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जीवन का ,
रूप है अनोखा।
हवा का झोंका,
को न समझे धोखा।।
अवसर को ,
समझे मौका।
मन रूपी,
नियंत्रित हो नौका।।
विपत्तियों से,
न होना विचलित।
हवा का झोंका,
है प्रचलित।।
जीव- जंतु से,
सीखें संघर्ष।
हवा का झोंका,
स्वीकार हो सहर्ष।।
धनीराम डड़सेना 'धनी'
छ.ग
इस अंक के रचनाकार
.
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मंगलवार, 23 मई 2023
हवा का झोंका
सोमवार, 22 मई 2023
महेश कुमार केशरीे की कविताएं
(1)कविता
अब लगता है , कि ये पूरी दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी ...!
"""""""""""""""""""""""""""""" """""""""""""""""""""""
सुना है , धरती पर तीन
चौथाई खारा पानी है..और
समुंदर का जलस्तर भी लगातार
बढ़ रहा है..
धीरे - धीरे हमारे तटीय क्षेत्र गायब होते
जा रहें हैं ..
एक समय के बाद बंबई बिला जायेगा...
आदमी ने कभी नहीं सोचा कि
इस धरती पर जो तीन चौथाई खारा पानी...है ..
वो
आखिरकार क्यों है ..?
क्यों , मीठे पानी के
सोते सूखते जा रहें हैं ...?
क्यों... सूखती जा रही है
बूढ़ी ..गंडक और यमुना..
क्यों सूखती जा रही है ..
हमारी संवेदनाएँ ...
स्त्रियों को लेकर ...!
सभ्यता के शुरूआती दिनों से ही
स्त्रियाँ लगातार रोए जा रही है .. !
इनके रोने से ही ये समुंदर बने हैं...!
उनके रोने से ही मीठे जल के सोते सूखते जा हैं..
और इन स्त्रियों के
लगातार रोने से ही हमारे समुद्र लगातार
बढ़ रहे हैं....
सुना है , ये जो खारा पानी है ..वो
स्त्रियों का दु:ख है ....
जो .. पृथ्वी पर तीन चौथाई
समुंदर के तौर पर पड़ा है...
स्त्री दु:खों को पी जाती है ..
बहुत बुरे वक्त में जो कि बहुत जल्द
ही आदमी का आयेगा
तब , शायद
खारे पानी की तरह ये तीन
चौथाई दु:ख भी पी जाती हमारी स्त्री ...!
लेकिन , अब लगता है , कि ये पूरी दुनिया
एक दिन साबुत खारे पानी में डूब जायेगी
क्योंकि आजकल एक नयी कवायद
चल पड़ी है ...
स्त्री को हिस्सों में काटकर फ्रिज
में रखने की कवायद....
फिर ... दु:खों को पीने वाली स्त्री
इस धरती पर कहाँ बचेगी ?
जो , सोचेगी .. हमारे संकट या अस्तित्व के बारे में...!
उस समय ये जो धरती का तीन चौथाई दु:ख है
उसको कौन पियेगा ?
नीलकंठ की तरह ...!
"""""""""""""""""""""""""""""" """""""""""""""""""""""""""""" """"""""""""
(2)कविता
धरती पर के मौसम
"""""""""""""""""""""""""""""" """""""""""""""""""""""
मौसम और ऋतुओं के चक्र
को मैं नहीं मानता...
ये सब बेमानी बातें हैं
मैं , नहीं मानता किसी आवृत्ति
को
समय के चक्र या दुहराव
को मैं नहीं मानता ..
और , ना ही मैं मानता हूँ
मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियाँ ...
मुझे ये
सब बेकार की
की बातें लगतीं हैं ..!
मेरा मानना है कि
धरती पर के सारे मौसम
स्त्री
से जुड़े हैं...
जब वो हँसती है ,
तो वसंत आता है ..
वातावरण में एक मादकता
सी छा जाती है ..
फूलने लगते हैं, फूल
गालों पर छाने लगती है
मुस्कन...
और
हर तरफ केवल खुशियाँ ...
ही खुशियाँ दिखाई देने लगतीं हैं
सचमुच जब स्त्री हँसती है
तो वसंत आ जाता है .!
स्त्री जब उदास और
बहुत दु:खी होती है तो
पतझड़ आ जाता है ...!
पेंड़ भी स्त्री के दु:ख से
उदास हो जाता है !
तो , गलने लगता है
स्त्री के दु:ख में..
और उसकी शाखों से पत्ते गायब हो जाते हैं ..
मानों कि वे स्त्री के उदासी से दु:खी हों ..
स्त्री ...
जब ठठाकर हँसती है तो
तो , वैसाखी आती है....
घर - आँगन अन्न से भर
जाता है ...
चारों ओर मँगल गान बजने
लगते हैं ...
और लोग मनाने लगते हैं
लोहड़ी का त्योहार. ..
स्त्री जब रोती है..
तो सैलाब आ जाता है ...
बाढ़ .. बीमारी..
प्राकृतिक आपदायें ...
स्त्री के रोने से ही आती हैं ...
इसलिये दुनिया को अगर
बचाना है , आपदाओं-विपदाओं
से तो स्त्री को हमेशा खुश रखो...!
"""""""""""""""""""""""""""""" """""""""""""""""""""""""""""" """"""""""""
सर्वाधिकार सुरक्षित
महेश कुमार केशरी
मेघदूत मार्केट फुसरो
बोकारो झारखंड
पिन-829144
(3)कविता
दु:ख
ईश्वर ने पृथ्वी बनाने
से पहले दु:ख बनाया था !
और उसके बाद बनाया
स्त्री को !
ताकि, स्त्री पृथ्वी के दु:ख को
समझ सके !
(4)कविता
दु:ख
"""""""""""""""""""""""""""""" """""""""""""""""""""
ईश्वर ने पृथ्वी बनाने
से पहले दु:ख बनाया था !
और उसके बाद बनाया
स्त्री को !
ताकि, स्त्री पृथ्वी के दु:ख को
समझ सके !
महेश कुमार केशरी
मेघदूत मार्केट फुसरो
बोकारो ( झारखंड)
पिन -829144
बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
अनसुलझी
उडि़या से हिन्दी अनुवाद
मूल लेखिका : सरोजिनी साहू
अनुवाद : दिनेश कुमार माली
अनुवाद : दिनेश कुमार माली
![]() |
| सरोजनी साहू |
पिताजी आए थे, दीपावली का उपहार लेकर और भाइओं के लिए व्रत रखा था उसने। पिताजी कह रहे थे - चलो, दीपावली इस बार हमारे साथ मनाना। तब भी झूमका नहीं गई। महीने - पन्द्रह दिन बाप के घर रहने से हाथ से दो - दो घर निकल जाएंगे। आने तक तो बेटा - बेटी भूख प्यास से तड़पकर मर जाएंगे। वह मास्टराणी तो और ज्यादा मर जाएगी। उसके घर दिन में एक बार नहीं जाने पर वह जमकर गाली देती थी। महीने में पन्द्रह दिन के लिए गई तो वह सहन नहीं कर पाती। उसके घर में तो काम भी कम। वह आनन - फानन में घर में दस जगह ताला लगाकर जाती है। साढ़े नौ बजे वहाँ से चली जाती है। अग्रवाल के घर में बहुत काम है। पांव से सिर तक। दो - दो झोड़ी झूठे बर्तन। नवजात शिशु को लेकर चार बच्चों के दो - दो कपड़े गिने से कपड़े हो जाते थे दो बाल्टी। मालकिन भी बहुत चालाक, कहती है वाशिंग मशीन मैं चला देती हूँ, तुम धोए हुए कपड़ों को खंगाल कर सूखा दो। अगर कहीं कोई मैल छूटा हो तो उस कपड़े पर तुम ब्रश फेर देना। दस तारीख को पैसा देते समय कहती है कि कपड़े तो मैं मशीन से साफ करती हूँ। और दो बर्तन और घर पोछने के लिए क्या तुम्हें तीन सौ रूपए देंगे? रख, ये दो सौ पचीस रुपए।
झूमका सोच रही थी- अगर उस दिन वह अपने पिताजी के साथ चली गई होती, तो आज यह दुर्दिन नहीं देखना पड़ता। उसने सब तो बेच बाच कर खा लिया। अब उसके पास बचा ही क्या है?
शराबी, जुआरी, सट्टेबाज,सभी गुण थे उसमें। अभी दो घंटे पहले पैसे छीनकर लेकर गया। जाते समय कहकर गया - इन चंद पैसों के लिए मर क्यों रही हो? रूको, आज देखना मैं जीतकर कितने सारे पैसे लेकर आता हूँ। दिवाली के दिन रात में जुआ खेलने से लक्ष्मी घर में आती है। पैसा जीतने के बाद हम लोग दिल्ली चले जाएंगे।
दिल्ली जाने की बात सुनकर झूमका की छाती धड़क उठी। जहां हर दिन सिर छुपाने की जगह नहीं, खाना बनाने का घर में सामान नहीं। हाथ में जितने पैसे थे, वे सब खत्म हो गए तब घर में काम - काज कर बहुत ही कष्ट के साथ पैसे कमाकर वे लौटे थे, ओड़िशा को। और फिर एक बार दिल्ली जाएंगे इस बेवकूफ के साथ? साथ में होंगे और दो बच्चें।
उस समय तो दिल्ली जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। नौ भाइयों की एक बहिन। पिता स्टील प्लांट में सफाई का काम करते थे। शादी के लिए एक अच्छा वर ढूंढ रखा था। झूमका की छोटी भाभी से सनऊ राखी बंधवाने के लिए उसके घर गया था। एक दिन रूकने की जगह पर पांच दिन रूका था। चाकलेट, अमचूर, जूड़ा बांधने वाले तरह - तरह के रबर - बैंड लाकर दिए थे उसने झूमका के लिए। उस दिन से उसका मन उस पर आ गया था। सनऊ ने कहा था -चलो, यहां से दिल्ली चले जाते हैं, नहीं तो तुम्हारे पिता तुम्हारी दूसरे के साथ शादी कर देंगे। जितना भी पैसा हाथ में था। वे लेकर दोनो ट्रेन में बैठकर दिल्ली चले गए थे। जिसकी भनक भाइयों को तक नहीं लगी।
दिल्ली से लौटते समय झूमका पेट से थी। पिता के घर न लौटकर सीधी चली गई थी सनऊ के घर। शादी - ब्याह नहीं होने के कारण वह सास की आंखों में खटकने लगी। मेरे बेटे को मुझसे अलग करने वाली नागिन। पिता को खबर लगने से मिलने आये थे। कह रहे थे - भाइयों को समझा - बुझाकर तुम्हें घर बुलाएंगे। सनऊ को बैठाकर समझाया था। उसका शादी - ब्याह करने के लिए धांगड़ा की व्यवस्था कर दी थी। स्टील प्लांट में मेरे साथ काम करता था। तुम तो उसे लेकर फरार हो गए। बैठकर खाने से क्या तुम्हारा संसार चलेगा। जाओ कुछ काम - धाम करो और अपना पेट पालो।
सनऊ ठेकेदार के बंगले पर काम करने जाता था। एक दिन की सत्तर रूपए मजदूरी। झूमका को आधा देता था और आधा पी - पाकर उड़ा देता था। तब झूमका कुछ भी कमाती नहीं थी। नहीं पीने से उसके शरीर की थकान कैसे मिटेगी, तब वह सोचती थी। मजाक - मजाक में एक दिन मिस्त्री ने करणी से उसके हाथ को खरोंच दिया। उस दिन वह उससे मारपीट कर गुस्से से काम छोड़कर आ गया। बहुत समझाने के बाद कभी ट्रेक्टर से बालू उतारना तो कभी मन होने से घर द्वारा की पुताई करना आदि काम करता था। उसके बाद हफ्ते में एक दिन या दो दिन। पांच - छ: दिन बैठकर रह गया घर में।
सास ने उसको खाना नहीं दिया। घर से बाहर निकाल दिया। किसी घर के बरामदे में पोलीथीन ढंक कर दो दिन आश्रय लिया था। आखिर में शिरीधारा ने खोली जुगाड़ कर दिया था, सौ रुपए भाड़े में। वह देख रही थी, जब सनऊ पेट भरने के लिए खाना की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है तो वह भाड़े की क्या व्यवस्था करेगा?
शिरीधारा के पास रो - धोकर अपना दुख दर्द बयान करने पर मास्टराणी के घर में काम दिलवा दिया था। झूमका के काम करने से सनऊ और आलसी हो गया। बच्चे को संभाल रहा हूँ, दिखाने के लिए घर में बैठा रहता था। जब तक झूमका घर नहीं आ जाती थी। क्या नाश्ता लाई हो, कहकर खुद खोजने लगता था। झूमका का ससूर अच्छा आदमी था। बेटे को उत्पात समझ रहा था। सनऊ के लिए कहीं न कहीं से काम का बंदोबस्त कर लिया। मगर वह आलसी आदमी काम पर नहीं जाता था। एक समय जाने से दूसरे समय छुट्टी। फिर एक बार बाप और बेटे ने मिलकर एक होटल बनाई। जंगल से लकड़ी काटकर तथा टोकरी में मिट्टी पत्थर ढोकर एक दीवार बनाई। किवाड़ भी जोड़ दिया था। ठेके का काम। बिहारी ट्रक वालों को चाय और खुचरा पेट्रोल बेचेगा, सोचकर बीच रास्ते में दुकान डाली थी। कुल मिलाकर डेढ़ हजार रूपया मिलता था बाप - बेटे को। झूमका के लिए एक पीस ब्लाऊज खरीद कर लाया था सनऊ और बाकी पैसों को बाप - बेटे ने मिलकर दारु में उड़ा दिया।
झूमका को लगता था, वही एक हफ्ता उसके सबसे ज्यादा खराब दिनों का था। नहीं तो सनऊ इस तरह बातों - बातों में रूठकर दिल्ली चला जाता। पिता ने तो उसके लिए नौकरी वाला लड़का खोजा था। सनऊ ने क्या मंत्र फूंका कि क्या ऐसी बात कही कि उसका मन किसी और की तरफ नहीं गया, केवल मन में यही विचार आ रहा था कि बिना सनऊ को पाए जीवन व्यर्थ है।
झूमका अपने साड़ी के आंचल को बच्चों को ओढ़ा दिया। बाहर में कुछ - कुछ बातें सुनाई दे रही थी। बस्ती के सारे आदमी सो नहीं थे। पुलिस के डर से सामने वाले दरवाजे पर एक ताला लगाकर पिछवाड़े बैठकर जुआ खेल रहे थे। घर से तार खींचकर पिछवाड़े में बल्ब लटका दिया था। कैसे खेलते हैं ये खेल, झूमका को पता नहीं था। उसका पिता, भाई ये खेल नहीं खेलते थे। खदानी इलाकों से राऊरकेला ज्यादा शिक्षित जगह है। उस घर में टी.वी. भी था। उसके भाई के पास लूना थी। यहां टी.वी. सीरियल देखने के लिए झूमका शिरीधारा को बीस रुपए भाड़ा देती थी। यह जगह मूर्ख लोगों की जगह थी। वे अपने बेटों को राऊरकेला भेज देंगे।
झूमका ने कपाल पर हाथ रखकर जुहार किया- ऐ माँ, आज सनऊ जीतकर आएगा तो प्रसाद चढ़ाऊंगी। इसके बाद वह उन पैसों से फेरीवाले से एकाध कंबल खरीदूंगी। इस खपरीली झोली में जितने भी पोलिथीन ढंकने से सुबह - सुबह ठंडी हवा आती है।
तरह - तरह की बातें सोचते हुए न जाने कब उसकी आंख लग गई। बाहर से चिल्लाने की आवाज सुनकर हठात् उसकी नींद खुल गई। वह उस आवाज को पहचान गई थी। ऐसा लगता है दूर कुरैसर के घर में कुछ हुआ है। इतना नजदीक से कभी नहीं सुनी। लडाई - झगड़ा हुआ होगा। कुरैसर की औरत लंगड़ी है। लंगडाते - लंगड़ाते वह ज्यादा काम नहीं कर सकती थी। एक घर पकड़ी थी जो उसको निपटाने में दोपहर हो जाती थी। बिचारी गर्भवती भी थी। उसका आदमी बड़ा गुस्सैल था। लंगडी को पीटता था। फिर भी वह कम बदमाश नहीं थी। पक्की चोरनी थी। चुपके - चुपके सामान उठाकर कब कमर के खोसे में रख लेगी, किसी को पता तक नहीं चलता था। कितनी बार तो हाथ घड़ी तो कितनी बार नथिनी। कितनी बार दो आलू तो कितनी बार मु_ी भर सर्फ । जितना वह हथिया कर लाती थी, कलमुंहा कुरैसर जुएं में उड़ा देता था। चोरनी के लिए अच्छा ही हुआ है।
देखते - देखते बेटी ने गुदड़ी के अंदर पेशाब कर दिया। एक बार तो झूमका के कपड़े भी भींग गए थे। भींगा खोसा खोलकर आंचल को बदल पहन लिए झूमका ने। कपड़े का टुकड़ा लाकर गुडडी के ऊपर डाल दिया था। उसके पास दो साडियां थी मगर उसकी बेटी पेशाब करके भींगा देती थी। कल काम पर जाऊँगी तब अगर इसी को पहनकर जाऊँगी। मास्टरनी नाक - भौं सिकोड़ेगी, नाक - भौं क्या सिकोड़ेगी, कहेगी - उसकी बेटी तो और नाक फुलाएगी। कहेगी - झूमका! तुम इधर से जाओ। क्या महक रहा है। मास्टरनी कुछ भी बोल सकती है। बेशर्म होकर पूछेगी - तुम्हारी बेटी का पेशाब, इतनी गंदी होकर तुम ऑफिसर लोगों के घर काम करने आती हो। तुम्हें खराब नहीं लगता है? तुम्हारे कहने पर तो रखी, तुम्हें और कोई घर नहीं घुसाएगा। अहा रे! दयावती, हफ्ते में पांच दिन मांस बनाती है मगर कभी थोड़ा झोल तक खाने को नहीं देती है। रविवार के दिन हड्डीवाला मांस खरीदा था। दो टुकड़े मांस दिया था। तब कितनी बार कहा था - ऐ झूमका! जाते समय मांस ले जाना, मांस ले जाना। समऊ पठान के पास काम करते समय एक दिन आंतों के साथ रान या चाप के दो टुकड़े छुपाकर लाया था। अब तो वह दर्जी के पास काम करता है। उस हटली में। कितनी बार कहा बचा खुचे कपड़ों से बच्चों के शर्ट सिल दे, मगर सुना नहीं। कहता था - दुआस कटिंग करता है। कपड़ा बचाकर वह उसे बेचता था और दारू पीता था। कहां से और कपड़ा मिलेगा, जो तुम मांग रहे हो। आजकल उसका मुझ पर विश्वास हो गया। इसलिए दुकान उसके भरोसे छोड़कर वह जाता है। चोरी करने पर रखता किवाड़ पर सांकल की झनझनाहट सुनकर झूमका समझ गई थी यह निश्चय ही सनऊ है। चिड़चिड़ा कर पूछने लगी।
- क्यों दरवाजा खटखटा रहे हो? बच्चें उठ जाएंगे?
