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इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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मंगलवार, 15 अगस्त 2023

डूबता सूरज

 

 सुरेश सर्वेद
                        पात्र परिचय
श्रीकांत - एक कृषक/ छन्नू - मन्नू बैलों के मालिक
सुनंदा - श्रीकांत की पत्नी
निमेष - बैल व्यापारी
मनीष, अरुण, अमित, सरपंच अन्य ग्रामीण - गांव के लोग
पशु चिकित्सक - पशु चिकित्सक
कालू-  बूढ़े और असक्त जानवरों का क्रेता
सूत्रधार - सूत्रधार
सारांश
     गांव का किसान श्रीकांत नई '' बैल जोड़ी '' खरीदना चाहता है। वह आमगांव के '' बैल बाजार '' से '' बैल जोड़ी '' खरीद लाता है । उन बैलों का नाम छन्नू और मन्नू होता है। छन्नू - मन्नू युवा और हृष्ट  - पुष्ट है । छन्नू - मन्नू की फुर्तीली चाल और गठीले अंगों को देख कुछ ग्रामीणों को जलन होती है तो कुछ को प्रसन्नता। एक ग्रामीण, मनीष बैलों की कार्यक्षमता की परीक्षा लेना चाहता है। उस परीक्षा में बैल सफल हो जाते हैं।
     समीप ही '' बजरंगपुर '' गांव है। वह '' बैल दौड़ '' प्रतियोगिता होता है। उस प्रतियोगिता में श्रीकांत, छन्नू - मन्नू को नहीं ले जाना चाहता मगर अमित के कहने पर छन्नू - मन्नू को प्रतियोगिता में ले जाता है। उसमें छन्नू - मन्नू प्रथम पुरस्कार प्राप्त करते हैं।
     एक दिन श्रीकांत दूसरे गांव जाता है। छन्नू - मन्नू के देख रेख की जिम्मेदारी सुनंदा पर आ जाती है। सुनंदा बैलों को घास देने जाती है। धोखे से छन्नू के पैर से सुनंदा का पैर दब जाता है। सुनंदा बौखलाकर दिन भर बैलों को कुछ खाने ही नहीं देती।
     श्रीकांत वापस आता है। उसे मालूम होता है कि छन्नू  - मन्नू को दिन भर दाना पानी नहीं दिया गया तो वह सुनंदा पर बौखला जाता है।
इसी तरह दस वर्ष निकल जाते हैं। और छन्नू - मन्नू वृद्ध हो जाते हैं। श्रीकांत नये बैल खरीदना चाहता है मगर अरुण के कहने पर वह ट्रैक्टर खरीद लाता है।
घर में ट्रैक्टर आने से छन्नू  - मन्नू की उपयोगिता खत्म हो जाती है। उन्हें कोठे में छोड़ दिया जाता है जहां वे यातना की जीवन जीते हैं। मन्नू को '' तड़कफांस '' की बीमारी हो जाती है। इससे वह न पैरा - भूसा खा सकता था और न ही पानी पी सकता था। एक दिन मन्नू की मृत्यु हो जाती है ।
      मन्नू की मृत्यु की पीड़ा छन्नू के लिये असहनीय होती है । वह साथ बिताये दिनों की याद करता है और कोठे में छटपटाता है। स्वयं से लड़ता है।
     गांव में कालू आया है। वह असक्त एवं अपंग पशुओं के खरीददार है । श्रीकांत उससे छन्नू का मोल भाव कर लेता है। वह छन्नू को कालू के पास बेचने तैयार हो जाता है। कालू, छन्नू को लाठी से पीट और घसीटकर कोठे से बाहर निकालना चाहता है । कालू की निर्दयता से श्रीकांत की आत्मा कराह उठती है । वह कालू के रुपये लौटा देता है । श्रीकांत, छन्नू से बेचने से इंकार देता है ।
नाटक   
(सूत्रधार - श्रीकांत '' बैल जोड़ी '' खरीदना चाहता था। वह आमगांव का बैल बाजार से बैल खरीदना चाहता था। वह तैयार होकर अपनी पत्नी सुनंदा को आवाज दी)
श्रीकांत - सुनंदा, अरी सुनंदा थैली तो लेते आओ। बैल खरीदने बाजार जाने का समय हो गया है।
सुनंदा - अभी आयी (श्रीकांत के पास आकर) ऐ लो थैली। अब की बार ऐसी बैल जोड़ी लाना जो हृष्ट - पुष्ट और काम में फुर्तीले हो।
श्रीकांत - (सुनंदा के हाथ से थैली लेते हुए ) हां - हां, मैं वैसे ही बैल जोड़ी लाऊंगा, जैसे तुम चाहती हो।
(श्रीकांत आगे बढ़ता है)
सुनंदा - (ऊंची आवाज में) और हां, रुपये सम्हालकर रखना। बाजार - हाट में चोर - उच्चकों की कमी नहीं रहती।
श्रीकांत - हां -हां, मैं तुम्हारी बातें गांठ में बांध कर रखूंगा । तुम निश्चिंत रहो ।
(दृष्य परिवर्तन)
(आमगांव का '' बैल बाजार '' । वहां गहमा - गहमी है। बैल खरीदने - बेचने की आवाजें उभर रही है। श्रीकांत '' दावन '' में बंधे बैलों को देखता - परखता है। उसकी दृष्टि दो बैलों पर जा टिकती है। वह बैल व्यवसायी निमेष से बैलों की ओर संकेत करके पूछता है )
श्रीकांत - निमेष, इन बैलों की क्या कीमत है ?
निमेष - कीमत कुछ अधिक नहीं । दोनों बैलों की कीमत मात्र बीस हजार रुपये है ।
श्रीकांत - तुम बहुत ज्यादा कीमत आंक रहे हो । कीमत सुनकर खरीददार भाग जायेगा। लेन -देन की बात करो ।
निमेष - तुम लेना ही चाहते हो तो इस बैल जोड़ी को अट्ठारह हजार में दे सकता हूं । इससे एक पैसा कम नहीं लूंगा । वैसे तुम भी मांग सकते हो ।
श्रीकांत - मैं पन्द्रह हजार तक खरीदने के पक्ष में हूं । यदि जम रहा हो तो '' दावन '' ठोंक दो ।
निमेष - नहीं रे भाई, नहीं । एक हजार और कम कर सकता हूं, अर्थात सत्रह हजार लगेंगे । एक बात गांठ में बांध कर रख लो, तुम्हें इतने सस्ते में ऐसे कमाऊ बैल कहीं नहीं मिलेंगे। ( निमेष एक बैल की पीठ ठोंकता है । बैल ऊपर की ओर उचकता है) देखा, छुआ नहीं कि बैल फुर्ती दिखाने लगा। इसका नाम छन्नू है । (पास ही बंधे दूसरे बैल की पूंछ ऐंठता है। बैल मचलता है) यह मन्नू है । इन दोनों की पटती भी खूब है । अलग - अलग बांध दूं तो ये '' दावन '' तोड़ देंगे। विश्वास करो - ये अपने परिश्रम से तुम्हारे रकम एक वर्ष में ही लौटा देंगे ।
श्रीकांत - (मन ही मन बुदबुदाता है) इसे तो मैं भी जानता हूं, तभी तो इन्हें खरीदना चाहता हूं । (निमेष से) तुम सोलह हजार में देना चाहते हो तो दे दो।
निमेष -कुछ सोच - समझकर मांगों ।
श्रीकांत - मुझे जो मांगना था, मांग लिया ।
निमेष - तुम नम्बर एक कंजूस निकले ।
(निमेष '' दावन '' ठोंक देता है । बैलों को '' दावन '' से खोल श्रीकांत को थमाते हुए) तुम इस व्यवसायी निमेष का क्या नाम लोगे,लो, सम्हालों अपने बैल ।
श्रीकांत - (रुपये देते हुए) ये रहे तुम्हारे रुपये। गिन लो - पूरे रुपये है कि नहीं ।
निमेष - (रुपये गिनता है) एक ...दो .... तीन ....चार ....(श्रीकांत से) पूरे के पूरे हैं ।
श्रीकांत - तो अब चलता हूं ...।
निमेष - हां हां, और कभी सेवा की जरुरत पड़ी तो बताना ।
श्रीकांत - ठीक है ...।
(श्रीकांत बैलों को हंकालता है । अपने गाँव की ओर चल पड़ता है)
दृष्य परिवर्तन
(बीच रास्ते में भाटागाँव पड़ता है । एक स्थान पर कुछ ग्रामीण खड़े हैं । श्रीकांत बैलों के साथ उनके पास से निकलने लगता है । ग्रामीण बैलों को देखते हैं )
एक ग्रामीण - (श्रीकांत से) ये बैल कहां से ला रहे हो । इन्हें कितने में खरीदा ।
श्रीकांत - (ग्रामीण से) आमगांव के बैल बाजार से खरीदा हूं । पूरे सोलह हजार पड़े हैं भाई ।
दूसरा ग्रामीण - सस्ते में पा गये ।
श्रीकांत - (हंस कर) सस्ते कहां । सोलह हजार कोई छोटी रकम है ।
पहला  - चिंता क्यों करते हो । ये सोलह के बत्तीस हजार एक ही वर्ष में कमा कर देगें ।
श्रीकांत - सो तो ठीक है ...।
(श्रीकांत बैलों को हकाल कर आगे की ओर बढ़ जाता है)
श्रीकांत - (छन्नू - मन्नू से) अभी तो आठ किलोमीटर का रास्ता शेष है । चलते - चलते मेरे पैरों में दर्द भर गया है । इच्छा हो रही है  - घना वृक्ष के तले बैठ कर थोड़ा आराम कर लूं । तुम लोगों को भी आराम मिल जायेगा । मगर घर शीघ्र पहुंचने का उमंग आराम करने की अनुमति नहीं दे रही है ।
(सूत्रधार  - बैल श्रीकांत की बात सुनकर अपनी भाषा में एक दूसरे से बातें करते हैं । )
मन्नू - (छन्नू से) मित्र छन्नू, तुमने सुना - मालिक क्या कह रहे हैं। देखो तो इनकी चाल, कैसी ढीली पड़ गई है। लगता है - ये बुरी तरह थक गये हैं।
