इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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रविवार, 28 दिसंबर 2025

लुवई-मिंजई......


रोशन साहू 
 
नइ तो पायेन नइ तो खायेन, बढ़ोना के खई खजाना।
गोठकारिन भौजी मारे, हमर भइआ ला बड़ ताना।।

धान-पान सब लुवा-मिंजागे, नइ दिखिस एको भारा।
नांगर-कोटेला चोर-खटिया,नइ दिखिस सुकवा तारा।।

रास-दाब ना फरा-चीला, मोर चूड़ी-पाठ कब चघही।
सोंचे परेतिन बोइर बइठे,मोर मान-गउन कब करही।।

गांव बनई घलो भुलागिन, ठाकुर दइय्या बर न भारा।।
नरियर- फाटा अउ परसादी, नइ पाइन पड़ोसी पारा।।

नइ रचावय ब्यारा मा अब, नइ दिखय रे छेना खरही।
बेरा चघे देवरानी उठय, काय जेठानी झगरा करही।।

अंटिवायय न पेरा डोरी, मुँहू फूलोवय न सूपा-चरिहा।
घर मा बइठे देखत टी.वी, जेन काली रिहिन सपरिहा।।

दांत निपोरे अब न दतारी,अब नइ कल्हरय रे कलारी।
दंदरय न रे खरेरा-बाहरी, हे भाग मा उँकर बियारी।।

रेंगिस न दंउरी बरिस न भुर्री, मुड़ धरे बेलन गाड़ा।
घुन्ना खागे अब टेकनी-धुरी, सुन्ना बिन बने बियारा।।

रोशन साहू 'मोखला'(राजनांदगांव)
7999840942

आवत हे नवा साल संगवारी

       तुलेश्वर कुमार सेन 

चारो कोती चलत हे, अभी बड़ भारी तइयारी।
पूछबे ता कहिथे आवत हे, नवा साल संगवारी।।
कपड़ा,फटाका,कुकरी,बोकरा,दारू  बिसावत हे।
पइसा खरचा करत हे फोकट मा सब झन भारी।।

इकतीस दिसम्बर के बारह बजे ले करही बवाल।
दिन अउ रात बजाही डीजे संग अलकरहा धमाल।।
छोकरी छोकरा अउ डोकरी डोकरा के नवा साल।
नइ जानत हे कुछु तहू मन जनवाही अपन चाल।।

फोड़ ही फटाका गा ही बड़ फूहड़पन वाले गाना।
अवइया जवइया सबला कही तहूं तीर मा आना।। 
दारू,गाँजा पीके हो ही ख़ुबेच एक दुसर ले झगड़ा।
नइ होय जी मान मनाउवा दुनो पार्टी जाहि थाना।।

अपन सुवारथ बर कतरोकन बेजान ला मार ख़ाही।
करके नशा कइ झन दुर्घटना के शिकार हो जाही।।
दाई बाबू गुरु के आशीष ले कोनो मन बाँच जाहि।
इखर लपरवाही के चक्कर मा कतको झन जाहि।।

अंग्रेजी कलेंडर वाले मन हा तो बवाल मचावत हे।
नवा कुछु नइ होवत हे ये हिन्दू पंचांग बतावत हे।।
अपन भाषा,संस्कृति,संस्कार ला सब जानव गा।
दूसरे मन हा तो केवल हमन ला बुद्धू बनावत हे।।

                       सलोनी राजनांदगांव

सोमवार, 15 सितंबर 2025

हम ला का करना हे

विजेन्द्र कुमार वर्मा 


जान दे कोरी खइरखा  लइका बिया  डरे  हवयI 
घर कइसे चलही वो अउ उँखर परिवार  जानयI 

दवई तो देवत हन काहत हे डाक्टर मन बीमारी केI 
ठीक होही  कि नइ होही पड़े हे वो  बीमार जानयI 

बइरी मन ला रोके बर बने हे सरहद मा दीवारI   
घुसपैठ रोक पाही कि नइ खड़े हे दीवार जानयI 

