तुलेश्वर सेन
देखो तो आज हर कोई बहुत परेशान हैं।
ऊपर से इंसान परंतु अंदर से शैतान हैं।।
रंगे कपड़े,रंगे शरीर माथे उनके तिलक चंदन।
बनावटी रूप देख लो तो लगे भगवान हैं।।
न खुद शांत हैं न औरों को शांत करते हैं।
आम आदमी से ज्यादा मौत से डरते हैं।।
ये लोग पद,पैसा,कुर्सी के लिए आपस में।
स्वयं से ही संघर्ष करते हुए ही मरते हैं।।
राजनीतिज्ञों को सत्ता और पैसों से प्यार है।
कुर्सी पाने के लिए करते अजीबो व्यवहार है।।
हरदम ही भटकती रहती है इनकी आत्माएं।
क्योंकि देश विदेश में फैला इनका व्यापार है।।
फिल्मों में न कोई मान मर्यादा न संस्कार है।
अश्लीलता और अंग प्रदर्शन का छाया बुखार है।।
नशा,अंधविश्वास,मुकदमा,फिजूल खर्ची से।
करो जी पड़ताल न बच सका कोई परिवार है।।
जितनी सुविधा उतनी दुविधा इंसानों ने बनाया है।
विज्ञान को चमत्कार समझकर अपनाया है।।
भौतिक सुख सुविधाओं की चक्कर में हमने।
जीवन से पहले ही मौत को गले लगाया है।।
सलोनी राजनांदगांव
इस अंक के रचनाकार
मंगलवार, 21 फ़रवरी 2023
हम इंसान हैं या शैतान
शनिवार, 4 फ़रवरी 2023
सत्ता की लोलुपता ने ही
मधुकवि राकेश माधुर
शनिवार, 20 अगस्त 2022
लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की नवगीत
इत्र से महके बदन, तो वह समझ लो बेकार है,
सदचरित्र से जीए जीवन से, महकता संसार है।
इत्र की खुशबू, बस! कुछ घड़ी में खत्म हो जाती,
सद्कर्मों से बदल सकता, समाज व परिवार है।।
परिवार और समाज बदलने से, होती है प्रगति,
हमारे विचारों में परिवर्तन की, आती ख़ूब गति।
अच्छे विचारों से महकने लगता, हमारा जीवन,
हम सद्प्रयास करते रहें, आगे जैसी हो नियति।।
हमारे सद्प्रयासों को, भाग्य भी देता है संबल,
जीवन में असंभव कार्य भी, हो सकते हैं हल।
सद्प्रयासों में प्रायः मुश्किलों से, होता सामना,
हाथ की रेखाएँ भी बदल जाती, जो हैं अटल।।
जीवन में कभी कभी सद्प्रयास, नहीं होते सफल,
हम अपने को कभी न अकेला माने, न ही निर्बल।
अकेले गाँधी जी ने, आज़ादी के लिए बढ़ाए पाँव,
फिर पूरा देश उनके साथ, कदम मिला दिया चल।।
हम अपने जीवन में सद्प्रयास को, कभी न छोड़ें,
जो जीने के तय किए सिद्धांत, उसे कभी न तोड़ें।
कभी सफलता, कभी विफलताओं का होगा दौर,
विजय मिले, उन कोशिशों को अपनी ओर मोड़ें।।
कुछ ऐसा करने की कोशिश, आदर्श बने हमारा परिवार,
संस्कृति, सभ्यता हम सीखें, खूब मिलें अच्छे संस्कार।
धन-दौलत भले ही कम हो, सद्गुण, विवेक अनंत मिले,
अनुजों को स्नेह खूब दें, बड़ों का करें आदर-सत्कार।।
परस्पर सहयोग भावना, परिवार के प्रति हो समर्पण,
जब पड़े जरुरत तो तन मन धन से सर्वस्व करें अर्पण।
परिवार में इक-दूजे के, सुख-दुःख का हम रखें ख्याल,
हम समझें मन की बातें, खुशियों का बनें हम दर्पण।।
मात-पिता और बड़ों के, अनुभव का हम लाभ उठाएँ,
अपनी खुशियों के लिए, उन्हें हम वृद्धाश्रम न पंहुचाएँ।
जन्म दिया और पालन-पोषण कर, हमें योग्य बनाया,
कोशिश हो उनकी आँखों में, आजीवन आँसू न आएँ।।
