इस अंक के रचनाकार

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शुक्रवार, 26 मई 2023

फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव

 

 

डॉ गोपाल कृष्ण शर्मा '' मृदुल ''

 
     सेवानिवृत्त होने के बाद से ही मेरा पुत्र बार बार मुझसे अनुरोध कर रहा था कि अब मैं हैदराबाद में उसके परिवार के साथ रहूं परन्तु अपनी स्वतंत्रता के बाधित हो जाने के भय से मैं लगातार उसके अनुरोध को भविष्य पर टाल रहा था। मगर इस बार दीपावली पर्व पर जब वह सपरिवार मेरे साथ पर्व मनाने हेतु एक सप्ताह की छुट्टी लेकर आया तो मेरे पौत्र ने भी मुझसे जिद की कि मैं उन लोगों के साथ हैदराबाद में रहूं। मैंने उसके अनुरोध को भी टालने का प्रयास किया। मगर मेरे व्‍दारा तुरंत न चल पाने की बात सुनकर वह इतना दुखी हो गया कि मुझे अपने इन्कार पर दृढ़ रहना कठिन हो गया। मैंने काफी सोच विचार कर एक माह उन लोगों के साथ हैदराबाद में रहने का निर्णय लिया और उनके साथ हैदराबाद जाने की हामी भर ली।
     संयोग से जिस रेलगाड़ी में उनका आरक्षण था। उसमें एक वरिष्ठ नागरिक की वर्थ खाली थी, अतः मुझे भी आरक्षित बर्थ मिल गई और हम लोगों की यात्रा आसान हो गई।
      रेलगाड़ी में यात्रा करते समय जब मेरे पौत्र ने अपने फ्लैट अपने मोहल्ले के विषय में मुझे बताना प्रारंभ किया तो उसकी मां ने हंसते हुए कहा .- '' अरे पगले! बाबू जी ने ही तो वह फ्लैट हम लोगों को खरीदने की सलाह दी थी और फिर धन की व्यवस्था भी बाबू जी ने ही कराती थी, तब तुम दो.तीन वर्ष के ही थे।''
     यह सुनकर मेरे पौत्र ने पूछा - '' पहले क्या बाबा भी हमारे साथ ही रहते थे। 
- नहीं। तब बाबू जी सेवा निवृत्त नहीं हुए थे। जब हम लोग पहली बार हैदराबाद आये थे तो बाबू जी पन्द्रह दिन का अवकाश लेकर  तुम्हारे पापा की सहायता के लिए हमारे साथ आए थे।''
     यह सुनकर मेरा पौत्र तो मौन हो गया मगर पन्द्रह वर्ष पूर्व हैदराबाद में गुजारे  उन पन्द्रह दिनों की स्मृति पुनः एक बार मेरे मानस पटल पर छा गई।
     प्रातः पांच बजे उठ कर चार किलोमीटर टहलने का नियम उन दिनों भी मैंने छोड़ा नहीं था। हैदराबाद के जिस इलाके में हमने घर किराए पर लिया था, वहां सड़कें काफी चौड़ी और मकान प्रायः पांच - छह मंजिल के थे। वहां पर हमारे शहर की तरह लोग सड़क का अतिक्रमण नहीं करते थे, मगर अपने भवन की सीमा के आगे एक - डेढ़ फुट जगह में क्यारी नुमा निर्माण कर फूल के पौधे अवश्य लगा लेते थे। इस प्रकार हर घर के आगे सुंदर पुष्पों से सज्जित पेड़ - पौधे लगे होते थे।
     उस शहर की दूसरी विशेषताए जिसने मुझे प्रभावित किया था, वह थी हर घर के आगे सुंदर रंगोली। प्रातः ही गृह - स्वामिनियां अपने द्वार के आगे की थोड़ी सड़क , फुटपाथ को धोकर द्वार के ठीक सामने सुंदर रंगोली बनाती थीं। हर घर के सामने एक अलग बनावट की रंगोली,  एक से एक सुंदर रंगोली। पता नहीं, यह रंगोली गृह स्वामिनी द्वारा समृद्धि की देवी लक्ष्मी के आह्वान हेतु बनाई जाती है, अतिथि के स्वागत हेतु बनाई जाती है या गृह की शोभा हेतु बनाई जाती है । मगर हर रोज हर घर के सामने रंगोली की बनावट बदली हुई होती थी। नित्य ही नई नई रंगोली बनाने में महिलाओं को अधिक समय भी नहीं लगता था। ऐसा लगता था कि वे सब भांति भांति की रंगोली बनाने में सिद्धहस्त हैं।
      मैंने जब हर घर के सामने फूलों की उपलब्धता देखी तो एक पालिथीन की थैली लेकर टहलने के लिए जाने लगा। रास्ते में मैं अपनी पसंद के फूल तोड़ कर उस थैली में रख लेता और स्नान करने के बाद भगवान को वे पुष्प अर्पित कर देता। वहां पर कई प्रकार के गुड़हलए कनेर, चांदनी,  बेला आदि के फूल देख कर मुझे बहुत खुशी होती और मैं हर रोज नए किस्म के फूल चुन कर लाता।
     एक दिन मैं श्वेत रंग के एक अति सुन्दर सुगंधित पुष्प को तोड़ रहा था , तभी एक वृद्ध घर के द्वार पर आया। उसे सामने देख कर मैंने झिझकते हुए एक फूल तोड़ा और आगे बढ़ गया। मुझे जाता देख उसने तेलगु भाषा में कुछ कहा। चूंकि मुझे तेलगु भाषा का ज्ञान नहीं है, अतः मैंने अनुमान लगाया कि यह वृद्ध मुझे फूल तोड़ने के लिए डांट रहा है। अतः मैंने उससे हिंदी में क्षमा मांगी और वहां से चल पड़ा। मगर वह और जोर से कुछ बोला तो मैंने उसके पेड़ से तोड़ा हुआ फूल उसे वापस लौटाते हुए फिर क्षमा मांगी, मगर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और फूलों की ओर संकेत करके फिर कुछ कहा।
     अन्ततः मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और लम्बे डग भरते हुए चल पड़ा। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वह वृद्ध जोर से चिल्लाया। संयोग से उधर से एक नवयुवक आ रहा था। उसने अप्रत्याशित रूप से मेरा हाथ मजबूती से पकड़ लिया और मुझे वृद्ध के पास ले आया। उस युवक का शारीरिक बल आंक कर मैं बिना विरोध किए उसके साथ चल पड़ा। उस युवक ने वृद्ध के पास पहुंच कर उससे तेलगु भाषा में कुछ बात की और फिर मुझसे हिंदी में पूछा - '' ये फूल किसके हैं ''