मेहनत मशक्कत ले होगे हे बंपर पैदावार फसल केI
फसल के बने दाम  मिलही ते नइ  बाजार जानयI 

बात के बतंगड़ कर नइते बात ल मन मा दबाI 
खुद उपर हे कइसे करबे तोर व्यवहार जानयI 

मजहब के मतभेद ह लड़ई मा उलझ  गाँठ बनगे हेI
सुलझाही कोन बइगा गुनिया नइते सरकार जानयI 

हम ला जे बात सही लगिस उही ल हम लिखेनI 
छपही ते नइ छपही वोला भई  अखबार जानयI


नगरगाँव (धरसीवां)

शनिवार, 30 अगस्त 2025

छत्तीसगढ़िया परबुधिया

    विजेन्द्र कुमार वर्मा 
 
भैरा अउ कोंदा बनइच दे हे तइसे लागथे गो I
तब लइकन ला कलम किताब धराना काबर I
 
संसद मा खाली सालों ले इही बहस चलत हे I
भेजे रिहिस रुपया पहुँचिस एक आना काबर I
 
भाठा टिकरा बंजर जमीन कतको पड़े हावँय I 
धनहा डोली मा बनत हे कल कारखाना काबर I 
 
इहाँ के मनखे के बेचावत हे खेत खार गहना गुठा I
लोटा धरके आय तेमन बनावत आशियाना काबर I  
 
निकम्मा हो कुर्सी ल पाके अपनेच दाँदर भरत हव  I
पाँच साल बाद आ के फेर मारथव बहाना काबर I 
 
कथनी अउ करनी ल तो एक रखतेव साहब हो I 
बाढ़ अउ सूखा मा आके हमदर्दी जताना काबर I 

हाँ मा हाँ मिलाना हे त मिलात रहौ रे परबुधिया I 
दीमक मन चट करके खाथें तब चिल्लाना काबर I 


नगरगाँव धरसीवां

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

तीजा के तिहार

अशोक कुमार यादव 


आवत होहीं गियाँ ओ, मोर भाई, ददा मन लेवाए ल।
पोरा अउ तीजा के तिहार म, मइके जाहूँ मनाए ल।।
मने-मन कुलकत हँव, फुरफुंदी बनके उड़ावत हँव।
कपड़ा ल जोर डारेंव, बिहनिया ले सोरियावत हँव।।

घेरी-बेरी निकल के देखत हँव, गली-खोर, अँगना म।
बारह महीना के परब ए, बंधागेंव मया के बंधना म।।
दाई के मँय ह दुलौरिन बेटी, ददा के सोनपरी आँव।
भाई के मँय ह मयारु बहिनी, परुवार के जुड़ छाँव।।

डेहरी म खड़े हे मोर बाबू, ए दे आगे मोला लेगे बर।
जावत हँव लइका मन ल धरके, ए जी संसो झन कर‌।।
भात रांध के तंय खाबे, हरिबे घर-कुरिया म अकेल्ला।
कहूँ मोर सुरता आही त, ससुरार भागत आबे पल्ला।।

बड़े किसान के तंय बेटा, बइला मन ल सुग्घर सजाबे।
बइला दउँड़ खेल म जीतके, बइला के आरती उतारबे।।
दीदी अउ बहिनी मन संग, सुख-दुख के गोठ गोठियाहूँ।
माथा म लाली सेंदूर, हाथ म तोर नाँव के मेहंदी लगाहूँ।।

करुहा करेला के साग खाके, रइहूँ भूखे-पियासे उपास।
ठेठरी अउ खुरमी बनाबो बिकट, बुता जाही मोर साध।।
नवा साड़ी पहिन के करहूँ पूजा, खुश हो जाही भगवान।
सिव-पारबती ले माँगहूँ जोड़ी, तोर लंबा उमर के बरदान।।

मुंगेली, छत्तीसगढ़ 
अध्यक्ष यादव समाज सेवा समिति।

तीजा

मुकेश उइके "मयारू"

