इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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गुरुवार, 22 मई 2014

पाठकों की कलम से

एक अच्‍छा अंक, बधाई 
विचार वीथी अंक फरवरी-अप्रेल 2014। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग उद्देश्यहीन है। राजभाषा बन जाना और बात है, सदुपयोग होना अलग चीज है। छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक - माध्यमिक पाठयक्रमों में लागू करना ढकोसला है। रूपयों का दुरूपयोग है। जनता के साथ छल है। छत्तीसगढ़ी भाषा में पाठ्यक्रम लागू करने के पूर्व ध्यान देना पड़ेगा -
1. सर्वेक्षण। 2. माता-पिता, बालक - बालिका और समाज कितनी स्वीकृति प्रदान करता है। 3. औद्योगिक पृष्ठभूमि वाले छत्तीसगढिय़ा कितने हैं जो इस भाषा में पढ़ पायेंगे। 4. कितने छत्तीसगढ़ी भाषा शिक्षक हैं जिन्होंने स्नातकोत्तर विषय के रूप में छत्तीसगढ़ी को पढ़ा है। 5. शासकीय - अशासकीय क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ी भाषियों को लेकर कितनी नियुक्तियाँ हैं?
उपरोक्त कारणों के बिना छत्तीसगढ़ी भाषा लागू की गई तो जस हाल माधो, तस हाल उधो ही होगा। सर्वोत्तम उदाहरण ’हिन्दी’ हैं एक विशिष्ट उदाहरण दूँगा, मेरी बात स्पष्ट हो जायेगी। ’’आज भी पचासों साल बाद विद्वान लोग हिन्दी को ’राष्ट्र भाषा’ कह रहे हैं। यह हिन्दी का दुर्भाग्य है। हमने सन् 1948 में अपनी किशोरावस्था में स्व. सेठ गोविन्द दास के साथ हिन्दी का कार्य किया था। फिर 1963 में हिन्दी को मात्र ’राष्ट्रभाषा’ दर्जा दिला पाये। इस भ्रम को लोग आज भी पाले हैं कि हिन्दी ’राष्ट्रभाषा’ है।’’ (श्रीमती सुधा रानी श्रीवास्तव, जबलपुर म.प्र., वैचारिणी, कोलकाता, अंक मार्च-अप्रेल 2013, पृ. 81)  राकेश भारती हिन्दी दशा पर लिखते हैं - ’’आज की पीढ़ी को जिस ’चटनी प्रक्रिया’ से हिन्दी पढ़ाई जाती है वह छात्रों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से काटकर रखती है।’’ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा का है और आगे भी जारी रहेगा। सर्वेद जायज लिखते हैं - ’’डॉ. सुरेन्द्र को लाज नहीं आती होगी।’’ कैसे आयेगी जब लोग अपनी डफली, अपना राग अलापने लगे हैं।
अंक में मनोज कुमार शुक्ल और संध्या विश्व के आलेख महत्वपूर्ण हैं। ’अरमान’ और ’फूलो’ दोनों कहानी में संघर्ष है; एक में पूर्ण होता है, दूसरे में लड़ाई का उत्सर्ग होने को है। देर-सबेर होगा ही। अर्पणा शाह की कहानी, ’जितना इलाज में पैसा लगेगी, दिक्कत होगी। उससे कम में आसानी से दूसरा बच्चा पैदा कर लोगी’। (पृ.29) तब भला आदर्श मनुष्य की  खोज जारी रहेगा? आजादी गिनने की नहीं समझने, जानने, विचार-विन्यास का विषय है। लघुकथाएँ उत्‍कृष्ट हैं। सर्वेद ने तीन पृष्ठ बेकार में रंगे हैं। महापर्व महाशिवरात्रि से सभी पाप हनन हो जाते तो दुनिया में कोई भी समस्या नहीं रहती। साहित्य के बहाने किसी एक वाद को लेकर चलना संपादक का काम नहीं , जनता-जनार्दन पर छोड़ देना चाहिए। थानसिंह वर्मा की कविता आज के दौर की कविता है। एक अच्छा अंक। सादर बधाई।
