इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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बुधवार, 12 जनवरी 2022

एक व्यंग्य लघुकथा

बृज राज किशोर ‘राहगीर’
            हेलो! जी मैं “अलाने” शहर से तूफ़ान सिंह ‘झंझावात’ बोल रहा हूँ। क्या मैं “फलाने” शहर के कुपित कुमार ‘अग्नि’ जी से बात कर रहा हूँ?
' जी हाँ, मैं अग्नि ही बोल रहा हूँ। फ़रमाइए मैं क्या सेवा कर सकता हूँ आपकी ?'
'अग्नि जी, मुझे पता चला है कि आप अगले महीने अपने शहर में एक वीर रस के कवि-सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं। मैं भी वीर रस का कवि हूँ। आपकी इनायत हो जाती तो मैं भी इसमें सम्मिलित हो जाता।' 
'आप चिंता न करें, आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था मैं ख़ुद कर लूँगा। झंझावात जी, कृपया अपना प्रोफ़ाइल थोड़ा बताने का कष्ट करें। आप राष्ट्रीय कवि हैं या अंतर्राष्ट्रीय। डाक्टर  वग़ैरह लिखते हैं क्या, शोध वाले न हों तो मानद उपाधि वाले ही हों। चिकित्सा वाले या फिर फीजियोथैरेपिस्ट ही हों। आप समझ सकते हैं कि नाम के साथ डाक्टर लगा हों तो अलग प्रभाव पड़ता है। या कोई और उपाधि आपको प्राप्त है? अब तक क्या-क्या सम्मान प्राप्त हुए हैं?'
' अग्नि जी, यह सब कुछ तो नहीं है मेरे पास पर मैं बुलंद आवाज़ में जब कविता पढ़ता हूँ तो बच्चे डरकर माँ की गोद में छिप जाते हैं। आस- पास के घरों की खिड़कियाँ हिलने लगती हैं। एक मील दूर तक के लोगों को कविता सुनाई देती है और युवकों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। प्रायः कवि-सम्मेलन में लोग अपनी आस्तीनें चढ़ा लेते हैं। बहुत ही प्रभावशाली कवि हूँ जनाब।'
' वो तो ठीक है झंझावात जी, पर हमारे अपने शहर में ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कवियों का पूरा जमघट मौजूद है। बहुत सारे डाक्टर नामधारी कवि भी हैं। चयन की बहुत ही मारामारी रहती है साहब। कोई मुक्तक का मसीहा है, कोई गीतों का बादशाह तो कोई ग़ज़लों का शहंशाह। अब तो गीतों के कई राजकुमार भी पैदा हो गए हैं। वीर रस के तो ऐसे-ऐसे धुरंधर हमारे पास हैं कि हमें बाहर झांकना ही नहीं पड़ता। उनकी कविता से युद्ध की रणभेरी बज उठती है। उनकी कविता से पाकिस्तान के हुक्मरान तक घबराते हैं साहब। कुछ कवि तो पंडाल में ही रण के दृश्य उपस्थित कर देने की गारंटी देते हैं। यह समझ लीजिए कि हर कवि-सम्मेलन में दस-पंद्रह कुर्सियाँ तो टूटती ही हैं। हम पर इतना दबाव होता है कि किसे बुलाएँ, किसे नहीं। आख़िर हमें इनके बीच ही रहना है। इनमें से कई तो हमारा आर्थिक सहयोग भी कर देते हैं। कईयों को तो हम खाली लिफ़ाफ़ा भी मानदेय के रूप में दे देते हैं।'
' अग्नि जी आप मुझे भी खाली लिफ़ाफ़ा दे दीजिएगा, बस मैं एक अवसर चाहता हूँ आपके शहर में।'
' देखिए मैं अकेला तो इसमें कुछ कर नहीं सकता। आप अपने क़ाव्य पाठ की एक वीडियो भेज दें। मैं आयोजन समिति से विचार करके ही बता सकूँगा, आप प्रतीक्षा कर लें।'
झंझावात जी बीस दिन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। वैसे कवि-सम्मेलन परसों है।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

