इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

अब क्षमा याचना नहीं

 प्रताप दीक्षित

 
उस शाम पेड़ों की परछाइयाँ फिर लंबी होते-होते अंततः धुंधलके में अपना अस्तित्व खो चुकी थीं. एक विराम के बाद अगली सुबह की शुरुआत के लिए. अँधेरे में भी झुकी नज़रों से उसने गली में फैले सन्नाटे को छिप कर अपनी ओर ताकते पाया. मालूम नहीं कि सन्नाटा से ही था कि खुसफुसाहट के बाद उगा – कहीं अधिक मुखर. पड़ोस के बंद खिडकी-दरवाजों में अनेक नेत्र उग आए थे. इन अदृश्य आँखों में घृणा और लिजलिजाहट भरी उत्सुकता उसने महसूस कर लिया था.
मिसेज मित्तल तो नि:संकोच, महिला पुलिस-कर्मियों के बीच उसे आता हुआ देख, शायद सब कुछ जानते हुए भी, अनजान बन उसके पास सबकुछ दरयाफ्त करने चली आतीं लेकिन मौके की नजाकत और पुलिस-कर्मियों के चेहरे देख अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया. स्थानीय समाचार पत्रों में यह घटना या दुर्घटना छप ही चुकी थी. जैसा कि होता है, उसने सोचा, लोग इसका विवरण चटखारे लेकर पढ़ रहे होंगे. ‘च’ – ‘च’ करते हुए, मुस्कराहट दबाने की असफल कोशिश के साथ, सहकर्मियों-मित्रों की ओर इंगित करते हुए. अखबारों में नाम न होने पर भी पक्का अनुमान लगाने के दावे के साथ.
यात्रा घर के सामने खत्म हुई थी. साथ की पुलिस-कर्मियों ने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देख दरवाजे की घंटी बजाई थी. दरवाजा धीरे-धीरे किसी तिलिस्म की भांति खुला था. थोड़े से खुले किवाड़ के पीछे उसकी सास ने चौकन्ना होकर झाँका. उन्हें देख कर कुछ क्षण ठिठकने के बाद अनिच्छा से एक ओर हट गईं. उसे नियत का जाना-पहचाना नहीं बल्कि एक अनंत अँधेरी सुरंग का द्वार लगा. ड्राइंगरूम में अंदर से पति और ससुर भी आ गए थे. उसने साड़ी का पल्ला सिर पर कुछ आगे खींचने का उपक्रम किया. महिला सिपाहियों ने उसके पति-ससुर से उसकी बरामदगी और यथास्थान सुपुर्दगी के लिए कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाए. कुछ पल ठिठकी रहीं. उनकी आँखों में कुछ प्रत्याशा फिर असमंजस उभरा, फिर बिना कुछ कहे अप्रत्याशित ढंग चली गईं.
माहौल में एक चुप्पी घुली थी. ठीक श्मशान से लौटने के बाद जैसी. उसका मन व शरीर बुरी तरह थके हुए थे. ध्वस्त कवच कुण्डलों के बाद पराजित योद्धा की भांति. उसकी तात्कालिक आवश्यकता इस समय एक कप गर्म चाय के साथ कुछ खाने की थी. पिछले चौबीस घंटों में, सुबह थाने में, एक कप चाय और दो बिस्किट मात्र लिए थे. उसने कमरे में स्वयं को अकेला पाया. भीड़ में छूट गई एक अकेली असहाय बच्ची की भांति उसने निरीह भाव से चारों ओर देखा. वह जमीन पर भहरा पड़ी. मिनी, उसकी पंद्रह-सोलह वर्षीय ननद उसके लिए चाय और कुछ खाने ले आई थी. उसने कातर दृष्टि से उसकी ओर देखा और रो पड़ी. तभी अंदर से मिनी को बुलाने की आवाज, दबी परंतु तीखे स्वर में आई. मिनी के मन में भाभी के प्रति करुणा उपजी लेकिन फिर कुछ कहे बिना चली गई. थकान के कारण उसकी आँखें बोझिल हो रही थीं. वह देर तक यूं ही पड़ी रही. रात काफी बीत गई थी. उसको आश्रय की तलाश थी. पति के कंधे से लग कर रो लेना चाहती थी. पति का सांत्वना भरा स्पर्श उसका संबल बन सकता था. लेकिन वह जानती थी कि यह उसकी मृगतृष्णा मात्र है. मालूम तो उसे शादी के बाद ही हो गया था.
एक साधारण सी लड़की का जो अभीष्ट होता है उससे अधिक उसकी कामना भी कब थी. निम्न-मध्य वर्गीय परिवारों में लड़कियों को अभावों के साथ तारतम्य स्थापित कर लेनी में किसी अतिरिक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती. विज्ञान की छात्रा होने पर भी साहित्य और कला के प्रति उसकी रूचि ने उसमें गहरी संवेदनशीलता के साथ ही भावनाओं को नियंत्रित कर परिवेश के साथ सामंजस्य करने की क्षमता उसमें विकसित कर दी थी. वह पिता को उसके विवाह के लिए प्रयासरत-दौड़ते और निराश होते देखती. प्रायः उसकी नुमाइश का आयोजन जोता. वह आकर्षक थी परंतु सांवले रंग और दहेज की मांग के कारण बात निष्कर्ष तक पहुँचने के पहले ही समाप्त हो जाती. विवाह के इंटरव्यू अक्सर पूछे जाने वाले सवाल होते – ‘तुम्हें नृत्य और गाना तो आता ही होगा? कॉलेज के विषय, उनके प्रतिशत, खाना बनाए और सिलाई-बुनाई में तो लड़कियों को पारंगत होना ही चाहिए. आदि, आदि.’ इन विरोधी ‘गुणों’ की संगति ना बैठाना उसके लिए मुश्किल होता. वह अंदर से आहत परंतु ऊपर से सहज बनी रहती. उसमें एक खिलान्दरापन दिखाई देता. उन लोगों के जाने के बाद, शरारतन लड़के वालों की नक़ल उतारती, खिलखिलाती.
नौकरी की उम्र की अंतिम सीमा पर उसका चयन बैंक में पी.ओ. के हो गया था. पिता और परिवार को आश्वस्ति हुई थी. लेकिन उनकी आशा का आहार निर्मूल ही साबित हुआ. विवाह के अर्थशास्त्र में दहेज कि अपेक्षित मांग, उसकी बढ़ती उम्र के अनुपात में, बढ़ गई थी. उसके पिता-परिवार से ज्यादा उसके रिश्तेदारों को उसके विवाह की चिंता थी. उनके सद्प्रयासों से अंततः उसका विवाह, उससे केवल दस वर्ष बड़े चि० कालिका प्रसाद के साथ, तमाम विघ्न-बाधाओं के उपरांत भी, संपन्न हो गया. दहेज की मांग पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया. एक तो वर की अधिक उम्र, दूसरे भावी वधू की बैंक की नौकरी. यों तो जीवन का एक आख्यान यहाँ समाप्त हो सकता था. परंतु कहानी में तो ऐसा नहीं होता. जीवन में भी ऊपरी तौर पर तो सब सामान्य प्रतीत होता है परंतु उसमें भी यथार्थः विराम कहाँ आता है.
विवाह पूर्व ससुराल पक्ष द्वारा तमाम आधुनिक और पारंपरिक वस्तुओं की नित्य परिवर्धित लिस्ट तथा रिश्ता कहीं और देख लेनी की बार-बार धमकी नुमा सलाह अनपेक्षित तो नहीं थे. वर के पिता शुक्ल जी जिला न्यायालय के पेशकार के सहायक पद से अवकाश ग्रहण किया था. उन्हें आसामियों से मोल-भाव करने का अनुभव था. साम, दाम, दंड, भेद आदि. वह कटे, ‘भइये, यह लोग तारीख पर जेबें भर कर आते हैं. लेकिन निकालते हैं मुश्किल से बीस रूपए. गिड़गिड़ाएंगे, कसमें खाएंगे. इन्हें जरा सी ढील दी कि गया हाथ से.’
वे हँसते हुए अपने अनुभव सुनाते, ‘अरे चौधरी जरा दूसरी तरफ की जेब देखो. इतने बड़े आदमी की जेब खाली हो ही नहीं सकती.’ वह कहते तो कड़ाई कर सकते थे. लेकिन उनका विश्वास था कि जब आदमी गुड देने से मर सकता है, तो जहर क्यों दिया जाए. कभी-कभी कोई कंगला भिखारी टकरा जाता. उस दिन घर लौटने तक उनका मूड ऑफ रहता.
यदि इन बातों को ऐसे अवसरों की सामान्य प्रक्रिया मान भी लिया जाए तो भी बाद में ‘सब कुछ ठीक हो जाने जैसा’ भी तो कुछ नहीं हुआ था. ससुर-गृह में स्त्रियों के प्रति किसी औपचारिक या अनौपचारिक सहृदयता की परम्परा तो थी नहीं. शुक्ल जी को पछतावा ऊपर से था – भट्ठे वाले अवस्थी जी मुंहमांगी रकम दे रहे थे. इंजीनियर बेटे और पी.डब्ल्यू.डी. की कमाई नौकरी- कोई रिश्तों की कमी थी. किस्मत फूटी थी कि जो कंगलों के यहाँ फंस गए. ऊपर से बहू का रोज मुंह उघाड़े निर्लज्जों की तरह नौकरी पर जाना? उसकी नौकरी ने उन्हें धर्म-संकट में डाल दिया था. उनकी मान्यताओं के अनुसार ‘खाना, पाखाना और जनाना’ घर के एकांत में होने चाहिए. परंतु उसका वेतन! वे उसांस भर कर रह जाते. शास्त्रों में इसका समाधान खोजने का प्रयास करते और अंत में ‘आपत्ति काले मर्यादा नास्ति’ सोच अपने को तसल्ली दे लेते.
सुधा को परिवार से इस सबकी अपेक्षा भी नहीं थी. उनकी उदारता इतनी क्या कम थी कि उसकी नौकरी नहीं छुड़वा दी गई. परंतु पति से उसे जिस सहज अंतरंगता, सुरक्षा और विश्वास की उम्मीद थी उससे जल्दी ही मोहभंग हो गया था. पति के मन में कॉम्प्लेक्स था. ऊपरी आमदनी ज्यादा होने पर भी वेतन पत्नी से कम था. शिक्षा हाई स्कूल के बाद पोलिटेक्निक का डिप्लोमा मात्र. जब कि सुधा प्रथम श्रेणी में एम.एससी. थी. परंतु सुधीर के लिए पुरुष होना मात्र ही महत्वूर्ण था. वह अक्सर मुंह में पान या गुटखा चुभलाते हुए कहता – औरत आखिर औरत होती है. रहना तो उसे मर्द की टांगों तले ही है. वह ठहाका लगता.
शुरुआत पहली रात ही हो गई थी. सुधा को पढ़ी-सुनि कल्पनाएँ और इस रात के लिए संजोए गए सपने झूठे लगे थे. पति ड्रिंक करके आया था. अब होली-दिवाली या शादी-ब्याह जैसे मौकों पर पीना क्या पीना कहा जाएगा. न मात्र वस्त्र बल्कि लाज, श्रम, संकोच के आवरण भी तार-तार हुए थे. उसकी निरावृत्त देह को झिंझोड़ते हुए उसने प्रश्न किया था – यह कैसे मान लूं कि इतनी उम्र तक यह अनछुआ रहा होता, तुम कुँवारी हो!’
वह अक्सर इस तरह की बातें करता. उत्तर की उसे जरूरत भी नहीं थी. गोपनीय क्षणों में अंतरंगता के वक़्त या बाते उसके मित्रों से संस्कारों में मिली थीं. परिवार के सुशील, आज्ञाकारी, दूसरों के लिए आदर्श पुत्र था. ऊपरी आमदनी, ठेकेदारों की संगति के बाद भी नियमित रूप से पूजा-पाठ करता. ऐसे माता-पिता के भक्त मिलते कहाँ हैं! उसकी दृष्टि में पुरुष और स्त्री के क्षेत्र अलग-अलग थे. उसको समय से भोजन और रात में पत्नी की जरूरत होती.
लेकिन ऐसा भी नहीं कि इसके लिए वह पालतू बन जाएगा. वह अक्सर देर से घर आता. सुधा के कुछ कहने पर उसका जवाब रहता – मर्द का शाम से ही घर में घुस जाने का मतलब क्या है? सुधा की किसी जरूरत या समस्या पर वह माँ से कहने को कहता. उनके विरुद्ध तो कुछ सुनना भी उसे अपराध लगता. यह सिलसिला चलता रहा. सुधीर न उसका मनन देखता न भावनाएं. वह अपने को न्यायोचित सिद्ध करता – औरत अनपढ़, गंवार हो या पढ़ी-लिखी अफसर चाहती यही सब है. फूहड़ कहावतों-चुटकलों का उसके पास खजाना था – ‘औरत को चाहिए न ताजो-तख़्त . . .’ उसे समर्पण का श्रेय भी न मिल पाता. सुधीर अपना प्राप्य वसूल कर खर्राटे लेने लगता. दैहिक आवेग में उसकी शिराएं तन जातीं, उसका तन, मन और आत्मा अतृप्ति के रेगिस्तानों में भटकने को विवश हो जाते. ऑफिस जाने के पहले और बाद घर के कामों का दायित्व तो उस पर था ही. कभी उठने में देर होने पर सास, ‘घोर कलयुग आ गया है. ऐसी भी क्या जवानी . . .’ वे उसकी जवानी को अलापतीं. प्रतिमाह उसका वेतन सहेज, गिनकर शुक्ला जी को दे देतीं. वे सदा की भांति इस अवसर पर दोहराना न भूलते, ‘इससे कहो घर-परिवार में रमें. हमारे खानदान में औरतें घर से पैर नहीं निकालती. लेकिन अब जमाना ही बदल गया है. इतने मर्दों के होते हुए एक औरत देश की गद्दी पर बैठी है.’ शुक्ल जी इन्दिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से और कुंठित हो गए थे.
वे रूपए एक बार फिर गिनते. जनेऊ में बंधी चाभी से अलमारी खोल रूपए रख देते. अक्सर उसकी साड़ी, लिपस्टिक और फैशन पर टिप्पणी करते, ‘हरि ओम्, हरि ओम्! एक दिन जरूर नाक कटेगी. बहु स्वतंत्र होइ बिगरहि नारी.’
एक बार वेतन मिलने पर उसने छोटे भाई को उसके जन्मदिन पर घड़ी खरीद कर दे दी. वेतन के रूपए कम देख कर घर में कहर आ गया था. सास अशिक्षित होने पर भी रूपए गिनना, हिसाब-किताब तो जानती ही थीं. उन्होंने एक बार फिर से गिना. ससुर जी अलमारी खोल चुके थे. वे अवाक रह गए. इस अवसर पर दोहराया जाने वाला संवाद दोहराना भी भूल गए.
‘इस बार तनख्वाह कम? अच्छा, डी०ए० कम हो गया होगा! मंहगाई जो कम हो गई है!’ उन्होंने कटाक्ष किया.
‘जी नहीं.’
‘फिर?’
‘डब्बू का जन्मदिन था न!’
‘डब्बू ? तो?’ स्वर में स्वर में तेजी के साथ अनभिज्ञता का भाव था. जानते हुए भी अनजान बने. वे प्रतिपक्षी को हतप्रभ करने की कला में पारंगत थे.
‘जी छोटा भाई. उसके जन्मदिन पर घड़ी खरीदी थी.’ उसने साहस जुटा कर स्पष्टीकरण दिया.
फिर तो कंगालों का वरद्गान. निठल्ले भाई और माँ-बाप का बेटी की कमाई खाकर नर्क में भी ठौर न मिलने की निश्चितता का वर्णन कई दिनों तक होता रहा.
शुक्ला जी कई माध्यमों से उसे मिलने वाले वेतन, डी०ए० के स्लैब्स एवं अन्य लाभों के संबंध में पूरी जानकारी रखते. लगभग सभी प्रकार के ऋण उससे लिवाए जा चुके थे. उसे निजी आवश्यकताओं के लिए उन पर निर्भर रहना पड़ता. बाकायदा सवाल जवाब होते.
‘अभी पिछले सप्ताह ही तो पूरे सौ रूपए लिए थे?’
‘जी आने-जाने में रिक्शे और ऑफिस में एक स्टाफ की फेयरवेल पार्टी थी.’
‘और बाकी? फिर फेयर-वेयरवेल में तुम्हारी क्या जरूरत? कहा नहीं – हम तो लेडिस हैं.’
वह टूटती गई. घर, नौकरी, पति, परिवार! वह चुक गई थी. ससुर की टिप्पणियों पर व्यथित हो उसने नौकरी छोड़ देने का निश्चय कर लिया था. पूरे सप्ताह बैंक नहीं गई. सभी हतप्रभ रह गए थे. शुक्ला जी बड़ाबड़ाए – मुझे मत दोष देना. मैं तो झेल रहा हूँ. कंगले बाप ने तो धोती खोल दी थी. इंजिनियर बेटे, ऊपर से कमाऊ नौकरी. लाखों मिल रहे थे.
सास ने उसे टस से मस न होते देखा तो आशंकित हो सिर पीटने लगी, ‘यह तिरिया चरित दिखाया जा रहा है!’ सुधीर पहली बार कुछ सहज हुआ था, ‘यह क्या? बड़ों की बात पर इस तरह जिद करते हैं? तुम्हारे पिता के सामान हैं. कुछ कह दिया तो क्या हुआ.’ साथ ही धमकी भी, ‘नौकरी छोड़नी है तो ठीक है अपने पिता के घर जाकर जो मन में आए करो.’ वह समझ गई करना इन सबके मन की होगी. वह जाने कब चली गई होगी लेकिन परम्पराओं को मानने वाले पिता इसे कैसे सहन कर पाएंगे.
विवाह के सात वर्षों बाद तक माँ न बन सकने के कारण सास ताने देती. झाड़-फूंक कराती. चिकित्सकीय जांच में वह सामान्य थी. सुधीर को जांच की आवश्यकता ही क्या थी. वह तो अपनी मर्दानगी का सुबूत देने के लिए तत्काल तत्पर रहता. जीवन के प्रति उसकी ललक खत्म हो चुकी थी. बैंक जाने का एक कारण रह गया था कि वह काम के उन घंटों मे सब कुछ भूल जाती. कर्तव्य-निष्ठा उसमें सदा से थी. जहां अन्य सहकर्मी देर से आते, जल्दी चले जाते. वह दोपहर तक ग्राहकों के कार्य निपटाती. कार्य उसकी सीट का होता या किसी अनुपस्थित सहकर्मी का, उसे अंतर न पड़ता. बैंक आने वाले ग्राहक उससे प्रसन्न रहते. लंच के बाद बैंक के आतंरिक कार्य, खातों का संतुलन, कैशबुक, पत्राचार आदि. पिछले दिनों एक छोटे से प्रमोशन के बाद उसका स्थानान्तरण शहर की इस आखिरी कोने वाली शाखा में हो गया था. स्त्री होने के नाते अन्यथा बाहर जाना निश्चित था. कभी सुधीर छोड़ देता. अधिकांशतः वह बस, रिक्शे या टेम्पो से आती-जाती. उन दिनों इंस्पेक्शन – ऑडिट टीम चल रहा था. बहुधा बैंक से चलते देर हो जाती. उस दिन ऑडिट हेतु जरूरी रिटर्न्स, प्रपत्र तैयार किए थे. बाहर निकालते समय वर्मा था. स्कूटर निकालते हुए उसने संकोच के साथ उससे साथ चलने के लिए पूछा था. उसने विनम्रता से माना कर दिया था. किसी पर-पुरुष के साथ उसके स्कूटर में? वह तो सोच भी नहीं सकती थी. पति पहले से ही संदेश करता था. उसकी दृष्टि में नौकरी पेशा स्त्रियों का चरित्र विश्वसनीय नहीं होता. उन दिनों नौकरी करती ही कितनी औरतें थीं? कुछ ज्यादा से ज्यादा स्कूल में पढ़ाने का. ससुर जी शास्त्रों के श्लोकों से प्रमाणित करते जिसके अनुसार स्त्री और पुरुष आग और फूस की भांति हैं. जितना संभव हो एक-दूसरे से दूर रहें.
निकालते-निकालते कुछ अँधेरा घिर आया था. तेज हवाएं और आसमान से बूंदा बंदी भी शुरू हो गई थी. वह जल्दी जल्दी चलते हुए पास के टेम्पो स्टैंड तक गई. वहां एक भी टेम्पो नहीं था. उसे पता चला दोपहर के बाद टेम्पो-चालकों की हड़ताल हो गई थी. शहर से दूर होने के कारण वहां से रिक्शे भी यदा-कदा ही मिलते. अब आखिरी बस का थी ठिकाना था. वह असमंजस में थी. पास में कहीं से घर के पड़ोस में फोन हो सकता. इसके लिए ब्रांच वापस जाना होता. तभी एक रिक्शा आता दिखा. वह जल्दी से उसे रोक बैठ गई. अब तक वह काफी भीग गई थी. कैंट तक आने के पहले, रास्ते का कुछ हिस्सा ऐसा था जहां सन्नाटा अधिक रहता. सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक जंगलनुमा खाली मैदान, पेड़ और झुरमुट. रोज बस में सवारियों के बीच इतना सन्नाटा महसूस न होता. उसे लगा रास्ता आज अधिक लंबा हो गया है. तभी रिक्शा लड़खड़ाया और रुक गया. रिक्शे वाले ने उतर कर जांच की. रिक्शे का एक्सेल सड़क के खांचे में पड़ कर टूट गया था. पहले वह बैठी रही. जब निश्चित हो गया कि रिक्शे का चलना संभव नहीं वह विवश हो उतर गई. रिक्शेवाला पैदल रिक्शा खींचते हुए चला गया था. पानी तेज हो गया था. दूसरे रिक्शे, टेम्पो या बस के इन्तजार के अन्य विकल्प भी क्या था! उसने इधर-उधर देखा. आश्रय के लिए सड़क के किनारे एक गुमटीनुमा दुकान के शेड के नीचे दौड़ती पहुंची थी. कपड़े भीग कर शरीर से चिपक से गए थे. दुकान में चार-पांच किशोर मौजूद थे. तभी बिजली चमकी थी. उसने देखा उनकी उम्र सोलह – सत्तरह के करीब रही होगी. उसके उम्र के लिहाज से निरे बच्चे. फिर भी उसे संकोच हुआ. उसने भीगी हुई साड़ी में ही अपने को चारों ओर से समटने की कोशिश की.
लड़के अपनी बातों में मशगूल थे. जैसा इस उम्र में अमूमन करते हैं. कॉलेज, अध्यापक, बेकारी, घर वालों की नजर में उनका निकम्मापन, फिल्मों, लड़कियों की. बातों से उनकी आँखों में तैरते सपने, भविष्य की आशंकाएं और हताशा स्पष्ट थीं. उस लगा इस प्रकार कह-सुन कर इन्हें अपनी कुंठाओं से कुछ देर के ही लिए निजात मिल जाती होगी. उसे अपने भाई की याद आ गई. भाई उससे काफी छोटा था. नौकरी की तलाश में बुझा-बुझा रहने लगा था. माँ के न रहने के बाद इधर-उधर घूमता रहता, गायब रहता. वह अभी भी उसे बच्चा लगता, नितांत भोला, दुनियादारी से दूर. उस दिन वह पिता के यहाँ आयी थी. भाई के कमरे में कुछ ढूढ़ते हुए उसकी अलमारी में किताबों के बीच दो-चार ऐसी किताबे, चित्र हाथ लगे. स्त्री-पुरुष के संबंधों वाली सस्ती. वह चौंक गई. उसका मन हुआ कि उसके आने पर उसे खूब फटकार लगाए. लेकिन उसने उन्हें यथास्थान रख दिया. भाई के आने पर संकोच और उसके चेहरे की मासूमियत देख कुछ ना कह सकी. उम्र का तकाजा मान चुप रही. उसे पढ़ने में मन लगाने की हिदायत दी. वह हमेशा उसका साहस बंधाती, सांत्वना देती. जो हो सकता उसकी मदद कर देती. मजबूरियों की तहत ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकती थी.
पानी तेज हो गया था. वह विचारों में डूबी रही. बिजली के चमकने की रोशनी में कब लड़कों का ध्यान उसकी, भीगे कपड़ों से झलकते उसके बदन की ओर गया और कब वह उनकी चर्चा का केंद्र बन गई, उसे जब तक पता चलता और वह सावधान होती, यदि संभव होता, तब तक देर हो गई थी. छेड़-छाड़, स्पर्श आदि से शुरू क्रियाओं का अंत उनके हाथों की जकड़न में हुआ था. उसके मुंह से चीख निकल नहीं सकी थी या सन्नाटे और बरसात के कारण किसी ने सुना नहीं. प्रतिरोध स्वाभाविक था लेकिन वह पस्त हो गई. उसका मुंह दबा कर मैदान में पेड़ों के पीछे ले जाया जा रहा था. चेतना लुप्त होने के पहले तक वह, अपने शरीर के क्षत-विक्षत होते जाने की सामूहिक प्रक्रिया की, गवाह रही.
आधी रात बीतने के लगभग बाद उसकी अचेतन अस्त-व्यस्त काया गश्ती पुलिस को सड़क के किनारे पड़ी मिली थी. अगले पूरे दिन रिपोर्ट, मेडिकल परीक्षण, बयान आदि चलते रहे. उसे प्रतीत हुआ कि ‘कल’ फिर से दोहराया जा रहा था. उसके घर खबर भेज दी गई थी. थाने में सुबह-सुबह पति, देवर और ससुर आए थे. उन्हें देख उसकी टूटती हिम्मत बंधी थी. परन्तु वे कुछ देर बाद चले गए.
ऊपर के कमरे में परिवार के लोगों की आपात्कालीन मीटिंग आयोजित हुई थी. मिनी को छोड़ सास, ससुर, पति, देवर सभी के सामने अभियुक्त के रूप में उसकी पेशी हुई थी. अभियोग तो स्वतः प्रमाणित था. अब घर में उसके फिलहाल बने रहने या स्थायी निष्कासन के संबंध में निर्णय एक-मत नहीं था. कारण कई थे – उसके चरित्र की काली छाया मिनी पर न पड़ने देने का प्रयास तो दूसरी ओर उसके वेतन, फंड के अग्रिम से उसके विवाह में योगदान की चिंता. बेरोजगार देवर की अपनी चिंताएं थीं. भाभी से अक्सर मदद लेना तो उसका अधिकार था. अखबार में नाम न होने पर भी अन्य विवरणों से मोहल्ले-रिश्तेदारों में शक तो उस पर था ही. वैसे भी उसको लेकर सरगोशियाँ, कानाफूसी चलती रहती. लगभग, दफ्तर जाने और लौटने का समय भी जरूर नोट होता होगा. मिसेज शर्मा तो कल से दो बार आकर लौट भी चुकी थीं. हर बार किसी न किसी बहाने बहू के बारे में पूछा भी था.
‘अब इसे अचानक भेज देने पर सबके संदेश की पुष्टि हो जाएगी’, पति ने कहा. देवर ने राय दी थी, ‘इस केस की इंक्वायरी चलेगी. पुलिस, अदालत में बयान होंगे. भेज देने पर उनकी नाराजगी मोल लेनी होगी.’ तभी सास को याद आया था वह इलाका तो मुसल्लों का है. जरूर वही रहे होंगे, ‘हाय – हाय, इज्जत के साथ धरम भी गया!’ वह डकराईं.
‘चुप साली . . .’ शुक्ला जी चिंघाड़े, ‘अब ढिंढोरा पीट रही है.’ कुछ फैसला न हो सका, सिवाए इसके कि दोष उसी का है. औरत जब तक न चाहे कोई कुछ नहीं कर सकता. सभी उठ गए थे. कमरे में वह अकेले रह गई थी. जाने कितनी देर हो गई. समय के उन असंख्य पलों में उसने पूरा जीवन, समस्त यातनाओं, विद्रूपताओं और खालीपन के साथ, एक बार फिर से जी लिया था. कमरे में निपट, निष्पंद एकांत था. उसने महसूस किया कि समय की धारा में पृथ्वी की भांति पर वह घूम रही है, सबसे असंप्रक्त.
पति, परिवार, शहर, पूरा परिवेश – सबकुछ कहीं दूर छूट गया है. अपनी जगह पर स्थिर रहते हुए भी उसने कितनी यात्रा कर ली है. अतल अंधकार में सबसे कट कर वह स्वयं में स्थित थी. उसे भास हुआ वह ही तो महत्वपूर्ण है. उसकी अस्मिता, अस्तित्व, स्वप्न, निजी दुःख-दर्द, उसका अपना जीवन. उस एक क्षण में, पूरे विराट्य के बीच, संभावनाओं के अनंत द्वार उसके चारों ओर खुल गए थे. अपने इस रूप के इस पस्ख से वह अब तक नितांत अपरिचित ही थी. जाना भी तो किन परिस्थितियों में. उसने अपने मन, शरीर और आत्मा के साथ एकात्म का अनुभव किया. साथ ही अपार शांति का.
अन्तःयात्रा के बाद वह कमरे में लौटी तो पाया कि घर कि सभी बत्तियाँ बंद हो चुकी थीं. गहरा अँधेरा. गली की ओर खुलने वाली खिड़की से कुछ प्रकाश छन रहा था. पहले तो उसे यह रोशनी गली के सरकारी लैम्पपोस्ट के बल्ब की लगी परंतु जब यह प्रकाश लगातार खिलता गया और कमरे में सुनाहलापन भरने लगा तो उसे विश्वास हो गया कि यह तो आने वाले दिन की आहट थी. उसकी इच्छा हुई वह छत पर जाकर उगते सूरज को देखे.
सभी उठ गए थे. एक-दूसरे से नजरें चुराते. वह तैयार हुई. रविवार होने के कारण अवकाश था. मिनी चाय-नास्ता ले आई. उसने पेट भर खाया. चाय तो एक कप और मांग के पी. सबने उसकी ओर आश्चर्य से देखा. तभी सुधीर उसके पास आया. उसका पुरुष अपने अहम की तुष्टि चाहता था. उसने कहा, ‘संभव है उन लोगों का उद्देश्य केवल लूटपाट रहा हो. कुछ और न हुआ हो. तुम्हारा पर्स, चेन भी तो गायब है.’ वह सुधा से आश्वस्त होना चाहता था. सुधा का तनिक सा झूठ उसके अहं को टूटने से बचा सकता था. संदेह का लाभ तो मिलना निश्चित था ही.
वह सजग हो गई. उसके अंदर की हिंसक बिल्ली प्रतिशोध में पंजे मारने को उद्धत हो थी, ‘नहीं, मैं बर्बाद हो गई.’ उसने घुटने में मुंह छिपा लिया.
सुधीर का चेहरा दयनीय हो आया. उसने फिर प्रयास किया, ‘तुम तो शायद बेहोश हो गई थीं. वे लूटपाट कर चले गए भी हो सकते हैं. तुम्हें ठीक से याद तो है?’
‘मेरी चेतना उस समय तक बाकी थी.’ उसने ठन्डे स्वर में जवाब दिया.
‘जा मर.’ वह उठ कर चला गया.
वह उठी सास के पास जाकर रोने को हो आई, ‘बाबू जी ठीक ही कहते थे. उनकी भविष्यवाणी कितनी सच निकली. जैसे सबकुछ पहले से जानते रहे हों.’ सास ने उसकी ओर अवश झुंझलाहट भरी दृष्टि से देखा, ‘तो?’
उसकी खिलखिलाने की इच्छा हुई. उसे खेल लग रहा था. निरंतर चलने वाला घिनौना खेल. पति, सास, ससुर, मोहल्ले के लोग, वे लड़के सभी के चेहरे एक दूसरे के धडों पर बदलते जा रहे थे. कंप्यूटर ग्राफिक्स की भांति अथवा किसी एकल-पात्र वाले नाटक में एक ही पात्र सभी चरित्र निभा रहा था. पति और विवाह स्त्री की संपूर्ण परिधि को नियंत्रिक करने की प्रवृत्ति का ही नाम है क्या? यह वह संबंध क्यों नहीं जो पूर्णता दे सके. इससे ज्यादा झिझक और हया उन लड़कों में थी. अनाड़ीपन के कारण ही क्यों न रही हो. वह नीली शर्ट वाला सीधा-साधा सा लड़का कपड़े उतारते वक़्त कैसे शर्माए जा रहा था.
अगले दिन, सबकी आशा के विपरीत, वह बैंक के लिए तैयार हुई थी. शोख लिपस्टिक और कपड़े, मेकअप रोज की तरह हल्का नहीं. उसने निश्चय कर लिया था कि अधूरे सच वाली जिंदगी वह अब नहीं जिएगी. उसका जीवन अपना है. क्या इसका एक अंश भी उसके अपने लिए नहीं? न किए गए अपराधों के लिए वह कब तक क्षमा मांगती रहेगी? वह न तो अग्निपरीक्षा देगी, न पृथ्वी में समाएगी.
एक नए संकल्प के साथ उसने अंतर्मन की आशंकाओं को झटक कर निकलने की कोशिश की. ड्रेसिंग टेबिल के सामने वह मुस्कराई. दर्पण में उसकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक थी.