यशवंत मेश्राम,  शंकरपुर, वार्ड नं. 4, राजनांदगाँव 491441 (छ.ग.)
वंदनीय कार्य र रहे हैं, बधाई
आपके  द्वारा प्रेषित पत्रिका विचार वीथी हमें प्राप्त हुई। पढ़कर बड़ी खुशी हुई। विषय सामग्री चाहे वह गजल,कविता,कहानी व आलेख वगैरह हो सभी का चयन सावधानी पूर्वक किया गया है। पेपर के साथ प्रिंटिंग का भी स्तर बहुत अच्छा लगा। जिसके लिये आप एवं आपके सहयोगी गण बधाई के पात्र है।
मैं रायपुर में लगभग 11 वर्ष अपने बैंक में सेवा के दौरान रहा। रायपुर नगर के सभी साहित्य मनीषियों का स्नेह व आशीर्वाद मिला। कुछ पुराने अपनत्व भरे पलों की याद तरो ताजा हो आयी है। अच्छा लगा। श्री देवीसिंह चौहान, श्री सरयूकान्त झा, डां. राजेश्वर गुरु, श्री हरिठाकुर, श्री बबन मिश्रा, श्री प्रभाकर चौबे, डां. सालिग राम सलभ, श्री बालचंद कछवाहा, श्री लखनलाल गुप्ता, श्री केयूर भूषण, डां. रामकुमार बेहार, श्री अमरनाथ त्यागी जैसे अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य सुख प्राप्त हुआ। बड़ा ही आनंद संयोग रहा है।
साहित्य की सेवा वस्तुत: एक समाज ही नहीं वरन राष्ट्र की सेवा है। जो अपने समाज व देश को बौद्धिक स्तर पर जागरुक करने का कार्य कर रही है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। कलम के सिपाही अपनी क्षमता व शक्ति के द्वारा हमारे देश के तम को दूर कर प्रकाश फैलाने का वंदनीय कार्य कर रहे हैं।
मनोज कुमार शुक्ल ''  मनोज '' ,  जबलपुर ( म.प्र.)
48 पृष्ट की पत्रिका में बहुत कुछ मिला, बधाई
विचार वीथी पत्रि·ा लगातार मिल रही है। निश्चित रूप से अब यह पूर्ण साहित्यिक पत्रिका बन पड़ी है। रचनाओं का चयन आप बहुत ही अच्छे ढंग से कर रहे हैं। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। नवबंर अंक के मुख्य आवरण को देखकर बहुत अच्छा लगा। भीतर की सामग्री ने प्रभावित किया। जहां कुबेर द्वारा अनुदित कहानी मन को भा गया वहीं गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी जिंदगी की  कतरन पढ़कर मन प्रसन्न हो उठा । इसी अंक में इब्राहीम कुरैशी,डां. गार्गीशरण मिश्र मराल, केशव शरण, डां. सुशील गुरु की रचनाएं बहुत ही अच्छी लगी। 48 पृष्ट की इस पत्रिका में आपने इतना कुछ दे दिया जो सोच से बाहर है। पुन: बधाई ...
मंगलदास, जयपुर 

