इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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रविवार, 28 दिसंबर 2025

धारणा

प्रिया देवांगन "प्रियू"
 
आज बहुत देर हो गई विशाल, मुझे जल्दी जाना था। उनके घर कल बहुत सारे मेहमान आए थे; घर तो चिड़िया का घोसला बना होगा, काम तो पूछो ही ना.....!
जाते ही बुढ़िया की डाँट सुनो सो अलग;  ये मालकिन लोग कहाँ किसी की बातें समझते हैं?
रीना अपने पति विशाल से बातें करते–करते काम पर जाने की तैयारी कर रही थी।
रीना प्लीज़..... आज मत जाओ न। विशाल बोला।
"रीना..... क्या आज भी तुम झूठे बर्तन साफ करोगी?" 
हाँ..... रीना दो टूक बोल शांत हो गई और स्लीपर पहन घर से निकल गई।
पूरे रास्ते रीना को बस एक ही सवाल दीमक की तरह खाए जा रहा था; आज तो मेरी खैर नहीं। हे प्रभु! कृपया आज डाँट खाने से बचा लीजिएगा। बड़बड़ाती हुई रीना बुढ़िया के घर पहुँची।
          ट्रिन...... ट्रिन..... बेल बजते ही बुढ़िया दरवाजा खोली और ऊपर से नीचे रीना को घूरने लगी। रीना सर नीचे झुका कर बोली सॉरी आंटी आज.... थोड़ी.....!
 हम्म.... अंदर आओ। कुछ बोलने से पहले ही बुढ़िया ने रीना को शांत करा दिया।
रीना को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि आज बुढ़िया शांत क्यों है! अब सुनने को तैयार हो जा रीना....रीना खुद से बातें करने लगी। ये खडूस बुढ़िया से कोई नहीं बचा पाएगा। 
रीना खुसफुसाती हुई रसोई में गई और देखते ही भौंचक रह गई।
अरे.....ये क्या चमत्कार हो गया? 
आंटी जी! रसोई का सारा झूठा बर्तन कहाँ हैं और आज घर भी बहुत साफ– सुथरा लग रहा है; कल मेहमान नहीं आए थे क्या? 
आए थे चले गए। बुढ़िया बोली। 
चले गए मतलब....?
"तुम्हें क्या लगा रीना आज मैं तुमसे हमारे झूठे बर्तन साफ करवाऊँगी?  नहीं.....नहीं.......मुझे अच्छे से पता है कि आज तुम्हारा पहला करवा चौथ का व्रत है इसलिए मैं और मेरी देवरानी मिल कर सारा काम खत्म कर दिए ताकि तुम्हारे निर्जला व्रत में कोई कष्ट ना हो।"
लेकिन आंटी जी....रीना धीमे स्वर में बोली।
हाँ रीना, तुम भी तो अपने घर की लक्ष्मी हो न और आज तो अपने पति के लिए निर्जला व्रत भी रखा है तुमने। अगर तुम हमारे झूठे बर्तन साफ करोगी तो मुझे पाप लगेगा। 
रीना को ऐसा लगा जैसे कोई साॅंप सूॅंघ गया हो। हैरानी से बुढ़िया को एक टक निहारती रही।
बातें सुन रीना की आँखों में आँसू की दो बूँदें झलकने लगीं।
       तुम्हारे आते ही मैंने चेहरा पढ़ लिया था। ऐसे ही धूप में बाल सफेद नहीं किए है मैंने। रीना स्टैच्यू की तरह खड़ी रही।
तभी बुढ़िया बोली– "रीना, देखो ये मेरी साड़ी और ये मेकअप किट; तुम पर बहुत अच्छी लगेगी।
   पर आंटी जी इसकी क्या जरूरत.....!
नहीं री.....ये रखो मेरा आशीर्वाद समझ लो।  बुढ़िया की बात नहीं मानेगी?
बुढ़िया मुस्कुराती हुई बोली।
मुझे माफ कर दीजिए आंटी जी, मैंने आपके बारे में न जाने कैसी गलत धारणा बना ली थी। रीना मायूस हो कर बोली।
अच्छा आंटी जी, मैं चलती हूँ कल समय से आ जाऊँगी।
न....न....कल तुम आराम करना, परसों मिलते हैं। 
जी आंटी जी।
रीना सुनो....।
रीना झट से पीछे मुड़ी।
बेटा मैं तो तुम्हें देख नहीं पाऊँगी, ये साड़ी और मेकअप में; तो फिर....??
कोई बात नहीं आंटी जी मैं आपको व्हाट्स एप पर फोटो शेयर कर दूँगी।
फिर क्या था....... दोनों की हँसी घर में गूँजने लगी; और रीना भगवान को धन्यवाद करती हुई आगे बढ़ चली।
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

सोमवार, 15 सितंबर 2025

कंठी माला

     मुरारी लाल साव


दूनो मितान बईला बेचे बर निकले रहींस l अपन अपन अंकड़ा बईला के जोड़ी बनाये रहिस l एक ठन भूरवा  दुकालू के पिवरा बईला सुकालू के रहिस l बईला जोड़ी आघू आघू पाछू म दूनो मितान गोठ बात करत जात रहिस l सुकालू -" 
सब बात तो बन जही लेन देन के l है नहीं l आधा आधा होही बँटवारा ह l फेर मोर बईला म चमक दमक अउ रोठ पोठ हे त 
कुछ उपराहा दे देबे मितान,बन जही नहीं l"
दुकालू ठीक हे फेर मोरो ला सुन  मोर बईला कंठी माला पहिरे हे थोकिन जादा ज्ञानी समझदार हे तोर बईला अस बईला नइ हे इशारा ला जान डरथे l  शास्त्री जी करा ले कंठी माला पहिराये हँव जाने l चमत्कारी कंठी हरे lथोकून उपराहा तहूँ दे देबे l ठीक है ना l नइ ते अंकड़ा अंकड़ा बेच देबो l इही सुझाव बने जंचत हे l
सुकालू कहिस बन जही l लेकिन मोला बता कंठी माला काबर पहिनायहस? बता देना राज के बात l
जेन गुरु बनाथे तेन ला कंठी माला दे जाथे l कंठी माला पहिरे के बाद उही ह गुरु बन जाथे l मोर बईला गुरु बन के देखाही  l बिन गुरु के कोनो ला ज्ञान मिले है? 
सुकालू -" बईला मन के कोन कान फूंकाथे अउ गुरु बनाथे?
अचरज के बात है l" 
"कुछु अचरज के बात नइ है l बईला मन गुरु बनाथे चेला बन के भीड़ बढ़ाथे l मोर बईला अपन जोड़ी बनाये हे ओकरो कान ला फूँकत जात हे, समझें l मोर बईला गुरु बन जही तोर बईला चेला, देखबे  तो l"  
ये दे चोरहा गाँव पहुँच जाथन l उहें पता चल जही l सीहोर जाबो का जी l " 
दुकालू  -"मोरो बईला ला कंठी माला पहिराये के मन होवत हे  l "  सकालू कहिस -" मोर बईला सब सीखा दिही l "
सुरजीडीह म रुकबो l सन्तु ला पूछ लेथन l 
बर के छाँव म बईला मन ला बांधिस  l लेवाल मन आइस देखिस l जबरदस्त जोड़ी हे l कंठी माला वाले बईला तो बड़ सुगघर गुरु बाबा असन दिखत हे l एक झन पूछिस -" का क़ीमत हे जी l" 
" अंकड़ा कि जोड़ी " ""मतलब "
ए गुरु हे अउ ए हा चेला "
 चेला बिना  गुरु नइ रहय अकेल्ला l" 
"जोड़ी बेचना है "  
"तीन लाख दे दे l" लेवाल सुन के मुँह फार दीस l
दिव्य दरबार गे हस कभू?इही बीच सुकालू पूछिस - " बड़े बड़े महराज मन के भागवत कथा सुने ला गे रहेस?लेवाल कइथे हौ l बीस लाख -तीस लाख मांगथे l सुने हस ना l " 
ओमन पंडित विद्वान ज्ञानी हरे 
तोर बईला से ओकर का लेना देना l" "लेना देना हे भाई- ओकरे मन के कंठी माला पहिरे हे l पूरा कथा ला सुने हे सब जानथे l" अरे वाह दिव्य चमत्कार हे तब तो l सुनत सुनत लेवाल के मन होइस l "गाँव भर के मन मिल के ले लेथन l"  लेवाल पूछिस तोर कंठी वाले ले कुछ पूंछव का मन के बात? 
पूछ के देख l पूछिस -" मोर ददा के ददा के नाँव का रहिस?
बईला लात मारिस अउ मुड़ी हिलाइस l सुकालू बोल के बताइस -" लतखोर " l लेवाल के खुशी के नइ ठिकाना नइ रहिस l हौ हौ एकदम सहीच हे l दूसर लेवाल भूरवा बईला ला पूछिस -" दू लाख म आहू " 
भूरवा  रोंठ पोठ हे अपन चेला के गुन ला बताइस l अपन सिंग म हमेले ला धरिस l दुकालू कहिस -" गुस्सा होगे हे  पाँच लाख कहत हे l" कइसे 
देख पाँच बार खुर ले खुर्चे हे l"
अब जादा परीक्षा झन लेव l सुकालू समझाइस l  गाँव भर म चर्चा फ़ैल गे l आखिर म गाँव वाले मन सकेल के खरीद लेथे l दूनो मितान बईला कोचिंया के भाग खुलगे l कंठी माला के असर ए मितान lगुरु के किरपा ले तोरो  बईला पक्का चेला बन गे l गाँव वाले मन जाने समझे lचल निकल इहाँ ले घर म जाके करबो बँटवारा l सुकालू के बात ला मानत दुकालू कंठी माला के नाम लेवत झोला म भर के दूनो निक लगे उत्ता धुर्रा l