बड़ मनभावन जान लौ, तीजा तीज तिहार।
आथें मइके मा बहिन, पाथें मया दुलार।।

सबो सुहागिन मन सदा, गाथें सुमधुर गीत।
भादो महिना खास हे, पुरखौती ये रीत।।

रखथें जी उपवास ला, पति के सेवा जान।
पावन हे तीजा परब, मिले सुघर वरदान।।

आस लगाके व्रत करैं,  करू करेला खाँय।
जप पूजा अउ ध्यान ले, मुँह माँगे वर पाँय।।

पहिरें लुगरा पोलका, टिकली चमके माथ।
चूरी  कंगन  हे  सुघर,  लगे  महेंदी  हाथ।।

घर-घर खुरमी ठेठरी, बनथे सुग्घर आज।
शिव भोला के जाप ले, पूरन होथे काज।।


ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

तीजा आगे जी !

मजा आगे,,,,मजा आगे,,,मजा आगे जी
छेल्ला होगेंव,हरियर लागे,तीजा आगे जी.....

महीना भर ले गुनत रेहेंव, कब तीजा आही,
अब बने घूमे बर मिलही सबेच्च मजा पाही !
ये सब ल गुन,गुन,मनभावन लागे जी..........

अब कोनों टोकइया नइहे जमके पिबो-खाबो,
दु दिन के अजादी मिले हे,खूबेच के इतराबो !
देख तो फटफटी म सारा आगे जी.........

ये जिछुट्टा संगवारी मन दुवारी म मेड़रावत हे,
अब बने मउका मिलही हप्ता भर ले गावत हे !
जम्मों लगोंटिया घूमे बर भागे जी.........

मनमरजी आजा,जाना नइहे कोनों ठिकाना,
जुन्ना सङ्गी के सङ्ग आनिबानी के गोठियाना !
गाँव गली अब तो ये सरग लागे जी.....

मजा आगे,,,मजा आगे,,,मजा आगे  जी
छेल्ला होगेंव,हरियर लागे तीजा आगे जी ।

               - राजकुमार 'मसखरे'

बुधवार, 20 अगस्त 2025

आगे तिहार हरेली

घर मोहाटी नीम डारा खोंचाये, अब लागे जइसे हवेली।
हरियर लुगरा पहिर के धरती, लगे दुलहिन नवा नवेली।
आगे जी आगे सुग्घर,आगे तिहार हरेली .....

नाँगर बख्खर धोवत माँजत, घाट घटोंदा ठेलम ठेली।
लोंदी खवावत नान्हे बाबू, बछरू संग खेलम खेली।।
चीला लहुटावत डोकरी दाई, डेरी हाथ मा धरे कसेली।
देवत हावय बड़े बहुरिया,भर-भर के पौनी पसेरी।।
आगे जी आगे सुग्घर,आगे तिहार हरेली..........

बरखा रानी ला बरजबे इंदर देंवता,आँखी हे कजरेली।
ऎती ओती किंजरत हे येसो,जादा करत हे बरपेली।।
साहित रहिहव डीही डोंगर, हूम देवत करत कलोली ।
नानकुन कुरिया हमर दाता,झन फोरे खपरा कवेली।
आगे जी आगे सुग्घर,आगे तिहार हरेली..........

अंग लागे के चाला मा बिछले के,ओखी खोजय अलबेली।
आनी- बानी के खेल खेलय,गुड़ी सकलाय सखी सहेली।।
लइका मन ला गेड़ी माँगय खेलय, पारा के टूरी अलबेली ।
छोरी छोरा देख भिरय कछोरा, मोटियार करे बरपेली।
बाँटी भाँवरा रस्साकसी, फुगड़ी डुआ मा पेलम पेली।।
आगे जी आगे सुग्घर,आगे तिहार हरेली.......... 
 
