इस अंक के रचनाकार
रविवार, 28 दिसंबर 2025
धारणा
सोमवार, 15 सितंबर 2025
कंठी माला
कुछ उपराहा दे देबे मितान,बन जही नहीं l"
दुकालू ठीक हे फेर मोरो ला सुन मोर बईला कंठी माला पहिरे हे थोकिन जादा ज्ञानी समझदार हे तोर बईला अस बईला नइ हे इशारा ला जान डरथे l शास्त्री जी करा ले कंठी माला पहिराये हँव जाने l चमत्कारी कंठी हरे lथोकून उपराहा तहूँ दे देबे l ठीक है ना l नइ ते अंकड़ा अंकड़ा बेच देबो l इही सुझाव बने जंचत हे l
सुकालू कहिस बन जही l लेकिन मोला बता कंठी माला काबर पहिनायहस? बता देना राज के बात l
जेन गुरु बनाथे तेन ला कंठी माला दे जाथे l कंठी माला पहिरे के बाद उही ह गुरु बन जाथे l मोर बईला गुरु बन के देखाही l बिन गुरु के कोनो ला ज्ञान मिले है?
सुकालू -" बईला मन के कोन कान फूंकाथे अउ गुरु बनाथे?
अचरज के बात है l"
ये दे चोरहा गाँव पहुँच जाथन l उहें पता चल जही l सीहोर जाबो का जी l "
दुकालू -"मोरो बईला ला कंठी माला पहिराये के मन होवत हे l " सकालू कहिस -" मोर बईला सब सीखा दिही l "
सुरजीडीह म रुकबो l सन्तु ला पूछ लेथन l
बर के छाँव म बईला मन ला बांधिस l लेवाल मन आइस देखिस l जबरदस्त जोड़ी हे l कंठी माला वाले बईला तो बड़ सुगघर गुरु बाबा असन दिखत हे l एक झन पूछिस -" का क़ीमत हे जी l"
ए गुरु हे अउ ए हा चेला "
चेला बिना गुरु नइ रहय अकेल्ला l"
"जोड़ी बेचना है "
"तीन लाख दे दे l" लेवाल सुन के मुँह फार दीस l
दिव्य दरबार गे हस कभू?इही बीच सुकालू पूछिस - " बड़े बड़े महराज मन के भागवत कथा सुने ला गे रहेस?लेवाल कइथे हौ l बीस लाख -तीस लाख मांगथे l सुने हस ना l "
ओमन पंडित विद्वान ज्ञानी हरे
तोर बईला से ओकर का लेना देना l" "लेना देना हे भाई- ओकरे मन के कंठी माला पहिरे हे l पूरा कथा ला सुने हे सब जानथे l" अरे वाह दिव्य चमत्कार हे तब तो l सुनत सुनत लेवाल के मन होइस l "गाँव भर के मन मिल के ले लेथन l" लेवाल पूछिस तोर कंठी वाले ले कुछ पूंछव का मन के बात?
पूछ के देख l पूछिस -" मोर ददा के ददा के नाँव का रहिस?