- तू दरवाजा खोल।
- तुम्हें क्या चाहिए, कहो, सोना हो तो आओ, नहीं तो जाओ सुबह उठना।
- दूंगा अभी खींचकर। बाहर से सनऊ उसे धमकाने लगा।
अवश्य ही यह आदमी जुए में हारा है, नहीं तो इस तरह की दादागिरी नहीं दिखाता। हा... हा... मेरे महीने की कमाई को भी जुए में उड़ा दिया। जैसे झूमका के भीतर आग जल रही हो। वह कहने लगी - तुम जाओ गड्डे में पड़ो, हरामी, मैं तुम्हारे लिए दरवाजा नहीं खोलूंगी।
दरवाजे पर जोर से पैरों से धक्का दिया था सनऊ ने। उसकी आवाज सुनकर दोनों बच्चें डरकर उठ गए थे। झूमका ने दोनों को अपनी गोद में लेकर पुचकारा था।
- ए माँ! भूख लग रही है? बच्चे ने कहा।
- कल मास्टरनी के घर पीठा मिलेगा। दीपावली का पीठा लाऊँगी खाना। अब सो जा।
- वह तुम्हारी माँ है?
- हाँ।
- तुम्हारी माँ ने मुझे बिस्कुट दिए थे।
- हाँ, कल और मांगकर लाऊंगी। अब सो जा।
झूमका के माँ की बिस्तर पर पड़ गई थी। हर समय कफ और खांसी। राउरकेला जाती तो एक बार देखकर आ जाती। झूमका की माँ और सास दोनों बहिनें लगेगी मामा और मौसी के बेटी। मगर झूमका सास को फूटी कौड़ी भी नहीं सुहाती थी। स्कूल के सामने भूजे हुए चने बेचती थी। नाति को अपने पास रख। मैं काम पर जाती हूँ। कहने से वह उलटा - पुलटा बोलना शुरु कर देती थी। एकदम झगड़ालू। अपनी बेटी की शादी के लिए उसने एक जोड़ा पायल खरीद कर रखा था। किस समय उसे ले जाकर सनऊ जुए में हार गया। कहकर बुढ़िया दिन - रात तक झगड़ती रही। मेरा आदमी है मगर तुम्हारा बेटा था। मैं तो तुम्हारे कमरे में नहीं गई थी? तुम मेरे ऊपर क्यों बिगड़ रही हो? झूमका ने कहा था मगर बुढ़िया कहां सुनती।
झूमका की दाहिनी आंख फड़कने लगी। थंूक लगाया था उस आंख पर। इस जुआरी ने पैसे भी डुबा दिए होंगे, नहीं तो यह आंख इस तरह क्यों फड़कती? जुआरी को किसी ने मार तो नहीं दिया? झूमका के मन में तरह - तरह के ख्याल आने लगे। धीरे से उसने सांकल खोल दी। कहां जाऊंगी, पिछवाड़े में खूब सारे आदमी बाहर अंगने में बैठकर जुआ खेल रहे थे। औरत को वहां देखकर क्या कहेंगे। खिड़की और दरवाजे ऐसे ही खुले रख दिए थे झूमका ने। कब वह शराबी आकर सोएगा। ठिठुराने वाली ठंड में किसके बरामदे में जाकर सोएगा?
रात खत्म होने में दो घंटे का समय रहा होगा। गहरी नींद में सो गई झूमका। किसी के हाथ लगने से उसकी नींद टूट गई थी। कौन कहकर आँखें खोली तो देखा सनऊ सामने था। सनऊ उसको हिला - हिलाकर उठा रहा था।
- क्या हुआ? सो नहीं रहे हो, चिटकनी लगा दी? नींद में झूमका ने पूछा था।
- तुम्हारे से काम था।
- क्या काम?
- मेरी बात सुनो।
- जीत कर आए हो? क्या लाए हो? कितना ला हो?
- तुम उठो न। सनऊ ने कहा था।
तुरंत उठकर बैठ गई थी झूमका। सच में, उसकी आंखों से नींद भाग गई थी। क्या - क्या लाए हो दिखा तो दो। मुंह उतारकर बैठ गया सनऊ। हां समझ गई तुम हार गए हो। मुझे पता था। कब जीतकर आए थे, जो आज जीतते। कल के लिए चावल नहीं है। मेरी कमर दर्द कर रही है तो डॉक्टर के पास दवाई - दारु करवाऊंगी, सोचकर पैसा खोज रही थी मगर तुमने तो सब उडा दिए।
जम्हाई लेते हुए झूमका ने कहा - छोड़ो, सो जाओ कल की बात कल देखेंगे।
- झूमका, झूमका!
- क्या हुआ? चिढ़ गई थी झूमका इस बार। सारी रात सोने नहीं देते हो। सुबह काम करने जाऊंगी या नहीं? पैसे तो तुम सारे हार गए। काम पर जाऊंगी तो नाश्ता - वाश्ता मिलेगा, जिससे मेरे बच्चों का तो पेट भरेगा।
- तुम मेरी बात क्यों नहीं सुन रही हो? तब से बकबक कर रही हो। मैं और क्या बोलूंगा? बड़ी दुविधा में पड़ गया हूँ। क्या करूंगा मुझे बता झूमका की आंखों से नींद गायब - सी हो गई।
- आह! उठकर बैठ गई थी वह। क्या दुविधा है, मेरे घर में है क्या, जो चिंता की बात है। साफ - साफ कहो।
- सारी गलती मेरी है। सनऊ ने कहा। मैं लोभ में पड़ गया था। पता नहीं, मेरी मति कहां मारी गई थी जो सारे पैसे हार गया। मेरा सब कुछ लूट लिया साले दर्जी ने, छतिसगढ़िया से मैं हारूंगा? मेरी औरत को रख लेना जा। यह मेरी लास्ट बाजी है।
- क्या कहा, क्या कहा तुमने? झूमका चहक उठी।
- तुम्हारा न खा रही हूँ, न पी रही हूँ। तुमने क्या सोच कर मुझे बंदी रखा। तुम्हारी इतनी बड़ी हिम्मत। इसलिए तुमने मेरे हाथ पकड़े थे, समझी। मेरा दिमाग खराब हो गया था जो तुम्हारे जैसे निकम्मे कुड़िया आदमी के साथ शादी की। मेरे पिता ने मेरे लिए स्टील प्लांट में एक आदमी देखा था। मैं कलमुंही अपने भाग्य को लात मारकर तुम्हारे साथ आई। और तुमने मुझे गिरवी रख दिया? हरामजादे, तुमने अपनी बहिन को क्यों गिरवी नहीं रख दिया। मुझे खरीदकर लाकर लाया था क्या? गुस्से में झूमका तुम से तू पर उतर आई थी।
- तूझे मरना है तो मर, जो करना है कर, मेरा क्या जाता है? मेरा हाथ पकड़कर शादी की थी,आज तुमने ऐसी मर्दानगी दिखा दी?
- चुप ..चुप, इतनी चिल्ला क्यों रही हो? बच्चे उठ जाएंगे। पास - पड़ोस को पता चलेगा।
- तूने तो अपनी औरत को गिरवी रख दिया, जिसे पांच लोग भी नहीं जानेंगे क्या? कल बात फैलेगी नहीं? सही कह रही हूँ, कल सुबह की गाड़ी से मैं राऊरकेला जा रही हूँ।
- दो थप्पड़ मारूंगा, राऊरकेला याद आ जाएगा। सनऊ ने कहा।
- हाथी के दांत और मरद की बात, समझी। तू जाएगी उस दर्जी के पास।
- तुमने नशा किया है। तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है।। नहीं तो कोई अपनी औरत को परपुरुष को सुपुर्द करता है। तुझे जरा भी अक्ल नहीं है, बुद्धू। अपने औरत और बच्चों का पेट नहीं पाल सकते हो इसलिए यह ऊपाय खोजा है। कल तुम इस बस्ती में मुंह नहीं दिखा पाओगे। मैं मुंह दिखा पाऊंगी। कहो, तुम्हारा बाप तुझे रखेगा। बस्तीवाले छींटाकशी नहीं करेंगे? तेरी बुद्धि पर राख पड़े। आंखों से पानी निकल आया झूमका के। - तुम जैसे जुआरी लोगों के बाल बच्चे नहीं, तुम्हारी कोई जाति - बिरादरी नहीं? क्या खेल खेलता है, जो खेल खेलता है, वह भाड़ में जाए। जो मेहनत करके लक्ष्मी लाई थी, उस लक्ष्मी को तुमने घर से बाहर निकाल दिया। मैं जा रही हूँ, दर्जी के घर, और आयंदा तुम्हारे घर में कदम नहीं रखूंगी। सुबह - सुबह अपना सामान लेकर राऊरकेला चली जाऊँगी।
झूमका का उत्तर सुनकर सनऊ थोड़ा नरम पड़ गया था। कहने लगा - और दो घंटे बाद रात खत्म हो जाएगी। तू मैदान गई थी या दर्जी के घर। कौन जानता है कहो तो, तेरे वहां पांव रखने से हो गया। अगर उसने तूझे छू लिया तो साले को एक झटके में काट डालूंगा। मैं क्यों तुझे इतना जोर देकर कह रहा हूं। तुम नहीं समझ रही हो। अब मुझे दर्जी छोटे - मोटे कपड़े सिलने को दे रहा है। और किसी दिन मैं उससे कटिंग सीख लूंगा। ट्रेनिंग हो जाने पर हम भी एक मशीन खरीद लेंगे। तब मैं मास्टर हो जाऊंगा। मेरी दुकान पर दो - दो बच्चे रखूंगा काज और बटन सिलाने के लिए।
सनऊ की बात सुनकर झूमका ने मुंह मोड़ लिया - तुम्हारी इन घटिया बातों पर मुझे विश्वास नहीं है। बहुत देख लिया है। कुछ समय के लिए दोनो चुपचाप बैठे रहे। झूमका सोच रही थी कि वह किसकी शरण में जाए। पूरी की पूरी बस्ती तो नशे से ग्रस्त है। आंखे होने पर भी सब अंधी।
- तुम्हारा घरवाला कह रहा है तो तुम जाओ।
सनऊ ने अपना मुंह खोला - तुझे डर लग रहा है,जाओगी तो मैं तूझे रास्ता दिखा देता हूँ।
झूमका की आंखों से मानो आग निकल रही हो। यह आदमी है या... मन कर रहा था कि मुंह पर थंूक दूं। गुस्से से वह तमतमा उठी। आंचल में बेटी सो रही थी। धीरे से खिसक कर उसकी तरफ आई। जैसे - तैसे साड़ी पहनकर मन ही मन सोच रही थी - मैं उधर जाऊंगी जहां मेरे कदम ले जाएंगे। रेल लाइन पर अपना सिर रख दूंगी। संभाल अपने बच्चों को। दरवाजा खोलकर एक - एक कदम रखकर वह बाहर चली गई। कहीं दूर पटाखे फूटने लगे। पिछवाड़े में जुए के खेल का एक दौर पूरा हो गया लगता है, तभी तो बस्ती में कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही है। टेकरी पर चढ़ते समय उसे डर लग रहा था। उसे ज्यादा डर लग रहा था उस अधेड़ उम्र के दर्जी के बारे में सोचकर। पियक्कड जुआरी, बच्चे और औरत को बिलासपुर में छोड़ दिया है उसके बेटे को चित्ती सांप काटने के बाद। उसका बेटा सांप काटने से मर गया था। इतनी उम्र होने के बाद भी औरतों पर डोरे डालता है। इसलिए अपने बालों में खिजाब लगाता है। किसी जन्म में पाप किया होगा तभी तो इस जन्म में बेटा मरा है, फिर भी पाप संचय कर रहा है।
मैं क्या करूं, सोच रही थी झूमका। नशेड़ी के पास मेरी इज्जत जाएगी? गुस्से - गुस्से में मैं घर छोड़कर बाहर तो आ गई। मेरी अक्ल पर ताला पड़ गया था। पीछे मुड़कर देखने लगी थी झूमका। पीछे केवल अंधकार, आगे में दर्जी दुआस का मकान।
दुआस उसी समय शायद पहुंचा था उसके घर। खिड़की, दरवाजे खुले थे। खूं - खूं कर खांस रहा था। यदि उस आदमी ने उसे खींच लिया तो? अगर बाघ की गुफा में बकरी आएगी तो वह क्या उसे छोड़ेगा? पूरी की पूरी निगल जाएगा। आगे का सोचकर पता नहीं क्यों झूमका को बहुत डर लग रहा था। कलमुंहे दुआस! तू मर क्यों नहीं गया। तू यहां किवाड़ खोलकर बैठा है। इस बुढ़ापे में तेरे आशिकपने को धिक्कार!
मेरी बदनामी होने से होगी। कल यदि मैं तुम्हारा नाम काउंसिलर के पास शिकायत न कर दी और तूझे अगर पुलिस की हाजत में नहीं बैठाया तो मुझे मत कहना, हरामजादे।
झूमका लौटने लगी थी। सनऊ ने कहा था- तू तो केवल अपने कदम रखकर आ जाना। उसने कदम रख दिया। पीछे से दुआस ने आवाज लगाई.
- कौन है, कौन है वहां?
- मैं सनऊ की औरत।
- तुम आ गई? दुआस ने कहा।
झूमका कांप उठी। उसका शरीर पसीने से तर - बतर हो गया। दरवाजे की चौखट पर आकर खड़ा हो गया दुआस। उसके मटमैले दांतों की हंसी - अरे अरे! खेल - खेल में हार गया तो सच में तुम आ गई। जा जा, घर को जा।
आंखें बंद करके वहां से भागी झूमका। उसे भीतर ही भीतर एक अपमान अनुभव होने लगा। किस जगह वह अपना मुंह छुपाएगी। झटपट लौटते समय उसका पेट काटने लगा। मैदान की ओर जाना था मगर वह पानी का लोटा तो साथ में नहीं लाई थी। अच्छा, दुआस को देखो, बाबाजी की तरह बैठा है, अपने मठ में। औरत उसके आगे समर्पण कर रही थी। फिर भी लौटा दिया? मेरे शरीर में मलमूत्र की गंध से, मेरे काले कलूटे हाथ देखकर।
घर के दरवाजे तक वह आ गई थी। धीरे से घर के अंदर चली गई झूमका। और कौन सोएगा, रात खत्म होने लगी थी। सनऊ सोया ही था शायद। उसने पूछा - आ गई क्या झूमका?