सोमवार, 1 सितंबर 2025

कॉफ़ी कैफ़े

 

नीलमणि
 
     लगभग बीस साल बाद तीन पुरानी सहेलियाँ— नीलू, रेखा और कविता कॉफ़ी कैफ़े में मिलीं। कॉलेज के दिनों की मस्ती याद करते-करते बात अचानक पतियों पर आ गई। नीलू हँसते हुए बोली, “मैंने अपने पति को शादी से पहले आठ साल तक जाना, सोचा अब सब समझ लिया। लेकिन शादी के बाद पता चला कि मैं तो उन्हें सिर्फ़ 8% ही जानती थी। नए-नए  रंग रोज़ सामने आते रहे।”
     रेखा ने भी ठंडी साँस भरते हुए कहा, “अरे! मेरे तो सिर्फ़ दो साल की जान-पहचान थी। तब  लगा बहुत कुछ जान लिया है, लेकिन शादी के बाद समझ आया, असल में मैं उन्हें मुश्किल से 2% ही समझ पाई थी।”
      दोनों हँसते-हँसते कविता की ओर देखने लगीं। कविता शांति से कॉफ़ी का घूँट भरते हुए बोली, “तुम दोनों भाग्यशाली हो, कम-से-कम प्रेम का स्वाद तो चखा। मैंने तो अब तक वो स्वाद भी नहीं चखा। हाँ, पति की रोज़-रोज़ एक जैसी आदतों का ‘धैर्य-रस’ ज़रूर पी रही हूँ। बाइस साल से एक ही स्वाद— बिना शक्कर की कॉफ़ी जैसा।”
     तीनों ज़ोर से हँस पड़ीं। नीलू ने मज़ाक में कहा, “लगता है हमारी ज़िंदगी की कॉफ़ी में सबसे अलग स्वाद कविता के पास ही है।”
परिचय –   नीलमणि
निवासी - मवाना रोड, मेरठ (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल नंबर -9412708345
 

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

भालू के जी पुतकी म

           - मुरारी लाल साव
 
 जगेसर हँसत कहिस- "देख भालू कति ले किंजर के आके घर म घुसत हे l " 
बिसेसर मुड़ी ला घुमावत देखिस -" आज तो भालू भारी टेंशन म हे तइसे लागत हे l"
पकलू बैगा के टुरा पिंटू ला सब झन भालू भालू कहिथे l भालू जइसे झूलपाहा अउ अपन ढंग ले  अलगे रहना गोठियाना सब अलगेच हे l ओइसने एक झन ला कोलिहा कहिथे, नाम ओकर कलेश हे l कोलिहा आके बताइस -"कका  भालू ला सरपंच बनेच धमका देहे l "
जगेसर पूछिस -"काबर?
कोलिहा टुरा कहिस -" मै का जानव ग l का का बात होइस ते l" बिसेसर कहिस -" भालू च पूछ लेथन ओमा का बात हे l जा तो बुला के ले आ l कोलिहा टुरा चल दीस l
आइस दूनो झन आघू म खड़ा होगे l
"का होगे कका? "
 बिसेसर पूछिस-" तही बता ना? सरपंच तोला का कहि दीस? "
भालू के जी पुतकी म होगे l
मामला गड़बड़ होवत हे l बताये च पड़ही l भालू कहिस -"तरिया म कोन अपन बच्चा ला फेंके हे तेखर पता लगा के बता कहिथे सरपंच हा?
तरिया पार म किंजर थन एखर मतलब सब चीज ला थोड़े जानबो l"
जगेसर कहिस -" एला महूँ सुने रहेंव l"
भालू ल पूचकार के पूछिस -"जानत होबे बता दें ना? "
एला तो गाँव म हाँका परवाही त पता चल जही lकोन गर्भवती अपन गरभ ला गिरवाए हे "-जगेसर कहिस l 
कोलिहा कहिस -" भालू ल डरवावत हे सरपंच ह l'
भालू के हिम्मत नई होवत हे l
 कतका लेन देन म काम होइस l बहुत बड़े घटना हे ये हा l एखर जाँच होना चाही l ये सब लट फ़स अउ लंदी फंदी घटना सरपंच के आये ले होवत हे l
एला सुन भालू के  जी पुतकी म lअउ  जादा घबराये ला धर लीस l

              कुम्हारी

बुधवार, 20 अगस्त 2025

अन्तर्वेदना

 

प्रिया देवांगन "प्रियू"
 
 "मुझे अपनी शरण में ले लो राम...... ले लो राम"
 "मुझे अपनी शरण में ले लो राम................!!"
रानो तुम ये उदासी भरा भजन क्यों गा रही हो और ये क्या तुम्हारी आँखें सरोवर की तरह डबडबा गई हैं? प्यारे ने अपनी पत्नी रानो के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
प्यारे! अब जीवन अंतिम पड़ाव पर है, भगवान भजन ही हमें मोक्ष की ओर ले कर जाएगा। रानो प्यारे के हाथ पर हाथ रखती हुई बोली। 
                         धत् पगली! हमने कौन सा पाप किया। पाप ही तो.....रानो आगे कुछ बोलती उससे पहले ही प्यारे ने उनको चुप करा दिया।
अच्छा सुनो रानो! हाँ प्यारे कहो; पता है न इस बार हमारी वैवाहिक वर्षगांठ के दिन कौन आने वाला है।
अरे हाँ.....! मैं कैसे भूल सकती हूँ। रानो मुस्काती हुई बोली। क्या रानो तुम भी न! 
                  प्यारे!..... न जाने क्यों मेरा हृदय उनसे मिलने को इतना आतुर है, और दूसरी तरफ कोने में छिपा भय बार–बार संकेत कर रहा है, लेकिन क्या? 
मुझे समझ नहीं आ रहा है। तभी! रानो और प्यारे की बातें उनके खास मित्र लखन लाल जी ने सुन लिया और बोले– "क्या बहन जी; आपको हमने कितनी बार समझाया कि ज्यादा मत सोचिए आप लोगों को बहुत अच्छा तोहफा मिलने वाला है; खास मैनेजर साहब ने इंतजाम किया है। भई....मैनेजर साहब से हम बहुत बार मिल चुके हैं अब आप लोगों की बारी है।"
                    थोड़ी देर बाद...... दूर खड़ी प्यारे और रानो की केयर टेकर आई  और बोली- "सुनो....सुनो....सुनो! सभी एक जगह इकट्ठा हो जाइए। आप लोगों को जिस पल का इंतज़ार था वह ख़त्म हुआ।" सभी के चेहरों पर मुस्कान की लालिमा दस्तक देने लगी।
         
             चलो....चलो रानो जल्दी चलो; वे आ गए हैं। दोनों एक–दूसरे का हाथ पकड़ कर तेज चलने लगे। प्यारे की खुशी का ठिकाना ही नहीं था मानो कोई अपना आया हो। हाँ प्यारे अब चलो भी!
ओह! इतनी अच्छी सजावट मैंने आज तक नहीं देखी। रानो अपने दोनों गालों पर हाथ रखती हुई हैरानी से बोली। सच....आखिर मैनेजर साहब कौन और कहाँ हैं? चलिए न प्यारे...! सबसे पहले उनको आशीर्वाद देकर धन्यवाद करते हैं। 
                    अरे! शायद वे रहे मैनेजर साहब। पीछे मुँह करके खड़े हैं, जैसे ही  प्यारे ने उनके कंधे पर हाथ रखा मैनेजर साहब उनकी तरफ मुड़े। 
   