मा्र्गदर्शक मंडल उर्फ मूर्तियां

संगीता गांधी 

अपने अलाने जी ने एलान किया - अब से अपने दल के सभी बड़े बुजुर्ग फलाने मार्गदर्शक मंडल में जाएंगे।
सारे फलाने यूँ तड़प उठे मानों पजामे में चींटी घुस गयी हो।
- ये तो गलत है। अलाने जी, हम सब तो अभी जिंदा हैं! हमें मूर्तियाँ काहे बना रहे हैं?
- मार्गदर्शक मंडल में भेज रहे हैं, मरने के बाद आप लोगों की मूर्तियाँ भी बनवा देंगें।
अलाने जी ने खीसें निपोरते हुए कहा।
- ये क्या बात हुई, हम क्या समझते नहीं! मार्गदर्शक मंडल का मतलब मूर्ति बनाकर एक साइड पर बिठा देना ही है।
एक सबसे बुजुर्ग फलाने जी फट पड़े।
- बुजुर्ग फलाने जी चुप रहिए, जो बनाया जा रहा है, बन जाइये! दूसरे दल में देखिए बुजुर्ग अध्यक्ष को दफ्तर से उठा कर बाहर पटक दिया गया था।
एक मैडम ने सारे दल को मूर्ति बनाकर रखा है! प्रधान सेवक तक मूर्ति को बना दिया!
आप लोगों को तो सम्मान से मार्गदर्शक मंडल दिया जा रहा है।
अब उसमें आप खुद को मूर्ति समझें या जिंदा इंसान ये आप लोगों की मर्जी!
अलाने जी ने दो टूक फैसला सुना दिया।
सारे फलाने चुप हो गए। एक बोला - हमें कहीं का राज्यपाल ही बना दें।
अलाने जी ठहाका मार कर हँसे - भाई फलाने, वो भी तो मूर्ति ही होता है। हाँ, चलिये जो ज्यादा तड़प रहे हैं,उन्हें पूर्ण राज्यों का राज्यपाल बना देते हैं। मूर्ति बनकर वहाँ बैठे रहें।
पर अपने सबसे तेज तर्रार फलाने को हम एक केंद्र शासित प्रदेश का राज्यपाल बनाएंगे। कारण उधर का मुख्यमंत्री बहुत धरना देता है। उसके धरने को जो धर दे वो बन्दा चाहिए।
- हम मार्गदर्शक मंडल की मूर्ति ही रहेंगे क्या? बुजुर्ग फलाने फिर तड़पे!
-  फलाने जी, जिस धरने वाले कि बात कर रहे हैं, उसने अपने दल के सारे पुराने माल को बाहर फेंक दिया है। हम आप लोगों को स्टोर रूम में सहेज रहें हैं! शुक्र मनाइये!
अलाने जी ने जबरदस्त जुमला उछाला।
 - चलिए अलाने जी, हम मार्गदर्शक मंडल की मूर्ति बनने को तैयार हैं। पर इस स्टोर रूम की मूर्ति को कभी - कभी बाहर निकाल कर कोई उदघाटन, फीता कटवाने का काम तो करवा लीजिएगा!
 - हाँ, ये बात मान लेते हैं, वैसे भी आप तो जिंदा मूर्ति हैं। इस देश में तो कई सदियों पुरानी मूर्तियों पर भी राजनीति हो जाती है।
सारी मूर्तियाँ जोर से हा हा हा करने लगीं।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

अगले जनम मोहे कुतिया कीजो

हे भगवान कौन से जन्मों के पापों की सजा दे रहा है मुझे ? यह गंदगी भी मेरी छाती पर ही छोड़नी थी। पूरा घर गंदगी से भर दिया इस बुढ़िया ने।
बीमार सास को गालियां देते हुए नाक बंद कर घर में घुसती मिसेज शर्मा नौकरानी पर चिल्लाई - कांताबाई! अरी कहां मर गई तू भी।
तभी बगल वाले कमरे से आई सास ने पीछे से कुर्ता खींचते हुए  पुकारा -बहू!
- हट बुढ़िया दूर रह, अभी फिर से नहाना पड़ेगा मुझे।
सास को धक्का देते हुए मिसेज शर्मा बोली, तभी नौकरानी पर नजर पड़ी। कांताबाई! यह तो दिन भर गंदगी करेगी,तू तो साफ  कर दिया कर।
अभी और कुछ कहती, उससे पहले ही कांताबाई बोली - लेकिन मालकिन आज तो मांजी ने कुछ भी गंदगी नहीं की। एक दो बार हाजत हुई भी थी तो मुझे बुला लिया था तो मैं टॉयलेट में करा लाई थी।
- तो फिर यह गंदगी ?
- अपने डॉगी को दस्त लग गए हैं।
- अरे बाप रे मेरा बेटू। क्या हो गया उसे।
मिसेज शर्मा चीखती सी बोली। तभी चूं चूं करता डॉगी उनके पास आ गया। मिसेज शर्मा उसे पुचकारते हुए उसके पास बैठने लगी तो कांताबाई बोली - मालकिन कपड़े गंदे हो जाएंगे।
- अरे हो जाने दे, कपड़े कोई डॉगी से बढ़कर है क्या? कहते हुए मिसेज शर्मा वहीं बैठ गई और डॉगी पर हाथ फेरने लगी। अब कमरे से गंदगी और बदबू गायब हो चुकी थी। दूर से यह सब देख रही साथ डॉगी की किस्मत से रश्क कर रही थी। शायद भगवान से दुआ मांग रही थी -अगले जनम मोहे कुतिया ही कीजो।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

