इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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मंगलवार, 26 अगस्त 2025

चलव, हड़ताल करथन

 छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-‘
धर्मेन्द्र निर्मल
मन मारके आफिस गए रहेवँ। जइसे कुर्सी पाए मनखे कुर्सी ल अपन जन्मसिद्ध अधिकार समझ पसरे लमे ऊँघावत रहिथे। उही किसम के मानसिकता पोटारे मोरो तन-बदन म आज ऊँघासी, उदासी अउ उबासी के राज हावय। अइसे तो मोर मनहूस थोथना, रेगड़ा-मरहा-बीमरहा तन अउ बैलगाड़ी जस धीरलगहा काम-बूता के सेति जनता मोला ‘मुर्दा मानुस’ के पागा पहिरा दे हवय। उपरहा म मैं दोगला, बइमान अउ जीछुट्टा करमचारी के सुग्घर खुमरी तको मुड़ म पहिर डारे हाववं। आज मन तको मुरझुरागे हवय, कारण बिहनिया-बिहनिया गृहलक्ष्मी के उल्लू ह मोर थैली म धावा बोल दिस। गृहलक्ष्मी तो अइसे होथे कि कपड़ा धोते-धोवत थैली ल तको फटाफट बहार-बटोरके सफाचट कर देथे। गृहलक्ष्मी मनके इही स्वभाव ल देखके स्वच्छता अभियान के महा विचार जनम ले हवय। देश दुनिया के विकास म देवियन के साथ।  सबो के साथ, सबो के विकास- इति सिद्धम।
ऊँघावत तन-मन म अचानक चहा-पानी के चुलुक सुलग के भभक आइस। मैं सुरता के हत्थे मत्था के खुदाई करे लगेवँ। अभीन अइसन कोन से फाइल हे, जेकर झारे-रपोटे, सुँघियाए-चाँटे ले तरसत थैली ऊपर कृपा बरसाए जा सकय अउ चहा-पानी के सुलगत-धधकत आगी ल हवन देके ओम शान्ति करे जा सकय। तभेच दुवार के फइरका खड़खड़ाइस अउ ‘अउ निर्मल’ के दनदनावत पोंगा आवाज अन्दर धमक आइस। आवाज के धमक ले मोर आँखी म चमक झलक आइस। मैं चहा-पानी के चाह ल भीतर तक चुहकत-चुचरत चहकके गमक उठेवँ। 
थोथना ल उठाएवँ, देखेवँ -आगू म कर्मचारी संघ के भूँईफोर अध्यक्ष अपन तुतरू टाइप तुच्छ विराट स्वरूप म अवतरित हे। मैं बोकबाय, मुँहफराय, अकबकाय 
सुरबइहा टाइप देखते रहिगेवँ। अहो भाग्य ! दसों-बीसां फोन के तको उत्तर नइ देके अपन व्यस्तता, महानता अउ गुणवत्ता के परिचय देवइया महान नीयतखोर, जलनखोर अउ हरामखोर ढोंगी व्यक्तित्व के धनी आज अचानक निर्धन-कुंदरा म। मैं बइठे बर कहितेच रेहेवँ, वो थकहा, जाँगरचोट्टा अउ कोढ़िया कुर्सी खींचके पसरत अपन बड़प्पन, ढीठपन अउ जिद्दी आदरणीय होए के परिचय दे दिस।
कुर्सी म धँसत-उन्ढत-घोन्डत कहिस - ‘अऊ का हाल-चाल हे जी ?’
‘चाल अपन जा नइ सकय अउ हाल बताए नइ जा सकय ?’
‘काबर, अइसन का होगे ?’
‘इही हाल मौका-बेमौका बहाल होके बेहाल कर देथे, भइया ...।’
‘बहाल होना तो हरेक कर्मचारी के जन्मसिद्ध अधिकार ये महोदय, येकर ले हमन ल विधाता हँ तको नइ रोक सकय, ये भ्रष्ट, जुटहा, लालची अउ चप्पलसेवक चाटुकार अफसर अउ खद्दरधारी फोकला फुसियाहा बयानबीर बेन्दरा मुखिया मन काय कर सकही, हूँ ....फेर तैं, आदमी बड़ दिलचस्प हस यार’ कहत वो अपन बत्तीसी ल उघारिस। चाँदी कस चमाचमावत बत्तीसी ह पिंयर पिंयर दीखत रिहिसे जेन ह वोकर मोठ विकास के पोठ परिचय देवत रिहिसे।
ओकर जुवाब म हमु अपन बत्तीसी उघार के साबूत सबूत दे देन कि अच्छा बच्चा बरोबर बिहनिया-बिहनिया दाँत-मुँह म झाड़ू-पोछा करथन। दाँत तो जिद्दी बाल (बालक अउ केस दूनों) बरोबर अपन सफेदी म कायम हवय। हमू हँ झक सफेद बाल म मेहंदी अउ चक सफेद दाँत म ‘जुँबा केसरी’ के सुग्घर सुनहरा रंग चढ़ाके ऊँचे लोग ऊँची पसंद के विज्ञापन करे म जुटाही मार लेथन। 
तभे, मोर खलपट्टा दिमाग म ये बात आइस कि अभीन तो दूरिहा-दूरिहा तक संगठन चुनाव के मानसून नजर नइ आवत हे, न कोनो चक्रवाती तूफान तुकतुकावत तियार हे, जइसे कि चोर-चोर मौसेरा भाई बरोबर कोनो भ्रस्ट कर्मचारी भाई के रिश्वत लेवत रंगे हाथों पकड़े जाना, कोनो संगी के नियमितता ल अनियमितता बताके सस्पेंड करना आदि-इत्यादि-अनादि। फेर ये बरसाती मेचका-सम अतेक उछलम, कूदनम अउ टर्रम-टर्र कोन बात म ?