छन्नू - (मन्नू से थकी आवाज में) मन्नू, चलना भी तो बहुत पड़ रहा है। सच कहूं - मुझे भी थकान महसूस हो रही है।
मन्नू - क्या कहा छन्नू ? तुम थक गये। अपना निकम्मापन प्रदर्शित करना चाहते हो । यदि तुमने आराम की सोची तो मालिक को संदेह हो जायेगा कि हम कामचोर है । अभी हम युवा हैं। फिर थकने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता ।
छन्नू  - मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था ।
मन्नू  - तुम मेरी क्या परीक्षा लोगे ? मैं सारी दुनियां को दौड़ लगा आऊंगा, फिर भी जीत मेरी ही होगी । अविश्वास हो तो दौड़ कर देख लो ।
छन्नू - तो देर किस बात की, स्पर्धा हो ही जाये ।
(छन्नू - मन्नू पूंछ उठाकर दौड़ने लगते हैं)
श्रीकांत - (छन्नू  - मन्नू के पीछे दौड़ते हुए ) अरे भई, इतना मत दौड़ों । मैं तुम लोगों के साथ नहीं दौड़ सकता । (श्रीकांत स्वयं से) लगता है, इन पर जिद्द सवार है (श्रीकांत के हांफने की आवाज, वह रेंगना शुरु कर देता है) दौड़ो बेटे, दौड़ो । इतना दौड़ो कि लोग दांतों तले ऊंगली दबा ले । मैं कहने नहीं चूकूगा कि जीत हुई तो छन्नू - मन्नू की, हार हुई तो मेरी ...।
दृष्य परिवर्तन
(श्रीकांत बैल जोड़ी के साथ अपने गांव के निकट पहुंच जाता है । एक स्थान पर कुछ ग्रामीण हैं। वे श्रीकांत के साथ हो लेते हैं।)
सरपंच - क्यों श्रीकांत, आखिर तुमने बैल ले ही आया ।
श्रीकांत  - बैल नहीं लाता तो खेती कैसे करता सरपंच महोदय । ठीक कहा न मनीष ।
मनीष  - हां - हां, तुम्हारा कहना उचित ही है। इस बार तो तुमने जानदार बैल जोड़ी लाये हो श्रीकांत ।
सरपंच - (मनीष से) मनीष,साल - साल बैल लेने से तो अच्छा यही होता है-जो लो, एक बार लो। भले कीमत अधिक लगे । अब श्रीकांत को कम से कम दस वर्ष तक तो बैल खरीदने - बेचने के पचड़े में पड़ना नहीं पड़ेगा ।
श्रीकांत  - ( सरपंच से) तुम्हारा आंकलन ठीक है सरपंच महोदय ।
( श्रीकांत, बैल जोड़ी एवं ग्रामीणों के साथ अपने घर के निकट पहुंच जाता है । दरवाजे के नजदीक पहुंच कर अपनी पत्नी सुनंदा को आवाज देता है)
श्रीकांत - सुनंदा, अरी सुनंदा ...।
सुनंदा  - (घर भीतर से आवाज देती है) अभी आयी ...।
श्रीकांत - खाली हाथ ही न आ जाना। नारियल आरती लेते आना ...।
(सुनंदा आरती नारियल ले कर आती है। वह बैलों के माथे पर टीका लगाती है । आरती उतारती है । नारियल श्रीकांत को देती है)
सुनंदा - लो ये नारियल फोड़ लोगों में प्रसाद बांट दो ।
(नारियल फुटता है । श्रीकांत लोगों में प्रसाद बांटता है । वह बैलों को आंगन में ले जाकर बांधता है। ग्रामीण भी आंगन में आ जाते हैं।)
श्रीकांत -(सुनंदा से) सुनंदा, बैलों के सामने हरी - हरी घास डाल दो। ये भूखे हैं ।
(सुनंदा बैलों के सामने घास डालती है। बैल घास चबुलाने लगते हैं)
सरपंच - (श्रीकांत से) श्रीकांत, मैंने बहुत बैल देखे पर ऐसे बैल नहीं देखा। देखो तो बस देखते रहने की इच्छा होती है ।
मनीष - (सरपंच से) सरपंच काका, बैल अभी - अभी आये और इन्हें हरी - हरी घास खाने मिल गया। आप श्रीकांत के बैलों की प्रशंसा ही न करें। श्रीकांत से कुछ खर्च भी करवाइये ।
सरपंच - (श्रीकांत से) मनीष का कहना उचित है श्रीकांत। अब तुम ही बताओ, इस खुशी के अवसर पर क्या खिलाओगे। स्पष्ट कर ही दो ।
श्रीकांत - (सरपंच से) अब मैं क्या बताऊं सरपंच महोदय,सारे रुपये तो छन्नू - मन्नू पर उड़ेल आया ।
अरुण - ये रही कंजूसी की बात। लगता है - अब श्रीकांत भूखा ही रहेगा ...।
(सभी ग्रामीण खिल खिलाकर हंस पड़ते हैं। हंसी थमती है)
मनीष - अरुण, अब श्रीकांत भूखा रहे या उपवास करे इससे हमें क्या ? श्रीकांत से पार्टी लेने का अधिकार तो हम लोगों का बनता ही है। श्रीकांत को हम लोगों को पार्टी देनी ही होगी ।
श्रीकांत - ठीक है, कल दे दूंगा पार्टी ?
अरुण - कल क्यों ? पार्टी तो अभी होनी चाहिए। क्यों सरपंच काका ?
सरपंच - (श्रीकांत से) हां श्रीकांत, अरुण का कहना उचित है । देर होने पर उत्साह किरकिरा हो जाता है । (ग्रामीणों से) क्यों भाईयों, मैंने उचित कहा न?
सभी ग्रामीण - (एक स्वर में) हां  - हां, पार्टी तो अभी होनी चाहिए ।
श्रीकांत -  (ग्रामीणों से) ठीक है, तुम सबका एक राग है तो मुझे भी स्वीकार है। (सुनंदा से) क्यों सुनंदा, ग्रामीण क्या कह रहे हैं - तुम सुन रही हो न ?
सुनंदा- ठीक ही तो कह रहे हैं ।
श्रीकांत - तो बना डालो, खीर - पुड़ी ।
(सुनंदा,पाकगृह में चली जाती है। श्रीकांत छन्नू की पीठ सहलाने लगता है । मन्नू, श्रीकांत के शरीर से अपना शरीर घसीट देता है)
श्रीकांत - (मन्नू से पुचकार कर) क्यों मन्नू, छन्नू को सहलाते तुमसे देखा नहीं गया ? लो तुम्हें भी सहला देता हूं ।
(श्रीकांत, मन्नू को सहलाने लगता है, उसी समय अमित प्रवेश करता है। वह हांफ रहा है ।)
मनीष - (अमित से) अमित, तुम इतना हांफ क्यों रहे हो। मैंने तो तुम्हें बैलगाड़ी से धान लाने भेजा था । मगर तुम यहां क्यों आये। क्या धान ले आये ?
अमित - नहीं ...।
मनीष - क्यों ...?
अमित - तुम यहां श्रीकांत के बैल जोड़ी देख रहे हो। उधर तुम्हारी गाड़ी नाले में फंस गई है ।
मनीष - (हड़बड़ा कर) क्या कहा, गाड़ी नाले में फंस गई है ?
अमित - हां - हां, तुम्हारे बैल गाड़ी को खींच नहीं पा रहे हैं ।
मनीष  - तो दूसरों के बैल मांग कर क्यों नहीं ले जाते ?
अमित - गांव के प्रायः सभी बैलों से कोशिश की जा चुकी है, गाड़ी टस से मस नहीं होती ।
मनीष - (श्रीकांत से) श्रीकांत, तुम अपने बैलों को वहां ले चलो। इनकी कार्यक्षमता की परीक्षा भी हो जायेगी ।
श्रीकांत - नहीं रे भइया, ये अभी थके हैं। इन्हें अभी आराम की आवश्यकता है ।
मनीष - (टंट कसता है) तो क्या इन्हें दिखाने के लिए लाये हो । क्यों सरपंच काका, मैं ठीक कह रहा हूं न ?
सरपंच -(श्रीकांत से) मनीष ठीक ही तो कह है श्रीकांत । हम भी देख लेंगे इनकी कार्यक्षमता (ग्रामीणों से) क्यों भईयों, मैंने उचित कहा न ?
ग्रामीण - हां - हां, मनीष और सरपंच का कहना उचित ही है ।
श्रीकांत  - ठीक है, जब तुम सबकी एक ही राय है तो मैं भी मान ही लेता हूं ।
दृष्य परिवर्तन
(नाले के पास ग्रामीण बैल जोड़ी को लेकर आते हैं। वहां एक गाड़ी जिसमें लबालब धान की फसल भरी है। वह नाले के चढ़ाव में अटकी पड़ी है, उसमें छन्नू - मन्नू को जोता जाता है। बैलों को गाड़ी खींचने हांकते है - '' हो - हो, ढिर्र ... दिर्र ... '' छन्नू -मन्नू जोर लगाकर गाड़ी को खींचते है। वे एक - दो कदम चढ़ने के बाद पुनः पीछे हो जाते हैं। फसलों से भरी गाड़ी जहां के तहां आ जाती है)
मनीष - (श्रीकांत से) श्रीकांत, तुम्हारे बैलों का काम दिख गया। थोड़े से चढ़ाव को भी पार नहीं कर पा रहे हैं ।
सूत्रधार - छन्नू, मन्नू की ओर देखता है। वे ताव में आ जाते हैं। वे एक साथ सामने के पैरों को मोड़ते हैं । पीछे के पैरों से बल देते हैं। फिर सामने के पैरों को शीघ्र उठा लेते हैं । वे गाड़ी को नाले के ऊपर खींच लेते हैं। छन्नू - मन्नू हांफने लगते हैं, मगर  वे गाडी को ऊपर खींच ही लेते हैं ।
मनीष - (श्रीकांत से) श्रीकांत, वास्तव में तुम्हारे बैलों की कार्यक्षमता सराहनीय है ।
सरपंच - (श्रीकांत से) हां श्रीकांत, देखो न ये हाँफ रहे हैं । इनके मुंह से झांक निकल गये मगर इन्होंने गाड़ी को नाले से ऊपर खींच ही लिया ।
अरुण - अब चलो, श्रीकांत के घर का भोजन ठंडा न हो जाये।
सभी ग्रामीण - चलो,चलो ....।
(सभी ग्रामीण, श्रीकांत के घर आते हैं । श्रीकांत, छन्नू - मन्नू को यथा स्थान बांध देता है ।)
श्रीकांत - (पाकगृह की ओर देखते हुए) सुनंदा, भोजन तैयार हो गया क्या ?