अगले जनम मोहे कुतिया कीजो

- शिवराज गूजर

हे भगवान कौन से जन्मों के पापों की सजा दे रहा है मुझे ? यह गंदगी भी मेरी छाती पर ही छोड़नी थी। पूरा घर गंदगी से भर दिया इस बुढ़िया ने।
बीमार सास को गालियां देते हुए नाक बंद कर घर में घुसती मिसेज शर्मा नौकरानी पर चिल्लाई - कांताबाई! अरी कहां मर गई तू भी।
तभी बगल वाले कमरे से आई सास ने पीछे से कुर्ता खींचते हुए  पुकारा -बहू!
- हट बुढ़िया दूर रह, अभी फिर से नहाना पड़ेगा मुझे।
सास को धक्का देते हुए मिसेज शर्मा बोली, तभी नौकरानी पर नजर पड़ी। कांताबाई! यह तो दिन भर गंदगी करेगी,तू तो साफ  कर दिया कर।
अभी और कुछ कहती, उससे पहले ही कांताबाई बोली - लेकिन मालकिन आज तो मांजी ने कुछ भी गंदगी नहीं की। एक दो बार हाजत हुई भी थी तो मुझे बुला लिया था तो मैं टॉयलेट में करा लाई थी।
- तो फिर यह गंदगी ?
- अपने डॉगी को दस्त लग गए हैं।
- अरे बाप रे मेरा बेटू। क्या हो गया उसे।
मिसेज शर्मा चीखती सी बोली। तभी चूं चूं करता डॉगी उनके पास आ गया। मिसेज शर्मा उसे पुचकारते हुए उसके पास बैठने लगी तो कांताबाई बोली - मालकिन कपड़े गंदे हो जाएंगे।
- अरे हो जाने दे, कपड़े कोई डॉगी से बढ़कर है क्या? कहते हुए मिसेज शर्मा वहीं बैठ गई और डॉगी पर हाथ फेरने लगी। अब कमरे से गंदगी और बदबू गायब हो चुकी थी। दूर से यह सब देख रही साथ डॉगी की किस्मत से रश्क कर रही थी। शायद भगवान से दुआ मांग रही थी -अगले जनम मोहे कुतिया ही कीजो।