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

छत्तीसगढ़ी भाषा हेतु बिस्‍मार्क जैसे नायक की जरुरत


यशवंत मेश्राम
विचार वीथी के मई - जुलाई 13 का संपादकीय जमीनी साहित्य पर बेबाक बयान करता है। अनेक प्रश्र समाधान हेतु उठाए गए। पिछले तेरह वर्षों में विकास छ.ग. का हुआ वह पूर्व दृष्टिगोचर नहीं, सत्य है? जबकि असमानता शिक्षा विद्यमान है। बिजनी - पानी - सड़क को विकास मान ले क्योंकि सस्ता दर राशन खाने मनुष्य मजबूर है और इधर छत्तीसगढ़ी भाषी साहित्यकार बासी नून गुनगाण कर रहे हैं। '' जुरमिल सबो चढ़व रे।''  समर्थन संपादक का जायज है जबकि लक्ष्मण मस्तुरिया इसी गीत में कहते हैं - '' कहाँ जाहू बड़ दूर हे गंगा, पापी इहाँ तरव रे।'' पाप क्यों करना ? पापी को सजा क्यों नहीं? तरण - तारण क्यों ? इस पर सर्वेद जी चुप ? छत्तीसगढ़ी भाषा में राजकाज शुरू करें संविधान सूची में जगह बना लेगी, देर - सबेर। हम क्यों आग्रह करें। काम तो शुरू करें। छग के हाईस्‍कूल  तक के पाठ्यक्रम में संस्‍कृत  के  स्थान पर छत्तीसगढ़ी भाषा को क्यों नहीं ला पा रहे हैं ? छत्तीसगढ़ी भाषा हेतु बिस्मार्क  जैसे नायक की जरुरत है। परसाई पर व्यंग्य विश्लेषक सौ फीसदी सटीक - मैंने जाना कि जीवन की सबसे सही व्यवस्था कार्ल्‍समार्क्‍स ने की ( पृ. 12,) कार्लमार्क्‍सीय  भारतीय दलों में फूट क्यों ? तुलना करें।
अपने हुनर को आजमाने चला हूं, फिसलती रेत पर घर बनाने चला हूं मैं। राजेश जगने( पृ. 33)
 मार्क्‍सदृष्टिकोण भारत का चकनाचूर नहीं पर बेरास्ता हो चुका समझे। विपात्र मुक्तिबोध कहानी से इसे समझ सकते हैं। दो मजबूत पैर में पुरुष सोच बदले तो स्त्री - पुरुष विमर्श कहां रहेगा। जीवन के लिए श्रमाधारित शिक्षा तो चाहिए ही। इसे नेस्तानाबूत करते हैं, मतदाता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि। वे चाहे दबंग हो, पूंजीपति या अकेले  डोरी, उन्हें कसना - छोडऩा पड़ता है। चुनाव मेरे शहर  द नाइटिंगल एण्ड द रोज़ का छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रेमदर्शन अध्यात्म में घालमेल से पत्रिका की सुंदरता को सौंदर्यमय कर दिया।
समीक्षाएं और अन्य साहित्य सामग्री पठनीय और संग्रहणीय है। छत्तीसगढ़ी भाषा बोली की बीमारी दूर कैसे हो उदाहरण पत्रिका में मौजूद है -
'' बस्तर ले निकल
मुनगा ला चुचर
बमलाइ मा चढ़
इही ला कथे छत्तीसगढ़ ''
' चढ़ ' शब्द क्या कहता है ? कौन सा संकेत है। बस्तर डायमंड है, छत्तीसगढ़ का खजाना है। और छत्तीसगढ़ में माताओं पर कैसे चढ़ोगे, सुविधाभोगी साहित्यकार ऐसे बिंब गढ़ रहे हैं। जहाँ छत्तीसगढ़ी भाषा समृद्धि की ओर नहीं विपन्नता की तरफ जायेगी। आखिर माँग पत्रों पर विचार न कर अमाँग पत्र जो होता नहीं कार्यवाही चालू होने से सोने की चिडिय़ा वाले छ.ग. में व्यापक भ्रष्टाचार तो है ही।
अनेक आग्रह पर अंचल के साहित्यकारों की कलम जरा थम सी गई है। सर्वेद भाई को रचनाएं उत्‍कृष्‍ट स्वरुप नहीं मिल पा रही है। वर्तमान बदलाव की। साहित्यिक आयोजनों में जनप्रतिनिधि को बुलाना प्रचार - प्रसार के लिए आवश्यक है? साकेत साहित्य परिषद की वार्षिक  समारोह बिना जनप्रतिनिधियों के पूर्ण होता ही नहीं।
पत्रिका उत्तरोत्तर स्तरीय सामग्री दे रही है पर संपादक को अंचल के साहित्यकारों की रचनाओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
यशवंत मेश्राम
शंकरपुर, वार्ड नं. - 7, 
गली नं. - 4, राजनांदगांव( छ.ग.)