      मैं समझ गया कि अब यह युवक मुझे दण्डित करेगा। अतः मैंने भोलेपन का नाटक करते हुए कहा - '' इन दादाजी के।'' 
- नहीं नहीं, ये फूल किसने बनाते।
- भगवान जी ने।
- आपने क्यों तोड़े।''
- ग़लती हो गई। मैंने संभावित अप्रिय घटना से बचने हेतु विनम्रता से उत्तर दिया।
       इस पर उस युवक ने हंसते हुए कहा - '' ये फूल आप भगवान को अर्पित करेंगे।''
यह सुनकर मैंने कहा - '' हां।''
- तो इसमें गलत क्या है। भगवान के फूल हैं और उन्हें ही आप अर्पित करेंगे। तो रुक क्यों गए और तोड़ लीजिए। तमाम फूल लगे हैं। ... यह दादाजी आपसे कह रहे थे मगर आप भाग खड़े हुए। इतना कह कर वह युवक जोर से हंसा और एक ओर को चल दिया।
      उस वृद्ध ने कुछ फूल अपने हाथ से तोड़ कर मुझे दिए और तेलगु भाषा में कुछ कहा। शायद उसने कहा हो कि कल फिर भगवान की पूजा के लिए फूल ले जाना।  
     मैं उस वृद्ध की सहृदयता के आगे नतमस्तक हो गया और उसे प्रणाम कर आगे बढ़ गया। मुझे याद आया कि मेरे घर के लान में एक गुड़हल का पेड़ लगा है जिसमें से अक्सर कोई फूल तोड़ लेता था। मुझे इस तरह से फूल का थोड़ा जाना बहुत खराब लगता था। एक दिन मैंने फूल तोड़ने वाले को पकड़ने का निश्चय किया और छिप कर बैठ गया। एक महिला फूल तोड़ने आई तो मैं प्रकट हो गया और उस महिला को बहुत भला - बुरा कहा। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उस महिला ने अपने आंचल में रखे सारे फूल वहीं गिरा दिए और दुखी मन से चली गई। उस घटना को याद कर मुझे बहुत अफसोस हुआ और मेरा मन उस महिला से क्षमा मांगने हेतु आकुल हो गया।  
     मैं नित्य प्रातः भ्रमण पर जाता और सुंदर सुंदर फूल लेकर वापस लौटता। कभी कभी वह वृद्ध मुझे मिल जाते तो मैं उन्हें श्रद्धा पूर्वक प्रणाम करता। कालोनी के गेट पर आकर देखता कि तमाम बच्चे अपने अपने अभिभावक के साथ खड़े स्कूल बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बस के आते ही कुछ बच्चे उस बस में बैठ जाते और शेष बच्चे अपनी बस के आने की प्रतीक्षा करते। कुछ बच्चे विलम्ब से आते मगर उनके पिता पहले ही आकर खड़े हो जाते और बस ड्राइवर से एक दो मिनट रुकने का आग्रह करते ताकि उनका बच्चा आ जाए।  
     एक बच्चा, जिसकी आयु सात - आठ वर्ष होगी, वह हमेशा अपने पिता या माता की गोद में चढ़ कर ही कालोनी के गेट तक आता था। जब पिता थक जाते, तो बच्चे की माता उसे गोद में ले लेती। एक दिन मैंने गेट पर तैनात सुरक्षा कर्मी से पूछा - यह बच्चा चलने में असमर्थ हैं क्या।
      वह सुरक्षाकर्मी बिहार प्रदेश के छपरा जिले का रहने वाला था। उसने हंस कर बताया कि यह अपने माता पिता का बहुत दुलारा है। इन्हें वृद्धावस्था में संतान सुख की प्राप्ति हुई है। इसीलिए दोनों बच्चे के पीछे पागल रहते हैं। उस सुरक्षा कर्मी ने मुझे यह भी बताया था कि यह भी बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले हैं। इनका नाम श्री कृष्ण झा है। झा साहब ने इस कालोनी के डी ब्लॉक में 101नं.का फ्लैट खरीद लिया है।
     यह सुनकर मेरी रुचि झा साहब में बढ़ गई। अतः उनसे सामना होने पर मैं उन्हें नमस्कार करने लगा। धीरे - धीरे हम दोनों के बीच बातचीत होने लगी। वैसे भी हिंदी भाषियों में थोड़ा अपनत्व का भाव उत्पन्न हो ही जाता था। उनसे बातचीत में मुझे ज्ञात हुआ कि झा साहब किसी इन्टर कालेज में हिंदी के अध्यापक हैं। उनके इकलौते पुत्र का नाम श्री पति है। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति बहुत विलम्ब से हुई। इसके लिए उन्होंने अनेक मनौतियां मानी, कई डाक्टरों का लम्बा इलाज चला तब उन्हें अपना कुल दीपक प्राप्त हो सका।  
     झा साहब और उनकी पत्नी अपने पुत्र की हर इच्छा को पूर्ण करने हेतु सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने समस्तीपुर में अपनी पैतृक संपत्ति बेच कर सुविधा एन्क्लेव में एक फ्लैट अपने पुत्र के नाम में खरीद लिया था। उनका विचार था कि समस्तीपुर की तुलना में हैदराबाद का मौसम स्वास्थ्य के बहुत अनुकूल है तथा पढ़ाई का स्तर भी बहुत अच्छा है। हैदराबाद में नौकरियों की संभावना भी समस्तीपुर की अपेक्षा अधिक ही रहेगी। और इस प्रकार अपने पुत्र के सुखद भविष्य के लिए उन्होंने अपने पैतृक जनपद तक से संबंध विच्छेद कर लिया था।