खैर, बात कुछु रहय, फेर बात हे बज्जुर। मोर मन म सैर करत डोकरी घटना रेंगते-रेंगत अचानक पल्ला (सरपट) दौड़े लगीस। 
पीछू दफे, मैं उल्टी-दस्त ले पस्त होए के बहाना बनाके चुस्त-दुरूस्त घर म अस्त-व्यस्त-मस्त परे रहेवँ। मोर अनुपस्थिति म परिस्थिति अइसे भारी परिस कि सबो वस्तुस्थिति दस्त कर डारिस अउ मोर विरोध म उल्टी करत सोकॉज नोटिस जारी हो गे। 
वोकर निदान खातिर इही बइमान ल कई पइत फोन लगाएवँ। आखिर म मोला ये महानुभव होइस कि ये महानुभाव बड़ व्यस्त मनखे हरे। समस्या छोटे होवय के बड़े, आदमी के सकपकाना-अकबकाना-धकपकाना स्वाभाविक हे। मैं तुरत-फुरत कूद-फाँदके, एति-ओति ले ले-देके मामला सुलटा लेवँ। 
बिहान भर ये मोर ले मिले बर खुदे आ धमकिस अउ आते ही बंदा धमकावत चंदा माँगे लगीस। 
‘मैं कहेवँ का के चंदा ?’
मंद-मंद मुस्कावत बंदा अब चंदा के धंधा होवत लंद-फंद म आ गे। अपन निर्लज्जता अउ हरामखोरी ल हमाम साबुन म धोवत कहे लगिस- ‘भाई मेरे ! तोर वाले वो मामला ल तो सुलटाए बर परही न।’
मैं कहेवँ - ‘मामला ल तो मैं सुलटा लेवँ,’ त वो झेंप गे, सोचिस-‘स्साले मोरो ले जादा पावरफुल हे’। गुसिया-फुसियागे। पद के रौब झाड़त कहिस-‘यार ! सबे मामला ल खुदे रफा-दफा कर डारहू, त संगठन का करही ? बाद म अनते-तनते हो जाथे, ताहेन हमन ल बदनाम करथौं। संगठन वाले सहयोग नइ करय। खाली-पीली फोकट म चंदा बस माँगथे, आदि-अनादि -इत्यादि।’
मैं कुछु बोल नइ पाएवँ, वो बकते रिहिस-‘हमू मन ल तो कुछ पता चलना चाही। का चलत हे, का अटकत हे, कोन सटकत हे। कोन कतका झटकत हे, कोन कतेक फटकत हे। कम से कम तुम्हार समस्या के बहाना साहबमन ले हमू मन ल मिले-मुलाए के मौका मिल जथे। जान-पहिचान बढ़थे।’
थोरिक रूकके फेर बखानिस - ’कुछु तो अनुभव मिलतिस जोन भविष्य के आड़ा-तिरछा बेरा म काम आतिस। सब गँवा दिएव। तुम छोटे कर्मचारी मन संग न, इही रोना हे, सब खदर-बदर करके रख देथव।’ अउ अपन कुंदुरू मुँह ल तुतरू बरोबर फुलाके बइठ गे।
मैं कहेवँ-‘चल, जोन बीत गे वो बात गय। कहव का लेहू आप ?’
 वो पासा ल अपन कोति पलटे देख कहिस-‘आपके सोकॉज नोटिस ले मैं ये नोटिस करेवँ कि भविष्य के सुरक्षा बर संगठन के रोंठ अउ पोठ होना आवश्यक हे। एकर खातिर आप लोगन के सहयोग अपेक्षित हे।’
‘मैं का कर सकथौं, बतावव ?’- मैं अपन सरीफी झाड़ेवँ।
‘आज के जमाना म अइसन कोन जिनिस हे, जेमा सबले जादा शक्ति निहित हे।’
‘संगठन में’ - मैं सट-जुवाबी के फोरन डारत अपन सठ दिमाग के हुसियारी बघारेवँ।
वो अव्वल दर्जा के फाइन-फिनिस दर्जी निकलिस। पहिलीच ले धरहा कैंची धरे बइठे रिहिस। मोर गोठ ल चर्र-ले चीरत-काटत कहिस -‘इहीच मेरन मार खा जाथन हमन। संगठन तभे मजबूत अउ शक्तिशाली होथे, जब आँट के गाँठ म भरपूर साँठ (माल) होवय।’
अतका कहि वोहँ टेबुल म थोरिक झुकिस अउ मोर आँखी म आँखी डार मोला मोहावत कहिस-’ साँठदार आँट के संग-संग साँठ-गाँठ भी बेहद जरूरी है, समझे का ?’