सोमवार, 16 सितंबर 2013

पाठकों के पत्र अगस्‍त 2013


बहुत ही स्तरीय पत्रिका है विचार वीथी

विचार वीथी का मई - जुलाई अंक मिला। अंक अच्छा है। मुख्यपृष्ट ही आपके लोक को उभारता है और अंदर की सामग्री पढ़ने को आमंत्रित करता है। छत्तीसगढ़ी भाषा भोजपुरी के कितना निकट है, जिस क्षेत्र का मैं रहवासी हूं यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। इसमें आस्कर वाईल्ड की कृति द नाइटिंगल एण्ड द रोज का अनुवाद पढ़कर एक अलग आस्वाद मिला। कुबेर जी बधाई के पात्र है। रचनाओं का चयन पठनीयता के आधार पर कर रहें हैं यह आश्वस्ति की बात है। विचार वीथी बहुत ही स्तरीय पत्रिका है इसमें संदेह नहीं। शुभकामनाओं के साथ।
                    केशव शरण, वाराणसी

संपादकीय अउ कुबेर के छत्तीसगढ़ी अनुवाद मन ल भा गे, बधाई

विचार वीथी मिलिस। संपादकीय पढ़ेंव। छत्तीसगढ़ी भाषा के हो हल्ला के खिलाफ अपन विचार व्यक्त करे हव। सही म आज के जुग म मानकीकरण के बात फिजूल हे। कोन भाषा आज निमगा रही गे हे अउ भाषा ल निमगा रख के कोन तीर मार सके हे?  भाषा बेवहार से स्वरुप धारण करथे। जउन सब्द बोले समझे में सरल होथे वो ह जबान म चढ़ जथे। बोलने वाला कोनो भी भासा के बोलइया राहय। दूसर दूसर भासा ल मिंझारबे त निमगावादी मन खिचाड़ी कहि के हंसी उड़ाथे। उंखरे मन से सवाल हे के बेवहार म का उन खिचड़ी खाय ले अपन आप ल बचा पाथे? खिचड़ी म अगर सुवाद हे त खाय म का के परहेज? एक गुस्ताखी करे के हिम्मत करत हौं काबर के सलाह पठोय के आमंत्रण आपे कोती ले मिले हे। पत्रिका के मंय सुरूच ले प्रसंसक हंव। छत्तीसगढ़ में प्रकाशित हिन्दी के स्तरीय पत्रिका म विचार वीथी के नाव ल कोनो नई भुला सकय। कुबेरके छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद मन ल छु दीस। भाई ल बधाई.....।

                    दिनेश चौहान, नवापारा, राजिम

विचार वीथी पढ़कर मन गदगद हो गया

विचार वीथी पढ़कर मन गदगद हो गया। मुझे यह नहीं मालूम था कि छत्तीसगढ़ से इतनी स्तरीय पत्रिका निकलती है। वास्तव में छत्तीसगढ़ विभिन्न मामलों में संपन्न राज्य है। वन सम्पदा, खनिज सम्पदा के साथ ही प्रतिभा संपन्न इस राज्य को किसी की नजर न लगे यही कामना करता हूं। विचार वीथी छत्तीसगढ़ के जनजीवन, संस्कृति के अनुरुप सदैव निकलती रहे यह दिली तमन्ना है।