     उस कालोनी में अधिकांश परिवार किरायेदार थे, अतः वे आस पास के लोगों से अधिक संपर्क नहीं रखते थे। कुछ लोग  फ्लैट खरीदकर खुद उनमें रहे थे। ऐसे लोग आपस में थोड़ा मेल जोल बना कर रखते थे। सुबह शाम वृद्ध लोग और महिलाएं कालोनी में टहलते थे। शाम को अनेक लोग अपने बच्चों को पार्क में शारीरिक अभ्यास कराते और कालोनी के अन्दर सड़क पर साइकिल चलवाते,  फुटबाल, बैडमिंटन, क्रिकेट आदि खिलाते। रविवार के दिन लोग छ : मंजिला कालोनी की छत पर जाकर आधा घंटा धूप में बैठते। मुझे यह फ्लैट संस्कृति कुछ अजीब लगती।
      मैं सोचता कि हमारा बचपन जहां बीता वहां तो बच्चों के माता पिता उनकी ऐसी चिंता नहीं करते थे। हम सब तो उन्मुक्त होकर पूरे गांव में धमाचौकड़ी मचाते थे। जब दो.ढाई घंटे घर से बाहर रहते तो अम्मा चिंता करती थीं। और अधिक समय तक गायब रहने पर पिता से शिकायत हो जाती थी जिसके परिणामस्वरूप थोड़ी ठुकाई भी झेलनी पड़ती थी। यहां तो मामला एकदम उलटा ही है।
     लम्बी यात्रा पूर्ण कर जब मैं अपने बच्चों के साथ सुविधा एन्क्लेव पहुंचा तो सारा कुछ पहले जैसा ही मिला। बस कोई पुराना चेहरा नहीं दिखाई दिया। वैसे ही स्कूल टाइम पर गेट पर स्कूल बसों का आना, बच्चों का मां - बाप के साथ अपनी बस की प्रतीक्षा, शाम को अपने अभिभावकों की देखरेख में बच्चों का खेल.कूद, रविवार को पुरुषों द्वारा आधा घंटा छत पर धूप का सेवन ....।
     इस बीच झा साहब और उनकी पत्नी से भेंट नहीं हुई तो एक दिन मैंने अपने पुत्र से उनके संबंध में पूछा। उसने बताया कि उनका पुत्र और पुत्रवधू उस मकान में रहते हैं। उन लोगों को मैंने भी काफी समय से नहीं देखा।
एक दिन जा साहब और उनकी पत्नी की कुशल क्षेम जानने के लिए मैं फ्लैट सं. डी 101 में पहुंच गया। द्वार पर लगी घंटी बजाने के कुछ देर बाद एक युवक ने आकर द्वार खोला और मुझसे प्रश्न किया - '' कहिए'' 
- तुम श्री पति झा ...। 
- जी हां! मगर मैंने आपको पहचाना नहीं।''
- मैं शंभूनाथ हूं, रमेशचन्द्र का पिता। जब तुम आठ - नौ वर्ष के थे तब मैं यहां आया था। उन दिनों मेरी और तुम्हारे पापा की खूब बातें होती थीं। मेरे यह कहने पर वह मुझे पहचान तो नहीं पाया किंतु मुझे घर के अन्दर आने के लिए आमंत्रित करने को विवश अवश्य हो गया। मैंने श्रीपति से उसके माता - पिता से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसने झिझकते हुए कहा - अंकल ! वे लोग दूसरी जगह रहते हैं।''
- अच्छा, तुम्हारे साथ नहीं रहते । मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।  
- वास्तव में, हम दोनों नौकरी में हैं। इसलिए यहां उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो पाती थी। यहां कोई बातचीत करने वाला भी नहीं था, दिन भर मुंह बंद किए बैठे रहते थे। इसलिए  हमने एक '' सेवा घर '' में उनके रहने की व्यवस्था कर दी है। हर माह हम लोग सेवा घर को चंदे के रूप में काफी धन दे आते हैं ताकि सेवा घर की प्रबंध समिति के लोग हमारे माता पिता का पूरा ख्याल रखें। श्री पति ने सफाई देने का प्रयास किया।
     तभी उसकी पत्नी रसोई से निकल कर हमारे सामने आ गई और बोली - वहां खाने पीने की व्यवस्था एकदम घर जैसी है। उनसे बातचीत करने के लिए आस पास बहुत से हम उम्र लोग हमेशा ही बने रहते हैं।'' 
     उन दोनों की बात सुनकर मुझे बहुत क्रोध आया। अपने क्रोध पर नियंत्रण करते हुए मैंने कहा ‌‌- उन्हें घर की चाहत होती तो उन्होंने यह फ्लैट तुम्हारे नाम में न खरीद कर अपने नाम में खरीदा होता। और उन्हें यदि बोलने .बात करने वाले लोगों की आवश्यकता होती तो वे सेवा निवृत्त होने के बाद समस्तीपुर में अपने गांव चले जाते। फिर भी तुम लोगों ने सेवा घर में उन्हें भेज कर इसकी व्यवस्था कर के उनके ऊपर बहुत उपकार किया है।'' 
     मेरे मन में आया कि मैं इन निकृष्ट कोटि के स्वार्थी लोगों से यह भी कह दूं कि भगवान तुम लोगों को भी ऐसी ही औलाद दे, मगर मैं यह अशुभ वाक्य बोल नहीं सकता और चुपचाप उनके घर से उठ कर चला आया।
     घर आकर मैं काफी देर तक इस विषय पर विचार करता रहा कि आखिर रक्त - संबंधों के बीच भी इतनी स्वार्थ परता कैसे बढ़ गई है। तभी मन में यह विचार कौंधा कि हमने अपनी स्वार्थ परता के कारण स्वयं को समाज से काट लिया है। अतः अब हमारे ऊपर कोई सामाजिक बंधन नहीं रह गया है। पहले संतान द्वारा वृद्ध माता पिता की उपेक्षा होते देख जाति.बिरादरी और पास.पड़ोस के लोग टोक दिया करते थे। फिर भी यदि संतान के व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता था तो उसका सामाजिक वहिष्कार कर दिया जाता था। आज हम सब स्वयं ही समाज से स्वयं को वहिष्कृत कर लेते हैं या यों कहें कि हम समाज को ही वहिष्कृत कर देते हैं,  जिसका परिणाम वृद्धाश्रम के रूप में हमारे सामने आ रहा है।
      मैं झा साहब से मिलना चाहता था मगर उनके दुख के अनुमान से ही मैं इतना भयभीत था कि उनसे मिलने की शक्ति मैं अपने भीतर नहीं जुटा सका।