रोशन साहू ' मोखला ' (राजनांदगांव)
7999840942

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

घोर बरसा के मारे

टिकेश्वर ध्रुव


अब तो थिराले ग बरसा अउ कतेक बरसाबे 
नदियां, नरवा घलो थकगे तैं कब सिराबे।


रही-रही के चिखला होथे, सबो के जी कऊहागे 
घर म पानी, बाहिर पानी, छत म सिहर आगे।


तोर मारे कुछु काम नई होवै, मन म कोढ़ीयई हमागे
जाये के रहिस एति-वोती, फेर बइठ के दिन पहागे।


खेत-खार म टनटन ले पानी, मेड़ पार ह बोहागे
दीदी ह फँसगे तीजा म आजे, याहा दे पूरा आगे।


अतेक पानी म कोंन बाँचे, तरिया-नदियाँ सरबटागे
मछरी काहत हे कती तऊँरों, लागथे रस्ता भुलागे।


दिन निकलगे, रात पहागे, तीसर बिहनियाँ आगे
पानीच-पानीच चारो मुड़ा, लागथे बादर बइहागे।


छानी-परवा ह चूहे ल धरलिस, पानी घर म हमागे
घर ल छोड़ के कहॉं जावन, गुन के उदासी छागे।


लईका काहत हे पढ़ेल नई जांव, पानी म वहु छनागे
देख के बरसा के रुप ल आजे, मन म डर समागे।


अब तो थिराले ग बरसा अउ कतेक बरसाबे
नदियां, नरवा घलो थकगे, फेर तैं कब सिराबे।


अमलीभांठा, हसदा न.1
मगरलोड, धमतरी (छ.ग)

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

सुमत के दीया ला बारही कोन।

सुमत के दीया ला बारही कोन।
पुरखा मन ला जी तारही कोन।

दूसर के पय ला सबो खोलथे,
अपन ला इहाँ उघारही कोन।

हड़ताल मा जम्मो कुकरी हावे,
तब तो अंडा ला पारही कोन।

डोंगा चलइया नशा मा बुड़गे,
तब गंगा पार उतारही कोन।

राम भरत के प्रेम ला पढ़के,
खुद ला इहाँ सुधारही कोन।

भगवान के आगू मुड़ नइ नवाबे,
आवत क्लेश ला टारही कोन।

जम्मो बइगा मन जेल चलदिस
मनखे के भूत ला झारही कोन।

सब के भाग मा जीत लिखे रही,
तब ये दुनिया मा हारही कोन।

पड़े रही जे दुनिया दारी में "दीप"
वोखर ले वोला उबारही कोन।

कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

मनखे जनम धरे हस

अरे मनखे जनम धरे हस ता दुनियाँ मा
सोच समझ के कहना ला कखरो मान
जानवर ले बदतर घूट_ घूट जियत हस
फोकट मा जावत हे संगवारी तोर जान

अरे गाय _बछरू, छेरी _पठरू जइसन
दिन _रात मुँहू मा तैं पगुरावत रहिथस
कोनो तोर भलाई बर समझाही तोला
ता येला तंय हा अमरित हरे कहिथस

तुंहर खाए बर सौंफ,लौंग,इलायची हे
रंग_ रंग गुटखा,तम्बाकू ला खावत हो
पिए बर शुद्ध निर्मल गंगा मा पानी हे,
बीड़ी,सिगरेट,दारू ला मुंहू लगावत हो

आज हम धरे हन काली दुसर मन धरही
आज हम मरत हन कल दुसर मन मरही
समय रहते जागव जी ये नशा ला छोड़व
फेर देबखो बनाइया खुदे भुर्री कस बरही

रूप,रंग,पद,पइसा,कुर्सी के नशा भारी हे
लग गे कोनो ला ताहन ये असाद बीमारी हे
बाहिर ले नइ दिखे भीतर ले घुना कस खाथे
मुख मा राम अउ बगल धर के चले कटारी हे।

तुलेश्वर कुमार सेन
सलोनी राजनांदगांव

राहु-केतु घर मोरे आगिन

राहु-केतु घर मोरे आगिन, मैंहर जावौं काकर डेरा।
सात जनम बर ले ली दूनों, ए भुइयाँ मा हामन फेरा।।