बईला लात मारिस अउ मुड़ी हिलाइस l सुकालू बोल के बताइस -" लतखोर " l लेवाल के खुशी के नइ ठिकाना नइ रहिस l हौ हौ एकदम सहीच हे l दूसर लेवाल भूरवा बईला ला पूछिस -" दू लाख म आहू "
अब जादा परीक्षा झन लेव l सुकालू समझाइस l गाँव भर म चर्चा फ़ैल गे l आखिर म गाँव वाले मन सकेल के खरीद लेथे l दूनो मितान बईला कोचिंया के भाग खुलगे l कंठी माला के असर ए मितान lगुरु के किरपा ले तोरो बईला पक्का चेला बन गे l गाँव वाले मन जाने समझे lचल निकल इहाँ ले घर म जाके करबो बँटवारा l सुकालू के बात ला मानत दुकालू कंठी माला के नाम लेवत झोला म भर के दूनो निक लगे उत्ता धुर्रा l
सोमवार, 1 सितंबर 2025
कॉफ़ी कैफ़े
रेखा ने भी ठंडी साँस भरते हुए कहा, “अरे! मेरे तो सिर्फ़ दो साल की जान-पहचान थी। तब लगा बहुत कुछ जान लिया है, लेकिन शादी के बाद समझ आया, असल में मैं उन्हें मुश्किल से 2% ही समझ पाई थी।”
दोनों हँसते-हँसते कविता की ओर देखने लगीं। कविता शांति से कॉफ़ी का घूँट भरते हुए बोली, “तुम दोनों भाग्यशाली हो, कम-से-कम प्रेम का स्वाद तो चखा। मैंने तो अब तक वो स्वाद भी नहीं चखा। हाँ, पति की रोज़-रोज़ एक जैसी आदतों का ‘धैर्य-रस’ ज़रूर पी रही हूँ। बाइस साल से एक ही स्वाद— बिना शक्कर की कॉफ़ी जैसा।”
तीनों ज़ोर से हँस पड़ीं। नीलू ने मज़ाक में कहा, “लगता है हमारी ज़िंदगी की कॉफ़ी में सबसे अलग स्वाद कविता के पास ही है।”
मोबाइल नंबर -9412708345
मंगलवार, 26 अगस्त 2025
भालू के जी पुतकी म
बिसेसर मुड़ी ला घुमावत देखिस -" आज तो भालू भारी टेंशन म हे तइसे लागत हे l"
पकलू बैगा के टुरा पिंटू ला सब झन भालू भालू कहिथे l भालू जइसे झूलपाहा अउ अपन ढंग ले अलगे रहना गोठियाना सब अलगेच हे l ओइसने एक झन ला कोलिहा कहिथे, नाम ओकर कलेश हे l कोलिहा आके बताइस -"कका भालू ला सरपंच बनेच धमका देहे l "
जगेसर पूछिस -"काबर?
कोलिहा टुरा कहिस -" मै का जानव ग l का का बात होइस ते l" बिसेसर कहिस -" भालू च पूछ लेथन ओमा का बात हे l जा तो बुला के ले आ l कोलिहा टुरा चल दीस l
आइस दूनो झन आघू म खड़ा होगे l
"का होगे कका? "
बिसेसर पूछिस-" तही बता ना? सरपंच तोला का कहि दीस? "
भालू के जी पुतकी म होगे l
जगेसर कहिस -" एला महूँ सुने रहेंव l"
भालू ल पूचकार के पूछिस -"जानत होबे बता दें ना? "
भालू के हिम्मत नई होवत हे l
कतका लेन देन म काम होइस l बहुत बड़े घटना हे ये हा l एखर जाँच होना चाही l ये सब लट फ़स अउ लंदी फंदी घटना सरपंच के आये ले होवत हे l
एला सुन भालू के जी पुतकी म lअउ जादा घबराये ला धर लीस l
कुम्हारी
बुधवार, 20 अगस्त 2025
अन्तर्वेदना
सोमवार, 18 अगस्त 2025
कुकुर कटायेन
एके बात म निर्णय होना रहिस उही बेरा चेंदवा मुड़ी के एक झन आदमी खड़े होके कहिथे -" झोला दें घूम घूम के चंदा उही म लाना हे l"
खालहे म बइठे मन के बीच खलबली मच गे l
कुकुर मन कस दाँत खिसोर के गुर्राना एक दूसर के मुड़ी हाथ ला धरी के धरा होना शुरू होगे l जेन ला झोला के जिम्मेदारी मिलथे ओकर रुतबा बाढ़ जथे l पलटी मार पलटू ला मिलगे l
जगतु के जी कचौवट रहिगे l
'राम रमायेन तिहाँ,कुकुर कटा येन l '
फूल भर के लाना हे l
'कुकुर कटायेन बंद करो l बस खांव -खांव तुंहर मन के l थोकिन धीर धरे राखे करव l "
थोकून रुक के फेर कहिस -
"बस तुमन उल्टा सोचत रहिथव
मया पाये बर फूल बरसाओ l
बड़े बड़े गज़माला पहिनाओ l "
अतका सुन हाल म शान्ति छागे l जगतु मने मन कहिस
बारा आना गये पाकिट म l
खा पी के उड़ाही काला धराही l पलटू दिही खाली झोला?