    
सेवा निवृत्त अधिकारी,
भारतीय स्टेट बैंक,
 संपर्क - 569/108 /2, स्नेह नगर,
आलमबागए लखनऊ -  226005
मो: 9956846197


परिचय : जन्म .01.05.1952, शिक्षा - एम.ए.,  पीएचडी, गद्य - पद्य की तेईस पुस्तकें प्रकाशित। दो कृतिया उ.प्र. हिंदी संस्थान और तीन कृतियां अन्य साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। विगत चार दशकों में शताधिक पत्र - पत्रिकाओं में पांच सौ से अधिक रचनाएं प्रकाशित। उ.प्र हिंदी संस्थान  द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, वर्तमान में छंद बद्ध कविता की त्रैमासिक पत्रिका '' चेतना स्रोत '' का अवैतनिक संपादन।

रविवार, 11 अप्रैल 2021

‘ विराट ’ कद का अभिनेता दीपक तिवारी

 

वीरेन्द्र बहादुर सिंह -
 
चरणदास चोर के एक दृश्‍य में दीपक विराट
           भारतीय रंगमंच का इतिहास अनेक कलाकारों की दिग्विजयी यात्रा का साक्षी रहा है लेकिन यह विडम्बना है कि जवानी के दिनों में नागर और लोक मंच पर अपनी प्रतिभा से हजारों दर्शकों को चमत्कृत कर देने वाले  अधिकांश कलाकारों की सांध्य बेला अर्थाभाव और लगभग गुमनामी में बीत जाती है। प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर के सानिध्य में अपनी कला प्रतिभा को परिमार्जित कर उसे विश्वस्तरीय मंचों पर स्थापित कर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करने वाले भी दीपक विराट की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। अपना लगभग समूचा जीवन कला मंचों को समर्पित करने वाले श्री दीपक विराट पिछले कुछ वर्षों से पक्षापात से पीडि़त थे। अर्थाभाव और बीमारी से संघर्ष करते हुए जैसे-तैसे वे अपनी पत्नी और ख्यात लोककलाकार एवं गायिका श्रीमती पूनम विराट के साथ जिंदगी की गाड़ी को खींच रहे थे। लगभग दो वर्ष पूर्व उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (पुरस्कार) से नवाजा गया था।
          लोग महीने दो महीने से रोज लोगों को चरणदास चोर व हवलदार का रोल करते देख रहे थे और हवलदार और चरणदास चोर का अभ्यास मेरे घर की छत में कभी-कभी हम लोग कर लेते थे। दीपक विराट ने चरणदास किया। 
           इस तरह नये चरणदास चोर ने जब कलकत्ता में अपना पहला शो किया और लोगों ने दीपक की एक्टिंग को वहाँ कबूल कर लिया। फिर तो दीपक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके पूर्व कलकत्ता में चरणदास चोर यानी गोविंदराम निर्मलकर ही लोगों की धारणा में बसे हुए थे। गोविन्दराम की चोर की छवि लोगों के दिलों में गहरे पैठ गई थी। कलकत्ता के दर्शक बिना गोविन्दराम के, हबीब तनवीर कैसे चरणदास चोर कर पाते हैं ? देखने बड़ी तादाद में पहुँचे थे । जितनी पब्लिक हाल में थी उससे दुगनी बाहर थी।  अपने पहले शो में ही दीपक ने कलकत्ता के दर्शकों का दिल जीत लिया।  दीपक विराट कलकत्ता के शो के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रंगकर्मी हबीब तनवीर के नया थियेटर से एक-एक कर जब सभी बड़े अभिनेता विविध कारणों से विदा लेे रहे थे तब नया थियेटर की मशाल को दीपक विराट ने अपने हाथों में थामा था। 
               रायपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी और दीपक विराट के अभिन्न मित्र योग मिश्र बताते हैं कि चरणदास चोर को मंच पर जीवंत करने वाले दिग्गज अभिनेता गोविन्दराम निर्मलकर जी नया थियेटर छोड़कर जा चुके थे। विख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर साहब को कलकत्ता में शो करना था। वे नया चरणदास तलाश कर रहे थे। रायपुर शहर के बहुत से अभिनेताओं को वे आजमा चुके थे। एक दिन हबीब साहब हम लोगों की तरफ अपनी पाईप से खेलते हुए आये। रविशंकर विश्वविद्यालय स्टेडियम में मैं और दीपक साथ गैलरी में ही बैठे थे। उन्होंने अपनी पाईप के इशारे से दीपक को कहा- "तुम चरणदास करो तो जरा?" हमबाद रंगमंच का स्टार बन गया था। एक ऐसा  स्टार जिसका रंगमंच में नाम बढ़ने लगा था पर नामा कभी नहीं बढ़ा।
           समीक्षकों के अनुसार नाट्य मंच पर दीपक विराट की हर अदा निराली होती थी। वे पात्र को आत्मसात कर जाने में प्रवीण थे। वे न केवल भाव प्रणव अभिनेता थे बल्कि उनके स्वर में गजब का आकर्षण, आवाज में सम्मोहन और शरीर में गजब की लचक थी। उनकी यही खासियत उनके विश्व स्तरीय अभिनेता होने का अकाट्य प्रमाण था।