सुनंदा - (पाकगृह से) हां हो गया है ।
श्रीकांत - (ग्रामीणों से) लो भाइयों, बैठो, अरुण चलो तुम भोजन परोसने में मेरी सहायता करो ।
अरुण - ठीक है ...।
सरपंच - (श्रीकांत से) श्रीकांत, पहले हम लोगों को भोजन न परोस देना। सबसे पहले छन्नू - मन्नू को भोजन देना फिर हमें ।
श्रीकांत - (सरपंच से) आप ठीक कह रहे हैं सरपंच काका,मैं दो थालियों में अलग से निकलवा लिया हूं (खीर - पुड़ी, छन्नू - मन्नू को देते हुए) लो खाओ ...।
(छन्नू - मन्नू खीर पुड़ी खाने लगते हैं। ग्रामीणों को भी खीर - पुड़ी परोसा जाता है । वे भी खाने लगते हैं )
श्रीकांत - लो सरपंच काका, दो पुड़ी और लो ...
सरपंच  - (डकारते हुए) नहीं - नहीं, बहुत हो गया...।
श्रीकांत - लो भी, दो पुड़ी कोई अधिक नहीं होता ...।
अमित - ( पुड़ी चबाते हुए) खाओ न काका, रोज - रोज तो ऐसा अवसर आता नहीं है ...
(इस तरह ग्रामीण भर पेट पुड़ी खीर खाते हैं)
दृष्य परिवर्तन (कुछ दिन बाद)
(प्रातः का समय, श्रीकांत कोठे में जाता है। वहां छन्नू  - मन्नू है । श्रीकांत देखता है - छन्नू सुस्त बैठा है । श्रीकांत छन्नू के पास जाता है । उसके पास बैठ जाता है)
श्रीकांत - (छन्नू के गले में हाथ फेरते हुए) छन्नू, तुम गुमसुम क्यों बैठे हो? कही तुम्हारी तबियत खराब तो नहीं .. मुझे लगता है - जरुर तुम्हारी तबियत खराब हो गयी है। (उठते हुए) मैं जाता हूं, अभी चिकित्सक को बुला ले आता हूं।
(श्रीकांत, कोठे से बाहर आता है । सुनंदा से)
श्रीकांत - सुनंदा, अरी ओ सुनंदा ...।
सुनंदा - क्या है ...?
श्रीकांत - लगता है, छन्नू की तबियत गड़बड़ा गई है। मैं पशु चिकित्सक को लाने जा रहा हूं । तुम बैलों का ध्यान रखना ।
सुनंदा - ठीक है ...।
(श्रीकांत अपने घर से निकल जाता है)
दृश्य परिवर्तन
(पशु चिकित्सक का निवास स्थान)
पशु चिकित्सक - (श्रीकांत से) कहो श्रीकांत, कैसे आना हुआ ।
श्रीकांत - जल्द मेरे साथ चलो,
पशु चिकित्सक - अरे बात क्या है, कुछ तो बताओ ।
श्रीकांत - पता नहीं छन्नू को क्या हो गया है ? वह सुबह से ही शांत और सुस्त बैठा है ।
पशु चिकित्सक - अच्छा ...।
श्रीकांत - हां, चलो मेरे साथ, देर न करो ...।
पशु चिकित्सक - दवाइयों का बैग तो पकड़ लेने दो । (दवाइयों का बैग सम्हाल कर) चलो ...।
दृष्य परिवर्तन
(श्रीकांत का घर,पशु चिकित्सक, श्रीकांत के साथ घर में प्रवेश करते हैं । वे बैलों के पास आते हैं)
पशु चिकित्सक - मैं छन्नू का जांच करता हूं । (पशु चिकित्सक, छन्नू को जांचता है)
श्रीकांत - कैसे डाक्टर साहब, क्या हुआ है, छन्नू को ...।
पशु चिकित्सक - (बैग को हाथ में लेकर हंसते हुए) श्रीकांत, खुद परेशान होते हो तो होते हो । मुझे भी परेशान कर देते हो । छन्नू को कुछ नहीं हुआ है । आलस्य के कारण शांत बैठा है । दरअसल तुम्हें बैलों से अत्याधिक लगाव है, यही वजह है कि तुम्हारे बैलों को कुछ हुआ नहीं कि परेशान हो जाते हो । (पशु चिकित्सक छन्नू की पूंछ पकड़ कर ऐंठ देता है । छन्नू रटपटा कर उठ खड़ा होता है । वह घास खाने लगता है) देखा न श्रीकांत, कैसे फुर्ती से उठ गया ।
श्रीकांत - (छन्नू को सहलाते हुए) नटखट, मैं तो घबरा ही गया था ।
(पशु चिकित्सक और श्रीकांत कोठे से आंगन में आते हैं। दीवार से सट कर रखी खाट को श्रीकांत बिछाते हैं । )
श्रीकांत - (खाट की ओर इशारा करते हुए पशु चिकित्सक से) बैठो डाक्टर साहब । ( फिर अपनी पत्नी सुनंदा को आवाज देता है, पशु चिकित्सक खाट में बैठ जाता है । ) सुनंदा,चाय बन गयी हो तो ले आओ ...।
(सुनंदा दो कप चाय ले आती है ।)
सुनंदा - लो, चाय लो ...।
(श्रीकांत और चिकित्सक एक - एक कप चाय उठा पीने लगते हैं । सुनंदा पाकगृह की ओर जाने लगती। श्रीकांत सुनंदा से कहता है । )
श्रीकांत - मेरे कपड़े और थैली ले आओ ।
सुनंदा - अभी लायी ...(सुनंदा एक थैली और श्रीकांत के कपड़े लाकर देती है) ये लो थैली और कपड़े ...।
(श्रीकांत और पशु चिकित्सक चाय पी चुके हैं। वे कप को नीचे रख देते हैं ।)
पशु चिकित्सक  - श्रीकांत, अब मैं निकलता हूं, और कोई बात होगी तो मुझे बताना ...।
श्रीकांत - अच्छा डाक्टर साहब। (पशु चिकित्सक श्रीकांत के घर से निकल जाता है। श्रीकांत, सुनंदा से) सुनंदा, संभव है आज लौटने में शाम हो जाये। तुम छन्नू - मन्नू का ध्यान रखना। समय पर दाना - पानी देना। (श्रीकांत आगे बढ़ते - बढ़ते फिर रुक जाता है) सुनंदा, छन्नू - मन्नू को थोड़ा भी कष्ट न होने देना ...।
सुनंदा - (हंसकर) तुम तो जाओ, छन्नू - मन्नू की चिंता मुझे भी है...। (श्रीकांत आगे बढ़ जाता है। सुनंदा पाकगृह में आ भोजन बनाने लगती है।)
दृश्य परिवर्तन
(दोपहर का समय, सुनंदा चांवल साफ कर रही है तभी बैल च्च् हम्मा- हम्मा ज्ज् चिल्लाते हैं। आवाज सुनंदा के कानों तक पहुंचती है।)
सुनंदा - (स्वयं से) लगता है, छन्नू - मन्नू के पास घास नहीं है। चलो, उन्हें घास दे आती हूं।
(सुनंदा, हरी - हरी घास लेकर कोठे की ओर जाती है। सुनंदा बैलों के सामने हरी - हरी घास डालना चाहती है कि छन्नू हरी घास देखकर, सुनंदा की ओर लपटकता है। उसका पंजा (खुर) सुनंदा के पैर ऊपर आ जाता है।)
सुनंदा - (दर्द से बिलबिलाकर) दइया रे,छन्नू ने तो मेरा पैर ही कुचल डाला, यह तो बहुत ही निष्ठुर है।
(छन्नू तत्काल अपना पैर उठा लेता है। सुनंदा क्रोधित हो जाती है। वह घास को हाथ में रखे ही वापस होने लगती है) अब मरो भूखे ...। (सुनंदा घास को आंगन के कोन्टे में पटक देती है। वह लंगड़ाती, कराहती है)
(इधर मन्नू, छन्नू से रुष्ट हो जाता है।)
मन्नू - (छन्नू से) छन्नू, तुमने मालकिन के पैर को क्यों आहत किया ? अब मरो भूख .. मालकिन हमारी सेवा करती है और तुमने उसे पीड़ा पहुंचायी । तुम तो कोड़े खाने लायक हो ...।
छन्नू  - तुम गलत अर्थ लगा बैठे मन्नू, यह धोखे में हुआ ...।
मन्नू - असत्य  ... मुझसे धोखा क्यों नहीं हुआ ...।
छन्नू  - मित्र, मुझे जोरों से भूख लगी है?
मन्नू - तो मैं क्या करुं ? भुगतो अपने कर्म का फल।
छन्नू  - चलो, मैं अपनी गलती स्वीकारता हूं। अब मान जाओ। मालकिन से तुम्हीं घास मांगों । मुझसे वह रुष्ट है।
मन्नू - मैं भूख से मर जाऊँगा पर भोजन नहीं मांगूगा।
छन्नू - मान भी जाओ मित्र, भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी।
मन्नू - ठीक है ...।
(छन्नू और मन्नू '' हम्मा  - हम्मा ''   चिल्लाते हैं। सुनंदा छपरी में बैठी आहत पैर की सिंकाई कर रही है। बैलों की आवाज उस तक पहुंचती है)
सुनंदा - (सिंकाई करती हुई) रहो भूखे, घास नहीं दूंगी मतलब नहीं दूंगी।
(छन्नू - मन्नू चिल्लाते - चिल्लाते थक जाते हैं।)
छन्नू - (मन्नू से) मन्नू, मालकिन तो बहुत ही नाराज हो गयी है।
मन्नू - हाँ, मालिक भी नहीं आ रहे हैं।
(छन्नू - मन्नू मुंह लटकाकर बैठ जाते हैं)
दृष्य परिवर्तन
(संध्या का समय - श्रीकांत घर में प्रवेश करता है। सुनंदा छपरी में बैठी चांवल साफ कर रही है।
श्रीकांत - (श्रीकांत थैली उसके पास रखता है। सुनंदा से कहता है।) इसमें ताजी सब्जी है। क्या बनाना है देख कर बना लेना। और छन्नू मन्नू का क्या हाल है।
(श्रीकांत कोठे में आता है। छन्नू - मन्नू मुंह लटकाये बैठे हैं। श्रीकांत उनके पास बैठ जाता है)
श्रीकांत - (छन्नू के सिर पर हाथ फेरते हुए) छन्नू, तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं न?