                    अशोक बजाज, अंधेरी, मुंबई

शनिवार, 29 जून 2013

समवेत प्रयास से ही राजभाषा समृद्ध होगी


-  सुनील कुमार '' तनहा ''  -

पिछले दिनों हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति का प्रांतीय अधिवेशन रायपुर के दुधाधारी मठ में संपन्न हुआ। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी प्रदेश भर से सैकड़ों साहित्यकार इस सम्मेलन में भाग लिए। वक्ताओं ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी भाषा  साहित्य की समृद्धि व प्रचार - प्रसार का पुराना फार्मूूला सुझाया तथा अब तक छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के प्रति शासन प्रशासन व जनमानस में अपेक्षित समादर भाव की कमी व अरुचि के प्रति खूब आँसू बहाया।
कुछ वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद  छत्तीसगढ़ शासन द्वारा व्यापक पैमाने पर छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा का आरोप लगाया तथा कुछ ने छत्तीसगढ़ी भाषा का अध्ययन व अध्यापन प्रायमरी स्कूल से  करने की पुरजोर वकालत की। कुछ एक वक्ताओं ने तो छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को सरकार द्वारा अपने खर्च पर प्रकाशित करके प्रसारित करने की बात भी कही।
खैर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विकास के प्रति प्रांत भर से आये हुए साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों के द्वारा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मानसिक व्यायाम करके छत्तीसगढ़ी डे मनाकर औपचारिकता पूरी की गई। समिति द्वारा कुछ योग्य व अयोग्य साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। रात्रि काव्य पाठ हुआ। पूरी कवायद में इस वर्ष भी आम श्रोता नदारत ही थे और कार्यक्रम समाप्त हो गया। इस आशा के साथ कि अगले वर्ष भी यही दृश्य उपस्थित कर सकें।
वास्तव में उक्त नजारा मुझे हर वर्ष एक ही फिल्म को पुन: - पुन: देखने की तरह महसूस हुआ। आखिर छत्तीसगढ़ को राज्य बने दस वर्ष बीत गये लेकिन राजभाषा छत्तीसगढ़ी अब तक राजकाज की भाषा नहीं बन पाई। छत्तीसगढ़ी वास्तव में अब तक उपेक्षित क्यों है ? क्या वजह है कि छत्तीसगढ़ी भाषा दो करोड़ से भी अधिक लोगों की मातृभाषा होते हुए भी छत्तीसगढ़ी भाषा राजकीय संवाद की भाषा नहीं बन पाई ?
निश्चित तौर पर हमारी राजभाषा की इस दयनीय स्थिति के लिए राज्य शासन ही प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। चूंकि प्रशासन के तमाम नौकरशाह व कार्यकर्ता जो कि नीचे से लेकर उपर तक के पदों पर विराजमान हंै वे लोग अधिकांशत: बाहरी प्रांत से आये हैं जिनकी आस्था बेशक छत्तीसगढ़ में है ही नहीं। इसलिए वे लोग स्वाभाविक रुप से छत्तीसगढ़ी बोली बोलने व लिखने के प्रति अरुचि ही रखते हैं। और इसी चक्कर में छत्तीसगढ़ी राजभाषा घोषित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के वटवृक्ष बनने का सपना देखना बेमानी - सा लग रहा है।
उक्त कार्यक्रम में दानेश्वर शर्मा  द्वारा पूछे गये एक प्रश्र के जवाब में समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए भी शासन द्वारा एक रुपये की सहायता नहीं दी गई है। यह बात वास्तव में छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य की उपेक्षा का ज्वलंत उदाहरण है। जबकि सरकार द्वारा अनेक प्रकार के औचित्यहीन उल जूलूल योजनाओं में लाखों रुपये का अनुदान मुक्त हस्त से बांट दिया जाता है। लेकिन प्रांतीय स्तर के ऐसे बड़े कार्यक्रम जिसमें हजारों की संख्या में छत्तीसगढ़ी साहित्यसेवक व विद्वान एक होकर छत्तीसगढ़ी साहित्य की समृद्धि के लिए प्रयास करते हैं, के लिए सरकार द्वारा फूटी कौड़ी की सहायता नहीं दिया जाता। वाकई प्रबल असंतोष का कारण है। ऐसे में साहित्यकारों के मन में भी हताशा की भावना उत्पन्न होगी। विशेष रेखांकित करने वाली बात तो यह भी थी कि उक्त राज्य स्तरीय कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की ओर से भी कोई सहयोगात्मक व्यवहार नहीं दिखाई दिया। यहां तक कि आयोग का एक भी सदस्य वहां उपस्थित नहीं हुआ।