मैं अपन आड़े मुँह ल फारके अड़ाए खड़े-खड़े ओकर थोथना निहारे लगेवँ। वो बकते बखानत रिहिस -‘संगठन के मजबूती अउ उत्तम व्यवस्था बर कुछु व्यवस्था हो जाए बस। ओकर ले उपराहा आप जऊन लेना-देना चाहत हौ, वो आपके मर्जी। हमार इहाँ दान के बछिया के दाँत नइ गिने जाय।’
‘भैया ! अभीन तो मोर इहाँ सुक्खा-सकराएत हे। चारो मुड़ा अकाल परे हे, बाद म ..... ’ कहत मैं अपन दीनता ल उघार के देखाए लगेवँ, त वो झट उठके खड़े होगे अउ अपन अनुभव के लट्ठ पटकत रट-फट जऊन मन म आइस बके लगिस -‘देखो जी, ये मगरमच्छ के आँसू मोला झन देखा, मोला सब पता हे, आफिस के कते-कते कोन्टा मं कहाँ-कहाँ कतका धन गड़े रहिथे।’
मैं आफिस के ओन्टा-कोन्टा, अगल-बगल ल झाँके-ताके-तलाशे लगेवँ अउ मने मन बके-बखाने लगेवँ- ‘स्साले ! बड़ कुकुर किसम के घ्राणशकित लेके धरती म अवतरे हे। अतेक जल्दी फाइल मन ल तको सूँघ डरिस।’ वो आगू बोलिस-‘मोला कुछ नइ सुनना-देखना। अभीन चंदा चाही, त चाही बस।’
जब मैं ‘अभीन’ के नाम म मुड़ पटक देवँ त वो नाराज होके पैर पटकत रेंग दिस।
वोकर ये रौद्र रूप देखके मैं सोच म पर गेवँ-‘अच्छा ! त, बंदा चंदेच के नाम म चुनावी लंद-फंद म परे रहिथे। ये तो साफ-साफ, सोज्झ-सोज्झ, फरी-फरा फुलत-फरत फुरमानुक धंधा हरे, बाप रे !’
तब के बिछड़े हँ आज वो फेर इहाँ आके मिले। मैं सोचते रहि गेवँ - अब मोर खैर नहीं। बंदा, चंदा लेके ही लहुटही। तभे वो अपन औकात ऊपर सवार होगे अउ दाँत निपोरत कहिस-‘चलव, हड़ताल करथन।’
मैं कहेवँ-‘का बात के हड़ताल ?’
‘पहुँचे हुए बेवकूफ हस तैं। बात कुछ रहय चाहे झन रहय। सामने चुनाव अवइया हे। सरकार ल कुर्सी म लहुट-पहुटके बइठे रहिना हे, त ओला हमर बात मानेच बर परही। लहुटे के नाम बर उन अइसन लेटके समय व्यतीत नइ करे सकय। चारपाई ऊपर चौपाया मन बरोबर लेटे-उन्डे-घोन्डे रहे के दिन अब फिर गे।‘
मैं वोला ओकर दूरदर्शिता के दाद देवइयच्च रेहेवँ कि वो अपन मन के उभरत माता (चेचक) के दाग देखाए लगिस, बोलिस-
’सत्ता पक्ष के सफलता, वाहवाही अउ दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की ल देखके विपक्ष ल साँप सूँघ गे हवय। सत्ता म आते ही ये मन कइसे अपन वेतन, मानदेय, भत्ता सब एके झटका म बढ़ा लिन, जेकर ले मुँह ताकत धकेले-धकियाए, हुद्दा खाए मुद्दाविहीन विपक्ष ल जरे म नून परे के एक ठो अउ सुनहरा अवसर मिल गे हवय। उन्कर छाती म एके संघरा अटखेलिया करत दोहरा-तीहरा साँप लोटत हावय।’
‘जब ले कुर्सी ले धकियाए गे हवय, उन विक्षिप्त, बीमरहा अउ पंगुरहा हो गे हवय। वोमन कल बेकल होके अपन चंगु-मंगु सहित मोर तीरन आए रिहिन। कहत रिहिन-देखव ! गरीबन के पइसा ले चौपाई म पसरे ये नकटा-कुटहा, जीछुट्टा अउ मीठलबरा हरामखोर चौपाया मन कइसे ऐश करत हावय। इही मन कभू हमन ल पानी पी-पीके बकय अउ आज इही मन हमार ले जादा होगे हे। हम सीधवा का भएन, दुनिया मसगीद्दा होगे। तुमन आफिस म बेवकूफ, गँवार अउ बइहा-भूतहा लोगन के बीच दिन भर खँटथौ। तुँहरो तो कुछु भला होना चाही,  अकेल्ला मुसुर-मुसुर खवई बने नइ होवय। मिल-बाँटके खाए म भलई होथे।’
‘इही बात म विपक्ष साँठगाँठ के आसरा ल गठियाए हमार कोति मुँह बाए खड़े हवय। उन्कर उत्कट-मरकट इच्छा हे कि क्र्रमविनिमेय अउ योगसाहचर्य नियम के अनुसार हम एक दूसर के संबल बनन। सहयोग बर वोमन तो मरे-च जावत हे। हमरे कोति ले आस्वासन बाकी हे। उन महामुर्दा मन अभीन तक हमरे आसरा म जीयत हावयं।’