छोटी-छोटी बातों के लिए, हम कदापि न करें तकरार,
छोटों और बड़ों के प्रति सदैव, हमारा हो मृदु व्यवहार।
विचारों में कभी भिन्नता हो, रिश्तों में न लाएँ खटास,
त्रुटि कभी किसी से हो जाए, कम न होने पाए प्यार।।
जब होगा सामंजस्य, परिवार की होगी इक पहचान,
देखने से आँखों में हो हर्ष, हम दें इक-दूजे को सम्मान।
परिवार में न होगा दुर्भाव, न होगा कभी यूँ मनमुटाव,
खुशियों का होगा आगमन, परिवार की बढ़ेगी शान ।।
छल, कपट या ईर्ष्या न हो, समस्याओं पर करें विमर्श,
परिजन करते जब प्रगति, ह्रदय में होता असीम हर्ष।
मत भिन्नता होने पर आपस में मिल-जुलकर दूर करें,
दूर तक फैलेगी यश-कीर्ति, परिवार का होगा उत्कर्ष।।
राष्ट्र हित हो सर्वोपरि
राष्ट्र हित की बात हो, निज स्वार्थ को करें परित्याग,
एकजुटता को दिखाकर देश प्रेम का गाएँ हम राग।
धर्म भाषा जाति मज़हब को तब गौण कर दीजिए,
हमारे सीने में जलनी चाहिए, राष्ट्र प्रेम की आग।।
राष्ट्र हित के लिए देशभक्तों ने, प्राण बलिदान किए,
देश की आजादी के लिए, परिवार वीरों ने तज दिए।
सीने पर खाई गोलियाँ व हँस कर फाँसी पर लटके,
घास की रोटी खाएँ, देश के आन बान शान के लिए।।
देश हित में ऋषि दधीचि ने किया अस्थियों का दान,
गांधी जी तन मन धन लगाए, देश का हो कल्याण।
सुभाषचंद्र बोस ने जीवन देश को समर्पित कर दिया,
भगतसिंह आजाद जैसे रणबांकुरों ने लगाई जान।।
देश की प्रगति व खुशहाली का सदा हम रखें खयाल,
अमन चैन सर्वत्र विराजे, कोई न भूखा, न रहे कंगाल।
समरसता, सद्भावना और एक दूजे के लिए सम्मान,
सुख-शांति से सब जीवन जिए, हम भी रहे खुशहाल।।
देश व समाज हित के लिए हृदय में में आए सुविचार,
कटुता और वैमनस्यता का हम कभी न करें व्यवहार।
देश हित में, परिवार हित हो सके तो, हम गौड़ कर दें,
सभी से हम रखें प्रेम मोहब्बत, न हो किसी से तकरार।।
ग्राम-कैतहा, पोस्ट-भवानीपुर
जिला-बस्ती 272124 (उ. प्र.)
मोबाइल 7355309428
laldevendra204@gmail.com
सोमवार, 30 मई 2022
आम आदमी ना रहा ...
आम आदमी ना रहा, कभी यहाँ खुशहाल
मिले उसको आँगन में, संकट हरेक साल
जितना भी यदि बच सके, बचकर रहिये आप
डस न ले एक दिन कहीं, जातियता का साँप
जात पांत के भेद को, रहे मिटाकर साथ
वरना एक दिन स्वयं ही, होंगे आप अनाथ
डस लेते हैं आपको, देखो वे चुपचाप
रखते हो आस्तीन में, छिपाकर आप साँप
जब भी करते हैं यहाँ, वे विकास की बात
पड़ती आम जनता पर, देख यहाँ आघात
बैठ गए प्रशासन में, जब सारे ही चोर
कोई भी सुनता नहीं, मचा खूब ही शोर
हो जाती सारी यहाँ, इज्जत की जब धूल
स्वार्थ खातिर बेच दे, अपने सभी उसूल
गीता रामायण लगे, उसको अब बकवास
जब पैसा ही बन गया, इस पीढ़ी का खास
पैसों में ही डूब गया, सारा ही संसार
इसलिए अब रहा नहीं, रिश्तो में वो प्यार
जब से पैसों की करें, पूजा ये इंसान
तब से रिश्ते हो गये, देखो लहूलुहान
शीतला माता गली जावरा (म.प्र.)457226,
मो. 9479662215
रविवार, 20 फ़रवरी 2022
बसन्त फिर से ...
