इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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गुरुवार, 14 मई 2020

पढ़े –लिखे नहीं तो ..

कृष्‍णा कुमारी 
         अरे भाई साहब! पढ़े –लिखे होकर भी आप कतार तोड़ रहे हैं ......... कोई अनपढ़ ऐसा करे तो मानने भी आता है ........|इन भाई साहब के कहने का भावार्थ शायद ये ही कि कोई अनपढ़ व्यक्ति ऐसा करे तो चलता है ..मगर ........ |.....अक्सर ऐसा  देखने व सुनने में .....आता रहा है |यानी जो पढ़े –लिखे नहीं होते वो जाहिल , गंवार होते हैं, तहजीब  से कोसों दूर होते हैं ? वो ऐसी हरकतें कर सकते हैं |
          निसन्देह, शिक्षा –दीक्षा से जीवन को  नई दिशा , नए विचार , नई दृष्टि, नए आयाम मिलते हैं |अच्छे बुरे का अंतर समझ में आता है|पढाई  की महत्ता को नकारा नहीं जा  सकता |मगर इस का ये अर्थ कदापि नहीं कि जो अनपढ़ है , साक्षर नहीं हो पाए किसी वजह से तो वो बेवकूफ हैं ,या समझदारी से उन का कोई वास्ता नहीं है, जी नहीं .....समझदारी और बुद्दिमता जन्म से मिलती है , ,ईश्वर प्रदत्त होती है जो उम्र के साथ –साथ बढ़ती है, अनुभव इस में चार चाँद लगा देता है और शिक्षा सोने में सुहागा का काम करती है | बहुत सारे ऐसे व्यक्तित्व हैं जो कम पढ़े- लिखे हैं या निरक्षर हैं , बावजूद इस के, उन के कारनामों को सारी दुनिया सलाम करती है , लोहा मानती है ....जैसे धीरू भाई अम्बानी ..जो अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं ,सचिन तेंदुलकर स्कूल में फेल, मगर जिंदगी की पाठशाला में नंबर एक पर महान वैज्ञानिक आइन्सटाइन  से स्कूल में, उन के शिक्षक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि तुम पढ़ने के सिवाय सब कर सकते हो |और ये ही हुआ| उन के आविष्कारों की सूची  काफी लम्बी है |एडिसन की भी ऐसी ही कहानी है |
         ऐसे अनेकानेक महान व्यक्तित्व हैं |अकबर भी निरक्षर थे |कई वैज्ञानिक हुए जो कम पढ़े हुए थे |संत कबीर ने तो मसि को छुआ तक नहीं था ,,,उन पर न जाने कितने शोध हो चुके हैं |उन के ही शब्दों में ...’मसि कागद छुयो नहीं , कलम गहि नहीं हाथ ....’|अत: कम पढ़े- लिखे लोगों को नजर अंदाज करना अनुचित है |उन का उपहास उड़ाना एक दम गलत है |वैसे भी शिक्षा का अर्थ है सतत सीखते जाना ......चाहे किताबों से या फिर अनुभवों से | इसी संदर्भ में शिविरा पत्रिका, सित. 2015 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवती प्रसाद गौतम के निबंध ‘विश्व का विलक्षण विद्यालय –समरहिल’ के अनुसार ------‘महामनीषी चाणक्य ने लिखा है –‘अनुभव हीन व्यक्ति के लिए तो उत्तम शास्त्र भी केवल एक जहर के सामान है |’संत कबीर के भी कहा था – ‘अनभो  साँचा’ ..अनुभव ही सब कुछ है |वही शिक्षक भी वही शिक्षा भी |’ राज .पत्रिका (29 अक्टू. 2015 ) के झरोखा के व्यंग्य के  अनुसार –‘कई तो पढ़े –लिखे  भी अनपढ़े से भी जियादा ख़राब बोलते हैं ‘ (जो “..केंद्र ने कोर्ट में बताया हमारे चार सांसद अनपढ़ हैं ‘खबर पर आधारित है |)
          स्कूली शिक्षा तो अनौपचारिक है , हाँ, इस से डिग्री व नौकरी मिल सकती है जो जीवनयापन का आधार है | वास्तविक पाठशाला तो अनुभव की ही मानी जाती है | ये सच्ची शिक्षा है |और फिर समझदारी, या विवेकी  होने का मापदंड केवल शिक्षा नहीं हो सकती | मेरी दादी श्री एक दम निरक्षर  थी, मगर  ज्ञान , समझ , बुद्धिमानी और अनुभव  का खजाना थी |उन्होंने बहुत कुछ श्रवण से ग्रहण किया था | मुझे सुसंस्कृत बनाने में उन का सर्वाधिक योगदान रहा है| हमारे यहाँ भक्ति परम्परा में श्रवण- भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना है | तनिक गौर कर के देखिये ,जन्म के डेढ़ –दो साल तक बालक केवल सुनता है , और वह सुन –सुन कर ही बोलना सीखता है| जैन – धर्म में श्र्वनोपासना शब्द बहुतायत से प्रचलित है | यानि सुनना भी एक बहुत बड़ी उपासना है , साधना है , सुन कर तो बहुत बड़ा  ज्ञानी बना जा सकता है,अभिमन्यु ने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह के बारे में बहुत कुछ जान लिया था ,मगर जब तोड़ने की बात आई तब उन की माता को नींद आ गई और इस वजह से अभिमन्यु नहीं सुन पाए और.......? इस उपासना से मोक्ष तक प्राप्त किया जा सकता है |