- हूँ।
उठकर बैठ गया सनऊ - मुझ पर गुस्सा कर रही हो?
झूमका ने कुछ नहीं कहा।
- एक बात पूंछू - गुस्सा नहीं होगी तो? सनऊ कहने लगा। सच सच बताना, उसने तुझे छूआ तो नहीं?
क्रोध से आगबबूला हो उठी झूमका। मन ही मन कहने लगी - तेरे ऊपर बिजली गिरे!
बुधवार, 9 नवंबर 2016
मिट़ठू मदरसा
रविन्द्र नाथ टैगोर की कहानी
का छत्तीसगढृ़ी अनुवाद
का छत्तीसगढृ़ी अनुवाद
किसान दीवान
एक ठिक मिट्टठू राहय,पट भोकवा। गावय मं बने राहय, फेर बेद नई पढ़य। डांहकय, कूदय, उड़ियाय फेर कायदा - कानून का होथे नई जानय। राजा कथे अइसने मिट्ठू का काम के? कोनो फायदा तो नी हे। घाटा जरूर हे। जंगल के जम्मों फर मन ला थोथम डारथे। ताहन राजा - मंडी म फर फरहरी के तंगी हो जाथे।
मंतरी ला बलाके किहिस - ये मिट्ठू ला गियान बिदिया सिखोवव। राजा के भांचा ला सिखोय - पढ़ोय के ठेका देय गीस। गुनी धियानी मन के बइसका होइस। बिचार करिन मि_ू म अबुजहापना काके सेती हावे। बनेच गंसियाहा भंजाय गीस। सुन्ता बनाईन मि_ू तो बन बदौर के गुड़ा म रहिथे। अइसने ठउर म बिदिया नई आवे। तेकर सेती जरूरत हे सुग्घर अकन पिंजरा बनाय जाय। राजपुरोहित मन ला खमखम्मा बिरादरी मिलिस। ओमन एक मन आगर अपन घर गीन।
सोनार बलाय गीस। वोहा सोन के पिंजरा बनाय बर भिड़गे। अइसे बिचित्र पिंजारा, जेला देखे बर दुनिया भर ले मनखे आईन। कोनो काहय - पढ़ई तो नंदा गे रे। कोनो काहय पढ़ई नई होय ते का होगे। पिंजरा तो बनिस। कतेक भागमानी हे मिट्ठू। सोनार ल थैली भर - भर के इनाम मिलिस। ओहर तुरते अपन घर चल दीस। गुरूजी मिट्ठू पढ़ाय बर बइठिस। नसवार लेके कथे येकर पढ़ई थोर - थार किताब म नी हो सके। तेला राजा के भांचा सुनिस। तुरते गोहड़ी अकन लिखइया बलाय गीस। सरी अकन किताब के नकल कराय गीस। नकल के नकल डोंगरी कस कुड़हा रचागे। जेने देखे, कहाय - वास रे, अतेक बिदिया ला राखे बर जगा नई मिलही। नकल उतरइया मन ला गाड़ा - गाड़ा बिदागरी मिलिस। ऊंकर तंगी के दिन बहुरगे। वो सोनहा पिंजरा के देखरेख म राजा के भांचा रातदिन एकमई करके भीड़े राहय। जउने देखे तउने काहय - बने तरक्की होवत हे।
अइसे ढंग ले मिट्ठू ला बुधमान बनाय के उदीम म जतेक छोटे - बड़े लगे रिहिन ओमन ऊंकर लागमानी मन ओखी - खोखी म घर भरे धर लीन। ये दुनिया म कतकोन कमी हावे, फेर चरियाहा के कमी नइये। एक खोजबे ते हजार मिलथे। ओमन किहिन - पिंजरा के तो घात सवांगा होवत हे। फेर मिट्ठू के आरो लेवइया कोनो नइये। बात राजा के कान म हबरिस। वो हा अपन भांचा ल बलाके कथे - कइसे हो भांचा, ये काय सुनावत हे? भांचा किहिस - महाराज! कहूं फरी - फरा बात सुने बर हे ते सोनार मन लाए पुरोहित मन लाए नकलची अऊ मरम्मत करइया जंचइया सबे ल बला लेवव। चरियाहा मन ला कमई के बांटा नई मिले न तेकरे सेती अइसने गोठियात रइथे। सुनके राजा ला पूरा अकल आ गीस। तुरते भांचा के टोटा म सोना के चैन पहिरा दिस अउ चल दिस।
राजा के मन होईस मिट्ठू मदरसा के हालचाल देखे जाय। एक दिन ओहर सबे सिपाही, दरोगा, संगी - मितान अउ दरबारी मंतरी संग लेके पढ़ई अखाड़ा मदरसा पहुंचगे। ऊंकर हबरतेच मुहाटी मेर संख, घड़ियाल, ढोल, तासे, खुदरक, नगाड़ा, तुरही, भेरी, दमामे, फांसे, बांसुरिया, झाल, करताल, मृदंग, जगझम्प अउ कतकोन बाजा रूंजी बाजे धर लीस। बाह्मन मन टोंटा चीरत लिटी झटकारत मंतर जाप किकिया किकिया के करे धर लीन। मिसतिरी, कमइया, बनिहार, सोनार, बढ़ई, नकलची, देखरेख करइया मन संग कका - बड़ा, ममा, फूफा, भाई, भतीजा, जमे लाग मानी जय जयकार करे धर लीन। भांचा कथे राजा ला देखत हस ममा महाराज। राजा किहिस - बास रे बोली भाखा तो कमसल नइहे। भांचा किहिस - बोलिच भाखा काबर महाराज, इंकर भितरौंदी अरथ घलो कमसल नइहे।
राजा मगन होके लहुटे धरिस। डेहरी नाहक के हाथी म चढ़त रिहिस। तसने म झुंझकुर म लुकाय चरियाहा किहिस - महाराज तैं तो मिट्ठू ला देखबे नी करे। सुनके राजा ला चेत आईस। किहिस - अरे हां, मय तो भुलावत रेहेंव लहुट के गुरूजी ला कथे। मोला देखे बर हे, मिट्ठू ला। तैं पढहाथस कइसे ? राजा ला पढ़हाय के तरीका देखाय गीस राजा गद्गद होगीस। पड़हाय के जोखा अतेक जादा राहय, तेमा मिट्ठू दिखबे नी करत राहय। राजा सोचिस अतेक उदीम करे गेय हे, अब मिट्ठू ला देख के काय करहूं ? ओला पक्का समझ आ गीस। मिट्टठू मदरसा तियार म कोनो कसर नइहे। पिंजरा म दाना - पानी के जगा फकत पड़हे गुने के जिनिस - किताबेच किताब राहय। पन्ना चीर - चीर के कलम के नोंक म लपेट के मिट्टठू के मुंहूं म गांजे जावय। मुहूं ठसाठस भर गेय राहय। देखइया मन के रूआं ठढ़िया जावय। राजा फेर हाथी म चढ़त कान अंइठुल दरोगा ला किहिस देख तो चरियाहा के कान ल बने अइंठ।
मिट्टठू दिन - दिन सुग्घर ढंग ले अदमरा होवत गीस। जंचइया मन समझिन तरक्की बने सुलगढ़न होवत हे। तभो ले चिरई जात के ऐब राहय। बिहंचे अंजोर कोती टुकुर - टुकुर देखय अउ अलकरहा डेना फड़फड़ावय। कभू - कभू तो अइसन देखे जावय, वोहर अपन अजरहा चोंच ले पिंजरा के छड़ ला ठोंनकत राहय। थानादार गरजिस - यहां का ऊदबिरीस होवत हे? लघियांत आगी, हथौरी अउ धुकनी लेके लोहार आईस। राहपट ठोंक - पीट चलिस ते का पूछबे। बरकस संकरी तियार होगे। मिट्टठू के डेना काटे गीस। राजा के लागमानी मन थोथना ओरमा के किहिन - ये राज के चिरई ,अबूजेच नइहें। निमक हिराम घला हे। ताहने तो पंडित मन एक हात म कलम अउ दूसर म बरछी ले लेके अइसन बिधुन मचईन जेला सिखौना कथें। लोहार के दुकान संवर गे लोहारिन के देहे भर सोन के गाहना सजगे। थानादार के चतुरई देख के राजा हर कोठी इनाम दीस।
मिट्टठू मर गीस। कब मरिस कोनो नी जानिन। फेर चरियाहा मन बगरादीन - मिट्टठू मर गीस। राजा अपन भांचा ला बला के पूछथें - ये काय सुनत हौं जी? भांचा किहिस महाराज मिट्टठू के पढ़ई पूरा होगे। राजा पूछिस - का अब घला उचक थे फुदरथे? भांचा कथे - कहां पाबे राम कदे। अब उड़ियाथे घला। राजा पूछिस त भांचा किहिस - अहं थोरको नीही। राजा - अब घला गाथे? भांचा - नीहीं भई राजा. दाना नई मिले ताहन चिचियाथे का? भांचा ऊंहूं एक घावं मिट्टठू ला लान तो भला देखहूं राजा किहिस। ताहन सिपाही, दफेदार, घुड़सवार, मन संग मि_ू लाने गीस। राजा हर मिट्टठू ल चिमकिस। मिट्टठू हुकिस न भूंकिस। ओकर पेट के कागत मन सुक्खा पाना, कस खड़खड़ाईन जरूर।
बाहिर डाहर नवा बसंत के भण्डारी हावा म नावा पत्ता मन अपन सुररत सांस ले संवरत जंगल के चारो मुड़ा ला बियाकुल कर दीस।
झलप चौक, बागबाहरा
महासमुन्द ( छत्तीसगढ़)
महासमुन्द ( छत्तीसगढ़)
शनिवार, 6 फ़रवरी 2016
बुलबुल और गुलाब
अनुवादक
द्विजेन्द्र द्विज ( हिन्दी )
मूल लेखक
आस्कर वाईल्ड
उसने कहा '' वह मेरे साथ नाचेगी, अगर मैं उसे लाल गुलाब ला दूँ तो।'' युवा.छात्र ने रोते हुए कहा - लेकिन मेरे सारे उपवन में लाल गुलाब कहीं है ही नहीं।
शाहबलूत वृक्ष की टहनियों में घोंसले में बैठी बुलबुल ने उसे रोते हुए सुना, पत्तों की ओट से झाँक कर देखा और हैरान हो गई।
कोई लाल गुलाब नहीं मेरे सारे उपवन में । '' वह चिल्लाया और और उसकी सुन्दर आँखों में आँसू उमड़ आए। - आह, कितनी छोटी - छोटी बातों पर निर्भर होती है ख़ुशी! मैंने पढ़ा है जो भी बुद्धिमानों ने लिखा है, दर्शन.शास्त्र के सब रहस्य भी मैं जानता हूँ, फिर भी एक लाल गुलाब की कमी ने मेरा जीना दूभर कर दिया है!''
- अन्तत: यह रहा असली प्रेमी! बुलबुल ने कहा ।'' न जाने कितनी ही रातों से मैंने इसी के बारे में गाया है, भले ही मैं इसे नहीं जानती, कितनी ही रातें गा - गा कर मैंने इसकी कहानी तारों को सुनाई है, और अब यह मेरे सामने है! इसके बाल सम्बूल की मंजरियों की तरह काले हैं और इसके होंठ इसकी चाहत के गुलाब.से लाल हैं लेकिन हसरतों ने इसके चेहरे को हाथी.दाँत.सा पीला कर दिया है। दु:ख ने इसके माथे पर अपनी मुहर लगा दी है।''
- राजकुमार कल नृत्य - उत्सव कर रहा है।'' युवा प्रेमी बुदबुदाया - और मेरी प्रेयसी भी वहीं होगी। अगर मैं उसे लाल गुलाब ला दूँ तो वह सुबह तक मेरे साथ नाचेगी। अगर मैं उसे लाल गुलाब ला दूँ तो मैं उसे अपनी बाहों में भर सकूँगा और उसका हाथ मेरे हाथ में कसा होगा लेकिन मेरे उद्यान में कोई लाल गुलाब नहीं है, इसलिए मैं अकेला बैठा रहूँगा और वह मेरे पास से गुज़र जाएगी, मुझे देखे बिना और मेरा दिल टूट जाएगा।''
- यह वास्तव में ही प्रेमी सच्चा प्रेमी है!'' बुलबुल ने कहा । जिसके बारे में मैं गाती हूँ उसे व्यथित करता है, मेरे लिए जो आनन्द है,उसके लिए व्यथा है। प्रेम सचमुच अद्भुत वस्तु है! यह माणिकों से अधिक मँहगा और विमल दूधिया रत्नों से ज़्यादा कीमती होता है।मोतियों और दाड़िमों से इसे खरीदा नहीं जा सकता, न यह दुकानों में बिकता है, न ही इसे दुकानदारों से इसे ख़रीदा जा सकता है और न ही यह सोने के तराज़ू पर तुलता है।''
- संगीतकार अपनी दीर्घा में बैठेंगे '' युवा छात्र बोला - और अपने सुरीले साज़ बजाएँगे और मेरी प्रेयसी वीणा और वायलिन की धुन पर नाचेगी।वह इतना बढ़िया नाचेगी कि उसके पाँव ज़मीन को छूएँगे भी नहीं ।चटक वस्त्र पहने दरबारियों का हजूम उसके इर्द - गिर्द होगा, लेकिन वह मेरे साथ नहीं नाचेगी, क्योंकि मेरे पास लाल गुलाब उसे देने को नहीं है '' उसने ख़ुद को घास पर पटक लिया, अपना मुँह अपनी हथेलियों में छिपा लिया और रोने लगा।
- यह रो क्यों रहा है। एक नन्ही हरी छिपकली ने पूछा और उसके पास से होती हुई दुम उठाए गुज़र गई।
- आख़िर क्यों। धूप की किरण पर हवा में तैरती तितली ने कहा।
- आख़िर क्यों रो रहा है यह।'' नन्हें गुलबहार फूल ने फुसफुसाकर अपने पड़ोसी के कान में कहा।
- वह लाल गुलाब के लिए रो रहा है।'' बुलबुल ने कहा।
- लाल गुलाब के लिए। वे सब चिल्लाए। कितना बड़ा मज़ाक है यह!'' और हरी छिपकली जो ज़रा दोषदर्शी थी, ज़ोर से हँस दी।
लेकिन बुलबुल जानती थी छात्र के दु:ख का रहस्य, वह शाहबलूत वृक्ष पर चुपचाप बैठी प्रेम के रहस्य के बारे में सोच रही थी।
अचानक उसने उड़ान के लिए अपने पर तोले, और ऊँचे आकाश में उड़ने लगी।साये की तरह वह उपवन में से उड़ी और साये की ही तरह उसने उपवन पार भी कर लिया।
घास वाले प्लाट के ठीक बीच में बहुत सुन्दर गुलाब का पौधा था। पौधे को देख बुलबुल उसकी एक टहनी पर बैठ गई।
- मुझे एक लाल गुलाब दे दो '' वह चिल्लाई - और बदले में मैं तुम्हारे लिए अपना सबसे मधुर गीत गाऊँगी।''
लेकिन पौधे ने इन्कार में अपना सिर हिला दिया।
- मेरे गुलाब सफ़ेद हैं।'' उसने कहा - समुद्र के फेन की तरह,पहाड़ों पर जमी बर्फ़ से भी सफ़ेद। लेकिन तुम मेरे भाई के पास जाओ जो धूप - घड़ी के पास उगा है।''
बुलबुल धूप- घड़ी के पास उगे गुलाब के पौधे के पास गई। - मुझे एक लाल गुलाब दे दो'' उसने पुकार लगाई '' और बदले में मैं तुम्हारे लिए अपना सबसे मधुर गीत गाऊँगी।''
- मेरे गुलाब पीले हैं।'' उत्तर मिला - तृणमणि सिंहासन पर बैठी जलपरी के बालों जैसे पीले घास काटे जाने से पहले वाली चरागाह में खिले नरगिस के फूलों से भी ज़्यादा पीले। लेकिन तुम छात्र की खिड़की के नीचे उगे मेरे भाई के पास जाओ जो शायद तुम्हारी इच्छा पूरी कर दे।''
बुलबुल छात्र की खिड़की के नीचे उगे गुलाब के पौधे के पास गई।
- मुझे एक लाल गुलाब दे दो।'' उसने पुकार लगाई - और बदले में मैं तुम्हारे लिए अपना सबसे मधुर गीत गाऊँगी।''
लेकिन उस पौधे ने भी इन्कार में अपना सिर हिला दिया।
- मेरे गुलाब लाल हैं।'' उसने कहा - फ़ाख़्ता के पंजों की तरह लाल और समुद्री कन्दराओं में झूल रहे प्रवाल - पंखों से भी ज़्यादा लाल। लेकिन सर्दी ने मेरी शिराओं को जमा दिया है, कोहरे ने मेरी पंखुड़ियाँ दबा ली हैं और तूफ़ान ने मेरी टहनियाँ तोड़ दी हैं, और अब सारा साल मुझ पर गुलाब नहीं खिलेंगे।''
- लेकिन मुझे तो बस एक लाल गुलाब चाहिए ।'' बुलबुल चिल्लाई - बस एक लाल गुलाब, क्या कोई उपाय नहीं कि मुझे एक लाल गुलाब मिल सके।''
- उपाय है, लेकिन इतना भयानक कि तुम्हें बताने का साहस मुझमें नहीं है।''
- अगर तुम्हें गुलाब चाहिए । '' पौधे ने कहा - तो तुम्हें इसे चांदनी रात में संगीत से रचना होगा और अपने हृदय के रक्त से इसे सींचना होगा। अपना सीना मेरे काँटों से सटा कर तुम्हें गाना होगा। रातभर तुम्हें मेरे लिए गाना होगा, काँटे को तुम्हारे दिल में धँस जाना होगा,तुम्हारे रक्त को मेरी धमनियों बह कर मेरा हो जाना होगा।''