डॉ सीमा विजयवर्गीय
हर एक दिल की हर इक गली को सजाने आया बसन्त फिर से
लो झोली में भर के चाँद - तारे मनाने आया बसन्त फिर से
कसक पुरानी, पुरानी यादें जगाने आया बसन्त फिर से
हवा सजीली सुखद चलाकर, हँसाने आया बसन्त फिर से
हँसी - खुशी के ये चार पल हैं बताने आया बसन्त फिर से
तुम
प्रीत भी तुम हो,अनुराग भी तुम हो,
तुम कल कल बहती सरिता
झरनों का आलाप भी तुम हो।
श्वास - श्वास संग अश्रु तुम हो,
नेत्रहीन मैं चक्षु तुम हो
तुम रोम - रोम की मादकता,
तुम रक्त बूँद की चंचलता,
तुम मन्द समीर यहाँ - वहाँ,
मैं ढूंढूं तुमको कहाँ - कहाँ।
तुम विह्वल होती मृच्छीका,
मैं अनंत लहरों का आगर हूँ,
तुम इठलाती इक दरिया हो
मैं मंजिल प्रेम का सागर हूँ।
तुम भँवरे का गुंजन हो,
तुम प्राणप्रिय तुम प्रियतम हो।
रात भी तुम हो,दिन भी तुम हो
जीवन का हर प्रहर भी तुम हो
तुम ही अग्नि,तुम ही वायु,
तुम धरा सुहानी,वारि तुम हो
काम भी तुम हो,अविराम भी तुम हो
जीवन का चल प्रहर भी तुम हो,
प्रहरों का विश्राम भी तुम हो।
ज्ञान भी तुम हो,विज्ञान भी तुम हो
हर सिद्धि का संधान भी तुम हो
हार भी तुम हो,जीत भी तुम हो
बिन बाजी का संग्राम भी तुम हो।
गान भी तुम हो,संगीत भी तुम हो
सम्मान भी तुम हो,पुनीत भी तुम हो
अविरल प्रेम रसधार भी तुम हो
शत्रु पर प्रहार भी तुम हो
वैशाखी तपन में छाँव भी तुम हो
पौष के शीत में अलाव भी तुम हो।
तुम दया क्षमा में,तुम समां - समां में
युगों - युगों का अलगाव भी तुम हो
तुम ही नश्वर,तुम ही सनातन,
हर बाजी का हर दांव भी तुम हो।
पीली पीली सरसों फूली
हरेन्द्र चंचल वशिष्ट
हरे खेत,सौंधी माटी की महक उड़ी फिज़ाओं में।।
रंग रंगीले फूल खिल रहे, कोयल राग सुनाए रे,
आया है मधुमास रंगीला ढोलक फाग बजाए रे ,
नई कोंपलें नींद से जागीं,खुलीं आंख शाखाओं में।।
ऋतु बसंत का राग गूँजा चारों ओर दिशाओं में।।
शीत ऋतु का अंत हुआ,फाग ने ली अंगड़ाई रे,
कलियाँ और कुसुम इतराए, बसंत पंचमी आई रे,
लद गए फूल और फलियाँ बेलों और लताओं में।।
गुड़हल, चमेली टेसू मोगरा की अब आई बहार रे,
मादकता वसुधा की अब रही नहीं सीमाओं में।।
रखे शारदे किरपा,चंचल जोड़ें हाथ दुआओं में।।
रविवार, 23 जनवरी 2022
इजारबंद गाँठ लगातें हैं
विमल सागर
बैठ गीत नया एक लिख देतें हैं
रिश्ते के मनका-मनका लरज़ते
अब गाँठ रिश्तों इजारबंद दे लेतें हैं....
तिलांजलि उन्हें दे आज लेतें हैं
बसंत ऋतु बसंतराज आ रहे
नव कोंपल बन फिर जीतें हैं.....
पलकों की ढलती शाम फिर हो
नयनों के जाम पी लेतें हैं.....
उधड़न तुरपन कर लेतें हैं
तन दिखे न किसी रिश्तों का
देह बसन सिल लेतें हैं...
फिर से महक दिल में होगी
हम बैठ वहीं फिर एक दूजे से
बात कोई फिर मुलाकात होगी....
फिर बहार बसंत ले आतें हैं
छांव के दामन बैठ लो फिर से
हम गीत नया लिख लेतें हैं।।
बुधवार, 12 जनवरी 2022
चलो बारिश मे हम ....