एम0डी0एच0 2/33, सेक्टर एच,
जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

एक मुलाकात

 वंदना पुणतांबेकर
बैंड बाजे की ढम-ढम का शोर सुबह की गुनगुनी धूप से ही शुरू हो चुका था. सभी तरफ पायल और चूड़ियों की खनक हंसी ठिठोली की आवाजों से सारा माहौल एक खुशनुमा वातावरण का एहसास करा रहा था. विद्या ने अलसाये मन से खिड़की का पर्दा लगाकर सोने की कोशिश की. लेकिन अब नींद कहां आंखों में आ रही थी. मोगरे और सेंट की खुशबू ने विद्या को उठने पर विवश कर दिया. विद्या तुरंत उठ बैठी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. विद्या ने अनमने ढंग से दरवाजा खोला, सामने अंजना खड़ी थी. एक परिपक्व सास की तरह जुड़े में फूल सजाए हुए. वह विद्या की देखकर बोली:-"यह क्या. . ? अभी सो कर उठी हो. . . जल्दी तैयार हो जाओ माता पूजन के लिए निकलना है. और हां. . . चाय नाश्ता नीचे लगा हुआ है. तुरंत कर लेना नहीं तो कहां वहां से हट जाएगा. कहते हुए चली गई.
उसके जुड़े में लगे गजरे से गिरे फूल देख मेरे मन का मुरझाया आलस तुरंत खिल उठा. विद्या नहाकर तैयार हो नाश्ते के सामने पहुंची. सब कुछ समेटा जा रहा था. बैंड बाजे की आवाज में भी अब कानों से दूर होती नजर आ रही थी. बमुश्किल चाय-नाश्ता कर विद्या दरवाजे की पर खड़े एक अपरिचित व्यक्ति को देख पूछ बैठी. . , "की माता पूजन के लिए यह लोग किधर गए हैं. विद्या की ओर अपरिचित व्यक्ति ने देखकर कहा. . . . ," कि अब जाकर कोई फायदा नहीं वे लोग आते ही होगी. विद्या बे मन से एक कुर्सी पर जाकर बैठ गई. और उन लोगों के आने का इंतजार करने लगी. आज विद्या अपने बचपन की सहेली जिसे वह फेसबुक पर मिल चुकी थी. उसकी बेटी की शादी में आई हुई थी.
यहां उसके अलावा विद्या का कोई भी परिचित नहीं था. सभी अनजाने चेहरे को देख विद्या अपने आप को उस माहौल में अजनबी सा महसूस कर रही थी. अपनी सहेली अंजना की व्यस्तता को देखते हुए उससे कुछ उम्मीद रखना मूर्खता होगी. यही सोचकर विद्या कमरे में आकर अपना पर्स उठाकर उस छोटे से शहर में भ्रमण करने निकल पड़ी. भोजन के समय तक लौट आऊंगी शादी की व्यवस्था में किसी को कुछ पता नहीं चलेगा कि कौन आया कौन गया यही सोच विद्या शादी समारोह से बाहर निकल पड़ी. सोचा ऑटो कर लू. मगर कहां जाना है. गंतव्य पता नहीं था. हल्की गुनगुनी बयार बसंत पंचमी का दिन मदमस्त मौसम का आनंद उठाते हुए वह अकेली ही पैदल निकल पड़ी. थोड़ी दूरी पर एक छोटा सा हाट बाजार दिखाई दिया. सुबह का व्यस्त समय था. अभी बाजार खुला नहीं था. वह आगे बढ़ती चली गई. तभी वहां पर विद्या को सरस्वती वाचनालय का एक बहुत बड़ा सा बोर्ड दिखाई पड़ा. विद्या के कदम वही ठिठककर रुक गए. उसने देखा तो वह लाइब्रेरी बंद पड़ी हुई थी. उसके पास एक स्टेशनरी की दुकान पर एक बुजुर्ग व्यक्ति विराजमान थे. विद्या उनसे वाचनालय के खुलने का समय पूछा. तो वह आदर से कहने लगे. . ,"बेटा अब यहां कोई नहीं आता. थोड़ी बहुत पुस्तकें पड़ी है. तुम्हें कुछ चाहिए तो मेरी दुकान से खरीद लो. उसने कहा नहीं मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस अंदर से देखने की जिज्ञासा थी. कहते हुए विद्या आगे बढ़ गई.
विद्या की भावनाओं को समझते हुए. उन बुजुर्ग व्यक्ति ने उसे पीछे से आवाज लगाई. बेटा क्या तुम्हें इसे अंदर से देखना है. . . ?,
विद्या की जिज्ञासा को देखते हुए उन्होंने पूछा. क्या तुम्हें वाचनालय में जाना है. . ?विद्या के पास तो समय ही समय था. शादी तो सिर्फ एक बहाना था. उसे तो दूसरा शहर घूमना था. तभी उस बुजुर्ग व्यक्ति ने विद्या को एक चाबी का गुच्छा देकर बोले. . ," बेटा यह लो देख लो कोई पुस्तक तुम्हारे काम की हो तो मैं तुम्हें दे सकता हूं. शायद तम्हारे किसी काम आ जाये. कहते हुए उन्होंने विद्या को चाबी का गुच्छा थमा दिया. दो,चार चाबियों को लगाने के बाद एक चाबी सही तरह से लग गई. और ताला खुल गया. गुनगुनी धूप की रोशनी विद्या से जल्दी अंदर प्रवेश कर गई. अलमारियों में बहुत सी किताबें देखकर विद्या मुस्कुरा उठी. शायद पुस्तकें भी सूर्य की किरणों को देख खुश हो गई. विद्या उस अलमारी की तरफ देख उस पर पड़ी धूल को अपने दुपट्टे से झाड़ने लगी. तभी वह अलमारी बोल उठी. . , 'यह क्या इतना कीमती दुपट्टा धूल झाड़ने के लिए थोड़ी है. आप कौन हैं. . ? आपका परिचय अलमारी खोलते ही वह चरमराती हुई बात करने लगी. हम यहां सदैव अच्छे पाठकों का इंतजार करते रहते हैं. क्या बाहर कोई कर्फ़्यू लगा है. . ? जो यहां कोई और पाठक आता ही नहीं. . ,ना ही कोई बच्चे आते है. हमें तो बाहर के हाल-चाल नजर ही नहीं आते.
विद्या ने एक पुस्तक को खोलकर देखा पन्नों पर दीमक का आतंक पसरा पड़ा था. विद्या ने उसे झाड़ते हुए कुछ पन्ने पलटे. इतिहास की कुछ रोचक कथाएं थी. मन में वही बालपन जीवंत हो उठा. तभी उस पर लगी दीमक कहने लगी. . . , "अरे अब तो सारी किताबों पर हमारा आतंक है. यहां अब कोई नहीं आता. अब यह हमारा इलाका है. मानो वह भी विभाजन की बात कर रही हो. विद्या दूसरी अलमारी की तरह बढ़ी. वहां भी कुछ पुस्तकें अपने सुख-दुख की दास्तां बयां कर रही थी. आखिर एक उपन्यास ने हिम्मत कर विद्या से सवाल पूछ बैठा. पूछने लगा. . ,"इतने बरसों बाद कैसे आना हुआ. . . ? ऐसा कौन सा युग आ गया है . कि हमारी मन की भावनाएं कहानियां कविताएं,बाल कथाएं ज्ञान-विज्ञान जासूसी पुस्तकों कि अब किसी को जरूरत ही नहीं. अब तो यहां दीमक नामक घुसपैठिया तो हमें इतिहास बनाने के लिए तुल गया है. यहां तो अब हमारा अस्तित्व ही धीरे-धीरे खत्म हो रहा हैं. विद्या ने अपने आंखों के कोरों की नमी को पोंछते हुए.
उनकी दुर्दशा देख अपना मौन तोड़ते हुए कहा. . ," क्या कहूं सखी तुमसे में. . . . बाहर इंटरनेट और स्मार्टफोन नामक ऐसे डिजिटल दानवों ने अपने पांव पसार रखे हैं. और उस पर गूगल नामक उनके सरदार ने सारा ज्ञान अपनी पगड़ी पर लपेट रखा है. उन्हें अब किसी की भी पुस्तकों जरूरत नहीं. सारी ज्ञान की चादर गूगल महाराज ओढ़े बैठे हैं. विद्या की बात सुनकर सारी पुस्तकें विलाप करने लगी. कहने लगी. तो क्या हमारा अस्तित्व खत्म हो रहा है. विद्या ने पुस्तकों को सांत्वना देते हुए कहा. . " नहीं-नहीं तुम्हारा कोई अस्तित्व खत्म नहीं हो रहा. भटकते राही को सही राह पर लाने वाली सत्य का प्रकाश पुंज फैलाने वाली तुम. . तुम्हारा अस्तित्व कैसे खत्म हो सकता है. बहुत से लोग हैं. अभी इस दुनिया में. . तुम्हें फिर तुम्हारे पुनरुत्थान की ओर ले जाने में अग्रसर होकर तुम्हें फिर से उम्मीद के प्रकाश में लाने के लिए तत्पर है. विद्या की बात सुनकर किताबें खिलखिला उठी. विद्या वहां सभी को एक आश्वासन देकर वहां से चार पुस्तकें अपने साथ लेकर बाहर आ गई. कि वह दिन अब दूर नहीं कि तुम्हारा परचम फिर से लहराएगा. विवाह समारोह में वापस आने पर विद्या ने देखा सभी का भोजन समाप्त हो चुका था.
विद्या का पेट पुस्तकों की दर्द
भरी आत्मकथा सुनकर खाली हो चुका था. लेकिन विद्या साथ आई पुस्तकों का मन उम्मीदों में बंधी आशाओं से ख़ुशी से तृप्त हो चुका था. 