- लाल गुलाब के लिए मृत्यु एक बड़ा सौदा है।'' बुलबुल ने कहा - और जीवन सबको प्रिय है। हरे जंगल में बैठ कर सूर्य को उसके स्वर्णिम रथ में और चाँदनी को उसके मोतियों के रथ में देखना मोहक है। सम्बूल की सुगंधि मधुर है, मधुर हैं घाटी में छिपे ब्लू - बेल्ज़ और पहाड़ों में बहने वाली समीर, परन्तु जीवन से बेहतर है प्रेम, और फिर मनुष्य के दिल की तुलना में एक पंछी का दिल है भी क्या।''
उसने अपने भूरे पंख उड़ान के लिए फैलाये और हवा में उड़ गई। साये की तरह वह उपवन के ऊपर से उड़ी और साये की ही तरह उसने उपवन पार भी कर लिया।
युवा छात्र अभी भी घास पर ही लेटा हुआ था,जहाँ बुलबुल उसे छोड़कर गई थी, आँसू उसकी ख़ूबसूरत आँखों से अभी सूखे नहीं थे।
- ख़ुश हो जाओ ।'' बुलबुल ने कहा - ख़ुश हो जाओ, तुम्हें मिल जाएगा तुम्हारा लाल गुलाब।'' मैं उसे चांदनी रात में संगीत से रचूँगी और अपने हृदय के रक्त से सींचूंगी।बदले में बस तुम इसी तरह सच्चे प्रेमी बने रहना क्योंकि प्रेम दर्शनशास्त्र से अधिक समझदार है। शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली है, भले ही शक्ति भी शक्तिशाली है, तृणमणि के रंग के हैं उसके पंख और शरीर भी उसका तृणमणि के ही रंग का है। मधु से मधुर हैं उसके होंठ और उसकी साँसें हैं गुग्गल धूप की ख़ुश्बू जैसी।''
छात्र ने घास से ऊपर सर उठाकर देखा, सुना भी, लेकिन समझ नहीं पाया बुलबुल उससे क्या कह रही थी क्योंकि वह तो सिर्फ़ किताबों में लिखी बातें ही समझ पाता था।
लेकिन शाहबलूत पेड़ समझ गया। उदास हुआ क्योंकि वह नन्ही बुलबुल का बहुत बड़ा प्रशंसक था,बुलबुल ने अपना घोंसला भी उसी की टहनियों में बनाया हुआ था।
- मेरे लिए एक अंतिम गीत गा दो। '' उसने फुसफुसा कर कहा - तुम्हारे चले जाने के बाद मैं अकेला हो जाऊँगा।'' तब बुलबुल ने शाहबलूत के लिए गाया उसकी आवाज़ ऐसी थी मानो चाँदी के मर्तबान में पानी बुदबुदा रहा हो।''
बुलबुल गा चुकी तो छात्र उठा और उसने अपनी जेब से पेंसिल और नोट बुक निकाली। इसके पास रूप विधान तो है,इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन क्या इसके पास संवेदना भी होगी। मुझे डर है,शायद नहीं होगी। वास्तव में वह भी अधिकांश कलाकारों की ही तरह है। उसके पास केवल शैली है, लेकिन हार्दिकता रहित। वह दूसरों के लिए बलिदान नहीं देगी। वह केवल संगीत के बारे में सोच सकती है और सब जानते है कि कलाएँ स्वार्थी होती हैं। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि कि उसकी आवाज़ में मधुर स्वर हैं। लेकिन दु:ख की बात तो यह है कि ये मधुर स्वर निरर्थक हैं। इनका कोई व्यवहारिक लाभ नहीं है।''
और वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर में लेट गया और अपनी प्रेयसी को याद करने लगा, काफ़ी देर बाद वह सो गया।
और जब चाँद आकाश में चमक उठा। बुलबुल उड़ कर गुलाब के पौधे पर जा बैठी और उसने काँटे से अपना वक्ष सटा दिया। सारी रात वह काँटे से अपना वक्ष सटाए गाती रही, ठण्डा बिल्लौरी चाँद नीचे झुक आया और उसे गाते हुए सुनता रहा। सारी रात वह गाती रही और काँटा उसके सीने में गहरे से गहरा धँसता गया और उसका जीवन - रक्त उससे दूर बह चला।
उसने गाया, सबसे पहले लड़की और लड़के के दिल में प्रेम उपजने के बारे में। उसने गाया गाने पर गाना और गुलाब के पौधे की सबसे ऊँची टहनी पर पंखुड़ी - पंखुड़ी कर एक सुन्दर गुलाब खिलने लगा। पहले तो यह हल्का पीला.सा था, नदी पर छाई धुन्ध की तरह, हल्का पीला.सा, सुबह की धूप के पैरों की तरह, चाँदी.सा, उषा के पंखों.सा । चाँदी के दर्पण में गुलाब की प्रतिछाया साय पानी के तालाब में गुलाब की परछाई - साय कुछ ऐसा ही था वह गुलाब जो पौधे की सबसे ऊँची टहनी पर खिला था।
परन्तु पौधे ने चिल्ला कर बुलबुल से कहा कि वह अपने वक्ष में काँटे को ज़ोर से भींच ले। ज़ोर से भींचो,नन्ही बुलबुल! और भी ज़ोर से, इससे पहले कि गुलाब पूरा होने से पहले दिन हो जाये।''
बुलबुल ने काँटे को और भी ज़ोर से भींच लिया। उसके गाने की आवाज़ ऊँची से ऊँची होने लगी। क्योंकि वह पुरुष और स्त्री की आत्मा में चाहत के जन्म लेने के बारे में गा रही थी।
और गुलाब की पत्तियों में हल्की - सी गुलाबी रंगत आ गई। गुलाबी रंगत जो दुल्हन के होंठ चूमते हुए दूल्हे के चेहरे पर आती है। परन्तु काँटा अभी बुलबुल के सीने में धँसा नहीं था इसलिए गुलाब का हृदय अभी श्वेत ही था। क्योंकि केवल बुलबुल के हृदय का रक्त ही गुलाब के हृदय को गहरा रक्तिम लाल कर सकता है।
और पौधे ने चिल्ला कर बुलबुल से कहा कि वह अपने वक्ष में काँटे को ज़ोर से भींच ले। ज़ोर से भींचो, नन्ही बुलबुल! और भी ज़ोर से, इससे पहले कि गुलाब पूरा लाल होने से पहले दिन ढल जाये।''
इसलिए बुलबुल ने काँटे को पूरे ज़ोर से भींच लिया, और काँटे ने उसके हृदय को छलनी कर दिया। बुलबुल की दर्दभरी एक तेज़ चीख़ निकली। असहनीय थी उसकी पीड़ा। प्रचण्ड हो गया उसका गायन, क्योंकि वह मृत्यु से सम्पूर्ण होने वाले प्रेम के बारे में गा रही थी, उस प्रेम के बारे में जो कब्र में जाकर भी जीवित रहता है। और वह अद्भुत गुलाब रक्तिम हो गया पूर्वी आकाश.सा। रक्तिम था गुलाब की पंखुड़ियों का रंग और माणिक.सा गहरा लाल था उसका हृदय।
लेकिन बुलबुल की आवाज़ हल्की पड़ गई, फड़फड़ा उठे उसके नन्हें पंख, और उसकी आँखों में एक पर्त्त - सी आ गई। मद्धिम होता गया उसका गायन, अवरुद्ध होने लगा उसका कण्ठ।
और फिर उसने अपने संगीत की अंतिम स्वर - लहरी बिखेर दी। चाँद इसे सुनकर उषा को भूल गया और आकाश में जमा रहा। लाल गुलाब ने इसे सुना, आनन्दातिरेक में काँप उठा और अपनी पंखुड़ियाँ सुबह की ठण्डी हवा के लिए खोल दीं। गूँज ने इसे पहाड़ों की अपनी बैंगनी कन्दरा तक ले जाकर सो, हुए गडरियों को उनके सपनों से जगा दिया। नदी के सरकंडों से होती हुई गूँज उसका संदेश समुद्र तक ले गई।
- देखो,देखो!'' पौधे ने कहा - गुलाब अब सम्पूर्ण हो चुका है।'' परन्तु बुलबुल ने कोई उत्तर नहीं दिया क्योंकि वह लम्बी घास में मृत पड़ी थी। उसके दिल में काँटा चुभा हुआ था।
और दोपहर को छात्र ने अपनी खिड़की खोलकर बाहर देखा।
- कितना भाग्यशाली हूँ मैं!'' वह चिल्लाया - यह रहा गुलाब ! अपने जीवन में मैंने तो इतना सुन्दर गुलाब नहीं देखा।यह इतना सुन्दर है कि अवश्य इसका कोई लम्बा - सा लातीनी नाम होगा।'' और उसने झुककर गुलाब तोड़ लिया।
हैट पहने,लाल गुलाब हाथों में लिए, वह प्रोफ़ेसर के घर की ओर भागा। प्रोफ़ेसर की बेटी, रील पर नीला रेशमी धागा लपेटते हुए, दरवाज़े में बैठी थी, और उसका छोटा - सा कुत्ता उसके पास बैठा था।
- तुमने कहा था तुम मेरे साथ नाचोगी अगर मैं तुम्हें लाल गुलाब ला दूँ तो।'' छात्र चिल्लाया - यह रहा विश्व का सबसे अधिक लाल गुलाब। तुम इसे अपने दिल के बिल्कुल पास सजाओगी और जब हम नाचेंगे तब मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ।'' लेकिन लड़की ने भृकुटी तान ली।
- लेकिन यह तो मेरी पोशाक से मेल ही नहीं खाता और, प्रबन्धक के भतीजे ने मेरे लिए कुछ असली मणियाँ भिजवाई हैं, और सब जानते हैं कि मणियाँ फूलों से ज़्यादा कीमती होती हैं।
- मैं कसम खा कर कहता हूँ कि तुम बहुत कृतघ्न हो।'' छात्र ने नाराज़ हो कर कहा और फूल को गली में फेंक दिया जहाँ से वह गन्दे नाले में गिर गया और एक ठेले के पहिए ने उसे कुचल दिया।
- कृतघ्न !'' लड़की ने कहा - तुम कितने अशिष्ट हो और फिर, तुम हो भी कौन। बस एक छात्र !मुझे क्यों तुम पर विश्वास नहीं है। भले ही तुम्हारे जूतों में चाँदी के बकल्ज़ हैं, लेकिन वे तो प्रबन्धक के भतीजे के जूतों में भी हैं।'' और वह अपनी कुर्सी से उठकर घर के भीतर चली गई।
- प्रेम भी कितनी हास्यास्पद चीज़ है!'' छात्र ने कहा और वहाँ से चल दिया। यह तो तर्क - शास्त्र की तुलना में आधा भी लाभदायक नहीं क्योंकि इससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता, और यह सदा हमें उन चीज़ों के बारे में बताता है जो कभी वास्तव में घटती ही नहीं, और हमें उन चीज़ों पर विश्वास करने को बाध्य करता है जो सत्य नहीं होतीं।वास्तव में प्रेम अव्यावहारिक है, और आज के युग में व्यावहारिक होना ही सब कुछ है, मैं फिर दर्शनशास्त्र और तत्व - मीमांसा का अध्ययन ही करूँगा।''
अपने कमरे में लौट कर उसने एक बड़ी.सी धूल - सनी किताब निकाली और पढ़ने लगा।
शनिवार, 30 अगस्त 2014
पतंगसाज
(मूल कहानी . The Kite Maker ( छत्तीसगढी अनुवाद - पतंगसाज )
अनुवादक - कुबेर
मूल कथाकार
RUSKIN BOND (रस्किन बांड)
संक्षिप्त परिचय
ब्रिटिश मूल के भारतीय नागरिक रस्किन बांड के जनम 19 मई 1934 म कसौली, हिमाचल प्रदेश के मिलिट्री अस्पताल म होय रिहिस। इंकर पिताजी ह ’रॉयल एयर फोर्स’ म नौकरी करय। जब इंकर अवस्था ह चार साल के होइस येकर माँ ह अलग हो गे, अउ 1944 म मलेरिया म इंकर पिताजी के फौत हो गे। तब अनाथ रस्किन बाण्ड ह अपन दादी संग देहरादून म रहे लगिस।रचना
The Room On The Roof इंकर प्रसिद्ध उपन्यास हरे जउन ल ये मन अपन 17 साल के अवस्था म लिख डरे रिहिन अउ 21 साल के इंकर अवस्था म येकर प्रकाशन होइस। पाछू चल के येकर दूसर भाग Vagrants Of The Valley लिखे गिस। दुनों के संघरा प्रकाशन 1999 म होइस। ये ह आत्मकथात्मक उपन्यास हरे जेमा अनाथ बच्चा मन के जीवन के वर्णन हे। लइका मन बर आप मन ह 30 ले जादा किताब लिखे हव। बाल साहित्यकार के रूप म आपके पहिचान हे।
फिल्मी जगत म काम
-आपके ‘A Flight Of Pigeon’ नाम के ऐतिहासिक उपन्यास ऊपर शशि कपूर ह 1978 म ’जुनून’ नाम केे फिल्म बनाइस।
- विशाल भारद्वाज ह आपके ‘Susann’s seven Husband’ नाम के कहानी ऊपर ’सात खून माफ’ नाम के फिल्म बनाइस। येमा आपो मन काम करे हव।
- The Blue Umbrella नाम के कहानी ऊपर विशाल भारद्वाज ह बाल-फिल्म बनाइस।
- The Room On The Roof ऊपर बी. बी. सी. ह टी.व्ही. धारावाहिक के निर्माण करिस।
पुरस्कार
- ’साहित्य अकादमी’ पुरस्कार 1992, बाल साहित्य लेखन खातिर '' Our Trees Still Grow in Dehraa '' ऊपर।
- भारत सरकार के ’पद्म श्री’ सम्मान 1999 म।
पतंगसाज ( छत्तीसगढी अनुवाद )
एक बहुत जुन्ना मस्जिद, जउन ह खण्डहर हो गे रिहिस, नमाजी मन जिहाँ नमाज पढ़ना छोड़ देय रिहिन हे, के दीवाल के दर्रा म एक ठन बर रूख जाम गे रिहिस। ये गली म, जउन ह गली रामनाथन के नाम से प्रसिद्ध रिहिस, खाली इही एके ठन पेड़ रिहिस, अउ येकरे डंगाली म छोटकू, अली के पतंग ह टंगा गे रिहिस।लइका ह, खाली पांव अउ सिरिफ चिरहा कुरता भर पहिरे, अपन इही संकुरी गली के धरहा पथरा के ऊपर (अपन घर कोती) दँउड़े जावत रिहिस, जिंहा आँगन के पिछवाड़ा म वोकर डोकरा बबा ह अपन मुडी ल डोलावत दिन के अँजोर म घला सपना देखत बइठे रिहिस।
- '' बबा, बबा! '' लइका ह चिल्लाइस, '' पतंग ह चल दिस।''
डोकरा ह झकनका के अपन सपना ले जागिस अउ मुड़ी उचा के, अपन पक्का दाढ़ी संग खेलत जेला मेंहदी रचा के अभी तक रंगे नइ गे रिहिस, देखिस।
- '' वोकर डोरी ह टूट गिस का ?'' वो ह पूछिस। ''मंय ह जानथंव, वो पतंग के डोरी ह वइसन नइ रिहिस, जइसन होना चाही।''
- '' नहीं बबा! पतंग ह बर रूख म अटक गिस हे।''
डोकरा ह खुलखुल-खुलखुल हॉंसिस। '' मोर छुटकू, तोला अभी ले घला पतंग उड़ाय बर नइ आइस। अउ तोला सिखाय के अब मोर उमर नइ हे। बस अतका बात हे। फेर कोई बात नही, दूसर ले जा।'' अभी-अभी वो ह बांस के बान, कागज अउ झेंझरहू सिलकन कपड़ा ले एक ठन नवा पतंग बना के वोला सुखाय बर घाम म मड़ाय रिहिस। ये ह पींयर-गुलापी रंग के रिहिस, हरियर पूछी वाले। डोकरा ह येला अली ल दे दिस, अउ अली ह अपन दुनों एड़ी मन ल उठा के खुद ल उचाइस अउ डोकरा के चेपलवा गाल मन ल चूम लिस।
- '' येला मंय ह नइ गवांव,'' वो ह किहिस, '' ये पतंग ह तो चिरइ मन सही उड़ही।''
अउ वो ह अपन एड़ी के बल घूमिस अउ देखते-देखत गायब हो गिस।
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घाम तापत-तापत डोकरा ह अपन सपना म फेर खो गिस। वोकर पतंग के दुकान ह उरक गिस, दुकान अउ वोकर सबो समान ल बहुत साल पहिलिच् वो ह एक झन कबाड़ी वाले तीर बेच देय रिहिस। फेर अपन मन-बहलाय बर अउ अपन छुटकू, नाती अली के खेले बर वो ह आजो घला पतंग बनाय के काम ल नइ छोड़े हे। आजकल के जमाना म पतंग के खरीददार जादा नइ रहि गिन। बड़े मन अब येकर तिरस्कार करथें, लइका मन अपन पइसा ल सिनेमा देखे म खरचा करना चाहथें। येकर अलावा पतंग उड़ाय बर अब जघच् कतका बचे हे। शहर ह (पतंग बाजी के) हरा-भरा मैदान ल लील डारिस जउन ह जुन्ना किला के दीवाल ले लेके नदिया के करार तक फैले रिहिस।