मन्नू - (श्रीकांत के क्रिया को देख मन्नू मन ही मन बुदबुदाता है) छन्नू की गलती के कारण अब तक भूखा रहना पड़ा और मालिक है कि उसी से हालचाल पूछ रहे हैं।(मन्नू क्रोधित हो जाता है। वह जोर से सिर हिलाता है। श्रीकांत मन्नू की ओर उन्मुख होता है। उसके मुंह पर हाथ फेरता है)
श्रीकांत - (मन्नू को पुचकार कर) मन्नू, इतनी नाराजगी क्यों? सुनंदा ने तुम्हें तंग तो नहीं किया ..?
(श्रीकांत इधर - उधर देखता है। वहां घास नहीं है। पास रखी बाल्टी को झांककर देखता है। उसमें पानी नहीं है)
श्रीकांत - (सुनंदा को आवाज देता है) सुनंदा, अरी सुनंदा, इधर आओ तो ...।
सुनंदा  - अभी आयी ...।
(सुनंदा लंगड़ाती श्रीकांत के पास आती है।)
सुनंदा  - क्यों चिल्ला रहे हो?
श्रीकांत - (छन्नू - मन्नू की ओर संकेत करते हुए ) तुमने इन्हें कुछ खाने नहीं दिया। देखो तो इनके पेट कितना चिपक गया है।
सुनंदा - (श्रीकांत को आहत पैर दिखाती है।) घास डालने आयी थी तो (छन्नू की ओर संकेत करते हुए) छन्नू ने मेरे पैर पर चोट पहुंचाया।
श्रीकांत - तुम्हें थोड़ी सी चोट क्या लगी, इन्हें कठोर दण्ड देने उतारु हो गयी। तुम बड़ी क्रूर हो ?
सुनंदा - तुम्हें चोट लगी रहती तो समझ आता (सुनंदा लंगड़ाती वापस छपरी की ओर बढ़ती है) चोट खाकर भी इनसे लाड़ प्यार करना ही है तो तुम ही करो, मुझसे ऐसा नहीं होगा।
(श्रीकांत आंगन में आता है। वहां रखी घास को लेकर कोठे में लाकर बैलों के सामने डालता है। बाल्टी उठाकर उसमें पानी भर कर लाकर उनके सामने रख देता है। बैल चुपचाप ही बैठे रहते हैं। बैलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। श्रीकांत बैलों के पास बैठ जाता है)
श्रीकांत - (छन्नू - मन्नू से) अगर तुम नहीं खाओगे तो मैं भी भूखा ही रहूंगा।
(छन्नू, मन्नू की ओर देखता है।)
छन्नू - (मन्नू से) मन्नू, देखते हैं - ये कब तक नहीं खायेंगे।
(सुनंदा भोजन तैयार कर चुकी है। वह श्रीकांत को भोजन के लिए आवाज देती है)
सुनंदा - तुम वहां बैठे क्या कर रहे हो? भोजन तैयार हो चुका है। भोजन करने आओ ...।
(आवाज सुनकर भी श्रीकांत  चुपचाप बैठा रहता है। मन्नू, छन्नू की ओर देखता है)
मन्नू - लगता है, मालिक अपनी प्रतीज्ञा साकार करेंगे?
छन्नू - हां, मालिक हमसे बेहद प्रेम करते हैं। यदि हमने इनकी बात नहीं मानी तो इन्हें पीड़ा होगी।
मन्नू - तो हमें घास खा लेना चाहिए ...।
छन्नू - बिलकुल ...
(बैल खड़े हो जाते हैं। वे घास खाने लगते हैं। श्रीकांत खुश हो जाता है)
श्रीकांत - (बैलों की पीठ थपथपाकर) शाबाश, बड़े समझदार हो। हां, छोटी  - छोटी बातों पर नाराज न हुआ करो ...। अब मैं भी भोजन करता हूं ...।
(श्रीकांत कोठे से निकल कर भोजन करने आ जाता है)
श्रीकांत - (सुनंदा से) सुनंदा, चलो, भोजन निकालो ...।
दृष्य परिवर्तन
(सुबह का समय - आंगन में खाट डाल है। श्रीकांत उसमें बैठा है। उसी समय अमित उसके घर आता है)
श्रीकांत - (अमित से) आओ अमित, बैठो ...।
अमित - श्रीकांत, तुम चुपचाप यहां बैठे हो? क्या तुम्हें पता नहीं, आज बजरंगपुर में बैल दौड़ प्रतियोगिता है। चलो, तुम भी अपने बैल छन्नू  - मन्नू को वहां ले चलो।
श्रीकांत - अमित, बजरंगपुर में एक से एक बढ़ कर बैल आते हैं। छन्नू - मन्नू स्पर्धा हार जायेंगे। मेरी नाक कट जायेगी। मुझे बैलों को वहां नहीं ले जाना है।
(छन्नू - मन्नू कोठे में बंधे हैं। आवाज उन तक पहुंचती है)
छन्नू - (मन्नू से) मन्नू, हमारे मालिक को हम पर विश्वास नहीं है। हमें प्रतियोगिता में सम्मलित होने का अवसर तो मिले।
मन्नू - हां छन्नू, हम किसी से क्या कम है? हमें अवसर मिलेगा तो प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करके ही दिखायेंगे।
(बैल जमीन को खुरचते हुए हुंकार भरते हैं। हुंकार की आवाज अमित और श्रीकांत के कानों तक पहुंचती है)
अमित - श्रीकांत, तुम्हारे बैल प्रतियोगिता में भाग लेने उतावले हैं और तुम पीछे हट रहे हो।
श्रीकांत - तुमने ठीक कहा अमित, चलो, छन्नू - मन्नू को भी इस प्रतियोगिता में ले ही जाता हूं। मैं बैलों को सजा लेता हूं। इनके सींग रंग देता हूं। इनके सींग में रंग - बिरंगे फीते एवं मयूर पंख बांध देता हूं। गले में घुंघरु और कौड़ियों की माला बांध देता हूं।
अमित - तुम ठीक कह रहे हो श्रीकांत, इससे बैलों की सुंदरता भी बढ़ जायेगी।
श्रीकांत - अमित, तुम तैयार हो कर आओ, फिर चलते हैं प्रतियोगिता स्थल की ओर ..।
अमित - ठीक है ... मैं तैयार होकर आता हूं।
(अमित, श्रीकांत के घर से निकल जाता है।)
श्रीकांत- (सुनंदा से) सुनंदा, थोड़ा जल्दी भोजन तैयार करना। आज छन्नू - मन्नू को नवागांव ले जाना है। वहां बैल दौड़ प्रतियोगिता है।
सुनंदा - ठीक है ...
दृष्य परिवर्तन
(प्रतियोगिता स्थल - वहां दर्शकों की भीड़ है। कई जोड़े बैल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने लाये गये हैं। सभी बैलों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है। लाउडीस्पीकर से बैल मालिकों के साथ बैल जोड़ियों के नामों की उद्घोषणा की जा रही है। बैल मालिक अपने बैल जोड़ी को लेकर मैदान में उतर रहे हैं। छन्नू - मन्नू के नामों की उद्घोषणा होते ही श्रीकांत बैलों को लेकर प्रतियोगिता मैदान में पहुंच गया। अब सभी प्रतियोगी बैल मैदान में उतर चुके हैं। सीटी बजती है और बैल मालिक अपने -अपने बैलों को दौड़ाने लगते हैं। दर्शक सीटियां एवं तालियां बजाते हैं।
छन्नू - मन्नू भी दौड़ रहे हैं। उनके साथ श्रीकांत भी कांसरा सम्हाले दौड़ रहा है। छन्नू  - मन्नू अन्य बैलों से बहुत पिछड़ गये हैं। श्रीकांत को उन बैलों पर गुस्सा आता है।)
श्रीकांत - (बैलों से झल्लाकर) अब तुम दोनों मेरी नाक कटवा कर ही रहोगे। यदि तुम्हें हारना ही था तो उत्साह क्यों दिखाया?
(मन्नू , छन्नू की ओर देखता है।)
मन्नू - (छन्नू से) छन्नू, हमारे मालिक तो निरुत्साहित हो रहे हैं। अब इसी मरघिन्नी चाल से दौड़ना है कि जोर पकड़ना है?
छन्नू - तुम ठीक कह रहे हो मन्नू। हमारे प्रतिद्वंद्वी बहुत डींग हांक रहे हैं। क्यों न अब इन्हें पछाड़ कर दिखा ही दे?
(छन्नू - मन्नू अपनी चाल बढ़ा देते हैं। वे जोर से दौड़ने लगते हैं। श्रीकांत भी उनके साथ दौड़ता है मगर श्रीकांत घसीटने लगता है। वह कांसरा छोड़ देता है। छन्नू - मन्नू अपने प्रतिद्वंदी को पिछाड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वे स्पर्धा में विजयी हो जाते हैं।
श्रीकांत घसीटाया था तो उसके हाथ - पैर छिल गये है। उसमें से रक्त बह रहा है। लेकिन श्रीकांत का ध्यान उधर नहीं जाता। वह बैलों के पास आता है। उनकी पीठ सहलाने लगता है। श्रीकांत के पास चिकित्सक आता है)
चिकित्सक - श्रीकांत, तुम्हें चोटें आ गयी हैं। उसमें दवाईयां लगवा लो।
श्रीकांत - (हंसकर) डाक्टर साहब, ये कोई खास चोंट नहीं है। फिर दवाई लगवाने का प्रश्र ही नहीं उठता।
अमित - (डाक्टर से) डाक्टर साहब , श्रीकांत को छन्नू - मन्नू पर अविश्वास था पर वे प्रथम पुरस्कार पा गये। इससे इसकी पीड़ा ही मिट गयी है। (श्रीकांत से) क्यों श्रीकांत, मैं ठीक कह रहा हूं न?
श्रीकांत - अमित, तुम तो ...?
अमित - बैलों ने प्रथम स्थान प्राप्त कर जीत हासिल की है तो इस खुशी में मिठाई खिलाओगे भी या नहीं?