           दीपक विराट के पहले हबीब तनवीर के चरणदास चोर के मुख्य पात्र का अभिनय प्रख्यात अभिनेता लालू राम, मदन निषाद और पद्मश्री गोविंदराम निर्मलकर ने किया था। इनमें लालू राम ने प्रसिद्व रंगकर्मी श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी फिल्म चरण दास चोर में भी मुख्य पात्र की भूमिका निभायी थी। श्री विराट ने चरणदास चोर को बरसों मंच पर जीवंत किया। इस क्रम में दीपक विराट हबीब तनवीर के चौथे चरणदास चोर के रूप में मंच पर उतरे और अपनी नैसर्गिक अभिनय क्षमता के बल पर कई बार अपने पूर्ववर्तियों को भी पीछे छोड़ गए। यह सुखद संयोग है कि हबीब तनवीर के चरणदास चोर नाटक में अभिनय करने वाले चारों शीर्ष अभिनेता राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) के थे। बाद में चैतराम यादव और ओंकारदास मानिकपुरी ने भी नया थियेटर के मंच से चरणदास चोर के मुख्य पात्र की भूमिका को साकार किया।
         नया थियेटर ग्रुप में अपने लगभग दो दशक के जुड़ाव के दौरान दीपक विराट ने हबीब तनवीर के अन्य प्रमुख नाटक लाला शोहरत राय, मिट्टी की गाड़ी, आगरा बाजार, कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना, देख रहे हैं नैन, हिरमा की अमर कहानी, जमादारिन, बहादुर कलारिन और गांव का नाम ससुराल मोर नांव दामाद में भी मुख्य पात्र का अभिनय करते हुए अपनी छाप छोड़ी। 
          अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अभिनेता दीपक विराट का चयन अखिल भारतीय संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार 2017 के लिए मणिपुर के इंफाल में जून 2018 में आयोजित जूरी की बैठक में किया गया। उन्हें अभिनय के क्षेत्र में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की घोषणा की गई। उल्लेखनीय है कि अकादमी द्वारा हर साल  रंगमंच के क्षेत्र में यह सम्मान दिया जाता है। अभिनय के क्षेत्र में पूरे देश में सिर्फ 8 लोगों को यह सम्मान दिया गया था। दीपक विराट को अभिनय के क्षेत्र में अकादमी पुरस्कार मिलना उनकी सुदीर्घ कलायात्रा का सम्मान था ।   छह फरवरी 2019 को नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्टपति भी रामनाथ कोविंद  ने विलक्षत्र अभिनय क्षमता और थियेटर में अभिनय कला में अप्रतिम योगदान के लिए दीपक विराट को जब 2017 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया और उसे ग्रहण करने के लिए  गंभीर रूप से अस्वस्थ श्री विराट जब व्हील चेयर पर आये तो समूचा सभागृह करतल ध्वनियों से गूंज उठा था । लंबे समय से बीमार परंतु जीजीविषा से लबरेज भी विराट को व्हील चेयर पर देखकर राष्टपति प्रोटोकाल को तोड़कर अपने स्थान से उठकर आये और इस कला साक्षक को सम्मानित किया। इस गौरवपूर्ण क्षण में श्री विराट की आंखें खुशी से छलक उठी, लेकिन ये अभिनय नहीं वास्तविक ,खुशी के आंसू थे। 
           रंगमंचों में दीपक विराट के नाम से सुपरिचित इस कलाकार का वास्तविक नाम दीपक तिवारी था । उनका जन्म 29 अक्टूबर 1959 को दुर्ग जिले के ग्राम मोहलाई में हुआ। उन्होंने बीए प्रथम वर्ष तक की शिक्षा प्राप्त की। भी तिवारी ने अपनी कलायात्रा की शुरूआत तरंगिभी सांस्कृतिक संस्था बिलासपुर के साथ गायक के रूप में की। बाद में उनका रूझान अभिनय की ओर हुआ। संस्कृत नाटक ‘स्वप्र वासवदत्ता’ में अपने छात्रा जीवन में अभिनय करने वाले भी विराट ने दहेज प्रथा पर आधारित एक नाटक में बूढ़े व्यक्ति के पात्र का अभिनय कर अपनी अभिनय यात्रा शुरू की थी। श्री विराट ने रेखा वर्मा के निर्देशन में ‘परमात्मा का कुत्ता’, विमल मुखर्जी के निर्देशन में ‘तुगलक’, अलखनंदन द्वारा निर्देशित ‘बकरी’ और मनहर चौहान के साथ ‘कसाईबाड़ा’ नाटकों में अभिनय कर अपनी प्रतिभा को और परिमार्जित किया।