फेर डोकरा ह वो जमाना के सुरता करथे जब मैदान म इक्का-दुक्का पतंग उड़तिस अउ देखते-देखत पतंगबाजी के महाभारत शुरू हो जातिस। जब तक कोनो एक ठन पतंग के डोरी ह कटा नइ जातिस, पतंग मन ह घूम-घूम के एक दूसर ऊपर झपट्टा मारतिन, अउ गुत्थमगुत्था हो जातिन। तब हारे, पन सुतन्त्र पतंग ह तंउरत-तंउरत नीला अगास म कोन जानी कोन लोक म गायब हो जातिस। बड़े-बड़े बाजी लगतिस अउ पइसा ह सरलग येकर हाथ ले वोकर हाथ किंजरत रहितिस।
तब पतंगबाजी ह नवाब अउ राजा-महाराजा मन के खेल रिहिस। डोकरा ह सुरता करथे कि ठाट-बाट के वो जमाना म तब कइसे नवाब अउ राजा-महाराजा मन खुद हो के अपन सब संगी-संगवारी अउ हितु-पिरीतु मन संग नदिया के खड़ोर म सकला जातिन। कागज के ये नचकार संग हँसी-खुशी म समय बिताय बर तब लोगन कना बहुत समय रहय। अब तो हर आदमी ल जल्दी हे, काम सधाय के जल्दी हे, अउ जल्दबाजी म पतंगबाजी अउ दिनमान के सपना देखई, जइसन नाजुक चीज ल वो मन अपन पाँव तरी रमजत जावत हें।
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पतंगसाज महमूद, जब वोकर जीवन के अच्छा दिन रिहिस, ये शहर म भला वोला कोन नइ जानय? नवा-नवा ढंग, नवा-नवा डिजाइन के वो ह पतंग बनातिस, अउ वोकर बनाय कतरो पतंग मन ह तीन अउ चार रूपिया तक म बेचा जातिस। नवाब के कहे म एक घांव वो ह बड़ विचित्र ढंग के पतंग बनाय रिहिस; अतका विचित्र ढंग के कि वइसन पतंग वो जिला भर के कोनो आदमी ह कभू कहीं नइ देखे रिहिन हें। येला बहुत पतला कागज के नान्हें-नान्हें ढेर सारा चकती मन ल, कमचील के बारीक-बारीक बांक के चौंखटा मन म लगा-लगा के, लाइन से एक के पीछू दूसर ल जोड़-जोड़ के बनाय गे रिहिस हे। डगमगाय झन कहिके (बैलेंस बनाय खातिर) वो ह कागज के सबो चकती मन के आखिरी छोर मन म दूबी के डारा मन ल बांध देय रिहिस। सबले अव्वल नंबर के चकती के ऊपर वाले भाग ह थोकुन डिपरहा रिहिस, अउ वोमा बड़ मजेदार चेहरा के पेंटिग करे गे रिहिस हे, जेमा नान्हें-नान्हें गोल दर्पण के दू ठन आँखी बनाय गे रिहिस। मुड़ी कोती के चकती ह सबले बड़े, फेर वोकर पीछू वाले मन छोटे, अउ छोटे, अउ सबले आखरी वाले ह सबले छोटे रिहिस जेकर ले वो पतंग ह जमीन म रेंगने वाला कोनों अजीब अउ भयंकर डरावना प्राणी कस दिखत रहय। भारीभरकम ये पतंग ल जमीन ले ऊपर उठा के उड़ाय बर बड़ भारी कलाकारी के जरूरत रिहिस अउ ये काम ल खाली महमूदेच् ह कर सकत रिहिस।
येमा कोई शक के बात नइ रिहिस, हर आदमी ह सुन डरे रिहिस कि महमूद ह बड़भारी अजगर सरीख (ड्रेगन) पतंग बनाय हे, अउ चारों कोती यहू अफवाह बगर गे रिहिस कि वोकर भीतर मरी-मसान के पइधारो हो गे हे। जब मैदान म वोला नवाब के आगू, जनता के बीच पहली घांव उड़ाय गिस, वो दिन बड़ भारी भीड़ जुरिया गे रिहिस। पहिली कोशिश म तो वो पतंग ह हालिस तको नहीं। वोकर चकती मन ह भयंकर अवाज करिन अउ गरगरा के उड़े बर इनकार कर दिन, वोकर आँखी मन म सुरूज ह चमकत रहय, अउ वो पतंग ह सचमुच के जीता-जागता कोनो भयंकर जीव कस दिखत रहय।
अउ तभे सही दिशा डहर ले अच्छा, बने ढंग के पवन चले के शुरू होइस अउ वो राक्षस बरोबर पतंग ह हवा म तंउरे लगिस, ऊपर, अउ ऊपर जाय बर छटपटाय लगिस, कांच के वोकर आँखीं मन ह सुरूज म डरडरान असन चमकत रहय। वो पतंग ह जब भयंकर जोर लगा के डोरी ल खींचे लगिस तब महमूद के बेटा मन ह घला वोला संभाले बर मदद करे लगिन। तभो ले वो पतंग ह खींचते गिस, मुक्त होय के चाह म, अपन जीवन ल सुतंत्र ढंग ले जीये बर।
अउ तब विही होइस जउन होना रिहिस। डोरी ह टूट गे, पतंग ह सूरज के दिशा म गोता खाय लगिस अउ अंत म उड़त-उड़त आँखी ले ओझल हो गे। वो ह फेर कभू नइ मिलिस, अउ पीछू चल के महमूद ल खुदे अचरज होइस कि वो ह अतका जीता-जागता, जीवित प्राणी कस पतंग बनाय रिहिस। वोकर बाद वो ह वइसन पतंग अउ नइ बनाइस, फेर वोकर बदला वो ह नवाब ल भेट करे खातिर एक ठन संगीत के सुर निकालने वाला पतंग (म्यूजिकल काइट) बनाइस जउन ह उड़े के समय वीणा के धुन कस अवाज करे।
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हाँ! तब वो ह फुरसत के जमाना रिहिस। फेर बहुत साल पहिली नवाब के फौत हो गे; वोकर वंशज मन गरीब हो गें, महमूदे के समान। पतंगसाज मन के, कवि मन के, विही मन तो माई-बाप रिहिन; महमूद के अब कोई नइ रहि गिस। वोकर अब कोनों पुछंता नइ रहि गिस, वोकर नाम अउ वोकर धंधा सब उरक गिस, अब हालाकि ये गली म हजारों आदमी रहिथें, फेर अपन पड़ोसी के चिंता कोनों नइ करंय।
जब वो ह छोटे रिहिस अउ बीमार पड़े रिहिस, तब अड़ोसी-पड़ोसी मन रहि-रहि के वोकर हालचाल पूछे बर आवंय। अब जब वोकर जीवन के अंतिम समय आवत हे, वोला देखे बर कोनो नइ आवंय। वोकर जुन्ना संगवारी मन म जादातर ह गुजर गे हें। वोकर (महमूद के) लइका मन जवान हो गे हें; एक झन ह विहिचे एक ठन गैरेज म काम करथे, दूसर ह देश के बंटवारा के समय पाकिस्तान म जा के बस गिस।
जउन लइका मन दस साल पहिली वोकर ले पतंग बिसावंय, वहू मन अब जवान हो गे हें; अपन घर-परिवार चलाय बर मरत-खपत हें, ये डोकरा बर अउ वोकर हालचाल पूछे बर उँकरो मन तीर अब समय नइ हे। छिन-छिन म तेजी से बदलत, कंपीटीसन के ये युग म उँकर नजर म पतंग बनइया ये डोकरा अउ वो बरगद के जुन्ना पेड़ म कोनों फरक नइ हे। दुनों झन ले अब कोनों ल कोई सरोकार नइ हे, चारों मुड़ा ले वो मन आदमी अउ आदमी के भीड़ ले घिरे हें, फेर उँकर मन बर वो मन बीते जुग के फालतू चीज बरोबर हो गे हें। जादा दिन नइ होय हे, पारा भर के आदमी बरगद के छाँव म जुरियातिन, अपन समस्या के बारे म चर्चा करतिन (दुख-पीरा के गोठ ल गोठियातिन), नवा काम के योजना बनातिन; अब तो कोनों-कोनों भूले-भटके मन खाली गर्मी के दिन म सूरज के ताप ले बचे खातिर, सुस्ताय बर येकर छाँव म आ जाथें।
फेर, अब तो वोकर फिकर करइया एके झन बाच गे हे, वोकर नाती। एक बात अच्छा हे कि वोकर बेटा ह वोकर नजीके म काम करथे, वो अउ वोकर दमाद मन वोकरे घर म रहिथें। जब वो ह अपन नाती ल ठंड के सुहाती घाम म खेलत देखथे, डट के खातू-पानी म दिन-दिन हरियावात, नवा-नवा डारा-पाना उल्होवत कोनों पेड़ कस जवान होवत देखथे, तब वोकर हिरदे ह गद्गद् हो जाथे।
पेड़ अउ आदमी म गजब के बराबरी हे। दुनों मन एक जइसे बाढ़थें, यदि कोनों इनला नुकसान झन पहुँचाये , या खाय-पिये म कमी झन होय, या कोनों कांटे झन। अपन जवानी के दिन म ये मन बड़ा दिव्य (मस्त-मलंग) लगथें अउ बुढ़पा के दिन म इंकर कनिहा ह नव जाथे। बीते जुग के सुरता करथें, अपन कमजोर बाजू मन ल सूरज के अंजोर डहर उठाथें, आह भरथें अउ अपन अंतिम पाना के झरत ले झांव करत रहिथें।
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महमूद ह घला बरगद के पेड़ कस हे, जेकर हाथ मन ह अब बंधा गे हे, कोनों जुन्नेट पेड़ के जर मन सरीख अँइठ गे हें। अली ह आँगन के छोर म (अभी-अभी) जामत छुईमुई के पेड़ कस हे। पीछू दू साल म दूनों झन, वो अउ वो पेड़ ताकत अउ आत्मविश्वास बटोरत आवत हें जउन ह जवान मन के विशेष लक्षण होथे।
गली के अवाज ह धीरे-धीरे मद्धिम पड़त गिस, महमूद ल अचरज होइस कि कहीं वोला नींद तो नइ आवत हे अउ वो ह जइसे अक्सर वोकर संग होथे सपना देखे लगिस कि वो ह हिन्दू मन के भगवान विष्णु के प्रसिद्ध सवारी, दुधिया सफेद रंग के सुंदर, ताकतवर पंछी, गरूड़ के समान एक ठन सुंदर बड़ेजन पतंग बनावत हे।
वो ह अपन नाती अली बर अइसने एक ठन अद्भुत पतंग बनाय के अक्सर सोचय। वोकर तीर अउ तो कुछू नइ रिहिस, लइका खातिर छोड़ के जाय बर।
थोरिक दुरिहा ले वो ह अली के अवाज सुनिस, फेर वोला परतिंग नइ होइस कि लइका ह विही ल पुकारत हे। अइसे लगिस कि अवाज ह बहुत दुरिहा ले आवत हे।
अली ह आँगन के मुहाटी म खड़े हो के पूछत रिहिस कि वोकर माँ ह अभी तक बजार ले लहुटिस कि नहीं। जब महमूद ह कोनों जवाब नइ दिस, लइका ह नजीक आ के अपन सवाल ल दुहराइस। सूरज के तिरछा किरण ह वोकर चेहरा म चमकत रहय, एक ठन नानुक तितली ह वोकर हवा म लहरावत दाढ़ी म बसेरा कर ले रहय। महमूद ह एकदम शांत परे रहय; अउ जब अली ह अपन छोटे-से भुरवा हाथ ल वोकर खांद म मड़ाइस, वो ह कोनों हरकत (चिटपोट) नइ करिस। लइका ह एकदम मद्धिम अवाज सुनिस, जइसे वोकर जेब म रखे बाँटी मन ह रगड़ावत होंय।
घबरा के अचानक अली ह घूमिस, मुहाटी तीर गिस, अउ अपन माँ ल पुकारत वो ह गली म भाग गिस। अउ तभे अचानक हवा के ताजा झोंका आइस, अउ बरगद के वो पेड़ म अटके वो पतंग ल उड़ा के ले गिस, रात-दिन संघर्षरत (हाय-हाय करत) अउ थके मांदे ये शहर ले दुरिहा, नीला अगास म ऊपर, अउ ऊपर।
व्याख्याता,
शा.उच्च.माध्य. शाला कन्हारपुरी,
गुरुवार, 28 नवंबर 2013
विष्णु भगवान के पदचिन्ह
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| कुबेर |
मूल कथा : Marks of Vishnu
छत्तीसगढ़ी अनुवाद- विष्णु भगवान के पदचिन्ह
मूल कथाकार - खुशवंत सिंह
अनुवाद - कुबेर
’’ये ह कालिया नाग खातिर’’ सासर म दूध ल ढारत-ढारत गंगा राम ह किहिस - ’’रोज संझा कुन कोठ तीर के बिला मेर मंय ह येला मढ़ाथंव अउ बिहिनिया के होवत ले दूध ह सफाचट हो जाथे।’’
’’का पता, बिलई ह पीयत होही।’’ हम नवजवान मन वोला सुझाव देयेन।
’’बिलई!’’ गंगा राम ह हमन के घोर निंदा करिस अउ किहिस - ’’ये बिला के नजीक कोनो इलई-बिलई नइ जा सकय। इहाँ कालिया नाग ह रहिथे। मंय ह वोला जब ले दूध पिलावत हंव, घर के कोनों ल वो ह डसे नइ हे। तुमन बिना पनही-चप्पल के चल सकथव, बेधड़क जिहाँ चाहव खेल सकथव।’’
हमला गंगा राम के संरक्षण के कोनों जरूरत नइ रिहिस।
’’डोकरा पंडित, तंय ह मूरख हस।’’ मंय ह केहेंव - ’’साँप ह दूध नइ पियय, का तंय नइ जानस ? कोनों सांप ह एक सासर दूध ल नइ पी सकय। हमर गुरूजी ह बताथे कि साँप ल गजब दिन के बाद म भूख लगथे। कतरो दिन म वो ह कुछू खाथे। एक घांव कांदी म हमन एक ठन सांप देखे रेहेन जउन ह मेचका ल लीलत रहय। मेचका ह वोकर टोंटा म गांठ बरोबर अटके रहय। मेचका के पचे म अउ पुछी तक जाय म कतरो दिन लगथे। हमर स्कूल के प्रयोगशाला म स्पिरिट (मेथिलेटेड स्प्रिट) म डूबे दर्जनों साँप हे। पीछू महीना हमर गुरूजी ह नकडेवन बजइया मन कना ले एक ठन सांप लेय रिहिस जउन ह दुनों डहर ले रेंगय। वोकर पुछी डहर घला मुड़ी अउ आँखी रिहिस हे। कांच के जार म जब वोला ओइलाइस, वोकर हालत ह देखे के लाइक रिहिस। प्रयोगशाला म अउ दूसर जार नइ रिहिस तउने पाय के गुरूजी ह विही एके ठन ल लेइस। वो ह करैत साँप रिहिस। वोकर मुड़ी-पुछी दुनों डहर ल धर के कांच के जार म ओइला दिस अउ जार के डंकना ल धरारपटा ढांक दिस। भीतर वो ह गोल-गोल गुरमुटा गे अउ अब तो वो सड़-गल गिस हे।
ये बात ल सुन के गंगा राम ल अबड़ दुख होइस अउ अपन दुनों आँखीं मन ल मूंद के वो ह भगवान के नाव जपे लगिस।
’’तुंहला अपन करनी के फल एक न एक दिन भेगे बर पड़ही। हाँ, जरूर भोगे बर पड़ही।’’
गंगा राम संग बहस करे म कोनों फायदा नइ रिहिस। वो ह एक कट्टर हिन्दू रिहिस हे जउन ल दुनिया के रचयिता ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु, अउ संघार करने वाला भगवान शिव के ऊपर पक्का विश्वास रिहिस हे, सब ले जादा भगवान विष्णु के वो ह भक्त रिहिस हे। रोज बिहिनिया वो ह पूजा-पाठ करतिस अउ माथा म चंदन ' v ' आकार के भगवान विष्णु के टीका लगातिस। हालाकि वो ह ब्राह्मण रिहिस, अनपढ़़ अउ अंध विश्वासी रिहिस। वोकर अनुसार दुनिया म सब जीव ह पवित्र हे, चाहे वो ह साँप होय, बिच्छू होय, कनखजूरा होय। जब वो ह कोनों साँप बिच्छू ल देखतिस, वोला तुरते दुरिहा खेदार देतिस ताकि वोला कम से कम हमन झन मार सकन। कोनों दतैया ल जब हमन अपन बेडमिंटन रैकिट म फांसे के कोशिश करतेन तब वो ह वोला तुरते बचाय के कोशिश करतिस। वोकर नुकसान होवल पंख मन के देख-भाल करे के कोशिश करतिस। ये कोशिश म कभू-कभू वोला डंक खाय बर घला पड़ जाय। सांप ह वोकर ये विश्वास ल डिगा नइ सकय। सब ले जादा खतरनाक जानवर सांप ह होथे फेर वोकर बर इही ह सब ले जादा पूजनीय रिहिस। वहू म डोमी, कालिया नाग ह वोकर खातिर सबले जादा पूजनीय रिहिस।
’’तोर कालिया नाग ह हमला दिख गे तब हम वोला मार देबोन।’’
’’अइसन भूल के झन करना। वो ह सैंकड़ों गार पारे हे। तुम यदि वोला मारेय तब वो सब्बो गार मन ले एक - एक ठन कालिया नाग निकलही अउ वो मन ह तुँहर घर भर म छाप जाहीं। तब तुमन का करहू ?’’