श्रीकांत - क्यों नहीं, घर पहुंचने दो। तुम्हें छकते तक मिठाई खिलाऊंगा ...।
दृष्य परिवर्तन (दस वर्ष बाद)
(श्रीकांत आंगन में खाट पर बैठा है। पत्नी सुनंदा छपरी में बैठी है। आंगन के एक कोंटे में छन्नू  - मन्नू बंधे हैं। उनकी पसलियां चमड़े से ऊपर आ गयी हैं। आंखे धंस गयी है। अब छन्नू - मन्नू बूढ़े हो चुके हैं।)
(श्रीकांत के घर अरुण प्रवेश करता है। वह श्रीकांत के पास आता है)
श्रीकांत - (अरुण से) आओ अरुण, बैठो ...।
अरुण - (खाट पर बैठते हुए) श्रीकांत, अब छन्नू - मन्नू बूढ़े हो गये हैं।
श्रीकांत - हां अरुण, पहले ये बुलंद थे। पूरे दस वर्षों तक इन्होंने अथक परिश्रम किया हैं। अब इनमें खेती  - किसानी करने की क्षमता नहीं है। सोचता हूं - नये बैल खरीद लूं।
अरुण - श्रीकांत, अब छोड़ों बैलों के चक्कर, नया युग है तो टै्रक्टर खरीदो। उससे जुताई - मिसाई - ढुलाई सभी काम होते हैं।
श्रीकांत - तुम ठीक कहते हो अरुण। अब की बार ट्रैक्टर ही खरीदूंगा।
दृष्य परिवर्तन
(श्रीकांत का मकान - छन्नू - मन्नू कोठे में है। उनके सामने सूखी घास है। कोठे में गंदगी का साम्राज्य है। छन्नू - मन्नू के शरीर कीचड़ से सने हैं। उनकी पूंछ में मिट्टी का गोला बंध गया है। उनके शरीर में जुएं के छाते बन गये हैं। वहां मच्छर - मक्खियां भिनभिना रही हैं)
छन्नू -(मन्नू से) मित्र मन्नू, वे दिन कितने अच्छे थे जब हम युवा और जवान थे।
मन्नू - हां मित्र छन्नू, पर अब वे दिन सपने हो गये हैं। अब देखो न - मुझे '' तड़कफांस '' की बीमारी हो गयी है पर मालिक ध्यान ही नहीं देते। तीन दिन हो गये, कुछ खाया भी नहीं हूं।
छन्नू - हां, जब हम स्वस्थ और युवा थे तब चिकित्सक आता था। अब असक्त और बीमार हो गये हैं तो मालिक झांक भी नहीं रहे हैं।
मन्नू - दरअसल, अब हमारी उपयोगिता खत्म हो गयी है।
(आंगन में एक ट्रैक्टर खड़ी है। छन्नू - मन्नू उसे हिकारत की दृष्टि से देखते हैं)
मन्नू - जो खर्च हमारे दाना - पानी के लिए होता था वह ट्रैक्टर के डीजल के लिये हो रहा है। हमारी बीमारी दूर करने जो खर्च किया जाता था उससे मिस्त्री बुलाया जा रहा है जो मालिक दिन - रात हमारी सेवा करते थे वे ट्रैक्टर के पीछे दौड़ रहे हैं ...। मित्र, मेरी तबियत बहुत ही बिगड़ती जा रही है। मुझे छटपटाहट सी लग रही है।
(थोड़े समय बाद मन्नू छटपटाने लगता है। छन्नू , मन्नू को छटपटाता देख घबरा जाता है। वह दरवाजे के पास आता है फिर मन्नू के पास आता है फिर दरवाजे के पास जाता है। आंगन की ओर देखकर '' हम्मा - हम्मा '' चिल्लाता है। आवाज श्रीकांत तक पहुंचती है।)
श्रीकांत - (स्वयं से) क्या हो गया बैलों को, जरा देखूं तो ...।
(श्रीकांत कोठे की ओर आता है। मन्नू छटपटाते - छटपटाते शांत पड़ जाता है। श्रीकांत कोठे में आकर देखता है- मन्नू शांत पड़ा है। छन्नू उसे चांट रहा है। उसकी आंखों से अश्रु की धारा बह रही है।)
श्रीकांत - (सुनंदा से) सुनंदा, अरी ओ सुनंदा ...।
सुनंदा - (कोठे की ओर आती है)- क्यों गला फाड़ रहे हो?
श्रीकांत - सुनंदा, देखो तो मन्नू का प्राणांत हो गया लगता है।
सुनंदा - (मन्नू की ओर देखकर) वास्तव में मन्नू मर गया। जाओ, चार लोगों को बुला लाओ। मन्नू के शरीर को बाहर ले जाने के लिए ...।
श्रीकांत - तुम ठीक कहती हो। मैं अभी गया और अभी आया ...।
सुनंदा - मैं यहीं पर हूं ...
(थोड़ी देर बाद श्रीकांत चार पांच ग्रामीणों को लेकर आता है)
एक ग्रामीण - श्रीकांत, इसे तो '' गेड़ा '' लगाकर, घसीटकर ही निकालना पड़ेगा। दो मजबूत लकड़ी की व्यवस्था करो।
(सुनंदा दो लकड़ी लेकर आती है)
सुनंदा - इस लकड़ी से काम चल जायेगा न?
दूसरे ग्रामीण - हां - हां ...। (अन्य ग्रामीणों से) लो भाईयों, गेंड़ा फंसाओ ...।
(एक लकड़ी को मन्नू के सामने वाले भाग में तथा दूसरे लकड़ी को पीछे वाले भाग में फंसाकर, मन्नू को घसीटना शुरु करते हैं। ले देकर मन्नू को कोठे से बाहर निकाला जाता है।)
(जब मन्नू को निर्ममता पूर्वक घसीटा जाता है, दृष्य देखकर छन्नू की आंखों में आंसू आ जाते हैं।)
एक ग्रामीण - (श्रीकांत से)श्रीकांत, इसे 
ट्रैक्टर ट्राली में डाल कर ले जाना पड़ेगा ...।
श्रीकांत - सुनंदा, ट्रैक्टर की चाबी ले आओ, अरुण, लो चाबी, तुम्हीं ट्रैक्टर को चलाना ...।
(ग्रामीण मन्नू को ट्रैक्टर की ट्राली में खींच खांच कर डालते है। फिर टैक्टर से मन्नू के शव को बाहर की ओर ले जाया जाता है)
सूत्रधार - (अब कोठे में छन्नू अकेला है। मन्नू की मृत्यु से वह व्यथित है। उसे मन्नू के साथ व्यतीत किये क्षणों की याद आ रही है। वह बेचैनी से कभी उठता है। कभी बैठता है। कभी दरवाजे तक आता है। कभी कोठे के किसी कोंटे में विचलित खड़ा हो जाता है। वह कोठे में स्वयं से लड़ रहा था।
श्रीकांत वापस आता है। उसके हाथ में एक जोड़ा जूता है)
श्रीकांत - (सुनंदा को आवाज देता है) सुनंदा, तुम झंगलू को जानती हो न ? वह मन्नू का चमड़ा उतारेगा। उसके बदले मुझे ये जूते पहनने को मिले ...।
(छन्नू भी जूतों को देखता है।)
छन्नू - (स्वयं से) हम कितने भाग्यवान है कि मरने के बाद भी अपने मालिकों के पैरों में कांट न चुभे उसकी व्यवस्था कर जाते हैं।
दृष्य परिवर्तन
(दोपहर का समय- आंगन में डले खाट पर श्रीकांत बैठा है। पास ही जमीन पर सुनंदा बैठी है। बाहर कालू की आवाज आती है।)
कालू - लो, बूढ़े  - असक्त और अपंग जानवरों को बेच डालो ...।
(आवाज श्रीकांत एवं सुनंदा के कानों तक पहुंचती है।)
श्रीकांत - सुनंदा, लगता है कालू आया है। वह बूढ़े और असक्त जानवरों को खरीदता है। सोचता हूं - क्यों न छन्नू को बेच दूं।
सुनंदा - बेच ही डालो न। घर में पड़े - पड़े धन तो देगा नहीं । हां, पैरा - भूसा में व्यर्थ पैसा जाता रहेगा । पर मुझे एक बात समझ नहीं आती- ये कालू बूढ़े और असक्त जानवरों का करता क्या होगा?
श्रीकांत - तुम भी व्यर्थ की बात करती हो। वह क्या करता होगा, वह जाने, इससे हमें क्या लेना - देना ।
श्रीकांत (श्रीकांत, खाट से उतर कर बाहर की ओर जाता है। वह कालू को आवाज देता है)- कालू, ऐ कालू ...।
कालू - (श्रीकांत के) अभी आया ...। (श्रीकांत के पास आकर) बोलो, कैसे याद किया...।
श्रीकांत - मेरे पास एक बूढ़े बैल है। उसे बेचना है...।
कालू- चलो, देख लेता हूं।
(श्रीकांत के साथ कालू उसके घर आता है)
कालू - कहां है बैल ...?