वह सभ्य इंसान

 डॉ.विभाषा मिश्र

काश मैं उन बच्चों जैसी किस्मत ला पाती
काश मेरे भी हाथों में उनकी तरह क़िताबें रहती
काश इस कच्ची उम्र में मैं भी थोड़ा जी लेती"
सोनू हाथ गाड़ी चलाते हुए यह सोच ही रही थी कि
सामने से अचानक एक बड़ी गाड़ी आकर रुकती है। गाड़ी से उतरकर एक सभ्य इंसान जब पूछते हैं कि बेटा तुमने इतनी छोटी - सी उम्र में इतना बड़ा काम कैसे हाथ में ले लिया। तो वह सकुचाते हुए कहती है। क्या करूँ साहब कभी मैं भी रोज़ स्कूल जाया करती थी। घर की परिस्थिति ही ऐसी है कि न चाहते हुए भी मुझे यह काम करना पड़ रहा है। पीछे जो बैठा है वह मेरा छोटा भाई है। मैं ही घर में बड़ी हूँ। मेरे पिताजी यह काम किया करते थे। मग़र कुछ महीनों पहले ही वे लकवाग्रस्त हो गए हैं। अब ऐसी स्थिति में माँ को ही उनकी देखरेख के लिए रहना पड़ता है। छोटे भाई,माँ और पिताजी इन सबकी ज़िम्मेदारी अब मेरे ही ऊपर है। मुझे यह काम बुरा नहीं लगता मग़र यह ज़रुर महसूस करती हूँ कि न चाहकर भी मैं बंध गई हूँ। अगर यह काम न करूं तो हमारा जीवन कैसे गुज़रेगा।
सभ्य इंसान ने पूछा-क्या! तुम इसके अलावा कुछ और काम करना जानती हो?
जवाब में सोनू ने कहा-जी साहब! मुझे कशीदाकारी बहुत अच्छे से आती है। मुझे यह करना भी बहुत पसंद है।
सभ्य इंसान सोनू की तरफ़ प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहते हैं कि बेटा अगर मैं तुम्हें कशीदाकारी का सारा सामान लाकर दे दूँ तो क्या तुम मेरी कम्पनी के लिए यह काम करोगी। काम ख़त्म करने के बाद तुम पढ़ने स्कूल भी चली जाना। सोनू को ऐसा लगा मानो कोई चमत्कार हो गया हो। सोनू को एक बार फिर अपनी एक छोटी -सी दुनिया दिखाई देने लगी,जिसमें रंग-बिरंगी क़िताबें हैं और वह ख़ूब मन लगाकर पढ़ रही है। उसने फ़ौरन हामी भर दी।
सोनू को उसका मनचाहा काम और जीवन जीने के लिए आर्थिक रूप से मज़बूती मिल गई। घर में जब तक रहती वह कशीदाकारी का काम करती,उसके बाद वह स्कूल जाती। धीरे-धीरे समय बीतता चला गया,और वही सोनू अब बड़ी होकर डॉक्टर बन गई।
उसने बचपन के दिनों के उपकार को न भूलते हुए उस सभ्य इंसान की हमेशा इज्ज़त की। वह हमेशा सोचती रहती कि उनका यह उपकार वह इस जन्म में कैसे चुका पाएगी।
एक दिन अचानक जिस हॉस्पिटल में सोनू डॉक्टर थी,उसी हॉस्पिटल में उस सभ्य इंसान को भर्ती किया गया। उनको दिल का दौरा पड़ा था। जैसे ही सोनू को पता चला वह भागते हुए उनके पास गई। उसने पूछा कि उनके साथ उनके घर के सदस्य जो आए हैं वे सब कहाँ हैं। जवाब में उसे सिर्फ़ एक चुप्पी मिली।
सभ्य इंसान का ऑपरेशन शुरू कर दिया गया। लगभग चार-पाँच दिनों के बाद जब वे सम्हलने की स्थिति में आये तब फिर सोनू ने उनसे पूछा कि आपके परिवार के सदस्य कहाँ गए।
उन्होंने जवाब दिया-बेटा मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है, मैं बचपन से अनाथ हूँ, और अनाथ आश्रम में पढ़-लिखकर ही मैंने अपने आपको इस मुक़ाम तक पहुँचाया। मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है। तुमको जब मैंने बचपन में हाथ-गाड़ी चलाते हुए देखा और तुम जिस करुण भाव से रिक्शे से स्कूल जाते हुए बच्चों को निहार रही थी। तब मुझे लगा कि इस छोटी-सी बच्ची ने अपने माता-पिता के लिए कितना कुछ समर्पित कर दिया। बहुत क़िस्मत वाले होते हैं जिनको माता-पिता का साथ मिलता है। तुम्हारे अंदर प्रतिभा देखकर ही मैंने तुमको दोहरी ज़िम्मेदारी सौंपने का फ़ैसला लिया। मुझे नहीं पता कि मैं कितने दिनों तक जीवित रह पाऊँ, मैं तुमको यह बताना चाहता हूँ कि मैंने अपने जीवन में अगर कोई पुण्य का काम किया है तो वह यही कि तुम जैसी क़ाबिल बच्ची को उसकी सही जगह पहुँचाने का माध्यम बन सका। तुमने मेरी इस बीमारी में जितनी सेवा की उतना शायद मेरे कोई अपने होते तो वह भी नहीं कर सकते थे।
सोनू की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। कुछ दिनों के बाद हॉस्पिटल में ही उस इंसान की मृत्यु हो गई। सोनू को यक़ीन नहीं हुआ कि पिता रूपी वह इंसान इस दुनिया में अब नहीं रहे। सोनू ने अपने ही हाथों उनका दाह-संस्कार किया। कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद उस सभ्य इंसान के वक़ील ने सोनू को आकर एक कागज़ का पैकेट थमा दिया। उसमें यह लिखा था कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरी सारी जायदाद मेरी बेटी सोनू को दे दी जाए,और पूरे जायदाद के कागज़ात उसमें शामिल थे। सोनू के पास अब बोलने के लिए कुछ भी नहीं बचा। बस वह लगातार रोये ही जा रही थी।
सोनू ने निश्चय किया कि उनकी सारी जायदाद ऐसे बच्चों पर ख़र्च करेगी जो असहाय हैं। कुछ महीनों में सोनू ने उस सभ्य इंसान की स्मृति में आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों के लिए एक भव्य स्कूल बनवाया,और उसकी ज़िम्मेदारी अपने छोटे भाई को सौंप दी। सोनू के लिए उस इंसान के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि थी।
इंसान मरकर भी अमर हो जाता है सोनू ने इसे अपने कर्मों से चरितार्थ कर दिया। 
अतिथि व्याख्याता (हिंदी/छत्तीसगढ़ी)

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर(छ.ग.)
 ई.मेल.-vibhashamishra@gmail.com

सती का ‘सत’