             ये क्या!... प्यारे ये तो तुम्हारा भतीजा है। जो विदेश में रहता है।  हाँ रानो! कुछ सेकेंड तक तीनों एक–दूसरे की तरफ टकटकी लगाए देखते रहे। प्यारे की लड़खड़ाती जुबान बोली– "आपने तो हमें सरप्राइज़ ही कर दिया।" मैनेजर साहब! सही कह रहे थे लोग; धन्य हैं तुम्हारे माता–पिता धन्य हैं; जो तुम्हें जन्म दिए हैं। बोलती हुई रानो मैनेजर साहब के दोनों हाथों को पकड़ कर रोने लगी। देर से ही सही तुम्हें अक्ल तो आई।

            जो बेटा अपने माँ–बाप के जीते जी सेवा न कर सका। आज उनके गुजर जाने के बाद इतने बड़े वृद्धाश्रम में दूसरों के माँ–बाप को संभालने और खुश रखने की जिम्मेदारी उठा रहा है। ये पश्चाताप का अच्छा अवसर ढूँढ रखा है बेटा। प्यारे ऊँची आवाज में बोले। अपनी नाराज़गी जताते हुए प्यारे, रानो का हाथ पकड़ उल्टे पाँव कमरे की तरफ लौट गए। वृद्धाश्रम में खड़े बुजु़र्गों की आँखें भर आईं। दूसरी तरफ मैनेजर साहब सर झुकाए फफक कर रो पड़े। रानो और प्यारे को उनकी इकसठवीं वर्षगांठ के तोहफ़े ने हृदय की गहराई तक झकझोर दिया।
 



राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़


सोमवार, 18 अगस्त 2025

कुकुर कटायेन

मुरारी लाल साव

 

खच्चखच ले हाल भरे रहिस l
बड़का आदमी आये रहीस l बड़े -बड़े मैनखे मन मंच म बइठे रहिन l खालहे म सब कार्य कर्ता मन  हाथ ला उठावत सुनत रहिन l
बड़े -बड़े गोठ होवत रहिस l
नदिया म पानी रहे चाहे झन रहे इंखर बानी ला सुनके अइसे लगत रहीस इहाँ पूरा आगे हें l
एके बात म निर्णय होना रहिस उही बेरा चेंदवा मुड़ी के एक झन आदमी खड़े होके कहिथे -" झोला दें  घूम घूम के चंदा उही म लाना हे l" 
खालहे म बइठे मन के बीच खलबली मच गे l 
कुकुर मन कस दाँत खिसोर के  गुर्राना  एक दूसर के मुड़ी हाथ ला धरी के धरा होना शुरू होगे l  जेन ला झोला के जिम्मेदारी मिलथे ओकर रुतबा बाढ़ जथे l पलटी मार पलटू ला मिलगे l
जगतु के जी कचौवट रहिगे l 
'राम रमायेन तिहाँ,कुकुर कटा येन l '
फ़ेर चेंदवा मैनखे कहिस -" चंदा भरे -धरे बर नोहय  झोला ह, ...एमा तो
फूल भर के लाना हे l  
'कुकुर कटायेन बंद करो l बस खांव -खांव   तुंहर मन के l थोकिन धीर धरे राखे करव l " 
थोकून रुक के फेर कहिस -
"बस तुमन उल्टा सोचत रहिथव 
मया पाये बर फूल बरसाओ l
बड़े बड़े गज़माला पहिनाओ l "
 अतका सुन हाल म  शान्ति छागे l जगतु  मने मन कहिस 
बारा आना  गये पाकिट म l 
खा पी के  उड़ाही  काला धराही l पलटू दिही खाली झोला? 



          कुम्हारी

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

वसीभूत

मुरारी लाल साव 

 

 एक दिन अपन घर के आघू म बैठे रहेंव l एक करिया कुकुर तीर म आथे अउ टुकुर टुकुर देखथे l ओखर आँखी म लालच के पुतरी एक टक देखत रहिस l अपन हाथ ला बार -बार खीसा म डारंव अउ निकालत रहेंव l
कुकुर अउ निटोर के देखय एकर सेती कुछु न कुछु दिही l
ओकर लालच अउ बढ़गे l ए दफे मय मुठा भर ला निकाले के आघू म रखेव l कुकुर अउ तीर म ऊं ऊं ऊं करत आगे l मुट्ठा ला खोल देंव कुछु नइ गिरिस l कुकुर के जी चुरमुरागे l एक बार फ़ेर हाथ ला खीसा म डारेव अउ निकालेंव मुठा ला नइ खोलेंव अउ दूसर डहर ला देखे के नाटक करेंव l करिया कुकुर धीरे धीरे सूंघियावत आगे l मुठा ला खोलत ओकर मुड़ी ला खजुवाये ला धर लेंव l कुकुर अपन मुड़ी ला पूरा दता दीस l खजुवाना ओला बने लागिस l तब लालच नइ रहिस ओकर आँखी म बल्कि दूनो आँखी ला मुँद लीस बेफिक्री होगे l शायद जान डरिस देवय नहीं त मारे भगावे तको नहीं l
कुकुर के भीतर जागे मया भरोसा ला तोड़े के महूँ कोनो उदिम नइ करेंव l ओकर मुड़ी ला छुवत खजूवावत दस मिनट होगे रहिस होही l बिन हांत -हुत के चुप चाप उठ के दूसर कोती रेंगे ला धर लेंव l कुकुर मोर पीछू पीछू आये ला धर लीस l कुकुर के हिम्मत बढ़गे मोर संग आये ला l दूसर कुकुर मन देख के भूके ला धरिस l करिया कुकुर मोर आघू पाछू घूमत दूसर कुकुर ला ज़वाब दे वत रहिस - " मुठा बंधाये हे अभी नहीं तो कभी भी खोलही मोर हिस्सा हे मोर आदमी हे एखर पाछू संग ला नइ छोड़व l"
करिया कुकुर ला मोर कुकुर नइ कह पांवत हँव
काबर -"मया अउ लालच म कभू भी ककरो संग ककरो पाछू भाग सकत हे l"
दूसर दिन फ़ेर अउ अउ बैठेव l
ए दफे पूरा साहस के साथ मोर गोड़ ला चूमे ला धर लीस l अपन आँखी ला मुँद के लोर्घयाये ला धर लीस l सोचेंव थोकिन मया म अतका अपना पन कुकुर के मन म आ गेहे l डउकी लइका म नइ दिखय l ओमन तो कुकुर ले जादा मतलबी स्वार्थी होथे l कुकुर के तीर म आये आदत परगे फ़ेर तीर म रहिके डउकी लइका धुरिहा धुरिहा रहिथे l मौका आही त पूछय नहीं l