श्रीकांत - कोठे में, (कोठे की ओर कदम बढ़ाते हुए) आओ न...।
(कालू, श्रीकांत के साथ कोठे में घुस जाता है। छन्नू मिट्टी से सने,मुंह लटकाये बैठा है)
कालू - अरे, इसके शरीर में तो किलो भर मांस नहीं है। चलो फिर भी एक हजार में खरीद ही लूंगा। समझो, लाश खरीद रहा हूं।
श्रीकांत - कालू, तुम पानी के मोल तो न मांगों ...।
कालू - दो सौ रुपये और सही ... इससे एक रुपये अधिक नहीं दूंगा ...।
श्रीकांत - कालू, पन्द्रह सौ देकर इस बला को तो ले ही जाओ ...।
कालू - (कालू, थैली से रुपये निकालता है। जबरदस्ती श्रीकांत के हाथ में थमा देता है) लो, चौदह सौ हैं, अब इससे और अधिक नहीं दे सकता ...।
श्रीकांत - (श्रीकांत रुपये ले लेता है।) चलो, ठीक है ...।
(कालू, छन्नू के निकट आता है। वह छन्नू की पसलियों में लाठियां बेधता है। छन्नू खड़ा हो जाता है। कालू उसे ढकेलकर कोठे से बाहर निकालने का प्रयास करता है। पर छन्नू कोठे से बाहर ही नहीं निकलता।
कालू एक मोटी रस्सी छन्नू के गले में बांध देता है। उसे खींचता है। रस्सी खींचने से छन्नू का गला कस जाता है। उसे पीड़ा होती है। छन्नू पुनः बैठ जाता है
श्रीकांत दृष्य देखता है। कालू की निर्दयता उसमें उथल - पुथल मचा देता है। उसमें विचार उठता है)
श्रीकांत - (स्वयं से) जब छन्नू युवा था तो मैंने इसकी खूब सेवा की। इसने अपने परिश्रम से मेरे सारे कर्ज छूट डाले। अब यह बूढ़ा और असक्त है तो मैं तिरस्कृत कर रहा हूं ... तो क्या डूबते सूरज को प्रणाम न करने की परम्परा को यथावत रहने दे ? नहीं - नहीं, स्वार्थ की भी सीमा होना चाहिए ...।
(कालू, छन्नू को मारने लाठी उठाता है। लाठी छन्नू पर गिराने होता है कि श्रीकांत उसे रोकता है)
श्रीकांत - कालू ...।
(कालू का हाथ ऊपर ही रुक जाता है। वह छन्नू पर प्रहार करने के बदले हाथ नीचे कर लेता है। श्रीकांत उसकी ओर रुपये बढ़ा देता है)
श्रीकांत - कालू, तुम ये रुपये रखो, मुझे छन्नू को नहीं बेचना है ...।
(कालू रुपये लेते हुए श्रीकांत के चेहरे को आश्चर्य से देखते रह जाता है।)
 
गली नं 5, एकता चौंक 
ममता नगर, राजनांदगांव (छ:ग)

शनिवार, 27 मई 2023

एक आदिम रात्रि की महक


 एकांकी रूपान्तरण:- सीताराम पटेल सीतेश

 पात्र परिचय

करमा:- एक अनाथ लड़का
धरमा:- करमा की छाया
बाबू:- रेलवे कर्मचारी
गोपाल बाबू:- रेलवे कर्मचारी
बौमा:- गोपाल बाबू की पत्नी
पानी पाँड़े:- रेलवे कर्मचारी
पैटमान:- रेलवे कर्मचारी
भैंसवार:- गांव का भैंसवाला
बूढ़ा:- एक का आदमी
बूढ़ी:-बूढ़ा की पत्नी
सरसतिया:- बूढ़ा की बेटी
लखमी:- बूढ़ी की पड़ोसी
कुत्ता:- करमा का साथी
भालूवाला:- मदारी
भालू:- पालतू जानवर

दृश्य: 01
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- रात्रि बारह बजे
( दोनों अलग अलग लोहे के खाट में सो रहे हैं, दोनों को नींद नहीं आ रही है।)
करमा:- (मन ही मन) न --- मुझको नींद नहीं आएगी। नए मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चवन्नी भर दर्द चिनमिनाता रहता है। पुराने लाइन के पुराने इस्टिसन सब हजार पुराने हों, वहाँ नींद तो आती है। ---- ले नाक के अंदर फिर सुड़सुड़ी जगी ससुरी---!
( करमा छींकने लगा। नए मकान में उसकी छींक गूँज उठी।)
बाबू :- (करवट लेते हुए पूछा) करमा, नींद नहीं आती?
करमा:- (गमछे से नथुने को साफ करते हुए) यहाँ नींद कभी नहीं आएगी, मैं जानता था, बाबू!
बाबू:- मुझे भी नींद नहीं आएगी।(सिगरेट सुलगाते हुए) नई जगह में पहली रात मुझे नींद नहीं आती।
करमा:- (मन ही मन) नए पोख्ता मकान में बाबू को भी चूने की गंध लगती है, क्या? कनपटी के पास दर्द रहता है हमेशा क्या?
बाबू:- (गीत गुनगुनाने लगा) सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है, न हाथी है, न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।
(एक कुत्ता गश्त लगाता हुआ आया और बरामदे के पास आकर रुक गया। करमा चुपचाप कुत्ते की नीयत को ताड़ने लगा।  कुत्ते ने बाबू की खटिया की ओर थुथना ऊँचा करके हवा में सूँघा। आगे बढ़ा।)
करमा:- (मन ही मन )जरूर जूता-खोर कुत्ता है साला! नहीं ,सिर्फ सूँघ रहा था।
( कुत्ता अब करमा की ओर मुड़ा। हवा को सूँघने लगा। फिर मुसाफिरखाने की ओर दुलकी चाल से चला गया।)
बाबू:- तुम्हारा नाम करमा है या करमचंद या करमू?
करमा:-(मन ही मन ) सात दिन रहने के बाद, आज आधी रात के पहर में बाबू ने दिल खोलकर एक सवाल के जैसा सवाल किया है। (प्रकट) बाबू नाम तो मेरा करमा ही है, वैसे लोगों के हजार मँुह है, हजार नाम कहते हैं। निताय बाबू कोरमा कहते थे, घोस बाबू करीमा कहकर बुलाते थे, सिंघ जी ने सब दिन कामा ही कहा और असगर बाबू तो हमेशा करम करम कहते थे। खुश रहने पर दिल्लगी करते थे- हाय मेरे करम! नाम में क्या है बाबू? जो मन में आए कहिए। हजार नाम---!
बाबू:- तुम्हारा घर संथाल परगना में है, या राँची-हजारीबाग की ओर?
करमा:- ( अचकचा कर, मन ही मन) घर? जहाँ धड़, वहाँ घर। माँ-बापजी- भगवान जी! लेकिन बाबू को ऐसा जवाब तो नहीं दे सकता! बाबू आप भी खूब हैं। नाम का अरथ निकालकर अनुमान लगा लिया। घर संथाल परगना में है, या राँची- हजारीबाग की ओर होगा, किसी गाँव में? करमा-पर्व के दिन जन्म हुआ होगा, इसलिए नाम करमा पड़ा। माथा, कपाल, होंठ और देह की गठन देखकर भी---। बाबू तो बहुत गुनी मालूम होते हैं। अपने बारे में करमा को कुछ मालूम नहीं। और बाबू नाम और कपाल देखकर सब कुछ बता रहे हैं। इतने दिन बाद एक बाबू मिले है, गोपाल बाबू जैसे!
(प्रकट) बाबू, गोपाल बाबू भी यही कहते थे! यह करमा नाम गोपाल बाबू का ही दिया हुआ है! गोपाल बाबू कहते थे, आसाम से लौटती हुई कुली-गाड़ी में एक डोको के अंदर तू पड़ा था, बिना बिलटी-रसीद के ही--- लावारिस माल। ( बाबू का नाक बजता है।) चलो बाबू को नींद आ गई। नाक बोलने लगी। गोपाल बाबू का किस्सा अधूरा रह गया। (कुतवा फिर गस्त लगाता हुआ आया।) यह कातिक का महीना है न! ससुरा पस्त होकर आया है। हाँफ रहा है। ले, तू भी यहीं सोएगा? ऊँह साले की गंध यहाँ तक आती है-धेत्त!धेत्त!
बाबू:-(जगकर) हूँ-ऊ-ऊ! तब क्या हुआ तुम्हारे गोपाल बाबू का?
( कुत्ता बरामदे के नीचे चला गया। उलटकर देखने लगा। गुर्राया। फिर दो-तीन बार दबी आवाज में बुफ-बुफ कर जनाने मुसाफिरखाने की अंदर चला गया। जहाँ पैटमान जी सोता है।)
करमा:- बाबू सो गए क्या? चलो बाबू को नींद आ गई! बाबू की नाक ठीक बबुआनी आवाज में डाकती है! पैटमान जी तो लगता है, लकड़ी चीर रहे हैं। गोपाल बाबू की नाक बीन-जैसी बजती थी- सुर में!! असगर बाबू का खर्राटा --, सिंघ जी फुफकारते थे और साहू बाबू नींद में बोलते थे- ए- डाउन दो, गाड़ी छोड़ा!
दृश्य परिवर्तन
( करमा सपना देख रहा है।)
(तार की घंटी! स्टेशन का घंटा! गार्ड साहब की सीटी! इंजिन की बिगुल! जहाज का भोंपा! सैकड़ों सीटियाँ-- बिगुल ---भोंपा--भों-ओं-ओं-ओं--!
हजार बार लाख कोशिश करके भी अपने को रेल के पटरी से अलग नहीं कर सका, करमा। वह छटपटाया। चिल्लाया, मगर जरा भी टस-से-मस नहीं हुई उसकी देह। वह चिपका रहा। धड़धड़ाता हुआ इंजिन गरदन और पैरों को काटता हुआ चला गया। लाइन के एक ओर उसका सिर लुढ़का हुआ पड़ा था, दूसरी ओर दोनों पैर छिटके हुए! उसने जल्दी से अपने कटे हुए पैर को बटोरा- अरे, यह तो एंटोनी गाट साहब के बरसाती जूते का जोड़ा है! गम-बूट! उसका सिर क्या हुआ? धेत्त, धेत्त! ससुरा नाक कान चबा रहा है! )
बाबू:- करमा!
करमा:- ( सोते हुए)धेत्त! धेत्त!
बाबू :- उठ करमा, चाय बना?
करमा:- (धडपड़ाकर उठकर बैठा) ले बिहान हो गया। मालगाड़ी को थुरू-पास करके पैटमान जी हाथ में बेंत की कमानी घुमाता हुआ आ रहा है। साला! ऐसा भी सपना होता है, भला? बारह साल में, पहली बार ऐसा अजूबा सपना देखा हमने। बारह साल में एक दिन के लिए रेलवे-लाइन से दूर नहीं गया। इस तरह एकसिडंटवाला सपना कभी नहीं देखा उसने!
( परदा गिरता है।)

दृश्य: 02
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन छह बजे
( करमा धरमा से बातचीत कर रहा है।)
करमा:- मैं रेल कंपनी का नौकर नहीं। मैं चाहता तो पोटर, खलासी पैटमान या पानी पाँडे की नौकरी मिल सकती थी। खूब आसानी से रेलवे-नौकरी में घुस सकता था। मगर मन को कौन समझाए! मन माना नहीं! रेल-कंपनी का नीला कुर्ता और इंजिन-छाप बटन का शौक मुझे कभी नहीं हुआ।
धरमा:- क्यों नहीं हुआ करमा?
