी ने भारतीय मुसलमानों के वैश्विक संदर्भ में वैचारिक विकास और अंतर्विरोध, संस्कृति और सभ्यता में उनकी देन तथा वर्तमान की चुनौतियों के लिए यथार्थवादी  दृष्टि के विकास पर बल दिया है।
       पुस्तक में 'आशीर्वचन' और 'भूमिका' के रूप में दो महत्वपूर्ण आलेख हैं। 'आशीर्वचन' में राजेश्वर सक्सेना जी ने अपने और शाकिर जी के वैचारिक यात्रा का उल्लेख किया है, तथा लोहियावाद के  'ज्ञान के अराजकतावादी दृष्टिकोण' का खंडन किया है। आगे उन्होंने शाकिर जी के कुछ आलेखों का विश्लेषण किया है। 'भूमिका' में युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने समग्र आलेखों का लोकवादी दृष्टि से विवेचन किया है और इसे उचित ही 'अस्मिता में संदर्भ में संतुलित लोकधर्म' कहा है।
        इस तरह 'आलोचना का लोकधर्म' शाकिर जी आलोचक रूप का प्रकटीकरण है।हम कह आये हैं कि यह उनके अलोचनाकर्म का एक पहलू भर है; उनके अध्ययन की सीमा काफी विस्तृत है जिसे अभी लिखा जाना है। उन्होंने शुरुआत कर दी है,उम्मीद कर सकते हैं कि आगे वे हिंदी के लोकधर्मी आलोचना और चिंतन को समृद्ध करेंगे।
* श्री शाकिर अली अब दिवंगत हैं, नवम्बर 2021में उनका आकस्मिक निधन हो गया]
कृति- आलोचना का लोकधर्म
लेखक- शाकिर अली
प्रकाशन- उद्भावना, गाजियाबाद
मूल्य- 200/ (पेपर बैक)

कवर्धा (छ. ग.)