कुम्हारी
सोमवार, 30 दिसंबर 2024
वसीभूत
मुरारी लाल साव
एक दिन अपन घर के आघू म बैठे रहेंव l एक करिया कुकुर तीर म आथे अउ टुकुर टुकुर देखथे l ओखर आँखी म लालच के पुतरी एक टक देखत रहिस l अपन हाथ ला बार -बार खीसा म डारंव अउ निकालत रहेंव l
कुकुर अउ निटोर के देखय एकर सेती कुछु न कुछु दिही l
ओकर लालच अउ बढ़गे l ए दफे मय मुठा भर ला निकाले के आघू म रखेव l कुकुर अउ तीर म ऊं ऊं ऊं करत आगे l मुट्ठा ला खोल देंव कुछु नइ गिरिस l कुकुर के जी चुरमुरागे l एक बार फ़ेर हाथ ला खीसा म डारेव अउ निकालेंव मुठा ला नइ खोलेंव अउ दूसर डहर ला देखे के नाटक करेंव l करिया कुकुर धीरे धीरे सूंघियावत आगे l मुठा ला खोलत ओकर मुड़ी ला खजुवाये ला धर लेंव l कुकुर अपन मुड़ी ला पूरा दता दीस l खजुवाना ओला बने लागिस l तब लालच नइ रहिस ओकर आँखी म बल्कि दूनो आँखी ला मुँद लीस बेफिक्री होगे l शायद जान डरिस देवय नहीं त मारे भगावे तको नहीं l
कुकुर के भीतर जागे मया भरोसा ला तोड़े के महूँ कोनो उदिम नइ करेंव l ओकर मुड़ी ला छुवत खजूवावत दस मिनट होगे रहिस होही l बिन हांत -हुत के चुप चाप उठ के दूसर कोती रेंगे ला धर लेंव l कुकुर मोर पीछू पीछू आये ला धर लीस l कुकुर के हिम्मत बढ़गे मोर संग आये ला l दूसर कुकुर मन देख के भूके ला धरिस l करिया कुकुर मोर आघू पाछू घूमत दूसर कुकुर ला ज़वाब दे वत रहिस - " मुठा बंधाये हे अभी नहीं तो कभी भी खोलही मोर हिस्सा हे मोर आदमी हे एखर पाछू संग ला नइ छोड़व l"
करिया कुकुर ला मोर कुकुर नइ कह पांवत हँव
काबर -"मया अउ लालच म कभू भी ककरो संग ककरो पाछू भाग सकत हे l"
दूसर दिन फ़ेर अउ अउ बैठेव l
ए दफे पूरा साहस के साथ मोर गोड़ ला चूमे ला धर लीस l अपन आँखी ला मुँद के लोर्घयाये ला धर लीस l सोचेंव थोकिन मया म अतका अपना पन कुकुर के मन म आ गेहे l डउकी लइका म नइ दिखय l ओमन तो कुकुर ले जादा मतलबी स्वार्थी होथे l कुकुर के तीर म आये आदत परगे फ़ेर तीर म रहिके डउकी लइका धुरिहा धुरिहा रहिथे l मौका आही त पूछय नहीं l
मुरारी लाल साव
कुम्हारी
बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
डीजे
दुर्ग
सोमवार, 12 फ़रवरी 2024
थोड़ी सी पत्तियाँ
अनिता रश्मि
वे जब भी सब्जियाँ खरीदतीं, मुफ्त का धनिया, मिर्ची, अदरक लेने से कभी
नहीं चूकतीं। उनकी कार या स्कूटी जैसे ही बाजार के किनारे लगती, सब्जीवालों
के चेहरे पर दबी मुस्कान थिरक उठती। सभी की मंद मुस्कान में उनकी आदत का
भेद छुपा था।
आज भी लाल कार बाजार के किनारे लगी। वे उतरीं। थैला संभालते हुए आगे बढ़ीं।
बैंगन, तोरई, टमाटर, कद्दू के साथ वापस लौट पड़ीं। सब चौंके। एक की आवाज -
मेमसाब! आप कुछ भूल रहीं हैं।
- नहीं! आज बस इतना ही।
- आज धनिया पत्ती या मिर्च मुफ्त।
में नहीं लेंगी?