मुरारी लाल साव
कुम्हारी

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

डीजे

      लइकामन के नइ रहे ले घर हा सुन्ना होइच जाथे। कार्तिक महाराज हा कमरछठ बर गे हावय ते कहीं-कहीं काम निपटावत धरती च मा हावे अउ आज पितर बैसखी घलो हो गे। दूनों लइकामन के गोठ करत भगवान शंकर अउ माता पार्वती हा बइठे रहय। ठउका उही बेरा गणेश जी हा मुसवा मा चघ के ऊँखर तीर मा आवत राहय। उन ला देख के शंकर जी अउ माता पार्वती हा अकचका गे। गणेश हा अपन दाई-ददा के पाँव पायलगी करिस, दूनों परानी हा गणेश ला चूमिन पोटारिन; ओकर हाल-चाल पूछिन। शंकर जी अउ माता पार्वती हा ये सोच के मने मन मा गुनत राहॅंय कि एसो कइसे गणेश हा लघिंयात धरती ले लहुट गे। उन एखर बारे मा जब गणेश ला पूछिन ता गणेश जी कहे लागिस।‘‘ए पइत प्रशासन के किरपा होगे महतारी नइ ते जानथस तो पितर पंचमी के आवत ले मूर्ति विसर्जन करथे।’’
‘‘काय किरपा करे हे प्रशासन हा एसो?’’
‘‘प्रशासन अउ कोर्ट सख़्त चेतावनी जारी कर दिन हे कि ये दारी मूर्ति विसर्जन मा कोनो भी प्रकार के डीजे या धुमाल नइ बजाए जाही।’’
‘‘ता भगत मन ये आदेश ला मान गें?’’
‘‘भगत मन हा तो शासन के ये आदेश के जय-जय मनाइन, फेर जानथव तो उन तथाकथित भगत मन ला। धरम-करम के असली मरम जानबेच नइ करॅंय अउ आँखी देखाए बरोबर नखरा लगावत रिहिन। प्रशासन घलो बने हकन के आदेश के पालन करवाइस हे। ‘भगवान हार गे, प्रशासन जीत गे’ अइसनहा तक काहॅंय। इँखर देखनउटी पूजा-पाठ के मारे जाय के मन घलो उतर जाथें, पूजा के नांव मा अतिक प्रदूषण बगराथें, अतिक फटाका फोड़थें; ते मोला खुदे अकबकासी लाग जाथे, फेर अपन सच्चा भगत मन बर जाय ला परथे। जेन धरम हा प्रकृति ला सरेख के राखे के गोठ कहिथे, ओखर बढ़वार के गोठ करथे; उही प्रकृति के सरी छरी-दरी करत हावय। ये मन ला पूजा-पाठ ले काहीं लेना-देना नइ राहय; बस पियई अउ डंगचगहा मन बरोबर नचई। एसो सबे कोती पारंपरिक बाजारूंजी मा ही मूर्ति विसर्जन होइस हावे, देखके अंतस हरियागे। मँय तो कहिथंव कि धरम-करम के नांव मा जतेक भी प्रकृति के बिगाड़ वाला काम होथे उन सब ला चमचम ले बंद कर देना चाही।’’
‘‘बने काहत हावस बेटा, आज नइ ते काली अइसन होबेच करही। अब नवरात्रि अउ ईसर-गउरा के पूजा हा घलो बने ढंग ले होही।’’
दिलीप कुमार निषाद
दुर्ग

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

थोड़ी सी पत्तियाँ

 

अनिता रश्मि

वे जब भी सब्जियाँ खरीदतीं, मुफ्त का धनिया, मिर्ची, अदरक लेने से कभी नहीं चूकतीं। उनकी कार या स्कूटी जैसे ही बाजार के किनारे लगती, सब्जीवालों के चेहरे पर दबी मुस्कान थिरक उठती। सभी की मंद मुस्कान में उनकी आदत का भेद छुपा था।
आज भी लाल कार बाजार के किनारे लगी। वे उतरीं। थैला संभालते हुए आगे बढ़ीं। बैंगन, तोरई, टमाटर, कद्दू के साथ वापस लौट पड़ीं। सब चौंके। एक की आवाज - मेमसाब! आप कुछ भूल रहीं हैं।
- नहीं! आज बस इतना ही।
- आज धनिया पत्ती या मिर्च मुफ्त।
  में नहीं लेंगी?
सब्जीवाले ने थोड़ी सी पत्तियाँ हाथ में उठा लीं। दूसरे ने मिर्च की ओर इशारा किया।
- नहीं!....
  सबके चेहरे पर छिपी मुस्कान नहीं, आश्चर्य था।
आगे कहा,
- .....मैं कल खेत पर गई थी। किसानों की अथक मेहनत देखी थी।

जूते


 डॉ. पूरन सिंह
 
आज अपनी बेटी के कहने पर मैं बाजार गया. मेरी बेटी और मैं दोनों ही शॉपिंग कर रहे थे. बेटी ज़िद करने लगी कि पापा आप अपने लिए अच्छे से जूते ले लो. मैं अपनी बेटी को बहुत प्यार करता हूँ उसके कहने पर लिबर्टी के शोरुम से 2299 रुपए के जूते खरीद लिए. बेटी ने सारा सामान लेकर गाड़ी में रख दिया.
बेटी ही कार ड्राइव कर रही थी. मैं उसके पास ही बैठा था. मैं कभी जूतों को देखता तो कभी अपने आप को.
अब से लगभग बीस साल पहले की वह बात सहसा मस्तिष्क के किसी कोने में कुलबुलाने लगी. वह एक छोटा सा गांव था. उस गांव में कई परिवार हमारी जाति के रहते थे. मेरे चाचा और बाबा दोनों ही कच्चे चमड़े के जूते बनाते थे. जानवर की खाल पर नमक लगाकर सुखाया जाता फिर उन्हें रंग डालकर पकाया जाता था. तब जाकर कहीं कच्चा चमड़ा तैयार होता था. बाद में चाचा और बाबा चमड़े से जूते बनाते थे. जूतों की हाट लगती थी जहाँ जूते बेचे जाते थे.
उस दिन भी कोई त्यौहार था. शायद होली थी. सभी लोग एक दूसरे के घर मिलने जा रहे थे. मेरे चाचा बहुत शौकीन मिज़ाज थे. वे अच्छी सी धोती, कुर्ता और अपने बनाए जूते पहन कर होली मिलने निकले थे. सबसे पहले वे पं. जयनारायण जी के घर गए थे. मैं उनके साथ ही था. पंडित जी से पायलागन करने के बाद उन्होंने दूर से ही जमीन से सिर लगाया था. पंडित जी ने आशीर्वाद दिया था और चाचाजी को सिर से पैर तक देखते रह गए थे. फिर चाचा जी, ठाकुर रुद्रनारायण के घर गए थे और बाद में मुहल्ले के सभी लोगों के यहाँ.
होली का दिन खुशी-खुशी निकल गया था. अगले दिन ही पंचायत इकट्ठी हुई थी. अपराधी मेरे चाचा थे. पं. जयनारायण के आदेश पर ठाकुर रुद्रनारायण ने चाचा से पूछा था-
“खचेरा, तूने अपराध किया है. बोल क्या सज़ा दी जाए.”
“अन्नदाता, पहले मुझे मेरा अपराध तो पता चले फिर चाहे जो सज़ा मुझे देंगे स्वीकार होगी. आप तो हमारे भगवान हैं.”
“तू जूते बनाता है. यह तेरा व्यवसाय है. लेकिन तू जूते पहनकर पूरे मुहल्ले में घूमता फिरे यह कहाँ की बात है नीच. कुछ तो अपनी जाति का खयाल किया होता. औकात भूल गया अपनी कमीने. तुझे शरम नहीं आई.” यह आवाज पंडित जयनारायण की थी.
“इसमें मैंने कहाँ अपराध कर दिया पंडित जी” – चाचा का तर्क अधूरा ही रह गया था कि ठाकुर साहब बोल पड़े थे –
“हरामजादा हमारे पंडित जी से जबान लड़ाता है. इनसे ज्यादा ज्ञान है तुझमें. इनसे ज्यादा वेद पढ़े हैं तूने. तू धर्माधिकारी है. अपनी जाति दिखाता है कमीने. चलो इसे नंगा करके इस पर सौ कोड़े बरसाओ. यही पंचायत का हुक्म है और चेतावनी यह है कि फिर कभी खचेरा या इसकी जाति का कोई चमार जूते पहनने की कोशिश करे या पहनकर घूमता दिखे तो उसका भी वही हाल किया जाए जो खचेरा का किया जाना है.”
चाचा को नंगा करके कोड़े लगाए गए थे. साड़-साड़ की वह दर्दनाक आवाज मेरे कानों में फिर से गूंजने लगी थी. सहसा कार एक झटके से रुकी. सामने कोई जानवर अचानक आ गया था, तभी बेटी ने ब्रेक लगा दिए. मुझे झटका लगा. बेटी चिल्लाई “पापा अपना ध्यान रखो... लग जाएगी आपके.”

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

और दूल्हा बिक गया

 मीरा शलभ

     चंद्रकांत जी चादर में मुँह लपेटे... घरवालों से नज़र बचा कर भीतर ही भीतर सिसक रहे थे- रात जब से लड़के वालों के यहाँ से लौटे हैं... उनके घर का माहौल ही बदल गया... घर में ऐसा भयावह सन्नाटा मानों यहाँ मौत हो गयी हो... हर आदमी एक दूसरे से दृष्टि सी चुराए अपने को व्यस्त सा जता रहा है.
     मृणाल की आँखें रो-रोकर लाल सी हो गयीं थीं. आँखों के पपोटे बुरी तरह से सूज गए लेकिन आँसुओं का वेग नहीं थम रहा था. बस कानों में पिता की कराहती हुई आवाज गूंज रही थी... “क्या बताऊँ मृणाल की मां... उन्होंने जबान दे कर हमसे नाता तोड़ लिया... मुझसे पहले वहाँ लड़के का मामा किसी दूसरी पार्टी को लिए बैठा था... मैं गाड़ी से सगाई का सामान उतरवा ही रहा था कि लड़के के पिता लगभग दौड़ते से मेरी ओर लपके ... बोले, बुरा न मानिए ठाकुर साहब... लड़की की कुंडली न होने से हम विवाह न कर सकेंगे.... लेकिन ये बात तो पहले ही आपसे साफ बतला दी गयी थी और लड़के को लड़की भी पसंद है... मैंने ये कहते हुए लड़के की तरफ देखा ... मगर वो चुप सर झुकाए खड़ा रहा ... और यहाँ ऐसा उतावला था कि मानों मृणाल को अभी ब्याह ले जाएगा... सब समझ आ गया मेरी... सब समझ आ गया मृणाल की माँ... दूल्हा बिक चुका था...”

