इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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सोमवार, 30 दिसंबर 2024

छत्तीसगढ़ लोक मंचों के दीपक शिव कुमार

    छत्तीसगढ़ को लोककलाओं का गढ़ भी कहा जाता है।इस प्रदेश का दुर्ग जिला अन्य जिलों की तुलना में कलाओं का किला ही रहा है। जहां छत्तीसगढ़ के बेहतरीन कलाकारों का जमावड़ा सर्वप्रथम दाऊ रामचंद्र देशमुख ने दुर्ग शहर के निकट स्थित ग्राम बघेरा में चंदैनी गोंदा संस्था का सृजन करके किया था।यह सांस्कृतिक क्रांति का ओ शंखनाद था जो अजर अमर हो गया। वर्ष 1971 में सृजित छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा कालजयी लोकमंच 'चंदैनी गोंदा' में 'हरित क्रांति माई' की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करके शिवकुमार 'दीपक' अमिट छाप छोड़ गए।
     चंदैनी गोंदा की भांति छत्तीसगढ़ी कला जगत के उत्थान तथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक यात्रा को आगे बढाने के लिए दाऊ महासिंग चंद्राकर ने दुर्ग के मिल पारा स्थिति समर्पण भवन में लोकमंच 'सोनहा बिहान' को सृजित किया। इस संस्था में भी शिव कुमार दीपक अपने हास-परिहास अभिनय से एक तरफा छाप छोड़ते थे। छत्तीसगढ़ के सुपरस्टार कॉमेडी किंग के नाम से विख्यात दीपक छत्तीसगढ़ी फिल्मों के साथ ही हिंदी भोजपुरी मालवी और अफगानी फिल्मों में भी अभिनय का अनूठा रंग बिखेर कर प्रसिद्ध हुए। 1965 में मनु नायक कृत छत्तीसगढ़ी के पहली फिल्म कहि देबे संदेस ' के बाद घर-द्वार और छत्तीसगढ़ गठनोपरांत निर्मित पहली फिल्म    मोर छइंया भुइयां, सहित परदेशी के मया,मया देदे मया लेले, मयारू भौजी, जैसे अनेक फिल्मों में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया।
     खैरागढ़ के सिद्धहस्त कलाकार रमाकांत बक्शी जी को वे अपना अभिनय गुरु,मार्गदर्शक मानते थे।
     अस्सी के दशक में हास्य प्रहसन 'नेता बटोरन लाल 'और 'छत्तीसगढ़ रेजीमेंट' 'सउत झगड़ा' 'छत्तीसगढ़ महतारी' से भी उनकी अमिट पहचान बनी। महिला पात्र की एकल भूमिका निभाने में उनकी बहुत अधिक रुचि रही जो कि उनकी विशेष पहचान बनी।
दाऊ देशमुख के लोकनाट्य कारी में सरपंच, सूत्रधार और दाऊ चंद्राकर की संस्था सोनहा बिहान में बतौर लोक नर्तक, हास्य अभिनेता ,उद्घोषक तथा लोकनाट्य 'लोरिक चंदा' में राजा मेहर जैसे प्रमुख किरदारों का अभिनय मैंने किया।इन्हीं लोक मंचों में मुझे हास्य अभिनेता शिवकुमार का साथ मिला।
*अभिनय के हेडमास्टर दीपक*
वे अभिनय में तो 'हेडमास्टर' थे, पर संवाद बोलते समय अकसर लेखक के लिखित संवाद से हटकर स्वरचित संवाद बोलते थे। इससे हास्य तो बना रहता था किन्तु यदा-कदा सहयोगी पात्र को अपनी लाईन जोड़ने में पसीना छूट जाता था। ऐसी स्थिति बनने पर दीपक जी परिस्थितियों को भांपकर तत्काल क्लू देने में भी दक्ष थे।
*जीवंत अभिनय के धनी*
दीपक अभिनय करते समय बड़े ही सहज और जीवंत अभिनय किया करते थे।उनके साथ सोनहा बिहान मंच पर मैं 'महाराज के पेंदा ले तेल टपकत हे' प्रहसन करता था। इसमें वे महाराज और मैं उनका बुद्धू नौकर बनता था।उस प्रहसन में बुद्धु नौकर बार बार गलती किया करता था। जिसे समझाने सुधारने हेतु महाराज मारते पीटते थे। जीवंत अभिनय के चक्कर में दीपक जी के मार से मेरे गाल -कान लाल लाल हो जाते थे।
*केले का बना कचुमर*
      छत्तीसगढ़ी लोक मंचों में दीपक और कमल नारायण सिन्हा की जोड़ी सुपरहिट रहती थी ।इनके साथ बैठने से हंसते-हंसते पेट में बल पड़ जाता था।वर्ष 1982 की बात है। दाऊ महासिंह चंद्राकर के नेतृत्व में लोरिक चंदा की शूटिंग हेतु हम लोग दूरदर्शन केंद्र दिल्ली गए हुए थे। वहां सांसद चंदूलाल चंद्राकर जी के आवास परिसर में हम पैंतीस कलाकारों को ठहराया गया था।तभी एक दिन दाऊ महासिंह जी केला लेकर आए और झोले में रखकर कहीं चले गए।उसमें से चार केला कमल और दीपक खा गए।
     दाऊजी को जब इस बारे में जानकारी हुई तो गुस्से में आकर उन्होंने केला को आंगन में फेक दिया।इसे देखकर कमल और दीपक केला को उठाकर लाए और हाथ जोड़ते दाऊजी के चरणों में रख दिए ।दाऊजी गुस्से में थे। उन्होंने फिर से केला को जोर से फेक दिया। वे दोनों फिर उठा लाए। ऐसा क्रम कई बार चला तो केलों का कचूमर बन गया।उन दोनों की ऐसी शरारत से दाऊजी भी हंस पड़े थे।
*दिल्ली में खुला दीपक का राज*
      दिल्ली में लोरिक चंदा की शूटिंग(1982 )के उपरांत दुर्ग वापसी हेतु रेल्वे स्टेशन पर बैठे थे। तभी मैंने उनके नाम के साथ दीपक जुड़ने का किस्सा पूछा था।तब जानकारी हुई।1958 में दुर्गा कॉलेज रायपुर में अध्ययन के दौरान नागपुर महाराष्ट्र में आयोजित अंतर्राज्यीय युवा उत्सव में शिवकुमार द्वारा प्रस्तुत एकल अभिनय 'जीवन पुष्प' को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने उनके अभिनय को सराहा और 'दीपक' नाम दिया,जो कि आजीवन उनके नाम के साथ जुड़ा रहा।अधिकांश जनमन इस बात से अनजान है कि उपनाम 'दीपक'से ख्याति प्राप्त कलाकार का असल नाम शिव कुमार (साहू )साव था।
      बेहतरीन हास्य कलाकार, छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी फिल्मों के दिग्गज अभिनेता शिव कुमार का जन्म 15 नवंबर 1933 को दुर्ग से सटे ग्राम पोटियाकला में हुआ था।91 वर्ष की उम्र में 25 जुलाई 2024 को उन्होंने अपने कलाग्राम पोटियाकला में अंतिम सांसे लीं। जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु दाऊ मंदराजी सम्मान से अलंकृत किया गया । भिलाई इस्पात संयंत्र से सेवानिवृत्त हुए स्व. दीपक एक व्यक्ति नहीं अपितु एक संस्था थे। अभिनय की दुनिया का ये दैदीप्यमान दीपक सदा आलोकित करता रहेगा।

*विजय मिश्रा 'अमित'*

हिंदी- लोक रंगकर्मी अग्रोहा कॉलोनी रायपुर(छग)492013
 9893123310



सोमवार, 31 अगस्त 2015

बहुआयामी कलाकार : सुरेश यादव

वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह

वीरेन्‍द्र बहादुर सिह
        संगीत साधना वस्तुत: ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा की मुखर अभिव्यक्ति है। संगीत साधक अपनी साधना एवं प्रस्तुतियों से अपने व्यक्तित्व का विकास कर अपनी माटी और परिवेश को गौरवान्वित करते हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में ऐसी ही अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने वाले एक कलाकार हैं सुरेश यादव, जिन्होंने भजनों से लेकर जसगीत एवं पारम्परिक लोकगीतों से लेकर फागगीत के गायन तथा सुगत संगीत से लेकर हारमोनियम, बेंजों एवं ढोलक नंगाड़ा जैसे स्वर एवं अवनद्य दोनों वाद्यों पर अपने सधे हुए हाथों का कमाल दिखाकर तथा नृत्य तथा नाट्य निर्देशन में अपनी कला को और जीवंत तथा मुखरित किया है।
सुरेश यादव
        लोक मंचों पर गायक-वादक दोनों भूमिका का सहजतापूर्वक निर्वहन करने वाले श्री सुरेश यादव का जन्म 02 जुलाई 1967 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के  छुईखदान नगर में एक मध्यमवर्गीय यादव परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बनवाली यादव एवं माता का नाम श्रीमती मेहतरीनबाई यादव था। श्री यादव अपने माता-पिता की पहली संतान हैं। उन्होंने प्रायमरी से लेकर मिडिल स्कूल तक की शिक्षा छुईखदान के शैक्षणिक संस्थानों में पूर्ण की। तदुपरान्त शासकीय सेवा के दौरान उनकी माताजी का स्थानांतरण क्रमश: कुसमकसा (राजहरा) एवं बेमेतरा होने कारण हायर सेकेण्डरी स्कूल की परीक्षा उन्होंने 1985 में शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला बेमेतरा से उत्तीर्ण की।
        कुछ समय के अंतराल के पश्चात उन्होंने स्वाध्यायी छात्र के रूप में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से 1990 में  कला स्नातक एवं 1992 में इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। लोक संगीत में गहरी रूचि के चलते उन्होंने वर्ष 2002 में स्वाध्यायी छात्र के रूप में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से द्विवर्षीय लोक संगीत में डिप्लोमा विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
        श्री यादव को बचपन से ही गायन का शौक था। स्कूली शिक्षा के दौरान जब वे कक्षा चौथी के विद्यार्थी थे तो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनके द्वारा मधुर स्वर में प्रस्तुत किये गये एक देशभक्ति गीत से प्रसन्न होकर नगर पालिका प्राथमिक शाला नम्बर एक छुईखदान के तत्कालीन कक्षा चौथी के कक्षा शिक्षक पं. श्याम प्रसाद तिवारी ने उन्हें पहली बार पुरस्कृत किया। इसी पुरस्कार ने श्री यादव को गायन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और वे गायन के क्षेत्र में अग्रसर हुए। बाद में श्री यादव ने अपने स्कृली जीवन में अनेक बार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी गायन शैली से श्रोताओं को प्रभावित किया तथा पुरस्कृत एवं सम्मानित हुए।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वे लगभग छह-सात वर्षों तक गण्डई-पण्डरिया में अपने मामा के पास रहे तथा उनके व्यवसाय में हाथ बंटाया। इसी दौरान उनका संपर्क पण्डरिया में मां शीतला सेवा समिति से हुआ और शीघ्र ही वे इस समिति के सदस्य के रूप में शामिल हो गये। श्री यादव मूलत: गायक तो थे ही उन्होंने पण्डरिया में इस समिति के सानिध्य में  देवी जसगीत गायन की बारीकियां सीखी। साथ ही उन्होंने शौकियाना तौर पर हारमोनियम, बेंजों, ढोलक एवं नंगाड़ा वादन सीखा। शीघ्र ही वे इन वाद्यों को बजाने में दक्ष हो गये।
        लोकसंगीत में रूचि के कारण वे गण्डई-पंडरिया की लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक संस्था ''मया के फूल''  में शामिल हो गये। इस संस्था में उन्होंने अनेक बार गायक एवं मंच संचालक की दोहरी भूमिका निभाई। उन्होंने लोकगायक धुरवाराम मरकाम एवं सुप्रसिद्ध लोकगायिका दुखिया बाई के साथ कई कार्यक्रमों में गीत प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी। गण्डई पंडरिया में युवा मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने ''सप्तरंग''  सांस्कृतिक संस्था का गठन किया तथा अपने गण्डई प्रवास के दौरान उसका लगातार संचालन किया। श्री यादव को सुप्रसिद्ध भरधरी गायिका रेखा जलक्षत्रिय एवं पंडवानी गायिका श्रीमती रितु वर्मा के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत करने का गौरव भी प्राप्त है।
        श्री सुरेश यादव सन् 1993 में अपने जन्मस्थान छुईखदान वापस लौट आये। यहां उन्होंने श्री जगन्नाथ फाग भजन एवं जस समिति का गठन किया। इस समिति में वे रचनाकार, गायक एवं ढोलक वादक की तिहरी भूमिका निभाते थे। इसके अलावा उन्होंने कुछ समय के लिए अस्तित्व में आये ''जयभारती'' पार्टी छुईखदान के गायक के रूप में हिन्दी फिल्मों के कई गीतों को अपना स्वर दिया। श्री यादव ने नब्बे के दशक में छुईखदान में स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में निर्देशक की भूमिका निभाई। उन्होंने स्कूली बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये नृत्यों की कोरियोग्राफी कर अपनी परिकल्पना को बच्चों के माध्यम से मंच पर साकार किया। उनकी प्रस्तुतियां अधिकांश अवसरों पर सराही गयी।
        हंसमुख एवं मिलनसार स्वभाग के श्री सुरेश यादव ने 1994 में संपन्न नगर पंचायत चुनाव में वार्ड क्रमांक-2 छुईखदान से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पार्षद का चुनाव जीता एवं अपनी क्षमतानुसार वार्ड एवं नगरवासियों की सेवा की। श्री यादव हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के उपाध्यक्ष हैं तथा लंबे समय तक छुईखदान की सक्रिय रचनात्मक संस्था ''प्रेरणा'' से जुड़े रहे।
        श्री यादव के नेतृत्व में उनकी संस्था ''सतरंग'' गण्डई पण्डरिया ने 1994 में 17 मार्च से 24 मार्च 1994 तक भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (युवा कार्य एवं खेल विभाग) द्वारा उत्तरप्रदेश के नेहरू युवा केन्द्र अमेटी के तत्ववधान में आयोजित ''राष्ट्रीय एकता शिविर'' में अविभाजित मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा एवं तत्कालीन केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री केप्टन सतीश शर्मा ने उन्हें एवं उनकी टीम को सम्मानित किया।
        सहज स्वभाव वाले श्री यादव ने अनेक मंचों पर अपनी सहभागिता दर्शायी है। भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ लोककला महोत्सव 1992 में उन्हें गायक के रूप में एवं छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव दल्ली राजहरा में 1996 में उन्हें ढोलक वादक के रूप में सम्मानित किया गया। नेहरू युवा केन्द्र राजनांदगांव द्वारा 1994 में उन्हें गायन एवं नृत्य निर्देशन का प्रथम पुरस्कार दिया गया।
        श्री यादव ने राजनांदगांव जिले के साक्षरता महायज्ञ में अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई है। 07 अप्रैल से 13 अप्रैल 1995 तक जिला प्रशासन राजनांदगांव द्वारा आयोजित साक्षरता अभियान जिला स्तरीय, स्रोत व्यक्तियों की नाट्य कार्यशाला में उन्होंने स्रोत कलाकार के रूप में सहभागिता की। 14 मई से 20 मई 1995 तक खैरागढ़ में आयोजित ब्लाक स्तरीय कला जत्था नाट्य कार्यशाला में उन्होंने गायक एवं वादन स्रोत व्यक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दी।
        श्री यादव ने राष्ट्रीय कुष्ठ अभियान के तहत 21 जनवरी से 30 जनवरी 1990 तक उदयपुर (छुईखदान) में आयोजित ''तन रक्षा और घाव मुक्ति पर्व'' शिविर में एक कलाकार के रूप में हिस्सा लिया। शिविर के दौरान कुष्ठ मुक्ति के प्रचार-प्रसारक हेतु श्री यादव ने शिविर में शामिल कलाकारों के साथ मिलकर एक नाटक का वीडियो कैसेट तैयार किया। इस कैसेट को कुष्ठ विभाग द्वारा डेनमार्क भेजा गया।
        श्री यादव की कला और प्रतिभा को अनेक अवसरों पर सम्मानित किया गया है। उन्हें शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला छुईखदान, शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला बेमेतरा, नगर पंचायत छुईखदान, जनपद पंचायत छुईखदान, सेवाभावी संस्था ''प्रेरणा'' छुईखदान, हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान, नेहरू युवा केन्द्र राजनांदगांव, चक्रधर कत्थक कल्याण केन्द्र राजनांदगांव द्वारा प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया है। श्री यादव ने विभिन्न स्थानों पर आयोजित जस एवं फाग गीत प्रतियोगिताओं में अपनी टीम के लिए अनेक बार पुरस्कार जीता है।
        श्री सुरेश यादव न केवल गायक, वादक और उद्घोषक हैं अपितु लेखन के क्षेत्र में भी दखल रखते हैं। उनकी कुछ व्यंग्य रचनाएं एवं कविताएं नब्बे के दशक में स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। रचनात्मक कार्यों में संलग्न छुईखदान की संस्था ''प्रेरणा'' के दशक समारोह के दौरान सन् 2000 में छुईखदान में आयोजित प्रथम छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव के आयोजन की परिकल्पना उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक (वीरेन्द्र बहादुर सिंह) के साथ मिलकर की। उस दौर में कस्बाई क्षेत्र में लोककला महोत्सव जैसे वृहद आयोजन की कल्पना करना और उसे सफलतापूर्वक साकार करना मुश्किल ही नहीं असंभव था, जिसे उन्होंने साकार कर दिखाया। श्री सुरेश यादव का मानना है कि अपनी धरती से जुड़े लोगों का सम्मान करके ही हम सम्मान प्राप्त कर सकते हैं।
        पुराने फिल्मी गीतों को सुनने के शौकीन और सबको सहज सुलभ रूप में उपलब्ध होने वाले श्री सुरेश यादव ने एक दौर में अपनी कला के माध्यम से छुईखदान नगर को गौरवान्वित किया है लेकिन कालान्तर में एक लत के चलते उनकी सारी प्रतिभा का धीरे-धीरे क्षरण होने लगा। जनप्रतिनिधि बनने के बाद शौकियाना तौर पर शुरू किये इस लत ने सुरेश यादव को इस बुरी तरह से जकड़ा कि वे इसमें बुरी तरह डूबते गये। शराब ने सुरेश यादव को न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया बल्कि उनके भीतर के कलाकार को भी मार डाला। तमाम मित्रों और शुभचिंतकों की समझाईश को उन्होंने हवा में उड़ा दिया और केवल अपने मन की बात ही सुनते रहे।
        सुरेश यादव ने अपने जीवन यापन के लिए कई तरह के व्यवसायों को अपनाया जिनमें क्रमश: पान ठेला, फोटो फ्रेमिंग, फोटो कापी, किराना व्यवसाय आदि शामिल हैं लेकिन दुर्भाग्य से वे किसी भी व्यवसाय में सफल नहीं हो पाये बल्कि उल्टे उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। दो पुत्रियों के पिता श्री यादव उम्र के पांचवें दशक में आज भी बेरोजगार है।  बहरहाल सिर्फ एक लत ने एक बेजोड़ कलाकार की प्रतिभा को निगल लिया।
सबेरा संकेत बल्‍देव बाग
राजनांदगांव (छ.ग.)