लहुँट-लहुँट के घर ला आहा, जनमभूमि मा ममता बसथे।
शपथ महूँ ला अपनो भुइयाँ, मनखे अपनो समता रखथे।।
रिहा एकला कोन्हों नीहीं, रिहा जइसने सबझन केरा।
सात जनम बर ले ली दूनों, ए भुइयाँ मा हामन फेरा।।

घाम जनावे अबड़ सँवरिया, आरो पाके तैंहर आबे।
तन-मन मिलके जीव जुराबे, मोरे ऊपर छइयाँ छाबे।।
काम मार के भोला चलदिन, रति रोवाई दिल ला पेरा।
सात जनम बर ले ली दूनों, ए भुइयाँ मा हामन फेरा।।

भोग जगत् मा जादा करिही, जनम कुकुर के लेना परिही।
करम जइसने तैंहर करबे, फलो वइसने मिलबे करिही।।
का लेके तैं आए जग मा, काल सबो ला हावय घेरा।
सात जनम बर ले ली दूनों, ए भुइयाँ मा हामन फेरा।।

-सीताराम पटेल 'सीतेश'

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

एक प्रयास


काखर तीर बताववँ मैहर, मोरो मन के बात।
हाँ हाँ मोरो मन के बात।
चारों कोती बइठे हावय, सबो लगावय घात।
हाँ हाँ सबो लगावय घात।
जेती जाबे तेती मनखे, मारत हावय लात,
हाँ हाँ मारत हावय लात।
दिन बीतत हे लाँघन भूखन, बितही कइसे रात,
हाँ हाँ बितही कइसे रा sss.. त जी हरि ...।

सोंच समझ जे चलय नहीं जी, वोहर धोखा खाय,
हाँ हाँ वोहर धोखा खाय।
चोरी बदमाशी ले जे बाँचय, वोहर नाम कमाय,
हाँ हाँ वोहर नाम कमाय।
जे मनखे हा ये सब करथे, हवा जेल के खाय,
हाँ हाँ हवा जेल के खाय।
बइठ सकय ना बीच म कखरो, मुँहु ला वोह लुकाय,
हाँ हाँ मुँहु ला वोह लुका sss ...य जी हरि।

धीर मा खीर होथे कहिथे, ऊतियइल मा बउली जान,
हाँ हाँ ऊतियइल मा बउली जान।
ज्यादा लाहव झन लेवव जी, देखत हे भगवान,
हाँ हाँ देखत हे भगवान।
काम बने जे मनखे करथे, पाथय वोहर मान,
हाँ हाँ पाथय वोहर मान।
जीवन में गा वोहर हरदम, भरथे जी मुस्कान,
हाँ हाँ भरथे जी मुस्का sss ..न जी हरि।

दया धरम तँय करले संगी, उही ह जाथे साथ,
हाँ हाँ उही ह जाथे साथ।
सबके रक्षक हावे कहिथे, जग मा भोलेनाथ,
हाँ हाँ जग मा भोलेनाथ।
जुरमिल गा चलना अब हावे, सबो मिलावव हाथ,
हाँ हाँ सबो मिलावव हाथ।
"दीप" सुझाये हावय रद्दा, चलो नवावव माथ,
हाँ हाँ चलो नवावव मा sss..थ जी हरि।

कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी

लाल होवथे.