प्रमोद भार्गव

कनकलता पैंतालीस-छियालीस साल की एक सुशिक्षित संभ्रात महिला। अच्‍छी मां, सुघड गृहिणी। घर के कामकाज में पारंगत। जैसी नियमित दिनचर्या उसी के अनुरूप सलीके से व्‍यवस्‍थित घर। आदर्श पत्‍नी के रूप में पति की आज्ञाकारी भी वे रहीं, पर भला पति का साथ उन्‍हें मिला ही कितना...., मात्र सात साल। तभी से उनके भावविहीन गौरवर्णी गोल चेहरे पर दुख दर्द की परत ठहरी हुई है। इधर ठहराव के बावजूद कैसे पंख लगाकार फुर्र हो गए बीस-इक्‍कीस साल....।
आज सुबह कनकलता की नजर जब अखबार की मुख्‍य हेडलाइन पर ठहरी ‘95 साल की महिला सती, बेटों ने ही मां को सती होने के लिये उकसाया' तो उनका मस्‍तिष्‍क बुरी तरह परेशान हो गया। सती होने वाली घटनाओं से संबंधित समाचार पढ़कर वे अक्‍सर भीतर तक दहल जाया करती हैं। आज से ठीक बीस साल पहले राजस्‍थान के दिवराला गांव में रूपकुंवर के सती होने की घटना सामने आई थी तब भी वे परेशान हो उठी थीं। कैसे अठारह-उन्‍नीस साल की यौवन ग्रहण कर रही नवौढ़ा रूपकुंवर को पति की चिता के साथ जल जाने के लिये लाखों लोगों के बीच चूनरी रस्‍म का आयोजन किया गया। ढोल धमाकों के बीच सती होने के लिये उकसाकर लाचार बना दी गई देह को लकड़ी के भारी गट्‌ठरों के बीच दाब दिया गया। फिर देवर ने ही जिंदा औरत को मुखािग्‍न दे दी। कहा तो यह जा रहा था कि सती के ‘सत' से आग निकलेगी ? पर सती के सत से कभी आग निकलती है भला ? वह तो पाखंडियों द्वारा आग निकलने का आडम्‍बर रच दिया जाता है। रूपकंुवर के शरीर ने जब आंच पकड़ी तो वह रहम की भीख मांगती हुई मद्‌द के लिये चिल्‍लाई भी थी। पर सती के बहाने हत्‍या के लिये आमादा खडे़ निर्मम पाखंडियों ने रूपकुंवर को लकडियां बिखेरकर चिता कहां फलांगने दी। देखते-देखते सती माता के आकाश चीरतें जयकारों के बीच दया की गुहार लगाती दर्दनाक चीखें खामोश होती चली गईं। एक समूची दुल्‍हन के रूप श्रृंगार से सुज्‍जित स्‍त्री-देह आग की लपटों के हवाले थी। काश रूपकुंवर को रीति-रिवाज और खोखली परंपराओं की निष्‍ठुर आग से बचाने के लिये कनकलता के ससुराल वालों की तरह रूपकुंवर के परिजन भी आड़े आ गए होते ? पर अनायास गौरवशाली जातीय परंपराओं की भावनाओं के वशीभूत कर दी जाने वाली स्‍त्रियां कनकलता की तरह सौभाग्‍यशाली कहां होती हैं ? ज्‍यादातर मामलों में सती हो जाने वाली स्‍त्रियों के परिजन ही सामाजिक मान्‍यताओं और परिस्‍थितियों के दास होकर सती हो जाने का माहौल निर्मित करने में सहायक हो जाते हैं। रूपकुंवर की चूनरी रस्‍म उसके पिता ने ही की थी। और अब पिनचानवें साल की कुरइया देवी को चिता के हवाले उसके चार बेटों ने ही किया।
कनकलता के मन मस्‍तिष्‍क में यादें के खुलासा करते हुये जीवंत हो उठी है....। इक्‍कीस साल पहले उस दिन संतान सातें थी। और कनकलता अपने मायके भितरवार में थी। भितरवार, बुन्‍देलखण्‍ड के प्रभाव क्ष्‍ोत्र में होने के कारण पारंपरिक पर्व त्‍यौहार, रीति रिवाज और मान्‍यताओं से कहीं गहरा वास्‍ता रखने वाला क्ष्‍ोत्र। संतान सातें यानी अपनी पुत्र संतानों में गुणकारी चरित्र प्रवाहित करने के लिये अलौकिक शक्‍ति से प्रार्थना एवं उपासना का दिन। कनकलता ने दोनों बेटों पियूष और कुणाल की लंबी उम्र और मेधावी बुद्धी के लिये व्रत रखा। वहीं कनकलता के चार बहिनों की पीठ पर इकलौते भाई के लिये उसकी मां ने भी व्रत रखा। उस दिन मां बेटी ने सुबह जल्‍दी उठकर दिनचयाएं निपटाने के बाद श्रृंगार किया। कनकलता ने गहरी नारंगी साड़ी पहनी। मेंहदी महावर रचाया। मांग में चुटकी भर सिंदूर की लंबी रेखा, पति की लंबी आयु के लिये खींची। माथे पर गोल टिकी जड़ी। सवा-सवा तौले की चांदी की चूड़ियां कलाइर्यों में पहनीं। सात और पांच साल के बेटों के लिये कढ़ाही में आसें (पूड़ियां) तलीं। गुड और कठिया गेहूं के चून में सनी आसें। फिर गोबर से लिपे आंगन में चौक (रंगोली) पूरकर पटा रखा गया। पटे पर आले से उठाकर पीतल के छोटे-छोटे भगवान विराजे गए। आसें रखी गईं। कलश में आम के पत्‍तों का झोंरा रख नारियल रखा गया। तब संतान सातें की कथा वांचकर पूजा पूर्ण हुई। नारियल फोड़कर बेटों को तिलक किया और उन्‍हें आसें खिलाईं। कनकलता मां और बहनें आंगन में ही बैठ मंगल गीत-गा रही थीं, तभी यकायक कनकलता के देवर रामगोपाल आंगन में आ खडे़ हुये। चारों बहिनें और मां अगवानी को तत्‍पर। देखा शांत रामगोपाल संपूर्ण संयम बरतते हुए बुद्‌बुदाने की कोशिश तो कर रहे हैं, पर बोल नहीं फूट रहे। फिर बमुश्‍किल बोलें, ‘‘भाभी तत्‍काल मुरैना चलना है।''
मस्‍तिष्‍क में आसन्‍न आशंकाओं के उठते विवर्तों के बीच चैन खो रही कनकलता बोली, ‘‘क्‍यों'' ? और उसने फिर अनुभव किया जैसे देवर लाला भीतर से उठ रहे किसी गुबार को जबरन साधने की कोशिश में लगे हैं।
कनकलता ने फिर उत्‍तर की प्रतीक्षा नहीं की। वह आशंकित हो गई जरूर कोंई अनहोनी घटित हुई है। कनकलता मां से निर्णायक स्‍वर में बोली, ‘‘मैं जा रही हूं मां।''
-‘‘तेरे पिता को तो आ जाने दे।''
-‘‘उन्‍हें भी मुरैना भेज देना।'' रामगोपाल बोले थे।
रामगोपाल पलटकर बाहर हो गए। पीछे-पीछे दोनों बेटों को लगभग घसीटती सी कनकलता थी।
बेचारी कनकलता का भाग्‍य जैसे किसी शरारती घोडे़ की तरह बिदक रहा है। भाग्‍य तो शायद पहले से ही बिदका हुआ था। सनत की वह जब ब्‍याहता बनी थी तब अपने भाग्‍य पर सखी सहेलियों के बीच खूब इतरायी थी। कुमारियां कल्‍पनाओं में जिस राजकुमार के ख्‍वाब देखा करती हंै सनतकुमार उन्‍हीं कल्‍पनाओं के साक्षी थे। एकदम अपेक्षित आकांक्षाओं के भव्‍य और दिव्‍य पुरूष। थे भी इंजीनियर। अच्‍छा वेतन। ऊपरी आमदनी अलग से। सब कुशल था। लेकिन विवाह के सात माह बाद जब कनकलता ने सतमासा बच्‍चा जन्‍मा तो सनत को नई-नई आशंकाओं ने घेर लिया। वे अपने ही अंश से उत्‍पन्‍न पुत्र को अवैध करार देते-देते लगभग बौरा गए। बौराई बुद्धि के उपचार के लिये सासू मां ने जब संदूक से मनोरोग चिकित्‍सक डाॅ. मल्‍होत्रा के पुराने पचोंर् की फाइल निकालकर देवर जी को दी तब कहीं रहस्‍य खुला कि सनत के मन की नम धारा पर मनोविकार के पौधे पिछले कई सालों से गहरी जडें जमाए हुए हैं। और अब जब भी अपनी इच्‍छाओं के विरूद्ध कोई अनहोनी घटित देखते हैं तो मन पर से बुद्धि का नियंत्रण दूर हो जाता है और वे सनक के दायरे में आने वाले ऊटपटांग बकने लगते हैं। विवाह से पूर्व सनत की सनक को कनकलता और उसके परिजनों से छिपाया गया था। बेचारी कनकलता माथा पकड़कर भाग्‍य को कोसती वेबस रह गई। अब सफाई दे भी तो किसे ? और सफाई सुने भी तो कौन ? जिस पति की काबिलियत पर कल तक कनकलता इतराती थी आज उसी की हरकतों को सामान्‍य व्‍यवहार जताकर छिपाने की नाकाम कोशिश करती रहती है। औरत की जिंदगी की विचित्र बिडम्‍बना है यह। लेकिन उसकी भी अपनी स्‍वार्थ भावनाएं हैं जो उसे पुरूष की प्रतिच्‍छाया बनी रहने के लिए मजबूर बनाएं रखती हैं।
कलंक दंश झेलती कनकलता बौराई अवस्‍था में भी पति का साथ निभाती रही। इस बौराई अवस्‍था में भी दैहिक सुख के लिये गोंच की तरह कैसे उसकी देह से चिपटे रहते थे सनत। काम सुख के दौरान पवित्रता-अपवित्रता का सनत की बौराई बुद्धि को भी कहां खयाल रहता था ? डाॅ. मल्‍हौत्रा मैडम के उपचार से सनत साल छह माह के लिये ठीक हो जाते और जब कभी कोई बात कांटे की तरह चुभ जाती तो फिर खिसक जाते। कठिन परिस्‍थितियों से समझौता करती कनकलता चार साल बाद एक और बेटे की मां बनी। नवजात शिशु की शक्‍ल ने जब हुबहू बड़े बेटे की शक्‍ल से मेल खाया तो सनत की शंकाऐं कहीं उन्‍हीं के शरीर में कहीं डूब गईं। कनकलता ने चैन की सांस ली और जीवन फिर पटरी पर आ गया। पर सनत का तबादला जब एकाएक दूरदराज सतना कर दिया गया तो मनस्‍थिति फिर विचलित होकर बौराने लगी। सतना में उनका मन नहीं लगता। बच्‍चों का बहाना लेकर बार-बार भाग आते। पसोंर् ही तो सनत कुतुब एक्‍सप्रेस से सतना गए थे। फिर क्‍या वे लौट आए और लौटने के बाद उन्‍होंने कहीं कुछ कर तो नहीं लिया.....? क्‍योंकि वे अकसर रेल से कटकर मर जाने की धौंस दिया करते हैं।
मुरैना घर के पास पहुंचने पर कनकलता हैरान....., भयभित ! परिचित अपरिचित लोगों की भीड़। मातमी सन्‍नाटा। कनकलता आगे बढी तो लोगों ने गैल छोड़ दी। कनकलता आंगन में पहुंची तो देखा मुंह में पल्‍लू दबाए बैठी औरतों से आंगन ठसा था। सभी औरतें उसे ही विचित्र निगाहों से देखे जा रही थीं। कनकलता समझ गई सनत के साथ कोई न कोई अनहोनी घट चुकी है। खुद को संभालती वह भीतर के कमरे थी। कमरे के कोने में वह दीवार के सहारे खड़ी हुई और फिर दीवार के सहारे ही खिसककर बैठ गई। सासू मां भीतर आई तो कनकलता ने पूछा, ‘‘क्‍या हुआ अम्‍मां ?''
- ‘‘का मुंह से कहूं दतिया बारी तेरे करम फूट गए।'' और सासू मां छाती पीटकर बुक्‍का फाड़ रो पड़ी। उन्‍हें संभालने को बुजुर्ग औरतें दौड़ी आईं। प्रलाप करती हुईं वे बेटे की मौत रहस्‍य भी उजागर करती जा रही थीं, ‘‘सबेरेईं कुतुब से लौटो हतो.......। केततो अम्‍मां मोय कलसेई जा भ्‍यास रई ती कि कनकलता....ए.....और दोनों मोड़ा......ने........काउ ने तलवार से काट दये.......। बाबूजी गोपाल के संग ग्‍वालियर दिखा लावे के इंतजाम में लगेई हते.....,के जाने कब पिछवाडे़ के किवाड़ खोल निकर गओ...। फिर कछु देर में तो खबर...ई....आ गई के सनत रेल से कट मरो.....। कौन बुरी घड़ी आन परी भगवान....रक्षा करिओंं...।''
इतना सब घटने के बावजूद कनकलता बेअसर, शांत। आल्‍ती-पाल्‍ती मारे प्राणायाम की मुद्रा में धीर-गंभीर।
कोई आंसू नहीं। पति का साथ छोड़ देने का रूदन-क्रंदन नहीं। उसका आभामण्‍डल चेहरे की लालिमा से जैसे अलौकिकता लिए दीप्‍त हो उठा हो...। कनकलता की तात्‍कालिक परिस्‍थितियों में निर्लिप्‍त, निर्विकार हालत देख आंगन में बैठी औरतें फुसफुसाई भीं, ‘‘कैसी विचित्र औरत है भर जवानी में आदमी के मर जाने पर भी आंसू नहीं फूट रहे।'' जितने मुंह, उतनी बातें।
लगभग दिव्‍य प्रतिमा में परिवर्तित कनकलता किसी साध्‍वी की तरह बोली, ‘‘हमें मालूम था यही होना है। हम भी जाऐंगे। हमारा उनसे वादा था। हम उन्‍हीं के साथ जाऐंगे। सती होएंगे। हमें वहां ले चलो जहां हमारे परमेश्‍वर का शरीर रखा है। आप लोग रोऐं नहीं, शांत रहें। जल्‍दी करो, हमें पति देवता के पास ले चलो.....।''
कनकलता एकदम उठी और बाहर की ओर दौड़ पड़ी। उसकी सास जिठानी और भतीजियों ने उसे हाथ पकडकर थाम लिया। सास बोली, ‘‘ऐसा नहीं करते बेटी, बच्‍चों की तरफ देख, बाप का साया तो उठ ही गया तेरा और उठ जाएगा तो इन दुधमुंहों को कौन पालेगा..., दुलारेगा...?''
- ‘‘कोई फिकर नहीं अम्‍मां, उनके सब हैं। दादा दादी हैं। नाना-नानी हैं। काका-काकी हैं। इन सब बुजुर्गों का आशीर्वाद उन पर रहेगा ही..., फिर ईश्वर मालिक है। हमें किसी से कोई मोह नहीं...? हम जाऐंगे। हमें जाने दो। अब हमें दुनिया की कोई ताकत सती होने से नहीं रोक सकती। यही इर्श्‍वर इच्‍छा है।''
- ‘‘हमरे तो वैसेई जवान मोडा के भर बुढापे में साथ छोड़ जाने से प्राण हलक में आ अटके हैं। हमरे अब कछु बसकी नई रई। अब तो इर्श्‍वर से एकई प्रार्थना है जल्‍दई प्राण हर ले, तासे बचो-खुचो जो जनम सुधर जाए। बुद्धि संयम से काम ले बहू और बच्‍चों की ओर देख...।'' सासू मां ने खुद को संयत करते हुए कनकलता को समझाइस दी। संवाद प्रति संवादों का दौर जारी रहा।
कनकलता का पति के प्रति अतिरिक्‍त लगाव से सनाका खिंच गया। कुछ महिलाऐं उसे संभाल रही थीं तो कुछ सती की शक्‍ति समझ सहमकर पीछे हट गईं थीं, कहीं सती का श्राप न लग जाए। कुछ ही पलों में कनकलता के सती होने की खबर घर से बाहर आई तो देखते-देखते पूरे कस्‍बा और आसपास के ग्रामों में फैल गई। फिर कनकलता के घर की ओर तमाशाइर्यों का रेला फूट पड़ा। गली-गलियारों में लोग। छतों पर लोग। पेड़ों पर बैठे व लटके लोग। सती माता के जयकारों से आकाश फट पड़ा। ढोल-धमाके, मंजीरे-चीमटों की सुरी-बेसुरी ध्‍वनियों ने जैसे सती मैया को पति की चिता के साथ अग्‍नि स्‍नान कर लेने के लिये संपूर्ण माहौल ही अनायास रच दिया हो।
जवान बेटे की अकाल मौत के गम में भी शव विच्‍छेदन की कानूनी कार्यवाही में लगे पंडित रामनारायण के कानों में बहू के सती होने की रट लगाए जाने की खबर पहुंची तो बेहाल बेचारे कागजी कार्यवाही जस की तस छोड अपने भाइर्यों के साथ घर की ओर भागे। पुलिस बंदोबस्‍त के लिये भी कहते आए।
रामनारायण और उनके भाइर्यों ने घर पहुंचने पर विचित्र माहौल देखा तो हैरान रह गए। जिधर आंख फेरो, उधर ही लोगों का तांता। ढोल-धमाकों के बीच, सती मैया के जयकारे। एक क्षण तो उन्‍हें लगा यह तो 1942 की अगस्‍त क्रांति सी स्‍थिति बन गई। रामनारायण ने भी इस आंदोलन में भागीदारी की थी। अंग्रेजी हुक्‍मरानों की लाठियां खाई थीं। जेल भी गए थे। स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण पूरे इलाके में उनकी साख भी थी और धाक भी। सती प्रथा, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों के वे सदा मुखर व प्रबल विरोधी रहे। स्‍त्री शिक्षा और विधवा विवाह के वे प्रबल पक्षधर थे। वे खुद तो पांचवी जमात तक पढे थे लेकिन बहू-बेटियों को पढ़ाने मंे कभी पीछे नहीं रहे। कनकलता ब्‍याह के वक्‍त केवल हायर सेकेण्‍डरी थी। लेकिन बाबूजी (रामनारायण) के आग्रह के चलते उसने बी. ए. किया और अब संस्‍कृत से एमए कर रही है।
रामनारायण ने घर पहुंचकर परिस्‍थिति को समझा और कुछ ही क्षणों में ठोस निर्णय लेकर ढोल-धमाके बजाने वालों को डांटकर बंद कराया। जयकारे लगा रहे लोगों को भी उन्‍होंने डांटकर चुप कराने की कोशिश की। परंतु भीड़ इतने बडे क्ष्‍ोत्रफल में फैली थी कि रामनारायण की आवाज बिना माइक के सब लोगों के कानों तक नहीं पहुंच सकती थी। बहरहाल माहौल कुछ शांत जरूर हुआ। लेकिन पेड़ों पर बैठे-लटके लोगों का कोई न कोई समूह सती मैया के जयकारे लगा ही देता।
रामनारायण थोडी बहुत स्‍थिति नियंत्रित होती देख सीधे कनकलता के कमरे में दाखिल हुए। चार छह महिलाओं द्वारा जबरन थामे रखी कनकलता उनके समक्ष थी। झूमा-झपटी में उसकी साड़ी का पल्‍लू नीचे सरक गया था। बाल बिखर गए थे। बेजा ताकत का इस्‍तेमाल करने के कारण मांग का सिंदूर माथे से लकीरों में बहकर उसके चेहरे को डरावना बना रहा था।
दीवार बने बाबूजी दहाड़े, ‘‘यह क्‍या नाटक बना रखा है बहू.....? ईश्वर ने जो जीवन दिया है वह अकाल व अनावश्‍यक बलिदान के लिये नहीं है ? तुम जो सोच रही हो वह जीवन का अनादर है। जीवन को मारकर नहीं जीवन को जीकर पति को याद किया जा सकता है....। पति की स्‍मृति में बेटों को अच्‍छा इंसान बनाने का व्रत संकल्‍प लो और यह सती-अती का आडंबर छोड़ो....। सती..., अपराध कर्म है।''
- ‘‘नहीं बाबूजी हम जाएंगे। हमारा उनसे वादा था......।''
- ‘‘वादा जीवितों के संग निभाये जाते हैं बेटी। मरों के संग मरना तो जीवन की हार है। अपने मन को उस दलदल से बाहर निकालो जहां तुमने अपने लिये सोचना ही बंद कर दिया है ?''
- ‘‘नहीं बाबूजी हम कुछ नहीं सुनेंगे..., हम तो सती होएगें। परमात्‍मा की यही इच्‍छा है।''
इस बार रामनारायण कड़क हुए, ‘‘हमारे जीते जी यह अनर्थ नहीं हो सकता। सती ईश्वरीय इच्‍छा होती तो राजा दशरथ की रानियां सती न हुई होतीं ? वे तो तीन-तीन थीं..., एकाध हुई सती ? बहुत हो गया अब त्रिया प्रपंच ! इसे चार औरतों के साथ कमरे में बंद कर के द्वार पर ताला जड़ दो.....। सती में सत होगा तो ताला भी आपसे आप खुल जाएगा और द्वार भी ! हमें भी तो चमत्‍कार से साक्षात्‍कार हों ?''
सती के सत का कोई चमत्‍कार सामने नहीं आया। कनकलता को भी बाद में लगा उसकी सती होने की जिद भी बौराई बुद्धि की तरह एक मतिभ्रम ही थी। बाबूजी इतनी शक्‍ति से पहाड की तरह आडे़ न आए हुए होते तो वह कब की जल मर खप गई होती....। उस वक्‍त उसके अंतर्मन में न जाने कहां से पति की चिता के साथ जल जाने की भावनाऐं एकाएक विकसित हो तीव्र हो उठी थीं। उसे तो लगने लगा था निश्‍चित रूप से किसी अलौकिक शक्‍ति का अनायास ही प्रगटीकरण होगा और बाबूजी समेत सब उसके सतीत्‍व के समक्ष चमत्‍कृत होकर दण्डवत होंगे और वह भीड़ को चीरती हुई पति की चिता पर पहुंचेगी। पति का सिर गोदी में रखेगी और फिर कोई आलौकिक शक्‍ति अग्‍नि बन फूट पडे़गी ?
पर अब लगता है धार्मिक अंधविश्‍वासों के चलते सती के सत से चिता में आग पकड़ लेने का रहस्‍य विधवा स्‍त्री के विरूद्ध एक सामाजिक षडयंत्र के अलावा कुछ नहीं है ? वाकई जीवन की सार्थकता सती के बहाने मर जाने में नहीं थी बल्‍कि संपूर्ण जीवटता और सामाजिक सरोकारों के साथ दायित्‍वों का निर्वहन करते हुए ही जीने में थी। कनकलता फिर स्‍मृतियों में......।
रात नौ बजे कनकलता के कमरे के द्वार खोले गए। कुछ औरतों ने भीतर जाकर सूचना दी दाह संस्‍कार हो गया। कनकलता के कानों तक भी खबर पहुंची। शायद उसे सुनाने के लिये ही खबर पहुंचाई गई थी। कनकलता बुदबुदाई, ‘‘बाबूजी ने हमारे साथ अच्‍छा नहीं किया। कम से कम हमें अंतिम दर्शन तो कर लेने देते। परिक्रमा तक नहीं कराई......?'' फिर जैसे-जैसे उसके अंतर्मन में यह विश्‍वास पुख्‍ता होता चला गया कि वाकई पति का अंतिम संस्‍कार हो चुका है तो उसकी आंखें डबडबा आईं और वह फूट पड़ी। कमरे में मौजूद अनुभवी औरतों ने जैसे चैन की सांस ली और कनकलता को जी भरकर रोने के लिये अपने हाल पर छोड़ दिया। पौर में कुटुम्‍बियों के साथ बैठे रामनारायण के कानों में बहू के कर्कश रूदन-क्रंदन ने टंकार दी तो हथेलियों से चेहरा छिपाते उनका साहस भी जैसे टूट गया, ‘‘बड़ा अनर्थ कर दिया रामजी...? अब विपदा संभालने की ताकत भी तू ही देना....।''
और फिर बिलखते-सुबगते कर्मकाण्‍ड की तैयारियों व निवृतियों में पहाड़ सा समय बीतने लगा। तीसरे दिन अस्‍थि संचय के बाद कनकलता ने बच्‍चों के साथ इलाहबाद संगम पर जाकर पति के फूल विसर्जन की इच्‍छा जताई तो बाबूजी ने इजाजत दे दी। कनकलता के मन को संतोष हुआ। उसका टूटा धीरज बंधने लगा। बेटों के प्रति भी वह आकर्षित हुई। कनकलता की जिजीविषा पल प्रति पल चैतन्‍य हो रही थी और उसके भीतर अनायास यह भाव उभरने लगे थे कि वह जिऐगी....। बच्‍चों को अच्‍छा पढ़ा-लिखाकर लायक बनाएगी....।
असमय पति की मौत के दंश ने कनकलता की चंचलता लगभग हर ली थी। खामोशी की भाषा ही जैसे उसके आचरण व्‍यवहार, इच्‍छा-अनिच्‍छा को व्‍यक्‍त-अव्‍यक्‍त करने का प्रमुख आधार बन गई। श्‍वसुर रामनारायण ने बहू को कभी सहारे का अभाव या आश्रय की कमी नहीं खटकने दी। बेटे की तेरहवीं के बाद वे बहू को लेकर ग्‍वालियर पहुंचे और शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्‍ति के लिये अर्जी लगवा आए। कुछ दिन की भाग दौड़ के बाद सरकारी विद्यालय में कनकलता को सहायक शिक्षिका के पद पर अनुकंपा नियुक्‍ति भी मिल गई। बाबूजी ने अपनी ही बिरादरी के एक मित्र के मकान में कनकलता को दो कमरे किराये से दिला दिए और दोनों बेटों के साथ कनकलता को ग्‍वालियर रख दिया।
कनकलता ने सरकारी नौकरी के आर्थिक आधार और बाबूजी के वरदहस्‍त के चलते जीने की शुरूआत की तो फिर न तो उसने कभी पीछे पलटकर देखा और न ही कभी बिरादरी समाज में कमजोर साबित हुई ? विद्यालय के वरिष्‍ठ शिक्षक भगवान स्‍वरूप शर्मा का उसे विशेष सहयोग प्राप्‍त होता रहा। सरकारी काम से लेकर घरेलू कार्यों तक जब कभी भी कनकलता को मदद की जरूरत पड़ती तो वे हमेशा ही निर्लिप्‍त, निर्विकार भाव से तत्‍पर रहते। घनी दाढ़ी में छिपे दार्शनिक चेहरे के भावों केा पढ़ते हुए कनकलता अक्‍सर अनुभव करती कि शर्मा उसकी भावनायें किसी भी स्‍तर पर आहत न हों इसका बड़ा ख्‍याल रखते हैं। उनके व्‍यवहार में कनकलता की लाचारगी के प्रति हमेशा ही दया भाव बना रहता। जिसका अहसास भर कनकलता को संबल प्रदान करता रहता। शर्मा एम. एस - सी. होने के साथ विश्‍व विद्यालय प्रावीण्‍य थे। लिहाजा वे कनकलता के बेटों के लिए जरूरत पड़ने पर उचित मार्गदर्शन भी देते। ऐसे तमाम सहयोगी कारणों के चलते शर्मा कनकलता के पारिवारिक शुभचिंतक की भूमिका में थे। कनकलता के बेटे भी उन्‍हें परिवार के वरिष्‍ठ सदस्‍य की तरह मान सम्‍मान देते।
किस्‍मत कहिए या संयोग उसके दोनों बेटे पढ़ने में इतने अब्‍बल निकले कि बडा न्‍यूरो सर्जन बन लंदन में बस गया। डाॅक्‍टर लड़की से ही उसने शादी रचा ली। छोटा बेटा इनफारमेशन टैक्‍नोलॉजी में इंजीनियरिंग कर बैंग्‍लौर स्‍थित बहुराष्‍ट्रीय कंपनी में अच्‍छी सेलरी पर जॉब पा गया। उसने भी सजातीय इंजीनियर लडकी से शादी कर ली।
उम्र के प्रौढ़ पड़ाव पर कनकलता के समक्ष जैसे-जैसे वैभव अठखेलियां करने को आतुर हो रहा था..., वैसे-वैसे उसे आशंका हो रही थी कि उसके भाग्‍य का घोड़ा फिर से भटकने को बेताव हो रहा है...। कनकलता संस्‍कृत से एमए करने के बाद यूडीटी हो गई थी और फिर कुछ सालों बाद ही पदोन्‍नत होकर लेक्‍चरर। उसके सहयोगी भगवान स्‍वरूप शर्मा उसी विद्यालय में प्राचार्य हो गये थे। उसके दोनों बेटों ने आठ-आठ लाख रूपये मिलाकर माधवनगर में आलीशान मकान खरीदकर उसके जन्‍म दिन पर उपहार में दे दिया था। लेकिन अकेली कनकलता घर में क्‍या करे ? बेटे-बहुऐं नाती-पोते होते तो दुलारते-पुचकारते, डांटते-डपटते दिन फुर्र...र्र से गुजर जाता। पर अकेले में तो खाली दिन जैसे काटने को दौड़ता है। स्‍कूल के बाद रिक्‍तता दिन भर जैसे उसे निचोड़ती रहती है। समय गुजारने के लिये टीवी आॅन करती तो स्‍क्रीन पर उभरती उत्तेजक तस्वीरें बीस-इक्‍कीस साल से वैधव्‍य की गांठ से बंधे मन की चाहतों को जैसे रेशा-रेशा कर केशौर्य की अल्‍हड़ता की ओर धकेलने लगतीं। उम्र के इस दौर में तीव्र बैचेैनी के साथ अपने आप में ही वह खुद को तलाशने लगती ? वैधव्‍य ढोते-ढोते सामाजिक मर्यादा और बंधनों की औपचारिकता में उसके अवचेतन में ही स्‍त्री दब कर कहीं लुप्‍त हो गई थी। एक आदर्श स्‍त्री के भीतर छिपी एक और स्‍त्री। जिसे शरीर में ही उभरते वह कई दिनों से अनुभव करती, शर्मा के बेहद निकट पा रही थी। कनकलता ने जब उस स्‍त्री का पिछले शनिवार को प्रगटीकरण कर अभिव्‍यक्‍त्त किया, तब जैसे विद्यालय में भूचाल आ गया.....।
शनिवार को महिला दिवस था। इस अवसर पर महिला संबंधी किसी भी विषय को चुनकर विचार गोष्‍ठी आयोजित किये जाने के निर्देश लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा दिये गये थे। कनकलता के विद्यालय में भी गोष्‍ठी आयोजित होनी थी। विषय चयन किया गया ‘‘बढ़ती सती की घटनायें और समाज'' कनकलता से इस विषय पर बोलने के लिए विशेष आग्रह किया गया। क्‍योंकि सब जानते थे कनकलता भी अपने पति की मृत्‍यु के समय सती होने की जिद के दौर से गुजरी है। ऐसे में उसकी तात्‍कालिक मानसिकता, स्‍थितियां और उनसे उबरने की जीवटता का वास्‍तविक चित्रण करने की अपेक्षा जरूरी थी। हांलाकि कनकलता बहस-मुवाहिशा, चर्चा-परिचर्चा और भाषण-संभाषण से हमेशा ही बचे रहने की फिराक में रहती। पता नहीं मंच से बोलते-बोलते वाणी से नियंत्रण कब हट जाए और मुंह से अनायास ही कुछ ऐसा-वैसा मुंह से निकल जाए जो बेवजह बवेला खड़ा कर देने का सबब बने। पर इस मर्तबा प्राचार्य शर्मा से लेकर ज्‍यादातर शिक्षकों की जिद थी कि कनकलता का तो भाषण जरूरी है। बहरहाल न-नुकुर करती कनकलता ने भी विचार व्‍यक्त करने की हामी भर ली।
सभाकक्ष ठसाठस। बतौर मुख्‍य अतिथि क्ष्‍ोत्रीय विधायक, विशिष्‍ट अतिथि संयुक्‍त संचालक शिक्षा और अध्‍यक्षता का दायित्‍व जिला शिक्षा अधिकारी संभाल रहे थे। वक्‍तव्‍यों का दौर शुरू हुआ तो ज्‍यादातर वक्‍ता सामाजिक उदारता और प्रगतिशील विचारों से परे सामाजिक कट्‌टरता, रूढ़ियों के खोखले आडंबरों को महिमामंडित करने के साथ वैचारिक पिछड़ेपन को उभारने का उपक्रम करते हुए सती हो जाने के लिए किसी हद तक स्‍त्री को ही दोषी ठहराने की कोशिश करते रहे। जैसे सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के मूल्‍यों को पुर्नस्‍थापित करने की होड़ में लगे हों। पर जब कनकलता की बारी आई तो जैसे स्‍त्री के प्रति वैचारिक क्रांति के शंखनाद ने आकाश भेद दिया हो, ‘‘लाचारी की अवस्‍था में स्‍त्री की लाचारगी को लेकर बहुत गहरे विचार व्‍यक्‍त करते हुए पीड़ा जताने की जरूरत नहीं है। क्‍योंकि शुभचिंतकों से बतौर सहानुभूति पीड़ा जताए जाने के मायने हैं स्‍त्री को और ज्‍यादा कमजोरी के दायरे में लाना। सती की घटनायें तो अब अपवाद स्‍वरूप ही घटित होती हैं लेकिन दहेज के अभाव में नवविवाहिताऐं रोज आत्‍महत्‍यायें कर रही हैं। मेरा ऐसा अनुभव और विश्‍वास है, जब एक स्‍त्री के तिल.....तिल प्राण निकल रहे होते हैं तब निर्णायक घड़ी में उसे बचा लेने के ठोस उपाय हम कहां कर पाते हैं....? हां मर जाने के बाद जरूर मुड़े-तुड़े पत्रों में कहीं दहेज प्रताड़ना की चंद पंक्‍तियां खंगालते हुए पुलिस कार्यवाही के लिए जितने बेचैन होते हैं, उतने पहले ही हो गए होते तो शायद एक जा रही जान को बचाया जा सकता था। जैसा कि आप में से ज्‍यादातर जानते हैं एक बुरे दौर में, मैं सती होने की जिद के दौर से गुजरी हूं। उस वक्‍त यदि मेरे श्‍वसुर कहीं गहरे आंसू बहाने में ही लगे रह गये होते तो मैंने भी पति की चिता में कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली होती। यदि हर विवाहिता को मेरे स्‍वर्गवासी ससुर जैसा आशीर्वाद मिले तो न स्‍त्रियां सती हों और ना ही दहेज के लिए जलाई जाएं अथवा आत्‍महत्‍यायें करें ? मुझे तो अपने पितातुल्‍य श्‍वसुर पर इतना विश्‍वास था कि यदि मैं पुर्नविवाह की इच्‍छा जताती तो वे निश्‍चित मेरा पुर्नविवाह करने के लिए समाज की कोई परवाह किए बिना आगे आ जाते...? चूंकि हम परंपरावादी सोच और आदर्श छवि के छिलकों से ढंके हैं इसलिए खुद को इर्मानदारी से अभिव्‍यक्‍त करने में इतनी सतर्कता बरतते हैं कि कहीं लांछनों के घेरे में ना आ जायें ? अंत में मेरा उन सब महानुभावों से, प्रगतिशीलों से यही विनम्र विनती है कि मरने की स्‍थितियों से जूझ रही स्‍त्री को बचाने के लिए सही घड़ी पर सर्तक हो जाइए। घड़ी चूक गई तो तय मानकर चलिए एक और स्‍त्री की जान गई....।
कनकलता के क्रांतिकारी भाषण से बैठे लोग स्‍तब्‍ध रह गए। यह कनकलता क्‍या बोल गई, इसके वक्‍तव्‍य का क्‍या अर्थ लगाया जाए, यही कि कनकलता के मन में पुर्नविवाह के लिए भी कहीं दबी इच्‍छा थी ? अथवा है ? लोग सोचने लगे, यह कनकलता नहीं, उसके भीतर से इक्‍कीसवीं सदी की आधुनिक नारी बोल रही थी ? भगवान स्‍वरूप शर्मा के मन में भी कनकलता की अंदरूनी भावनाओं को लेकर तमाम सवाल उभर रहे थे। जिनके उत्‍तर पाकर वे जिज्ञासाओं पर विराम लगा देना चाहते थे। उन्‍होंने रात नौ बजे के करीब कनकलता को फोन लगाया, ‘‘तुमने तो आज स्‍त्री मन के भेद का उद्‌घाटन कर क्रांतिकारी भाषण दे डाला....। बड़ी चर्चा है...।''
- ‘‘न जाने क्‍यों लोग स्‍त्री से अपेक्षा करते हैं कि वह देह की कारा से मुक्‍त होने की बात सोचे ही नहीं... ? अब आपसे क्‍या छिपाऊँ शर्मा जी..., पति के मर जाने से स्‍त्री का मन थोड़े ही हमेशा के लिए मर जाता है.....।'' और कनकलता ने फोन काट दिया। शर्मा की जिज्ञासाओं पर विराम लगने की बजाय रहस्‍य और गहरा गया लेकिन
उधर कनकलता खुद को अभिव्‍यक्‍त कर संपूर्ण संतुष्ट थी। बीस-इक्‍कीस साल के विधवा जीवन में आज जैसी संतुष्‍टि की अनुभूति उसे शायद पहली बार हो रही थी।