‘हमन ल मिलइया लालीपाप अउ आश्वासन-भासन के रासन ले उन्कर पेट पीराए-कीराए लगे हावे। उन अतेक दुखी, हतास अउ उदास हवय कि आत्महत्या करे बर उतारू होगे हवय। अइसन मौका म हम चौका-छक्का नइ लगा पाएन त धिक्कार हे हमर मक्कारी, भ्रष्टाचारी अउ रिश्वतखोरी के योग्यता, साहस अउ भावना ल। दर-दर भटकत उन बेकदरा मन के कदर अभीन नइ करबोन त कभू न कभू हमरो हाल उन्करे मन कस हो सकत हे जब उन कुर्सी म लहुट परही। अभीन ऑफिस म बइठे मिश्रीयुक्त मक्खन लूटत हावन वो बात अलग हे। फेर कभू उन्करो आयोडीन युक्त नमक खाए हवन। एक लोभचाहक, लाभदर्शक अउ सच्चा लोकसेवक ल ये बात कभू नइ  भूलना चाही कि हमर ये पद के मद तभे तक जिंदा हे जब तक उन्कर पाद अउ दाद जिंदा हे, नहीं तो ये करमछड़हा नौकरी तको बंचक छोकरी कस गर के फंदा ले कम नइहे।’
मैं बकासुर-बरोबर बयाए ओकर थोथना ल देखते रहेवँ अउ वो सरलग बकर-बकर करते रिहिस -‘पुरजोर शक्ति-प्रदर्शन निजोर लोकतंत्र ल सजोर करे के अनिवार्य, अकाट्य अउ अपरिहार्य मंत्र-तंत्र-यंत्र हरे। एक ताल ठोंके ले विपक्ष के ताली तो बरसना ही बरसना हे। सत्ता के गारी-बखाना अउ संगठन के बात छोड़, कम से कम मोर पहिचान तो ऊपर तक बनबे करही। चलव ! इही बहाना कुछ माँग रखके हड़ताल कर देथन। लोहा गरम हे। भागत भूत के लंगोटी सही। कुछ नहीं ले अच्छा ‘कुछ’ तो मिलबे करही।’

संगठन म शक्ति निहित होथे। शक्ति म हित तको समाहित होथे। 
सो निज हित अउ निहित शक्ति ल सुँघियावत -भाँपत महूँ ओकर  हाँ म हाँ मिला देवँ। 


ग्राम कुरूद, पोस्ट-एसीसी जामुल, थाना-जामुल
तहसील-भिलाईनगर, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़ पिन -490024 मोबाइल नं. 9406096346

रविवार, 20 फ़रवरी 2022

झन्नाटा तुँहर द्वार

महेन्द्र बघेल

      बड़े होय चाहे छोटे, अमीर होय चाहे गरीब,मालिक होय चाहे नौकर,लमगोड़वा होय चाहे बठवा, सियान होय चाहे जवान,गोरा होय चाहे सावरा सँउक तो सँउक हरे जी। अंतस के सँउक ल भला कोन ह मार सकथे। सँउक ले बढ़के अउ का हे ये दुनिया म। समय के संगे - संग सँउक के वेराइटी हर घलव अपडेट होवत (बदलत) रहिथे।
        पहिली मनखे अपन जरवत के मुताबिक जिनिस ल बउरे अब सँउक के हिसाब ले चीज - बस ल बउरथें। नवा जमाना हे त सँउक ह घलव हाईटेक होगे हे। इही सँउक बर चिंतन करत देश के चिंतक मन ह सत्ता के विकेंद्रीकरण अउ उदारीकरण के नीति ला देश के हित में बताथें। ठंडा दिमाग म जब ये बात ल सोचबे त लगथे, सही म येकर प्रत्यक्ष प्रमाण सरकार के आबकारी नीति हर आय।
         बच्चा ले लेके बम्फर तक अलग - अलग ब्रांड मा झन्नाटा अउ पाउच - पानी आकर्षक वेरायटी मा गाँव - गली, मोहल्ला मा सहज अउ सुलभ ढंग ले उपलब्ध हो जथे। नान्हे रहेन तब सुनन येहा पहिली कस्बा अउ शहर म मिले, एक कनी बाढ़ेंन तब पता चलिस ये बड़का गाव (जादा आबादी वाला गांव) मिलथे, आजकल गांव - गांव म मिलथे। अघोषित रूप म ग्राम पंचायत,गांव प्रमुख अउ उर्जावान झन्नाटा बेचइया (कोचिया) के बीच मा लेन - देन अउ जोहार -भेंट जइसन एक ठसलग गठबंधन तैयार होथे। फेर भीतर - भीतर होय सेंटिंग। सहमति के बाद आबकारी विभाग के आदरणीय अधिकारी कर्मचारी मन के परसादे अलग - अलग पाउच, डब्बा अउ शीशी मा जब्बर गुणवत्ता वाले झन्नाटा ला आम उपभोक्ता बर घर बैठे जुगाड़ करवा देथें। मनखे के सँउक ल पूरा करे बर जब सरकारे ह अपन कनिहा कस लेथे तब गांव - गांव म गली - गली म झन्नाटा ह उपलब्ध होइ जथे।