बुधवार, 29 नवंबर 2023

राक्षस

कमलेश झा
 
     यूं तो हरी सब्जियां घर के पास ही मिल जाया करती हैं किंतु सब्जी मंडी के नजदीक ही मेरा ऑफिस होने के कारण पत्नी चाहती थी कि आफिस से छुट्टी होने के बाद मै मंडी से ही प्रतिदिन ताजा सब्जी लेता आऊं. अब चूंकि इसमें कोई परेशानी वाली बात नहीं थी तो मैं रोज मंडी से ही ताजा सब्जी ले आता था. यहां सब्जियों के दाम भी बाहर से कम होते थे.
     रोज सब्जी मंडी जाने से कुछ सब्जी बेचने वाले पहचानने लगे थे. मंडी में प्रवेश करते ही वे मुझे आशा भरी नजरों से देखने लगते. वहां कुछ दुकानदार ठेलों पर तो कुछ नीचे जमीन पर टाट की फट्टियां बिछा कर सब्जियां बेचते थे. नीचे दुकान लगाने वालों में अधिकतर महिलायें ही थीं.
प्रायः में मंडी की शुरुआत में ही बैठने वाली एक अधेड़वय महिला से सब्जी ले लिया करता था. मैंने उसकी उम्र का अंदाज अधपके बाल व चेहरे पर दिखाई देने लगी झुर्रियों से ही लगाया था.
- का लेने, बाबूजी - आत्मविश्वास भरे चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हुए वह बुंदेलखंडी भाषा में बोली.
- पालक क्या भाव है? - मैने दुकान में एक ओर रखे पालक के छोटे से ढेर की ओर इशारा करते हुए कहा.
- आज पालक न लेओ, काल की है - उसने दबी आवाज में कहा.
     चूंकि आम तौर पर ऐसा होता नहीं है कि कोई दुकानदार ग्राहक को अपने सामान की कमी बताकर उसे बेचना न चाहे, इसलिए उसकी इस स्पष्टवादिता ने मुझे बहुत प्रभावित किया.
     मैंने उस दिन उससे दूसरी सब्जी लेकर पैसे दिए और प्रशंसात्मक दृष्टि डालकर वापस लौट आया. इस एक घटना के बाद से मैं उसी से सब्जी लेने लगा.
'और, ठीक हो बाई' से शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला ‘घर में कौन-कौन है‘ तक पहुंच गया। धीरे-धीरे सब्जी लेने के साथ-साथ उससे दो-चार बाते भी हो जातीं.
     मेरी इस धारणा के विपरीत कि गैरजिम्मेवार आदमियों की औरतें ही इस मंडी में सब्जियां बेच रही होंगी, उससे मालूम हुआ कि पहले उसके पति ही सब्जी की दुकान लगाते थे। असमय उनकी मृत्यू हो जाने से दुकान बंद करना पड़ी। जमापूंजी कब तक बैठ कर खाते. फांकाकशी होने लगी तो उसने ही दुकान खोलने का निर्णय कर लिया।
     अब तो कई वर्ष हो गये हैं। उसने बेटी की शादी भी कर दी। बेटा पढ़ रहा है। उसे उम्मीद है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद बेटा कहीं नौकरी करेगा और उसे इस काम से मुक्ति मिलेगी। यह बताते हुए उसकी आंखें भीग आयी थीं।
एक दिन उसके बेतरतीब बालों और गंदी मुड़ी-तुड़ी साड़ी को देखकर मैंने बेहद अपनत्व से उससे कहा - यह कैसा हाल बना कर आती हो, बाई? -
- इते, इत्ते राक्षसन के बीच, बजार में बैठ के कमावो आसान नईंये बाबूजी - वह भीगे और गहरे स्वर में कहते हुए सब्जी तौलने लगी।
     उसके एक वाक्य ने मुझे बाजार और बाजार के मनोविज्ञान को समझा दिया।
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कमलेश झा
झांसी - 9450908514

लिस्ट

 

Beena Sharma

     आकाश की बहन अक्षरा के लड़के रवि की शादी तय हो गई थी जिसके लिए वह कल ही भात नौतने आई थी और साथ में भैया को शादी का निमंत्रण और भात में देने के लिए सामान की लिस्ट भी बनाकर दे गयी थी आकाश ने शादी का कार्ड तो देख लिया था परंतु ,भात की लिस्ट अभी देखी नहीं थी एक कंपनी में नौकरी करके मामूली वेतन पाकर बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का पालन पोषण करने वाला आकाश को मन ही मन इस बात की चिंता सता रही थी कि यदि बहन ने भात में रुपए, गहने की डिमांड करी तो वे उसे कैसे पूरी करेंगे?
      बेटे को चिंतित देख कर उसकी मम्मी उर्मिला उसे समझाते हुए बोली " बेटा एक बार लिस्ट को पढ़कर तो देख मैंने अक्षरा को बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं जिसके कारण वह पति और खुद की कमाई के कारण मिले पैसों में ही संतुष्ट रहती है उसके मन में लालच की कोई भावना नहीं है हां दूसरों की मदद करने को वह हमेशा तत्पर रहती है मांगना तो उसके संस्कार में है ही नहीं शादी के बाद उसने आज तक कभी हमसे कोई चीज मांगी मैं जो भी उसे दे दूं चुपचाप हाथ जोड़ कर ले जाती है जब भी तुझ पर कोई विपत्ति आती है सबसे पहले दौड़कर वही आती है साथ में पैसे भी लेकर आती है ताकि तेरी आर्थिक मदद कर सके भले ही तू स्वाभिमान के कारण उससे पैसे लेने से मन कर देता है और फिर वह अपने घर की हालत जानती भी है वह तुझसे कोई ऐसी डिमांड ना करेगी जो तू पूरी न कर सके मैंने उसे ऐसे ही संस्कार दिए हैं वह मेरे दिए हुए संस्कारों की लाज जरूर रखेगी मुझे उसे पर पूरा विश्वास है" उनकी बात सुनकर बहू आरती व्यंग्यात्मक लहजे में बोली" ऐसा कुछ भी नहीं है जब बेटी की शादी बड़े घर में हो जाती है तो बेटी सब संस्कार भूल जाती है उसे अपने मायके से ज्यादा ससुराल वालों के स्टेटस की ज्यादा फिक्र रहती है यदि ऐसी बात ना होती तो वह लिस्ट क्यों बनाती? आप पढ़िए ना लिस्ट में अक्षरा ने क्या लिखा है? पत्नी की बात सुनकर आकाश जब लिस्ट पढ़ने लगा तो लिस्ट पढ़ कर उसकी आंखों में आंसू आ गए थे जिन्हें देखकर उसकी मम्मी और आरती घबरा गई थी उन्हें लगा शायद अक्षरा ने लिस्ट में कोई ऐसी बात लिख दी है जिसे पुरा ना कर पाने के बोझ के कारण आकाश की आंखें भर आई।
      " बेटा ऐसा क्या लिख दिया अक्षरा ने लिस्ट में जिससे तेरी आंखों में आंसू आ गए मुझे बता तो सही" उर्मिला ने बेचैनी से पूछा तो आकाश मुस्कुराते हुए बोला "मम्मी जी मेरी बहन ने आपके दिए संस्कारों की लाज रख ली वह अभी भी ऐसी है जैसी शादी से पहले थी रईस घर में शादी होने के बाद भी वह बिल्कुल नहीं बदली शादी करने से पहले जब भी मैं उससे उसकी कोई ख्वाहिश पूछता तो वह मुस्कुरा कर कहती थी "भैया मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आपका आशीर्वाद चाहिए वह तो कोई लिस्ट बना ही नहीं रही थी जब मैंने जबर्दस्ती उसे समान की लिस्ट बनाने को कहा तो इस लिस्ट में भी उसने यही लिखा "भैया भात की थाली में बस एक रुपया और अपना आशीर्वाद दे देना यही मेरे लिए सबसे बड़ी दौलत होगी आपके दिए हुए संस्कार उसमें कूट-कूट कर भरे हुए हैं मां मैं कैसा मूर्ख था जो अपनी बहन के बारे में गलत सोचने लगा काश! संसार की हर बहन ऐसी हो तो भाइयों को कोई भी रस्म बोझ ना लगे मुझे गर्व है अपनी बहन पर और मां आपके दिए संस्कारों पर जिसने मुझे चिंता मुक्त कर दिया अब मैं खुशी-खुशी पूरे परिवार के साथ रवि की शादी में भात भरने जाऊंगा" कहते हुए आकाश के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी जिसे देखकर उसकी मम्मी और आरती के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी।
      आज भी हमारे समाज में ऐसी बहुत सी रस्मे है जिन्हें निभाने के चक्कर में पिता और भाई कई बार अपनी जमीन और गहने तक भी गिरवी रख देते हैं जिससे इन रस्मो का माधुर्य खो जाता है संपन्न लोग तो पैसों के बल पर ये रस्मे पूरी कर देते हैं परंतु, मध्यम वर्गीय परिवार के लिए यह रस्मे कई बार मुसीबत बन जाती हैं यदि बहन या उसके ससुराल पक्ष के लोग समझदारी दिखाएं तो सभी रस्मे खुशी-खुशी से निभाई जा सकते हैं इसके लिए बेटियों को अच्छे संस्कार देना बहुत जरूरी है ताकि किसी भी परिस्थिति में वे बदले ना।