          अमूमन,,ये भी देखने में आता है कि कितने ही पढ़े - लिखे   लोग भी बेवकूफियां  करते हैं, हीन- भावना से ग्रसित देखे हैं, अनपढ़ लोगों को अपमानित करने में भी पीछे नहीं रहते|  गलतियाँ करते हुए भी देखे हैं, ज्ञान के अहंकार से बोझिल भी ....तरस आता है ऐसे लोगों पर |अकसर पढ़ - लोग   बेकार की बातों पर भी बहुत बहस करते हैं , समय जाया करते हैं, कुतर्क भी करते हैं ,दिल की नहीं सुन कर के दिमाग की ही बात मानते हैं |
जब कि बिना या कम पढ़े लिखे अधिक सरल व भोले होते हैं ,दिल की सुनते हैं, प्यार भी बहुत करते हैं |मेरी ही एक कविता है ....बड़ी भोली है वो लड़की ...... और फिर कितने ही ऐसे लोग हैं जो चाह कर भी स्कूल नहीं जा पाते .....जाने कितनी विवशताएँ आड़े आ जाती हैं |कितने ही पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वाह में रह जाते हैं और खुद की तरफ ध्यान नहीं दे पाते,अपनों के लिए त्याग करते –करते ....उनकी उम्र निकल जाती है, यहाँ तक कि शादी से भी वंचित रह जाते हैं | मगर संघर्षों की आग मे तप कर खरा सोना ज़रूर बन जाते हैं |  जीवन की पथरीली पगडंडियों  पर नंगें पावों चलते चलते , ठोकरें खाते खाते ,इतने कड़वे –मीठे अनुभवों से गुजरते हैं कि बड़े –बड़े डिग्रीधारी उन के समक्ष पानी भरते दिखाई देते हैं| कहने का तात्पर्य इतना ही है कि ऐसे व्यक्तियों को कम करके नहीं आंकना चाहिये |जो किसी परिस्थिति वश पढ़ नहीं भी पाए ,मगर दूसरे क्षत्रों में बड़े बड़े काम करके नाम कमा लेते है
            मेरा अपना  मानना है, और अनुभव भी कि हर बालक  नहीं पढ़ सकता |कम से कम एक फीसदी बच्चे ऐसे मिल जायेंगे जो लाख प्रयास के बाद भी शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते, में खुद ऐसे  प्रयास कर चुकी हूँ |मगर वो ही बच्चा बहुत अच्छा मैकैनिक बन जाता है, चित्रकार बनता है ...या और किसी भी हुनर में कमाल कर जाता हैं और दुनिया  देखती रह जाती है |अभी कुछ दिनों पूर्व दैनिक भास्कर में पढ़ा था कि एक फैलियर ने कम्पनी बनाई, .......|क्योंकि ईश्वर सब को अलग –अलग हुनर से नवाजता है,|कोई भी दो मनुष्य एक जैसे नहीं है, इस पृथ्वी पर| क्योंकि ....
” हरेक शख्स बेमिस्ल होता है ‘कमसिन ‘
कि कोई किसी और जेसा नहीं है “
          इसका ये मतलब कदापि नहीं कि में पढाई लिखाई के खिलाफ हूँ , में तो अपने स्कूल की चतुर्थ श्रेणी की महिला को साल भर से साक्षर बनाने में जुटी हुई हूँ |मेरा ही एक शैर.... 
      ‘ज्ञान बिन है व्यर्थ जीवन 
      कम से कम ये ज्ञान रखना ‘
          ज्ञान की महिमा अनंत है |ज्ञान से पवित्र कुछ भी नहीं है|लेकिन ज्ञान और शिक्षा .दोनों अलग –अलग चीजें हैं | ये ही इन्सान का समग्र विकास करता है, मगर कुछ लोग इसे ग्रहण नहीं कर पाते तो ...क्या कीजे |
लेकिन ज्ञान और शिक्षा .दोनों अलग –अलग चीजें हैं |जो व्यक्ति शिक्षित है, आवश्यक नहीं कि वह ज्ञानी भी हो |इसी तरह, अशिक्षित व्यक्ति भी अज्ञानी होगा  ये मान लेना भी अज्ञान का प्रतीक है |.....लेकिन इसी आधार पर उन की अवमानना तो नहीं की जानी चाहिये| या उन की किसी भी खूबी पर अंगुली नहीं उठाई जानी चाहिए| उन के सम्मान में कमी भी क्यों की जाये|कहने का तात्पर्य इतना ही है कि केवल निरक्षर होने मात्र से तो किसी का तिरस्कार ,अवहेलना, उपेक्षा करना उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही  इस आधार पर किसी का उपहास उड़ाया जाना चाहिए |
          प्रख्यात शायर और ‘काव्या’ पत्रिका के सम्पादक हस्तीमल ‘हस्ती’ साहिब फरमाते हैं .....
अक्लवाला तो कोई –कोई मिला
वैसे तो सब पढ़े –लिखे देखे
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संक्षिप्त परिचय 
 
नाम : डॉ.कृष्णा कुमारी
उपानम : ‘कमसिन’
आत्मजा : पिता : श्री प्रभू लाल वर्मा                 
 माता :  श्रीमती रामदुलारी                                                           
जन्म तिथि              : 09 सितंबर          
राज्य :        : राजस्थान
जन्म स्थान     : चेचट. लालन –पालन और  प्राथमिक शिक्षा ग्राम -सावन भादो में
शिक्षा              : एम.ए., एम.एड., (मेरिट अवार्ड) साहित्य रत्न.
                     आयुर्वेद रत्न. बी.जे.एम.सी, पीएच.डी.            