 
रोज  हमर  धरती हर, लाले  लाल होवथे।
नक्सल के  मारे माटी  लाले  लाल होवथे।

कायर मन छिप छिप के, घात करत रहिथें।
फौजी निरदोष मन हा, रोज मरत रहिथें।
कोरी कोरी रोजे गिन के , लाश  उठावत हन।
लहू लुहान सनाए हम, हार गोहारत हन।
हरियर बस्तर हा नरक, भुँई पलाल होवथे।
      रोज हमर--------
नक्सल  के  संगत  मा, का  मिलही तोला।
बिंदरी  बिनास  करही, बम  बारुद गोला।
कुकुर  कस  मरथो सबो, तहूँ मन घिलर के।
धर खाथे  सरापा हर, अनाथ  बेवा सब के।
भाई बर तो भाई हर, जीव के काल होवथे।
            रोज हमर - - - - - - - - -
सुतनिंदवा सरकार हर, कते दिन उम्हियाही।
ढाढस ला छोड़के वो, कते दिन बगियाही।
नक्सल के  कीरा हर, घुन्ना कस  खावत हे।
रहि  रहि  के आतंकी  मन, घरुवा बनावत हे।
बस्तरिहा बनवासी मन के, कुकरी हलाल होवथे।
       रोज हमर---------
लहुट के आजा बाबू रे, रद्दा ला सत के धर ले।
माटी के लाल तहूँ हस, माटी के पाँव परले।
परबुधिया  बनके रहिबे तौ  धारे धार जाबे।
मिहनत  अउ  सेवा  ले तँय, दूध  रोटी खाबे।
ये माटी महतारी हर, तोरो बाट जोहथे।
        रोज हमर धरती - - - - - - - -।

राजकुमार चौधरी "रौना"
टेड़ेसरा राजनांदगांव।

शुक्रवार, 26 मई 2023

बाटुर - बुता किसानी

चल असाढ़ तैं जाती - खानीख, बरस झमाझम पानी।
बखत बखत बड़कन करना हे, बाटुर -बुता किसानी।

परहा बर थरहा देना हे, दिन - दिन हे पछुवावत।
नट दे हे नलकूप तोर बिन, पानी नइ हे आवत।

सोयाबीन उरिद अउ राहर, कोदो ला हे बोना।
काम - बुता सब तोर भरोसा, तोर बिना का होना।

बरसे बर बादर ला कहि चल करय न आनाकानी।
बखत - बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।

बादर बरसे बर लउहावय,अब झन देर लगावय।
गरमी गदक निचोवत हावय, जल्दी जीव जुड़ावय।

गरमी छुट्टी अउ झन बाढ़य, सुनव निवेदन हावय।
मोबाइल के मतरे लइका जल्दी इस्कुल जावय।

सुटुर - सुटुर झन रेंगव देखव, बादर के बयमानी।
बखत बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।

खातू माटी बीज भात मा, लगत अजीरन खरचा।
टोंटा भर कर्जा काढ़े हन, लिखा -फँसा के परचा।

गरुवा-गाय गली के होगे, छुहनय खोजय पैरा।
चल तो आज बेड़ के लादवँ, कहय न लइका ऐ राख।

तोर असीस कृपा छत होगे, छाये छइहाँ छानी।
बखत - बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।

नदिया नरवा ताल तलइया, कचरा ले भर गे हें।
मनखे मन सो अकताइस का बिन माँगे दे दे हें।

बीज बिचेतख² परे भुँइया मा जेठ जरोइस भारी।
रुखराई बर उम्हियाइन बड़, टँगिया आरा -आरी।

पा असाढ़ के आरोख जगथे, जीव जगत जिनगानी।
बखत -बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।

देय तुँहर भर भरख पाये हन, जय हो असाढ़ राजा।
बादर ला तुम तियार जाहू, खूब बजाहय बाजा।

सावन सन तुँहरो गुण महिमा, गाबो बड़ सँहराबो।
रिमझिम असीस पाबो तब तो, खाबो घलो खवाबो।

आमा के अथान ले जाहव, चर -चर के हे चानी।
बखत -बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