बप्पा बाहर गए हैं

 

देवेंद्र कुमार

     अभी दिन पूरी तरह नहीं उगा है, चौक की दुकानें बंद हैं ,सड़कों पर इक्कादुक्का लोग दिखाई दे रहे हैं। लेकिन पटरी से लग कर १५-२० लोग एक कतार में बैठे हैं। वे रोज बैठते हैं चाहे मौसम कैसा भी हो। उन्हें देख कर लगता है जैसे पंगत में बैठे हुए दावत की बाट जोह रहे हों। वे बाट देखते हैं लेकिन दावत की नहीं,रोजनदारी के काम की।
      वे सब दिहाड़ी मजदूर हैं जो काम की तलाश में सुबह वहाँ आकर बैठ जाते हैं। किसी को काम मिल जाता है तो कोई शाम तक निराश आशा में बैठा रहता है। हरेक के आगे उसकी पहचान रखी रहती है। जैसे बिजली मजूर के आगे तारों का बण्डल तो बढ़ई के सामने आरी और हथौड़ा ; रंग-- रोगन करनेवाले अपने सामने ब्रश और कूंची रखते हैं तो मजदूर के सामने फावड़ा और कुदाल देखे जा सकते हैं|
     सर्दियों के दिन , ठंडी हवा बह रही थी। लेकिन मौसम की परवाह न करते हुए काम की तलाश करने वालों की पंगत लग चुकी थी। तभी एक औरत वहां आ खड़ी हुई।उसने एक बच्चे का हाथ पकड़ रखा था। आखिर कौन थी वह? पहचानने में थोड़ी देर लगी, फिर किसी ने कहा-‘ अरे, तो श्याम की पत्नी है।’ फिर तो श्याम की पत्नी को कई लोगों ने पहचान लिया। एकाएक भूला हुआ श्याम सबको याद आ गया। श्याम भी इसी जगह बैठ कर काम मिलने की प्रतीक्षा करता था औरों की तरह। बीच में कुछ समय तक नहीं आया और एक सुबह पहले की तरह लौट आया। पूछने पर उसने बताया कि तबीयत ठीक नहीं रहती।
     फिर तो श्याम अक्सर चौक की मजदूर मंडी से गायब रहने लगा। कभी आता तो फिर कई कई दिन तक न आता। यह कोई खास बात नहीं थी। औरों के साथ भी ऐसा कई बार हुआ था। और फिर श्याम ने आना बंद कर दिया। एक बुरी खबर सुनने को मिली, कई लोग उसके घर भी गए। समय बीता और फिर सब भूल गए| लेकिन उस दिन श्याम की पत्नी को देख कर भूला हुआ श्याम फिर से याद आ गया। पर श्याम की पत्नी रमा यहाँ क्यों आई है- हर कोई यही सोच रहा था। तब तक रमा बच्चे का हाथ पकड़कर पांत में बैठे लोगों के एकदम पास चली आयी। लोगों ने सुना—‘ तेरे बप्पा यहीं बैठते थे।’—रमा बच्चे को बता रही थी। ‘ मैं भी बैठूँगा।’ बच्चे ने कहा। वह बारी बारी से सबको देख रहा था।
     सबको याद था कि श्याम कहाँ बैठा करता था। सब इधर-उधर खिसक कर जगह बनाने लगे। अब पांत में एक खाली जगह नजर आने लगी। शिबू ने बच्चे की ओर देख कर कहा—‘बेटा, यहीं बैठा करते थे तुम्हारे बप्पा,’ और बच्चे का हाथ पकड़ कर खाली जगह पर बैठा दिया। बच्चा मुस्कराया—‘मैं यहीं बैठूँगा।’ रमा चुप खड़ी देख रही थी। बेटे को हँसते देखा तो खुद भी मुस्करा दी। लेकिन आँखों में आंसू झलमला रहे थे।
1
‘’बेटा, नाम बताओ।’—एक ने पूछा,
‘श्याम सुंदर।’’
‘ बेटा अपना नाम बताओ।’—रमा ने कहा और एक झोला बेटे के पास रख दिया। वह झोला श्याम का था।
‘विजय बहादुर।’’ बच्चा हंसा तो पांत में बैठे सभी खिलखिला उठे।
     एक जना उठ कर गया और चाय वाले के ठेले के पास रखा स्टूल लाकर श्याम के बेटे को उस पर बैठा दिया। विजय ने कहा—‘ बप्पा बाहर गए हैं । मैं यहाँ बैठूँगा। ‘ जब वह रमा से अपने बप्पा श्याम के फोटो के बारे में पूछता था तो रमा कह देती थी=तेरे बप्पा बाहर गए हैं|
“ हाँ, हाँ जरूर बैठना। ‘’ पांत में बैठे लोगों ने विजय को घेर लिया। अभी तक किसी को कोई काम नहीं मिला था,लेकिन कोई उदास नहीं था।
     तभी उसमें बाधा पड़ी। किसी ने कहा—‘अरे, यह मजमा क्यों लगा रखा है।’ यह रघुवीर था। उन्ही में से एक लेकिन झगडालू। उसे देखते ही लोग परे हट गए। उसने विजय को स्टूल पर बैठे देखा तो चिल्लाया—‘ यह कौन है, मेरी जगह क्यों बैठा है?’’ और विजय को हटा कर खुद बैठते हुए स्टूल को दूर खिसका दिया।
     उसकी इस बात से सभी को गुस्सा आ गया। इस तरह हटाये जाने से विजय रो पड़ा। रमा ने कहा—‘बेटा, रो मत,आ घर चलें।’ उसका हाथ थाम कर मुड़ी तो रमन ने रोक लिया—‘ रुको, मत जाओ।विजय अपने बप्पा की जगह बैठा है। इसे कोई नहीं हटा सकता।’ दो जनों ने रघुवीर को जबरदस्ती उस जगह से हटा दिया। फिर विजय को वहां बैठाते हुए बोले –‘कोई नहीं हटा सकता इसे।’
     तब तक अशोक पेंटर ब्रश पेंट में डुबा कर, जमीन पर लिखने लगा—‘विजय’ और नाम को एक गोले से घेर दिया|
2
‘’यह हुई कुछ बात।’—ललन बोला। सबने उसकी हाँ में हाँ मिलाई। नाराज रघुवीर चुप खड़ा गुस्से से देख रहा था। रमा ने बेटे से कहा—‘जरा पढ़ कर तो बताओ।’’ विजय शब्दों को देखता खड़ा था। वह अभी पढना नहीं जानता था। रमा ने कहा—‘अपना नाम तभी पढ़ सकोगे जब स्कूल जाओगे।’
‘ मैं स्कूल जाऊँगा, किताब पढूंगा।’’—विजय बोला। इतने में रमन जाकर कापी, पेंसिल और अ आ वाला कायदा ले आया। विजय को देते हुए बोला—‘ बेटा, स्कूल जाना,मन लगा कर पढना।’’
‘बप्पा की जगह बैठूँगा।’ विजय ने कहा। रमा बोली—‘ यह स्कूल जाने को तैयार नहीं होता। आज जिद करके यहाँ आया है।’’ तभी ललन ने जेब से एक कागज निकाल लिया। बोला—‘ विजय, मेरे पास तुम्हारे बप्पा की चिट्ठी आई है। उन्होंने लिखा है…..’
रमा और विजय ललन की ओर देखने लगे। अशोक ने कहा—‘पढो विजय के बप्पा की चिट्ठी।’ ललन ने पढने का नाटक किया—‘विजय से कहना मैं जल्दी ही उसके पास आऊंगा।लेकिन एक शर्त है—उसे स्कूल जाकर ख़ूब पढना होगा। और हाँ वह अपनी माँ को परेशान न करे। ‘ ललन ने वह कागज विजय को थमा दिया। कहा –‘ बेटा, तुमने सुना तुम्हारे बप्पा ने क्या लिखा है।’
‘’ बप्पा ने लिखा है…..’ विजय ने कहा। पास खड़ी रमा की आँखों से आंसू बह चले। उसने माँ का हाथ थाम लिया –‘’ माँ, मैं स्कूल जाऊँगा,तुम्हें परेशान नहीं नहीं करूंगा।’’
      रमा ने सबको नमस्कार किया और विजय का हाथ थाम कर वापस चल दी। वे लोग दोनों को जाते हुए देख रहे थे। अपने बप्पा की चिट्ठी विजय के हाथ में थी। वह स्कूल जाएगा, मन लगा कर पढ़ेगा, और माँ को परेशान बिलकुल नहीं करेगा| तभी बारिश होने लगी फिर धूप भी निकल आई। गीली सड़क पर घेरे में लिखा ‘विजय’ नाम चमक रहा था|