        मने गांव अउ पंचायत के सक्रियता ले सरकार के हर भावी योजना हर समाज के आखरी मनखे तक पहुंच बना पाथे। तब हम कहि सकथन कि शासन प्रशासन के जुम्मेदार पद मा बइठे नीति बनइया मन आम उपभोक्ता तक पीये - खाय के सामग्री ला अमराय बर ’ झन्नाटा तुँहर द्वार’ जइसे राजस्व जुगाड़ू योजना अउ पंचायती राज के सपना ला साकार करत हें।
         गांव - गांव के कतरो हमर दीदी बहिनी मन येकर विरोध करिन, कमांडर बनके,टोपी पहिरे लउठी उबावत अउ सिरसिरी पारत खूब धमकी चमकी लगईन। धर - पकड़ ल देखके कोचिया मन के सुकुड़¸दुम होय लगिस। थोरिक दिन बर दुकान - पानी बंद होगे।
         फेर उपभोक्ता समाज म येकर जबरदस्त साइड इफेक्ट आना शुरू होगे,अक्खा मंदहा मन तो हफर -हफर के हाय - हाय करत कइसनो करके जीना सीखगे। फरक पड़िस उनकर घर के ओ लइका मन ल जेन बिहनिया च ले शीशी के भरोसा डबल रोटी बिसाय। आज वोमन एक ठन शीशी गतर बर मोहताज होगे, गोसइन मन दू -फर साग अउ सुरवा बर तरसगें। का ये दरद के अनुभो कोई मनखे समाज ल हे, आखिर यहू मन तो सामाजिक प्राणी हरे का ? इनकर मौलिक अधिकार के रक्षा भला कोन ह करही।
        फेर कहे गेहे जेकर कोई नइ रहय ओकर उपर वाले होथे। समय अइसे पल्टी खाइस कि उपर वाले मन इनकर उद्धार करे बर कैबिनेट म पहुंचगे। फेर का पूछना हे, शिक्षित बेरोजगार मन के चिंता करत ओ समय के सरकार हा एक ठन कल्याणकारी योजना जनता जनार्दन मन बर लागू कर दिस। अउ नवा बजट -साल मा एक अप्रैल ले सब्बो प्राभेट ठेकादारी ला बंद करवा के उच्च गुणवत्ता के चौबीस कैरेट वाले सरकारी झन्नाटा दुकान खोल दिन। बड़े - बड़े बस्ती के चौरस्ता मा नवा - नवा बिल्डिंग बनाय गीस।
         सार्वजनिक वितरण प्रणाली सही कर्मचारी राखे बर नौकरी के विज्ञापन निकाल दिस। देखते - देखत फारम भरे बर बेरोजगार मन के भीड़ उम्हियागे। सबले ज्यादा नंबर पवइय्या बेरोजगार साथी मन के चयन घलव होगे। अउ शुरू होगे सरकारी झन्नाटा दुकान।
         दुनिया मा अपन आदर्श वादी पहिचान बनाय खातिर सरकार हर भट्ठी के सुचारू संचालन बर पढ़े लिखे होनहार कर्मचारी मन के भर्ती करिस,जेकर ले मंदहा मन ला सही डिग्री वाले झन्नाटा मिल सके। फेर हरेली, पोरा, देवारी, होली, मेला - मड़ई, सगई, बिहाव, छट्ठी,पिकनिक,जनमदिन, जइसन कार्यक्रम के समय मा मिलावट वाले मंद (जहरीला दारु) बेचाय के खबर ला सुनके सरकार बेचैन हो जथें।
         आबकारी मंत्री के नींद उड़ जथे। ओ रात दिन इही चिंता मा बुड़े रहिथे कि हमर प्रदेश के गउ कस जनता मन ला तिहार बार मा कइसे ओरिजनल झन्नाटा के सुविधा देवा पाबो।
         मनखे समाज मा अपन खास पहिचान रखने वाला येकर उपयोग करइया कका - भइया मन जब सरकारी आईटम (झन्नाटा)ला सबले पहिली चिखिन तब ओकर ओरिजनल सवाद अउ झन्नाहट ला पाके बड़ खुशी मनाइन।
         फेर छन्नू ला नवा मटेरियल के सवाद हा थोरको भी पसंद नइ अइस अउ अपन मन के बात ला मन्नू कर कहिस। कस भाई हमला अतिक दिन होगे हे येला बउरत फेर आज ले अइसन नी लगे रहिस,कहुं डुप्लीकेट माल ला तो नी दे देहे।