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लेखक परिचय:

पिता का नाम ः स्‍व. श्री नारायण प्रसाद भार्गव
जन्‍म दिनांक ः 15 अगस्‍त 1956
जन्‍म स्‍थान ः ग्राम अटलपुर, जिला-शिवपुरी (म. प्र.)
शिक्षा ः स्‍नात्‍कोत्तर (हिन्‍दी साहित्‍य)
रूचियां ः लेखन, पत्रकारिता, पर्यटन, पर्यावरण, वन्‍य जीवन तथा इतिहास एवं पुरातत्‍वीय विषयों के अध्‍ययन में विशेष रूचि।
प्रकाशन ः प्‍यास भर पानी (उपन्‍यास), मुक्‍त होती औरत, पहचाने हुए अजनबी, शपथ-पत्र एवं लौटते हुए (कहानी संग्रह), शहीद बालक (बाल उपन्‍यास) सोन चिरैया सफेद शेर, चीता, संगाई, शर्मिला भालू, जंगल के विचित्र जीव जंतु (वन्‍य जीवन) घट रहा है पानी(जल समस्‍या) इन पुस्‍तकों के अलावा हंस, समकालीन भारतीय साहित्‍य,वर्तमान साहित्‍य, प्रेरणा, संवेद, सेतु, कथाबिंब परिकथा, धर्मयुग, जनसत्ता, नवभारत टाइम्‍स, हिन्‍दुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, नईदुनियां, दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, राजस्‍थान पत्रिका, नवज्‍योति,पंजाब केसरी, दैनिक ट्रिब्‍यून, रांची एक्‍सप्रेस, नवभारत, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, कादम्‍बिनी, सरिता, मुक्‍ता, सुमन सौरभ, मेरी सहेली, मनोरमा, गृहशोभा, गृहलक्ष्‍मी, आदि पत्र पत्रिकाओं में अनेक लेख एवं कहानियां प्रकाशित।
संपादक -शब्‍दिता संवाद सेवा, शिवपुरी
दूरभाष ः 07492-232007 मोबा. 09425488224
संपर्क ः शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म. प्र.)

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

वफादार भइंसा

                  हम जानथन कि सबो जानवर म सबले चउतरा कोलिहा ल माने गे हावे । तभे तो चउतरा मनखे ल कोलिहा कस चउतरा हे कहिथे । जांगर म भइंसा ल कहे गे हावे काबर कि ओहर बहंगर होथे ते पाय के कभू-कभू मनखे ल भइंसा कस कमाथे फेर खाए नि जाने घलो कहि देथे । बिलई ल अशुभ मानथें ओला मारे म भारी पाप होथे कहिथें । कभू कारी बिलई ल देख डारबे त डर - डरावन लागथे । बिलई कभू डहर म ए पार ले ओ पार आर-काट कर दिस त काम नि होय कहिथे । गाय ल बड़ सिधवा माने गे हावे तभे कोनों मनखे के सुभाव ल देख के ओला गउ बरोबर सिधवा हे कहिथें । 
                 जानवर म छेरी के घलो अलगेच चिन्हारी होथे दिन भर लपर - लपर चरई अऊ नरियई ल देख के काकरो सुभाव ल कभू छेरिया कस लपर - लपर करथस कहि देथें । इही जानवर के डांड़ म कुकुर घलो के बड़का नांव हे , कुकुर के बेवहार अऊ सुभाव ले जनाथे कि ओहर गरीबहा लागथे कभू खाय बर नि पाय त लांघन परे रहिथे । संगे - संग स्वामी भक्त घलो होथे । मनखे मन कभू काम - बूता नि करे त ओला कुकुर कस किंजरत हावे कहि देथें ।
               चिराई-चिरगुन मन म घलो अइसनहे देखे जाथे घुघुवा के नरियाय ले अशुभ मानथें । काकरो छानही परवा म घुघुवा चिरई के नरियाय ले ओ घर म मनखे के हानि होथे सियान मन बतावंय । कउँआ कभू छानही म कांव - कांव नरियाइस त समझव घर म पहुना आय के सोर -संदेशा मिल जाथे । तइहा समें म परेंवा चिरई ल सोरिहा के रुप म देखे जावत रहिस । कागज म चिट्ठी लिख के ओकर घेंच म ओरमा देवंय तहं ले परेंवा ल उड़िया देवंय ओहर संदेशा पहुंचा देवंय । घर म मिट्ठु पोसें रहिथे ओला जइसन सिखोय -पढ़ोए रहिथें वइसन ओहर बोलथे । घर म कोनों आथें त ओमन ल राम-राम कहे बर नि छोड़े अऊ आव भगत करत देखे बर मिल जाथे ।
                कतको चिरई-चिरगुन मन शुभ अऊ अशुभ संकेत देवत रहिथें वइसनहे जानवर मन के घलो चिन्हारी करे गे हावे । जिनगी म ये जीव-जन्त मन समे-समे म काम आवत रहिथें ते पाय के चिरई - चिरगुन मन ल मनखे अपन तीर म पोंसे-पाले रहिथें ओमन के दाना - पानी के बेवस्था करथें । चिरई मन ल दाना - पानी देवई घलो बड़का पून के कारज आय ।
            हीरापुर गाँव म हिरउ नांव के एकझन किसान रहिस । ओला चिराई-चिरगुन अऊ गरुवा - भइंसा पोंसे के भारी सउंख रहिस । ओकर घर के कोठा गाय - गरुवा म भरे रहय । ओहर भइंसा घलो राखे रहय एकठन भूरवा अऊ दूसर ह करिया रंग के रहिस। दूनों भइंसा के हुलिया एके बरोबर रहिस सींग-सींघोट उमर म एकठन चार , दूसर छै दांत अऊ पूछी चंउरी रहिस । फेर एकठन भूरवा रंग के खातिर अलगेच दिखत रहिस। भूरवा भइंसा थोरिक फंकटहा रहिस अऊ करिया भइंसा जबर सिधवा रहय । 
           हिरउ दूनों भइंसा के नांव घलो धरे रहिस भूरवा भइंसा के नांव सोन अऊ करिया भइंसा के मणि रखे रहिस। सहिच म दूनों भइंसा हिरउ बर सोन अऊ मणि रहिन । हिरउ अऊ ओकर गोसाईंन मंगली सोन अऊ मणि दूनों ल भारी मया करे । संवारे पुचकारय समे म चराय ले जावय अऊ ओमन बर हरीयर - हरीयर कांदी लूके लाने। तरिया म पैरा धरके रगड़ - रगड़ के धोवय । हरियर कांदी ल खाके भइंसा मन के देहें चिक - चिकावत रहय । कोठा म पखरा के कोटना म पानी - पसिया , कोंढ़ा अऊ कूना बोर के खवावय। हिरउ के मया के कारन भइंसा मन घलो हिरउ ल भारी पतियावय। हिरउ कभू - कभार कुछू काम ले एको - दू दिन बर गाँव जावय त दूनों भइंसा मन उदास हो जावंय । हिरउ के गोसाईंन घलो मया करे फेर हिरउ के बिना ओमन ल सुन्ना लागे ।
               एक दिन करिया भइंसा आधा रात के घेंच म बंधाय गेरवा ल छटका के कोला - बारी कोती खुसर के नार - बियांर अऊ भाजी - पाला रहिस तेन ल चर दिस अऊ कुछू नि जानत हौं कहिके कलेचुप आके फेर कोठा म अपन जघा बइठगे । बिहनिया बेरा हिरउ के गोसाईंन मंगली बारी कोती गिस त देख के अब्बक होगे । सब नार - बियांर ल चर दे रहिस । हिरउ के गोसाईंन भइंसा के खूर अऊ ओकर गोबर ले चिन्हारी कर डारिस कि करिया भइंसा बारी के नार बियांर ल चर के खूंद - कचर डारे रहिस फेर करिया भइंसा कोठा म कलेचुप बइठे रहिस त ओला विश्वास घलो नि होवत रहिस कि करिया भइंसा ह चरे हावे ।
             एकदिन हिरउ भइंसा चरा के लूदिया तलाव म धोके घर लानत रहिस , करिया भइंसा आघू म रहे अऊ भूरवा भइंसा पाछू कोती दूनों धीरे - धीरे घर आइन घर के मुहाटी ले  नाहक के जइसे परसार म भइंसा  पहुंचिस त ओमेर हिरउ के लइका माड़ी म गोंगनिया करत खेलत रहिस । हिरउ के गोसाईंन रंधनी कुरिया म खुसरे रहिस । जइसे भइंसा के गोड़ के अवाज ल सुन के सकपकावत ए ! ' मोर लइका '.... चिल्लावत मंगली कहिस ! करिया भइंसा मंगली के अवाज ल ओरख दारिस अऊ तुरते उहीच मेर ठाड़ होगे एको पांव आघू नि बढ़ाइस । लइका खुंदाय बर बांच गिस अऊ जबर अलहन टरगे । जानवर मन मूक जरुर होथें फेर अपन के मालिक बर वफादार अऊ संवेदना घलो रहिथे।
              एक दिन भूरवा भइंसा बीमार पर गिस । करिया भइंसा ओला अपन जीभ म चाट के मया करत रहिस । काबर दूनों एके संग रहंय खाय -पीए अऊ चरे घलो एके संग एके जघा चरंय । दूनों एक दूसर ल भारी मया करंय । हिरउ बइद गुनिया अऊ डाक्टर ल देखाइस । इलाज करवाइस फेर भूरवा भइंसा अपन मुहूँ ल करिया भइंसा के कान म लेगिस अऊ जोर से नरियाइस अऊ अपन परान ल निकाल दिस। अइसे लागिस कि करिया भइंसा ल कुछू कहिस होही ।
              भूरवा भइंसा के मरे ले ओकर संगी करिया भइंसा के आँखी ले आंसू के धार थिरकत नि रहिस।चिरइ - चिरगुन मन म घलो भारी मया के संगे - संग संवेदना घलो रहिथे । हिरउ भूरवा भइंसा ल चार झन मिलके बोह के दूरिहा भांठा कोती लेगिन । समे गुजरत गिस थोरिक दिन के पाछू मंगली अपन गोसईंया ल कहिस...' करिया भइंसा एकेठन हावे एला बेच के आने भइंसा बिसा लेतेन '। ' ठीकेच कहत हावस तोर सलाव बने नीक लागत हावे '.....हिरउ कहिस !
             थोरिक दिन गुजरे के पाछू एकझन गरुवा - भइंसा के कोंचिया हिरऊ घर आइस अऊ मोल - भाव करके ओ करिया भइंसा ल बिसा डारिस । जब हिरउ कोठा ले भइंसा ल ढिले गिस त भइंसा जान डारिस कि मोला बेंच दिस । करिया भइंसा कोठा ले रोवत निकलिस काबर कि भूरवा भइंसा ओला मरे के बेर कहे रहिस होही कि हिरउ ल कभू झन छोड़बे । फेर ओकर तो वश के बात नि रहिस । मालिक हिरउ के घर अऊ गाँव छुटगे ए दुख म करिया भइंसा ल जबर पीरा होइस।
               ' करिया भइंसा के निकले ले कोठा सून्ना - सून्ना लागथे ' ... उदास मन ले हिरउ कहिस ! ' हव जी महूँ ल सून्ना लागथे '..... भरे गला ले मंगली कहिस ! ' शुक्रवार के भैसमा बजार भराथे एको दिन बजार चल दिहा अऊ भइंसा बिसा के लेके आहा '.....मंगली समझावत कहिस ! ' ले न का होही ए दारी के अवइया बजार म चल देहूँ ' ... धीरज धरावत हिरउ कहिस ! शुक्रवार के दिन आइस तहं ले...' संदूक के रुपिया ल निकाल के देतो बजार जाहूँ '....हिरउ कहिस । सबो रुपिया ल निकाल के दे दिस । ' बढ़िया सही भइंसा लेके आहा जी ' ....मंगली कहिस । ' तैं फिकिर झन कर भूरवा अऊ करिया भइंसा कस लेके आहूँ '.....हिरउ कहिस !
               तीर - तखार म कतको अकन मवेशी बजार लगथे जेमा भैसमा , हरदीबजार (कोरबा ), किरवई (रायपुर) , बेलरगाँव (धमतरी), उतई (दुर्ग), खैरा , डभरा  अऊ घोघरी ( सक्ती ) , बिर्रा, लखाली , खूंटीघाट , आरसमेटा अऊ बलौदा (जाँजगीर -चांपा) , गोंड़खाम्ही , तखतपुर (बिलासपुर) , दरमोहली (मरवाही) , झाबर (पेण्ड्रा) , लटोरी (सरगुजा) अऊ कतको जघा म मवेशी बजार लगथे । जेमा भैसमा बजार कोरबा जिला के सबसे बड़का अऊ नामी मवेशी बजार हावे ओहर शुक्रवार के लगथे । जेकर सोर दूरिहा - दूरिहा ले बगरे हावे। 
               हिरउ शुक्रवार के दिन भैसमा बजार गिस , बजार के छेदहा भांठा म गरुवा - भइंसा , छेरी - पठरु कुकरी - छेमरी के बजार लगे रहिस। हिरउ सबो रुपिया ल गठरी म बांध के कनिहा म कोंथियाय धरे रहिस । ओहा भइंसा के गोहंड़ा ल किंजर - किंजर के देखत जावत रहिस । अपन मन पसंद के छांटत - निमारत रहिस तइसनहे बेरा म ओ करिया भइंसा अपन के जून्ना मालिक हिरउ ल दूरिहा ले चिन्हारी कर डारिस । देखते - देखत ओहर दउंड़ के हिरऊ के तिर म आके ओला अपन अपन पूछी ल टांग के जीभ म चाटे लगिस । हिरउ ओला अपन हाथ म मुड़ी अऊ पीठ ल संवारे लागिस । ' मोला बिसा लेते अऊ अपन घर ले जाते '.... करिया भइंसा रोवत कहिस अइसे लागिस ! फेर भइंसा के भाखा अऊ इशारा ल हिरउ नि समझ पाइस होही।
              बिचारा करिया भइंसा ल लवठी म पीटत अऊ हांकत कोचिया लेगिस । फेर करिया भइंसा उदास होगिस। गोहंड़ा ले छांट के एक रास पड़वा हिरउ बिसा के घर लेके आइस । एकझन किसान समारु ल अंकड़ा भइंसा के जरूरत रहिस ओहर करिया भइंसा ल कोंचिया करा ले बिसा के अपन घर लेगिस। करिया भइंसा ल जोड़ी मिले बर मिल गिस फेर ओकर मन उहां नि लागत रहिस । भूरवा भइंसा के सुरता म ओहर रो दारे । करिया भइंसा ल उंहा खाय - पीए ल बढ़िया देवंय फेर ओकर मन खाय पीए कोती नि लागे भलुक हिरउ के घर सुरता आवय । एक दिन करिया भइंसा रात के गेरवा ल झटक के टोर दिस अऊ कोला कोती के डाहर ले भागत - भागत अपन जून्ना मालिक के घर आ गिस ।
             बिहनिया बेरा मंगली घर के फइरका उघारिस त ओहर अब्बक होगे करिया भइंसा मुहाटी म ठाढ़े रहय । मंगली भइंसा ल भीतर कोती आय बर इशारा करिस तभे ओहर भीतर खुसरिस अऊ कोठा म पखरा के कोटना म भराय पेज पसिया ल एक सांस म सर - सरउवन पी दारिस। अइसे लागत रहिस कि कतका दिन के खाय पीए बर नि पाय रहिस । अपन जून्ना घर म आके ओला बड़ सुग्घर लागिस फेर ओला एहू बात के डर सतावत रहिस कि ओकर नवा मालिक खोजत आही अऊ लेके जाही इही बात ओला संसो धर ले रहिस । जून्ना घर के मालिक अऊ मालकिन के मया दूलार अऊ भूरवा भइंसा के कहे गोठ ओला इंहा तक झिंक लाने रहिस।
             ' हमर करिया भइंसा आ गहे त ओला राख लेथन '..... मंगली कहिस ! ' ठीक कहत हस ले राख लेवत हन '......हिरउ कहिस ! ' ओकर मालिक आही त ओकर कीमत ल दे देबो '....मंगली समझावत कहिस ! ' ले ठीक हे पड़वा मन संग ओहू रहे रही '..... हिरउ कहिस ! पन्दराही के कटे ले ओकर मालिक समारु खोजत आ गिस । ' मोर करिया भइंसा ल लेके जाहूँ ' .... समारू कहिस ! ' अइसे कर समारु ओकर तैं कीमत लेले '....मंगलू कहिस ! ' मोर भइंसा अंकड़ा हावे ओकर जोड़ी बर तो बिसाय हौं '.....समारु कहिस ! ' ठीक बात हे लेजा तोर भइंसा ल '....हिरउ कहिस ! समारु भइंसा ले जाय के उदीम कर देखिस फेर भइंसा जाबेच नि करिस ।
              अपन मालिक के मया अऊ भूरवा भइंसा के सउंपे बात के खातिर करिया भइंसा ओ घर ल नि छोड़िस सहीच म ओहर मणि आय । जेकर चिन्हारी अंधियार म घलो हो जाथे काबर के ओहर रग - रग ले अँजोर दिखथे । जानवर घलो मन म संवेदना अऊ मानवता के गुन रहिथे । करिया भइंसा म ए गुन देखे बर मिलिस । जानवर घलो अपन मालिक बर वफादारी रहिथे अऊ जिनगी भर साथ देथें।