शनिवार, 22 नवंबर 2014

भिखारी ठाकुर के मायने

मुन्‍ना कुमार पाण्‍डेय 
ठनकता था गेंहुअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे - धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज
कवि केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियाँ भोजपुरी और पूरे पुरबियों के बीच भिखारी ठाकुर की लोकप्रसिद्धि का बयान ही है। प्रख्यात रंग - समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने भी भिखारी ठाकुर की आवाज को अधरतिया की आवाज कहा है। जब भी भोजपुरी संस्कृति और कला - रूपों पर बात होती है, भिखारी ठाकुर का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है। ऐसा होने की कई वाजिब वजहें हैं। भारतीय साहित्य और रंगजगत में ऐसे उदाहरण शायद ही मिले। जहाँ कोई सर्जक या रंगकर्मी प्रदर्शन के लगभग सभी पक्षों पर सामान दक्षता रखता हो और उसनें कहीं से कोई विधिवत शिक्षा न ली हो। अमूमन जितने भी रंगकर्मियों ने अपनी लोक - संस्कृति का हिस्सा होकर अपने रंगकर्म को विकसित किया अथवा उसको दूसरी संस्कृतियों से भी परिचय कराया, वह सभी किसी न किसी स्कूल के सीखे हुए, दक्ष और सुशिक्षित कलाकार थे। फिर चाहे वह महान रंगकर्मी हबीब तनवीर, एच.कन्हाईलाल या रतन थियम ही क्यों न हों। यहाँ इन पंक्तियों के लिखने का अभीष्ट बस इतना ही है कि यहाँ इन रंगकर्मियों से या उनके रंगकर्म से भिखारी ठाकुर की तुलना करना नहीं है। ना तुलना हो सकती है। ये सभी रंगकर्मी अलग - अलग परिस्थितियों में अपनी - अपनी लोक - संस्कृति, अपनी कला जनमानस में सिद्ध कर चुके हैं और किसी परिचय के मुहताज नहीं। पर भिखारी ठाकुर के सन्दर्भ इनका जिक्र इसलिए जरुरी हो जाता है क्योंकि ये भी भिखारी ठाकुर की ही तरह लोकप्रिय संस्कृति और लोक साहित्य के पैरवीकार रहे हैं। इस सन्दर्भ में इनकी बात करना इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि भिखारी ठाकुर को इन लोगों की तरह विरासत में न तो कोई बेहतर प्लेटफार्म मिला, ना ही आखर ज्ञान हेतु कोई विधिवत व्यवस्था। फिर भी उनके भीतर सीखने की, कुछ करने की जो ललक थी, वही उनको भीड़ से अलग खड़ी करती है। उन्हें विशिष्ट बनाती है।
कलाकार अथवा साहित्यकार अपने समय - समाज से निरपेक्ष होकर सर्जना - रचना नहीं कर सकता। एक उत्कृष्ट और जागरूक रचनाकार की कलम अपने देश - काल की परिस्थितियों का बयान दर्ज करती है, जिससे कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियाँ अपने उस लोक - सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश की उन सच्चाईयों से रु - ब -रु हो सके। जो उस समाज और समय में व्याप्त हो। भिखारी ठाकुर भी पाने समय के ऐसे ही सर्जक, भोक्ता थे, जिन्होंने अपने समय की सामंती मानसिकता, जातिवादी सोच, वर्ग - विभेद की राजनीति, श्रमिक संस्कृति, पलायन और पीछे रह गयी प्रोषितपतिकाओं की वेदना को प्रत्यक्षत: देखा ही नहीं बल्कि सामियाने के बीचो - बीच मंचासीन होकर उन सवालों से दो - दो हाथ करने की प्रेरणा भी दी। रंगकर्म जनवादी कला है और भिखारी ठाकुर मूलत: प्रगतिशील, जनवादी रंगकर्मी कलाकार थे। ऐसे प्रगतिशील सर्जकों को लोक यूँ ही नहीं छोड़ देता उसके लिए भी यथास्थिति की पोषक शक्तियाँ कई दुश्वारियाँ पैदा करती हैं, पर सोना आग में तप के और निखरता है। यह बात भिखारी ठाकुर पर अक्षरश: लागू होती है। कई दफे यह स्थितियाँ होती हैं, कि उस कलाकार, सर्जक का मूल्यांकन उसके समय में नहीं हो पता है। इसके कई कारण हो सकते है। भिखारी ठाकुर की स्थिति भी इससे भिन्न तनिक थी। यद्यपि दिक्कतें भिखारी से थीं पर भिखारी ठाकुर को उस समय के प्रगतिशील शक्तियों ने पहचाना और विभिन्न उपाधियों - विशेषणों यथा अनगढ़ हीरा, भोजपुरी के शेक्सपियर, भोजपुरी के भारतेंदु आदि से नवाजा पर सामंती ताकतें गाल बजाने में ही मशगूल रहीं और उन्हें एक नचनिया लौंडा नाच करने वाला ही मानती रही। भोजपुरी के एक कवि शिवनंदन भगत, जो भिखारी ठाकुर के ही सामयिक थे, ने उनके विरोध में एक कविता भी लिखी
जाति के हजाम भईले, पेशा के नापाक कईले
हिजरा के गिनती में गईले भिखरिया
दोकड़ा के सेंदुर अवसर, बुढ़िया बनके नाच कईले
रोपेया में इज्जति गँववले भिखरिया।
इसके अलावा रघुवंश नारायण सिंह जी ने भी महेश्वर प्रसाद की पुस्तक जनकवि भिखारी की समीक्षा में कुछ ऐसी ही कही हैं,जो तत्कालीन सोच का कच्चा - चिटठा प्रस्तुत करती हैं। मसलन - बहुत दिन पहले आरा से निकलने वाले भोजपुरी में श्री बीरेंद्र किशोर का एक लेख छपा था - भोजपुरी के शेक्सपियर  भिखारी ठाकुर। बहुत लोगों ने जब उसे पढ़ा तो अचरज में पड़ गए। सिहर गए कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। यह तो अजब मेल बैठाया गया। ऐसा बहुत लोगों ने कहा। बात सही भी थी। बाकी राहुल बाबा सांकृत्यायन जी भिखारी को महाकवि कह चुके थे। अब हम लोग क्या करें .... उन्होंने भोजपुरी की जान कर जानते बूझते सेवा थोड़ी न की थी। उन्हें तो नाचना गाना था। पहले तुलसी,कबीर सूर वगैरह के पद कंठ किया बाद में सरस्वती की कृपा उन पर हुई तो खुद भी पद जोड़ने लगे। मुझे शक है कि भिखारी कभी नाटककार के रूप में गिने जायेंगे। उन्हें नाटक से क्या मतलब ? वे अंक गर्भांक जानने कहाँ गये?  उनके सभी खेल - तमाशे अपने हैंए जिससे देहाती गंवारू जनता को मोहा, खींचा जा सके उन्होंने वही नाचा - गाया। इनका सब बैले हो सकता है, जिसे नाच - गान के साथ रूपक कहा जाए। तब शायद कुछ सधे तो सधे भिखारी में नाटकीयता है। वे रूप बनने और बनाने में और नकल उतारने में भी सफल खिलाड़ी है। लोक प्रसिद्ध कलाकारों - सर्जकों को अपने समय में इस तरह के गर्दभ - गान सुनने को मिलते हैं, जो समय के नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हो जाते हैं। रघुवंश जी ने अपने इस लेख समीक्षा में जिस तरह की चिंता की और ध्यान दिलाया था कि भिखारी विरोधियों को यह लगता था कि वे कभी सूर, कबीर, तुलसी सम पद नहीं लिख पाएँगे और यदि लिख लिया जो जग - प्रसिद्ध न हो सकेंगे। वह बात निर्मूल ही साबित हुई। भिखारी ठाकुर ने तुलसी,कबीर, सूर की तरह कविताएँ भी लिखीं और नाटककार के साथ - साथ लोगों ने उनकी कवित्व शक्ति को भी पहचाना। कवि रूप में भी उनकी ख्याति किसी से छुपी नहीं हैं। भिखारी ठाकुर ने धर्म आधारित कविताएं भी लिखी। इसका कारण स्पष्ट है कि लोक साहित्य का मूल आधार धर्म रहा है। सृष्टि के सभी मानव मूल रूप में धर्म में आस्था रखते हैं। कृष्णदेव उपाध्याय ने इस संबंध में लिखा है कि धर्म की आधारशिला पर ही लोक साहित्य की प्रतिष्ठा हुई। भिखारी ठाकुर इसके अपवाद नहीं थे। साथ ही, वह लोकसंस्कृति के उस पक्ष के पैरवीकार थे, जहाँ संस्कृति के अंतर्गत समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक व्यवस्था का सम्मिलित प्रवाह निरंतर गतिमान होता है। भिखारी ठाकुर सजग चेतना के कलाकार थे, उनके सामने परिवार का विघटन पति के परदेस जाने के बाद घर में अकेले रह गयी उसकी ब्याहता के सामने घर के भीतर और समाज में उपस्थित खतरे, लोक जीवन के अन्य दु:ख - दर्द, हर्ष - उल्लास, पर्व - त्यौहार आदि का दृश्य साक्षात था। जाग्रत मस्तिष्क का यह कलाकार इन सब स्थिति - परिस्थितियों से निरपक्ष नहीं रह सकता था। इसलिए उनका साहित्य, उनकी कला अपने समय की सामाजिक चेतना और स्थितियों का यथार्थ प्रतिबिम्ब है। उनकी सर्जनात्मकता की शक्ति इसमें थी कि उनके रचनाकर्म में भोजपुर प्रान्त की तद्युगीन सामाजिक - राजनीतिक - आर्थिक प्रवृतियों, सच्चाईयों का समावेश था। जो किसी भी लोक साहित्य, लोककला का एक अनिवार्य पक्ष है। एक मशहूर कथन है कि संस्कृति शून्य व्यक्ति निरा पशु होता है। संस्कृति मनुष्य की जीवन जीने की एक बुनियादी शैली और गुण है।  इस स्तर से भी भिखारी ठाकुर भोजपुरी लोक - संस्कृति के अगुआ नायक थे। जिनकी रचनाओं, नाट्य - प्रदर्शनों से व्यक्ति अपने - आप को, अपनी संस्कृति, अपने समाज, परिवेश को समझता रहा है। भिखारी ठाकुर का कद इतना बड़ा है कि उन्हें किसी एक फ्रेम में मापना संभव ही नहीं। बस इतना ही कि भोजपुरी, पुरबी संस्कृति का ध्वज भिखारी ठाकुर के हाथ में है और इस संस्कृति को,समाज की संकल्पना एवं अध्ययन उनके बिना संभव नहीं। भिखारी ठाकुर भोजपुरी प्रान्त के सांस्कृतिक अध्ययन में एक अनिवार्य जरुरत बनके सामने आते हैं। इसका एक उदाहरण सामने है कि भोजपुरी प्रदेशों ही नहीं बल्कि समस्त पूर्वी श्रमिक संस्कृति में एक लोक - प्रचलित गीत सुनने में आता है
लिया ना बैरी, जहाजिया न बैरी
से पईसवा बैरी ना
मोर सैयां के बिलमावे से पईसवा बैरी ना
भारतवर्ष का पूर्वांचल प्रांत गरीबी, बाढ़, सूखा जैसे कई मारों से टूटा हुआ प्रान्त है। बिना किसी आदर्शवादी या रामराजी चाशनी के कहें तो पैसा जीवन जीने की तीन मूलभूत जरूरतों में सबसे ऊपर है। इस प्रान्त के कई गाँव आज भी नौजवानों से खाली हैं। कोई इसी दो पैसे कमाने के फेर पूरब की ओर कोलकाता, असम गया हुआ है। तो कोई मुंबई, दिल्ली, पंजाब में अपमानित होकर रह रहा है। खाड़ी देशों की ओर पलायन भी खूब है। पीछे रह गए हैं बूढ़े माँ - बाप, बच्चे और रोती - सूखती -सुबकती पत्नियाँ। राजकपूर के श्री420 का पुरबिया राजू इसी पैसे के लिए मुम्बई जाता है। दो बीघा जमीन का किसान कोलकाता में हाथ रिक्शा खींचता है। आजादी से पहले की यह दशा आज भी वैसी ही है। भिखारी ठाकुर समय से आगे देख रहे थे। बिदेसिया तब भी था, आज भी है। बस रूप - रंग - ढंग बदला है। भिखारी ठाकुर इस नब्ज़ की धड़कन को जानते थे। बद्रीनारायण थोड़ा आगे बढ़कर भिखारी ठाकुर को समस्त भारत के किसानों की दुर्दशा का चितेरा घोषित करते हुए लिखते हैं भिखारी ठाकुर में भारतीय गाँव - जीवन के आर्थिक अपवाय की दर्दनाक गाथा है। पुलिस दमन, सामाजिक विसंगतियाँ नए आर्थिक दबावों से सामाजिक संबंधों के टूटन की जितनी सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक समझ भिखारी ठाकुर के साहित्य में मिलती है, उतना तत्कालीन अभिजात स्वीकृत तथा शिक्षित रचनाकारों की रचनाओं में नहीं दिखाई पड़ता। भारतीय रंगजगत में दूर - दूर तक ऐसा रंगकर्मी नज़र नहीं आता, जो अपने तमाम सीमाओं के बावजूद इतनी पैनी और सूक्ष्म संवेदनशील दृष्टि रखता है।
भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के लोक कलाकार थे, जिसने वैश्विक प्रसिद्धि और ऊँचाईयाँ पाई। सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ  मशाल उठाने वाले इस कलाकार ,रचनाकार पर अपने पारंपरिक मूल्यों की भी छाप थी। वे अपने विरासत में मिले इन मूल्यों के बावजूद जड़ता के, यथास्थितिवाद के पैरवीकार न होकर प्रयासों में खालिस प्रगतिशील थे। नाच मंडली से जीवन यापन और उसी नाच के मंच से कबीर की भांति अपने कुशल अभिनय से उस सामंती समाज का नकली चेहरा सबके सामने ले आते थे। हालांकि भिखारी ठाकुर का परिवेश भी मध्यकालीन समाज - व्यवस्था से बहुत अलग नहीं था। भिखारी ठाकुर जिस तरह के जातिगत संरचना से आते थे। वहाँ इस पूरी दकियानूसी सिस्टम से सीधे - सीधे दो - दो हाथ करना भिखारी ठाकुर के लिए संभव नहीं था। अत: इस व्यवस्था से टकराना या इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना एक कूटनीतिक चतुराई वाले प्रयास की माँग करता था और भिखारी ठाकुर जैसा कलाकार इस खेल का महारथी था। उन्होंने बड़े ही चतुराई से इस व्यवस्था को उसके बनाये मंच से चुनौती दी। जनप्रिय कलाकार के मुँह से अपने पर पड़ती चोट से यह तंत्र तिलमिलाने के अलावा कर ही क्या सकता था।
आज जब भिखारी ठाकुर हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके लिखे - खेले नाटक आज के नए विमर्शों के मध्य और भी प्रासंगिक हो उठे हैं। भिखारी ठाकुर का समय औपनिवेशिक समय था। आज उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी भिखारी ठाकुर के उठाए प्रश्न हमारे समाज में विद्यमान हैं। चाहे वह दलित वर्ग से सम्बंधित हों या स्त्रियों का पक्ष। आज भी इन प्रश्नों से जूझते बड़े समाज की ओर किसकी दृष्टि है ? जिन श्रमिकों का बड़ा चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया। उनकी कोई जाति नहीं थी। सब पूरब के बेटे हैं, जो आज भी पलायन को मजबूर हैं और घर में पीछे रह गयीं औरतें रोने को मजबूर हैं। हमारे बड़े प्रजातंत्र के नीति - नियंता कहाँ हैं ? श्रमिक संस्कृति का इतना बड़ा चितेरा भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता। जिसके प्रश्नों का जवाब आज तक अनुत्तरित है।
सन्दर्भ सूची
लेख - भोजपुरी के शेक्सपियर कवि भिखारी ठाकुर , आधुनिक भोजपुरी के दलित कवि और काव्य, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गौतम बुक सेंटर, शाहदरा, दिल्लीपृ. 93, 17.ISBN 978-93-80292-29-8 -2000
देखें मूल लेख भोजपुरी में समीक्षा, जनकवि भिखारी, रघुवंश प्रसाद सिंह, अंजोर भोजपुरी पत्रिका अंक - अक्टूबर - नवम्बर 1967
लेख - लोकभाषा और लोक- साहित्य-सैद्धांतिक पक्ष, गवेषणा, अक्टूबर -दिसंबर 2008, सं. मीरा सरीन, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा पृ.48
लोक संस्कृति -आयाम और परिप्रेक्ष्य, सं. महावीर अग्रवाल, शंकर प्रकाशन, दुर्ग, मध्य प्रदेश पृ.8
लोक संस्कृति और इतिहास - बद्रीनारायण, लोकभारती प्रकाशन, 15 महात्मा गाँधी रोड, इलाहाबाद पृ.38
सहायक प्रोफ़ेसर, हिंदी.विभाग
सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
अशोक विहार - 3  दिल्ली - 52

