रविवार, 21 फ़रवरी 2021

स्त्री

ऋतु सिंह

मैं सृष्टि का अनमोल सृजन हूं,
मैं हर घर में पाई जाती हूं,
कभी श्रद्धा के भाव से तो,
कभी कामुकता से देखी जाती हूं।
मैं ही चंड - मुंड,महिषासुर मर्दिनि,
मैं ही कौशल्या,यशोदा,अंजनी
मैं तुलसी बन आंगन में रहती,
मैं हीं बाजार में भी बेची जाती हूं।
मैं सृष्टि का ...
तुम अंतरिक्ष में जाकर भी,
चांद पर  लटके रहते हो,
मैं धरती बनकर नीचे ही,
आसमान झुका ले जाती हूं।
मैं सृष्टि का ...
युग युगांतर से मेरी महिमा भारी है,
लक्ष्मीबाई कभी दुर्गावती की अवतारी है,
तुलसीदास, कालिदास महान बने,
इसमें भी विद्वता हमारी जानी जाती है।
मैं सृष्टि का ...
कभी हिमालय की कठोरता,
कभी गंगा की शीतलता,
कभी राम की सीता हूं कभी कृष्ण की राधा,
लेकिन यह सच है कि 
तुमसे मिलकर ही पूरी हो पाती हूं।
मैं  सृष्टि का ...


वाराणसी 

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