         सन् 1981 में जनसंपर्क विभाग में सहायक फोटोग्राफर के पद पर उनकी नौकरी लगी। रायपुर (छत्तीसगढ़) में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात सुपरिचित रंगकर्मी मिर्जा मसूद के साथ हुई। उन्होंने उनके साथ ‘जुलूस’ और ‘आदमी’ नामक नुक्कड़ नाटक में काम किया। नौकरी करने के साथ-साथ वे इप्टा से भी जुड़ गये और जलील रिजवी द्वारा निर्देशित ‘एक और द्रोणाचार्य’, नीलम मेधानी द्वारा निर्देशित ‘मिस पाटला पासा’, प्रदीप चटर्जी द्वारा निर्देशित ‘आषाढ़ का एक दिन’ एवं ‘काकनगरी’ नामक नाटकों में अपनी अभिनय प्रतिभा का जौहर दिखाया। अपने रायपुर प्रवास के दौरान भी विराट ने छोटे-बड़े 50 से ज्यादा नाटकों में अभिनय किया।
          विराट 1984 में प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर के संपर्क में आये और उनके नया थियेटर ग्रुप के साथ जुडक़र उनके लगभग सभी नाटकों में अभिनय कर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। भारत महोत्सव के अंतर्गत 1986 में उन्हें हबीब तनवीर के नया थियेटर ग्रुप के साथ मास्को (रूस) और स्वीडन जाने का अवसर प्राप्त हुआ। छत्तीसगढ़ की लोक कला को विदेशी धरती में काफी सम्मान मिला। स्वीडन और रूस में छत्तीसगढ़ी लोक कला और संस्कृति का परचम लहरा कर जब वे वापस रायपुर लौटे, जब तक जनसंपर्क विभाग की उनकी नौकरी छिन गयी थी।
नौकरी से हाथ धोने के बाद श्री विराट ने मुंबई जाकर अपने लिए संभावनाएं तलाशी लेकिन महज आश्वासन के सिवा कुछ न मिला। 1995 में उन्होंने जब पुन: प्रयास किया तब उन्हें कल्पना लाजमी द्वारा निर्देशित कला फिल्म ‘दरमियां’ में अभिनय करने का अवसर मिला। उन्होंने टीवी सीरियल फर्ज, ये शादी नहीं हो सकती, बाम्बे ब्लू, नया दौर, राजा रेंचो और हादसा में भी अभिनय किया। मुंबई प्रवास के दौरान उन्होंने विभा मिश्रा निर्देशित टलीफिल्म ‘फरार’ में भी काम किया। सन् 2000 में जब भी हबीब तनवीर ने भोपाल में रहकर पुन: अपना गु्प शुरू किया तो उन्होंने न जाने क्यों दीपक विराट और उनकी पत्नी पूनम विराट को आमंत्रिात नहीं किया। स्वाभिमानी दीपक विराट ने भी अपनी ओर से कोई पहल नहीं की।        
आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए अनत: दीपक विराट ने अपनी रंगकर्मी पत्नी और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा दाऊ मंदराजी सम्मान से सम्मानित श्रीमती पूनम विराट के साथ मिलकर राजनांदगांव में ‘रंग छत्तीसा’ नामक ग्रुप का निर्माण किया। ‘रंग छत्तीसा ने धीरे-धीरे’ छत्तीसगढ़ में अपनी पहचान बना ली और छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों में उसका सफलतापूर्व प्रदर्शन भी शुरू हो गया था लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था। रंग छत्तीसा के गठन के कुछ ही समय बाद 2008 मेंं श्री विराट को पक्षाघात हुआ और मंच का सिरमौर यह कलाकार अब केवल एक पलंग में सिमटकर रह गया था। उनकी पत्नी श्रीमती पूनम विराट ने पूरे हौसले के साथ परिस्थितियों का मुकाबला किया और बाद में उनके बच्चे भी इस ग्रुप को संभालने में लग गये। छत्तीसगढ़ में रंग छत्तीसा आज भी अपनी मौलिक प्रस्तुति देने के लिए विख्यात है।
        बहरहाल जीवन की सांध्य बेला में भी दीपक विराट को प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिलना उनकी कला साधना का सम्मान था परंतु यह पुरस्कार उन्हें डेढ़ दशक पहले तब मिल जाना था, जब वे अपने अभिनय के शीर्ष पर थे। श्री विराट का 9 अप्रैल 2021 को राजनांदगांव निधन हो गया।
 
