जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
दारू सराब झनिच पिबे तैं , दारू म हानि भारी ।
घर कुरिया सब बेंचा जाथे , लोटा बटकी थारी ।।१।।
आनी बानी रोग समावै , धर खाथे बीमारी ।
डॉक्टर बैगा ठगहीं रुपिया , पुजबे कुकरी कारी ।।२।।
छोड़य नहीं तब ल बीमारी , नोहय गोठ लबारी ।
पानी कस रुपिया बोहावै , बृथा कमाई सारी ।।३।।
कतको कमाबे पूरै नहीं , बढ़ जाथे लाचारी ।
भूखन मरथें नोनी बाबू , अंग संग के नारी ।।४।।
कपड़ा लत्ता बर सब तरसैं , परय सुने बर गारी ।
कतको परिवार टूट जाथे , जाथे भाग सुवारी ।।५।।
नारी बिन नर तन हे सुन्ना , अँगना महल अटारी ।
दारू घर हे बरबादी के , सुन लेवा सँगवारी ।।६।।
छोड़व साथी दारू पीना , देखौ मन म बिचारी ।
जिनगी सँवरे 'ठाकुर' बोले , कहना धरव हमारी ।।७।।
जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
सम्पर्क सूत्र-- बरिष्ठ साहित्यकार }
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