 प्रकाशन (10 पुस्तकें )              
1 “में पुजारिन हूँ” कविता संग्रह -सन 1995 ई,                         
2 “प्रेम है केवल ढाई आखर” निबंध- सन 2002 में प्रकाशित               
3 “कितनी बार कहा है तुमसे ‘ कविता - सन 2003 में प्रकाशित              
4 “ .... तो हम क्या करें” -गजल- सन 2004 में प्रकाशित
5 “ज्योतिर्गमय” आलेख- सन 2006 में प्रकाशित
6 “ स्वप्निल कहानियाँ” कहानी -सन 2006 में प्रकाशित
7 “आओ नैनीताल चलें” -यात्रा वृतांत -सन 2009 में प्रकाशित
8 “जंगल मे फाग”, बाल- गीत- सन 2014 में प्रकाशित
9’कुछ अपनी, कुछ उनकी’ साक्षात्कार , 2018 ,में प्रकाशित
10-‘नागरिक चेतना’ दीर्घ निबन्ध, 2018 में प्रकाशित
11-  विभिन्न राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय पत्र पत्रिकाओं. संकलनो आदि में हजारों रचनाएँ प्रकाशित। बालहंस, बालवाणी, बालवाटिका,
12 प्रकाशनाधीन - “कतरा नदी में”[ उर्दू ग़ज़ल]. “दक्षिण की ओर” यात्रा वृतांत .. “अदभुत है सिंगापुर”- यात्रा वृतांत, कोई बात नहीं निबन्ध संग्रह
13 - शिक्षा निदेशालय बीकानेर द्वारा मान्यता प्राप्त पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित।
14- शिक्षा निदेशालय बीकानेर द्वारा “शिक्षक दिवस” पर प्रकाशित पुस्तक श्रृंखला में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित।
15- कई पुस्तकों, पत्रिकाओं में आधुनिक रेखा चित्र व आवरण चित्र प्रकाशित। अपने बाल गीत “जंगल में फाग” सहित आवरण चित्र |
16- कई शोध- ग्रन्थों (पीएच . डी) , संदर्भ ग्रन्थों एवं गु.ना.देव वि.वि..की एम् , फिल में अनुशांसित पुस्तकों में विस्तृत परिचय एवं रचनायें प्रकाशित ।
16- कई रचनाओं का अंग्रेजी. उर्दु व गुजराती भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित।
सम्मान एवं पुरस्कार                :
  नगरपालिका मण्डल. कैथून. पर्यावरण विभाग़ राजस्थान. मदर इण्डिया अकादमी आफ लर्निग़ कोटा. नामदेव सभा. कोटा आदि द्वारा विशिष्ट उपलब्घियों एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं के लिए सम्मानित. पुरस्कृत ‘मित्र संगम’ पत्रिका द्वारा “सैयद असगर रूदोवली पुरस्कार” . श्री कृष्ण कला साहित्य अकादमी. इन्दौर द्वारा भगवान सिंह यादव स्मृति सम्मान. संगम कला अकादमी परियावॉ. उत्तर प्रदेश द्वारा “सुश्री राजकिशोरी स्मृति सम्मान”. कथांचल उदयपुर द्वारा ‘पगली’ कहानी को कथाशिल्पी राजेन्द्र सक्सेना सर्वोत्तम कहानी पुरस्कार प्रदान. नारा लेखन व पत्र वाचन में कई विभागो आदि द्वारा पुरस्कृत. मघ्य प्रदेश लेखक मंच बैतूल द्वारा काव्य कलिका ‘उपाघि अक्षरघाम समिति कैथल’ द्वारा “प्रथम राष्ट्रीय अक्षर गौरव” सम्मान एवं संगम कला परिषद बैतूल मघ्यप्रदेश द्वारा “काव्य कुसुम” उपाघि से अलंकृत. दैनिक भास्कर द्वारा आशीर्वाद एचीवर्स एवार्ड प्रदान तथा “मघुबाला स्मृति सम्मान” प्राप्त जिला प्रशासन द्वारा नागरिक सम्मान. संस्कार भारती संस्थान दौसा द्वारा श्री शिवनारायण स्मृति सम्मान. अनुराग म्यूजिकल एंड कल्चरल सोसायटी. लालसोट राज। द्वारा “अनुराग साहित्य सम्मान 2007”. “साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा” द्वारा हिन्दी भाषा भूषण सम्मान. चेतना साहित्य परिषद. लखनऊ द्वारा श्रीमती गीता स्मृति सम्मान। ग्रीन अर्थ  ‘ एन. गी . ओ. कुरुक्षेत्र द्वारा आयोजित पर्यावरण विषय पर ‘राष्ट्र स्तरीय महिला कविता प्रतियोगिता – 2017’ में द्वितीय स्थान प्राप्त |
विशेष पुरस्कार  :  1. एयर इण्डिया एवं राजस्थान पत्रिका द्वारा आयेजित ‘रेन्क एण्ड बोल्ट’ प्रतियोगिता मे जिला स्तरीय एवं राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार.सिंगापुर की यात्रा अर्जित।
 2 . शिक्षक दिवस 2008 पर “राज्यस्तरीय शिक्षक सम्मान” प्राप्त
  3 . राजस्थान साहित्य अकादमी. उदयपुर द्वारा “ज्योतिर्गमय” (सांस्कृतिक निबंध)को “देवराज उपाध्याय पुरस्कार”।
अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन :  तुलसा. ओ के 74136 यू.एस.ए. से प्रकाशित मासिक प्रत्रिका ‘रोशनी’ उर्दू मे ग़ज़ले।. लधुकथायें आदि प्रकाशित।
प्रसारण  : आकाशवाणी(कोटा और जयपुर ) एवं दूरदर्शन से समय समय पर रचना पाठ व वार्ताऐ प्रसारित और अनेक कवि सम्मेलनों, मुशायरो में भागीदारी।
सृजन विघाएं :  मुख्यत कविता, गीत, गज़ल, रिपोर्ताज़, स्लोगन, लघुकथा, कहानी, संस्मरण, साक्षात्कार, यात्रा वृतांत, बाल गीत, समीक्षाएँ (लगभग 100 पुस्तकों की) इत्यादि हिन्दी,राजस्थानी.,उर्दू व अंग्रजी भाषाओं की विभिन्न विधाओं में भी निरन्तर सृजनरत।
अभिरूचियाँ :  संगीत, वाद्य यंत्र एवं चित्रकारिता में विशेष रूचि के साथ साहित्य पठन.लेखन एवं विद्वजनो की सुसंगति।
विशेष   :  उपाध्यक्ष राष्ट्रीय शिक्षक रचनाकार प्रगति मंच, कोटा शाखा एवंजिलाध्यक्ष संगम कला परिषद बैतूल पदों पर कार्यरत. भारतीय साहित्य परिषद शाखा कोटा द्वारा “श्रीमती कृष्णा कुमारी का साहित्य मे योगदान” मोनोग्राफ प्रकाशित ( लेखक , सुरेश वर्मा ), कुछ हिन्दी आलेखो का राजस्थानी मे अनुवाद।
सी- 368, तलवंडी
कोटा ( राज.) 324005
मोबाईल : 9166887276

सोमवार, 16 सितंबर 2013

क्रमश : हिन्दी का आख्यायिका साहित्य


भूल सुधार
'' विचार वीथी  ''  के मई अंक में पृष्ट क्रमांक - 6 में डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म स्‍थान '' राजनांदगांव ''  छप गया है जबकि उनका जन्म छत्‍तीसगढ़ के  राजनांदगांव जिले के ''  खैरागढ़राज '' में हुआ था  इसे सुधार कर पढ़ने का कष्ट करें। प्रस्तुत है गतांक से आगे ....।
                                                                                                                             सम्पादक

डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
हिन्दी के आधुनिक आख्यायिका लेखकों में तीन लेखकों ने विशेष प्रसिद्धि पाई - एक जैनेन्द्र कुमार, दूसरे बेचन शर्मा उग्र ओर तीसरे प्रसाद जी। प्रसाद जी काव्य के क्षेत्र में जितने प्रसिद्ध हैं, उतने ही आख्यायिका के क्षेत्र में भी। दोनों में भावों की नवीनता के साथ शैली की नवीनता है। उग्र जी ने कुछ समय तक अपनी शैली की उग्रता से हिन्दी साहित्य में एक धूम-सी मचा दी। वे लोकप्रिय भी खूब हुए। कथा का विषय चाहे जो हो, कथाकार यदि निपुण है तो वह सभी विषयों में एक हृदयग्राहिकता ला देता है। हम लोगों के नगर में भी दो-एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कहानियों को सुनने के लिए उन्हें घेरे रहते हैं। मैंने भी ऐसे लोगों की कहानियाँ सुनी है। साधारण जीवन की साधारण बातों को भी वे ऐसे अच्छे ढंग से बतलाते हैं कि श्रोताओं को उन्हें सुनकर एक उल्लास होता है। बात सब यथार्थ जगत की रहती हैं। उग्र जी की कहानियों में भी कला की यही विशेषता है। वे ऐहिक जगत ही यथार्थ बातों का वर्णन करते हैं। उनके वर्णन में स्पष्टता है। वे जो चाहते हैं, निस्संकोच कह देते हैं। उन्होंने संसार को जैसा देखा है, समझा है, उसको उसी रूप में कहने में उन्हें कोई झिझक नहीं है। उनमें भावुकता की कृत्रिमता नहीं है। वे मनुष्य की वासनाओं को प्रेम का आवरण देकर उज्जवल नहीं बनाते। जो वासना है, वह वासना ही है। उसकी उग्रता भी जीवन में प्रगट होती है। मनुष्य यदि अपने अंतस्तल की सच्ची परीक्षा करने बैठे तो वहाँ वह वासनाओं की संचित पंक-राशि ही देखेगा। उच्च या नीच, उत्कृष्ट या निकृष्ट सभी भावों के भीतर एक गुप्त लोलुपता बनी रहती है। हम लोगों का गर्व, माहात्मय, वैभव, सभी के भीतर वह लोलुपता विद्यमान रहती है। उग्र जी ने विषयों की महत्ता या हीनता की ओर ध्यान न देकर जीवन की कोई भी बात लेकर उसको रसमय बनाने का प्रयत्न किया है और इसमें संदेह नहीं कि उनके वर्णन में कथा का रस अच्छी तरह विद्यमान है। उसी के साथ उग्र जी के व्यंग्य, तिरस्कार, विषाद, आक्षेप और उपहास ने उनकी सभी