4/5 बल्देव बाग, वार्ड नं. 16 
बालभारती स्कूल के पीछे, राजनांदगांव
मो. 94077-60700

 

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

वो मेरा गांव

घनश्‍याम भारतीय

आजकल काफी उलझन में हूं। लगता है कोई अमूल्य निधि खो गई है। उलझन के बीच एक ऐसा प्रश्न खड़ा हुआ है जिसका उत्तर नहीं है। यह उलझन और उससे जुड़े प्रश्न सिर्फ  मेरे ही सामने नहीं अपितु अपनी व्यापकता में एक बड़े समूह के सम्मुख है। बस समझौता परस्त लोगों को इसका आभास नहीं। मैं ठहरा समझौतों के सदा खिलाफ  रहने वाला वाला। सो उलझा हूं।
मेरी यह उलझन अपने उस गांव को लेकर है जो गांव होते हुए भी गांव नहीं रहा। वह या तो शहर में समा गया या फिर शहर बन गया। हालांकि देखने में वह आज भी गांव जैसा ही है परंतु गांव के गुण उसमें दिखते ही नहीं। वेश -भूषा, बोली - भाषा, खान - पान, रहन - सहन में चमत्कारिक बदलाव तो आया ही है। मान - मर्यादा, बात - व्यवहार, काम - काज, अदब - लिहाज, मेल - जोल, भाईचारा सब कुछ तो बदल गया है। बाग - बगीचा, ताल - तलैया, घूर - खलिहान सिमट गए। झोपड़ियों का स्थान अट्टालिकाओ ने ले लिया। चारागाह और खेल मैदान तो रहे नहीं। आंगन में दीवार खिंच गई। संयुक्त परिवार सपना हो गया। एकल परिवार अपना हो गया। तब बचा क्या गांव को गांव कहने के लिए।
गांव तो वह था जहां गाय,बैल,भैंस दरवाजे की शोभा होते थे। भोर से ही उन्हें चारा खिलाने, दूध दुहने और खेतों में हल लेकर जाने को लेकर खटर - पटर होती थी। जांते चकिया की घड़घड़ाहट ओखली और मूसर की घप - घप कानों में गूंजती थी। सर्दियों में गन्ना छीलने को लेकर चहल - पहल कायम रहती थी। बच्चे और युवा बिना दातून के गन्ना चूसकर पेट भर लेते थे। सुबह से ही कोल्हार चलना शुरू हो जाता था, जो आधी रात को गुड़ पकने या भेली बांधने के साथ समाप्त होता था। कोल्हार में बारी - बारी लोग अपने बैल से गन्ना पेरते थे। महिलाएं उसी कोल्हार से रस लाती थी। आलू और मटर की घुघुरी के साथ रस पीकर लोग मस्त हो जाते थे। दिन में भोजन की जरूरत नहीं पड़ती थी। गांव के तमाम किशोर आलू लेकर कोल्हार पहुंच जाते थे। कुछ लोहे की तीली में गूँथकर खौलते रस में पकाते और कुछ गुलौर के पीछे की आग में भूनते थे। जिसे सभी बड़े चाव से खाते थे। उसी कोलहार की चिरई के इंतजार में घंटो बीत जाता था। तब लोगों के बीच अनोखा प्रेम था। किसी के कहीं आने जाने पर टोका टाकी नहीं होती थी। लेकिन लोग मर्यादा का पालन भी करते थे।
गोजई, बजरी, मक्के और मकुनी की मोटी रोटी, आम और पुदीना की चटनी,सरसो, बथुआ और चने का साग, मूंग, मसूर,लतरी, बाकले की दाल का नाम सुनकर मुंह से लार टपकती थी। साँवाँ,कोदो, टांगुन,तीसी अलसी जड़हन से घर भर जाता था। बैल चालित रहट,चरखी और ढकरपेच करती ढेकुली सिंचाई के साधन हुआ करते थे। गुल्ली - डंडा, गोली - कन्चा, चोर - सिपाही, लुका - छिपी प्रमुख खेल हुआ करते करते थे। घर - घर में दूध - दही की नदियां बहती थी। छाछ को देख मन हिलोरे मारता था। बिड़वा - गोंनरी,खपड़ा - नरिया, खाची - पलरी, भरूका - परई, कोहा - गगरी तत्कालीन कला के उत्कृष्ट नमुने थे।
होली में पखवारे भर पहले से लोगों में मस्ती छा जाती थी। फाग के राग, कीचड़ व रंग के साथ छोटे - बड़े का भेद समाप्त हो जाता था। भांग मिश्रित ठंडई पीकर फाग गाती युवाओं की टोली गांव की संस्कृति की वाहक होती थी। सावन में बागों में झूले की पेंग के साथ कजरी गाती नव योवनाओ में गजब का उत्साह होता था। गुड़िया पीटते बच्चे, कबड्डी और कुश्ती खेलते युवा, मस्ती में सराबोर होते थे। बाप के कंधे पर चढ़कर गांव के मेले में पहुंचे बच्चे कठपुतली की नाच के साथ बाईस्कोप देख, गुड़ही जलेबी खाकर दुनिया की सारी खुशी पा जाने का एहसास करते थे। घुघुरी - खिचड़ी ले कर आए भाई - बाप को देखकर नव विवाहिता, प्रफुल्लित होती थी। त्योहारों की गुझिया और गुलगुले की खुशबू से पूरा गांव महक उठता था।