        मन्नू कहिस - हत कँहिके बइहा,अइसन बात नोहे। जब बिक्कट दिन ले डुप्लीकेट चीज - बस ला बउरत रहिबे नए तब वोहा डिट्टो ओरिजनल कस अनुभो होथे। अउ कहुं हुरहा ओरिजनल ले पाला पड़ जथे तब सवाद अउ हाजमा दूनो के खराब होय के डर ह सतात रहिथे। संग मा डुप्लीकेट के भोरहा घलव हो जथे भाई,का करबे।
        नवा वेवस्था मा जब ओरिजनल झन्नाटा के शोर - खबर हा हर मंदहा भाई मन तक पहुचिस तब सरकार के खूब वाहवाही होइस। खुशी मनावत सबे मन एक - एक दूदी पैग उपराहा पीके सरकार के प्रति आभार व्यक्त करिन,रंगझाझर खुशी मनाय के चक्कर मा कई हितग्राही मन कोमा में घलव पहुंचगे। कई झन नाली मा झपावत हाड़ा - गोड़ा टोरके अपन समर्पण भाव ला सरकार तक घलव पहुचाइन।
सरकारी आइटम के प्रति लोगन मन के बइहा - भूतहा कस मया - दुलार पाके सरकार हर मने मन बड़ खुशी मनाइस। अउ येकर भरोसा कई ठन जन कल्याणकारी योजना बनाय बर सोचिस।
        गजब के झनझनाहट ला देखत तीज - तिहार, बर -बिहाव, नेंग - जोग मा येकर डिमांड बाढ़गे, उही साल नचइया मन होली तिहार म चिखला मता - मता के, घोलंड - घोलंड के झूम - झूम के नाचिन।
        आजकल देखब म आथे फलदान (सगई) के बूता ल निपटाय के पाछू ओ सगा - सील जेन मन झन्नाटा के उपभोक्ता माने जाथे। (चालू भाषा म मंदहा टाइप के सगा) उनकर मन के बीच भारी वेवस्था के दौर शुरू हो जथे। मुंधिहार होते साट येमन तुरते खसक जथें, घरवाले मन खाना खवाय बर घेरी - बेरी चिचियात रहि जथे फेर येमन अइसे कल्टी मारथे कि घंटों इनकर गम नइ मिले। येमन जब आथें ते चुपर - चुपराके हालत - डोलत आथें। येमन जब पंगत म बइठथे त इनकर नाज - नखरा शुरू हो जथे। बरा अउ डार, पापड़ अउ दे,सलाद लान,भात ठंडा होगे हे। गरम - गरम लान। अरे रकम - रकम के बरतिया फरमाइश ले जीव हलाकान हो जथे। बस येमन खाना कम घोरना जादा करत रहिथें। ले देके खाहीं - पीहीं त हाथ - गोड़ ल लोम देथे अउ उही मेर पसर जथें। सकुशल घर वापसी ल ध्यान म रखत घरवाले मन इन ला थक - हार के चेचकारत,खींचत - खांचत मोटर गाड़ी म जोरके,धन्य मनाथे।
        मनखे समाज म यहूं बूता ह आजकल अपन जबरदस्त जगा बनावत हे। घरवाले मन कतका सात्विक हे, तात्विक हे, आध्यात्मिक हे। येहा कोई मायने नइ रखे। जतका नेवतार सगा होथे ओमन अपन मनमर्जी के मालिक होथें। काकरो चेहरा म थोरे लिखाय रहिथे अंतस के इच्छा ह जेला टप ले पढ़े जा सके। कुल मिलाके पंगत के आखरी दौर म अइसन पीयाक सगा मनके सबो भेद ह फरिहर होइ जथे ...।
सगई (फलदान)के गोठ ल कतिक लमियाबे, दूसर नेंग - जोग के बेर एकर सुरता नइ आय का ? बिहाव म तो घलव अइसने च ढंग ले चित्रहार देखे सुने बर मिलथे।
         मायन नचइया मन (मेन नाच) सरकारी आइटम के ओरिजिनाल्टी अउ झन्नाहट के अइसे दिवाना रहिथे कि इनकर मन बर हर हाल म वेवस्था करना पड़थे। नइते फुलहा फूफा सही रिसा जथे।
         मोटर ले उतरते साट बरतिया मन अपन अपन ले जुगाड़ मा लग जाथे। सबले पहिली पान ठेला मा जाके झन्नाटा बेचइया के नाम पता,मोबाइल नंबर, गली नंबर माँग लेथें। फेर इतरावत,मटमटावत बरतिया पावर के इस्तेमाल करत पव्वा - खव्वा के वेवस्था कर पाथें। रूचि अउ खपत ला ध्यान मा रखत मयारू पियाक मन ला देशी अउ विदेशी नाम के दू गुरूप मा रखे जा सकथे।