हृदय परिवर्तन

- कवि डॉ. जय प्रकाश प्रजापति' अंकुश कानपुरी'
- तुम कितनी अच्छी हो!
- क्यों अब क्या हुआ? - रश्मि बोली
- तुमने मेरा दिल जीत लिया- भुवनीश ने कहा
- शादी के तीस साल हो गए, अब तक? - रश्मि बोली
- नही नही ऐसी बात न थी, मैंने तो हमेशा ही तुम्हें प्यार किया है- भुवनीश विद्रूप हँसी हँसते हुए बोला
- अब क्या हुआ? तुम्हारे और साथी कहाँ गए- रश्मि मुँह बनाती बोली
- अच्छा तो मैं समझ गई, अब कोई साथ देने वाले नही- थोड़ी देर रुक कर फिर वह बोली
- फिर तुमने वही राग सुनाना शुरू किया- भुवनीश बोला
- मैं क्या झूठ बोल रही हूँ- रश्मि गुस्से में बोली
- चलो जो कुछ हुआ मैं उसके लिए माफ़ी मांगता हूँ- भुवनीश ने नम्र होकर कहा
- हाँ !हाँ !अब बोलोगे ही, मेरी सारी जवानी यूँ ही गुजर गई- कभी तुमने मुझे अपना समझा ही कहाँ? - उसके अंदर की मार्मिकता उभर उठी थी।
- अरे यार छोड़ो सब बातें, सब कुछ अपने वश में नही होता, लोग कान भरते रहे, मैं उनकी बात मानता रहा, इसी लिए तो मुझे भी अफसोस है।
- तुम भी तो मेरी बात सुनने को तैयार न थी,चलो छोड़ो न, एक कप चाय बना लाओ- मुस्कराते हुए बोला- भुवनीश बोला
रश्मि मुस्करा पड़ी।
- ठीक है, चलो अब तो अच्छी लगी बुढ़ापे में- रश्मि हँस कर बोली और फिर रश्मि उठ कर चाय बनाने चली गई।।

नयी पहचान

पुष्पा पाण्डेय 
 
     कनक के हाथों में मोबाइल था और चेतन जी हाथ में रिमोट कंट्रोल ले सभी चैनलों का मुआयना कर रहे थे। समाचारों के चैनलों और सेयर चैनलों से चेतन जी का समय तो गुजर ही जाता था, पर कनक उब जाती थी। दिनभर कितना और क्या बातें करते। फिर दोनों एक- दूसरे के बगल में बैठे अपने-अपने तरीके से समय व्यतीत कर रहे थे। सेवानिवृति के बाद तो दोस्तों, परिचितों का दायरा भी सीमित रह गया था। विदेश में रह रहे बच्चों से रोज रात में ही बात हो पाती थी।
     पारिवारिक जिम्मेवारियाँ निभाने में कनक के दोस्त पीछे छूट गये थे। आज कनक को अपने दोस्तों की याद आ रही थी। सोचने लगी- घंटों बातें करते थे, फिर भी बातें  खत्म नहीं होती थी। उस समय वक्त नहीं था और आज वक्त है तो दोस्त दूर हो गये।
सुन रखा था कि फेसबुक पर दोस्तों को ढूँढा जा सकता है।
उत्साहित हो पति से कहती है-
" सुनिए! फेसबुक पर मेरी दोस्त लता को ढूँढिए न।"
"आज तुम्हें लता कैसे याद आ गयी?"
"यों ही। कुछ काम नहीं है तो दोस्त ही याद आते हैं।
      आधे घंटे में लता नहीं उसकी पुरानी पड़ोसन निर्मला फेसबुक पर मिल गयी। नहीं चाहते हुए भी कनक ने उससे बातें की। जिस पड़ोसन को वह कभी पसंद नहीं करती थी उससे आज घंटों बातें की। निर्मला भी अपनी पुरानी पड़ोसन से फोन पर बात कर बहुत खुश हुई। ठीक उसी तरह जैसे पुरानी चीजें नये लेबल के साथ मार्केट में आती हैं। कुछ साल पहले ही पति बच्चों के सहारे छोड़कर चल बसे थे। दोनों ने एक- दूसरे से अपना सुख- दुख साझा किया और बहुत सारे परिचितों का उसी से नम्बर भी मिल गया। उसमें लता भी थी। फोन रखते ही कनक एक लम्बी साँसे लेती हुई अंगडाई भरी, मानों बुझते दीये में तेल डाल दिया गया हो।

राँची,झारखंड।

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

-डॉ आर बी भण्डारकर - दो लघुकथाएं

संस्‍कार 
दूसरा काल खण्ड समाप्त हुआ;भूगोल के प्राध्यापक अपना अध्यापन समाप्त कर अपनी अगली कक्षा के लिए निकल गए। तीसरे काल खण्ड के लिए हिंदी के प्राध्यापक उपस्थित हुए।
हिंदी वाले प्राध्यापक अभी इस महाविद्यालय के लिए नवागत ही थे पर सभी  छात्रों को भलीभाँति मालूम हो गया था कि वे  प्रतिदिन उपस्थित होते हैं और समय पर उपस्थित होते हैं। यदि उन्हें कभी छुट्टी आदि पर जाना होता है तो वे कक्षा में पहले ही सूचित कर देते हैं।
आदत के अनुसार थोड़े ही अंतराल में छात्र भारी शोरगुल करने लगे थे। हिंदी वाले प्राध्यापक जी ने आते ही छात्रों को शांत कराया;पर एक छात्र शोर और शरारत करता ही रहा।
प्राध्यापक ने कहा थोड़ा खड़े हो जाइए श्रीमान। छात्र उद्दंडता पूर्वक खड़ा हो गया। वह सोचने लगा कि प्राध्यापक जी डांटेंगे या खड़े रहने की सजा देंगे या बाहर चले जाने के लिए कहेंगे पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। कहा,देख लिया सबने इनको?
हाँ, अब आप बैठ जाइए; अच्छा हुआ कि आज आपने केवल अपने ही नहीं,अपनी सात पीढ़ियों के संस्कार प्रकट कर दिए हैं।
छात्र पानी-पानी; पूरी कक्षा स्तब्ध। 