 मनखे - मनखे एक समान

डॉ. पीसी लाल यादव

सुनो - सुनो ग मितान,हिरदे म धरो धियान।
बाबा के कहना मनखे - मनखे एक समान।।
एके बिधाता के गढ़े, चारों बरन हे।
ओखरेच हाथ म, जीवन - मरन हे।।
काबर करथस गुमान? सब ल अपने जान।
बाबा के कहना मनखे - मनखे एक समान।।
सत के जोत,घासी दास जगाय हे।
दुनिया ल सत के, ये रद्दा देखय है।।
झन कर हिनमान, ये जोनी हीरा जान।
बाबा के कहना मनखे - मनखे एक समान।।
जीव - जगत बर सत सऊँहे धारन ये।
मया मोह अहम दुख पीरा के कारन ये।।
झन डोला तैं ईमान,अंतस उपजा गियान।
बाबा के कहना मनखे - मनखे एक समान।।
साँसा - साँसा संगी, सतनाम सुमर ले।
सतसंग करके तैंहा, चारों धाम घुमर ले।।
कहिथे पोथी - पुरान,कर सत के गुनगान।
बाबा के कहना मनखे - मनखे एक समान।।

बुधवार, 27 जुलाई 2022

हरेली तिहार

प्रिया देवांगन "प्रियू"

बड़े बिहनिया सूरज जागे। काम काज जम्मो सकलागे ।।
खेत खार मनखे हर भागे। परब हरेली संगी आगे । ।
नांगर बक्खर रापा गैती। धोये माँजे झटकुन चैती । ।
रगड़ रगड़ बइला नउहाये। चंदन बंदन माथ सजाये ।।


रदरद रदरद बरसे पानी। लइका लोग करय मनमानी ।।
भरे लबालब नदिया तरिया। परे रिहिस जी जेहर परिया ।।
दाई चीला मीठ बनाये। गुड़ के चीला भोग लगाये ।।
गोल बनाये भइया लोंदी। देखत राहय बइठे कोंदी ।। 

फूल दूध अउ लोंदी गोला। धर के जाये झटकुन भोला ।।
माई लोगिन सब सकलाये। नाग देव ला दूध पियाये ।।
हे भगवन रक्षा तै करबे। दुख पीरा ला सब के हरबे ।।
खेत खार मा डोलय पाना। तब मनखे ला मिलही दाना ।। 


रच रच रच रच चढ़हे गेड़ी। टांँग टांँग के राखय एड़ी ।।
खो खो फुगड़ी दौड़ लगाये। लइका लोगन सब सकलाये ।।
खोंचय भोंदू निमुआ डारा। धर के झोला घूमय पारा ।।
कन्द मूल ला घर घर बांँटे। बीमारी ला ओहर काटे ।। 


बैगा मन हर भूत भगावै। मनखे मन ला अबड़ डरावै ।।
अंँधविश्वासी संगी छोड़ो। नाथ शिवा से नाता जोड़ो ।।
हमर गाँव के सुघर हरेली। नाचय गावय सखी सहेली ।।
साथ रहे के इही निशानी। परब हरेली हवै कहानी ।।

राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com

बुधवार, 13 जुलाई 2022

दो छत्‍तीसगढ़ी गीत

 डॉ.पीसी लाल यादव

 कथरी-गोदरी म जऊन पले हे

कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।
तन ओखर लोहा कस ढले हे।।
पर के हँसी-खुसी खातिर ओ,
बेरा-बखत पानी कस गले हे।।

सुख का ये?कभू जानिस नहीं,
दुख ल दुख कभू मानिस नहीं।
जेठऊरी म घलो हाँसत रहिथे,
छाँव सेती छतरी तानिस नहीं।।
आमा सही लहस के फले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

तन ले जब पछिना ओगरथे,
पथरा ले घलो पानी पझरथे।
तब दुनिया पाथे सोन-सिथा,
महल-देऊँर म अंजोर बगरथे।।
आँधी म घलो दीया कस जले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

करम ह जेखर रामायेन-गीता,
जिनगी जेखर कथा-कविता।
हक येखर कोनो नंगावय झन,
कोनो लूटे झन सुख-सुभिता।।
गंगा भगीरथ के पाछु चले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

जांगर पेरइया ललावत काबर?
ठलहा बइठइया पगुरावत काबर?
परपोसी अमरबेल के खातिर-
पेट-पीठ म फोरा परत काबर?
चिन्हव ओला कोन-कोन छ्ले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

मैं बीजा अँव.....