करमा:- रेल कंपनी क्या, किसी भी नौकरी मैंने कभी नहीं की।
धरमा:- क्या काम करते हो?
करमा:- नाम धाम पूछने के बाद सभी लोग पेशे के बारे में पूछते हैं।  मैं एक ही  जवाब देता है कि मैं बाबू के साथ रहता हूँ। एक पैसा भी मुसहरा न लेने वाले को नौकर तो नहीं कह सकते।
धरमा:- तुम्हारी कहानी मजेदार है करमा? और सुनाओ ना।
करमा:- गोपाल के साथ, लगातार पाँच वर्ष! इसके बाद कितने बाबुओं के साथ रहा, यह गिनकर बतलाना होगा! लेकिन एक बात है- रिलिफिया बाबू को छोड़कर किसी सालटन बाबू के साथ नहीं रहा। सालटन बाबू माने किसी टिशन में परमानंटी नौकरी करने वाला -फैमिली के साथ रहनेवाला! जा रे गोपाल बाबू! वैसा बाबू कहाँ मिले, मेरा माय बाप भाय बहिन कुल परिवार जो बूझिए - सब गोपाल बाबू! बिना बिलटी रसीद के लावारिस माल था, मैं! रेलवे अस्पताल से छुड़ाकर अपने साथ रखा, गोपाल बाबू ने। जहाँ जाते मैं जाता। जो खाते, मैं भी खाता। लेकिन आदमी की मति को क्या चाहिए, रिलिफिया काम छोड़कर सालटनी काम में गए। फिर एक दिन शादी कर बैठे। बौमा गोपाल की फैमिली - राम हो राम! वह औरत थी? साच्छात चुड़ैल! दिन भर गोपाल बाबू ठीक रहते। साँझ पड़ते ही उनकी जान चिड़िया की तरह लुकाती फिरती। आधी रात को कभी कभी इसपेसल पास करने के लिए बाबू निकलते। लगता, अमेरिकन रेलवे इंजिन के बायलर में कोयला झोंककर निकले हैं, मैं क्वाटर के बरामदे पर सोता था। तीन महीने तक रात में नींद नहीं आई कभी। बौमा फों फों करती - बाबू मिनमिनाकर कुछ बोलते। फिर शुरू होता रोना कराहना गाली गलौज। मारपीट। बाबू भागकर बाहर निकलते और वह औरत झपटकर माथे को केश पकड़ लेती। तब मैंने एक उपाय निकाला। ऐसे समय में मैं  उठकर दरवाजा खटखटा कर कहता-
दृश्य परिवर्तन
 करमा:- बाबू इसपेसल का कल बोलता है। बाबू की जान कितने दिनों तक बचाता मैं?
(बौमा एक दिन चिल्लाई)
बौमा:- ए छोकरा हरामजादा को दूर कोरो। यह चोर है, चो-ओ-ओ-र!
दृश्य परिवर्तन
करमा:- इसके बाद से ही किसी टिसन के फैमिली क्वाटर को देखते ही मेरे मन में एक पतली आवाज गूँजने लगती है- चो-ओ-ओ-र! हरामजादा! फैमिली क्वाटर ही क्यों- जनाना मुसाफिरखाना, जनाना दर्जा, जनाना- जनाना नाम से ही मुझको  उबकाई आने लगती है।  ( चुप हो जाता है , जैसे कुछ याद कर रहा हो।)
धरमा:- फिर क्या हुआ धरमा?
करमा:- एक ही साल में गोपाल बाबू को हाड़ गोड़ सहित चबाकर खा गई, वह जनाना! फूल जैसे सुकुमार गोपाल बाबू! जिन्दगी में पहली बार फूट-फूटकर रोया था, मैं।  रमता जोगी, बहता पानी और रिलिफिया बाबू ! हेड-क्वाटर में चैबिस घंटे हुए कि परवाना कटा- फलाने टिसन का मास्टर बीमार है, सिक रिपोट आया है। तुरत जोआयेन करो। रिलिफिया बाबू का बोरिया बिस्तर हमेशा रेडी रहना चाहिए। कम से कम एक सप्ताह, ज्यादा से ज्यादा तीन महीने से ज्यादा किसी एक जगह में जमकर नहीं रह सकता, कोई रिलिफिया बाबू। लकड़ी के एक बक्से में सारी गृहस्थी बन्द करके - आज यहाँ, कल वहाँ।  पानीपाड़ा से भातगाँव, कुरैठा से रौताड़ा। फिर हेड क्वाटर कटिहार!
( चुप हो जाता है , जैसे कुछ याद कर रहा हो।)
धरमा:- आज मुझे जिन्दगी में पहली बार इतना मजा आ रहा है। आगे सुनाओ।
करमा:- गोपाल बाबू ने ही घोस बाबू के साथ लगा दिया था- खूब भालो बाबू। अच्छी तरह रखेगा। लेकिन घोस बाबू के साथ एक महीना से ज्यादा नहीं रह सका करमा। घोस बाबू की बेवजह गाली देने की आदत ! गाली भी बहुत खराब खराब! माँ बहन की गाली। इसके अलावा घोस बाबू में कोई ऐब नहीं था। अपने समांग की तरह रखते थे। घोस बाबू आज भी मिलते हैं तो गाली से ही बात शुरू करते हैं। की रे --करमा? किसका साथ में हैं आजकल मादर्च---? घोस बाबू को माँ बहन की गाली देने वाला कोई नहीं। नही ंतो समझते कि माँ बहन की गाली सुनकर आदमी का खून किस तरह खौलने लगता है। किसी भले आदमी को ऐसी खराब गाली बकते नहीं सुना है करमा ने आज तक।
धरमा:- ओ हो बहुत ज्यादा मजा आ रहा है करमा। आगे सुनाओ।
करमा:- राम बाबू की सब आदत ठीक थी। लेकिन भा-आ-री इस्की आदमी। जिस टिसन में जाते, पैटमान पोटर सूपर को एकांत में बुलाकर घुसुर फुसुर बतियाते। फिर रात में कभी मालगोदाम की ओर तो कभी मुसाफिर खाना की में, तो कभी जनाना पैखाना में -छिः-छिः -- जहाँ जाते छुछुआते रहते। क्या जी असल-माल-वाल का कोई जोगाड़ अंतर नहीं लगेगा। आखिर वही हुआ जो मैंने कहा था- माल ही उनका काल हुआ। पिछले साल जोगबनी लाइन में एक नेपाली ने खुकरी से दो टुकड़े काटकर रख दिया। और उड़ाओ माल! जैसी अपनी इज्जत वैसी पराई!
धरमा:- यही तो मजा है, नौकरी वालों के साथ रहने पर, खाना और मनोरंजन और क्या चाहिए जीवन में करमा।
करमा:- (अपने मग्न होकर कहे जा रहा है।) सिंघ जी भारी पुजेगरी! सिया सहित राम-लछमन की मूर्ति हमेशा उनकी झोली में रहती थी। रोज चार बजे से ही नहाकर घंटी हिलाते रहते। इधर कल की घंटी बजती। जिस घर में ठाकुर की झोली रहती, उसमें बिना नहाए कोई पैर भी नहीं दे सकता था। कोई अपनी देह को उस तरह बाँधकर हमेशा कैसे रह सकता है। कौन दिन में दस बार नहाए और हजार बार पैर धोए! सो भी जाड़े के मौसम में। जहाँ कुछ छुओ कि हूँहूँहूँ- हाँहाँहाँ- अरेरेेरे- छू दिया न? ऐसे छुतहा आदमी को रेल कंपनी में आने की क्या जरूरत? सिंघ जी का साथ नहीं निभ सका।
धरमा:- आगे क्या हुआ?
करमा:- साहू बाबू दरियादिल आदमी थे। मगर मदक्की ऐसे कि दिन-दोपहर को पचास-दारू एक बोतल पीकर माल गाड़ी को थुरूपास दे दिया और गाड़ी लड़ गई। करमा को याद है, एक्सिडन्ट की खबर सुनकर साहू बाबू ने फिर एक बोतल चढ़ा लिया। आखिर डॉक्टर ने दिमाग खराब होने का साटिफिकेट दे दिया। लेकिन उस एकसिडंट के समय भी किसी रात को मैंने ऐसा सपना नहीं देखा!
( परदा गिरता है।)
दृश्य:03
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन सात बजे
करमा:- (मन ही मन) न भोर भोर ऐसी कुलच्छन भरी बात बाबू को सुनाकर ठीक नहीं किया। रेलवे की नौकरी में अभी तुरत घुसवै किए हैं। न बाबू के मिजाज का टेर पता अब तक करमा को नहीं मिला है। करीब एक सप्ताह तक साथ रहने के बाद कल रात में पहली बार दिल खोलकर दो सवाल- जवाब किया बाबू ने। इसीलिए सुबह को करमा ने दिल खोलकर अपने सपने की बात शुरू की थी।
( चाय की प्याली सामने रखने के बाद उसने हँसकर कहा)
हँह बाबू , रात में हम एक अ-जू-ऊ-ऊ-बा सपना देखा। धड़धड़ाता इंजिन -- लाइन पर चिपकी हमारी देह टस-से-मस नहीं--- सिर इधर और पैर दोनों लाइन के उधर -- एंटोनी गाट साहेब का जूते का जोड़ा--- गमबोट---।
बाबू:- धेत्त ! क्या बेसिर-पैर की बात करते हो, सुबह सुबह? गाँजा -वाँजा पीता है क्या?
करमा:- (मन ही मन) करमा ने बाबू को सपना की बात सुनाकर अच्छा नहींे किया।
(करमा उठकर ताखे पर रखे हुए आईने में अपना मुँह देखने लगा।  उसने अ-जू-ऊ-ऊ-बा  कहकर देखा।)
छिः उसके होंठ तीतर की चोंच की तरह।
(पानी पाँड़े आता है।)
पानी पॉड़े:- का करमचन? का बन रहा है?
करमा:-( मन ही मन) पानी पाँड़े ? यह पानी पाँड़े भला आदमी है। पुरानी जान पहचान है इससे, करमा की। कई टिसन में संगत हुआ है। लेकिन यह पैटमान लटपटिया आदमी मालूम होता है। हर बात पर पुच पुचकर हँसने वाला।
पानी पॉड़े:- करमचन, बाबू कौन जाति के हैं?