शनिवार, 30 अगस्त 2014

अनिल विश्‍वास को मॉं से मिला भक्ति संगीत का संस्‍कार

शरद दत्‍त
शरद दत्‍त
आज़ादी से लगभग चार साल पहले कि़स्मत फि़ल्म का एक तराना हर हिन्दुस्तानी की जबान पर था, जिसके बोल थे - '' आज हिमालय की चोटी से, फिर हमने ललकारा है, दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनियावाली, हिन्दुस्तान हमारा है।''  कवि प्रदीप की इस रचना को जिस्म की रंगों में खून की रफ्तार तेज कर देने वाली धुन में अनिल विश्वास ने ढाला था। देशभक्तिपूर्ण गीतों के प्रसंग में आज भी इस तराने को याद किया जाता है। लेकिन इसे विडंबना के अतिरिक्त और क्या कहा जाए कि हमारी यादों में तराने का अस्तित्व तो है, उसकी धुन बनाने वाले संगीतकार का नहीं। कितने लोग जानते हैं कि अनिल विश्वास कौन है, क्या है, वह जीवित है या नहीं, और अगर जीवित है तो कहाँ रहता है। किस तरह रहता है। लेकिन इस बेखबरी के लिए किसी को भी दोषी कैसे ठहराया जाए। अवाम की याददाश्त शायद बहुत देर तक उसका साथ नहीं देती। जि़न्दगी की तेज़ रफ़तार में वह अपने निकट अतीत का कोई एक टुकड़ा उसके पैरों को जकड़ लेता है और उसे झकझोर कर अपने होने का अहसास करता है।
हिंदी फिल्म - संगीत के भीष्म पितामह अनिल विश्वास का अतीत भी कुछ ऐसा ही
वे 1914 के उथल - पुथल भरे दिन थे। दुनिया के सभी छोटे - बड़े देश पहले महायुद्ध की विभीषिका झेल रहे थे। इसके बरक्स हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए जनता संगठित हो रही थी। एक तरफ कांग्रेस की नरम - दलीय राजनीति थी और दूसरी तरफ क्रांतिकारी गतिविधियाँ जोर पकड़ रही थीं, जिनके प्रमुख केन्द्र उत्तर में पंजाब तथा उत्तरप्रदेश, पश्चिम में महाराष्ट्र और पूर्व में बंगाल थे। विश्वव्यापी आतंक और हिन्दुस्तान के अवाम को इस कुलबुलाहट के बीच ही पूर्वी बंगाल [अब बांग्लादेश] के एक सुदूर नगर बरिसाल में 7 जुलाई 1914 को अनिल विश्वास का जन्म हुआ। कहा जाता है कि अभिमन्यु ने अपनी माँ के गर्भ में चक्रव्यूह - भेदन की कला सीख ली थी। बालक अनिल भी शायद गर्भ में रहते हुए ही उस दौर के प्रभावों को आत्मासत कर रहा था। जो उम्र बच्चों के खेलने - कुदने की होती है उस उम्र में वह क्रांतिकारी बन गया। उसके अंतस में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भरी हुई थी। लेकिन इसके अलावा उसे माँ से एक और संस्कार मिला था- भक्ति संगीत का संस्कार। जिसने अंतत: उसे क्रांतिकारी से संगीतकार बना दिया। संगीत उसके प्राणों में बसने लगा। संगीत ने उसकी आत्मा को मुक्त कर दिया। पर उसकी क्रांतिकारी भावनाओं का उ$फान फिर भी शांत नहीं हुआ। अवसर मिलते ही उसके भीतर का लावा फुट कर बाहर निकलने लगता।
बंगालियों के सारे विरोध के बावजूद उनके प्रांत का पश्चिमी और पूर्वी बंगाल के रुप में विभाजन हो चुका था। और जहाँ तक क्रांतिकारी गतिविधियाँ का संबंध है, पश्चिमी बंगाल में कलकत्ता तथा पूर्वी बंगाल में बरिसाल, जहाँ अनिल विश्वास का जन्म हुआ, सक्रियता के प्रमुख केन्द्र थे।
अनिल विश्वास की जन्मस्थली बरिसाल सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता अश्विनी कुमार दत्त की कर्मभूमि थी। उनके द्वारा गठित बांधव समिति ने एक अनुमान के अनुसार ढाई हजार से अधिक स्वयंसेवक तैयार किए थे और ग्रामीण विवादों के निपटाने के लिए अनेक न्यायिक समितियाँ बनाई थीं। विख्यात इतिहासकार सुमित सरकार के शब्दों में - बांधव समिति ने अपनी प्रथम वार्षिक रिपोर्ट में 89 न्यायिक समितियों के माध्यम से 523 ग्रामीण विवादों का निपटारा करने का दावा किया था ... 1909 ई. में इसकी 175 ग्राम शाखाएँ होने की रिपोर्ट मिलती है और 1906 की अकाल जैसी स्थिति में निरंतर मानव - सेवा के कार्य करके इसके नेता अश्विनी कुमार दत्त ने अपने जिले के हिंदू और मुसलमान किसानों के दिल में समान रुप से स्थान बना लिया था। इन्हीं सब कारणों से अश्विनीकुमार दत्त की गतिविधियों में बाद में गाँधीवादी स्वदेशी कार्यक्रम, राष्ट्रीय विद्यालयों एवं रचनात्मक ग्रामीण कार्य का स्पष्ट पूर्वाभास मिलता है। यानि अश्विनी कुमार दत्त के लिए क्रांति का अर्थ केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह नहीं बल्कि भावी समाज का एक रचनात्मक ढाँचा प्रस्तुत करना भी था। उन्होंने संघर्ष के साथ - साथ निर्माण की प्रक्रिया भी जारी रखी।
अनिल विश्वास की बाल्यावस्था और तरुणाई के विकास - क्रम को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए बरिसाल की इस संक्षिप्त पृष्ठभूमि को समझना जरुरी था। लेकिन इसके साथ ही जरुरी है यह जानना भी कि बरिसाल को नदीमातृक देश कहा जाता है - एक ऐसा भूभाग जिसकी नदियाँ ही उसकी माँ है। नदियों का इतना बड़ा जाल है वहाँ कि आज तक भी उस अंचल में रेल नहीं पहुँच पाई है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद बांग्ला के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कवि जीवनानंद दास भी बरिसाल - पुत्र थे और उनकी कविता में वहाँ की नदियों के बहुआयामी चित्र प्रचुरता के सााि अंकित हुए हैं।
नदियों के प्राचुर्य तथा रेलों के वहाँ न पहुँच पाने का एक प्रत्यक्ष परिणाम तो यह है कि सारा यातायात और हर तरह की सामग्री का परिवहन स्टीमरों तथा नौकाओं द्वारा ही होता है और दूसरा अगोचर परिणाम यह कि मनुष्य प्रकृति के अधिक निकट रहता है, जो उसकी संवेदनशीलता को प्रगाढ़ बनाती है।
अपनी इस नदीमातृक देश की चर्चा करते हुए अनिल दा ने कहा था - इसका नतीजा जानते हो क्या था ? जो तैरना नहीं जानता, वह गया काम से। इसलिए हमारे यहाँ बच्चे को एक साल का होते न होते पानी में छोड़ देते हैं तैरने के लिए। हाँ, दो सूखे नारियलों के साथ बाँधकर छोड़ते हैं ताकि वह डूबे नहीं और हाथ - पाँव मारने की प्रक्रिया में ही वह तैरना सीख जाता है।
अनिल दा का यह कथन एक वास्तविकता का उल्लेख मात्र लगता है, लेकिन यह उनकी संगीत - यात्रा के आरंभ का रुपक भी है कि कैसे वे बिना किसी औपचारिक शिक्षा के संगीत में निष्णात हो गए।
नदी की धारा पर जलपरी - सी तिरती नौकाएँ। मछली पकड़ने के लिए जाल फैलाकर किनारे पर बैठे प्रतीक्षारत बच्चे। घरों के आँगनों में खड़े नारियल के पेड़ और केले के गाछ। कुल मिलाकर प्रकृति का एक निर्मल और मनोहारी चित्र, जिसे देखकर अनायास कविता प्रभावित होने लगे या संगीत व लोक - संगीत की स्वर लहरियाँ मुखरित हो उठें। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था - राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। बरिसाल का यह वातावरण भी कुछ वैसा ही था। जिसके लोकगीत - संगीत की रचना के लिए खाद - पानी का काम किया। लोक संगीत व अभिनय का एक अत्यंत प्रचलित प्रकार जान्ना विशेष रुप से इसी अंचल की देन है। और मुकुंददास की जान्नाएँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। बालक अनिल इन सब प्रभावों को आत्मसात करता बड़ा हो रहा था।
अपने बचपन को याद करते हुए अनिल दा बताते हैं - मैं चार साल की उम्र में ही तबला बजाने लगा था। माँ नियमित पूजा करती और भजन गाती थीं, तो खोल [मिट्टी के अंग से बना एक विशेष वाद्य] मैं बजाता था।
- और आपके पिता ?
- हाँ, जोगेशचंद्र नाम था उनका। एक जमींदा के नायब यानि जनरल मैनेजर थे, एक तरह के छोटे - मोटे ताल्लुकेदार। एक चाचा थे - सुरेश विश्वास, जो ताल्लुकेदारी का काम देखते थे। पिता लगान वसूली के और दूसरे कामों के सिलसिले में ज्यादतर बाहर रहते और महीने में चार - छह दिन के लिए ही घर आते थे। नतीजा यह कि  पिता के साथ मेरा वैसा संबंध बना ही नहीं, जो एक पिता और पुत्र के बीचहोना चाहिए।
पिता योगेश विश्वास का ताल्लुका था बहादुरपुर गाँव में। बरिसाल सदर से स्टीमर बहादुरपुर। लगभग डेढ़ सौ परिवारों की बस्ती। कच्ची झोंपड़ियों में रहने वाले ब्राहा्रण, वैश्य, नाई, लुहार, शुद्र - अछूत आदि सभी जातियों और वर्णों के लोग, जिन्हें ताल्लुकेदार की प्रजा कहा जाता था। जिस जाति के लोग वहाँ न होते, उन्हें ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े का लालच देकर बुलाया जाता कि आओ भाई, अपने परिवार के साथ बसो यहाँ आकर। आखिर सामाजिक व्यवस्था के लिए सभी वर्णों - जातियों का गाँव में होना जरुरी था।
- आपका मकान तो पक्का होगा ? हमने जिज्ञासा की, तो अनिल दा बोले - नहीं, पक्का मकान सिर्फ ज़मींदार का होता था। हमारी इतनी हैसियत नहीं थी। हमारा घर एक ऊँचे चबूतरे पर टीन की चादरों से बना था - टीन की ही दीवारें और लकड़ी के मोटे खंभों पर टिकी छत भी नालीदार चादरों की।
अनिल विश्वास का बचपन इसी घर में बिता था, जो बरिसाल सदर में था। बहादुरपुर वे बचपन मे एक - दो बार ही गए, जिसकी बहुत स्पष्ट रुपरेखा उनके मन में नहीं है। बस उन्हें इतना ही याद है कि गाँव में उनके घर का आँगन बहुत बड़ा था, जहाँ धान की मढ़ाई होती थी। गाँव में ताल्लुकेदारी की सारी व्यवस्था चाचा सुरेश विश्वास के जि़म्मे थी।
- पिताजी नाच - गाने के शौकिन थे, अनिल दा ने बताया - उनके पास एक बजरा था, जिसमें बैठकर व ताल्लुकेदारी और ज़मींदारी के काम में लगातार यात्रा में रहते थे। बजरा क्या, अच्छा खासा मकान ही था - सोने का कमरा, बैठक$खाना, रसोईघर, स्नानघर, शौचालय, क्या कुछ नहीं था उसमें। और ऊपर खुली छत, जहाँ चाँदनी रातों में ...। फिर ठहरकर बोले - बैठना बहुत अच्छा लगता होगा ...।
अनिल दा शायद कुछ और कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। उन्हें लड़खड़ाते देख हमने जड़ दिया - नहीं, बाईजी का मुजरा $खूब जमता होगा।
हँसते हुए अनिल दा ने कहा - हाँ, पिताजी का मामला था न, मैं कहते हु झिझक रहा था।
पिता घर में आते तो पूछते - बॅडॅ खोका कोथाय ? [ अर्थात् बड़ा लड़का कहाँ है ?] अनिल विश्वास की एक बहन थी, पारुल। उनसे चार साल छोटी और एक भाई था सुनील जो पारुल से भी चार साल छोटा था। इसलिए परिवार में बॅडॅ़ खोका अनिल ही था।
पिता के पुकारने पर बालक अनिल उनके सामने पेश होता, और वे सवाल करते, पढ़ाई - लिखाई कैसी चल रही है ?
- ठीक। बालक अनिल जवाब देता और बात $खत्म हो जाती। पिता और पुत्र के बीच का संवाद इस लक्ष्मण - रेखा को शायद कभी नहीं लाँघ पाया। पिता का आतंक ही ऐसा था कि उनके सामने आँख उठाकर बात करने की हिम्मत पुत्र में नहीं थी।
पिता की स्नेह छाया और उनके सघन संवाद से वंचित अनिल ने माँ को ही पिता समझा, गुरु समझा, उसके संसार के समस्त नातों - रिश्तों की प्रतिमूर्ति थी माँ। वी उसके जीवन की प्रेरणा रही और उसी के संस्कारों ने उसके मानस का निर्माण किया। पारुल और सुनील भी इसके अपवाद नहीं थे। पिता का प्रभाव तीनों संतानों में से किसी के ऊपर नहीं रहा।
पिता ताल्लुकेदार थे, तो घर में नौकर - चाकर भी जरुर होंगे। और जैसा कि उन दिनों होता था ...।
अनिल दा ने हमारी बात बीच में काटते हुए कहा - नौकर - चाकर तो नहीं, बस एक नौकर था। पिताजी का नाम जोगेश था और उसका भी यही नाम था, इसीलिए हम उसे जोगेश्या मामा कहते थे। वह हमारे परिवार का एक अंग बन गया था, ऐसा ही होता था उन दिनों। अनिल दा ने हमारी अधूरी बात पूरी की - जोगेश्या हमारे लिए मामा ही था, नौकर नहीं, और बच्चों की देखभाल करना उसकी जिम्मेदारी थी। हमारी छोटी - सी भूल पर भी हमारी पिटाई कर देना उसका विशेषाधिकार था और इस अधिकार - क्षेत्र में कोई दखलंदाजी नहीं कर सकता था।
बोलते - बोलते अनिल दा कुछ रुके, फिर होठों पर हल्की - सी मुस्कान तैर गई और वे कहने लगे - एक मज़े की बात सुनाता हूं। पारुल दूध नहीं पी रही थी। जोगेश्या मामा ने बहुत मनुहार की, दूध का गिलास कई बार उसके होंठों से लगाने की कोशिश की लेकिन वह राज़ी नहीं हुई। आखिर जोगेश्या मामा का धैर्य जवाब दे गया। और कुछ तो उन्हें सुझा नहीं, वे पारुल को घसीटकर चूल्हे के पास ले गए। जो कुछ देर पहले ही बुझाया था और उसका सर चूल्हे में घुसाते हुए बोले - दूध नहीं पियोगी तो तुम्हारा सर इसी तरह गरम चूल्हे में घुसा देंगे। और सचमुच इस धमकी से सहमी पारुल गटागट दूध पी गई। वह जानती थी, हम तीनों भाई बहन जानते थे कि जोगेश्या मामा को ऐसा करने से रोकने वाला कोई नहीं है। अपनी सीमाओं के भीतर उनका एकछत्र साम्राज्य था।
- दादा आपने कहा कि माँ ही आपका सर्वस्व थी। उसके बारे में ...।
दादा ने तुरंत हमारी बात काटी - क्या बताऊँ माँ के बारे में। कहाँ से शुरु करुँ, कहाँ $खत्म करुँ। जितना कहूँगा, वह कम ही होगा। कबीर का वह दोहा याद है न -
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि - गुन लिख्या न जाइ।।
तो भाई, माँ का प्रसंग तो ऐसा ही है मेरे लिए ...। कहते - कहते भावोद्रेक से अनिल दा का गला रुँध गया। वा$कई आँसुओं की कोई उम्र नहीं होती। छियासी वर्षीय अनिल दा आँखों में अनायास छलक आए आँसुओं को अँगुलियों की पोरों से पोंछते हुए बोले - मेरी माँ साक्षात् सरस्वती का अवतार थीं। जितनी लावण्यमयी, उतनी ही कलात्मक अभिरुचि से संपन्न। यामिनी नाम था उनका। किंतु पिताजी की मृत्यु के बाद जब उन्होंने दीक्षा ली, तो गुरु ने उनका नामकरण किया - सत्यभामा वैष्णवी। वे विवाह से पहले ही संगीत की $खासकर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने लगी थीं। उनके संगीत गुरु थे लालमोहन गोस्वामी, जो एक मंदिर के पुजारी थे और पखावज बहुत सुंदर बजाते थे। पिताजी हालाँकि स्वयं संगीत के जानकर नहीं थे, लेकिन जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं वे संगीत के प्रेमी थे और शायद स्वभाव से उदार ही रहे होंगे। तभी तो विवाह के बाद भी उन्होंने मेरी माँ को संगीत की शिक्षा रखने की अनुमति दी और लालमोहन गोस्वामी उन्हें संगीत के विभिन्न रुपों का अभ्यास कराने के लिए हमारे घर आने लगे।
है। जिसने हमारी चेतना को झकझोर कर हमें विवश किया कि हम उसके अवदान को न सिर्फ स्वयं स्वीकार करें बल्कि आज की और आने वाली पीढ़ियों के लिए उसे लिपिबद्ध कर दें।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

कठिन जीवन के कुटिलकाल में मध्यांतर का गीतकार : डॉ विष्णु सक्सेना

जगन्‍नाथ ' विश्‍व '
-जगन्‍नाथ ' विश्व '  -
नवगीत तो अस्तित्व का नवनीत है। विषय पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए पद्मश्री गोपालदास नीरज ने ग्रेसिम बिरलाग्राम नागदा की साहित्यिक संस्था वातायन में लोकप्रिय गीतकार कवि डॉ विष्णु सक्सैना के लिए एक दशक पूर्व कहा था -  डा विष्णु सक्सैना एक ऐसा कवि गीतकार है जो कुछ बरसों पहले सावन के बादलों की तरह उमड़ा और पूरे देश पर कुछ इस कदर बरसा कि हर काव्य प्रेमी का मन सदा सदा के लिए उसकी रसधारा में डूब गया। विष्णु की भाषा का प्रवाह तथा स्वर संयोजन एक झरने के समान है। जिसमें बड़े - बड़े तैराको के पांव उखड़ जाते है और वे उसमें डूबने के लिए विवश हो जाते हैं।
सर्वप्रिय विष्णुभाई का हर गीत एक  पुष्प है। आइये उनके गीत पुष्पों की माला संजोकर मां वीणापाणी के गले में डालते हुए श्रवणीयता की नई सरगम आत्मसात करें.
आओं एक बार फिर से तुम्हें देख लूं, क्या पता फिर ये दरपन मिले ना मिले,
पास आ तन की गंधों को दे दो मुझे, क्या पता फिर ये चंदन मिले ना मिले,
इस निवेदन के साथ गीतकार मीठे निर्णय के लिए भी प्रेरित करता है.एक हैं अंक हम एक हो अंक तुम आओ दोनों को अब जोड़ दें। तुम हमारी कसम तोड़ दोड़ हम तुम्हारी कसम तोड़ दें।
इस अहसास के समर्थन में  विश्व व्यापी ख्याति प्राप्त हिन्दी मालवी के महारथ हासिल वरिष्ठ कवि पूर्व सांसद श्री बालकवि बैरागी का यह कथन भी सत्य है -  बसंत ने किसे संत रहने दिया है। याद आया बात आठ वर्ष पुरानी है। नागदा में रंगपंचमी पर प्यारेलालजी पोरवाल द्वारा आयोजित टेपा हास्य कवि सम्मेलन के प्रमुख मंच संचालक बैरागीजी ने कवि विष्णु सक्सैना को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए जो टिप्पणी प्रस्तुत की उसे सुनकर श्रोतागण हंसते - हंसते लोट पोट हो गए। टिप्पणी के बोल थे - आज हमारे आंगन में कई अर्थों में ये अकेला अलबेला कवि डॉ विष्णु सक्सैना पता नहीं अपने चिकित्सा शास्त्र के शिक्षण प्रशिक्षण के बाद अपने मरीजों के साथ कैसा भी उपचारी डाक्टर हो, परन्तु हिन्दी की आज वाली पीढ़ी में विष्णु अकेला ऐसा गीतकार है जिसे अगर किसी ने एक बार भी अपनी समग्रता एकाग्रता के साथ सुन लिया तो फिर या तो वह रोगी होकर ही रहेगा या उसका कोई प्राचीन अर्वाचीन प्रेमरोग नये सिरे से जाग उठेगा। बस फिर क्या था, श्रोतागण गीत सुनते रहे और विष्णु सक्सैना गीत सुनाते रहे।
थाल पूजा का लेकर चले आइये, मंदिरों की बनावट सा घर है मेरा
मैंने काट दिये दिन - दिन उँगलियों पे गिन
हथेली पर तुम्हारी आज मैं मेंहदी रख दूंगा
क्‍वॉंरी मांग सिन्दूरी सितारों से सजा दूंगा
तदुपरांत माईक पर आई एक प्रसिद्ध कवियित्री ने अपनी भूमिका बनाते हुए कहा -  कवि डॉ सरोज कुमार, पं. सत्यनारायण सत्तन की तरह डॉ विष्णु सक्सैना को भी प्रकृति ने सुदर्शन रूप सम्पदा दी है। कविता पढ़ते हुए इनका रूप और भी मनमोहक बालकवि जी जैसा निखरा - निखरा अच्छा लगता है। तत्‍काल  बैरागी जी चुटकी लेते हुए बोले -  सच कहूँ ये विष्णु उतना अबोध और मासूम भी नहीं है जितना कि ये लगता या दिखाई देता है।
धोखा खाने का मन हो तो खालो।
फिर भी यह बात सत्य है कई बार विष्णु मरूस्थल में मारूउधान और महासागर में द्वीप साबित हुआ है। जहाँ था हारा प्राण पंछी घड़ी अधघड़ी विश्राम पाकर अपनी सामान्य चह - चहाहट फिर से प्राप्त कर सके। उसी प्रकार  हमारे मानवीय कठिन जीवन के कुटिलकाल में डॉ विष्णु सक्सैना मध्यांतर का विशेष गायक गीतकार कचन कवि है।
ज्ञातव्य है इन दिनों कवि सम्मेलनों में डॉ विष्णु सक्सैना अपनी काव्य प्रस्तुति में स्वराघात् और शब्दाघात् का ऐसा सधा हुआ संधान करते हैं कि हर कोई उन पर फिदा हो जाता है। उदाहरण के लिए देखिए इन पंक्तियों को जिसे सुनकर कौन कुरबान नहीं होगा।
 बस एक ही ग्राहक बचा दिल की दुकान में, सोचा था साथ दोगे तुम ऊँची उड़ान में।
जब यूँ झटक के डाली तोड़ दोगे घोंसला, पंछी रहेगा फिर कहो किस  मकान में।
डॉ विष्णु सक्सैना के  कई गीत देह - गंध से प्रवाहित होकर मन के गमले में सदा बहार के पौधों की तरह खिलने के लिए आतुर दिखते हैं। इस प्रतिबिम्ब में वियोग के अतिरिक्त संयोग की भी झलक स्पष्ट दिखलाई देती है.
कितना मिलता था सुख,कुछ खिलाते समय काट लेते थे आपस में हम उँगलियाँ
पहले लिखते थे करते थे फिर रेत पर एक दूजे के नामों से अठखेलियाँ
सीप मैं चूम लूं, शंख तुम चूम लो क्या पता फिर ये चुंबन मिले न मिले
आज आतं·, हिंसा, लूट, बलात्‍कार दंगे जैसे रोग मानवता का कत्ल करने में लगे हुए हैं। इन तमाम रोगों की  एक दवा और उपचार है - प्रेम। प्रेम आदमी की रागात्मक संवेदना की  कुंजी  है। प्रेम ही आनंद से परमानंद की प्राप्ति है। अत : प्रेम से दूर रहना विधाता की व्यवस्था का विरोध करना है। यही बात विष्णु सक्सैना की इन पंक्तियों में सलीके से यूँ अंदाजे - बयां है -
मस्जिद हो तुम अगर मुझे मंदिर ही मान लो।
हो आयतों में गर मुझे श्लोक ही जान लो।
कब  तक  सहेंगे और  रहेंगे अलग  अलग ।
पूजूं  तुम्हें  तुम  मेरे दिल में अजान दो।
कुछ समय से हिन्दी काव्य मंचों की निरंतर गिरावट जग जाहिर है। ऐसी स्थिति में अकवियों की भीड़ में जब किसी कवि सम्मेलन में डॉ विष्णु सक्सैना अपने शालीन श्रृंगार गीत पढ़ते और खूब सुने - सराहे जाते हैं तो हमारी यह आस्था फिर से बलवती हो जाती कि काव्य प्रेमी आज भी अच्छा सुनना चाहते हैं यही समय का शाश्वत् सत्य है।
गीत तो अस्तित्व का नवनीत है, इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि जब तक मनुष्य के सीने में हृदय जैसी कोई चीज धड़कती रहेगी तब तक डॉ विष्णु सक्सैना और उनके जैसे अनेकानेक समर्थ गीतकार कविगण काव्य मंचों पर सर्वप्रिय बनकर हमेशा जन - जन का प्यार और सम्मान पाते रहेंगे।
वाकई, डॉ विष्णु सक्सैना भाग्यशाली व्यक्ति हैं। ईश्वर उनकी हर इच्छा पूरी कर रहा है। इसलिए विष्णुभाई भी सावधानी रखते हुए मर्यादाओं में रहकर उजले मन से प्रभू से अच्छाई का कल्पवृक्ष अपना कर सभी को आजीवन प्रसन्नता के फूल बांटते रहे, ताकि प्रत्येक जगत का प्राणी उनसे ऐसा जुड़ा रहे. जितना के पेड़ों से परिन्दे और फूलों से तितलियाँ। इसी हार्दिकता की हवन - खुशबू में नहाई हुई मस्तुरिया सुगंध सहित दिली - दुआएँ हैं।

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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

प्रेरक काव्य के सर्जक - ठा. नारायण सिंह

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ के साहित्याकाश में अनेक कवियों  ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदेश की सीमा को लांघ कर राष्टï्रीय और अंर्तराष्टï्रीय ख्याति अर्जित की है। परन्तु कुछ ऐसे साहित्यकार भी हुए जिन्होंने ठोस रचनाएं तो लिखी लेकिन प्रकाशन के प्रति उदासीनता के कारण चर्चित नहीं हो पाये। वे अपनी मौन साहित्य साधना में लगे रहे। ऐसे ही एक कवि है - ठा. नारायण सिंह जिनकी रचनाएं काव्य की कसौटी पर सौ फीसदी  खरी उतरती है।
11 मार्च 1934 को राजनांदगांव जिले के तत्कालीन रियासत छुईखदान में जन्में ठा. नारायण सिंह दसवीं कक्षा में अध्ययनरत रहते हुए कविता लिखने की प्रेरणा अपने शिक्षक जी.पी. सुल्लेरे से प्राप्त कर कविताएं लिखने लगे। बेमेतरा में शिक्षक रहने के दौरान छत्तीसगढ़ के कवि दानेश्वर शर्मा से उन्हें काव्य सृजन की प्रेरणा मिलीं। बाद में समकालीन रचनाओं ने उन्हें काफी प्रोत्साहन किया। उन्होंने अमिधा एवं लक्षणा से ओतप्रोत शैली में काव्य लेखन कर युवाओं को उनकी ताकत का अहसास कराने का प्रयास किया। अब तक उन्होंने लगभग दो सौ कविताएं एवं गीत लिखे हैं लेकिन उनके पास मात्र सौ कविताएं ही संग्रहित है।
ठा. नारायण सिंह ने कविताओं के अलावा निबंधात्मक लेख, बाल प्रहसन, संस्मरण एवं यात्रा वृतांत भी लिखा। वे साहित्य की किसी एक विधा में बंधकर नहीं रहे। उन्होंने पहली रचना रामचरित मानस से प्रभावित होकर तुलसी स्तवन के नाम से लिखी, जो एक कोमल पदावली है।
ओ राम भक्ति के मतवाले, ओ रामरूप के दीवाने,
ओ रमा, रामप्रिय रामदास, तुलसी मेरा शत - शत प्रणाम।
रत्नावली के अनमोल रत्न, नरहरि के ओ आन - बान,
अमर आत्मा आत्माराम, हुलसी के तुलसी प्रणाम।
गुरू ऋण से कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता। इस शाश्वत वाक्य को उन्होंने अपनी कविता में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है।
मैं प्राण का दीप सजा लाया, सांसों की इसमें बाती है,
नैवैद्य मात्र ये शब्द मेरे, बस इतनी मेरी थाती है।
मुझ पर गुरूवर की ऋण इतना, क्या कभी उऋण हो सकता हूं,
तेरेे चरणों पर ये गुरूवर, अपने को समर्पित करता हूं।
शिक्षकीय जीवन में विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने अनेक कविताओं की रचना की। एक आव्हान गीत की पंक्तियां इस प्रकार है।
बरबादियों को हमीं ने है झेला, कि हमने सदा संकटों से है खेला।
ऊंगली पे गिरिवर उठाया था जिसने,  दुनिया को कान्हा की बंशी सुना दो॥
ये लक्ष्मी की तलवार राणा का माला, शहीदों ने पहनाई मुंडों की माला।
उसी मुंड माला की तुम भी कड़ी बन, मां के सपूतों दुनिया हिला दो॥
ठा. नारायण सिंह रागात्मक काव्य को ही कविता मानते हैं, जो रस, छंद एवं अलंकार जैसे काव्य गुणों से युक्त हो। उनके लिखे चंद दोहे दृष्टïव्य हैं -
पलकों पर सपने सजे, सुख से बीती रैन।
सुबह हुई फिर जिंदगी, सायकल उतरी चैन॥
कौआ रोटी ले गया, बिल्ली खा गयी खीर।
धनिया बैठी सिसकती, ठोंक रही तकदीर॥
एक घाट पानी पीये, बकरी शेर सियार।
राजनीति का भेद यह, जाने सोई होशियार॥
मौजूदा दौर की सबसे भयावह समस्या दहेज पर ठा. नारायण सिंह की लेखनी जमकर चली है। उनकी मान्यता है कि दहेज के खिलाफ अब बेटियों को मुखर होकर सामने आना चाहिए। बेटी को आव्हान करती गीत की ये प्रेरक पंक्तियां -
तो अब तू जाग कि चल पड़, युग की यही पुकार है बेटी,
नहीं भ्रूण में तू मर सकती, जीने का तुम्हें अधिकार है बेटी।
आन - बान गौरव है तू, अपनी ताकत पहचान ओ बेटी
मत बन, मत बन, मत बन, विज्ञापन का सामान ओ बेटी।
इस जंग लगी तलवारों पर अब तू ही धार करेगी बेटी,
इस दहेज के महिषासुर का, तू ही संहार करेगी बेटी॥
शासकीय शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने व्यंग्यात्मक शैली में इस प्रकार कटाक्ष किया है -
गली - गली में अक्षर ज्ञान, स्कूल में भोजन अभियान।
शिक्षक बेचारे हैरान, बच्चों के मुख पर मुस्कान॥
शिक्षा का अब वजन न तौल, खोल सके तो बटुआ खोल।
सावन महिना बम - बम बोल ....॥
ठा. नारायण सिंह ने हिन्दी के अलावा छत्तीसगढ़ी में भी अपनी लेखनी जमकर चलाई है। सम सामायिक घटनाओं पर उनकी कलम बेखौफ होकर चली है। केन्द्र की राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के गठन पर उन्होंने छत्तीसगढ़ी में कुछ इस तरह व्यंग्य किया -
अकल हरागे अटल कका के फीलगुड के चक्कर मा,
अडवानी रथ चुरकुट होगे, सोनिया के टक्कर मा।
सुवारथ के सब संगी साथी, मतलब बर जुरियावत हें,
बिन पेंदी के लोटा कस, ऐती - वोती ढुरकत जावत हें।
कतको सुरकंय चुहत लार ला, कतको के मुंह मा आगे पानी,
मनमोहना मनमोहन सिंह के, मूड़ मा आगे परधानी।
सवैया छंद में होली गीत का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है -
लइका जवान सियान सबो में, फागुन अइसन रंग जमावै।
ऊंच न, नीच न छोटे बड़े कोनो, होरी के रंग सबै रंग जावै॥
रंग - गुलाल उड़े घनघोर के, देवतन देखि के तारी बजावै।
गलियन प्रेम के गंगा बहे, मन कारिख मैल सबै बहि जावै॥
दूषित राजनीति व्यवस्था पर उन्होंने प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से अपनी बात को बड़ी बेबाकी के साथ अभिव्यक्त किया है। पंक्तियां इस प्रकार है -
पोंसे कुकुर चबनहा होगे, कोढ़िया होगे बईला,
दूध - मलाई चांट बिलाई, कर दिन हमला कंगला।
बघवा के माड़ा म होवय, कोलिहा के सत्कार,
ओ बमलेसरी दाई कइसे के होही बेड़ा पार ...।
बखरी म तो बरहा पईधे, धनहा मा पईधे गोल्लर,
इन सावन के अंधरा मन बर, बारो महिना हरियर।
तेल सिरागे, बाती सुखागे, होगे देवारी तिहार,
ओ बमलेसरी दाई, कईसे के होही बेड़ा पार ...।
ठा. नारायण सिंह ने एक ओर कोमल पदावली की रचना की है तो दूसरी ओर वीररस एवं हास्य तथा व्यंग्य से भरपूर कविताओं का भी सृजन किया है।
स्थानीय काव्य गोष्ठिïयों के वे लोकप्रिय कवि हैं। कवि सम्मेलनों की अपेक्षा वे काव्य गोष्ठिïयों को अधिक वरियता देते हैं। कवि सम्मेलनों के फूहड़ प्रस्तुतियों से खिन्न रहने वाले ठा. नारायण सिंह का अभी तक कोई काव्य संकलन प्रकाशित नहीं हुआ है।
विभिन्न अवसरों व शिक्षक दिवस पर वे अनेक बार सम्मानित हुए हैं। दीपाक्षर साहित्य समिति दुर्ग - भिलाई द्वारा राजनांदगांव में आयोजि वार्षिक सम्मान समारोह में ठा. नारायण सिंह को उनकी काव्य साधना के लिए स्व. मेघनाथ कनौजे स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।