गुरुवार, 22 मई 2014

कुबेर की लघु व्‍यंग्‍य कथाएं

परंपरा
रात मरहाराम ने एक सपना देखा। एक व्यक्ति काफी दिनों से बीमार था। बचने की उम्मीद नहीं थी। संयोग से उसके घर एक सिद्ध पुरूष का आगमन हुआ। उन्होंने उसे एक औषधि दिया। उस औषधि के सेवन से वह स्वस्थ हो गया। औषधि की कृपा से उस समय उसने मौत को जीत लिया था। औषधि पर श्रद्धा हो जाना स्वाभाविक था। वह उसकी पूजा करने लगा।
मरते वक्त उसने अपने पुत्र से कहा कि इस औषधि को वह संभाल कर रखे, पता नहीं कब आवश्यकता पड़ जाय। पुत्र ने पिता की परंपरा का निर्वाह किया। वह जीवन भर उसकी श्रद्धा पूर्वक पूजा करता रहा। बीमार पडऩे पर भी उसने उस औषधि का सेवन नहीं किया। उनके बच्चों ने भी उसकी परंपरा का निर्वाह किया। अगली पीढ़ी को बस इतना ही पता था कि यह एक दिव्य वस्तु है। पूर्वज इसकी पूजा करते आये हैं इसलिये इसकी पूजा करन उनका भी धर्म बनता है। इससे पुण्य लाभ होता है।
एक बार उस परिवार का मुखिया उसी रोग से पीडि़त हो गया जिससे कभी उसका पूर्वज ग्रसित हुआ था। जिस दिव्य वस्तु की वह रोज पूजा करता था, उसके सेवन से वह रोग मुक्त हो सकता था, परंतु उसने ऐसा नहीं किया। दिव्य वस्तुएँ पूजा के लिए होती हैं, सेवन करने के लिए नहीं। वह कालकवलित हो गया।
उस औषधि का नाम था, ईश्वर।
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छठवाँ तत्व
उस दिन सतसंग में पंडित जी कह रहे थे - '' क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा ..  मनुष्य का शरीर पाँच तत्वों से बना होता है। यह शरीर नाशवान है। मृत्यु होने पर ये पाँचों तत्व अपने-अपने मूल में वापस समा जाते हैं।'' 
मरहा राम भी सतसंग लाभ ले रहा था। उसकी अड़हा बुद्धि के अनुसार पंडित जी के इस कथन में उसे कुछ घांच-पाँच लगा। उसने कहा- '' पंडित जी! हजारों साल पहले लिखी यह बात उस समय जरूर सत्य रही होगी। अब इसकी सत्यता पर मुझे संदेह होता है।''
पंडित जी ने कहा - '' हरे! हरे! घोर पाप! कैसा जमाना आ गया है। धर्मग्रंथों में लिखी बातों के ऊपर संदेह? ऐसी बातें कभी असत्य हो सकती हैं?''
'' मैं भी तो यही कह रहा हूँ पंडित जी'',
 मरहा राम ने कहा - '' अब तत्वों की संख्या बढ़ गई होगी, वरना पाप कहाँ से पैदा होता?''
'' अरे मूरख! पाप-पुण्य कब नहीं थे। उस समय भी थे अब भी हंै।''
'' लेकिन भ्रष्टाचार और अनाचार तो नहीं रहे होंगे न? ''
'' मरहा राम! ये सब भी पहले थे, फरक केवल मात्रा का है। अब कम का जादा और जादा का कम हो गया है।''
'' लेकिन पडित जी '' मरहा राम ने कहा - '' लोग कहते हैं, आज का आदमी जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। और जैसा होता है, वैसा दिखता नहीं। मुझे लगता है, नहीं दिखने वाला यही तत्व पहले नहीं रहा होगा। नहीं दिखने वाला तत्व मतलब अदृश्य तत्व, डार्क मैटर। कहीं यही तो छठवाँ तत्व नहीं है।''
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संत
मरहा राम आजकल धार्मिक व्यक्ति हो गया है। गाँव में उत्तर वाले किसी पहुँचे हुए संत का प्रवचन चल रहा था। नियम-व्रत का पालन करते हुए पिछले पाँच दिनों से वह सत्संग-लाभ ले रहा है। वह संत जी के वचनों को हृदय में बसाता भी है और बुद्धि से तौलता भी है। खाली समय में वह संत जी के पास जाकर बैठ जाता है, अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करने के लिए।
संतों का लक्षण बताते हुए प्रवचनकार संत जी आज ही  अपने प्रवचन में कह रहे थे -  '' संत वह है जो मीठा खाता है और मीठा बोलता है। मीठा खाने का मतलब मीठा सुनना। ''
संत जी की बातों ने मरहा राम के हृदय को छू लिया। उसने कहा -  '' भगवन! संतों के बारे में आप ठीक ही कहते हैं। नेता जी जब भी आते हैं, मीठा-मीठा ही बोलते हैं। ''
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माता पार्वती का देवभूमि की सैर
सब्र की एक सीमा होती है। आखिर कोई कब तक धीरज रखे? या फिर इस तरह की इच्छा जाहिर करने वाली दुनिया की वह पहली पत्नी है? देवी पार्वती ने मन ही मन सोचा; और किसी अज्ञात संकल्प के साथ उसके दोनों गाल कुप्पे की तरह फूल गये।
पत्नी हठ के सामने भोलेनाथ को आत्म समर्पण करना ही पड़ा। उसने अपने स्वचलित नंदी विमान को पृथ्वी भ्रमण पर जाने के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। नंदी, देवी पार्वती का चहेता, पहले ही तैयार बैठा था। उसने देवी माता पार्वती को फौरन यह शुभ समाचार सुनाया। देवी पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा। वह तैयारी में जुट गई।