सुयश

बात उस समय की है जब आज की तरह व्हाट्सएप्प ग्रुप नहीं हुआ करते थे।
एक मित्र मंडली थी। उसमें खूब सारे भागीदार। खूब सारे ,तो तरह तरह के मिजाज के लोग। एक बात में सब एक जैसे।
सब एक जैसे ? भई ऐसी बात कौन सी है ?
परनिंदा।
एक बार चमत्कार हो गया। शाम को सब स्कूल के बाहर के चबूतरे पर बैठ कर गपशप कर रहे थे। गप्प यानी अंतहीन वार्ता;जिसका न ओर(आदि) होता है न छोर(अंत)। बात स्थानीय चर्चा से शुरू हुई। युवाओं की कमियाँ फिर आस-पास के कुछ पुरुषों, महिलाओं की बुराइयाँ फिर कर्मचारियों, अधिकारियों, मंत्रियों की कमियाँ ,फिर रूस, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड और न जाने कौन कौन देश के रीति-रिवाजों, नीतियों, योजनाओं की खामियाँ।
सुयश का प्रवेश। आते ही-भाइयो ! हम दूसरों की कमियाँ, बुराइयाँ गिनाने में अपना वक्त जाया करने की बजाय यदि कुछ सार्थक, प्रेरक, लोकहित कारी चर्चा करें तो कैसा रहे?
सब सुयश का मुँह ताकने लगते हैं।

 

बागडोर

 

बागडोर

- भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'


एक बाग का माली मर गया। उसके दो छोटे - छोटे बच्चे थे जो कि अनाथ हो गए। घर की स्थिति ऐसी नहीं कि बचे हुए लोग बिना मेहनत के बैठ कर खा सकें।

एक दिन सुबह - सुबह माली का लड़का जो  करीब पन्द्रह साल का था। बाग में पौधों को पानी दे रहा था। टलहने आने वाले लोगों में से एक ने पूछा, "बेटे, पढ़ने - लिखने की उम्र में ये क्या कर रहे हो ?"

बच्चे ने बड़ी आत्मीयता से बात को समझते हुए बोला, "मेरे पिताजी नहीं हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही उनका स्वर्गवास हो गया। हम तीन लोग हैं। मेरी मां, मैं और मेरी बहन। बहन अभी बहुत छोटी है। पिताजी के रहते मां ने कभी कोई काम घर के अलावा नहीं किया।
  अब घर चलाने के लिए पैसे चाहिए और मेरी पढ़ाई के लिए भी ।  मैं किसी कीमत पर पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहता। मेरे पिता जी का लिहाज करते हुए सोसायटी के लोगों ने ये फैसला किया कि मेरे पिता जी की जगह पर, मैं बाग की सिंचाई, निराई और गुड़ाई का काम करूं । काम के एवज में जो पैसे मेरे पिताजी को मिलते थे।वह अब मुझे मिलेंगे ।  साथ में एक आदमी को और रख लिया गया है जो मेरे अलावा इस पार्क की रखवाली और माली का काम करेगा। इससे मेरी पढ़ाई का भी नुकसान नहीं होगा ।
  वैसे भी पिता जी के बाद अब मुझे ही अपने घर की बागडोर संभालनी है ।"

वह व्यक्ति इतनी कम उम्र के बच्चे को अपने घर - परिवार की जिम्मेदारी समझते देख बहुत प्रभावित हुआ । बोला,  "बेटे, मैं तुम्हारी कुछ मदद करना चाहता हूँ  । बताओ, तुम्हें किस तरह की मदद चाहिए ?  मैं उसे पूरी करने की कोशिश करूंगा ।"

बच्चे ने नम्रता से कहा, "धन्यवाद अंकल, बस, आप मुझे हौसला देते रहिएगा।"

और वह ट्यूबवेल का पाइप पकड़ पौधों में पानी देने लगा ।

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भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
२८८/२२ गली नंबर ६एच, नियर हनुमान मंदिर गांधी नगर, गुड़गांव हरियाणा:-१२२००२

मंगलवार, 15 अगस्त 2023

निःशब्द

 प्रिया देवांगन "प्रियू"

  "बिटिया रानी....!  मैं सोच रहा हूँ कि तुम पढ़ाई करती रहो और साहित्य सेवा भी; जिससे हमारी साहित्यसेवा बढ़ती रहे। साहित्य सृजन के जरिये हमारी समाजसेवा भी होगी। मुझे तो अभी और आगे बहुत कुछ करना है। तुम क्या सोचती हो इस बारे में ? क्या तुम सहमत हो मेरे इस बात से ?" एक साहित्यकार पिता इंद्रजीत ने रूही के पास अपनी स्नेहपूर्वक बात रखी। 
          थोड़ी देर सोचने के बाद रूही बोली- हाँ... हाँ...! पापा क्यों नहीं... ? मुझे आपके साथ अधिक से अधिक समय बिताने को भी मिलेगा; और एक साथ कार्य करने में अच्छा भी लगेगा। रोज अखबारों के पन्नों में बड़े-बड़े अक्षरों में आपके नाम के साथ मेरा भी नाम आएगा।".रूही की बातें सुन इंद्रजीत जी हँस पड़े। 
          रूही मुँह बनाते हुए बोली- "पापा ! इसमें हँसने वाली क्या बात है ? हम ऐसा कार्य करेंगे तो हम दोनों का एक साथ नाम नहीं आएगा क्या ?" 
          इंद्रजीत जी बोले- "बेटा, एक बात जिंदगी में हमेशा ध्यान रखना कि लोगों को नाम के पीछे नहीं भागना चाहिए। कुछ ऐसा काम करो कि स्वयं तुम्हारा नाम हो जाय। हमें लोगों को बताने की जरूरत नहीं पड़ना चाहिए कि हम ऐसा काम कर रहे हैं या बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। जताने की जरूरत नहीं है।" 
          रूही अपना एक हाथ आगे करते हुए बोली- "बस .. बस... पापा जी हो गया।" इंद्रजीत जी को रूही बिटिया का जरा सा रूठना समझ आ गया। बोले- "आज तुम्हें मेरी बात समझ नहीं आएगी। जब तुम जिंदगी का मतलब समझोगी, तब तुम्हें सब एहसास होगा।" 
रूही बोली- "पापा जी, ये सब बातें मेरी समझ से परे हैं। वैसे भी आप तो मेरे साथ हो ही हमेशा, तो मुझे किस बात की फिक्र रहेगी ; भला बतताइए।" फिर इंद्रजीत जी बोले- " मेरी रानी....! हमेशा तुम मेरे भरोसे मत रहा करो न भाई। कभी खुद भी कुछ कर लिया करो।" 
         "छोड़ो ना पापा जी, आप भी बस इन्हीं बातों को लेकर बैठ गए ? आप भला कहाँ जायेंगे; बताइए ? चलिए, अब रात बहुत हो चुकी है। सोते हैं। कल सुबह क्या करना है। इसकी योजना तैयार करेंगे। गुड नाईट पापा जी।" कहते हुए रूही अपने बेडरूम में चली गयी।
          अगली सुबह रूही की आँखें देर से खुली। उठी। उसे इंद्रजीत जी नहीं दिखाई दिये। सोचने लगी कि इतनी देर हो गयी आज पापा मुझे आवाज क्यों नहीं दे रहें है। थोड़ी भी देर होती तो, वे रूही उठो न कितना सोओगी री लड़की। रात भर नहीं सोयी हो क्या। जल्दी उठ कर व्यायाम करना चाहिए ना। कुछ भी नहीं।" रूही आज स्वयं उठ गयी थी। इंद्रजीत जी को देख कर घबरा गयी। बोली- "क्या हुआ पापा जी, आप ठीक तो है ना ? क्यों बार–बार पसीना आ रहा है आपको ? हाँफ क्यों रहे हैं आप ? मम्मी... मम्मी...! पापा जी ठीक तो है ना ?"
         इंद्रजीत जी बोले- "थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही है बेटा।" तभी मम्मी बोली- "चलिए डॉक्टर के पास चलते हैं।"
         इंद्रजीत जी को डॉक्टर के पास ले जाने वाले ही थे कि पता नहीं रूही की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। तभी इंद्रजीत जी बोले- 'मैं जल्दी आऊँगा बेटा। डोंट वरी माय डियर।" इंद्रजीत जी ने कहा।   
          "नहीं पापा जी। मैं भी आपके साथ जाऊँगी।" रूही की जिद्द में अनुरोध था। अंततः रूही का इंद्रजीत जी के साथ जाना नहीं हो पाया। 
          घर वालों को इंद्रजीत जी का इंतजार करते काफी समय हो गया। थोड़ी देर बाद खबर मिली कि वे अब कभी वापस नहीं आयेंगे।
          साहित्यकार पिता इंद्रजीत जी की नयन बिछायी पुत्री रूही अब तक निः शब्द हो चुकी थी।
                  ----//----
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

शुक्रवार, 26 मई 2023

सीताराम गुप्‍ता की लघुकथाएं

 


 

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