छत्तीसगढ़ी भाषा - साहित्य की समृद्धि व विकास के लिए गठित आयोग के सदस्यगणों का आखिर ऐसे महत्वपूर्ण अवसरों पर नदारत रहना उनकी नीयत पर संदेह उपस्थित करती हैं। वैसे भी उक्त आयोग के अध्यक्ष व महामंत्री के बीच की आपसी अहं के टकराव की गूंज तो सभी सुन चुके हैं। उन दोनों को उनकी अड़ियल रवैये से  व्यक्तिगत क्या फायदा हो रहा है, यह तो वे ही जाने लेकिन इससे कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य का अहित अधिक हो रहा है इसीलिए छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने आयोजन के पूर्व लिखे अपने लेख में उक्त आयोग को सफेद हाथी की संज्ञा दी थी।
वैसे सुशील यदु भी स्वयं आत्मावलोकन करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। उनके द्वारा किये जाने वाले ऐसे वार्षिक आयोजन में भी तटस्थता का अभाव दिखता है। लगता है यदु भी खास वर्ग के साहित्यकारों के प्रभाव में आकर काम करते हैं इसीलिए ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में वही घिसे पीटे लोगों को बार - बार प्राथमिकता देकर मंचासीन करते रहते हैं तथा योग्य व अयोग्य साहित्यकारों के बीच की विभाजन रेखा को भी नहीं समझ पाते। प्रांतीय स्तर के अध्यक्ष का इस तरह दबाव में आकर काम करना भी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। ऐसी स्थिति में प्रतिभावान व उपलब्धि युक्त साहित्यकार अपने आप को ठगा सा महसूस करता है और हतोत्साहित भी होता है।
इन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ी साहित्य व भाषा का भला कतई नहीं होने वाला है। यह समय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ साधने का नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा की समृद्धि में अपना नि:स्वार्थ योगदान देने का है। हमें मिल जुलकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे हमारी राजभाषा व साहित्य का समुचित विकास हो सकें एवं जन - जन उसे आत्मसात कर सकें। राज्य के 95 प्रतिशत लोगों द्वरा दैनिक जीवन में बोली जाने वाली लोक व्यवहार की भाषा भला अपनी धरती में कैसे उपेक्षित हो सकती है। इतनी बड़ी जनसंख्या का समर्थन मिलने के बावजूद हम अपनी राजभाषा व साहित्य को उचित सम्मान न दिला पायें तो यह हमारे लिए शर्मनाक है इसलिए आयें और समवेत रुप से इस दिशा में हम पुन: सकारात्मक कदम उठायें,जिससे राजभाषा व साहित्य का मान बढ़े एवं लोकप्रियता प्राप्त करें। प्रत्येक जिले में ऐसे भव्य कार्यक्रम वर्ष भर होते रहना चाहिए और छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए हर संभव उपाय  अपनाना चाहिए इसके लिए छत्तीसगढ़ शासन व स्तरीय प्रशासन खास आर्थिक सहयोग करें एवं ईमानदारी व कर्तव्यपूर्वक छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य रुप से राजकाज की भाषा बनाकर इसे जन - जन में लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न करें तभी छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा सही मायनों में स्थापित हो सकेगी।
  • पता - राजमहल चौक, कवर्धा [छ.ग.]