श्रीमती रजनी टाटस्कर
चलो बारिश मे हम कोई ठिकाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
हमेशा साथ रहने का, बहाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
दीवाने हैं जहाँ में हम दीवाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
नज़र मंजिल पे रखते हैं निशाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
बहुत दिन हो गये, खुलकर हँसे भी तो नही हैं हम
पुराने दोस्तों का चल, खज़ाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
भला मिलता कहाँ है न्याय, लोगो को जमाने मे
जहाँ वाले शिकायत मे, फसाना ढ़ूँढ़ लेते हैं
नफा, नुकसान सब अपना, यहाँ बस सोचते रहते
किसी के दर्द मे भी ये, तराना ढ़ूँढ़ लेते हैं
भोपाल (म.प्र.)
सोमवार, 3 जनवरी 2022
तीन नवगीत
डॉ मृदुल शर्मा
1.
रविवार, 26 दिसंबर 2021
रक्तिम अधरों के पंकज उर
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
मृदु कुमुद नीड़ की कविता मे।
उस छंद बद्ध की ड़गर सुघड़।
मन सुमन सुवासित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
अरुणिमा अधर फुलवारी मे।
उरतल की निश्छल गात महा।
हृद् मुकुर आह्लादित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
आंसु की गहनतम माया मे।
पलकों की निर्मल कुंज मृदुल।
नित नेह सुभाषित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
लालायित नयनन की आभा।
अश्रु सिंधु समाहित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
कोरबा (छत्तीसगढ़)
प्यारी बिटिया
सदा सत्य ही कहती बिटिया।
लक्ष्मी बाई लगती बिटिया।।
शब्दों के तीरों से कैसे,
रिपु को आहत करती बिटिया।।
करे सदा बेवाक टिप्पणी,
नहीं किसी से डरती बिटिया।।
सदाचार के साथ खड़ी है,
अत्याचार कुचलती बिटिया।।
एक अकेली सब पर भारी,
कोई जुल्म न सहती बिटिया।।
अपनी आँखें कान खोलकर,
सँभल-सँभल पग धरती बिटिया।।
नीता अवस्थी (कानपुर)
गुरुवार, 9 दिसंबर 2021
अपने-अपने ढंग से ही सब जीते हैं
अपने-अपने ढंग से ही सब जीते हैं।
जिसके पत्नी नहीं वे बिल्कुल रीते हैं।
जो हैं विधुर उन्हें भी सदा दुखी देखा
पत्नी बिना रो-रो उनके दिन बीते हैं।
जो भी आया उसने ज़ख्मी ही किया
उन ज़ख्मों को जैसे - तैसे सीते हैं।
रखते नाम लोग इन्नी, बिन्नी, निन्नी
नही द्रोपदी, सावित्री और सीते है।
पिज्जा, बर्गर मोमो कभी नहीं खाते
हम तो निसदिन खाते पके पपीते हैं।
लोग गटकते व्हिस्की, ब्रांडी या रम
हम तो सिर्फ चुकंदर का रस पीते हैं।
जंगल का दायरा रोज कम होने से
शहरों में अक्सर आ जाते चीते हैं।
पड़ोसी गर सुखमय जीवन जीता है
पड़ोसी ही उसमें लगाते पलीते हैं।
जुये में भी दांव लगाया कितनी बार
'खेतान' हारते ज्यादे,कम ही जीते हैं।
मंगलवार, 24 अगस्त 2021
डाली का फूल
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021
नवगीत : अशोक सिंह
बताओ हम कहीं ठहरे हैं
वो अपने रात हो दिन हो,
भले ये ज़िन्दगी पिन हो।
बताओ। हम कहीं ठहरे कहां हैं?
धूप के जलते सफर में छाँह तो मिलती।
पांव जख्मी टीसते थे,लड़खड़ाते थे,
इक तसल्ली को भली सी बाँह तो मिलती।
खूब सुनते कान हैं, बहरे कहां हैं?
बस्तियों के मौन सन्नाटे
हवायें जड़ गयीं चांटे,
भूख की आँखों भरी भाषा,
समझता कौन परिभाषा।
कि अंधे राज्य में अनुवाद किससे हो।
भ्रमित से डूब जाते हैं,
बताये कौन हमको ताल ये गहरे कहाँ हैं?