        बरतिया सगा मन के बारे मा जतका गोठियाबे कम हे,फेर कहना तो पड़थेच। झन्नाटा के टोंटा मा उतरते उनकर हाव - भाव ह बदल जथे। जइसे - जइसे उनकर हाथ - गोड़ अउ तरवा म झुनझुनी दउड़ना शुरू होथे बस वइसने च उही रफ्तार मा खीसा ले सुहापी निकल जथे। तुरते ताहीं सुहापी हर बीन बन जथे अऊ नागिन धुन मा जम्मो बरतिया मन अपन- अपन तन - मन ला डोलावत भुइयाँ मा घोंडइया मार - मार के ओरिजनल बरतिया के धरम निभाथें। जइसने च झुनझुनाहट के असर उतरथे। तुरते ताही रिचार्ज करे बर फेर झन्नाटा के शरणागत हो जथें। दूल्हा बाबू ला बरतिया मन डहर ले येकर ले बढ़के मितान श्रद्धांजलि भला का हो सकथे। मटमटहा बरतिया मन के बाते झन पूछ। आगू - आगू मा पुच - पुच कूदत मटमटावत, तेरा मन डोले मेरा तन डोले के धुन मा मड़वा मा चढ़ेच ल धरथें। नाचत - कूदत जइसने च बरतिया मन मड़वा मेर पहुचथे अउ दूल्हिन के संगी सहेली मन के दर्शन होथे,फेर तो नागिन डांस पूरा सबाब मा पहुंच जथे।
ये चाल - चरित ले का छ्ट्ठी - बरही ह बाचे हे कथस। अरे येमा तो जोश - खरोश ह दू गज अउ बाढ़ जथे।
          रात कुन कोनो हुरहा बम फटाका फूटिस तहान तँय समझ जा,उँकर घर के पबरित अंगना मा अवइया छेंठवा दिन मा छट्ठी मनाना तय हे। तहाँ देखले सुत उठके बिहान दिन छट्ठी खातिर बेवस्था बर एक ठन लिस्ट बनना शुरू हो जथे, जेमा तीली,सोंठ, गुड़, मिच्चर - मिठई, चाउर - दार, बरी - मुनगा, भाजी - पाला,पतरी - दोना,पोंगा - समियाना संग बहुआयामी डिस्पोजल गिलास हर लिखाय रहिथे। लिस्ट के आखिरी लाईन मा कुछ कीमती समान के नाम हर नइ लिखाय रहय फेर मीत - मितान अउ सगा - सुजान मन के विशेष रूचि के मुताबिक वो समान ला हर हाल मा बिसाय के जुगाड़ करना च पड़थे।
         घरवाले ले जादा सखा - सुजान अउ मीत - मितान मन छट्ठी हा कब आही कहिके दिन गिनत रहिथे। येमन पाहती च ले ददा अउ बबा बने के सेती फोन मा उसर - पुसर के बधाई अउ शुभकामना पठोवत रहिथें। घेरी - बेरी वेवस्था करे बर नोखियावत रहिथें।
         नवा लइका के आय ले भला कते ददा - बबा अउ कका - फूफा ला खुशी नइ होत होही। छेठवा दिन के आवत - आवत इही बबा जात मनके मुहुं मन घलव पंछाना शुरू हो जथे। उपर ले कोन्हो मन बेवस्था करे बर नोखिया दिस तब तो अउ का पूछना हे। सुर -सुराँट हर पूछी उठाके दौड़े बर धरथे। अइसन दिन ला परोसी मन घलव ठउँका तुकत रहिथे। कब छट्ठी होय त कब जुगाड़ होय। तभे तो परोसी आशाराम ह अपन मन म आशा पाले आज छ्ट्ठी वाले घर मा बिहिनिया च ले टेंक देहे। अंतस मा जुगाड़ के आशा मा चुलुक ला फिजोवत अपन मुखार बिंद ले तारीफ के बीजा छिचत हे।
         आशा राम - बड़ सुग्घर मुहुर्त मा राजकुमार हर तोर दुवारी मा अवतरे हे भैया। लइका के मुहुं कान ह तो बापे सही हे फेर माथा के लकीर अउ आँखी के तेज ह डिट्टो तोरे च सही हावे, बड़का भैया।
एती नाती के संग मा अपनो तारीफ ला सुनके दयालु राम के मन ह गदगद होवत हे।
तारीफ ल सुनके कते मनखे के चोला म मया ह नइ पलपलात होही भला।
         तभे तो तुरते ताही दयालु राम के बक्का फूटिस - का करबे आशा भाई ये तो सब उपर वाले के किरपा आय गा। फेर तोर गोठ ह सोला आना सच हावै छोटे। आशा राम ह समझगे ओकर फेंके निशाना ह सही जगा म टिपाय हे। अपन बात ला फेर लमावत कहिस - का भैया तहूं ह अतिक खुशियाली के बेरा मा थूके - थूक म बरा चुरोवत हस। घर मा नाती आय हे तभो हाथ - पांव सकेलत हस।