शुक्रवार, 28 जून 2013

छत्तीसगढ़ी भासा के असली सवाल : सोझ - सोझ बात

  • दिनेस चौहान
छत्तीसगढ़ी भासा कइसना होय ये सवाल खड़ा होगे कहना ठीक नइ हे। ये सवाल खड़ा करे गे हे। असली सवाल तो दूसर आय। जब तक इसकूल म छत्तीसगढ़ी माध्यम ले पढ़ई सुरू नइ होही तब तक छत्तीसगढ़ी भासा के भलई के बात जागत आंखी के सपना छोड़ के कुछू नो हे। एला मंय डंका के चोंट में काहत हौं। अभी छत्तीसगढ़ी - छत्तीसगढ़ी के जउन गोहार परत हे वो ह नवा - नवा राज बने के परभाव आय। तइहा ले लेके आज तक  जतका छत्तीसगढ़ी लेखन होय हे अउ होवत हें तेखर लिखइया कोन आंय ? सब के सब हिन्दी माध्यम ले पढ़े - लिखे रचनाकार तो आंय। एखरे सेती ले दुनिया भर के बात ल छोड़ के सब धियान छत्तीसगढ़ी माध्यम ले पढ़ई सुरू करे कोती देय के जरूरत हे। रहिगे बात आने - आने भासा के सब्द मन ल छत्तीसगढ़ी म सामिल करे के। एमा कोनो ल आपत्ती नइ होना चाही। आपत्ती करइया मन कुआँ के मेचका आंय। फेर अइसन शब्द सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी के पहिचान जरूर झलकना चाही। कोनो भी भासा के सबले खास पहिचान ओखर वर्नमाला आय। बियाकरन तो 125 बछर पहिली बन गे हे अइसे बड़का बिदवान मन के कहना हे। फेर उही बिदवान मन वर्नमाला म भ्रमित जान पड़थें। अइसन काबर हे ? वर्नमाला तो कोनो बियाकरन के पहिली अध्याय होथे। मय हर जउन छत्तीसगढ़ी बियाकरन देखे हौं ओमा देवनागरी लिपी के ङ,ञ, ण, ष, श, क्ष, त्र, ज्ञ, त्र ऋ अक्छर सामिल नइ हे। इही पाय के जब छत्तीसगढ़ी के एकरूपता के बात होथे तौ छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्नमाला के बात घला होना चाही। ये बिसय म भासाविद मन ल अपन बिचार ल सार्वजनिक करना चाही। फेर एखर बर कोनों आगू नइ आवत हें। डॉ. चितरंजन कर ल घला मंय व्यक्तिगत पत्र लिखे रहेंव। ऊंखर ले ये बिषय म व्यक्तिगत जवाब के आसा घलोक रिहिस हे, फेर को जनी उन ल पत्र मिलिस हे के नइ मिलिस ? वर्नमाला ल अधिकारी बिदवान मन दतइया के छाता बरोबर डर्रावत काबर हें, ये समझ से बाहिर हे। सिरिफ सुशील भोले एकमात्र अइसे रचनाकार हे जेन देवनागरी के जम्मों वर्न ल सामिल करे के बात सार्वजनिक रूप म कहिथे। फेर स, ष, श ल लेके वहू भ्रमित हे अउ ओखरो कहना हे के वर्नमाला के बिसय म भासाविद मन ल अपन बिचार ल सार्वजनिक करना चाही।
ये बहस म नंदकिशोर तिवारी के कहना हे के सब्द के परयोग म एकरूपता आना चाही। एखर जवाब सुधा वर्मा कर हाजिर हे - जम्मो डाहर के सब्द ल पर्यायवाची के रूप म सामिल करना एकदम सही बिचार जान परथे। छत्तीसगढ़ी वर्नमाला अउ नाव ए बहस म मंय अभी तक के ज्ञात वर्नमाला अउ छत्तीसगढ़िया मन द्वारा सहज उच्चारित वर्न के मुताबिक कई झन नामी - गिरामी छत्तीसगढ़ी साहित्यकार मन के नाव के छत्तीसगढ़ीकरन करे रेहेंव, जउन ह कतको इस्थापित साहित्यकार मन ल नइ सुहाय रिहिस। वइसनेहे बात डॉ. चितरंजन कर घला ह मड़ई दिनांक 20 दिसंबर 2010 के अंक म करे हवैं के व्यक्तिवाचक नाव अउ पारिभासिक सब्द ल जस के तस लिखे जाथे। उनला मय पूछना चाहत हौं के भासा, सुद्धि, सब्द सच्छम, कारन आदी लिखे के कारन का ए ? इही न के छत्तीसगढ़ी म श, ष, क्ष, ण के उच्चारन नइ होय। अउ उच्चारन नइ होय तिही पाय के जुन्ना बिदवान मन ये वर्नमाला ल वर्नमाला म सामिल नइ करिन अउ छत्तीसगढ़ी वर्नमाला म ये वर्न मन हइच नइ हे तौ शंकर, सुरेश लिखना कइसे संभव होही ?  