वो आंखें लाल कर आये
कभी पूछा नहीं क्या दर्द है क्यों शोर करते हो
जो बोलें जान लेते हैं
भॄकुटियां तान लेते हैं
पुराना रोग कहकर घूरते क्यों बोर करते हो
उन्हें फुर्सत नहीं मिलती
यों कहते जब चले आना यहां पहरे कहाँ हैं?
आज ठहाके ओठों के ...
आज ठहाके ओठों के अनदर हैं मरे मरे !
बिंधे वाण से तड़प रहे हैं निर्जन जंगल में।
रावण के बंधक हैं सम्मुख राम रसीले हैं।
वो भी था परिवेश कि रीते थे पर भरे भरे।
अब भौतिक सुख लदे कहीं अन्दर पर डरे डरे।
पहले फक्कड़ थे शाहीपन था,व्यवहारों में,
आज ठहाके ओठों के अन्दर हैं,मरे मरे।
डूब मरेंगे सब बहकर इस गंगा के जल में।
ये विभीत्स चेहरे जो लगते नीले पीले हैं।
केवटपाड़ा दुमका-814101 (झारखण्ड)
मो. न.ः 9431339804,
ई मेल - ashok.dumka@gmail.com
सोमवार, 22 फ़रवरी 2021
नवगीत : देवेन्द्र कुमार पाठक
हम सावन मन हरयाये
और न जेठ मुरझाये,
हाँ,रैली, घेराव, धरने में
डंडे खाये, अघाये।
इसमें कोई न राजा - रानी!
कॉमरेड इस दौड़ - होड़ में,
कूद - फाँद बहुत कर रहे तुम
खींच - तान में,जोड़ - तोड़ में,
दौड़ो - दौड़ो कुआं खोदने,
जले न राजभवन,सिंहासन,
जली जा रही है रजधानी!
लेकिन कुम्भ नहा न पाये,
उनके हाथ - अँगुलियाँ महकें
जिनके पुरखों ने घी खाये,
हम नदियों की रेत निचोड़ें
चढ़ी दुपहरी स्वेद नहाये,
तप करते हम औघड़दानी!
रहे सींचते खेत खून से
हाड़ जुड़ाती लम्बी रातें
काट रहे उम्मीदे पाले,
भरपाई दहाई - सैकड़े के चेक,
अच्छे दिन के दावे करती
लचर दलीले पीटें पानी!
लबरों के हल कितने चलते,
भई गति साँप छछूँदर केरी
लीलत बने,न बने उगलते
चश्मदीद ये पाँतें - सड़कें
लहू प्रसव या कटे - मरे का
करता सच की नीमबयानी,
सच के करने लगे दलाली,
प्रतिरोधों के वाहक लाइव
फेचकुर फेंकें करें जुगाली
गाँधी को तौले गोड़से से,
रीढ़ तोड़कर उर्वरता की
दैवी विधी की व्यथा बखानी
श्रमजीवी, श्रमसाधक हूं
धरती का आराधक हूँ,
श्रमजीवी श्रमसाधक हूँ!
जेठ तपे, सावन बरसे
या पूस - माघ हिमवात चले,
हर ऋतु,हर मौसम में
ये दो पाँव मेरे दो हाथ चले,
मैं क्या जानूँ रुख बाज़ारु
हानि - लाभ की दशा दिशा,
मैं श्रम - सेवा,त्याग प्रेम और
समता का प्रतिपादक हूँ!
हाँ,मैं ही इस जग - जीवन का
वर्तमान,आगत,गत हूँ
पर अपने कृतित्व के मूल्यांकन
से विरत कर्मरत हूँ
प्रभुता के पवर्त - शिखरों पर
चढ़ना मेरा ध्येय नहीं
मैं जन - जन की भूख - प्यास,
दुख.पीड़ा का संहारक हूँ!