रचनाओं में एक ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दिया है कि पाठक उनकी ओर आप से आप आकृष्ट हो जाते हैं। उग्र जी में कवि की भावुकता नहीं है और न दार्शनिक की गंभीर समीक्षा है; उनमें गुरू का उपदेश नहीं है और न नेता का सन्मार्ग प्रदर्शन है। उन्होंने एक दर्शक की तरह उस संसार का वर्णन किया है, जिससे वे अच्छी तरह परिचित हैं और जिसकी सभी लीलाओं में उन्होंने मनुष्यों की दुर्बलता, अक्षमता नीचता देखी है। जीवन की सभी लीलाओं को देखकर कभी उनको विरक्ति होती है और कभी आश्चर्य, कभी उन्हें विषाद होता है और कभी ग्लानि, कभी वे तिरस्कार करते हैं और कभी उनका उपहास करते हैं। पर वे निरपेक्ष समीक्षक की तरह उन लीलाओं में तटस्थ नहीं रहते। वे सभी स्थितियों में प्रविष्ट होकर जीवन के एक रस का भी अनुभव करते हैं। उनकी यह रसानुभूति उनके सभी आक्षेपों, तिरस्कारों और उपहासों के भीतर विद्यमान है।
प्रसाद जी हिन्दी के प्रसिद्ध आख्यायिका लेखक हैं। उनके सभी पात्र असाधारण हैं, क्योंकि असाधारण भावों से ही वे युक्त हैं। उनका बूढ़ा साईं साधारण बैरागी नहीं है, उसमें माया नहीं है, मोह नहीं है और न ही क्षुधा और तृष्णा। उसकी इच्छा असाधारण है, उसे तृप्ति तभी होती है जब दस वर्ष का एक बालक उसे रोटी देता है। वह बालकों से अपना गूदड़ छिनवाने में और फिर उनसे गूदड़ छीनने में ही आनंद लाभ करता है। इसी प्रकार उनका बंजारा उतना ही भावुक नवयुवक है जितनी भावमयी उसकी प्रियतमा मौनी। बंजारा अपना लादने का व्यवसाय मौनी के लिए ही छोड़ देना चाहता है और मौनी भी लादने के लिए बोझ इक_ा करना छोड़ देती है। दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं में प्रेम होने पर भी अनन्त वियोगी हैं। मौनी आशा में अनमनी बैठी रह जाती है और नन्दू हताश होकर घर लौट आता है। उनके इस वियोग का एकमात्र कारण यह है कि नन्दू भावुक है और मौनी भावमयी।
हिन्दी के एक दूसरे लब्धप्रतिष्ठ लेखक जैनेन्द्र जी की सभी कहानियों में विलक्षण भावुकता है। उसके सभी पात्र भाव जगत के हैं। लौकिक व्यापारों से उनका कोई प्रयोजन ही नहीं है। लौकिक बंधनों से वे सभी मुक्त हैं। उच्छृँखलता ही उनके लिए नियम हैं स्वच्छन्दता ही उनकी नीति है। उनके सभी कार्यों में एक विचित्रता है, एक अपूर्वता है। उनमें अल्हड़पन है, हठ है और प्रेमोन्माद है। भाव के आवेश में आकर वे सभी कुछ का कुछ कर बैठते हैं। ओले उन्हें नहीं रोक सकते, इन्सान उन्हें नहीं रोक सकता। बादल गरजे, अथवा बिजली चमके, उनकी नायिका काली दुनिया में ही जायेगी। ऊपर आसमान होगा और नीचे धरती और वह निश्चिन्त होकर अपने प्रियतम के पास चली जाएगी। उनके सभी पात्र मानों यही कहते हैं कि हम तो वही करेंगे जो हम चाहेंगे। परिणाम की उन्हें चिंता नहीं, लोकनिन्दा की उन्हें आशंका नहीं। यह उन्हीं की कहानियों में संभव है कि रेल कम्पार्टमेंट में भेट हो जाने पर एक अपरिचित व्यक्ति से एक युवती का इतना घनिष्ठ संबंध हो जाय कि वह घर में जहर खाकर और फिर बाद में उसी युवक से फोटो खिंचवाकर उसी के सामने मर जाय।
एक पाश्चात्य लेखक ने एक विज्ञान विशारद् अध्यापक की कथा लिखी है। उसने वृद्धावस्था में एक सुंदरी से विवाह किया। उसी के घर में उसका एक प्रिय छात्र आया करता था। उस प्रिय छात्र से उसकी स्त्री का प्रेम-संबंध हो गया। कुछ दिनों के बाद अपने उस छात्र के व्यवहार से कुछ रूष्ट होकर अध्यापक ने उसे अपने घर से अलग कर दिया। परन्तु उस छात्र के चले जाने पर उस स्त्री की अवस्था दयनीय हो गई। तब उसने उस छात्र को फिर अपने घर में आश्रय दिया। इसके बाद उस स्त्री को एक पुत्र उत्पन्न हुआ। तब अपने को उस पुत्र का पितामह मानकर एक उल्लास का अनुभव किया।