इंहा तक के छत्तीसगढ़ी के अउ जम्मों बोली मन म घला ये वर्न मन गैरहाजिर हे। तौ ये वर्न मन ल जब मन लगिस सामिल कर लौ अउ जब मन लगिस छंटिया दौ, ये नीती ल ठीक नइ केहे जा सकय। हां, यदि सब बिदवान मन हिन्दी के वर्नमाला बर बिना बदलाव के एकमत हो जाय तब बात दूसर रइही। तब अइसन म सब्द मन के दोहरा परयोग ले बांचे ल परही। जइसे - भासाा, राजभासा, सब्द, सिक्छा, कक्छा, परीक्छा, पाठसाला, छेत्र, सुद्धि आदी लिखे के का जरूरत रहि जाही ? ताहन व्यक्तिवाचक नाव अउ पारिभासिक  सब्द ल जस के तस लिखे के तर्क घलो सही हो जाही। जइसे बोले जाथे वइसे लिखे नइ जाय अउ जइसे लिखे जाथे वइसे बोले नइ जाय ये ह अंगरेजी भासा के पहिचान आय। हिन्दी के पहिचान बिसेसता बर तो ये केहे जाथे के एला  जइसे बोले जाथे वइसनेच लिखे भी जाथे। ये ह छत्तीसगढ़ी के घलो पहिचान आय। अइसनेहे छत्तीसगढ़ी म उच्चारन भेद घलो ओखर पहिचान आय। छत्तीसगढ़ी म हिन्दी के तुलना म मात्रा कभू दीर्घ तौ कभू लघू हो जाथे। इहू कोती धियान देना जरूरी हे। जइसे - 1.राष्ट्रपति ह रास्ट्रपती, ऋषि ह रिसी, मुनि ह मुनी, साधु ह साधू, हरि ह हरी, विष्णु ह बिसनु, लिपि ह लिपी आदि ह आदी हो जाथे।
2. मूर्ति ह मुरती, मालूम ह मालुम, शीतला ह सितला, दीदी ह दिदी, रघु ह रघू, नीति ह नीती हो जाथे।अधिकांस छत्तीसगढ़ी लेखन करइया मन के सोंच हिन्दी केन्द्रित जान पड़थे। ओमन पाठसाला, कार्यसाला सब्द मन म आपत्ति करथे। कहिथे के साला माने पत्नी के भाई होथे। हिन्दी म ये अर्थ सही हे, छत्तीसगढ़ी म तो एखर बर सारा सब्द हे। सोंच कइसे बदलही ? इही पाय के असली सवाल हे के पहिली छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्नमाला तय करे जाय अउ प्रायमरी इस्कूल म ओखर विधिवत पढ़ई कक्छा पहिली ले चालू करे जाय तब सही मायने म छत्तीसगढ़ी के भलई होही। नहीं ते हिन्दी माध्यम ले पढ़के छत्तीसगढ़ी लेखन करइया के दुकाल नइ हे। हां, वो छत्तीसगढ़ी लेखन के पढ़इया के दुकाल जरूर चारों मुड़ा बियापे हे अउ दगदग ले दिखत हे। पूर्व सिक्छा सचिव सिरी नंदकुमार के कोसिस ले कक्छा तीसरी ले पांचवी तक बर छत्तीसगढ़ी भारती छपवाय गे हे। बहुत अकन अउ बोली म घलो छपवाय गे हे। फेर ये समझ म नइ आइस के ये कोसिस ल कक्छा पहिली ले काबर सुरू नइ करे गीस ? मोला लागथे, जेखर हाथ म बदलाव के ताकत हे उही मन खुद नइ चाहय के छत्तीसगढ़ी ह सरकारी काम - काज अउ जन - जन के परयोग के भासा बनय। यदि छत्तीसगढ़ी के सिरतोन भलई करना हे तौ वोला कक्छा पहिली ले पढ़ाय बर सुरू करना पड़ही अउ एखर बर सबले पहिली जरूरी हे छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्नमाला तय करना अउ आगू चल के उही वर्नमाला के मुताबिक छत्तीसगढ़ी के सब्द ल लिखना। यदि अइसन नइ होय तौ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार के भासा तो बन सकथे वो ह जन - जन के परयोग के भासा नइ बन सकय। वो ह बोलीच बने रिही।
आखिर म फेर जोर के केहे जात हे के जब तक छत्तीसगढ़ी भासा के अधिकृत वर्नमाला नइ बन जाही अउ ओमा ठप्पा नइ जाही न पारिभासिक सब्द के वर्तनी बदलई रूकय न छत्तीसगढ़ी भासा म एकरुपता आय।
  • पता - शीतलापारा, नवापारा, राजिम