बुधवार, 11 सितंबर 2013

कला व समाज को समर्पित एक सम्पूर्ण

व्यक्तित्व - महेश गुप्ता
सुरेश सर्वेद
कुछ लोग हैं जो वक्त के,
सांचे में ढल गये।
कुछ लोग हैं जो,
वक्त के सांचे बदल दिये।
उक्त पंक्तियां किसी मशहूर शायर की है जो कला के धनी मगर बारदाना के व्यवसायी महेश गुप्ता पर अक्षरश: उतरता है। कला, साहित्य, फिल्म खेल के लिए विश्व विख्यात संस्कारधानी राजनांदगांव में अनेक प्रतिभाएं हैं जो अपने रचनात्मक गुणों के साथ भीड़ से अलग पहचान बनाने में सफल हुई है। उनमें महेश गुप्ता भी पांक्तेय स्थान रखते हैं। इस प्रतिभा ने लंबी कला, सांगीतिक, साहित्यिक और राजनीतिक क्षेत्रों में न केवल स्वयं अपनी पहचान बनाई अपितु प्रतिभाओं को अवसर प्रदान कर उन्हें मंजिल तक पहुंचाने में अपना अमूल्य योगदान भी दिए हैं।
रचनात्मक स्वभाव के धनी महेश गुप्ता सन् 1966 में तात्कालिक विषम परिस्थितियों में भी अपने अनन्य मित्रों सर्वश्री नजीर अहमद, रवि रामटेके, स्व. बिंदु वर्मा  एवं स्व. प्रभाकर उत्तलवार के साथ मिलकर संगीत साधना समिति की स्थापना की। इस संगीत मंडली ने वर्ष 1966 से 1977 तक प्रदेश सहित भारत के विभिन्न शहरों में अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से लोगों का मन जीत लिया। समिति के मंचों पर सैंकड़ों कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं, जिनमें समिति के उद्घोषक, इलेक्ट्रानिक मीडिया  से संबद्ध, दूरदर्शन के लिए अनेक सीरियलों के निर्माता श्री संतोष जैन, आकाशवाणी दूरदर्शन सहित विदेशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके बांसुरी वादक श्री संतोष टांक, समिति ने छत्तीसगढ़ की लोक गायिका श्रीमती कविता वासनिक दूरदर्शन एवं आकाशवाणी कलाकार, लोक गायिका श्रीमती साधना यादव, लोकगायिका श्रीमती उषा बांदिले जैसे बाल कलकाकारों को पल्लवित किया जिन्होंने आगे जाकर छत्तीसगढी लोक कला को सजाया संवारा। समिति के मार्गदर्शक एवं गायक श्री दीपक बुद्धदेव, रंगकर्म में हास्य कला के सिद्धहस्त कलाकार इकबाल राइन, स्व.मोहम्मद रफी साहब के गीतों के मशहूर गायक श्री नबी कुरैशी, गायिका श्रीमती शैल सार्वा, हास्य विनोद के सशक्त हस्ताक्षर डां. ललित जायसवाल, स्व. केदार यादव लोक गायक, स्व. जसबीर सिंह भाटिया प्रसिद्ध गायक स्व. चंदू शुक्ला कामेडी किंग ने महेश गुप्ता की टीम के साथ उत्कृष्टï प्रदर्शन किया।
महेश गुप्ता एक रचनात्मक व्यक्तित्व हैं, इस बात का प्रमाण यह है कि वे मंचों पर न केवल सफल प्रस्तुतियों की बागडोर सम्हालते रहे बल्कि स्वयं कांगो,मेलोड्रम, एवं जाजसेट का वादन कर कलाकारों को उद्दाम प्रस्तुति के लिए प्रोत्साहित भी करते रहे। उनके मंच निर्देशन का लोहा कलाकार जगत मानता था।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि गुप्ताजी, जितनी रूचि संगीत में लेते रहे उसी के सामान्तर उनकी रूचि ललित कला में भी थी। इसी जुनून के चलते उन्होंने सुप्रसिद्ध कला गुरू श्री अरूण गौतम के मार्गदर्शन में  महाराष्टï्र स्टेट द्वारा संचालित कला की एलीमेंट्री व इंटर मिडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की है। एक समय ये,कलाकृतियों का प्रदर्शन कर सम्मानित होते रहे हैं। कला के क्षेत्र में तो महेश गुप्ता की पकड़ रही पर यह जानकार सुखद अनुभूति होगी कि वे मीडिया के क्षेत्र से अछूते नहीं रहे। इन्होंने इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिये न केवल कला व प्रदर्शनकारी कलाओं को भरपूर कवरेज दिया अपितु जनहित, समाजहित, व देशहित के अनेक मुद्दे उठाये जिसके कारण टीवी कार्यक्रम च्च्बहुरंगज्ज् को देश स्तर पर पहचान मिली। श्री गुप्ता द्वारा राजनांदगांव जिले के ग्राम कौड़ीकसा के पानी में आर्सेनिक होने की खबर को प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया गया। पानी में आर्सेनिक की उपस्थिति के चलते ग्रामीणों को होने वाले फ ोड़े, फुसियों, चर्मरोगों की पीड़ा को कवरेज देकर प्रशासन का ध्यान आकृष्टï किया जो एक सराहनीय पहल थी। उल्लेखनीय है कि जब प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री डां.रमनसिंह  लोकसभा चुनाव लड़े तब राजनांदगांव संसदीय सीट पर सबकी नजर थी,क्योंकि भाजपा प्रत्याशी  डां.रमनसिंह के मुख्य  प्रतिद्वंदी कांग्रेस के वरिष्ठï नेता श्री मोतीलाल वोरा थे। इस दिलचस्प चुनावी समाचार का कव्हरेज भोपाल दूरदर्शन के लिए महेश गुप्ता ने प्रमुखता से किया, जिसे खूब सराहा गया तब इतने समाचार चैनल नहीं थे जितना की अब है। इसके अतिरिक्त संस्कारधानी की अनेक प्रतिभाओं जैसे अपने हाथ पैर जंजीर में बांधकर तालाब में तैरने का हैरतंगेज कारनामा दिखाने वाले द्वारिका यादव, क्रासहैण्ड मोटर साइकिल चालक श्री सतीश भट्टïड़,एवं एक ही रंग का कपड़ा 25 वर्षों से लगातार पहनने वाली दम्पति को दूरदर्शन द्वारा दिखाया। ईरा फिल्मस के डायरेक्टर श्री संतोष जैन ने प्रोजेक्टर द्वारा आठ फीट के पर्दे पर आंचलिक, प्रादेशिक एवं राष्टï्रीय गतिविधियों का कव्हरेज कर समाचारों का प्रसारण गांव - गांव किया। इसके लिए भी श्री गुप्ता ने रिर्पोटिंग की जिसमें च्च्अपनी बदहाली पर आंसू बहाता नांदगांव का बी.एन.सी. मिलज्ज् रिपोर्टिंग को खूब सराहना मिली। श्री महेश गुप्ता की प्रेरणा से आज नगर के अनेक युवा जैसे देवेन्द्र पीटर कैमरामेन, संजू सिन्हा कैमरामेन, प्रणव झा कोरियो ग्राफर व टी.वी. विज्ञापन एक्सपर्ट  इलेक्ट्रानिक मीडिया की पहचान बने हुए हैं।  कला फिल्मों के निर्माता - निर्देशक मणिकौल की फिल्म च्च्नौकर की कमीजज्ज् में नगर के कलाकारों को स्क्रीन टेस्ट में हिस्सा लेने का वृहद् अवसर मिला। नगर के कुछेक कलाकारों जिसमें ओमप्रकाश द्विवेदी प्रमुख हैं, ने इस फिल्म में अहम् भूमिका निभाई।
महेश गुप्ता न सिर्फ  कला और मीडिया जगत से जुड़े रहे अपितु राजनीति में भी इनकी अपनी अलग पहचान है। श्री गुप्ता जिले के पूर्व सांसद श्री मदन तिवारी, पूर्व विधायक जे.पी.एल. फ्रांसिस एवं स्व. विद्याभूषण ठाकुर के अनुयायी रहे। सामाजिक कार्यक्रमों में भी  महेश गुप्ता का काफी योगदान रहा।
प्रतिभा के धनी श्री महेश गुप्ता को क्षेत्रीय फिल्म च्च्जय मां बम्लेश्वरी मय्याज्ज् के तकनीकी सलाहकार हेतु स्मृति चिन्ह व प्रशस्तिपत्र ईरा फिल्मस द्वारा दिया गया। यातायात विभाग द्वारा सनï् 1999 में सड़क सप्ताह के  कवरेज व डायक्यूमेंट्री हेतु तात्कालीन एस.पी. द्वारा प्रशस्ति पत्र, पत्रकारिता के क्षेत्र में जनकल्याणकारी योजनाओं को जन - जन तक पहुंचाने हेतु छत्तीसगढ़ शासन के लोकनिर्माण मंत्री श्री राजेश मूणत एवं कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा द्वारा सन 2005 में 15 अगस्त के मुख्य समारोह में सम्मान किया गया। बहुप्रतिभा केधनी, युवाओं में प्रतिभा खोजकर उन्हें सामने लाने में सदैव तत्पर श्री महेश गुप्ता भले ही आज भी युवाओं के प्रेरणाश्रोत बने हुए हैं मगर उनका नाम लगभग गुमनाम सा हो गया है।

कालजयी गीतों के प्रणेता - डां. रतन जैन

वीरेन्द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ की शस्य श्यामला भूमि में आदि कवि महर्षि बाल्मिकी से लेकर छायावाद के प्रवर्तक पं. मुकुटधर पाण्डेय एवं नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं से राष्टï्रीय स्तर की ख्याति अर्जित की है। परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिनकी रचनाएं प्रकाशन के अभाव में कालजयी होते हुए भी चर्चित नहीं हो पायीं। इसके बावजूद वे उम्र के अंतिम पड़ाव में भी सतत मौन साहित्य साधना में रत हैं। ऐसे ही एक गीतकार है ... डां. रतन जैन।
छायावादी एवं प्रगतिवादी गीत लिखने वाले डां. रतन जैन का जन्म 27 मई 1927 को राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर में हुआ। 1939 में नोआखाली आंदोलन से प्रेरित होकर कविताएं लिखने वाले डां. रतन जैन ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा आयोजित साहित्य भूषण एवं साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की है। उनकी प्रथम रचना समाधि दीप विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित हुई। बाद में उनकी लिखी कहानी लुटेरा जिंदगी पत्रिका में छपी। उनकी कविताएं अब तक छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं महाराष्टï्र से निकलने वाले लगभग सभी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। वे आकाशवाणी के भी प्रिय गीतकार रहे। आकाशवाणी रायपुर की कवि गोष्ठिïयों में 1974 से 1992 तक उनकी गीत एवं कविताएं प्रसारित हुई है। इसके अलावा अंचल के अनेक मंचों पर उन्होंने देश के  प्रतिष्ठिïत कवियों के साथ काव्य पाठ किया है। छुईखदान जैसे छोटे से नगर में होने के कारण एवं प्रकाशन की अल्प सुविधा तथा कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ अंचल के इस कवि का एक भी काव्य संकलन आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया है। संभवत: यही कारण है कि साहित्य बिरादरी में आज तक  उनका समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाया है। उनकी काव्य यात्रा अस्सी वर्ष की उम्र में अभी भी जारी है।
डां. रतन जैन कवि होने के साथ - साथ सफल पत्रकार भी रहे हैं। जीवन के प्रारंभिक दिनों में उन्होंने नागपुर से प्रकाशित साप्ताहिक आलोक में सह संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दी। बाद में वे रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत एवं युगधर्म के  लगातार 15 वर्षों तक संवाददाता रहे।
डां. रतन जैन हिन्दी के अनन्य सेवक है। बसंत पंचमी सनï् 1948 को छुईखदान में गठित हिन्दी साहित्य समिति के वे संस्थापक सदस्यों में से एक है। सनï् 1961 में समिति का पुर्नगठन होने पर उन्हें सर्वसम्मति से इस समिति का अध्यक्ष चुना गया। अपने सात वर्ष के अध्यक्षीय कार्यकाल में उन्होंने समिति को नई दिशा एवं गति प्रदान की आठ फरवरी 1973 को आयोजित हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की रजत जयंती समारोह एवं इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका के कलेवर को संवारने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान में वे समिति के संरक्षक है।
डां. रतन जैन के साहित्यिक योगदान के छुईखदान की सेवाभावी संस्था प्रेरणा ने 26 जनवरी 1996  को सम्मानित किया। दो वर्ष बाद हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की स्वर्ण जयंती समारोह बसंत पंचमी 1998 में उनका सम्मान किया गया। जीवन के पचहत्तर वर्ष पूर्ण करने पर हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान ने उनका अमृत महोत्सव का आयोजन किया एवं उन्हें सम्मानित कर उनके यशस्वी योगदान को याद किया। मात्र 23 वर्ष की उम्र से शुरू हुई उनकी काव्य साधना आज उम्र के 80 वें पड़ाव में भी निर्बाध रूप से जारी है।
डां. रतन जैन की कविताओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश एवं सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति स्पष्टï रूप से दिखाई पड़ती है। उनकी इन पंक्तियों में जीवन संघर्ष का सटीक चित्रण हैं-
 जीवन के पृष्ठों को मत खोलो, अक्षर - अक्षर चोट चिन्ह है।
शब्द - शब्द पीड़ा की रेखा, पंक्ति - पंक्ति है घाव व्यथा के,
छंद - छंद मेरे अभाव की, गाथाएं स्वच्छंद कह रहे,
अंधकार में भाव चरण मृदु बेबस, अनगिन शूल सह रहे।
उम्र साधना की वेदी पर, कविते तुम जी भर के रो लो,
जीवन के पृष्ठïों को मत खोलो ....।
देश की मौजूदा हालत पर कवि की लेखनी कुछ इस तरह बेबाक होकर चली है -
नाविक बदले, धार न बदली, जीर्णशीर्ण जलपोत वही है,
वही शक्ति अभिव्यक्ति पुरानी, शोषण के सब श्रोत वही है।
दुल्हर धर हथेली देती, किन्तु भ्रष्टï आचरण खड़े हैं,
मंदिर कलश पुराने केवल, मूर्ति के पत्थर बदले हैं।
गीत वही है छंद वही है, केवल युग के स्वर बदले हैं,
परिवर्तन के संग्रह में बस, पृष्ठïों के अक्षर बदले हैं।
अपनी उत्पात शीर्षक कविता में कवि ने भयानक रस की भयावहता का चित्रण इन शब्दों में किया है -
लूटपाट हत्याओं की यह आयी कैसी अशुभ घड़ी है,
चौराहे पर बिना कफन की, नंगी विकृत लाश पड़ी है।
मरघट के सन्नाटे जैसा, सारा चमन उदास हो गया,
भाई से भाई का रिश्ता, अर्थहीन परिहास हो गया।
डां. रतन जैन की कविताओं में उपमा, अलंकार का सर्वाधिक प्रयोग दिखाई पड़ता है -
सुबह का सूरज सोया - सोया, सांझ सुहानी सरमायी सी,
रात वियोगिन खोयी - खोयी, दीपशिखा सी अलसाई सी।
उनकी कविताओं में छायावाद का प्रभाव स्पष्टï रूप से दिखाई पड़ता है -
नीली अलसी का राग नगया, अरहर को मिला सुहाग नया।
आंगन में घुंघरू बोल उठा,  मन मीत चने का डोल उठा॥
कवि का लेखनीय पिछले छह दशक से साधनरत है। हर स्थिति एवं घटनाक्रम पर कवि ने अपनी लेखनीय के माध्यम से अपने विचारों को मुखर होकर अभिव्यक्त किया है।
कवि बचपन की ओर लौटना चाहता है -
एक बार फिर से आ जावो प्यारा बचपन,
सुख का अनुभव कर लेगा यह बोझिल जीवन।
मां की दृष्टिï पूर्णिमा जैसे ताजमहल है,
लोरी जिसकी अमृत जैसी गंगाजल है।
मां की मुस्कानों में हंसता जग का आंगन,
एक बार फिर आ जा ....।
कवि दुनियावालों से अपनी गीतों को गाने का अव्हान कुछ इस तरह करता है ताकि उनके गीत अमर हो जायें -
मेरे गीतों को स्वर दे दो,
मैं मरूं या छला जाऊं, दुनिया से दूर चला जाऊं,
लिखना ही मेरा कर्म बना, शब्दों की रचना धर्म बना।
जगवालों इन्हें अमरता का कोई भी सरल डगर दे दो,
मेरे गीतों को स्वर दे दो ...।
ऋतुराज बसंत का वर्णन कवि ने अत्यंत ही सार्थक शब्दों में इस प्रकार किया है -
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
मदहोशी मस्ती की सीमा अनंत है॥
मौर मुकुट पहन लिया अमराई ने सरे आम,
कवियों ने गटक लिया छंदों का भरा जाम।
कोकिला बेसुध है ऋतुपति के प्यार में,
वसुधा उल्लासित है, सुरभित श्रृंगार में।
केशर की क्यारी में काश्मीर कंत है,
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
डां. रतन जैन हिन्दी के अन्यय सेवी है। उन्होंने अपनी पंक्तियों में हिन्दी को हिन्दुस्तान कहा है -
हिन्दी भव्य विशाल सरल है, हिन्दी मधुर महान है।
हिन्दी है ध्वनि प्रखर हिन्दी की, हिन्दी हिन्दुस्तान है॥
कवि गीतों को ही अपनी जिन्दगी का मीत मानता है और अगला जन्म भी भारत में ही लेना चाहता है -
गीत मेरी जिन्दगी का मीत हो गया।
वर्तमान ठंूठ सा अतीत हो गया॥
चाहता हूं मौत पर बस गीत कफन हो,
अगला जनम हो तो यही मेरा वतन हो।
दर्द मेरे द्वार का संगीत हो गया,
गीत मेरी जिन्दगी का ....।