डोरेलाल कैवर्त " हरसिंगार "
      तिलकेजा, कोरबा (छ.ग.)


सोमवार, 15 सितंबर 2025

श्राद्व तर्पण

     प्रमदा ठाकुर  
 
   बहू बेटे और पोते की जिद़ के चलते जमुना प्रसाद को अपने पुरखों  की ख़ेती बाड़ी बड़े -बड़े घर दालान बाग बगीचे  छोड़ करशहर आना पड़ा.गर्मियों की छुट्टी में उनका लाड़ला पोता अभिनव के साथ मस्ती चुहल बाजी और मासूम बचपन का प्रभाव कुछ ऐसा  पड़ा कि  मूल ज्यादा  ब्याज़ प्यारा वाली कहावत भी चरितार्थ होने लगी.
    इकलौते बेटे हिमांशु  ने समझाया "बाबूजी अब अम्मां तो रही नहीं   भला हम आपको अकेले कैसे छोड़ दें? मैं कहां -कहां देखू़ं भला बतलाइए ,,आप चलेगे़ तो आपकी बहू भी अकेली नहीं रहेगी कम से कम बाहर टूर में जाते वक्त़ मैं तो निश्चितं होकर जा पाऊंगा. 
     पिता के मुख़ पर साकारात्मक भावों को पढ़ते हुए हिमांशु ने पुन: कहा- आपके साथ जाने से आपकी बहू को भी सेवा का अवसर  मिल जाएगा और फिर बिट्टू (अभिनव) तो आपसे कितना हिल गया  है उसे भी आपकी ज़रूरत है बाबूजी और फिर घर से बस दो कदम की दूरी पर है श्री राम जानकी मंदिर बस आपको वहां बहुत से हम उम्र मिल जाएगें आपको बोरियत भी नहीं होगी.
       हिमांशु की बात मेंना सिर्फ़  वज़न था बल्की पितृ मोह की व्याकुल ता भी झलक रही थी.फिर भी मन का तर्क वितर्क गांव के सहज, सरल वातावरण  से विलग होनेमें रूकावट भी पैदा कर रहा था. यहां तो एक लुंगी और गमछा में पूरे गांव की सैर हो जाती है वहां शहर में हिमांशु के स्टेस्ट का ख्याल तो रख़ना ही पड़ेगा, लेकिन गांव के ही दो चार यार दोस्तों की सलाह मशवरा के बाद वह शहर बैंगंलोर जाने तैय्यार हो गये.
     शहर आने के बाद जमुना प्रसाद जी का जीवन पहले से ज़्यादा व्यस्त हो गया,बहू संगीता के साथ घर गृहस्थी के छोटे-छोटे काम वे सुमित्रा के साथ भी किया करते अब संगीता के साज करने लगे. पूर्व में संगीता को कुछ संकोच और झिझक भी हुई  लेकिन  सास के साथ बहुत  स्वाभाविक रूप से करते देख़ उसने भी बाबूजी को व्यस्त और अलगाव का एहसास ना हो सो उसने भी इसे सहज़ स्वीकार कर लिया था.
   भिनसारे ही उठ कर कॉलोनी के सम वयस्को  के साथ मीलों  सैर को जाना,लौटते वक्त़ सड़कों  के किनारे बैठे गांव के लोगो ं से ताजी़ सब्जी़ भाजी ख़रीद लेना , आने के बाद योगासन फिर संगीता चाय बना लाती, स्नान कर पूजा पाठ करना नियमित दिनचर्या  बन गईं  थी,  संगीता का सबसे महत्वपूर्ण काम     ठाकुर जी का दरबार सम्हालना होता जो जमुना प्रसाद जी को हैण्ड ओव्हर हो गया था, वरना आधा घण्टा तो सुबह इसी में लग जाता था.
     सुबह अभिनव को उठाना ब्रश मंजन नहलाना धुलाना अब दादा जी के लाड़ प्यार के साथ  सम्पन्न होने लगा. इधर  संगीता का चाय नाश्ता,  रसोई बच्चे का टिफ़िन सब नियत समय पर सुचारू  रुप से होने लगा था, यह देख हिमांशु अब पूरी तरह से बहू ससुर की टीम से निश्चित  भी हो गया था.
     बहू संगीता भी जमुना प्रसाद  जी जैसा और जमुना प्रसाद  जी  संगीता जैसी बहू पा कर बेहद संतुष्ट और खुश थे. संगीता को अब अपने किसी किटी पार्टी अथवा लेडिज़ ग्रुप के प्रोग्राम  मे़ ना तो घर पर ताला लगाने। की नौबत आती ना ही अभिनव को साथ ले जाने की ज़हमत ही उठानी पड़ती. दादा पोते की टीम के कारण वह निश्चितं होकर बाहर जाती.
     इसी बीच क्वांर पितृ पक्ष आया, अभिंनव के लिए दादा जी का कुशा से जल तर्पण एक कौतूहल सा बन गया, छुट्टियो के दिन वह पूरे समय अपने दादा जी के साथ बना रहता. -कभी वह दादा जी की विडियो बनाता कभी फोटो खींचता और अगनित  प्रश्नों के ढे़र लगा देता. 
कभी पूछता *दादू आपने ऊंगली में क्या पहना है, कभी कहता पानी डालकर आप क्या बोलते है? मुझे समझ नहीं आता, बाद में ससुर बहू अभिनव के बाल सुलभ जिज्ञासा स काफी़ हंसते.
संगीता निश्चिंत रहती कि कुछ संस्कार  तो अभिनव आंख़ो से देख़ रहा है उसे अलग से शिक्षित करने की आवश्यकता  नहीं पड़ेगी.
       नवमी की तिथि आई सुमित्रा का श्राद्ध इसी तिथि में होना था.संगीता सभी तैय्यारियां बड़ी कुशलता व मनोयोग से करने में लगी रही सभी चींजे जो उसकी सास को पसंद थी, पूरी, कचोड़ी खीर रायता कढ़ी आदि जमुना प्रसाद भावुक हो उठे गांव में यह  सारी व्यवस्था  नौकरानी करती थी मग़र आज तो बहू के हाथों सुमित्रा को मिलेगा यह छप्पन भोग सीधे सुमित्रा  के पास स्वर्ग जाएगा.
     रसोई तैय्यार थी हवन तर्पण कर अब एक थाली कागराज के लिए भी  निकाली गईं, इस फ्लैट  में आंगन तो किस चिड़िया का
नाम है यहां के लोग क्या जाने फिर भी छोटी सी बालकनी में पाटा पर पानी का लोटा थाल रख़  हाथ जोड़े जमुना प्रसाद जी को बुदबुदाते देख़ कर अभिनव  का बाल सुलभ मन चंचल हो उठा *दादू आप यह थाली यहां क्यों लेकर  ख़ड़े है!?  दादा जी ने कहा बेटा यह थाली तेरी दादी  जो उस;;!ऊपर स्वर्ग में है ना उसके लिए है वह खाएगी अभिंनव ने फिर पूछा तो दादी  आएगी क्या  इसे खाने.  जमुना प्रसाद हंस  पड़े गाल थपथपा कर कहा -नहीं बेटा इसे कौव्वां खाएगा  तो दादी को मिल  जाएगा. दादी को भला कैसे मिल पाएगा ?और हम लोग नही खाएंगे क्या,?
     दादा जी ने कहा - हम लोग भी खाएगें पर पहले कौव्वा ं को खि़लाएगे़ फिर हम ;;!!!दादा जी की बात पुन:- पर उसे। क्यों;? मम्मा ने तो इसे हमारे लिए बनाया है ना;!! दादा जी ने कहा- बेटा जब इसे कौव्वाംखाएगा ना तभी वह  तेरी दादी के पेटംमें जाएगा समझ गया जमुना  प्रसाद  जी  अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा मन में बैचेनी यहां तो कौव्वा तो क्या चिड़िया भी पर नहीं मार रही थी, लेकिन अभिनव भी ठहरा कंम्पयूटर  युग का बच्चा  तीव्र दिमाग़ मा के पेट से सीख़ आ गया था. उसने कहा -अभिनव अब बालहठ पर स आया था - कौव्वा ं खाएगा तो दादी के पेट  में कैसे जाएगा ,बतलाइए.  जमुना प्रसाद बगले झांकने लगे  लेकिन उन्होंने  भी बाल यूं ही सफेद नहीं किये थे  बच्चे की कमजोर नस दबाई बोले - वैसे ही जैसे तुम यहां मोबाइल में बात करते हो तो तुम्हारे दोस्तों को कैसे सुनाई दे जाता है, अंय;!!? बस वैसे ही. अभिनव भी कहां  मनाने वाला था, बच्चों की मासूमयित पर विज्ञान हावी हो चुका था उसने झट- पर दादू वो तो टेक्नालॉजी  है  दादू ने उत्तर दिया -बेटा यह भी टेक्नालॉजी  है, इसे धार्मिक  आस्था का एप कहते हैं.चल चल अब बहुत देर हो  गई तेरी  दादी को भूख़ लगी होगी.
   इधर सुबह से दोपहर हो गई कौव्वे का दर्शन  ना होना था ना कोई आशा थी इस बीच थाली सबसे ऊपर छत पर रख़ कर जमुना प्रसाद दो बार सीढियां चढ़ कर  हांफ़ने लगे थे.
         संगीता बेचैन ससुर की मनस्थिति ताड़ चुकी थी, बोली- बाबूजी -चलिएംतीन बज रहा है देर सबेर पर कौव्वा आ जाएगा. जमुना प्रसाद जीംसोचने लगे*हां भई स्मार्ट सिटी है कौव्वा के पास भी टाईम की कमी होगी
      कुछ देर बाद कॉलोनी में घंटी की स्पेशल आवाज़ सुनाई देने लगी कांव कांव अभिनव उछल पड़ा -दादू कौव्वा आ गया कौव्वा ं आ गया. संगीता दौड़ कर छत से थाली ले आई .
    जमुना प्रसाद जी ने देख़ा एक ठेले में एक आदमी दो पिंजरा रखा हुआ था जिसमें तीन चार  कौव्वे कैद थे ,सभी बंगलों से थाली लेकर लोग निकलने लगे थे   ठेला वाला एक  निश्चित  स्थान  पर रुक गया, लोग अपनी अपनी थाली लेकर पिंजरे  के पास जाने लगे. ऊपर लिख़ा था काग भोज प्रति थाली ५०)रु पिंजरा वाला पुचकारते हुए अपनेംप्रशिक्षित कोव्वे को निकालता लोग थाली आगे  करते पहले से ही पेट भरे कोव्वैं फार्मलिटी निभाते चोंच से थोड़ा  बहुत खा कर पुन; पिंजरे में चले जाते.
    जमुना प्रसाद भौच्चकें रह गये; ":;;! हे! ईश्वर यह भी दिन देख़ना था.यहा़ पशु पक्षी संरक्षण  अधिनियम ';!!!!? लेकिन  उतनी गहराई से सोचने का वक्त़ नहीं था उन्होने थाली आगे खिसका दी पिंजरे वाले काംसपूत पिंजरा खोलना बंद करता और वह नोट गिनता रहा.जमुना प्रसाद जी आंखे़ बंद कर पत्नि को श्रद्धाजंली अर्पित करतेरहे.