’’हम वोला जिंदा धर-धर के मुंबई भेज देबोन। उहाँ वोला दुहहीं, वोकर बिख ल निकाल के साँप डसे के बिख उतारे के दवाई बनाहीं। एक ठन जिंदा साँप के दू रूपिया देथें। तब तो सीधा-सीधा दू सौ रूपिया के कमाई हो जाही।’’
’’तुँहर डॉक्टर मन के थन होवत होही। साँप के थन मंय ह कभू नइ देखे हंव। फेर कहि देथंव! वोला छुए के कोशिश कभू झन करना। वो ह फनियार नाग हरे, वोकर कतरो अकन फन हे। मंय ह वोला देख डरे हंव। वो ह तीन हाथ लंबा हे। वोकर फन ह अइसन हे,’’ गंगा राम ह अपन हाथ के हथेली ल खोल के फन सरीख बना के बताइस अउ अपन मुड़ी ल डेरी-जेवनी डोलाय लगिस। ’’तुम वोला आँगन (लॉन) म घाम तापत देख सकथव।’’
’’तोर ये बात ले साबित हो गे कि तंय ह झुठल्ला हस। फनियार साँप ह नर होथे, तब वो ह सौ-सौ ठन गार पारिच् नइ सकय। तब तो वो गार मन ल जरूर तहिंच ह पारत होबे।’’
हमर दल म सब झन जोरदार ठठा हे हाँस दिन।
’’जरूर गंगराम के गार होही, तब तो एके संघरा सौ-सौ झन गंगा राम देखे बर मिलही।’’
गंगा राम ह चुरमुरा के रहिगे। बहुँत झन नौकर रहंय फेर लइका मन गंगा राम संग जादा मस्ती करंय। वो मन वोला रोज नवा-नवा तरीका ले सतातिन। येमा कोनों मन धरम ग्रंथ नइ पढंय। महात्मा के अहिंसा संबंधी बिचार ल घला नइ जानंय। इंकर तीर चिड़ीमार बंदूक हे जउन म चिराई मन ल मारथंय, अउ जार हे स्पिरिट के, साँप मन ल धरे बर।
गंगा राम ह अपन बिचार ल जीवन के पवित्रता संग जोड़ के देखय। वो ह साँप ल दूध पियाय, वोकर रक्षा करय, काबर कि दुनिया म साँप ह भगवान के सब ले जादा क्रोधी रचना आय। वोला मारे के बजाय वोकर संग प्रेम करव, तब तुमन अपन आप ल साबित कर सकथव।
गंगाराम ह अपन आप ल सिद्ध करना चाहत रिहिस। वोकर बिचार ह भले साफ-साफ समझ म नइ आय फेर वो ह खुद ल साबित करेच् बर रोज सांझकुन साँप के बिला तीर म सासर भर दूध मढ़ातिस जउन ह बिहिनिया के होवत ले सफाचट हो जाय रहितिस। 0
एक दिन हमन एक ठन कालिया नाग देखेन। अषाड़ लग गे रिहिस (मानसून ह सक्रिय हो गे रिहिस) अउ वो दिन रातभर पानी गिरे रिहिस। धरती, जउन ह सूरज के तपन के मारे हलाकान हो गे रिहिस, जीव-जंतु अउ आनंद ले फेर भर गे रिहिस। नान-नान डबरा मन म मेचका मन ह टोरटोरावत रिहिन। चारों मुड़ा चिखलच् चिखला हो गे रिहिस जउन म गेंगड़ुवा, कनखजूरा अउ मखमली बीरबहूटी मन रेंगत रहंय। केला के पाना मन घला हरियर-हरियर छितराय रहंय। कालिया नाग के बिला म पानी भर गे रिहिस होही अउ वो ह आंगन म एक ठन सुक्खा असन जघा म मेंडऱी मारे बइठे रहय। सूरज के अंजोर म वोकर करिया, चमकदार फन ह चमकत रहय। वो ह बड़े जबर रिहिस, कम से कम छै फुट के रिहिसेच् होही अउ मरूवा कस मोट्ठा रिहिस होही।
’’वो देख, डोमी साँप। चलो वोला पकड़बोन।’’
कालिया नाग ल पकडऩा सरल नइ होवय। जमीन ह चिखलहूँ हो गे रिहिस। बिला अउ नाली मन म पानी भर गे रिहिस। गंगा राम ह घर म नइ रिहिस।
कालिया नाग ह कुछू खतरा भांप पातिस वोकर पहिलिच हमन वोला घेर लेयेन। हमन के हाँथ म बाँस के लउठी रिहिस हे। कालिया नाग ह हमन ल देख के जोर-जोर से फुफंकारे लगिस। वोकर आँखी मन अंगारा कस बरे लगिस अउ लुकाय बर वो ह केरा पेड़ डहर रेंगे लगिस।
जमीन ह एकदम दलदली हो गे रिहिस जउन म वो ह घिसटत रिहिस। मुश्किल से पाँच गज सरके रिहिस होही जब एक ठन लउठी ह वोकर पीठ म बीचों बीच दनाक ले परिस अउ वोकर कनिहा ह टूट गे। रकत संग वोकर लादी-पोटा ह निकल गे अउ चिखला म सना गे। वोकर मुड़ी ह कुछू नइ होय रिहिस हे।
’’वोकर मुड़ी ल झन कुचरो,’’ एक झन संगवारी ह चिल्ला के किहिस - ’’कालिया नाग ल पकड़ के हमन अपन स्कूल म लेगबोन।’’
वोकर पेट खाल्हे लउठी डार के वोला हमन उठायेन अउ बिस्कुट के एक ठन टीपा म भर के टीपा ल डोरी म कस के बाँध देयेन। टीपा ल खटिया खाल्हे लुका देयेन। रात म गंगा राम ह मोरे तीर रिहिस। मंय ह सांप खातिर सासर म दूध मड़ाय के वोकर अगोर करत रेहेंव। ’’आज रात तंय ह अपन कालिया नाग बर दूध नइ मड़ास?’’
’’हाँ।’’ गंगा राम ह किहिस - ’’जा, तंय ह सुत।’’
वो ह ये बारे म जादा बात नइ करना चाहत रिहिस।
’’अब वोला दूध पियाय के कोनों जरूरत नइ हे।’’
गंगा राम ह ठहर गे।
’’काबर ?’’
’’ओह! कुछू नहीं। अब तो बिकट मेचका हो गे हें। वोला दूध ले जादा सुवाद मेचका म आथे। आज तक तंय दूध म कभू शक्कर नइ मिलायेस।’’
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बिहिनिया गंगा राम ह सासर ल धर के आइस। वोमा रात के दूध ह जस के तस बाँचेच् रहय। वोह बेहद उदास अउ संसो-फिकर म दिखत रहय।
’’मंय ह तोला केहेंव न कि वो ह दूध ले जादा मेचका खाना पसंद करथे।’’
जब तक हमन नाश्ता नइ कर लेयेन, कपड़ा नइ बदल लेयेन, गंगाराम ह हमर तीर ले टरिस नहीं। स्कूल बस आइस। हमन वो टीपा सहित स्कूल बस म चड़ गेन। बस ह जब रेंगे लगिस, टीपा ल बाहिर खींच के गंगा राम ल देखायेन, केहेन - ’’तोर कालिया नाग ह इहाँ हे एकदम सुरक्षित। येला हमन ह स्पिरिट म रखे बर लेगत हन।’’
गंगा राम ल अवाक अउ बेहद दुखी खड़े छोड़ के हमन बस म चढ़ के निकल गेन।
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स्कूल म हो हल्ला हो गे। हमन चार भाई हन। चारों झन मन बहादुर माने जाथन। ये बात ल एक घांव हमन फेर साबित कर देयेन।
’’डोमी ( किंग कोबरा)। ’’
’’छै फुट लंबा।’’
’’फनियार।’’
टीपा ल विज्ञान के शिक्षक ल सौंपे गिस। अब वो ह गुरूजी के टेबल ऊपर माड़े रिहिस। सांस रोक के हम टीपा खुले के अगोरा करत रेहेन। गुरूजी ह अलग तरीका अपनाइय। वोला काम करे म थोकुन अड़चन होवत रिहिस। वो ह सांप धरे के चिमटा ल मंगाइस। गंदलहा स्पिरिट म सरत करैत के जार ल मंगाइस। वो ह गुनगुनावत टीपा के डोरी ल खोले लगिस।
डोरी ह जइसने ढीला होइस, टीपा के ढकना ह सांय ले हवा म उड़ाइस। गुरूजी के नाक ह मुश्किल से बाँचिस। उहाँ अब कालिया नाग ह फन काढ़े खड़े रहय। वोकर आँखी मन अंगारा के समान दहकत रहय। वोकर साबुत फन ह कसाय रहय। वो ह गुरूजी के मुँहू डहर फुफकारिस। खुद ल बचाय बर गुरूजी ह पीछू कोती झूलिस अउ कुरसी समेत गिर गिस। फर्रस म गिरे-गिरे वो ह टकटकी लगा के साँप कोती देखत रहय अउ डर के मारे लदलद - लदलद कांपत रहय। वोकर डेस्क के चारों मुड़ा खड़े पढ़इया लइका मन जोर-जोर से चिल्लाय लगिन।
कालिया नाग ह अपन बरत आँखी म चारों मुड़ा घूम के देखिस। वोकर दुफंकिया जीभ ह उत्ताधुर्रा मुँहू के भीतर-बाहिर होवत रहय। वो ह विकराल दिखत रहय अउ भागे के कोशिश करत रहय। वो ह टीपा सुद्धा भद् ले फर्रस ऊपर गिरिस। वोकर कनिहा ह कतरो जघा ले टूटे रहय। बड़ तकलीफ म वो ह फर्रस म घसीटत मुहाटी कोती रेंगिस। जब वो ह मुहाटी म पहुँचिस, फन काढ़ के खतरा भांपे के फेर कोशिश करिस।
कक्षा के बाहिर सासर अउ मग्गा म दूध धर के गंगा राम ह खड़े रहय। जइसने वो ह कालिया नाग ल आवत देखिस, मडिय़ा के बइठ गे। सासर म दूध ल ढारिस अउ वोला मुहाटी तीर मढ़ा दिस। वो ह प्रार्थना म अपन दुनों हाथ ल जोड़ लिस अउ क्षमा मांगत-मांगत अपन मुड़ी ल भुँइया म मढ़ा दिस।
साँप ह भयंकर फुफकार मारिस अउ गंगा राम के मुड़ी ल डस लिस। अउ बड़ जोरदार ताकत लगा के नाली म कूदिस अउ आँखी ले ओझल हो गिस।
अपन चेहरा ल अपन हथेली म तोप के गंगा राम हा भुँइया म गिर गे। वो ह दरद के मारे कराहे लगिस। बिख ह बड़ जल्दी वोकर शरीर ल जकड़ लिस। कुछेक मिनट के भीतर वोकर शरीर ह पीला अउ नीला पड़ गे। वोकर मुँहू डहर ले गजरा निकले लगिस। वोकर माथा म रकत के कुछ बूँद दिखत रहय। गुुरूजी ह रूमाल म वोला पोंछ दिस। माथा म, जिहाँ वो ह ' v ' आकार टीका लगाय रहय, वोकरे खाल्हे साँप ह वोला डसे रहय।
पता
व्याख्याता
शासकीय उच्च्तर माध्यमिक शाला कन्हारपुरी
वार्ड - 28, राजनांदगांव ( छ.ग.)
E mail : kubersinghsahu@gmail.com
बुधवार, 27 नवंबर 2013
जीत
शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत
अनुवादक - डॉ. विजय शिंदे
मैदान में चारों ओर भीड़ उमड़ पड़ी थी। चारों तरफ लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। पास - पड़ोस के गांवों के सारे लोग मुकाबला देखने के लिए मैदान में इकठ्ठा हो रहे थे।
जैसे ही समय नजदीक आने लगा। एक - एक बैलगाड़ी मुकाबले के स्थान पर आकर खड़ी होने लगी। गांव के तुका पाटिल की भी गाड़ी वहां आकर खड़ी हो गई। जैसे ही उसकी गाड़ी आ गई लोगों का हुजूम उसकी ओर उमड़ पड़ा। गाड़ी के चारों तरफ घेरा करके खड़े हो गए। उसकी ओर दर्शक पागलों की तरह देखने लगे।
तुका पाटिल ने गाड़ी को अपना बूढा हर्ण्या बैल जुतवाया था। हर्ण्या अपने साथी जवान खिलारी गाय और बैलों की एक अच्छी नस्ल जो केवल पश्चिम महाराष्ट्र में पाई जाती है। सांड़ के साथ खड़ा था और लोग उसकी ओर आश्चर्य से बिना पलक झपकाएं देख रहे थे। असल में लोगों को मालूम भी था कि जवानी में हर्ण्या ने कई मुकाबले जीते थे। उसकी दौड़ ताकत और खासियतें किसी से छिपी नहीं थी। यह सच था कि सारे इलाके में नाम कमाने वाला वह अकेला बैल था। लेकिन अब वह बूढा हो चुका था। उसकी पसलियां निकली थी। वह पूरी तरह थक चुका था। चेहरे और शरीर पर अब तेज नहीं था। अपने साथी खिलारी जवान बैल के साथ कैसे दौड़ सकगा लोग चकित थे चिंतित भी हो रहे थे और तुका पाटिल को मन ही मन कोस रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पागल ने बूढे बैल को क्यों जोता है ?