सब्जीवाले ने थोड़ी सी पत्तियाँ हाथ में उठा लीं। दूसरे ने मिर्च की ओर इशारा किया।
- नहीं!....
सबके चेहरे पर छिपी मुस्कान नहीं, आश्चर्य था।
आगे कहा,
- .....मैं कल खेत पर गई थी। किसानों की अथक मेहनत देखी थी।
जूते
रविवार, 11 फ़रवरी 2024
और दूल्हा बिक गया
बुधवार, 29 नवंबर 2023
राक्षस
लिस्ट
Beena Sharma
बप्पा बाहर गए हैं
हृदय परिवर्तन
नयी पहचान
गुरुवार, 17 अगस्त 2023
-डॉ आर बी भण्डारकर - दो लघुकथाएं
सुयश
बागडोर
बागडोर
- भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'
एक बाग का माली मर गया। उसके दो छोटे - छोटे बच्चे थे जो कि अनाथ हो गए। घर की स्थिति ऐसी नहीं कि बचे हुए लोग बिना मेहनत के बैठ कर खा सकें।
एक दिन सुबह - सुबह माली का लड़का जो करीब पन्द्रह साल का था। बाग में पौधों को पानी दे रहा था। टलहने आने वाले लोगों में से एक ने पूछा, "बेटे, पढ़ने - लिखने की उम्र में ये क्या कर रहे हो ?"
बच्चे ने बड़ी आत्मीयता से बात को समझते हुए बोला, "मेरे पिताजी नहीं
हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही उनका स्वर्गवास हो गया। हम तीन लोग हैं। मेरी
मां, मैं और मेरी बहन। बहन अभी बहुत छोटी है। पिताजी के रहते मां ने कभी
कोई काम घर के अलावा नहीं किया।
अब घर चलाने के लिए पैसे चाहिए और
मेरी पढ़ाई के लिए भी । मैं किसी कीमत पर पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहता। मेरे
पिता जी का लिहाज करते हुए सोसायटी के लोगों ने ये फैसला किया कि मेरे पिता
जी की जगह पर, मैं बाग की सिंचाई, निराई और गुड़ाई का काम करूं । काम के
एवज में जो पैसे मेरे पिताजी को मिलते थे।वह अब मुझे मिलेंगे । साथ में एक
आदमी को और रख लिया गया है जो मेरे अलावा इस पार्क की रखवाली और माली का
काम करेगा। इससे मेरी पढ़ाई का भी नुकसान नहीं होगा ।
वैसे भी पिता जी के बाद अब मुझे ही अपने घर की बागडोर संभालनी है ।"
वह व्यक्ति इतनी कम उम्र के बच्चे को अपने घर - परिवार की जिम्मेदारी समझते देख बहुत प्रभावित हुआ । बोला, "बेटे, मैं तुम्हारी कुछ मदद करना चाहता हूँ । बताओ, तुम्हें किस तरह की मदद चाहिए ? मैं उसे पूरी करने की कोशिश करूंगा ।"
बच्चे ने नम्रता से कहा, "धन्यवाद अंकल, बस, आप मुझे हौसला देते रहिएगा।"
और वह ट्यूबवेल का पाइप पकड़ पौधों में पानी देने लगा ।
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भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
२८८/२२ गली नंबर ६एच, नियर हनुमान मंदिर गांधी नगर, गुड़गांव हरियाणा:-१२२००२
मंगलवार, 15 अगस्त 2023
निःशब्द
शुक्रवार, 26 मई 2023
सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं
