रोज हमर धरती हर, लाले लाल होवथे।
नक्सल के मारे माटी लाले लाल होवथे।
कायर मन छिप छिप के, घात करत रहिथें।
फौजी निरदोष मन हा, रोज मरत रहिथें।
कोरी कोरी रोजे गिन के , लाश उठावत हन।
लहू लुहान सनाए हम, हार गोहारत हन।
हरियर बस्तर हा नरक, भुँई पलाल होवथे।
रोज हमर--------
नक्सल के संगत मा, का मिलही तोला।
बिंदरी बिनास करही, बम बारुद गोला।
कुकुर कस मरथो सबो, तहूँ मन घिलर के।
धर खाथे सरापा हर, अनाथ बेवा सब के।
भाई बर तो भाई हर, जीव के काल होवथे।
रोज हमर - - - - - - - - -
सुतनिंदवा सरकार हर, कते दिन उम्हियाही।
ढाढस ला छोड़के वो, कते दिन बगियाही।
नक्सल के कीरा हर, घुन्ना कस खावत हे।
रहि रहि के आतंकी मन, घरुवा बनावत हे।
बस्तरिहा बनवासी मन के, कुकरी हलाल होवथे।
रोज हमर---------
लहुट के आजा बाबू रे, रद्दा ला सत के धर ले।
माटी के लाल तहूँ हस, माटी के पाँव परले।
परबुधिया बनके रहिबे तौ धारे धार जाबे।
मिहनत अउ सेवा ले तँय, दूध रोटी खाबे।
ये माटी महतारी हर, तोरो बाट जोहथे।
रोज हमर धरती - - - - - - - -।
राजकुमार चौधरी "रौना"
टेड़ेसरा राजनांदगांव।
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
लाल होवथे.
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