    अमलेश्वर  रायपुर  छ,ग,

रविवार, 31 अगस्त 2025

अपने अपने अरण्य

नन्द भारद्वाज 
 
     हरे भरे पेडों और झाडियों से ढक़ी पहाडियों से घिरे इस विशाल जंगल के एक छोर पर बसी इस छोटी सी बस्ती में जब सवेरे की पहली बस आकर रुकती हैं, तो यहां के ठहरे हुए जीवन में जैसे एक हलचल सी आरंभ हो जाती हैं। बीती रात की अच्छी बारिश के बाद सवेरे तक जारी बूंदाबांदी अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी और भूरे-मटमैले बादलों की लगातार आवाजाही के बावजूद आसमान मौन था। हलकी सी आवाज के साथ बस के साथ आकर रुकते ही आसपास के ढाबों और थडियों से निकलकर लोग बस को घेरकर खडे हो गए थे।
     बस्ती के नाम पर यहां ज्यादातर तो नेशनल पार्क के लिए बनाए गए कुछ भवन और मकान हैं। उनके अलावा कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, डाकतार जैसे महकमों के भी छोटे-छोटे भवन और एक दो वन विभाग का गैस्ट हाउस, जिसमें ज्यादातर तो वन विभाग और सरकारी महकमों के अधिकारी आते हैं, कभी-कभार कुछ सैलानी भी आकर ठहर जाते हैं। थोडे बहुत कच्चे मकानों में आसपास के गांववासी है, जे पहले कभी इन्ही पहाडियों के बीच बसे गांवों में अपना गुजर बसर करते थे। बस्ती में एक प्राथमिक स्कूल है और डाकखाना भी है जो यहां के कर्मचारियों और निवासियों की सुविधा के लिए बनाया गया है। पार्क के मुख्यद्वार के आगे से होकर गुजरती इस खुली सडक़ का सिरा आगे जाकर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुडज़ाता है और दूसरा पास ही के जिला मुख्यालय से। सडक़ पर दिन भर वाहनों की आवा-जाही बनी रहती है। इस रूट पर चलने वाली ज्यादातर बसें और यात्री वाहन पार्क आने वाले सैलानियों से ही भरे होते है, जिन्हे इसी मुख्यद्वार पर लाकर उतार दिया जाता है और वापस लौटने वाले भी इसी द्वार के पास बने शेड के नीचे य सडक़ के पार बनी चाय की कच्ची थडियों और ढाबों के आसपास बैठकर वाहनों का इंतजार करते हैं।
     रुकी हुई बस के बीच वाले गेट से एक-एक कर उतरती सवारियों के बीच अपने ढीले-ढाले लिबास को संभाले जब मानसी ने सामने खडे लोगो की ओर नजर दौडाई, तो उसे मुस्कुरा कर हाथ हिलाते हुए रोहित दिख गए थे, उसने भी अभिवादन में अपना दाहिना हाथ ऊपर उठा दिया था और अगले ही क्षण वह बस से नीचे उतर आई थी। रोहित के साथ खडे वन कर्मी ने आगे बढक़र उसका सूटकेस और बैग अपने हाथों में संभाल लिया था और सामान लेकर वह रोहित से कुछ दूरी पर जाकर रुक गया था। बस से उतरकर मानसी सीधे रोहित के सामने आकर खडी हो गई थी – उसके मुस्कुराते चेहरे के पार कुछ और भी तलाश करती हुई सी। उसे अपनी ओर इस तरह देखते अनायास ही रोहित ने पूछ लिया था –
” कैसी हो मानसी?”
” जी कैसी हो सकती हूं आपके बगैर?” हल्की सी मुस्कराहट के साथ यकायक निकल आये इस सवालिया जवाब में जैसे उसने बहुत कुछ कह दिया था। सुनकर एक बार अचकचा गया था रोहित।
” मेरा मतलब है रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?” अपने को संभालते हुए उसने बात आगे बढाई।
” नहीं, तकलीफ कैसी ये तो पूरा रास्ता ही इतना खूबसूरत है और फिर सुबह ही बारिश ने तो इसे और भी खुशगवार बना दिया”
” इसलिए तो सैलानी ऐसे ही मौसम में यहां आना पसंद करते है। वैसे घर चलना पसंद करोगी या गैस्ट हाउस” उसके स्वर में शराारत थी या कुछ और, वह ठीक से पकड नही पाई। बस हल्की सी उदासी के साथ इतना ही कह पाई
” जैसा आप ठीक समझें।”
उसे लगा मानसी बुरा मान गई।
” ओ के बाबा, ऑय एम सॉरी! सामान घर ले चलो भैया।” उसने अपने से थोडी दूर पर खडे वनकर्मी को निर्देश दिया और वह दोनो पैदल ही घर की ओर चल दिए, जे ज्यादा दूर नहीं था।
     रोहित चालीस कै उम्र पार करता दरम्याना कर्दकाठी का हंसमुख सा इंसान था, जिसे वन अधिकारी के रूप में इस छोटी सी बस्ती के कर्मचारी और निवासी ही नहीं, जंगल के जानवर भी उतने लगाव से जानते थे। रास्ते में जो भी मिलता, उससे हंस कर दुआ-सलाम जरूर करता।
मानसी को यह देखकर अच्छा लगा कि उसका बंगला खूब खुला-खुला और साफ सुथरा था। घर के चारों तरफ हरी घास का लॉन और चहार दीवारी के पास ऊंचे-ऊंचे अशोक और मोरपंखी के पेड थे। अंदर के कमरों का एक बार मुआयना कर लेने के बाद वह हाथ-मुंह धोने बाथरूम में चली गई थी और रोहित उसका सामान लेकर बैडरूम में।       जब वे दोनो वापस बैठक में आये, तब तक रोहित का सेवक गोपाल चाय बनाकर ले आया था। हाथ-मुंह धो लेने से वह काफी तरो-ताजा महसूस कर रही थी। अभी कपडे नहीं बदले थे, अलबत्ता जूडे में बंधे हुए बालों को उसने अवश्य खोल दिया था। चाय का प्याला उठा कर पहला घूंट लेते हुए उसी ने बात शुरू की थी –
” और आप कैसे है?”
” बस जैसा हूं, तुम्हारे सामने हूं खुद ही जान लो” वह नहीं जान पाई कि वह वाकई खुश है ये उसी की तरह भीतर से उन्मन।
” और कौन लोग रहते है, यहां आपके आसपास?”
” बहुत लोग र्है पार्क का स्टाफ है, गांववासी है, गोपाल हैऔर तमाम तरह के जानवरो से भरा हुआ जंगल है”
     रोहित ने इसी तरह हास परिहास के माध्यम से माहौल को जैसे हल्का-फुल्का बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन मानसी, उसका यह उत्तर सुनकर भी जैसे और कुछ जानने की गरज से उसी के चेहरे की ओर देखती रही।
” बच्चे कैसे है?” थोडा संजीदा होते हुए रोहित ने पूछ लिया था।
” अच्छे है, लेकिन तुम्हे बहुत मिस करते है मैं उन्हे क्या समझाऊं रोहित? अब वह बडे हो रहे है क्या तुम्हे उनकी याद नहीं आती?” यही पूछते हुए मानसी यकायक उदास हो गई थी।
” आती क्यों नहीं मानसी। इसलिए तो पूछ रहा हूं।  अपने काम की कुछ मजबूरियां है आए दिन जंगल में जानवरों के मारे जाने की घटनाएं हो रही है जिनकी वजह से यहां का काम बढ ग़या है लेकिन उम्मीद है जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा। और कैसी चल रही है उनकी पढाई वगैरह?”
” वैसे तो ठीक ही चल रही है बस तुम्हारे लिए जब पूछने लगते है, तो समझाना मुश्किल हो जाता है फिर कोशिश करती हूं” बोलते-बोलते वह अचानक रुक गई थी। उसे लगा कि वह इस तरह ज्यादा देर तक सहज रह कर बात नहीं कर पायेगी।
” खैर चिन्ता की कोई बात नहीं, मैं खुद जल्दी ही आऊंगा बच्चों के पास।” वह बात को समेटते हुए जैसे उठने की तैयारी में था।
” तो अभी वापसी में मेरे साथ नहीं चलेंगे?” पूछते हुए थोडी रुंआसी सी हो आई थी मानसी, लेकिन फिर तुरंत अपने आप को संभाल लिया।
” देखता हूं बात करनी होगी हेड ऑफिस से।” इतना कहते हुए रोहित अपनी जगह से उठ गए थे।
      मानसी रोहित के व्यवहार में आए इस ठण्डे बदलाव से थोडी और चिन्तित हो उठी। उसे लगा कि रोहित के मन में पिछली बातों का तनाव अभी भी बना हुआ है। वह खुद अपनी उलझनों से बहुत संतप्त रहती आई है और वह नहीं चाहती कि उसका कोई अपना उसी की तरह आत्म-संताप से पीडित रहे। अनिकेत ठीक ही कहते है, कई बार आवेश के क्षणों में हम अपना संतुलन खो बैठते है, जीवन के छोटे-छोटे संदेह हमारे समूचे जीवन विवेक और अनुभव पर भारी पड ज़ाते है और जब तक हमें इस बात का एहसास हो पाता है, हम अपने समय और संबंधों का पर्याप्त नुकसान कर चुके होते है। अपने पत्रों में वह बार-बार रोहित को यहीं समझाने की कोशिश करती रही कि उनके बीच की उलझनों का असर बच्चों पर न पडे, लेकिन यह सब अकेले उसके हाथ में तो नहीं। अपने पिछले पत्र में तो जैसे उसने समूचे प्राण ही उडेल दिये थे, उसके बावजूद जब रोहित घर नहीं लौटा और न ही उसका कोई जवाब आया, तो उसे लगा कि वह उसे खो देगी। उसे खुद से ज्यादा अपने बच्चों की फ्रिक थी, जो अपने पिता को बेहद प्यार करते थे और जिन्हे उनकी सख्त जरूरत थी। इस दौरान अनिकेत जब भी मिले, उसे यहीं सलाह देते रहे कि वह फौरन रोहित से खुद जाकर बात करें, पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे माध्यम के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती, चाहे वह कितना ही अजीज़ और आदरणीय क्यों न हो। अगर अनिकेत ने इतना आग्रह न किया होता तो शायद आज वह यहां न होती और न ही रोहित के स्वभाव में आ रहे इस बदलाव को जान पाती।
” तुम चाहो तो थोडी देर आराम कर लो, मैं तब तक ऑफिस का कुछ जरूरी काम निपटा कर आता हूं। दोपहर का खाना हम साथ खायेगे। और अगर कुछ नाश्ता करना हो तो गोपाल को बता देना, वह बना देगा।”
      यह कहते हुए रोहित बाहरी दरवाजे की ओर बढ ग़ए थे और वह उसी तरह अपनी जगह पर बैठी उसका जाना देखती रही। उसकी चाय कबकी खत्म हो गई थी, लेकिन खाली प्याला अब भी उसके हाथों में मौजूद था। वह उसी तरह सोच में डूबी रही। कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पास खडा उससे कुछ पूछ रहा है। जब वह अपनी संज्ञा में लौटी तो सामने गोपाल खडा था और उससे खाली कप मांगते हुए पूछ रहा था –
” थोडी और चाय बना दूं मेम साब।”
” नहीं गोपाल, बस रहने दो।”
” जी मेमसाब।” छोटा सा उत्तर देकर उसने मानसी के हाथ से खाली प्याला थाम लिया और टेबल पर रखे बाकी बर्तन समेटने लगा। मानसी ने देखा, वह एक बीसेक साल का मासूम स लडक़ा था, जवानी की दहलीज पर कदम रखता हुआ सा।
” यहीं रहते हो, साहब के साथ?” उसने यूं ही पूछ लिया था।
” नहीं मेमसाब, पास में ही क्वाटर है, वहीं मां के साथ रहता हूं।”
” और कौन-कौन है घर में।”
” बस मां है और दो छोटी-छोटी बहनें।” इतना बताकर वह चुप हो गया था।
” और पिताजी?”
” वो नहीं हैंदो साल पहले इसी जंगल में एक हादसे का शिकार हो गए थे। उनकी खाली जगह पर साहब ने मुझे रख लिया है।” यह सब बताते हुए थोडा उदास हो गया था गोपाल।
” ओह आय एम सॉरी गोपाल।” उसे सांत्वना देती हुई वह भी जैसे उसी के दुख में डूब गयी थी। गोपाल ने सारे बर्तन उठाकर ट्रे में रख लिए थे।
” अच्छा गोपाल, ये बर्तन रसोई में रखकर तुम अभी घर चले जाओ, मैं थोडी देर आराम करूंगी। चाहो तो दोपहर में खाने से पहले लौट आना।”
” जी, अच्छा मेमसाब।” छोटा सा उत्तर देकर वह रसोई की ओर लौट गया।
      गोपाल के चले जाने के बाद मानसी ने नहाकर अपने कपडे बदले और थकान दूर करने के लिए कुछ देर बाद वहीं सोफे पर लेट गई। उसे भीतर कहीं लग रहा था उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है – उसका गंतव्य अभी और आगे है। वह कब बेसुध होकर अपने गुजरे दिनों की ओर लौट गई, उसे कुछ सुध न रही।
      अनिकेत के साथ उसकी अंतरंगता की एक अलग ही पृष्ठभूमि है। उसे मित्रता के सामान्य मापदण्डों से समझ पाना आसान नहीं है। खुद अनिकेत को उसके अपने घर-परिवार वाले भी कम ही समझ पाते है, पत्नी भी कई तरह की आशंकाओ से घिरी रहती है, लेकिन अनिकेत अपनी निजी जिंदगी के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करते। मानसी जो भी थोडा बहुत उनके बारे में जान पाई, वह इधर-उधर से टुकडों-टुकडों में प्राप्त हुई जानकारियां थी, लेकिन अनिकेत से इस मसले पर बात करने की जब भी कोशिश की, वे टाल जाते थे। बेशक वे भिन्न स्तरों पर एक दूसरे की रूचियों और रचनात्मक उपलब्धियों से प्रभावित होकर ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए हो, लेकिन पारिवारिक व्यक्ति के रूप में अनिकेत की अपने घर के प्रति जबावदेही और साफगोई ने उन तमाम आकर्षणों को वक्त आने पर इस तरह छांट-तराश दिया कि खुद मानसी को ही अपने व्यक्तित्व में एक अलग तरह की परिपक्वता और परिवर्तन महसूस होने लगा। अनिकेत का सारा लगाव इस बात पर टिका हुआ था कि मानसी की रचनाशीलता में उसे एक अलग तरह ही ताजगी और तडप दिखाई दी थी। उसकी दूधिया कविताओं और कैनवस पर उभरते अमूर्त आकारों में जो मौलिकता और संभावनाए उसे दीख रही थी, वह उसका सही विकास और विस्तार देखना चाहता था।
मानसी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का श्रेय अनिकेत को ही देती है कि रोहित के साथ उसका रिश्ता और पारिवारिक जीवन उसी के आग्रह और प्रयत्न का प्रतिफल है। उस बात को उसके परिवार वाले मानते है। रोहित से अनिकेत की यह रिश्ता तय होने से पहले कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी, लेकिन उसके बारे में अनिकेत ने इतनी जानकारी अवश्य प्राप्त कर ली थी कि वह एक संजीदा और संवेदनशील युवक है। उसका वानिकी सेवा में चयन भी निश्चित हो चुका था और उसे वह मानसी के लिए हर तरह से उपयुक्त जीवनसाथी लगा था। मानसी के प्रति भी उसे यह विश्वास जरूर था कि वह जिसे भी अपनाएगी उसे अपने आत्मिक लगाव और उसके जीवन में अपनी अथक साझेदारी से उसे संवार लेगी।
      जिन दिनों वह अनिकेत से मिली थी, वे उसके जीवन के सबसे कठिन दिन थे। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस गौरव को उसने जवानी की दहलीज पर कदम रखने से लेकर अगले चार साल तक जी-जान से प्यार किया, जिसके लिए अपने घर-परिवार वालों की सारी नाराजगियां सही, अपने शुभचिन्तकों की हर सलाह की अनदेखी की और जिसके लिए वह हर मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार थी, वहीं गौरव वक्त आने पर बाहरी दबावों के आगे झुक गया और बिना बताए इस तरह उसे मंझधार में छोडक़र भाग खडा हुआ जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो। उसे तो एकबारगी सारे रिश्ते-नातों पर से जैसे आस्था ही उठ गई थी, यहां तक की खुद अपनी जिंदगी से भी जैसे कोई मोह नहीं रह गया था। वे तमाम सराही जाने वाली रचनाएं और कैनवस पर उभरती आकृतियां उसी टूटन को ही तो व्यक्त कर रही थी। उस वक्त यह अनिकेत ही तो थे, जिन्होने उसे मानसिक यंत्रणा और टूटन के बीच और बिखरने से रोक लिया था। ऐसे ही कठिन दौर में अनिकेत उसकी जिंदगी में एक सच्चे दोस्त की तरह आये और आत्मीय संरक्षक की तरह उसे उस मानसिक ऊहापोह और मंझधार से बाहर ले आए। उन्ही ने उसके अंत:करण में यह बात बिठाई कि किसी एक बुरे अनुभव से अपनी अनमोल और संभावनाओं से भरी हुई जिंदगी को बेवजह सजा देना खुद अपने साथ भी अन्याय करना है।
      अनिकेत के इतने लगाव से समझाने का मानसी पर यह अनुकूल असर अवश्य पडा कि वह थोडे ही दिनों में गौरव की बेवफाई के बुरे अनुभव से बाहर निकल आई। उसने अपनी बकाया पढाई पूरी की। अपनी रुचियों के कामों को और दिलचस्पी से करने लगी। जब वह पी एच डी कर रही थी, उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित वार्षिक कला-प्रदर्शनी में उसकी भी चार कलाकृतियां प्रदेश के बडे क़लाकारों के साथ प्रदर्शन के लिए चयनित कर ली गई थी – इससे वह बहुत उत्साहित थी। उसी कला-प्रदर्शनी से जुडी एक विचार-गोष्ठी में अनिकेत ने जिस तरह प्रदर्शित विभिन्न कला कृतियों की बारीक व्याख्या की, जिसमें मानसी की कला-कृतियों का विशेष उल्लेख था, उसे सुनकर वह बहुत देर तक अभिभूत रही। पहली बार किसी ने उसके काम को सार्वजनिक रूप से इस तरह सराहा था। वह मन ही मन में अनिकेत के प्रति कृतज्ञता और लगाव से भर उठी थी।
      संयोग से उन्ही दिनों मानसी के घर में उसके रिश्ते की भी बात चल रही थी, लेकिन मानसी अभी शादी न करने की जिद पर अडी हुई थी। उसने गौरव को तो मन से निकाल दिया था, लेकिन वह नये रिश्ते के लिए भी अपने को तैयार नहीं कर पा रही थी। उधर लडक़े वाले जल्दी फैसला करने के बारे में तकाजा कर रहे थे। मानसी के मां-बाप की दुविधा बढती जा रही थी। उन्ही दिनों अनिकेत भी दो-एक बार बहुत आग्रह करने पर मानसी का काम देखने उसके घर भी आ चुके थे, यों वे मानसी के पिता को पहले से ही जानते थे और मानसी के पिता भी इस बात को जानते थे कि मानसी अनिकेत का बहुत आदर करती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होने पिछली मुलाकात के दौरान अकेले में अनिकेत से यह अपेक्षा अवश्य की थी कि वे मानसी को एक अच्छे रिश्ते के लिए मनाने में उनकी मदद करें। अनिकेत ने उन्हे आश्वस्त किया था कि वे कोशिश करेंगे।
      उस दिन आर्ट गैलरी के पास बने रेस्तरां में चाय पीते हुए अनिकेत ने बहुत अपनेपन से मानसी से उस रिश्ते के बारे में बात की तो पहले तो वह यहीं कह कर टालती रही कि वह अपनी पढाई पूरी करना चाहती है, लेकिन जब अनिकेत ने ज्यादा जोर दिया तो वह अपनी इच्छा और मनोभावों को दबा कर नहीं रख सकी। उसने दबे स्वर में यह बता दिया कि वह तो उन्ही को पसंद करती है। उसकी यह अप्रत्याशित बात सुनकर वह एकाएक गंभीर हो गया था। वह गौरव के साथ मानसी के बुरे अनुभव से परिचित था और वह नहीं चाहता था कि वह फिर से किसी तनाव का शिकार हो, इसलिए अनिकेत ने बहुत आत्मीयता और संजीदगी से समझाया कि वह जो सोचती है, वह असंभव है। यह अनिकेत की इतनी आत्मीयता और धैर्य से समझाने का ही परिणाम था कि मानसी ने उसी दिन घर पहुंच कर रोहित से अपनी शादी का रिश्ता कुबूल कर लिया। अनिकेत अपनी व्यस्तताओं के कारण मानसी और रोहित की शादी में तो शरीक नहीं हो पाया, लेकिन शादी से कुछ दिन पहले, जब मानसी उसे शादी का कार्ड देने आई थी तो उसने उसे यह आगाह अवश्य कर दिया था कि अब उसे अपने पारिवारिक रिश्तों, स्कूल कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्तियों और अपनी रुचियों से जुडे उन तमाम संपर्को और संबधों के बारे में नये सिरे से सोचना और व्यवहार करना होगा, उन्हें अपने पारिवारिक सुख और पति-पत्नी के अंतरंग रिश्तों की रोशनी में नये सिरे से जांचना-परखना होगा कि वे किस तरह उनके पारिवारिक जीवन को ऊष्मा और गति प्रदान कर सकते है।
      मानसी ने अब अपना एक मानस बना लिया था और वह अपने मनोभावों की कोई और परीक्षा नहीं चाहती थी। उसने शादी में आने के लिए अनिकेत से बहुत आग्रह भी नहीं किया। इस आखिरी मुलाकात के बाद अगले सात सालों तक उनके बीच कोई सम्पर्क नहीं रहा। मानसी अपने पारिवारिक जीवन में रम गई थी और अनिकेत उसी विश्वविद्यालय में पढाते हुए अब रीडर हो गए थे। इसी बीच उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुकी थी। पत्रिकाओं में भी उनकी कहानियां और लेख आदि छपते रहते थे। उन्ही दिनों एक पत्रिका में छपी कहानी पर उन्हे अपनी डाक में एक छोटे से पत्र के रूप में मानसी की प्रतिक्रिया मिली और उसी से यह जानकारी भी वह उन्ही के पास के एक शहर में रोहित का तबादला होने के कारण आ चुकी है। उसने यह भी आग्रह किया था कि वे जब भी कभी उनके शहर में आएं, उनसे मिले बिना न जाएं। रोहित को भी उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगेगा और इस तरह एक अन्तराल के बाद आत्मीयता का वह सूत्र फिर से जुड ग़या।
      यह जुडा हुआ संपर्क कब रोहित य उनके प्रियजनों के मन में संदेह और परेशानी का कारण बन सकता है, उन्हे कभी इसका ख्याल ही नही आया। और इसी प्रसंग को लेकर न जाने कैसे उन दोनो के बीच एक अनावश्यक से विवाद ने ऐस तूल पकड लिया था कि वे एक दूसरे से खफा होकर अलग-अलग जा बैठे। वन-विभाग की नौकरी में हालांकि पति-पत्नी का साथ-साथ रह पाना एक संयोग ही माना जाता है, और साल भर पहले जब इस नेशनल पार्क में रोहित का तबादला हुआ, तो उसके पीछे कोई विशेष कारण नहीं था, लेकिन मानसी ने उसे इसी रूप में ग्रहण किया कि रोहित ने उससे नाराज हो कर ही अपना यह तबादला परिवार से दूर रहने के लिए इस जंगल में करवाया है, जहां वह और बच्चे आकर न रह सकें।
     झब अनिकेत ने मानसी से बहुत आग्रह करके पूछा तब उसने बताया कि रोहित और उसके बीच अनबन का कारण उन्ही के बीच का पर्त्रव्यवहार है, जो उन दिनों बिल्कुल रुक गया था। अनिकेत को भी यह जानकर बहुत दु:ख हुआ, बल्कि अपने पर ही यह झुंझलाहट हुई कि उसे इस तरह पति-पत्नी के बीच दुबारा नहीं आना चाहिए था। उसने मानसी को ही समझाने का प्रयास किया कि वह अपने मन में रोहित के प्रति कोई नाराजगी न रखे और जितना जल्दी हो सके स्वयं उसके पास जाकर तमाम गलतफहमियां दूर करें। अनिकेत को सबसे बडा आश्चर्य इस बात का था कि मानसी जैसी संवेदनशील और टूट कर प्रेम करने वाली स्त्री से कोई कैसे रूठ कर रह सकता है? अनिकेत के आग्रह पर मानसी ने पहले तो दो पत्रों में धैर्य से अपने और अनिकेत के निर्मल रिश्ते की उसे खुलासा जानकारी दी और उसी के साथ उसकी गैर मौजूदगी के कारण घर में उसे और बच्चों को होने वाली कठिनाइयों और मानसिक पीडा का विस्तार से जिक्र किया। उन दोनो पत्रों के बाद भी रोहित का कोई उत्तर नहीं आया तो मानसी चिन्तित हो उठी। वह पढी-लिखी और समर्थ र्थी अपनी और बच्चों की आवश्यकताओं के लिए वह किसी पर निर्भर नहीं थी, आजकल वह खुद एक एडवर्टाईजिंग एजेन्सी में आर्ट डाईरेक्टर थी। इससे पहले रोहित की नौकरी और बच्चों के कारण ही उसने अब तक किसी शहर में स्थाई रूप से बसने के बारे में सोचा नहीं था, रोहित के तबादले के साथ वे जहां भी जाते, मानसी थोडे समय में उस शहर में अपनी रुचि का काम ढूंढ लेती थी, इससे उसका अपना मन भी लगा रहता और पारिवारिक कामों में भी मदद रहती। जब तीन महीने गुजर जाने के बाद भी न रोहित घर आया और नही कोई जवाब आया, तो मानसी का चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था। उसने तुरन्त पत्र लिखकर मायके से मां को बुलवा लिया और उसे घर और बच्चों की जिम्मेदारियां सौंपकर वह खुद रोहित के सामने आ खडी हुई।
      रोहित के साथ दिन भर की जंगल यात्रा में मानसी ने उसके मन को कई तरह से टटोलने की कोशिश की – यह जानने के लिए कि कहीं कोई आशंका या सवाल अब भी उसके मन में बचा हुआ तो नहीं है। जो कुछ वह अपने पत्रों में बयान कर चुकी थी, क्या उसे फिर से दोहराने या उसे और खोलकर समझाने की आवश्यकता शेष रह गई है? जो खुलापन और अन्तरंगता वैवाहिक जीवन के दस वर्षों में उनके बीच बनी रही, वह किसी काल्पनिक आशंका य संदेह-मात्र से बोधित कैसे हो सकती है? क्या उनके रिश्ते की बुनियाद इतनी कमजोर है?
      वे दोनो अपने-आप में खोये हुए सोफे के दो छोरों पर बैठ कर शाम की चाय पी रहे थे। बैठक की खिडक़ी के बाहर कहीं दूर से वन्य-प्राणियों और पक्षियों की आवाजे अनायास ही मानसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। यों सुबह की छोटी सी बातचीत और दोपहर बाद रोहित के साथ जंगल की यात्रा के बाद दोनो के बीच तनाव का कोई चिन्ह नहीं दिख रहा था – खुद रोहित भी जंगल में घूमते हुए बहुत उत्साह से उसे अभयारण्य की खूबियों के बारे में विस्तार से बताते जा रहे थे। उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि वह अलग अलग प्राणियों की आदतों और गतिविधियों के बारे में कितना-कुछ जानता है, यहां तक कि कुछ प्राणियों की आवाजों और उनकी हरकतों को इतनी खूबी से पहचानता है कि देखकर ताज्जुब होता है। जंगल में घूमते हुए वह किस तरह वायरलैस के जरिए समूचे जंगल में फैले वन-कर्मियों के काम पर अपनी पकड रखता है, किस समय कौन सा बडा वन्य-प्राणी किस इलाके में घूम रहा है, वह हर पल इसकी पूरी खबर रखता है। वह रोहित की इस कार्यशैली और क्षमता पर मन ही मन रीझ रही थी, लेकिन एक सवाल अब भी उसके मन में कायम था कि सब कुछ की उतनी खबर रखने वाला और सब के साथ इतना खुला व्यवहार करने वाला यह शख्स अपने ही घर परिवार और अन्तरंग रिश्तों के प्रति इतना शंकालु क्यों है? जंगल-यात्रा के दौरान जीप में एक अन्य वनकर्मी के साथ होने के कारण वे ज्यादा निजी बातें तो नहीं कर सके, लेकिन पूरी यात्रा के दौरान मानसी ने यह जरूर महसूस किया कि उसके मन में वह पहले वाला संशय और तनाव नहीं दिख रहा था, लेकिन सुबह से लेकर अब तक उसे यह भी लग रहा था कि रोहित उससे खुलकर बात नहीं कर रहा था, और तो और वह ऐसा भी कुछ जाहिर नहीं कर रहा था जिससे यह अनुमान हो कि उसके मन में अभी भी मानसी के प्रति किसी तरह का संशय या संदेह बना हुआ है। जंगल में झरने के पास थोडा एकान्त मिलने पर मानसी ने जब सीधे अपने पत्रों के बारे में पूछा तो तुरन्त उसने यह कहते हुए बात को संक्षेप में समेट दिया कि वह सब उसका बेकार का वहम था, जो वह कब का भूल चुका है।
” तो फिर क्या बात है रोहित?” पूछते हुए अधीर सी हो उठी थी, मानसी, लेकिन रोहित तब भी शान्त था। उसने चारो ओर नजर दौडाते हुए घडी क़ी ओर देखा और इतना ही कहा था – ”हम इस पर तसल्लीसे बात करेंगे मानसी।” और यह कहते हुए वे वहीं से वापस लौट पडे थे।
      मानसी ने चाय का आखिरी घूंट लेकर प्याला वहीं सामने टेबल पर रख दिया और अपनी जगह से उठ कर वह पिछवाडे क़ी खुलने वाली खिडक़ी पर पहुंच गई थी। यहां से पश्चिम का आकाश साफ दिखता था। सूरज अब डूब चुका था, लेकिन रौशनदान से भीतर आने वाले उजास का असर बैठक में अब भी बरकरार था, इसलिए बत्ती अभी नहीं जलाई गई थी। थोडी और रोशनी के लिए मानसी ने खिडक़ी का पर्दा जब हटा दिया तो उसकी नजरें खिडक़ी के पार दीखते खुले आसमान पर टिक गई। वह देर तक खोई हुई सी उस खुले आसमान के टुकडे पर उडते हुए पक्षियों का आना-जाना देखती रही।
      रोहित न जाने कब अपनी सीट से उठकर उसके पीछे आ खडा हुआ था, इसका आभास उसे तभी हुआ, जब उसे अपनी पीठ और कंधों पर बढता दबाव और अपनी बगल से निकल आए दो आत्मीय हाथों का स्पर्श उसी दृश्य की ओर बहा ले जाता हुआ स प्रतीत हुआ – वह एकाएक उस स्पर्श और दबाव में बेसुध होकर रह गई। उसने उन हाथों की कलाइयों को अपने हाथों में बांध लिया। उसे अपने दाएं कान और गाल पर रोहित की गर्म सांसो की मिठास और भी बेसुध किए दे रही थी। वह समय, स्थान और अपनी अवस्था की सारी संज्ञाएं भूल गई थी और उसकी पलकें अपने आप मुंद गई थी। जाने कितनी देर वे इसी अवस्था में बेसुध से खडे रहे और जब संज्ञा में लौटे तो सामने का दृश्य बदल चुका था। बाहर उसी खुले आसमान पर अब असंख्य तारे निकल आये थे और बैठक की हर चीज अंधेरे में डूब चुकी थी। रोहित के इस पार्श्व आलिंगन से मुक्त होते ही ज्यों ही मानसी बत्ती जलाने के लिए पीछे की ओर घूमी, रोहित ने फिर उसे पाकर अपने गहरे आलिंगन में बांध लिया।
  