          देखते देखत अंतस मा पलपलात चुलुक अउ परोसी धरम के बीच गठजोड़ होगे। येला तो होना च रहिस। दयालु डहर ले बियारी के जुगाड़ के घोषणा,मुखारी करे के बेरा म होगे। असवासन पाके आशा ह धन्य मनइस कि आज ओकर आस ह खच्चित पूरा होही। उही कर छट्ठी साँवर बनावत नऊ ठाकुर ह दूनो झन के गोठबात ल कान टेड़ के सुनत रहिस अउ मौका पाते साट वहूं ह अपनो नाम ल लिस्ट म जुड़वा डरिस।
         बेर बुड़ती के टेम म कोंटा - कांटी डहर बबा (दादा) अपन सँगवारी संग अउ ददा,कका,ममा अउ फूफूा मन अपन दल संग चखना,डिस्पोजल गिलास अउ झन्नाटा के संग छट्ठी तिहार के आयोजन ल सफल बनाय म लग जाथें।
        इहाँ तक तो सब बने रहिस,फेर सभासद मन जस - जस झन्नाटा ल चुपरत गिनए तस - तस अपन - अपन मुहुं ल अनसम्हार फरकावत गिन।
        ओती घर म बहिनी -बेटी,दाई - दीदी अउ रमायण वाले मन सोहर गीत गावत हे त येती डिस्पोजल मैन मन ह फोहर -फोहर गरदा उड़ावत हें। नवा अध्याय के बोहनी इहे ले होइस जे रोशेरोश म तेरे - मेरे धमतरी तक पहुंच बनाइस अउ धक्का मुक्की ले बुक्की - बुक्की ले पटकिक - पटका, बोजिक - बोजा या ये कहन कि मुड़ी, कान,माड़ी,कोहनी के छोलई, फूटई तक पहुंच बना के पूर्णाहुति ल प्राप्त करिस।
          बेरा - कुबेरा म मंदहा मन के रूचि ल देखत हमर तो इही कहना हे कि अइसन मन ला बी. पी. एल. म शामिल करे बर सगई,बिहाव अउ छट्ठी वाले घर के बारे म शासन ल खास ध्यान देना चाही। अउ चाउर वितरण सही सगा - सोदर के हिसाब ले पउवा,अद्धी, बाटल अउ मुरकू - मिच्चर खउवा के शासकीय अनुदान के वेवस्था करना चाही। अउ जेन सगा मन रूचि नइ ले (सात्विक) उनला ए. पी. एल. केटेगिरी म मानके उकर बर फ्रूटी - माजा अउ बिस्कुट - पीपरमेंट आबंटित करे के प्रावधान होना चाही। मने काकरो मुहुं ल कोई काबर टुकुर - टुकुर देखत रहय। मने सबला मिले बरोबर न्याय, जनता पीये जनता खाय।
           येकर गुनगान करत अनुभवी मन बताथे कि येला बउरे ले कोंदा ह घलव पड़पड़ - पड़पड़ बोलना शुरू कर देथे। जोजवा मनखे म हिम्मत आ जथे। खोरवा हर दउंड़ना शुरू कर देथे। अपन घनघोर अनुभो ले बड़ आत्म विश्वास ले ओ कहिथे कि येकर परसादे कई झन कलाकार मन राष्ट्रीय स्तर म अपन नाम बुलंद करे म सुफल हो सकत हें। अउ कई झन मन अलग - अलग मंच म झंडा फहराके श्री - श्री नाम के पुरस्कार घलव पा सकत हें। त अइसन राष्ट्रीय महत्व के चीज ल कई झन नइ माने। ये सब उनकर संकुचित सोच ल बताथे। बल्कि अइसन मनखे मन के दिल ल तो बड़े होना चाही,अतका बड़े कि झन्नाटा हमा जाय। देख हमर सरकार के दिल ह कतका बड़े हे। शासन प्रशासन डहर ले एक घाँव मा सोला ठन खरीदी - बिक्री करे के उदारवादी नीति हर गली - गली मा पहुँच बनाके कल्याणकारी योजना के नवा ईबारत लिखत हे। तेकरे सेती तो बुधियार समाजशास्त्री विश्लेषक मन कहिथें - ये मानव समाज बर अभिशाप आय। अरथशास्त्री मन कहिथें ये समाज के विकास के पर्याय आय।
         जेन भी माननीय मन सत्ता म बइठे रहिथे। ओमन ल समाजशास्त्र के जगा अर्थशास्त्र के सुवाद ह जादा मीठ लगथे। त हमर असन सादा माथा वाले निपट कामन मैन मन बस इही कहि
          सकथन कि एती - ओती, चारो - कोती जब कागजी विकास के गुंगवा उड़त हे तब तो सत्ता सरकार हर उही विकास के फोसवा बाना म ढिठाही के धजा ल फहराबे करही। अउ जनता ल भरमाय बर आश्वासन के हवा ल अंदर - बाहर खींचत अनुलोम - विलोम करबे करही। भला खार - खाय जनता जनार्दन मन शीर्षासन करत रहँय।

डोंगरगांव