इसी प्रकार जैनेन्द्र जी के ' मास्टर साहब ' अपनी दुश्चरित्र स्त्री की सभी प्रेम-लीलाओं को चुपचाप सहन कर लिया और जब वह स्त्री अपने नवयुवक नौकर के साथ घर से भाग कर चली गई तब उन्होंने यह समझकर संतोष कर लिया कि वह भाग कर नहीं गई है। इसके बाद अपने तरूण प्रेमी से परितृप्त होकर और तरह-तरह के कष्ट सह कर जब वह स्त्री फिर मास्टर साहब के घर में लौट आई तब उन्होंने सानंद उसको लक्ष्मी कहकर उसका स्वागत किया।
यह सच है कि भगवान क्राइस्ट की तरह किसी भी दुष्ट-चरित्र पुरूष और स्त्री को कठोर दण्ड देने के समय हम सभी लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि जिसने कभी कोई दुराचार नहीं किया है वह उस कठोर दण्ड की व्यवस्था करे और तब ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं निकला जिसने किसी न किसी स्थिति में पड़कर कोई न कोई पाप नहीं किया है। तब हम सभी में दुराचारियों के प्रति एक सहानुभूति का भाव उत्पन्न हो जाता है। पर पाप या दुराचार स्वयमेव पुण्य या सदाचार तो नहीं हो सकता। नीति का कोई भी तो विचार जीवन में काम करता ही है। यदि कोई स्त्री अपनी युवावस्था में किसी से प्रेम करने लगे तो यह उसकी दुर्बलता अवश्य है, पर समझाने पर भी, दण्डित होने पर भी, विवाहित होने पर भी यदि वह कुपथगामिनी बनी रहे तो उसकी उस दुर्बलता में भी एक दृढ़ता आ जाती है, उसके कारण उसके चरित्र का उत्कर्ष नही होता, उसका पतन ही हो जाता है। यही कारण है कि वह एक को छोड़कर दूसरे की अनुचरी बन जाती है और दूसरे से परित्यक्त हो जाने पर वह तीसरे की भी सहचरी हो सकती है। उसकी इस स्थिति में एकमात्र आर्थिक व्यवस्था ही काम नहीं करती। उसमें तो वासना प्रेरित करती है, वह अध:पतन की ओर ले जाती है। यही कारण है कि त्याग-पथ की नायिका पाठकों के लिए सहानुभूति अथवा क्षमा की पात्र नहीं होती। जगत को कठोर कह देने से, माँ को कठोर मान लेने से, मति को मूर्ख और हृदयहीन बना देने से उसके चरित्र में उज्ज्वलता नहीं आती। वह शरद् बाबू की पतिता नायिका नहीं है जिसका अंतस्तल सदैव पवित्र रहता है और जो निरपराध होकर भी दण्डित हो जाती है। समाज के विरूद्ध भी वह किसी प्रकार का दोषारोपण नहीं कर सकती। उसने समाज के प्रति विद्रोह करने का कभी साहस भी नहीं किया। उसने जो कुछ भी किया स्वयं अपनी इच्छा से प्रेरित होकर ही किया। अतएव किस न्यायबुद्धि से प्रेरित होकर न्यायाधीश ने अपना पद छोड़ दिया यह तो लेखक ही जानें, पर इसमें संदेह नहीं कि उसके आचरण के प्रति मनुष्यों की सहानुभूति नहीं होती है। उसमें मेडम बोमेरी की तरह वह वासना की उग्रता भी नहीं है जो उसको विपथ की ओर सहसा खींच ले जाती है।
जैनेन्द्र जी ने मनुष्यों के भावजगत को लेकर अपने कथा-साहित्य की सृष्टि की है। अनन्त समुद्र की तरह वह भावसागर भी असीम है। उसका कोई अन्त नहीं है। उसमें जो प्रचण्ड लहरें उठती हैं वे लक्ष्यहीन हैं और बाधाहीन हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि कब उनकी गति किधर जाय। किसी भी कारण से क्षुब्ध होकर वे किसी भी समय पंचण्ड होकर किसी ओर बह सकती है। मेरे लिए कथा-साहत्य में जैनेन्द्र जी का वही स्थान है जो काव्य साहित्य में महादेवी वर्मा का है।
साधारण मनुष्य के साधारण जीवन में जो साधारण बातें होती रहती हैं उनकी ओर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। वे मनुष्य के अत्यंत रहस्यमय हृदयजगत में प्रविष्ट होर भावों की जो लहलाएँ देखते हैं उससे उसे स्वयं विश्मय होता है। वहाँ जीवन की वेदनाएँ मेघों की श्याम घटाओं की तरह उनके चित्त को अन्यथा तृप्त कर देती है। वे कुछ देखते हैं, कुछ समझते हैं और कुछ कहते हंै। उनके भावों में जो सौन्दर्यमय स्पष्टता है उसका कारण यह है कि जीवन की यथार्थता को उनकी कल्पना ने श्यामघटा से आच्छन्न कर लिया है।
साधारण लोगों के लिए जीवन पहेली नहीं है, वह छायामय नहीं है, उसमें सत्य की कठोरता है, उसमें शुष्कता है, कष्ट है, प्रयास है, चिंता है और व्यग्रता है। हम यदि अपने को धोखा देना न चाहें तो सत्य के उज्ज्वल प्रकाश में हमारे लिए जीवन का यथार्थ रूप प्रगट हो जायेगा।               समाप्त .....