यह सुबह-सुबह की बात थी।
सूरज ढलने वाला था, जब भोले बाबा और देवी पार्वती का नंदी विमान कैलाश से उड़ान भरा।
विमान की दिशा देखकर देवी को आश्चर्य हुआ। उसने भोलेनाथ से पूछा - '' भगवन! हम किस द्वीप की ओर जा रहे हैं? ''
भोलेनाथ ने उत्तर दिया -'' देवी! आज हम आपको पाश्चात्य देशों की यात्रा पर लेकर जा रहे हैं। आपको प्रसन्नता नहीं हुई? ''
देवी पार्वती ने रूठने का अभिनय करते हुए कहा -  '' भगवन! आप कब से भोगवादी बन गए? मैंने तो तपस्वियों, योगियों और त्यगियों की भूमि आर्यावर्त की सैर पर जाने के लिये कहा था, भोगियों के देश की नहीं। ''
भोलेनाथ -'' देवी! आप उसी आर्यावर्त की बात कर रहीं है न जिसे आजकल कुछ लोग हिन्दुस्तान, पुरातनपंथी लोग भारत और पढ़े-लिखे लोग इंडिया कहते हैं?''
देवी पार्वती - '' हाँ देव! वही देवभूमि, जिसे लोग भारत वर्ष भी कहते हैं।''
भोलेनाथ - '' ठीक कहती हो देवी! पर वहाँ जाने का हठ न करो। ''
देवी पार्वती - '' क्यो देव ?''
भोलेनाथ - '' इसी में हमारी भलाई है। ''
देवी पार्वती - '' आखिर कैसे, देव ? ''
भोलेनाथ - '' देवी! अब आप मुझे इतना भी भोलाभाला न समझो। आप जैसी रूपवान और सोलहों श्रृँगार युक्त पत्नी साथ में हो तो ऐसी मूर्खता कोई कर सकता है? इस स्थिति में मूर्ख से मूर्ख आदमी भी वहाँ जाने का खतरा मोल नहीं लेगा जिसे आप देवभूमि कह रही हैं, समझीं देवी। ''
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विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव
उस दिन यमराज के पास और एक विचित्र केस आया। केस स्टडी करने के बाद यमराज को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि इस केस को ईश्वर की जानकारी में लाना जरूरी है। केस को लेकर वह दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के पास गया। कहा - प्रभु! आज बेहद शुभ समाचार लेकर आया हूँ; सुनकर आपको भी सुखद आश्चर्य होगा।''
ईश्वर ने मुस्कुराकर कहा - तब तो बिलकुल भी विलंब न करो यमराज जी, सुना ही डालो।''
यमराज ने कहा - प्रभु! जिस भारतीय प्रजाति के मनुष्य को हम विलुप्त समझ लिये थे, वह अभी विलुप्त नहीं हुआ है। देखिये, सामने खड़े इस मनुष्य को। साथ ही साथ इसके बहीखाते को भी देखते चलिये।''
पहले तो ईश्वर ने उस अजूबे मनुष्य को निगाह भर कर देखा, फिर जल्दी-जल्दी उसके खाते के पन्नों को पलटने लगा। खाते में उस मनुष्य के सम्बंध में निम्न विवरण दर्ज थे -
नाम - दीनानाथ
पिता का नाम - गरीबदास
माता का नाम - मुरहिन बाई
(ईश्वर के बहीखाता में मनुष्य की जाति, वर्ग, वर्ण, देश आदि का उल्लेख नहीं होता।)
पता ठिकाना - जम्बूखण्ड उर्फ आर्यावर्त उर्फ भारतवर्ष उर्फ भारत उर्फ हिन्दुस्तान उर्फ इंडिया।
(एक ही स्थान के इतने सारे नामों को पढ़कर ईश्वर की बुद्धि चकराने लगी।) हिम्मत करके उसने आगे की प्रविष्टियाँ पढ़ी। बहीखाते के बाईं ओर के (आवक अर्थात पुण्य वाले) सारे पन्ने भरे पड़े थे परन्तु दाईं ओर के (जावक अर्थात पाप वाले) सारे पन्ने बिलकुल कोरे थे। ईश्वर को बड़ी हैरत हुई। अंत में बने गोशवारे को उन्होंने देखा जिसमें संक्षेप में निम्नलिखित बातें लिखी हुई थी -
झूठ बोलने की संख्या - शून्य
चोरी, धोखेबाजी अथवा ठगी करने की संख्या - शून्य
आजीविका के लिये भीख मांगने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए दूसरे प्राणियों को दुख देने, पीडि़त करने अथवा हत्या करने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए, धर्म के नाम पर शब्दों का प्रपंच रचकर, लोगों को ठगने, लूटने, दिग्भ्रमित करके उन्हें आपस में लड़वाने की संख्या - शून्य
ईश्वर और धर्म के नाम पर लोगों को देश, जाति अथवा संप्रदाय में बाँटने का काम करने की संख्या - शून्य
बहीखाता पढ़कर ईश्वर के मन की शंका और गहरी हो गई। उन्होंने यमराज से पुन: पूछा -  क्या यह मानव वाकई भारतीय है? ''
यमराज ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - मैंने इसके बारे में बहुत बारीकी से जांच किया है, प्रभु! यह भारतीय ही है। संभालिये इसे और मुझे आज्ञा दीजिये।''
- '' ठहरिये यमराज जी!'' ईश्वर ने कहा - इसके सम्बन्ध में हमारी योजना अलग है। इस विचित्र मानव को वापस पवित्र देवभूमि भारत भेज दीजिये। वहाँ किसी अजायब घर में इसे सुरक्षित रखवा दीजिये। इसके पिंजरे के बाहर सूचना-पट टंगवा दीजिये जिसमें लिखा हो - ' विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव '।