मैं बीजा अँव....मया के बीजा अँव।
अक्ती हरेली भोजली जँवारा,
छेरछेरा पोरा-तीजा अँव।।
मैं बीजा अँव.....

माटी तो माटी ये मोर बर,
पथरा संध म घला जाम जथँव।
जर मोर जतके माटी भीतरी,
ओतके अगास म लाम जथँव।।
तुलसी कबीरा के साखी दोहा,
वेद-पुरान के रिचा अँव।
मैं बीजा अँव.....

दुख-पीरा सहिके जग खातिर,
जेन हा हांसी-खुसी ल बोंथे।
नांगर जोतइया के पाँव चूम,
धन-धन मोर जिनगी होथे।।
दाई - ददा के मया -  दुलार,
डोकरा बबा के खिझा अँव।
मैं बीजा अँव.....

माटी महतारी दुलारे मोला,
सुरुज किरन हा गुदगुदाय।
पिरीत पानी पलोवय बादर,
पवन पुरवाही झुलना झुलाय।
सुख-सुम्मत के फुलवारी मैं,
भाईचारा बाग बगीचा अँव।
मैं बीजा अँव.....

परमारथ बर जिथँव-मरथँव,
रुखवा बनके फुलथँव फरथँव।
नान्हे काया म सिरजन समाय,
सुरुज अंजोर मुठा म धरथँव।
देवारी के दीया-बाती नोहर,
अरथदूज परब गोडिंचा अँव।
मै बीजा अँव.....

मान-गऊन के लोभ ना संसो,
आस-बिसवास जिनगी धारन।
भूख-दुख सहि के पीका फोरँव,
साँस सिरावे झन मोर अकारन।।
माटी बर जेन घेंच कटाइस ओ
बीर नारायण बेटा बीजा अँव।
मैं बीजा अँव.....

            डॉ.पीसी लाल यादव

रविवार, 29 मई 2022

महर - महर ममहावत ...

बिहारी साहू’ सेलोकर’

महर महर ममहावत हे,हमर अंगना दुवारी
फुलगे हमर अंगना मा,मया के ुफुलवारी
झिमिर झिमिर पानी बरसथे,सावन के महिना मा
तस तस मया ह बाड़थे,धरती दाई के कोरा मा
करथों तोर अगोरा मोर मैना,आतेस मया के बगीया मा
बना लेतेंव तोला मोर जोंहीं,गुनत रथों मैं रतिहा मा
बन जतेस तंय मोर राधा,मंय बन जतेंव बनवारी
फुलगे हमर अंगना मा,मया के फुलवारी
झुमर झुमर के नाचबो गाबो,आबे तंय फुलवारी मा
माथ नवातेंन दुनो,झन हम छत्तीसगढ महतारी ला
काखरो नजर झन लागे,हमर दुनो के मया ला
सुग्घर संजों के रखे रहन,अईसन ऐ फुलवारी ला
कोनो बईरी झन आवाय,हम करबोन ऐकर रखवारी
फुलगे हमर अंगना मा,मया के फुलवारी
महर महर ममहावत हे,हमर अंगना दुवारी
फुलगे हमर अंगना मा,मया के फुलवारी

चिरई खोंधरा

शशांक यादव
घर के अँगना म ठाढ़े लीम रुख
निहारत हे बैठे - बैठे मंगलू ह,
चिंव - चिंव के बोली ला सुन
देखे लगिस चिरई खोंधरा ला,
काड़ी कचरा ला सकेल के,
चिरई बनाये खोंधरा अपन,
नजर लहुटा के मंगलू देखय,
अपन छानहि कोती,
चिरई फेर आवय,फेर जावय,
चोंच म धर के लावय दाना,
नान्हे - नान्हे पिला के भूख भगाय
मंगलू देखे लगिस अपन लइका कोती,
अउ मुस्का के अपन बुता म निकलगे।।

निवास - गंडई
जिला - राजनांदगांव              
मो - 8103840047