पलटे कई सिंहासन, कितने
मुकुट गिरे मैंने देखा,
गुजरे कितने दुर्दिन कितने
सुदिन फिरे मैंने देखा
पदमर्दित हो गयीं ध्वजायें
और कई यशगगन चढ़ी
मैं भू सुत हर बार हर कही
नव सिरजन अवधारक हूँ।
नदी पसीनें की बहती है
मेहनतकश की देह - धरा पर
नदी पसीने की बहती है,
भगीरथ प्रयत्नों का है,
इसके बलबूते ही सच साकार
हुआ सुख स्वप्नों का है,
बंजर को उर्वर करती है,
इस बेरंग स्वेदजल ने ही
बहुरंगी संसार रचा है,
जीवन पर विश्वास बचा है,
हर उन्नतित प्रगति की इससे
राह निकलती है
दुर्दिन के दुगर्म शिखर ढहाये,
इसने कई सफलताओं के
धरती पर आकाश झुकाये,
बदले ताज -तख्त कितने,
यह अविरल बहती है।
रचनाकार परिचय
शिक्षाः एम. ए. बी.टी.सी.(हिन्दी अध्यापन) दो उपन्यास,
चार कहानी संग्रह, दो व्यंग्य संग्रह,दो कविता संग्रह पत्रिकाओं
में रचनाएं प्रकाशित। (महरुम तख्¸ाल्लुस से गजलें कही) आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारण भी।
कटनी 483501 (म.प्र.)
स्वागत है मधुमास
छुअन प्रेममय देह की,झंकृत दिल के तार
निखरी सुर्खी गाल पर, नैंनो से उद्गार
चुनर लाज की कर रही, असमंजस के प्रश्न
रहे काँपते लब सिले, मौन हृदय में जश्न
खिली देह से झर रही,मादक मादक गंध
उखड़ी साँसे तोड़ती,संयम के अनुबंध
हृदय विरह की अगन में,धधके सुबहोशाम
संचित यादें इनदिनों, छेड़ रहीं संग्राम
पियरी - पियरी ये धरा,नीला है आकाश
कोयल कुहुकी बाग में,स्वागत है मधुमास
मुर्दे ने मिट्टी से कहा...
मुर्दे ने मिट्टी से कहा, मैं मिट्टी का पुतला हूं,
छोटी सी संसार थी मेरी,मैं जिससे अब उजड़ा हूं।
जीवन भर नफ़रत में जला था,अब मैं तेरी गोद जलूँ,
वैर - द्वेष तन मन में पला था,मैं मिट्टी था मिट्टी में मिलूँ।
तिनका तिनका तन धन खातिर,जीवन भर मैं भटका हूं,
जब टूट गया सांसों का तार,आज अर्थी में मैं लटका हूं।
मैं अपना - अपना कहता था,तब जीवन सारा अपना था,
तन मन धन सारा छोड़ चला,जो जीवन देखा सपना था।
मुर्दे ने मिट्टी से कहा मैं मिट्टी का पुतला हूं,
वस्त्र बदल कर प्राणों का,मैं मिट्टी में मिलने आया हूं।
मैं सृष्टि का कठपुतला था,जो खेल दिखाने आया था,
जीवन के इन अल्पकाल में, किरदार निभाने आया था।
मौत मिला जब जीवन में, तब सत्य बताने आया हूं,
कर्म किया क्या मैंने जीवन,अब अन्त दिखाने आया हूं।
ईमान,सादगी,जीवन जी ले, फर्ज निभाने आया हूं,
प्राण मिला है मिट जाएगा, शमशान दिखाने लाया हूं।
औरंगाबाद (बिहार)
रविवार, 21 फ़रवरी 2021
स्त्री
मैं सृष्टि का अनमोल सृजन हूं,
मैं हर घर में पाई जाती हूं,
कभी श्रद्धा के भाव से तो,
कभी कामुकता से देखी जाती हूं।
मैं ही चंड - मुंड,महिषासुर मर्दिनि,
मैं ही कौशल्या,यशोदा,अंजनी
मैं तुलसी बन आंगन में रहती,
मैं हीं बाजार में भी बेची जाती हूं।
मैं सृष्टि का ...
तुम अंतरिक्ष में जाकर भी,
चांद पर लटके रहते हो,
मैं धरती बनकर नीचे ही,
आसमान झुका ले जाती हूं।
मैं सृष्टि का ...
युग युगांतर से मेरी महिमा भारी है,
लक्ष्मीबाई कभी दुर्गावती की अवतारी है,
तुलसीदास, कालिदास महान बने,
इसमें भी विद्वता हमारी जानी जाती है।
मैं सृष्टि का ...
कभी हिमालय की कठोरता,
कभी गंगा की शीतलता,
कभी राम की सीता हूं कभी कृष्ण की राधा,
लेकिन यह सच है कि
तुमसे मिलकर ही पूरी हो पाती हूं।
मैं सृष्टि का ...
वाराणसी