डां. रतन जैन को फूलों से नहीं बल्कि कांटों से प्यार है -
फूलों से तो चाव नहीं है, पर कांटों से प्यार मुझे,
कांटों में ही पला - बढ़ा हूं, देते हर्ष अपार मुझे।
संघर्षों से तपकर निकला, वह कहलाता है कुन्दन,
मधुबन की क्यों लिप्सा पालें, शूल माथ का जब चंदन।
दुनिया वालों ने दिखलाया, सपने झूठ हजार मुझे,
फूलों से तो चाव नहीं है ....।
कवि कर्मयागी है और केवल अपना कर्म करना जानता है। उन्होंने फल की आशा कभी नहीं की। यही भाव उनकी पंक्तियों में इस प्रकार आया है -
हाय - हाय में ढलता है दिन,
कैसी कटती रात न पूछो, मेरे मन की बात न पूछो।
मेरे गीत कुंवारें ही हैं, मैंने बहुत संवारे भी है॥
कौन निराशा में डूबा है, कौन हुआ प्रख्यात न पूछो,
मेरे मन की बात न पूछो।
जीवन की सांध्य बेला में कवि ने अपनी भावनाओं का इजहार कुछ तरह किया है -
जीवन की ढलती संध्या में ये मेरा अंतिम पड़ाव है,
बूढ़ा बरगद, पावन पीपल, अमराई से भरा गांव है।
सांझ की बेला धारा गहरी, तूफानों के बीच नाव है,
जीवन की ढलती संध्या में ...।
माटी सोंधी मेरे गांव की, मुझको लगती बड़ी सुहानी,
जिसका कण - कण पावन उज्जवल, पुण्य परम वंदित बलिदानी।
जन्मभूमि की शैय्या में ही सो जाने की प्रबल चाव है,
जीवन की ढलती संध्या में .....।
अपनी कविताओं एवं गीतों में जीवन के दुख - सुख, हर्ष - विषाद, सौंदर्य बोध और करूणा तथा जीवन दर्शन को स्थान देने वाले एवं हर प्रसंग, पर्व त्यौहार, मौसम एवं जीवन  प्रसंग  पर अपनी लेखनी सलाकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले डां. रतन जैन छुईखदान ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ अंचल के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी रचनाएं अगर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हो जाये तो साहित्य के भंडार में एक और नगीना शामिल हो जायेगा मगर  आवश्यकता इस अनमोल नगीना को पूरी ईमानदारी के साथ पहचानने की है ....।
राजनांदगांव

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

डॉ. परदेशीराम वर्मा: लेखक भी एक्टिविस्‍ट भी

गिरीश पंकज 
डां. परदेशीराम वर्मा अभी हुए है साठ के लेकिन च्च्पाठाज्ज् तो वे बहुत पहले ही हो चुके थे। उनका लेखन च्च्पाठत्व ज्ज् को बखूबी सत्यापित करता है। वर्माजी से मेरे दो दशक पुराने संबंध है। विभिन्न अखबारों से जूड़े रहने के कारण और एक लेखक होने के नाते, उनकी रचनाओं को पढ़ने और छापने के अनेक सुअवसर मिले।फिर जब साक्षरता अभियान चरम पर था तब कुछ ऐसे मौके भी आए जब उनके साथ लेखन शिविरों या कार्यशालाओं में भाग लेने का अवसर मिला। भिलाई, कसडोल,जबलपुर,भोपाल से लेक र पंचमढ़ी तक उनका साथ हमेशा सुखद एवं प्रेरक रहा।
नवसाक्षरों के लिए वर्माजी जिन विषयों का चयन करते हैं, वे विषय दूसरों के जेहन में कौंधते ही नहीं। विशुद्घ रूप में माटी से जुड़े विषय। साधारण से दिखने वाले पात्रों को वे महानायक बनाकर पेश कर देते हैं। नवसाक्षरों के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ के जीवंत नायकों की सच्ची कहानियां लिखी। उनक ा लक्ष्य ही यही है कि यहां के सामान्य से सामान्य लोगों के असामान्य कामों से देश के लोग परिचित हो। और वे अपने अभियान में सफल भी हुए हैं। जे.एम.नेल्सन, मिनीमाता से लेकर देवदास बंजारे तक के बारे में लिखकर पूरे देश के पाठकों तक पहुंचाया। अपने मौलिक कृतियों को किनारे करके वर्माजी ने माटी के ऋण से उऋण होने के लिए अपने जीवन के कीमती पल यहां के नायकों को महानायक बनाने में होम कर दिए। यह बहुत बड़ी बात है।
डां परेशीराम वर्मा लेखक कम, एक्टिविस्ट ज्यादा हैं। सही लेखक इसी भूमिका में रहते हैं। एक लेखक वो होता है जो गोष्ठिïयों में चिल्लाकर शंात हो जाता है, दूसरा लेखक वक्त पड़ने पर मशाल लेकर निकल पड़ता है। परदेशीराम दूसरे किस्म के लेखक हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा और उसकी अस्मिता के प्रश्न पर तमाम तरह के आरोपों को झेरने के बावजूद वे भूपेश बघेल विधायक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे। जबकि उनके पैरों में तकलीफ थी। सबको पता है कि देवदास बंजारे के साथ रायपुर जाते वक्त वे बुरी तरह से दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे। बंजारे तो बंजारे निकले। अनंत यात्रा पर निकल पड़े लेकिन वर्माजी को अभी कुछ और अच्छे काम करने थे। उनका एक पैर बुरी तरह घायल हो गया था। वर्माजी की जिजीविषा ही थी कि पैर बच गया। वे महीनों तक बिस्तर में पड़े रहे। पैर के ठीक होने की प्रतीक्षा करते रहे। महीनों बाद जब ले देकर चलने फिरने के लायक हुए तो छत्तीसगढ़ी का झंडा लेकर चल पड़े। इसलिए मैं उन्हें एक्टिविस्ट भी कहता हूं। महीनों तक बिस्तर में पड़े - पड़े वर्मा जी ने इतना लेखन किया, इतना लेखन किया कि लोग दंग रह गये। लेखन के प्रति ऐसी निष्ठïा दुर्लभ है। इतना धुंआधार लिखने वाले वे इकलौता हैं।
परदेशीराम जी बड़े भाई की तरह हैं। उसी तरह वे फटकारते भी हैं और दुलारते भी हैं। मेरे पचासवे वर्ष पर जब सुधीर वर्मा ने च्च् साहित्य वैभवज्ज् के विशेषांक की योजना बनाई तो वर्मा जी ने मुझे समझाया था कि च्च्अंक भले ही निकल जाए इस पर केन्द्रित समारोह भव्य नहीं होना चाहिए। बिलकुल साधारण।ज्ज् मैं उनकी बात से सहमत था। इसलिए मन में कोई इच्छा ही नहीं हुई कि उस विशेषांक के बहाने मुझ पर कोई कार्यक्रम हो। सचमुच, आपके मुंह पर आपकी तारीफ की जा रही हो, यह अजीब किस्म का मामला लगता है। परदेशी जी ने भी कहा था कि मुझ पर भी कोई ग्रन्थ निकले लेकिन मैं अपनी स्तुती वाला कोई कार्यक्रम नहीं होने दूंगा। मैं जानता हूं, ऐसा ही होगा।
परदेशीराम जी बहुत लिखते हैं। मुझसे कई गुना जादा। लेकिन जब कभी छपा देखते हैं तो फोन करके शाबाशी देते हैं कि अच्छा लिखा, बधाई। यह उनका बड़प्पन है। वर्माजी की ऊर्जा देखकर मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है कि इसी तरह सक्रिय रहना है। लेकिन प्रकृति सारे सपने तोड़ देती है। सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती है। अचानक एक अगस्त को पेट में जानलेवा दर्द हुआ। आपरेशन की नौबत आ गई। गांल ब्लेडर निकालना था। डांक्टर ने पूरी तरह आराम करने कहा है। लेकिन जब पता चला कि वर्माजी के साठ साल पूर्ण होने पर एक ग्रंथ निकल रहा है तो मन नहीं माना। लगा, मुझे भी कुछ न कुछ लिखना ही चाहिए। बहुत कुछ लिखना चाहता हूं। बाद में लिखूंगा भी, मगर फिलहाल इतना ही। पीठ में जकड़न शुरू हो गई है। पेट में खिंचाव सा महसूस कर रहा हूं। लेकिन वर्माजी पर लिखने का हौसला नहीं छोड़ा, क्योंकि इसकी प्रेरणा भी वर्मा जी ही हैं। वर्माजी निरंतर सक्रिय रहें। अपनी कहानियों एवं साहित्येतर लेखन के सहारे वे अपना नाम रोशन करते रहें,छत्तीसगढ़ की यश पताका फहराते रहे .....।

सोमवार, 15 जुलाई 2013

भारतीय आर्य संस्कृति की इमारत पर खड़े



राष्ट्रीय कवि सांसद डॉ.सत्यनारायण जटिया ' सत्यज '


जगन्‍नाथ ' विश्‍व '
राष्‍ट्रीय  कवि डां. सत्‍यनारायण जाटिया

- जगन्नाथ ' विश्व '  -
भारत में विशेषकर मालवा की महिमामयी उर्वरा भूमि एक ओर जहाँ अपने शस्य श्यामला सघन रूप पर गर्वित है वहीं उसे इस बात पर भी गौरव प्राप्त है कि अनेक श्रेष्ठ विलक्षण असाधारण वैज्ञानिक, विजेता वीर, साहित्य उपासक, कवि, लेखक, साहित्यकार, संत ज्ञानी, उत्सर्गशील व्यक्ति इसकी गोद में जन्मे पले-बढ़े और अपनी कीर्ति पताका समय की शिलाओं पर गढ़ते चले गये। होनहार बिरबान के होत चिकने पात वाली कहावत मालवाँचल के कविवर श्री सत्यनारायण जटिया सत्यज में चरितार्थ होती है। महाकाल की नगरी उज्जैन(अवंतिका) में रहते हुए कालीदास की परम्परा का निर्वाह कर रहें हैं। आपका व्यक्तित्व बहुआयामी है।
कवि, लेखक, वक्ता, कर्मयोगी, राजनेता, विधायक, सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री इत्यादि आप क्या नहीं हैं। वाह भाई वाह। इतनी विविधाओं के बीच भी अलमस्ती के रंग में सदैव रंगे रहते हैं। जटियाजी को कविता संसार मिला,डॉ.शिवमंगलसिंह सुमन से और उत्साहवर्धन करने में कवि हृदय चिंतक देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी तथा भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री शिवराज पाटिल प्रमुख प्रणेता हैं।
जटियाजी ने कहा है-सच तो सर्वदा  सच होता है। जैसा देखा, सुना, समझा  वैसा ही कहा जाता है। सतयुग  का सच हरश्चिन्द्र त्रेता का सच रामचंद्र। द्वापर का सच कृष्णचंद और कलयुग का सच आप और हम हैं। जटियाजी ने जमीन पर बैठकर पढ़ा, लिखा, स्पर्श, ऊँच, नीच की जितनी समझ बनी ईश्वर कृपा से ज्यों की त्यों आपके समक्ष प्रस्तुत है। मनुष्य की चेतना जहाँ तक पहुँचे और जितना समझे उतना अभिव्यक्त होता जाता है। यहीं अभिव्यक्ति हमारे निष्ठावान कवि जटियाजी की इन पंक्तियों में परिलक्षित है।
मृत्यु के द्वार पर पहुँचे/ जब हम कभी/ अथवा स्वंय मृत्यु भी/ द्वारे आ जाये अभी/ भय न मन में हो/ किंचित कि मर जायेंगे/ मृत्यु तो मुक्ति पर्व/ निर्भय अपनाएंगे/
आपके  संघर्षमयी जीवन यात्रा की बड़ी ईमानदार कहानी है। अपने नाम को सार्थक करते हुए जटियाजी का कलम के जरिये शोषण और विसंगति के खिलाफ संघर्ष निरंतर जारी है।
स्वतंत्रता की चाह लिए/ संग्राम सतत जो करता है/धधका करता अंगारों सा/ कभी विराम न करता।
कवि जटियाजी पूरी ईमानदारी  और साहस के साथ लंबी दौड़  लगाते-लगाते अन्याय, शोषण के विरूद्ध संघर्ष करते-करते राजनीति में आये। गाँव-गाँव गरीब किसान और कस्बा, शहर के श्रमिक क्षेत्र में काम करते-करते, संघ के गीत गाते-गाते कवि सम्मेलनों में सुनाते हुए अलख जगाना इनका स्वभाव आज भी बना हुआ है।
एक देश एक रक्त फिर हम हैं विभक्त/ एक शक्तिशाली दूसरा  है क्यों अशक्त?
शोषण के विरूद्ध अब युद्ध चाहिए/ देश को उत्कर्ष का संघर्ष चाहिए/
जटियाजी का संग्राम गरीबी, बेकारी,बेरोजगारी, असमानता, आतंकवाद और सांप्रदायिकता के विरूद्ध कम नहीं है। प्रमाण के लिए कवि की चुनौती देखियें-
किसमें दम हैं जो बाँध सके/ चिंतन की मुक्त उड़ानों को/ किसमें साहस जो कुचल सके/ आजादी के बलिदानों को/ आतंक दमन की दहशत से/ आदर्श नहीं टिक सकते हैं/ दमकते कुबेरी कोषों पर/ सिद्धान्त नहीं बिक सकते हैं/
सच पूछों तो आज सबसे बड़ा संकट हमारे नैतिक मूल्यों का  पतन और सिद्धान्त विहीनता का है। सच यह है कि सच सुनाये कैसे? सच को सच हम बताये कैसे?
कुएँ में बदबू पानी को रोग/ काहे रस्सी बाल्टी बदले लोग? सूरज को कोहरे का लगा पहरा है/ लोकतंत्र को स्वार्थ के अंधेरों ने घेरा है/
जटियाजी ने अपनी कविताओं में इंसान को इंसानियत से विमुख होने पर कहा है-
एकता के भाव का आभाव हो गया/ मेरा देश अपना कहाँ खो गया?इसी प्रकार जटियाजी के काव्य में अवसरवादी स्वार्थपरक तत्वों पर भी रंग में व्यंग्य देखा जा सकता है। देखते ही देखते खजूर बन गये/ चार ही दिनों में हुजूर बन गये/
कवि जटियाजी सत्य के प्रति निष्ठा और कर्मठता, उत्सर्गशीलता इनके सत्यज उपनाम को सार्थक करती है। कवि की इन मार्मिक पंक्तियों में किसान का सच्चा जीवन चरितार्थ है-
किसान के अहसान को/ खेत और खलिहान को/ अथक श्रम मुस्कान को/ भुला दिया किसान को/ बीज ठीक मिला नहीं/ खाद महंगा कर दिया/ दिया उसने देश को/ हमने उसे क्या दिया?
जटियाजी ने एक बार संसद में अपने काव्यात्मक भाषण में भारत के  गाँव और ग्रामीण जीवन का जो  करूण चित्र खींचा वह काबिले-तारीफ है-
एक ओर गाँव है/ जहाँ अभाव ही अभाव है/ पानी, बिजली, शिक्षा का/ स्वास्थ्य और चिकित्सा का/ ध्यान देगा अरे कोई/ जहाँ अभाव ही अभाव है/
संसद भवन में इस  सच्चाई की अभिव्यक्ति से यह आभास होता है कि कवि पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यज ने अनुभूतियों का साक्षात्कार करते हुए सर्जना के सोपानों को गढ़ने का उपक्रम किया है।आप वर्तमान राजनैतिक जीवन के ऊहापोह में दार्शनिक पक्ष को वाणी देने में सतर्क रहते हैं। वाकई गीत और दीप दोनों प्रकाश के प्रतीक हैं-
गाएँ स्नेह के गीत/ गीतों से जलें दीप/ दीप से दीप जलाएँ/ अंतर से अंतर का अंतर/ नहीं कुछ अंतर रह जाए
कवि ने अंधकार से लड़ने के लिए संकल्प का दीप जलाने और दीप-बोध का बड़ा यथार्थ वर्णन किया है-
माँ, अभी दूर है, दूर सवेरा/ इस पर घोर तिमिर का घेरा/ इसीलिए माँ, जगता हूँ/ तेरी रक्षा हित प्रतिपल जलता हूँ/
कवि मानवतावादी है। मानव के प्रति गहरी निष्ठा आस्था है। किसान, मजदूर, सर्वहारा-वर्ग उसकी सहानुभूति के पात्र हैं, इसलिए उन्हें यह लिखने लिए भी बाध्य होना पड़ा-
ऊँच-नीच जाति-पांति भेदभाव है/ वर्ग-भेद वर्ण-भेद का दुराव है/
जटियाजी की वाणी में बड़ा असर है। भारतीय आर्य संस्कृति उनके विकास की इमारत है।
ये राष्ट्रीय भावना के  पोषक, हिमायती माने जाते हैं। कवि का यह देश-गीत हम सबके  लिए गुनगुनाने लायक है-
कुम-कुम छिड़के  जहाँ पर सवेरा/ महावर रचाये संध्या नवेली/ हवाओं में महके चंदन की खुशबू/ यह देश मेरा प्रियदेश मेरा/ गाँधी, गौतम, महावीर की धरती/ सत्य अहिंसा का उपदेश करती/ प्राणों से प्यारा वतन यह हमारा/ अर्पित है यह तन-मन जीवन सारा/ यह देश मेरा, प्रिय देश मेरा/
देश का कल्याण तभी हो सकता है जब देश की भाषा हिन्दी हो। हिन्दी हमारी संस्कृति आस्था एकता की पहचान है। जन-जन की कल्याणी वाणी हिन्दी को देश के आलोक रूप में स्थापित करने का कवि द्वारा काव्य कौशल अद्भुत है-  इस देश की अभिव्यक्ति शक्ति/ जन-जन की वाणी कल्याणी हिन्दी है/ आओ। हिन्दी से हिन्दस्तान को/ समझे और समझाएं/ देश की
कवि सत्यज की कविताओं के अंतरंग में झांकने से यह तथ्य सामने आता है कि कवि की काव्य यात्रा सर्वथा निजी अनुभव की यात्रा है। अनुभूति की प्रमाणिकता एवं ईमानदारी की बात प्रत्येक पंक्ति में झलकती है। सारा काव्य सात्विक चेतनाशील महिमा मण्डित हैं। जटियाजी यदि राजनीति में नहीं होते तो बहुत बड़े कवि साहित्यकार होते। अपने जीवन में कुछ भी छुपाने की कोशिश नहीं की आप जो हैं, जैसे हैं, उसी रूप में स्वंय को प्रकट किया है।
ज्ञान को विज्ञान से, साहित्य को संस्कार से जोड़ने की क्षमता  रखने वाले इस विराट काव्य पुरूष पूर्व केन्द्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया सत्यज के संग पूर्ण तन्मयता से दीप से दीप जलाते रहें। गहराते  संकट में मुस्कुराते रहे ।  नई चेतना का अखल जगाते रहे। देश प्रेम का शंखनाद गुंजाते रहें। इसी सत्यज संदेश को आत्मसात करते हुए आपके जन्म दिवस पर हार्दिक मंगलकामनाएँ, बधाई। जय हिन्द।  जय भारत।।
एकता को सशक्त बनाएँ/ माँ भरती का सुयश गाएँ/ जय हिन्दी। जय जय हिन्दुस्तान/
  • मनोबल, 25, एम.आई.जी.,हनुमान नगर, नागदा जं. ( म.प्र.)
  • Ph no. :-   (07366)241336, 09425986386
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बुधवार, 26 जून 2013

छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान बन चुके हैं कौंसर

   



  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह

पिछले लगभग तीन दशकों से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्दू और हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अपनी गजलों और नज्मों के कारण चर्चा में आये शायर अब्दुस्सलाम 'कौसर' ने अपने गुणवत्तामूलक लेखन से छत्तीसगढ़ के उर्दू अदब को राष्ट्रीय स्तर की ख्याति दिलाई है। छत्तीसगढ़ में उर्दू अदब के प्रति पर्याप्त माहौल नहीं होने के बावजूद 'कौसर की गजलों और नज्मों के लगातार प्रकाशित होने के कारण ही उर्दू शायरी के नक्शे पर छत्तीसगढ़ का नाम तेजी से उभर कर सामने आया है। छत्तीसगढ़ में उर्दू शायरी की पहचान बन चुके हैं कौंसर। यही कारण है कि गजलों और नजमों के सृजनात्मक लेखन में उत्कृष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त करने एवं उर्दू साहित्य में गुणवत्तामूलक लेखन करते हुए छत्तीसगढ़ में उर्दू भाषा का अनुकरणीय माहौल तैयार करने के लगन को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने जनाब अब्दुस्सलाम 'कौसर' को उर्दू भाषा की सेवा के लिए हाजी हसनअली सम्मान से विभूषित किया है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर 01नवम्बर 2010 को 'कौसर' को राजधानी रायपुर में हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली एवं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 'कौसर' को दो लाख रूपये नगद, प्रशस्ति पत्र, साल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया।
    अपने समकालीन शायरों में अलग पहचान रखने वाले जनाब अब्दुस्सलाम कौसर का जन्म 09 जनवरी 1948 को रायपुर जिले के ग्राम खरोरा में हुआ। उनके पिता का नाम श्री सिद्दीक अहमद था। 'कौसर' के जन्म के बाद उनका परिवार संस्कारधानी राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) में आकर बस गया। 'कौसर' ने बी.एस.सी. एवं बी.टी.सी. तथा आदि वे कामिल तक शिक्षा प्राप्त की है। सिर्फ पांचवी तक उर्दू पढ़ने के पश्चात 'कौसर'  ने उर्दू साहित्य का गहन अध्ययन किया। उर्दू शेरो -सुखन और अदब का 'कौसर' ने इतना अध्ययन किया कि उन्हें हजारों शेर जुबानी याद है।
    दोस्तों की शादी में सेहरा लिखते-लिखते, मौलाना लोगों की तकरीर में पैगम्बर इस्लाम की शान में नाट लिखकर पढ़ते-पढ़ते, मटका पार्टी वालों को फिल्मी धुन में गीत लिख कर देते-देते 'कौसर' उर्दू के अजीम शायर बन गये। उन्हें सपने में भी ये गुमान नहीं था कि उनका शेरो - सुखन का जुनून उन्हें ऐसे मान -सम्मान से विभूषित करेगा जो उनके प्रशंसकों और उनकी कर्मभूमि राजनांदगांव के लिए गौरव की बात होगी। मौजूदा समय में कौसर एक शायर की हैसियत से उस मुकाम पर हैं जहां तक पहुंचना लोगों का सपना होता है। दो करोड़ दस लाख की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के किसी भी शहर में जब शेरो-सुखन की चर्चा होती है हो 'कौसरÓ का नाम अदब, एहतेयाम से लिया जाता है।
    शेरो, सुखन के विद्वान समालोचक हनीफ नज्मी (हमीरपुर) ने 'कौसर' को 'छत्तीगढ़ में उर्दू गजल की आबरू' कहा है। छत्तीसगढ़ के उस्ताद शायर एवं वरिष्ठ पत्रकार काविश हैदरी ने स्वीकार किया है कि 'कौसर' एकमात्र ऐसे शायर हैं जो प्रकाशन के मामले में छत्तीसगढ़ के शायरों में सबसे आगे हैं। उनकी रचनाएँ अब तक 130 पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
    'कौसर' को गजलों के अलावा नज्म लिखने में भी महारत हासिल है। उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) के क्षेत्र में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'शमा'  विश्वस्तर पर उर्दू साहित्य की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मान ली गई थी। 'शमा' का क्रेज ऐसा था कि इसमें छपने की आस में कई लेखकों और शायरों की उम्र गुजर जाती थी। ऐसी उत्कृष्ठ गौरवशाली पत्रिका में साठ-साठ, सत्तर-सत्तर मिसरों (पक्तियों) पर लिखी गयी नौ-नौ, दस-दस बंद की नज्में क्रमश: लाटरी का तूफान, मेरे हिन्दोस्तां, हवाले का शिकंजा, नया साल, कौन रहबर है तथा कंप्यूटर प्रकाशित होने से 'कौसर' राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शायरों की पंक्ति में आ गये।
    पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत पर 'कौसर' की नज्म 'गद्दार का मजहब' शायरों के लिए चर्चा का विषय बन गयी थी। राजनीति के दांव पेंच को बड़ी साफगोई के साथ पेश करने वाली इस नज्म की दो बंद देखें  -
और कुछ लोग वफादारी का परचम लेकर
मौत का जश्न सलीके से मनाने निकले
अपनी औकात जमाने को दिखाने के लिए
आग नफरत की दुकानों में लगाने निकले

इंदिरा गांधी हो या लूथर या कोई कैनेडी
पैदा होते हैं हर एक दौर पें और मरते हैं
कत्ल करके इन्हें 'कौसर' नए अंदाज के साथ
हम सियासत का नया दौर शुरू करते हैं
बावरी मजिस्द के विध्वंस पर उनका आक्रोश इस प्रकार फूट पड़ा -
ये मसला नहीं है कि गद्दार कौन है
पहले ये तय करो कि वफादार कौन है
    शुरू से ही कुछ अच्छा कहने की ललक में 'कौसर' ने शेरो-सुखन , उर्दू जबानो - अदब का डूब कर गहन अध्ययन किया है। संकीर्ण मानसिकता से उपर उठकर उन्होंने इस्लाम ही नहीं हिन्दू और ईसाई धर्म से संबंधित साहित्य, वेद पुराण, गीता,रामचरित मानस, पौराणिक कथाओं और मान्यताओं का विषद अध्ययन किया है।
    लगभग चार दशक तक शिक्षकीय पद पर कार्य करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी। इस दौरान गांव के परम्परागत त्योहारों, सामाजिक मान्यताओं, लोकगीतों, लोकाचारों से उन्होंने अनुभूतिगम्य अनुभव प्राप्त किया है। व्यक्तिगत अनुभव की सूक्ष्म गहराई और गहन संवेदना कौसर की शायरी में स्पष्ट दिखती है। सामान्य शब्द विन्यास के साथ दिल को छू लेने वाले शेर कहने से आम आदमी में भावनाओं की संप्रेषणीयता की वजह से आपका लोकप्रिय हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।
    मेराज फैजावादी, मंजर भोपाली, शायर जमाली, गौहर कानपुरी जैसे शायरों के साथ कामठी (महाराष्ट्र) के आल इंडिया मुशायरे में जब कौसर ने यह शेर पेश किया -   
इधर रौनक मजारों पर उधर महलों में सन्नाटा
शहंशाहों की हालत पर फकीरी मुस्कराती है।
तो इन्हें इस शेर पर बेहद दाद मिली। मुशायरें के बाद एक छात्रा को आटोग्राफ  देते हुए जब कौसर ने उसकी डायरी पर ये शेर लिखा तो छात्रा ने सवाल करते हुए कहा - शायर साहब महलों में सन्नाटा क्यों रहता है? कभी इस पर गौर करें। 'कौसर' को यह बात याद रही और काफी दिनों बाद उन्होंने दिल को छू लेने वाले अंदाज में ये कतआ कहा -
दासियों के कहकहे और इशरतों की महफिलें
इन नजारों में ही खोकर जिन्दगी काटा हूँ मैं
चौख कितनी दब गयी और बद्दुआ किसकी लगी
याद सब कुद है मुझे महलों का सन्नाटा हूँ मैं
उर्दू शायरी की शोहरत रंगेतगज्जुल यानि श्रृंगार रस से सराबोर भावनाओं की अभिव्यक्तियों की वजह से है। मुहब्बत, नफरत, तिरस्कार, हुस्न और इश्क की नोंक - झोंक, मिलन - विरह की संवेदना, महबूब की मासूमियत आदि आदि को शायरों ने जिस खूबी से अपनी गजलों और शेरों में पिरोया है उनकी मिसाल अन्य भाषाओं की कविताओं में मिलना मुश्किल है। 'कौसर' की गजलों में भी नजाकत से भरपूर ऐसे कई शेर मिलते हैं चंद मिसालें पेश हैं :-
कभी सपने में भी सोचा न था ये हादसा होगा।
मैं तुमको भूल जाऊंगा ये मेरा फैसला होगा।

नजर मिलते ही वो शरमा के जब भी सर झुकाती है
मुझे उस वक्त नाजुक लाजवंती याद आती है।

बचा बचा के नजर आँख भर के देखते हैं
वो आईना जो कभी बन संवर के देखते हैं

    नजर बचा के गुजरना हमें कबूल मगर
    निगाहे नाज तेरी बेरूखी पसंद नहीं
दोस्ती, मिलनसारिता, बफादारी और बेवफाई पर भी उनकी कलम चली है। दोस्ती पर उनका कतआ और कुछ शेर देखें -   
मुस्कराती आरजूओं का जहां समझा था मैं
जिन्दगी का खूबसूरत कारवां समझा था मैं
दोस्ती निकली फकत कांटों की जहरीली चुभन
दोस्ती को गुलसितां गुलसिंता समझा था मैं
       
न दोस्ती न मुरोव्वत न प्यार चेहरों पर
दिखाई देती है नकली बहार चेहरों पर
वफा की एक भी सूरत नजर नहीं आई
निगाह उठती रही बार- बार चेहरों पर
सियासत, सामाजिक व्यवस्था, शिष्टाचार, आध्यात्म पर 'कौसर' की गहरी पकड़ हैं। उनकी गजलों में इस अंदाज के शेर बड़े खूबसूरत अंदाज में पेश हुए हैं। चंद मिसालें देखें :-    
चमन पे हक है तुम्हारा, मगर ये ख्याल रहे
मैं फूल हूँ मुझे आवारगी पसंद नहीं

आस्तिनों में अगर सांप न पाले होते
अपनी किस्मत में उजाले ही उजाले होते
हम सियासत को तिजारत नहीं समझे वरना
अपने हाथों में भी सोने के निवाले होते।
आध्यात्म पर 'कौसर' ने कई शेर और बेहतरीन शेर कहे हैं -

सुना है उनकी गली है निजात का रास्ता
सो हम भी उनकी गली से गुजर के देखते हंै

चमन वालों जरा सोचों इबादत के लिए किसकी
हजारों साल से शबनम गुलों का मुंह धुलाती है।
पतंगे, तितलियां, भंवरे ये सब किस धुन में रहते हैं
ये किसकी याद में कोयल विरह के गीत गाती है
मानसिक क्लेश, दर्द की गहन अनुभूति को कौसर जे अपनी शायरी का जेवर बनाया है। इस अंदाज के शेरों की संप्रेषणीयता में उनकी लेखनी का कमाल झलकता है।
न जाने कितने जख्मों, के दरीचे खोल देता है
टपकता है जो आंखों से लहू सब बोल देता है
जिन्हें रहना था महलों पे सरापा नाज की सूरत
मुकद्दर चंद सिक्कों में उन्हें भी तोल देता है
सामाजिक विषमताओं और विद्रुपताओं पर भी उनके शेर दिल को छू जाते हैं।
हमारी मुफालिसी पर तंज करते हो थे मत भूलों
खजानों की उठाकर फेंक दी है चाबियां हमने
ये दुनिया है यहां आसानियां यूं ही नहीं मिलती
बहुत दुश्वारियों से पाई है आसानियां हमने        
हिन्दी साहित्य में संस्कारधानी राजनांदगांव का नाम राष्ट्रीय ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। मानस मर्मज्ञ डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र, साहित्य वाचस्पति डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी रचनाधर्मिता से राजनांदगांव का नाम रोशन किया है। प्रकारांतर में क्रांतिकारी कवि कुंजबिहारी चौबे और डॉ.नंदूलाल चोटिया ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। हिन्दी साहित्य के साथ ही अब उर्दू साहित्य में भी निरंतर सृजनात्मक लेखन कर तथा हाजी हसन अली सम्मान से विभूषित होकर अब्दुस्सलाम कौसर ने राजनांदगांव ही नहीं समूचे छत्तीसगढ़ को गौरवान्वित किया है।
बाल भारती स्‍कूल के पीछे, राजनांदगांव (छग)