बुधवार, 17 जुलाई 2013

हिन्‍दी का आख्‍यायिका साहित्‍य



 
थापी 
( आदरणीय पाठकों! विचार वीथी के इस अंक  में हम ’थाती’ नाम से एक नया स्तंभ प्रारंभ कर रहे हैं। इस अंक में हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों की कहानियों , निबंधों, संस्मरणों आदि गद्य रचनाओं   को प्रकाशित किया जायेगा। इस अंक में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की कृति ’बिखरे पन्ने’ से एक निबंध का प्रकाशन किया जा रहा है।
’बिखरे पन्ने’ की भूमिका में बख्शी जी ने लिखा है - ’’कुछ समय पहले खैरागढ़-स्टेट द्वारा प्रकाशित ’प्रजाबंधु’ नामक पाक्षिक पत्र में मुझे काम करना पड़ा। उस समय ’प्रजाबंधु’ के संपादक लाल त्रिभुवन सिंह जी ने श्रीमती रानी पद्मावती देवी की डायरी के कुछ पृष्ठ दिखलाये। उनमें दैनिक जीवन की बातों के साथ सभी तरह के विषयों पर भिन्न-भिन्न विचारों का संकलन किया गया था। यह ंढंग मुझे बड़ा पसंद आया। मैंने उनकी अनुमति से उन्हीं संक्षिप्त नोटों के आधार पर एक लेखमाला लिखनी आरंभ कर दी। उसका एक अंश ’प्रजाबंधु’ में निकला।’’
किताब की भूमिका के इस अंश से दो बातें स्पष्ट होती हैं - पहला यह कि खैरागढ़ स्टेट की तत्कालीन रानी श्रीमती पद्मा देवी सिंह न सिर्फ राजनीति में अपितु साहित्य में भी रूचि रखती थी। दूसरा यह कि श्रीमती पद्मा देवी सिंह की डायरी के अंशों के आधार पर इस किताब में संग्रहित निबंध बख्शी जी द्वारा ही लिखे गये हैं, यद्यपि इस किताब के लेखक के रूप में किसी का नामोल्लेख नहीं हुआ है और बख्शी जी ने स्वयं को इस किताब के संपादक के रूप में ही प्रस्तुत किया है।
इस अंक में संकलित निबंध ’हिन्दी का आख्यायिका साहित्य’ में हिन्दी कहानियों के विकास के साथ-साथ कहानी की विशेषताओं पर भी पर प्रकाश डाला गया है। यह निबंध दो भागों में विभक्त है। निबंध का दूसरा भाग अगले अंक में दिया जायेगा। - संपादक  )

( भाग - 1 )
  • पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी
हिन्दी साहित्य में आख्यायिका की कला आधुनिक युग की देन है। जब से हिन्दी साहित्य में मासिक पत्रिकाओं का प्रचार हुआ है तब से निबंधों और छोटी कविताओं के बाद आख्यायिकाएँ भी लिखी जाने लगी। पहले पहल हिन्दी में मौलिक आख्यायिकाएँ नहीं लिखी जाती थीं। बंग भाषा या अंग्रजी भाषा से अच्छी कहानियों के अनुवाद हिन्दी की मासिक पत्रों में प्रकाशित होते थे। इन अनुवादों से यह लाभ अवश्य हुआ कि हिन्दी के कितने ही लेखक आख्यायिका कला को समझने लगे। प्रेमचंद के पहले जिन आख्यायिका लेखकों ने मौलिक कहानियाँ लिखी हैं, उनमें विश्वम्भर नाथ कौशिक, गिरजा कुमार घोष, ज्वालादत्त शर्मा और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी के नाम प्रसिद्ध हैं। बंग महिला की भी कुछ कहानियाँ उस समय प्रकाशित हुई थीं। परंतु यह बात सच है कि हिन्दी की प्राण-प्रतिष्ठा प्रेमचंद जी ने ही की। उन्हीं की रचनाओं में हमें कथा का परिष्कृत, परिमार्जित और पुष्ट रूप मिलता है। बीस वर्ष तक उन्होंने कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियाँ हिन्दी साहित्य की स्थायी संपत्ति हैं।
कहानियों में कुछ घटना-प्रधान होती हैं और कुछ चरित्र-प्रधान। अधिकांश अच्छी कहानियों में छोटी-छोटी घटनाओं के द्वारा एक ऐसी चरित्र की झलक प्रदर्शित हो जाती है कि उस झलक में ही चरित्र की गरिमा व्यक्त हो जाती है। छोटी कहानियों में भावों का उत्थान-पतन प्रदर्शित किया जाता है।  भिन्न-भिन्न विपरीत भावों में एक संघर्ष अथवा द्वन्द्व होता है। कभी सुप्रवृत्तियाँ उदित होती हैं और वे हमारी कुप्रवृत्तियों को दबा देती हैं। इसी प्रकार कभी-कभी कुप्रवृत्तियों का इतना प्राबल्य हो जाता है कि उनके द्वारा हमारी सुप्रवृत्तियाँ पराभूत हो जाती हैं। यही अंतर्द्वन्द्व कहा जाता है। इन्हीं के कारण आख्यायिका-कला में एक विशेषता आ जाती है। प्रेमचंद की कहानियों में ये सभी बातें विद्यमान है। उनमें चरित्र की विशेषता को व्यक्त करने वाली स्पष्ट झलक है, उनमें भावों का उत्थान-पतन है, उनमें अंतर्द्वन्द्व है, उनमें चरित्र के साथ घटना का ऐसा सुंदर समावेश हुआ है कि यह नहीं जान पड़ता कि कथा में चरित्र की प्रधानता है या घटना की। इनके अतिरिक्त प्रेमचंद जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने भारतीय ग्राम्य जीवन का विशद् चित्र अंकित किया है। उसमें दैन्य की सहिष्णुता है, वुभुक्षा का चीत्कार नहीं है। अपनी विशेषताओं के कारण प्रेमचंद जी हिन्दी साहित्य के सबसे श्रेष्ठ आख्यायिकाकार माने जाते हैं। प्रेमचंद जी के बाद जिस लेखक ने हिन्दी के कला-साहित्य में विशेष कीर्ति और लोकप्रियता प्राप्त की है वे भी प्रेमचंद जी की तरह