धीरे - धीरे गाडिय़ों की संख्या बढऩे लगी और मुकाबले की कतार में खड़ी होने लगी। कुछ बैल फूर - फूराने लगे। किसी के जवान सांड़ जैसे बैल डरकने लगे। कोई गर्दन झुका कर सींग हिला रहा था, और कोई खुरों से जमीन खुरच रहा था। हर्ण्या का साथी भी मचल रहा था। सारे लोगों की नजरें हर्ण्या पर टिकी थी। वे उसे टकटकी लगा देख रहे थे। हर्ण्या की गति और दौडऩा उन्हें मालूम था। उसकी तेज रफ्तार से सभी परिचित थे। एक जगह पर ठहरी हुई बैलगाड़ी के साथ वह कभी भी शरारतें नहीं करता था। डरकता नहीं। सींग हिलाता नहीं। लेकिन एक बार दौडऩा शुरू हुआ और पहियों की खडख़ड़ाहट कानों पर पड़ी कि उसके पांव हवा से बातें करने लगते थे। पहियों की आवाज के साथ वह छलांगे भरने लगता था। उसे कभी भी हांकने की जरूरत नहीं पड़ती थी। समय आ भी गया तो वह अपने साथी बैल को भी खिंचते हुए दौडऩे लगता था!
हर्ण्या की दौड़ के बारे में किसी को शक नहीं था, लेकिन अब उसकी उम्र हो गई थी। बाजार या मेले जाते वक्त एकाध झलक दिखाना अलग बात होती है और मैदान में उतर कर दौडऩा अलग। यह जिम्मेदारी वह कैसे निभाएगा, इसकी चिंता दर्शकों को सता रही थी। और इधर तुका बेफिक्र था। हर्ण्या भले ही बूढा हो पर उसका उस पर भरोसा था। लोग चिंतातुर होकर उसकी गाड़ी की ओर देख रहे थे और तुका बेफिक्री से चेहरे पर हंसी बिखराते उनकी ओर देख रहा था।
इशारा हो गया। बैलगाडिय़ां दौडऩे लगी, पहियों की खडख़ड़ाहट शुरू हो गई। हर्ण्या के अंग - अंग में फूर्ति आने लगी। सभी को चिंतित करने वाला बूढा बैल जवान घोड़े के समान लंबी - लंबी छंलागे भरने लगा। उसके पांव जमीन पर ठहरने का नाम नहीं ले रहे थे। साथ वाले दूसरे खिलारी जवान बैल की बाजू पीछे पडऩे लगी। देखते ही देखते बाकी बैलगाडिय़ों को पीछे छोड़ते हुए बूढे बैल की गाड़ी आगे निकलने लगी। तूफानी रफ्तार से हर्ण्या अंतर कम करने लगा। दूसरे गाड़ीवान औंधे हो - होकर बैलों पर कोड़े बरसाने लगे। सभी लोग पागलों की तरह आंखें फाड़ कर देख रहे थे।
बैलगाडिय़ां दूर - दूर गई, आंखों से ओंझल हो गई। इधर लोगों की जबान पर हर्ण्या की बातचीत शुरू हो गई। जैसे - जैसे बैलगाडिय़ां वापस लौटने का समय हो गया वैसे - वैसे दर्शक गर्दन उठा - उठा कर देखने लगे। आस पास के सारे पेड़ दर्शकों से लदा - लद भर गए। दूर से ही गाड़ीवानों का शोर और पहियों की आवाज कानों पर पड़ रही थी। वैसे ही दर्शकों का मन मचलने लगा यह जानने के लिए कि किसकी गाड़ी आगे है ? लोग टीलों पर, पेड़ों पर चढ़ - चढ़कर देखने लगे। उसी समय एक पेड़ से कोई जोर से चिल्लाया - बैलगाड़ी आ गई, बैलगाड़ी आ गई। बूढे बैल की ही!
दर्शकों की उत्सुकता चरम पर थी। वे मैदान में इधर - उधर दौड़ कर अपनी जगह पक्की करने लगे ताकि बैलगाडिय़ों को साफ देख सके। मानो उनकी आंखों मे जान आ गई थी। हर्ण्या को देखने के लिए लोग रास्ते पर दोतरफा खड़े हो गए थे। इतने में तुका पाटिल की बैलगाड़ी नजदीक आ गई। दो - तीन बैलगाडिय़ां उसके पीछे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थी। कांटे का मुकाबला शुरू था। बैलों के नथुनों और मुंह से झाग टपकने लगा था। पहियों की खडख़ड़ाहट कानों में गुंजने लगी थी और हर्ण्या का ताकत लगा कर दौडऩा जारी था। पीछे से आ रही किसी भी बैलगाड़ी को वह आगे निकलने नहीं दे रहा था। मुकाबले का अंतिम लक्ष्य नजदीक आने लगा था। हर्ण्या के मुंह से निकलने वाली झाग सामने वाले दोनों पैरों पर गिरने लगी थी। उसे अपनी जान की भी परवाह नहीं थी। लक्ष्य था केवल जीत हासिल करना। पीछे से आने वाली बैलगाड़ी के पहियों की जैसे ही आवाज आती वैसे ही वह और अधिक छलांगे भरने लगता था। इसी जोश में तुका पटिल की गाड़ी लक्ष्य को लांघकर थोड़ा आगे जाकर रूक गई। वैसे ही लोगों के हुजूम ने हर्ण्या को घेर लिया। दर्शक गर्दन उठा - उठा कर हर्ण्या को देख रहे थे।
लेकिन हर्ण्या अपनी ओर उमड़ी भीड़ से मोहित नहीं था, शांत था। उसने प्रतिक्रिया स्वरूप कान नहीं उठा। सींग नहीं हिलाए। गर्दन से जुआ हटाते ही वह धम से नीचे बैठ गया और एकाएक उसकी गुदा से खून की धार बहने लगी। हर्ण्या ने गर्दन लुढ़काई और अपने चारों पांवों को फैला कर करवट बदली। उसके पिछले दोनों पैरों की एडि़य़ा जमीन पर घिसने लगी। मिट्टी उछल कर ऊपर उठने लगी और गढ्ढा पडऩे लगा।
पता
देवगिरी महाविद्यालय,
औरंगाबाद
मंगलवार, 16 जुलाई 2013
बुलबुल अउ गुलाब
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मूल ( अंग्रेजी ) द नाइटिंगल एण्ड द रोज
लेखक - आस्कर वाइल्ड
मूल ( अंग्रेजी ) द नाइटिंगल एण्ड द रोज
लेखक - आस्कर वाइल्ड
छत्तीसगढ़ी अनुवाद
बुलबुल अउ गुलाब
अनुवादक - कुबेर
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| कुबेर |
’’वो ह कहिथे, वो ह मोर संग तभे नाचही, जब मंय ह वोला लाल गुलाब के फूल ला के दुहूं।’’ रोवत-रोवत जवान छात्र ह कहिथे, ’’फेर मोर सबो फुलवारी म तो एको ठन लाल गुलाब के फूल नइ फूले हे, कहाँ ले लानव मंय ह लाल गुलाब के फूल?’’
फुड़हर पेड़ के खंधोली मन के बीच, अपन खोधरा म बइठे बुलबुल चिरई ह वोकर रोवई ल सुनिस, पत्ता मन के ओधा ले झांक के वोला देखिस अउ बड़ा हैरान होइस।
’’मोर फुलवारी म एको ठन लाल गुलाब नइ हे।’’ वो ह जोर से चिल्लाइस अउ वोकर सुंदर अकन आँखीं डहर ले तरतर-तरतर आँसू बोहाय लगिस। ’’हाय, आदमी के खुशी ह कतका छोटे-छोटे बात के मुहताज रहिथे! महू ह पढ़े हंव, बुद्धिमान मनखे मन घला कहिथें, शास्त्र मन में लिखाय रहस्य ल घला जानथंव, तभो ले एक ठन लाल गुलाब के फूल खातिर मोर जीवन ह अबिरथा लागत हे।’’
’’आखिर इही हरे असली प्रेमी।’’ बुलबुल ह किहिस - ’’जेकर प्रेम-गीत ल न जाने, के रात ले, रात भर-भर जाग के मंय ह गाय हंव। भले येला मंय ह नइ जानंव, फेर येकरे गीत ल तो मंय ह रात-रात भर जाग के चंदा-चंदेनी मन ल सुनाय हंव, अउ देख, आज ये ह मोर आघू म बइठे हे। येकर चूंदी ल देख, सम्बूल फूल के गुच्छा मन सरीख कइसे सुंदर करिया-करिया दिखत हे; अउ येकर ओंठ ल तो देख, येकर हिरदे के प्रेम रूपी लाल गुलाब सरीख कइसे लाल-लाल दिखत हे। फेर येकर मन के उदासी ह येकर चेहरा ल हाथी दांत कस पिंवरा-पिंवरा कर देय हे। दुख ह येकर माथा म चिंता के गहुरी लकीर खींच देय हे।’’
’’कल रातकुन राजकुमार ह नाच-गान के उत्सव करत हे,’’ जवान छात्र ह टुड़बुड़ा के कहिथे - ’’अउ मोर मयारुक ह घला विहिंचे रही। अगर मंय ह वोला लाल गुलाब के फूल ला के दे दुहूं तब वो ह बिहिनिया के होवत ले मोर संग नाचही। अगर मंय ह वोला लाल गुलाब के फूल ला के दे दुहूं तब मंय ह वोला अपन आगोश म भर सकहूं, अउ वोकर हाथ मन ह मोर हाथ मन म कटकट ले जुड़े रही। फेर मोर फुलवारी मन म तो कहूँ घला लाल गुलाब के फूल नइ हे, अउ येकरे सेती मंय ह उहाँ अकेला बइठे रहिहूँ। वो ह मोर तीर ले रेंग के चल दिही फेर मोर डहर हिरक के देखही घला नहीं। मोर हिरदे ह टूट-टूट के छरिया जाही।’’
’’इही ह वास्तव म प्रेमी आय, सच्चा प्रेमी आय,’’ बुलबुल ह किहिस - ’’जेकर प्रेम-गीत ल मंय ह रात-रात भर गाथंव, जउन ल गा के मोला तो आनंद मिलथे फेर सुन-सुन के येकर तो मन ह दुखित हो जाथे। सचमुच, प्रेम ह कतका अनोखा चीज होथे? ये ह मुंगा-मोती मन ले घला मंहगा होथे। अनमोल रत्न मन ले घला जादा कीमती होथे। मुंगा-मोती अउ हीरा-जवाहरात ले येला खरीदे नइ जा सके, अउ न कोनों दुकान म ये ह बिके। न तो येला दुकान से खरीदे जा सके अउ न येला सोना के तराजू म तउले जा सके।’’
’’बजनिहा, (संगीतकार) मन अपन जघा म बइठहीं,’’ जवान छात्र ह किहिस - ’’अउ अपन-अपन बाजा मन ल मस्त हो के बजाहीं अउ मोर मयारुक ह वीणा अउ वायलिन के धुन म सुग्घर नाचही। वो अतका संुदर नाचही, अतका बिधुन हो के नाचही कि वोकर पांव ह धरती म नइ परही। रंग-बिरंगा कपड़ा पहिरे दरबारी मन के भीड़ ह वोकर चारों मुड़ा सकला जाही, फेर वो ह मोर संग नइ नाचही, काबर कि वोला देय खातिर मोर कना लाल गुलाब के फूल नइ होही।’’ दुख के मारे वो ह मैदान के हरियर दूबी म विही करा धड़ाम ले गिर गिस, अपन मुँहू ल हथेली मन म ढांप लिस अउ रोय लगिस।
’’ये ह काबर रोवत हे?’’ एक ठन नानचुक हरियर छिपकिली ह पूछिस अउ अपन पुछी ल हवा म नचात वोकर तीर ले रेंगत नहक गे।
’’सचमुच म काबर रोवत हे?’’ पूछत-पूछत एक ठन रंगबिरंगी तितली ह सूरज के सुंदर किरण म हवा म तंउरत निकल गे।
’’आखिर काबर रोवत हे ये ह?’’ बीच म हरियर रंग के टिकुली लगाय सफेद रंग के नान्हे गुलबहार के फूल ह अपन पड़ोसी के कान म धीरे ले सुहाती-सुहाती फुसफुसा के किहिस।
’’वो ह लाल गुलाब के फूल खातिर रोवत हे।’’ बुलबुल चिरई ह किहिस।
’’लाल गुलाब के फूल खातिर रोवत हे?’’ सब झन एक संघरा चिल्ला के किहिन - ’’कतका बड़ मजाक हे ये ह।’’
हरियर छिपकिली, का जाने वो ह मया-पिरीत के मरम ल, जोर से हाँस दिस।
फेर बुलबुल चिरई ह तो ये लइका के दुख के रहस्य ल जानत रिहिस, फुड़हर पेड़ के अपन खोंधरा म चुपचाप बइइे-बइठे वो ह प्रेम के रहस्य के बारे में सोचे लगिस।
अचानक उड़े खातिर बुलबुल ह अपन डेना मन ल खोलिस, अउ बात कहत अगास म उड़े लगिस। छंइहा बरोबर वो ह उड़िस अउ छंइहच् बरोबर उड़त-उड़त वो ह फुलवारी के वो पार चल दिस।
घास के मैदान के बीच म एक ठन बड़ संुदर अकन गुलाब के पेंड़ रहय। विही ल देख के बुलबुल ह उतर गे अउ वोकर एक ठन डारा म बइठ गे।
’’मोला एक ठन लाल गुलाब दे दे,’’ वो ह चिल्ला के किहिस - ’’अउ बदला म मंय ह तोला अपन सबले सुंदर, सबले मधुर गीत ल सुनहूँ।’’
गुलाब के पेंड़ ह इन्कार म अपन मुड़ी ल डोला दिस। ’’मोर फूल ह तो सफेद हे,’’ वो ह किहिस - ’’समुद्र के फेन जइसे अउ पहाड़ म जमे बरफ जइसे सफेद। फेर कोई बात नहीं, तंय ह मोर भाई तीर जा, जउन ह जुन्ना धूप-घड़ी तीर रहिथे। वो ह तोला तोर मर्जी के चीज दे दिही।’’
सुन के बुलबुल ह उहाँ ले उड़िस अउ उड़त-उड़त जुन्ना धूप-घड़ी तीर जागे गुलाब के पेंड़ तीर चल दिस। ’’मोला एक ठन लाल गुलाब दे दे,’’ वो ह रो के बिनती करिस - ’’अउ बदला म मंय ह तोला अपन सबले सुंदर, सबले मधुर गीत ल सुनहूँ।’’
सुन के गुलाब के पेड़ ह इन्कार म अपन मुड़ी ल डोला दिस। ’’मोर फूल ह तो पींयर हे,’’ उत्तर मिलिस - ’’तृणमणि सिंहासन के ऊपर बइठे मत्स्य कैना के चूँदी कस पींयर, अउ घास के मैदान म घास काटे के पहिली फूले नरगिस के फूल जइसे पींयर। फेर कोई बात नहीं, तंय जवान छात्र के खिड़की खाल्हे जागे मोर भाई तीर जा, हो सकथे, वो ह तोर इच्छा ल जरूर पूरा करही।’’
बुलबुल बिचारी का करे, उड़त-उड़त जवान छात्र के खिड़की खाल्हे जागे गुलाब के पेंड़ तीर चल दिस।
’’मोला लाल गुलाब के एक ठन फूल दे दे,’’ वो ह रो के किहिस - ’’अउ बदला म मंय ह तोला अपन सबले सुंदर, सबले मधुर गीत ल सुनहूँ।’’
यहू ह इन्कार म अपन मुड़ी ल डोला दिस।
’’मोर फूल हा लाल जरूर होथे,’’ वो ह जवाब दिस - ’’पानी म तंउरत बत्तख के पंजा अउ समुद्र के पानी भीतर खोह मन म झूलत मुंगा-पंख मन ले जादा लाल। फेर कड़कड़ंउवा ठंड म मोर नस मन ह जम गे हे, मोर डोहड़ू मन ल पाला मार दे हे, अउ हवा-बड़ोरा ह मोर डारा मन ल फलका दे हे, अउ विही पाय के अब साल भर मोर पेड़ म लाल फूल नइ फूल सकय।’’
’’मोला सिरिफ एक ठन लाल गुलाब के फूल होना,’’ बुलबुल ह रोवत किहिस - ’’सिरिफ एक ठन लाल गुलाब के फूल। का कोनो उपाय नइ हे कि मोला एक ठन लाल गुलाब के फूल मिल सके?’’