बुधवार, 22 मई 2013

अब भी नाचने की चाहत है गोपाल में

शरीरिक दुर्बलता साथ नहीं देती
  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह
गोपाल दास साहू
कला के प्रति रूझान ने राजनांदगांव जिला विकास खंड खैरागढ़ ग्राम भंडारपुर करेला निवासी गोपालदास साहू को नाचा पार्टी से जुड़ने विवश कर दिया। जहां बर - बिहाव में छत्तीसगढ़ के आसपास क्षेत्र ही नहीं अपितु सीमावर्ती राज्य महाराष्‍ट्र में भी उनकी मोहरी की धुन से वातावरण माधुर्य हो उठता। गाँव में जब बर - बिहाव होता तो वह बर - बिहाव गोपाल साहू की मोहरी के बगैर अधूरा सा महसूस होता। वहीं नाचा में उनकी गम्मत को देखने की चाहत में दर्शक रात भर डंटे रहते थे। जब वे अपने सहयोगी कलाकार दीनदयाल विश्वकर्मा के साथ पैर थिरकाते थे तो दोनों की जोड़ी देखते बनती थी। नाचा स्थल धूल - धुसरित हो उठता मगर न उनके पैर रूकते और न ही उनका मन ही भरता था। गम्मत में दर्शक उनकी प्रस्तुत जीवंत तस्वीर को देखते। जहां हास्य के गम्मत पर हंस - हंस कर लोग लोटपोट हो उठते वहीं समस्या प्रधान गम्मत पर लोग प्रस्तुत गम्मत की कहानी को अपनी कहानी महसूस करते थे। दुर्भाग्य ही कहा जाए कि एक समय अपने कला का जौहर दिखा चुके गोपालदास साहू वर्तमान में जहां शारीरिक दुर्बलता के शिकार हो गए हैं वहीं गरीबी उन्हें दाना - दाना के लिए मोहताज कर रखी है। उम्र के साठ से अधिक पड़ाव पार करने के बावजूद वह आज भी एक बार फिर खड़े साज में नाचने की इच्छा रखते हैं।
पिता स्वर्गीय भगवानदीन साहू साहू व माताश्रीमती पुनियाबाई साहू की पुत्र गोपालदास साहू को सही मायने में कहा जाए तो पूरा जीवन कला के लिए जिया हैं। जहां वह खड़े साज में जोकर की भूमिका अदा करते थे वहीं स्वयं नाटक तैयार करते और गीत भी स्वयं लिखा करते थे। आज भी वे गीत लिखते हैं जिसमें लोक साहित्य का स्पष्ट दर्शन होता है। नाचा परंपरा को जीवंत बनाये रखने गोपाल दास साहू ने महज दस बारह वर्ष की उम्र में नाचा पार्टी से जुड़ गया और उसने रिंगनी की नाच पार्टी में शामिल होकर नाचना शुरू किया बाद में उसने भंडारपुर नाच पार्टी का गठन किया। इस नाच पार्टी में जोकर की भूमिका में उनके सहयोग जोकर दीनदयाल विश्वकर्मा, ठाकुरराम ,  रूपसिंग यादव हुआ करते थे वहीं पारी की भूमिका पीलू ठाकुर, कवल निषाद निभाया करते थे। गोपालदास साहू और दीनदयाल विश्वकर्मा की जोंड़ी खूब जमती। पॉव में पैजना बांधकर झूम झूमकर नाचते। अपनी भाव - भंगिमा से सबको हंसाते। अपनी बातों से हंसी की फूलझड़ी छोड़ते। वादक पक्ष में गैंदसिंग, रंजीत, मेहरू और शेरसिंह रहते थे। नाचा जब शुरू होती और वादक पक्ष अपने में मस्त हो जाते थे तो रंजीत के ढोलक पर ऊंगलियां इस कदर चलती की ढोलक फुट जाया करता था। वहीं स्वर्गीय शेरसिंह की ऊंगलियाँ हारमोनियम की रीड पर चल कर माधुर्य उपस्थित करती थी। मेहरू निषाद तबला वादन करते और तिलक साहू कभी मंजीरा तो कभी ढोलक पीटा करते थे। नाचा शुरू होने से अंत तक जो समा बंधता की दर्शक सुबह तक उठने का नाम नहीं लेते थे। नाच पार्टी मधुर संगीत, आकर्षक नृत्य व हास्य से परिपूण्र गम्मत के कारण इतनी प्रसिद्ध हुई कि  इनकी पुछ परख राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़, खैरागढ़, चौकी, मोहला, कवर्धा एवं दुर्ग जिले तक भी होने लगी। बाद में महाराष्टï और मध्यप्रदेश के कई शहरों और गांवों में इनकी नाचा पार्टी को बराबर प्रोत्साहन मिला।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो सभी पर्वों का अपना अलग महत्व है मगर प्रमुख पर्व दीवाली और होली को माना जाता है। गोपालदास साहू द्वारा प्रस्तुत बारहमासी गीत की पंक्तियाँ :-
देवारी तंय आवत होबे, दीया मन ल संग म लावत होबे।
हरेली अइस धान बर हरियर लुगरा लइस, 
गहिरा मन बर लीम डारा दसमुर डोंटों कांदा लाइस
हंस - हंस के घर कुरिया म लीम डारा,
 दसमुर खोंचिस, नांगर बसुला टंगिया धोइन,
लइका मन बर गेड़ी फांदिन,
गेड़ी चढ़ा के लइका मन ल खेलावत होबे । देवारी तंय ...........
थोरके दिन म अइस पोरा बिचारा मुरहा,
 ठेठरी खुरमी भजिया लाइस अंगाकर गुरहा
तीज के दिन पारबती अइस, पूजा करिन तिजहारिन,
चउत के दिन गनपति अइस नाचिन गाहन बनिहारिन ।
नंदिया बइला चढ़के रेंगावत होबे,देवारी तंय ....................
कुंवार अइस पुरखा मन ल संग म लइस,
पुरखा बनके कउवा पनदरा दिन बरा भजिया खइस
नवमी अइस धान बर पियर लुगरा लइस,
दसेरा म रावन मरिस, धान के छठ्ठïी निपटइस
तलवार धर दसेरा तंय आवत होबे।  देवारी तंय ...............
गाय बर सोहई धर के अइस देवारी
कोहड़ा कोचइ लइस दीया बारे नरनारी
गहिरा सोहई बांधिन साजू अउ फूलेता साजिन,
दफड़ा - दमउ बजाइन झुमर के नाचिन
आज गोपाल तंय गोवर्धन खुंदावत होबे, देवारी तंय ...................
जहां गोपालदास साहू की  कला अदायगी अदभूत रही। वहीं ठेठ पारम्परिक ढंग से नाचा की प्रस्तुति इनकी अपनी विशेषता है । किसान के प्रति इन्होंने अपनी भावना को कलबद्ध कुछ इस तरह किये हैं -
मोर धरती के एके झन दिखते गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
नांगर बइला लथपथ होथे,
बइला भइया सदबद होथे, गोबर खातू राख गिल्ला,
किसान कमाथे माई पिल्ला।
भरे बरसात म बासी खाके, आगी के तपइया॥
फागुन तिहार पर उनकी रचना शैली देखिए :-
देखो देखो जी महिमा गुलाल के।
मजा ले लो संगी फागुन तिहार के॥
गोपालदास साहू ने जहां नाचा के माध्यम से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों और विसंगतियों पर चोट करते रहे वहीं अपने गीत के माध्यम से नशा, दहेज, अंधविश्वास, छुआछूत, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों को केन्द्र में रखकर रचनाएं की।
1 . रात दिन खुल रहिथे बैरी मधुशाला,
तोर मंदिर राम लगे रहिथे तारा
मस्ती म झुमत रहिथे सब मतवाला॥
2 . खेती ल कमाबे कइसे,
इही बुध मं, गली - गली किंजरत रहिथस
चोंगी माखूर पीयत रहिथस,
कमइया लइका मन ल बिड़ोरत रहिथस
जिनगी चलाबे कइसे इही बुध म ...।
3 . काकर करा हम जान, कोन ला हम गोहरान,
ऐ डहर ओ डहर सबो डहर भंइसा अंधियार
जान डरिन सुन डरिन , कहूं कहे नई दीया ल बार॥
जीवन भर दर्जी का काम कर कला को जीवित रखने वाले गोपालदास साहू आज उन दिनों को याद कर रोमांचित हो उठता है और एक बार फिर  नाचने व मोहरी वादन का मन बना लेते हैं मगर शारीरिक शिथिलता उन्हें ऐसा कुछ करने का इज्जात नहीं देती। अभावग्रस्त होने के कारण आज वे अपने स्वस्थ का सही उपचार कराने का भी साहस नहीं कर पाते। जीवन भर जिन्होंने अपने कला के माध्यम से न सिर्फ अपने गांव अपितु पूरे प्रदेश का नाम रोशन किये आज खुद अंधकार में जीवन व्यतित करने बाध्य है ....।
सबेरा संकेत बल्‍देवबाग, राजनांदगांव (छग)

रविवार, 12 मई 2013

लोक कला साधक : सुखीराम निषाद

  • डां. पीसीलाल यादव
 छत्तीसगढ़ लोक कलाओं और लोक कलाकारों की धरती है। यहाँ के लोक कलाकारों ने अपनी लोक कला के माध्यम से विश्व के कोने - कोने में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव को प्रतिष्ठित किया है। छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं में लोक नाटय नाचा का स्थान सर्वोपरि है। नाचा की परम्परा को समृद्ध करने व उसे जीवंत बनाये रखने में स्व. दुलारसिंह मंदराजी दाऊ, मदन निषाद, ठाकुरराम, भुलवाराम, झुमुकदास, नियामिक दास, गोविन्द निर्मलकर, मालाबाई, फिदाबाई जैसे राष्ट्ररीय स्तर के लोक कलाकारों का अविस्मरणीय योगदान है। इसी तरह आँचलिक स्तर पर ख्याति प्राप्त अनेक लोक कलाकारों ने भी नाचा के संरक्षण और संवर्धन में अपनी सक्रिय भूमिका निर्वहन किया है। ऐसे ही लोक कलाकारों में एक हैं लोक कला साधक, लोक कवि - सुखीराम निषाद।
सुखीराम निषाद का जन्म 17 जनवरी 1938 को इतिहास प्रसिद्ध सांस्कृतिक व बलिदानी नगरी छुईखदान के एक श्रमिक परिवार में हुआ। इनकी माता का नाम दुखदई और पिता का नाम गोकुलराम निषाद था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा छुईखदान में ही हुई। इन्होंने सातवीं तक शिक्षा प्राप्त की। तब सातवीं की पढ़ाई बहुत मायने रखती थी। इनके कई साथी सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर शासकीय नौकरी में आ गये। किन्तु सुखीराम जी का झुकाव बचपन से नाच - गाने की ओर था, इसलिए नौकरी की ओर ध्यान नहीं दिया। इस बात का मलाल इन्हें आज भी है। छुईखदान रियासत काल से ही संगीतकारों व साहित्यकारों की नगरी रही है। यहाँ शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत को बराबर का सम्मान मिलता रहा है। तब बालक सुखीराम निषाद पर इस संगीतिक व साहित्यिक  परिवेश का प्रभाव पड़ा। वे फाग गीतों, जंवारा गीतों की टोली व भजन मंडली में जाते, गाते - बजाते। इसी अभिरूचि ने इन्हें आज एक प्रतिष्ठिïत लोक कलाकार के रूप में पहचान दी है। सन 1953 में छुईखदान में ऐतिहासिक घटना घटी। जिसमें अनेक अधिकारों की लड़ाई लड़ते छुईखदान के सपूत पुलिस गोली से शहीद हुए। इस घटना ने किशोर सुखीराम के ह्रदय को आंदोलित और उद्वेलित किया। तब इनकी उम्र 15 की रही होगी। नाच - गान की ओर रूझान तो था ही, तब कलम भी थाम ली और उस गोलीकांड की कहानी को अपने टूटे - फूटे शब्दों में इस तरह व्यक्त किया -
सुनो गोली कांड के कहानी, सुनो गोल कांड के कहानी
छुईखदान तहसील था छोटा, जहां चपरासी फंदीराम छोटा
पहले होता था यहां दीवानी, सुनो गोली कांड की कहानी।
इस तरह नाचने = गाने के साथ ही सुखीराम निषाद ने गीत - कविता लिखना भी प्रारंभ किया। कुछ समय पश्चात अपने स्थानीय कलाकारों के सहयोग से इन्होंने नाचा पार्टी का गठन 1963 के आसपास किया। तब नाचा में मंदराजी दाऊ, मदन निषाद, ठाकुरराम, भुलवाराम जैसे कलाकारों का बड़ा नाम था। इन कलाकारों को अपना आदर्श मानकर सुखीराम ने अपना प्रयास प्रारंभ किया। दिन में मेहनत मजदूरी करते और रात में नाचा। प्रयास को सराहना और सफलता मिलनी शुरू हुई। साथियों का उत्साह बढ़ा। आर्थिक संबल मिला। तब छुईखदान - गण्डई अंचल में सुखीराम - पहेलो साज का डंका बजने लगा। गाँव - गाँव में गणेश दुर्गोत्‍सव तथा मेले मड़ई में जहाँ भी सुखीराम का नाचा होता देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती। पारम्परिक गीतों के साथ तत्कालीन फिल्मी गीतों की महक के साथ गम्मतों की प्रस्तुति में हँसी के फव्हारे फूट पड़ते। दर्शक आनंद विभोर हो जाते। सुखीराम का नाम दर्शकों के जुबान पर चढ़ने लगा। सुखीराम का सहयोगी जोक्कड़ था पहलोराम। दोनों की जोंड़ी खूब जमती। पॉव में पैजना बांधकर झूम झूमकर नाचते। अपनी भाव - भंगिमा से सबको हंसाते। अपनी बातों से हंसी की फूलझड़ी छोड़ते। तब इनके साथियों में वादक कलाकार के रूप में शोभा पांडे, पूरन पांडे, बाबूराम और सुप्रसिद्ध क्लार्नेट वादक दुखुराम कामड़े। नचकारिन के रूप में पंचम पांडे चंदा नाम से स्त्री पात्र की भूमिका निभाते। हीराराम देवांगन और लक्ष्मण पांडे परी की भूमिका निभाने वाले अन्य सहयोगी थे।
उस समय सुखीराम निषाद की नाच पार्टी मधुर संगीत, आकर्षक नृत्य व हास्य से परिपूण्र गम्मत के कारण इतनी प्रसिद्ध हुई कि इनके नाच का कार्यक्रम टिकटों में चैरिटी शो के रूप में होने लगा। इस बीच इनका कार्यक्रम डोंगरगढ़, राजनांदगांव, रायपुर, दुर्ग, खैरागढ़, बेमेतरा, मोहगाँव, बालाघाट जैसे शहरी क्षेत्रों में भी चर्चित हुआ। तब यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इन पंक्तियों के लेखक को 10 - 12 साल की उम्र से इनके नाच देखने का सौभाग्य मिल रहा है। सुखीराम की कला अदायगी अदï्भूत है। ठेठ पारम्परिक ढंग से नाचा की प्रस्तुति इनकी अपनी विशेषता है। साखी व नचौड़ी गीतों में तो इनका कोई शानी नहीं है। इनकी साखी की एक बानगी देखें -
बड़े फजर पर चारी करे, परे दुवारी जाय।
पर नारी से हेत करे, तो सीधा बैकुंठ जाय॥
सामान्य अर्थों में तो यह साखी बड़ी अटपटी लगती है। आश्चर्य होता है कि दूसरे की स्त्री से प्रेम करने वाला कैसे बैकुंठ जायेगा ? पर वाह, सुखीराम जी, नाचा के दौरान इसका अर्थ समझाते हैं तो लोग बिना हंसे नहीं रह सकते। ये इसका अर्थ इस तरह बताते हैं - जो सुबह - सुबह पर चारी अर्थात परमेश्वर का नाम लेता है वह बैकुंठ जाता है। पर दुवारी जाने का मतलब सुबह शौच क्रिया से जो निवृत्त होता है वह स्वस्थ रहता है और जो पर नारी से प्रेम करता है अर्थात तुलसी के पौधे में जल डालता है वह बैकुंठ को प्राप्त करता है। स्वस्थ रहना ही बैकुंठ को प्राप्त करना है। सुखीराम निषाद अपनी नाचा प्रस्तुति में जो गीत प्रस्तुत करते हैं वे लोक जीवन से जुड़े हुए बड़े अर्थवान और उद्देश्य परक होते हैं -
ये पवन बिन कलगी नई डोलय, ये पवन बिन कलगी नई डोलय
नई डोलय, नई डोलय भईया, ये पवन बिन कलगी नई डोलय।
नांगर डोलय, बईला डोलय, अऊ डोलय जोतईया।
अरे तरी डाहर आंतर छुटे, देखत हे निंदईया
ये दे नई डोलय .....
लोकगीतों में कितनी सहज अभिव्यक्ति होती है - पवन बिन कलगी नई डोलय का आशय यह कि बिना कारण कोई कार्य नहीं होता। बिना हवा चले धूल नहीं उड़ती हिन्दी के इस मुवाहरे का सौन्दर्य भी इसके सामने फीका लगता है। इस तरह सुखीराम जी ने नाचा को लोकप्रिय बनाने में परम्परा और अभिरूचि के अनुरूप गीतों और गम्मतों को अपने श्रम और कला से संवरा।
सुखीराम निषाद की यह भी विशेषता थी कि वे नाचा के माध्यम से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों और विसंगतियों पर चोट करते। नशा, दहेज, अंधविश्वास, छुआछूत, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों को केन्द्र में रखकर गम्मत की प्रस्तुति करते। आवश्यकतानुसार इन गम्मतों के लिए स्वयं गीतों की रचना करते। प्रेम, श्रृंगार और सामाजिक सरोकारों के गीत बड़े लोकप्रिय हुए। उस समय वे गीतों की पुस्तिका छपवाकर भी नाच प्रदर्शन के बाद बेचते। तब पुस्तिका की कीमत चार आने होती थी। आलसी बेटे - बहू पर उनका कटाक्ष देखें -
ये जुग भईगे अंधरा, मोला सूझत नई हे ग।
कलजुग के बेटा हा सोय, बाप ल नांगर जोताय।
दाई - ददा ल गेरवा बांधे, नारी ल मुड़ चढ़ाय।
मोला  सूझत नई हे ग ...
साजपरी की भूमिका निभाने वाले पंचराम पांडे जब सज - संवर कर मंच पर उतरते तो उर्वसी से कम नहीं लगते थे। वे अपने बालों में टार्च के बल्ब लगाये होते, कमर में बैटरी छिपाये रहते और जब मटकते तो बल्ब बुग - बुग जल उठते। दर्शक चमत्कृत हो जाते। उनके इस सौन्दर्य पर सुखीराम नाच कर गीत गाते। जिसे तब के लोग आज भी याद कर आनंदित होते हैं। यह गीत श्रृंगार का सुन्दर नमूना है -
धीरे रेंगबे तोर पातर कनिहा,
ठमकत - ठमकत होवथे मंझनिया,
पंड़की तोर पाँव हवय, कोदो सांवर कारी,
नागिन कस बेनी सपोटा, मुड़ म कुहकु लाली,
तोर कनिहा ले चुंदी, ते हा मोर आड़ी पूंजी,
पारम्परिक लोकगीतों के साथ पारम्परिक धुनों पर भी जैसे - सुवा, आल्हा, ददरिया, करमा, जस - जंवरा, फाग आदि पर रचे गीतों को नाचा के माध्यम से सुनकर लोगों का मन गदगद हो जाता। उन्हें लगता कि ये तो अपने ही गीत हैं, अपनी ही बात है। सुखीराम का बारामसी गीत भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ -
पूस महिना म कोलिहा रोये, जाड़ - सीत सहि न जाय।
माघ महिना मोटियारी रोये, मोर कुंडा लगिन धराय॥
सुखीराम की नाचा पार्टी वर्षों चलती रही और लोकप्रिय बनी। पुराने साथी एक - एक कर परमेश्वर को प्रिय हाते गये। तब विवश होकर पार्टी बन्द करनी पड़ी। उसके पश्चात् सन् 1980 से गण्डई की सुप्रसिद्ध लोक कला मंच दूध मोंगरा से जुड़े। दूध मोंगरा के माध्यम से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के साथ - साथ मध्यप्रदेश, महाराष्‍ट्र , कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की माटी को गौरवान्वित किया है। '' दूध मोंगरा '' से आज भी जुड़े हुए हैं। 69 वर्ष की उम्र में स्वस्थ कभी - कभी जवाब दे जाता है पर आज भी इनका मार्ग दर्शन दूध मोंगरा के कलाकारों को मिलता रहता है। दूध मोंगरा की प्रगति देखकर सुखीराम भी सुख अनुभव करते हैं। वर्तमान में गायत्री शाक्तिपीठ छुईखदान में अपनी सेवा दे रहे हैं। स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हैं। प्रतिदिन सुबह - शाम स्नान व धार्मिक क्रिया, पूजा - पाठ, ईश्वर आराधना इनकी जीवन चर्या है। छुईखदान से गण्डई तक की 20 किलोमीटर की यात्रा साइकिल से करते हैं। यह सब संयम साधना का प्रतिफल है। अभाव में भी पल कर कला की जो सेवा इन्होंने की है वह और इनका संयमित जीवन तथा अनुशासन नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए अनुकरणीय है।
सुखीराम निषाद निराले लोक कलाकार हैं। ये अपनी कला से सबको सुखी कर रहे हैं। सबको आनंद बाँट रहे हैं। सुखीराम निषाद नाम का लोक कला का यह दैदिप्यमान नक्षत्र शताधिक वर्षों तक लोक कला जगत को आलोकित करता रहे ....।
गंडई पंडरिया, जिला- राजनांदगांव ( छ.ग.)