उर्दू के  क्षेत्र से उतर कर हिन्दी के क्षेत्र में आये हैं। उर्दू-साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने पहले ही कीर्ति प्राप्त कर ली थी, उनकी भाषा में भी एक विशेषता आ गई थी। हिन्दी में प्रविष्ट हाने पर उन्होंने भी प्रेमचंद की तरह हिन्दी भाषा और शैली को परिष्कृत और परिमार्जित किया। प्रेमचंद और सुदर्शन, दानों की भाषा में जो उक सरल प्रभाव है उसी के कारण उनकी कथा में अधिक स्वाभाविकता आ गई है। प्रेमचंद की तरह सुदर्शन की भी कहानियों में चरित्र के साथ घटना का बड़ा अच्छा मेल हुआ है। श्री सुदर्शन ने नागर का वर्णन किया है। उनकी रचनाओं में मध्यम श्रेणी की गृहस्थों का ही जीवन अंकित है। उनमें दाम्पत्य-जीवन के घात-प्रति-घात, आनंद और विच्छेद दोनों सुंदर रूप से व्यक्त हुए हैं। प्रेमचंद की तरह सुदर्शन भी एक आदर्शवाद को लेकर अपनी कहानियों की रचना करते हैं। उनके पात्र स्वच्छन्द नहीं होते फिर भी त्याग की उनमें उच्च भावना है जिसके कारण भाग्य की लीलाएँ भी उनके जीवन में एक गरिमा ला देती हैं।
पं. विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक हिन्दी के प्रचीन मौलिक आख्यायिकाकार माने जा सकते हैं। प्रेमचंद और सुदर्शन दोनों के हिन्दी साहित्य में प्रविष्ट होने के पहले वे अपनी कहानियों के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं। उनकी कहानियों में घटना की प्रधानता है। जीवन में जो अच्छे और बुरे भाव प्रकट होते हैं, वे किसी न किसी घटना से व्यक्त होते हैं। किसी के चरित्र का उत्कर्ष या अपकर्ष उसके कार्यों से ही लक्षित होता है। संसार में सभी तरह के लोग होते हैं। अधिकांश बुरे होते हैं और कुछ अ़च्छे भी। अधिकांश के जीवन में स्वार्थ की ही भावना काम करती है। इन्हीं स्वार्थों की सिद्धि या असिद्धि में लोग अपने जीवन की सफलता या विफलता को समझते हैं। कौशिक जी की घटनाओं के द्वारा मनुष्यों के उन्हीं भावों का दिग्दर्शन कराया गया है जिनमें उच्च या नीच के भाव काम करते हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के द्वारा किसी न किसी प्रकार की नैतिक शिक्षा या समाज सुधार का उपदेश देने का प्रयत्न भी किया है। चरित्र के विकास में केवल उनकी यही नैतिक भावना काम करती है। जो सत्य लोककल्याण का समर्थक है, जिसके द्वारा जीवन के साधारण घटनाओं    में भी एक उच्चता आ जाती है, उसी का उन्होंने प्रदर्शन किया है। उनके वर्णन में सर्वत्र एक स्वाभाविकता और शैली की सरलता है। सभी कहानियों में समाज और जाति का स्वाभाविक वर्णन है।
श्री चतुरसेन की गणना आधुनिक श्रेष्ठ आख्यायिकाकारों में की जाती है। उन्होंने दौ सौ के करीब कहानियाँ लिखी हैं। कहानी में उनकी एक विशेष शैली है। एक विज्ञ के कथनानुसार उनकी भाषा में प्रवाह का सौन्दर्य है और भावों में ओज है। जीवन की अभिव्यक्ति में उन्होंने यथार्थवाद का अनुसरण किया हैं वे जीवन का यथार्थ चित्र ही  कहानियों में अंकित करने का प्रयास करते हैं। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है  कि कथा की घटनाओं को एक उच्च स्थिति तक पहुँचाकर उसका ऐसा अन्त कर देते हैं जो बड़ा विलक्षण या चमत्कारपूर्ण होता है। अधिकांश आख्यायिकाकारों का यह उद्देश्य होता है कि वे कहानी को एकमात्र कहानी के लिए ही लिखते हैं। किसी प्रकार का नैतिक शिक्षा या समाज सुधार की ओर उनका ध्येय नहीं रहता। वे जीवन में विभिन्न भावों का विश्लेषण ही किया करते है। उनकी कथाओं में जीवन-विश्लेषण ही अधिक चित्ताकर्षक है। उसी का यथार्थ चित्रण करके वे अपनी कथाओं में रस की सृष्टि करते हैं। यही ढंग कला के लिए कला का विन्यास समझा जाता है। श्री चतुरसेन शास्त्री जी की कहानियों में  कौशिक जी की लोक-कल्याण की भावना अवश्य काम करती है, तो भी उनकी कहानियों में कथा-रस की जो परिपुष्टि होती है उससे यह कहा जा सकता है कि उसमें नीति-शिक्षा की अपेक्षा कला की प्रधानता अधिक है। वे अपनी अनुभतियों को स्वच्छन्द रूप में आख्यायिका की कला द्वारा व्यक्त करने में सफल हुए हैं।
कुछ विज्ञों की राय में चण्डी प्रसाद हृदयेश भी  हिन्दी के कलाक्षेत्र में अपना एक पृथक स्थान बना गए हैं। उनकी भाषा संस्कृत से प्रभावित है। वह वैसी काव्यमयी भाषा मानी गई है जैसी कादम्बरी में पाई जाती है। प्राचीन काल में कथा की जो शैली थी उससे आधुनिक काल की शैली सर्वथा भिन्न है। पर हृदयेश जी की कहानियों में प्राचीन कथा-शैली के साथ नवीन शैली का भी बड़ अच्छा मेल है। हृदयेश जी में कवि की भावुकता भी थी। वे कल्पना-जगत में विहार करते थे। उनकी कल्पना में ही रस विद्यमान था। उनकी सभी कहानियों में कल्पना की प्रधानता है, उसी के अनुसार उनकी काव्यमयी भाषा है।
सरलग ----