पता -
व्याख्याता ,शास. उच्च. माध्य. शाला कन्हारपुरी, 
वार्ड नं. - 28, राजनांदगांव छ.ग.
E mail: kubersinghsahu@gmail.com, blog: storybykuber.blogspot.com

भाषणबाज

नूतन प्रसाद 

नेताजी आजकल स्वर्ग में ही निवासकर रहे थे.यद्यपि उन्हें सब प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं तो भी अनशन पर बैठ गये.इसकी खबर अधिकारियों को लगी तो वे दौड़े आये.उनने अनशन पर बैठने का कारण पूछा तो नेता जी बोले -हम यहां की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं इसलिए व्यवस्था बदली जाय.''
अधिकारियों ने साश्चर्य कहा -आप भी बड़े विचित्र जीव हैं. आपको दूसरों के समान भोजन कपड़े अर्थात आवश्यकता की सारी वस्तुएं मिल रही है.आपसे भेदभाव भी नहीं किया जाता फिर आपकी असंतुष्टि का कारण समझ नहीं आता.''
- यही तो दुख है कि हमारे बराबर दूसरों को भी अधिकार दे दिया गया है जबकि हम विशिष्ट हैं. गरीबा को देखो - वह हमारा नौकर था. जूते साफ करता था.हम मलाई खाते थे तो वह दुत्‍कार  खाता था.लेकिन वही अब हमारे साथ बैठकर भोजन करता है.यही नहीं हमसे टक्कर भी लेता है जबकि ये बातें हमारी शान के खिलाफ है.''
- आपकी शान मिट्टी में मिल जाये पर हम व्यवस्था नहीं बदलेंगें.''
- तो हमें नर्क  भेजने का प्रबंध किया जाये.वहां के जीव जो बहुत दुखी हैं.उनकी सेवा करेंगे.
- झूठ क्यों बोलते हैं.आपने कब किसकी सेवा की.यदि सत्य बतायेंगे तो नर्क  भेजने के लिए विचार भी करेंगे.
नेताजी बहुत देर तक सोचते रहे फिर बोले-हकीकत यह है कि जब मैं यहां की व्यवस्था की आलोचना करता हूं तो दूसरे जीव मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते.यदि वहां नर्क चला जाऊंगा तो वहां की व्यवस्था के बारे में उल्टा सीधा आक्षेप करने का अवसर मिलेगा.
अधिकारियों ने पूछा - भाषण देना जरूरी है क्या ? मुंह पर ताला लगाकर रखेंगें तो काम नहीं बनेगा ?
नेता जी तुनके - मैं नेता हूं.भाषण दिये बगैर कैसे रह सकता हूं.
- आप कैसे भी रहें पर न तो व्यवस्था बदली जायेगी न तो आपको नर्क  में भेजा जायेगा.यहीं पर दूसरों के समान रहना पड़ेगा.
इतना कह अधिकारियों ने उनकी बोलती बन्द कर दी और  उन्हें काम पर ले गये.  
भंडारपुर ( करेला ) 
पो. - ढारा, व्‍हाया - डोंगरगढ़ 
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)