कटिया - पिटिया, दँवरी ओसावन में महीना गुजर जाता था। पैरा - भूसा मिश्रित गेहूं के ढेर पर दरी बिछाकर सोने के बाद दूधिया चांद को निहारते रात ढल जाती थी। नींद न आने पर लोरी सुनाती दादी नानी, पनघट पर ठिठोली करती पनिहारिन आज गायब है। बडेर पर कागों की कांव - कांव और बागों में कोयल की कूक नात के आगमन की सूचना देते थे। बांस के टट्टर लगे कच्चे घर मे ढिबरी के मद्धिम प्रकाश में आंख पर जोर देकर चावल बीनती, कठवत में आंटे गूँथती और बटुले में दाल पकाती घर की महिलाओं के सिर से आंचल कभी हटता नहीं था।
हमारे बचपन का गांव तो अब कहीं दिखता ही नहीं। घरों के सामने अतिथि देवो भव की पट्टिकाएं शुभ लाभ से होते हुए अब कुत्तों से सावधान तक पहुंच गई है। आज कोई भूखे का पेट भरना नहीं चाहता। तब गरीबी होने के बाद भी कोई परिवार भूखा नहीं सोता था। गांव के लोग मिलकर मदद करते थे। आज दूसरे का निवाला छीन लेना बड़प्पन का प्रतीक बन गया है। तब दूसरे के दु:ख को अपना दु:ख समझकर समाधान में लोग हाथ बटाते थे, आज दूसरे का सुख देखा नहीं जाता। तब दिल के धनी को धनवान कहा जाता था, आज ऐसे लोगों को बेवकूफ  समझा जाने लगा है। जिसके पास आज चांदी का जूता है, वह दिल का काला होते हुए भी सम्माननीय हुआ है। तब कठोर परिश्रम सफलता की कुंजी था। आज दगाबाजी, चालबाजी और दोगलापन सफलता की सीढ़ी है। तब मांगलिक आयोजनों में घर की महिलाएं रसोई सम्हालती थी और बाहर की महिलाएं नृत्य करती थीं। आज बाहर की महिलाएं रसोई संभालती हैं और घर की महिलाएं नृत्य करती हैं। तब लोग टाट पर बैठ कर पत्तल में भोजन करके मिट्टी के कुल्हड़ में पानी पीकर डकार लेते थे। आज आलीशान पांडालों में बिछी मखमली कालीन पर दौड़ - दौड़ कर भोजन करने में शान समझा जाता है। आज भोजन के बाद हाथ धोने के बजाए नैपकिन में पोछ लिया जाता है। तब लोग शर्म हया के दायरे में होते थे। आज निर्लज्जता और भौडापन शान का प्रतीक है। ऐसे में वह गांव तो अब सपना हो गया।
आजादी के 68 सालों में वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। बैलगाड़ी से वायुयान तक और पाती से इंटरनेट की थाती तक की यात्रा में विकसित कल कारखानों ने हस्तकला की कमर तोड़ दी। बेरोजगारी के चलते तमाम युवाओं के शहरों की ओर पलायन के साथ ही गांव विलुप्त हो गए। गलियों, चैबारों से निकलकर हम मॉल और पंचतारा तक पहुंच गए। हस्त चालित बेना - पंखा वातानुकूलन में खत्म हो गया। चबूतरा और दालान का स्थान फ्लैट व मकान ने ले लिया। काका - काकी, दादा - दादी गुजरे जमाने की बात होने के साथ माँ भी मॉम और पिता डैड हो गए। मैगी - पिज्जा के दीवानों को देखकर खजूर, जामुन और देशी आम किस्मत पर रोने को विवश हो गए। गुलदान में मुस्कुराते कैक्टस को देख आंगन की तुलसी सूख गई।
गाय, गोबर, और कंडे से दूर भागते लोग दूध - दही और लस्सी के बजाए व्हिस्की, कोक, पेप्सी के दीवाने हो गए। पहले लोग किताबों के कीड़े होते थे आज किताबों को कीड़े खा रहे हैं। कथरी, गोनरी, खटिया पर खर्राटे थे अब मुलायम बेड पर करवटें हैं। मंडप, पांडाल और संगीत आज डिस्को, पॉप और आइटम सांग के आगे शर्मिंदा हैं। बुआ, मौसी, बहन, सब के सब कजन हो गए। आदर,प्रेम,सत्कार का स्थान स्वार्थ,नफरत और दुत्कार ने ले लिया। सीधे, सहज और सरल ढंग से रहने वालों की नई पीढ़ी धूर्त, चालाक और कुटिल हो गई। संतोष,सुख और चैन के जाते ही सभी बदहवाश, दुखी और बेचैन हो गए। तब कम हो कर भी जो मजबूत थे, वही आज ज्यादा होकर भी कमजोर हैं। एकता तो दूर - दूर तक दिखती नहीं। आखिर में गांव और शहर की संस्कृति को रेखांकित करता मुनव्वर राना का यह शेर भी उसे न बचा सका -
तुम्हारे शहर में मैयत को सब कांधा नहीं देते,
हमारे गांव में छप्पर भी सब मिलकर उठाते हैं।