***
      उस रात रोहित ने बिना कोई अतिरिक्त वास्ता दिए मानसी के सारे गिले शिकवे दूर करने और अपने व्यवहार का परिमार्जन करने के लिहाज से जब उसके सामने अपने अतीत के उन पृष्ठों को खोला, जिनके बारे में मानसी कुछ नहीं जानती थी, उसे लगा कि रोहित के मार्मिक अनुभवों और मानसिक उलझनों के सामने उसके अपने किशोर अनुभव और उलझनें तो जैसे कुछ भी नहीं है। रोहित ने गहरे सोच विचार के बाद जैसे उसे यह सब कुछ बताने का मानस बनाया था और जब उसने बोलना शुरु किया तो वह अवाक सी उसके चेहरे की ओर देखती रह गई थी –
” मानसी, मुझे इस बात का अफसोस है कि मैने पिछले दिनों में अपने अजीब व्यवहार से तुम्हारा दिल दुखाया है तुमने इन सालों में व्यत्तिगत रूप से और अपने पत्रों के माध्यम से भी कई बार अपना मन खोल कर मेरे सामने रखा है और तुम्हे हर बार ऐसा लगता रहा होगा कि जैसे मैं तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा हूं वास्तव में यह ऐसा नहीं था मानसी, मेरी अपनी दुविधाएं बहुत अलग तरह की रही है और मैं कभी इतना साहस नहीं जुटा पाया कि उन्हें तुम्हारे साथ शेयर कर सकूं मैं तुम्हारे जितना खुला और बेलाग व्यक्ति नहीं हूं मानसीमैं अपनी कमजोरियां और सीमाएं अब जानने लगा हूं, शायद तुम्हारे इसी खुलेपन ने आज मुझे इतनी हिम्मत दी है कि मै तुम्हारे सामने अपना उलझा हुआ अतीत और अन्त:करण खोल कर रख सकूं मैं कलाकार नहीं हूं और शायद मेरे पास बयान करने के लिए अच्छी भाषा भी नहीं है, लेकिन मैं यह उम्मीद करूंगा मानसी, कि तुम मुझे गलत नहीं समझोगी और इस बात का भी बुरा नहीं मानोगी कि वैवाहिक जीवन के दस साल बाद मैं इस रूप में तुम्हारे सामने खुल रहा हूं”
      और इस कैफियत के साथ कुछ क्षण मौन रहते हुए जब पहली बार मानसी के सामने उसने यह रहस्योद्धाटन किया कि वह इस शादी से पहले किसी और को अपना जीवनसाथी बनाने का इच्छुक रहा है, और उसको लेकर उसके जीवन में कई सालों तक भारी उथल-पुथल रही है तो उसे लगा कि जैसे इस रोहित से तो वह पहली बार मिल रही है। वह बिना एक शब्द बोले एकटक उसकी ओर देखती रही और सांस रोके उसे सुनती रही –
     रोहित बता रहे थे कि वह अपने कॉलेज के दिनों में शालिनी नाम की लडक़ी से बेहद प्यार करते थे, जिससे विवाह न कर पाने का अफसोस उसे बरसो तक भीतर से कचोटता रहा। वह खूबसूरत और समझदार थी लेकिन गरीब थी। अपने घर में वह बहुत उपेक्षा और बुरे अनुभवों के बीच से गुजर कर बडी हुई थी। वह बडी मुश्किल से कॉलेज में दाखिला ले पाई थी – वह किसी तरह पढ लिख कर उस नर्क से बाहर निकल आना चाहती थी और उसी में वह उसकी मदद चाहती थी। उसके शराबी पिता ने पैसा लेकर उसका रिश्ता अपनी ही बिरादरी के एक ऐसे व्यक्ति से तय कर दिया था, जिससे उसका कोई मेल नहीं था, लेकिन वह उसके उसके झगडालू घरवालों के कारण शालिनी की कोई मदद नहीं कर पाया। शालिनी की मर्जी के खिलाफ उसकी पढाई बीच में ही छुडवाकर उसकी शादी उस दूज वर से कर दी गई, जिसकी पहली बीवी मर चुकी थी। शालिनी उससे बचने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार थी, उसने कई बार रोहित से मदद के लिए आग्रह किया लेकिन वह कभी उतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया। शादी के बाद शालिनी के साथ उसके घरवालों और उसके पति का बर्ताव और बुरा होता गया और वह भी उसी के कारण। उसका अपराधबोध और भी बढता गया। इसी दुख के कारण बहुत अर्से तक उसने अपने घरवालों को उसके लिए आने वाले किसी रिश्ते के लिए अपनी सहमति नहीं दी। आखिरकार जब शालिनी को जब इस बात का पता चला कि वह उसी के कारण शादी नहीं कर पा रहा है, तो उसे भी अफसोस हुआ। वह तब भी कहीं भीतर उससे लगाव महसूस करती थी। आखिर उसी के कहने समझाने पर उसने मानसी का रिश्ता मंजूर किया था और उसने उस दूजवर के साथ जीवन बिताने को अपनी नियति मान लिया था। वह आज भी उनके परिवार की उतनी ही शुभचिन्तक है, लेकिन वह कहीं पति पत्नी के बीच गलतफहमी का कारण न बन जाए, इसलिए उनकी शादी के बाद उसने कभी संपर्क बनाए रखने की कोशिश नही की।
     उसकी शादी हो जाने के बाद शालिनी के पति का बर्ताव उसके प्रति और बिगडता ही गया, उसने उसपर कई तरह के उल्टे सीधे लांछन लगाए लेकिन शालिनी ने सारी तकलीफे उठा कर भी यहीं कोशिश की कि उनका पारिवारिक जीवन संभल जाए तब तक वह दो बेटियों की मां बन गई, लेकिन उस निर्मम आदमी का मन वह नहीं बदल सकी उसका पारिवारिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो गया और उसकी इस दशा के लिए वह आज तक अपने को माफ नहीं कर पाया है
        यह सब बताते हुए उसका चेहरा गहरे अवसाद में डूब गया था और सिरहाने रखे तकिए पर पीठ टिका कर छत की ओर देखने लगा था। मानसी अब भी उसकी ओर मुंह किए सिरहाने के पास ही बैठी थी। उसकी पूरी बात सुनकर कुछ देर बाद उसकी ओर देखते हुए उसने पूछा था –
” यह वहीं शालिनी है न जो, आस्था संस्था के साथ काम करती है?”
” हां वही , मगर ” वह कुछ और पूछता लेकिन उसे अनसुना करते हुए मानसी ने अपनी बात जारी रखी –
” लेकिन वह तो अपनी दोनो बेटियों के साथ अपने पति और परिवार से अलग रहती है शायद? ”
” तुम शालिनी को जानती हो मानसी?” रोहित ने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए पूछा था।
” बस, इतना ही कि वह एक साहसी स्त्री है वह अपने पांव पर खडी है और स्त्रियों की स्वयंसेवी संस्था  आस्था” के साथ काम करती है। मैने पहली बार उसे उसी संस्था के आयोजन में बोलते हुए सुना था – अच्छा बोलती है,वह तो कहीं से भी असहाय या कमजोर नहीं लगती। ”
” यहीं तो उसकी खूबी है मानसी! वह अपने भीतर के दर्द को छिपा कर रखती है। उसने तो मुझसे भी कभी नहीं कहा कि उसने क्या कुछ सहा है। मुझे भी उसके आसपडोस और परिचितों से ही उसके बारे में जानकारियां मिलती रही है।”
” तो आपकी उससे मुलाकात नहीं होती?” पहली बार मानसी ने अविश्वास से उसकी आंखो में देखते हुए पूछा था।
” बहुत कम..कभी कभार संयोग वश! बस, पिछले दिनों यहीं पास के जिला मुख्यालय पर एक आयोजन में उससे मिलना हुआ था। मैं तो उससे सहानुभूति प्रकट करने ही उसके पास गया था जब थोडी देर अकेले में उससे बात हुई तो मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि उसके मन में मेरे प्रति अच्छी राय नहीं है….मेरी सहानुभूति में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी…वह तो उल्टे मुझे ही जैसे नसीहत दे रही थी कि मैं अपने घर को ठीक तरह संभालू….ऐसा क्यों हुआ मानसी….उसने ऐसा रूखा बर्ताव क्यो किया मुझसे? पिछले सप्ताह भर से यहीं बात मुझे बराबर कचोटती रही है।”
फिर जैसे कुछ और सोचते हुए उसने पूछा –” कहीं ये तुम्हारी उस मुलाकात का परिणाम नही था, मानसी?”
और उसने अपनी आंखे मानसी के चेहरे पर टिका ली थी।
     इस अंतिम प्रश्न से मानसी एकाएक चौक गई, फिर भी उसने संयन रहते हुए इतना ही कहा – ” नहीं, मुझसे तो ऐसी कोई बात नहीं हुई, बल्कि मुझे तो उससे पहली बार मिलने पर यह आश्चर्य हुआ था कि वह हमारे बारे में कितना कुछ जानती है। तुम्हारे बारे में पूछने पर उसने इतना ही बताया था कि तुम दोनो साथ पढे हो और इसी नाते वह तुम्हे जानती है मुझे थोडा अजीब लगा था कि उस पहली ही मुलाकात में वह हमारे आपसी रिश्तों को लेकर कितनी दिलचस्पी दिखा रही थी, लेकिन मैने तो उसे कुछ नहीं बताया। बस आखिर में जाते जाते उसने यह जरूर कहा था कि तुम बहुत अच्छे इंसान हो मुझे तुम्हे और बेहतर ढंग से समझना चाहिए!…उस मुलाकात के बाद एक दिन       अचानक अनिकेत से भी यह पता लगा कि वे एक दूसरे को अच्छी तरह परिचित है उनकी संस्था के काम में अनिकेत से उनका अक्सर मिलना होता है हो सकता है अनिकेत से ही हमारे पारिवारिक जीवन के बारे में उनके बीच में कोई बात हुई हो”
लेकिन यह सब बताते हुए मानसी फिर जैसे अपनी ही चिन्ता में डूब गई थी।
      वे एकबारगी चुप हो गये थे। रोहित तकिए पर सिर टिकाकर अब पीठ के बल लेट गया था और वह भी कुछ क्षण बाद उसकी
      बगल में लेट गई थी। फिर मानसी ने करवट बदल कर उसी ओर देखते हुए पूछा था –
” रोहित, क्या तुम्हे अजीब नहीं लगता कि हमारे रिश्तों के बीच में और लोग आकर हमें समझाने का प्रयास करते है क्या पति पत्नी से अधिक नजदीक कोई और रिश्ता हो सकता है?”
रोहित ने उसे आलिंगन में लेते हुए बस इतना कहा था –
” मुझे बहुत अफसोस है, मानसी!  लेकिन अब ऐसा कभी नहीं होगा बिलीव मी!”