’’एक ठन उपाय हे,’’ गुलाब के पेड़ ह किहिस - ’’फेर वो ह अतका भयानक, अउ अतका डरावना हे कि वोला तोला बताय बर मोर हिम्मत नइ होवत हे।’’
’’जल्दी बता मोला वो उपाय,’’ बुलबुल ह झट ले किहिस - ’’मंय नइ डर्राव।’’
’’अगर तोला गुलाब के लाल फूल होनच् त सुन,’’ गुलाब के पेड़ ह किहिस - ’’वोला तोला चंदा के दूधिया अंजोर म अपन सबले सुंदर संगीत ले सिरजे बर पड़ही, अउ अपन खुद के हिरदे के रकत ले वोला रंगे बर पड़ही। अपन छाती ल मोर कांटा म गोभ के तोला रात भर मोला अपन सबले संुदर गीत ल सुनाय बर पड़ही। रात भर तोला गीत गाय बर पड़ही, अउ मोर कांटा ह तोर हिरदे म धंसत जाही, धंसत जाही, अउ तोर जीवन-रकत ह निकल-निकल के मोर नस मन म आवत जाही, अउ जइसे-जइसे तोर जीवन-रकत ह निकल-निकल के मोर नस मन म आवत जाही, मोर होवत जाही, लाल गुलाब के रचना होवत जाही।’’
’’लाल गुलाब के एक ठन फूल खातिर मौत, ये तो बड़ा मंहगा सौदा हे,’’ बुलबुल ह चिल्ला के किहिस - ’’अउ ये दुनिया म सब ल अपन-अपन जिंदगी ह सबले जादा प्यारा हे। सुंदर हरियर-हरियर जंगल म बइठ के मिलने वाला आनंद ले घला जादा प्रिय हे, सोन के रथ म बइइ के जावत सुरूज ल देखे से, अउ मोती के रथ म बइठ के जावत चंदा ल देखे से मिलने वाला आनंद से घला जादा प्रिय हे। फेर प्रेम, प्रेम तो जिंदगी ले भी बढ़ के होथे। अउ फेर मनुष्य के हिरदे के सामने मोर जइसे छोटे से चिरइ के हिरदे के का कीमत?’’
बुलबुल ह अपन भुरवा डेना मन ल खोलिस, अउ हवा म छंइहा के समान वेग से उड़त-उड़त, उड़त-उड़त आ के पेंड़ के ऊपर बइठ गे।
जवान छात्र ह अभी ले विहिच करा विही हालत म अल्लर परे रहय, जउन हालत म वो ह वोला छोड़ के गे रिहिस हे। वोकर सुंदर आँखीं मन के आँसू ह अभी ले सुखाय नइ रहय।
’’खुश हो जा अब,’’ बुलबुल ह चिल्लाइस - ’’बाबू! तंय अब खुश हो जा। अब तोला तोर लाल गुलाब ह मिल जाही। आज रात चंदा के दुधिया अंजोर म अपन संगीत के सुर ले मंय ह वोकर सिरजन करहूँ, अपन हिरदे के लाल रकत के रंग ले वोला रंगहूँ। बदला म मोर बस इतना कहना हे कि तंय ह एक सच्चा प्रेमी आवस, अपन प्रेम म सदा सच्चा बने रहना, काबर कि दुनिया म प्रेम ह सबले अनमोल हे, वेद-शास्त्र ले घला जादा; अउ दुनिया के सबले बड़े ताकत ले घला जादा ताकतवर हे। बरत जोत के लौ के समान लकलक-लकलक करत वोकर पंख होथे, अउ वइसनेच् वोकर शरीर ह घला लकलक-लकलक चमकत रहिथे, मदरस के समान मीठ वोकर ओंठ मन होथे, अउ लोभान के खुशबू कस वोकर सांस के खुशबू ह होथे।’’
जवान छात्र ह जमीन म गड़े अपन नजर ल उठा के बुलबुल कोती देखिस, वोकर बात ल सुनिस, फेर जीवन के सच्चा प्रेम के मरम के जउन बात ल बुलबुल ह कहत रहय तेला वो ह समझ नइ सकिस। वो ह तो बस विहिच् ल समझथे जउन ह किताब-पोथी म लिखाय हे।
फेर फुड़हर के पेड़ ह सब बात ल समझ गे, अउ उदास हो गे। वो ह तो छोटकुन बुलबुल के सबर दिन के मयारूक आय, जउन सबर दिन वोकर डारा मन म खोंधरा बना के रहत आवत हे।
’’तंय तो अब जावत हस, (छुटकी बुलबुल) तोर बिना मंय ह एकदम अकेल्ला हो जाहूँ,’’ फुड़हर के पेड़ ह रो के कहिथे - ’’जावत-जावत एक ठन अपन गीत तो सुना दे।’’
बुलबुल ह फुड़हर ल अपन सुंदर गीत सुनाय लगिस। वोकर कंठ ले गीत ह वइसने झरे लगिस जइसे चाँदी के मग्गा ले जल के धार बोहावत हो।
जब बुलबुल के गीत खतम हो गे तब वो जवान छात्र ह चुपचाप उठिस, अउ अपन जेब ले कागज अउ सीस निकाल लिस। ’’वोकर तीर रूप-विधान तो हे,’’ पेड़ ले दुरिहा, अपन खोली कोती जावत-जावत वो ह अपने आप से किहिस - ’’एकर ले इन्कार नइ करे जा सकय, फेर का वोकर तीर संवेदना घला हे? मोला येकर कोनो परवाह नइ हे। वहू ह बाकी दूसर कलाकार मन जइसेच् तो हे, वोकर तीर सब कला हे, फेर बिना भावना के। वो ह दूसर खातिर अपन बलिदान नइ कर सकय। वो ह खाली संगीतेच् के बारे म जादा सोचथे; अउ ये बात सारी दुनिया जानथे कि कलाकार मन स्वार्थी होथें। तभो ले ये बात तो मानेच् बर पड़ही के वोकर कंठ म सुंदर मिठास हे। फेर ये सुंदर सुर, मधुर गीत, सब बेकार हे, जब येकर ले कोई फायदा न होने वाला हो, येकर ले कोई व्यवहारिक लाभ न होने वाला हो।’’ इही बात मन ल सोचत वो ह अपन खोली म जा के अपन छोटे से बिस्तर म ढलंग गे; अउ अपन प्यार के बारे म सोचे लगिस; अउ छिन भर बाद वोकर नींद लग गे।
अउ जब स्वर्ग म चंदा ह चमके लगिस, बुलबुल ह उड़ के लाल गुलाब के वो पेड़ म आ के बइठ गे, अउ अपन छाती ल वोकर कांटा म गोभ लिस। अपन छाती ल वोकर कांटा म गोभ के वो ह रात भर बर प्रेम के सुंदर-सुंदर गीत गाय के शुरू कर दिस, अउ शीतल चमकदार उजास बगरावत चंद्रमा ह जउन ल सुने बर निहर के धरती म आ गे। रात भर वो ह सुंदर-सुंदर गीत गातेच् रिहिस अउ कांटा ह वोकर छाती म गहरी, अउ गहरी धंसतेच् गिस, अउ वोकर जीवन-रकत ह वोकर हिरदे ले निकल के बोहावत गिस, बोहावत गिस।
सबले पहली वो ह प्रेम के वो सुंदर गीत ल गाइस जब एक लड़की अउ एक लड़का के हिरदे म प्रेम ह जनम लेथे। अउ गुलाब के पेड़ के सबले ऊपरी खांधा म गुलाब के एक ठन अद्भुत डोहड़ू फूल गे। वो ह जइसे-जइसे गीत गावत जाय, वो डोहड़ू म एक-एक ठन पंखुड़ी जुड़त जाय, अंत म वो डोहड़ू ह पूरा फूल बन गे। फेर पेड़ के ऊपरी डारा म फूलने वाल वो फूल ह पहली एकदम पींवरा रिहिस, कलकल-कलकल करत नदिया के ऊपर छाय धुंधरा सरीख पींवरा, पंगपंगावत बिहिनिया अउ सुरूज नारायण के निकलत खानी के पहिली अगास के रंग सही पिंवरा (बिहिनिया के पांव कस पिंवरा अउ उषा काल के चांदी समान डेना कस)। चांदी के दरपन म दिखत गुलाब के छांया कस, जल-कुंड म पड़त गुलाब के छांया कस, बिलकुल पिंवरा।
तभे गुलाब के पेड़ ह जोर से चिल्ला के बुलबुल ल अपन छाती ल कांटा म अउ जोर से दबाय बर कहिथे। ’’नजदीक ला के अउ जोर से दबा, छुटकी बुलबुल,’’ पेड़ ह चिल्लाइस - ’’नइ ते गुलाब के ललियाय के पहिलिच् बिहिनिया हो जाही।’’
तब बुलबुल ह अपन छाती ल कांटा म अउ जोर से कंस लिस, अउ जब नर-नारी के आत्मा म प्रेम के जन्म होथे, जेकर तेज खिंचाव म एक-दूसर कोती खिंचावत-खिंचावत ऊंकर मन के मन ह एकाकार हो जाथे, वो समय के प्रेम-गीत ल वो ह जोर-जोर से गाय लगिस।
अउ तब वो पिंवरा फूल के पंखुड़ी मन धीरे-धीरे गुलाबी होय लगिस, दुलहिन के गाल म छाय गुलाबी, आभा कस, जब दुलहा ह पहिली घांव वोकर ओंठ ल चूमथे अउ वोकर गाल ह चमके लागथे। फेर कांटा ह अभी तक बुलबुल के हिरदे म नइ धंस पाय रिहिस हे, अउ इही कारण गुलाब के हिरदे ह अभी तक सफेद के सफेद हे, काबर कि केवल बुलबुल के हिरदे के रकत के रंग से ही वोकर हिरदे के रंग ह लाल हो सकत हे।
तब गुलाब के पेड़ ह अउ जोर से चिल्ला के बुलबुल ल अपन छाती ल कांटा म अउ जोर से दबाय बर किहिस। ’’नजदीक ला के अउ जोर से दबा, छुटकी बुलबुल,’’ पेड़ ह चिल्लाइस - ’’नइ ते बिहिनिया हो जाही, लाल गुलाब के फूल फूले के पहिलिच्।’’
अउ बुलबुल ह अपन हिरदे ल वोकर कांटा म अउ जोर से दबाय लगिस, अउ जोर से दबाय लगिस, अउ अंत म जब कांटा ह वोकर हिरदे ल छेदे लगिस, बुलबुल के मुँह ले एक दर्दनाक चीख निकलिस। दरद ह अनसंउहार हो गे। जइसे-जइसे वोकर दरद ह बाढ़त गिस, वइसने-वइसने वोकर गायन ह अउ प्रचंड ले प्रचंड होवत गिस काबर कि अब वो ह प्रेम के वो गीत ल गाय लगिस हे जउन ह मृत्यु ल घला अमर बना देथे, वो प्रेम के गीत जउन ह कब्र म घला कभू दफन नइ होय।
अउ अद्भुत गुलाब के पंखुड़ी के रंग ह अब एकदम लाल हो गे, जइसे सुरूज निकले के समय पुरब के अगास ह हो जाथे, अउ वोकर हिरदे ह अइसे लाल हो गे, जइसे माणिक के रंग होथे।
फेर बुलबुल के स्वर अब धीरे-धीरे मंद से मंदतर होवत गिस, अउ वोकर छोटे-छोटे पांखी मन फढ़फड़ाय लगिस, अउ वोकर आँखी के ऊपर परदा छाय बर लगिस। वोकर स्वर ह मद्धिम से मद्धिम होवत गिस, अउ वोला अइसे लगे लगिस कि वोकर कंठ म कुछू चीज आ के अटकत जावत हे।
तब बुलबुल ह आखिर म फेर पूरा जोर लगा के संगीत के लहर छेड़ दिस। दुधिया चंद्रमा ह जउन ल सुन के अगास म जिंहा के तिंहा ठहर गे अउ भुला गे अगास ह पंगपंगाय बर। जउन ल लाल गुलाब ह सुनिस अउ मारे खुशी के कांपे लगिस, बिहिनिया के मंद-शीतल हवा म वो ह अपन पंखुड़ी मन ल खोल दिस। अनुगूंज ह ये गीत ल दूर पहाड़ के अपन गुलाबी कंदरा मन म पहुँचा दिस अउ गड़रिया मन ल जगा दिस जउन मन ह नींद म सुंदर-सुदर सपना देखत रहंय। ये गीत ह नदिया तीर-तीर उगे सरकंडा मन म तंउरत गिस अउ वो मन प्रेम के संदेश ल समुद्र तक पहुँचा दिन।
’’देख! देख!’’ गुलाब के पेड़ ह चिल्लाइस - ’’लाल गुलाब के फूल ह पूरा फूल गे।’’ फेर बुलबुल ह कोई जवाब नइ दिस, काबर कि वो तो पेड़ के खाल्हे लंबा-लंबा दूबी में मरे परे रहय, अउ गुलाब के कांटा ह वोकर हिरदे म गोभाय रहय।
दोपहर म जवान छात्र ह अपन खिड़की ल खोलिस अउ बाहिर झांक के देखिस।
’’मोर भाग ह कतका ऊँचा हे,’’ वो ह मारे खुशी के चिल्लाइस - ’’ये देख लाल गुलाब। अतका सुंदर गुलाब के फूल तो मंय ह अपन जिंदगी म कभू नइ देखे रेहेंव। ये ह अतका सुंदर हे कि लातिनी भाषा म जरूर येकर कोई लंबा-चौड़ा नाम होही।’’ अउ निहर के वो ह गुलाब के फूल ल टोर लिस।
वो ह अपन टोपी ल पहिरिस, लाल गुलाब ल हपन हाथ म पकड़िस अउ प्रोफेसर के घर कोती भागिस।
प्रोफेसर के बेटी ह चकरी म नीला रंग के रेशमी सूत ल लपेटत, घर के मुहाटी म बइठे रहय, अउ वोकर छोटे से पालतु कुकुर ह वोकर गोड़ तीर बइठे रहय। ’’तंय ह केहे रेहेस न, तंय मोर संग नाचबे, यदि मंय ह तोला लाल गुलाब के फूल लान के दे दुहूँ।’’ जवान छात्र ह चिल्ला के किहिस - ’’ये देख, दुनिया के सबले सुंदर लाल गुलाब के फूल। ये ले अउ येला अपन हिरदे से लगा के रख, अउ जब हम नाचबोन तब बताहूँ कि मंय ह तोला कतका मया करथंव।’’
लेकिन सुन के तुरते लड़की ह गुस्सा म अपन मुँहू ल बिचका दिस (नाक-भौं सिंकोड़ दिस)।
’’मोला डर हे कि ये ह मोर पोशाक के संग मेल नइ खाही,’’ वो ह जवाब दिस - ’’अउ फेर मनीजर के भतीजा ह मोर बर असली गहना भेजवाय हे, अउ सब जानथें कि गहना ह फूल ले जादा कीमती होथे।’’
’’ठीक, मंय ह कसम खा के कहिथंव, दुनिया म तोर ले जादा नमकहराम अउ कोनों नइ होही’’ छात्र ह क्रोध के मारे किहिस, अउ वो सुंदर फूल ल गली के चिखला में फेंक दिस, जिंहा एक ठन गाड़ी के चक्का ह वोला रमजत निकल गे।
’’नमकहराम!’’ लड़की ह किहिस - ’’मंय तो तोला बस अतका कहहूँ कि तंय ह बहुत जंगली (असभ्य) हस, अउ आखिर तंय होथस कोन? केवल एक छात्र, मंय ह तोर ऊपर भरोसा नइ कर सकंव, का होइस कि तोर पनही म चाँदी के बक्कल लगे हे, वो तो मनीजर के भतीजा के पनहीं म घला लगे हे।’’ अतका कहि के वो ह अपन कुरसी ले उठिस अउ घर के भीतर चल दिस।
’’प्रेम घला कतका बेकार चीज होथे,’’ छात्र ह उहाँ ले जावत-जावत किहिस - ’’ये ह तो तर्कशास्त्र के तुलना म आधा काम के घला नइ होवय, येकर से कुछ भी सिद्ध नइ करे जा सकय, अउ ये तो हमला खाली विही बात के बारे म बतावत रहिथे जइसन वास्तव म कभी होयेच् नहीं, अउ हमला वइसन चीज के बारे म विश्वास करे बर मजबूर करथे जउन ह कभू सत्य होबेच् नइ करय। वास्तव म, प्रेम ह बिलकुल अव्यवहारिक होथे, अउ आज के युग म व्यवहारिक होना ही सब कुछ हे। अब तो मोला फिर से दर्शनशास्त्र अउ अध्यात्म के अध्ययन करे बर पड़ही।’’
लहुट के वो ह अपन खोली म आइस, अउ धुर्रा जमे एक ठन मोटा असन किताब ल निकालिस, अउ पढ़े लगिस।
पता - व्याख्याता, शास. उच्च. माध्य. शाला कन्हारपुरी, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)
मोबाइल - 094076 - 85557
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