करमा:- क्यों? बंगाली हैं।
पानी पॉड़े:-  भैया बंगाली में भी साढ़े-बारह बरन के लोग रहते हैं।
करमा:- पानी पॉड़े  जी, सो तो मैं नहीं जानता। मगर बहुत गुनी आदमी हैं। आपका नाम का मतलब निकालकर- चेहरा देखकर सब कुछ बता देंगे। लीजिए, घंटी पड़ गई दुब्ज्जी गाड़ी की, और मेरी तरकारी अभी तक चढ़ी नहीं है।
पानी पॉड़े:-  (जाते जाते कहा) थोड़ी तरकारी बचाकर रखना करमचन!
( पानी पॉड़े जाता है।)

करमा:- (मन ही मन) घर कहाँ? कौन जाति? मनिहारी घाट के मस्तान बाबा का सिखाया हुआ जवाब, सभी जगह नहीं चलता, हरि के भजे सो हरि का होई! मगर हरि की भी जाति थी! ले यह घटही गाड़ी का इंजन कैसे भेज दिया लाइन में आज? संथाली-बाँसी जैसी पतली सीटी-सी-ई-ई!!
( धरमा आता है।)
धरमा:- करमा भाई! और कुछ कुछ सुनाओ?
करमा:- ले फक्का! एक भी पसिंजर नहीं उतरा, इस गाड़ी से भी। काहे को इतना खर्चा करके रेल कंपनी ने यहाँ टिसन बनाया, मेरे के बुद्धि में नहीं आता। फायदा? बस नाम ही आमदपुरा है- आमदनी नदारद। सात दिन में दो टिकट कटे हैं और सिर्फ पाँच पसिंजर उतरे हैं, तिसमें दो बिना टिकट के। इतने दिन के बाद पंद्रह बोरा बैंगन उस दिन बुक हुआ। पंद्रह बैंगन देकर ही काम बना लिया, उस बूढ़े ने। उस बैंगनवाले की बोली बानी अजीब थी। मुझसे खुलकर गप करना चाहता था बूढ़ा। घर कहाँ है? कौन जाति? घर में कौन कौन हैं? मैंने सभी सवालों का एक ही जवाब दिया था- ऊपर की ओर दिखलाकर! बूढ़ा हँस पड़ा था। अजीब हँसी! घटही -गाड़ी! सी-ई- ई-!!
धरमा:- तुम्हारी बातों में मुझे बहुत रस मिल रहा है, तुम्हारी बातें गन्ने की रस की तरह मीठे हैं, करमा।
करमा:- मनियारी घाट टिसन में भी रहा हूँ, तीन महीने तक एक बार, एक महीने में दूसरी बार। इसकी बात निराली है। कहाँ मनियारी घाट और कहाँ आदमपुरा का यह पिद्दी टिसन। नई जगह में नए टिसन पर पहंुॅचकर आसपास के गाँवों में एकाध चक्कर घूमे फिरे बिना मुझको न जाने कैसा कैसा लगता है। लगता है अंधकूप में पड़ा हुआ है। वह डिसटन-सिंगल के उस पार दूर दूर तक खेत फैले हैं। वह काला जंगल ताड़ का वह अकेला पेड़, आज बाबू को खिलाकर मैं निकलूँगा। इस तरह बैठे सहने से उसके पेट का भात नहीं पचेगा। यदि गाँव भर और खेत का मैदान में नहीं घूमता-फिरता तो वह पेड़ पर चढ़ना कैसे सीखता? तैरना कहाँ सीखता?
धरमा:- आम के रस की तरह तुम्हारे बोल लग रहे हैं। सुनाओ सुनाओ कुछ और सुनाओ, करमा।
करमा:- लखपतिया टिसन का नाम कितना जब्बड़ है! मगर टिसन पर एक सत्तू-फरही की भी दुकान नहीं। आसपास में पाँच कोस कोई गाँव नही। मगर टिसन से पूरब जो दो पोखरे हैं, उन्हें कैसे भूल सकता है मैं? आईना की तरह झलमलाता पानी। बैसाख महीने के दोपहरी में, घंटों गले भर पानी में नहाने का सुख! मुँह से कहकर बताया नहीं जा सकता! मुदा, कदमपुरा - सचमुच कदमपुरा है। टिसन से शुरू करके गाँव तक हजारों कदम के पेड़ हैं। कदम की चटनी खाए एक युग हो गया।
धरमा:- संजय जैसे तुम्हारी बातें लग रही है, करमा।
करमा:- वारिसगंज टिसन, बीच कस्बा में है। बड़े बड़े मालगोदाम हजारों गाँठ-पाट, धान-चावल के बोरे, कोयले सीमेंट चूना की ढेरी। हमेशा हजारों लोगों की भीड़! करमा को किसी का चेहरा याद नहीं। लेकिन टिसन से सटे उत्त्र की मैदान में तंबू डालकर रहनेवाले गदहावाले मगहिया डोमों की याद हमेशा आती है। घाघरीवाले औरतें हाथ में बड़े बड़े कड़े, कान के झूमके, नंगे बच्चो, कान में गोल गोल कुंडल वाले मर्द! उनके मुर्गे! उनके कुत्ते!
धरमा:- नाम तो मेरा धरम है, पर तुम धरम कर रहे हो करमा। आदमी को कर्म को ही पूजा समझना चाहिए और कर्म करते रहना चाहिए। आगे सुनाओ।
करमा:-बथनाहा टिसन के चारों ओर हजार घर बन गए हैं। कोई परतीत करेगा कि पाँच साल पहले बथनाहा टिसन पर दिन दोपहर को टिटही बोलती थी। कितनी जगहों कितने लोगों को याद आती है। सोनबरसा का आम, कालूचक की मछलियाँ, भटोतर की दही, कुसियारगांव का ऊख। मगर सबसे ज्यादा याद आती है मनिहारीघाट की टिसन। एक तरफ धरती दूसरी ओर पानी। इधर रेलगाड़ी, उधर जहाज। इस पार खेत-गाँव मैदान, उस पार साहेबगंज कटरोटिया का नीला पहाड़। नीला पानी-सादा बालू! तीन एक चार! चार महीने तक तीसों दिन गंगा में नहाया है करमा। चार जनम तक पाप का कोई असर नहीं होना चाहिए। इतना बढ़िया नाम शायद ही किसी टिसन का होगा - मनिहार। बलिहारी! मछुवे जब नाव से मछलियाँ उतारते तो चमक के मारे करमा की आँखें चैंधिया जाती। रात में उधर जहाज चला जाता-धु धु करता हुआ। इधर गाड़ी छकछकाती हुई कटिहार की ओर भागती। अजू साह की दुकान की झाँपी बंद हो जाती। तब घाट पर मस्तान बाबा की मंडली जुटती।
धरमा:- ऐसी बातें रोज रोज सुनने को मिले तो, आदमी खाना भूल जाए।
करमा:- मस्तान बाबा  कुली कुल के थे। मनिहारी घाट पर कुली का काम करते थे। एक बार मन ऐसा उदास हो गया कि दाढ़ी और जटा बढ़ाकर बाबाजी हो गए। खंजड़ी बजाकर निरगुन गाने लगे। बाबा कहते- घाट घाट का पानी पीकर देखा- सब फीका। एक गंगाजल मीठा। बाबा एक चिलम गाँजा पीकर पाँच किस्सा सुना देते। सब बेद पुरान का किस्सा ! मैंने ग्यान की दो चार बोली मनियारी घाट पर ही सीखाीं। मस्तान बाबा के सत्संग में। लेकिन गाँजा में उसने कभी दम नहीं लगाया। आज बाबू ने झुँझलाकर जब कहा, गाँजा- वाँजा पीते हो क्या, तो करमा को मस्तान बाबा  की याद आई। बाबा कहते - हर जगह की अपनी खुशबू-बदबू होती है! इस आदमपुरा की गँध के मारे मुझको खाना- पीना नहीं रुचता। मस्तान बाबा को बाद देकर मनिहारीघाट की यााद कभी नहीं आती।
(परदा गिरता है।)
दृश्य: 04
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन दो बजे
( करमा ने ताखे पर रखे आईने में फिर अपना मुखड़ा देखा। उसने आँखें अधमुँदी करके दाँत निकालकर हँसते हुए मस्तान बाबा  के चेहरे की नकल उतारने की चेष्टा की। - मस्त रहो! सदा आँख कान खोलकर रहो। धरती बोलती है। गाछ- बिरिच्छ भी अपने को पहचानते हैं। फसल को नाचते देखा है कभी। रोते सुना है कभी अमावस्या की रात को? है--है--- है--- मस्त रहो। करमा को क्या पता कि बाबू पीछे खड़े होकर सब तमाशा देख रहे हैं। बाबू ने अचरज से पूछा।)
बाबू:- तुम जगे जगे खड़े होकर भी सपना देखता है? कहता है कि गांजा नहीं पीता?
(सचमुच वह खड़ा खड़ा सपना देखने लगा था। मस्तान बाबा का चेहरा बरगद की पेड़ की रह बड़ा होता गया। उसकी मस्त हँसी आकाश में गूँजने लगी। गाँजा का धुआँ उड़ने लगा। गंगा की लहरें आईं। दूर जहाज का भोंपा सुनाई पड़ा- भों-ओं-ओं!
बाबू:- खाना परोसो।  देखूँ, क्या बनाया है? तुमको लेकर भारी मुश्किल है। ( पहला कौर निगलकर) लेकिन खाना तो बहुत बढ़िया बनाया है। खाना बनाना किसने सिखलाया तुमको? गोपाल की घरवाली ने?
करमा:- गोपाल की घरवाली? माने बौमा? बौमा का मिजाज तो इतना खट्टा था कि बोली सुनकर कड़ाही का ताजा दूध फट जाए। वह किसी को क्या सिखावेगी? फूहड़ औरत?
बाबू:- और यह बात बनाना किसने सिखलाया तुमको?
करमा:- बाबू सिखलाएगा कौन? सहर सिखाए कोतवाली!
बाबू:- तुम्हारी बीबी को खूब आराम मिलेगा।
करमा:- बाबू, आज हमको जरा छुट्टी चाहिए।
बाबू:- छुट्टी! क्यों? कहाँ जाएगा?
करमा:- ( हाथ से इशारा ) जरा उधर घूमने फिरने।
( पैटमान पुकारता है।)
पैटमान:- करमा ! बाबू को बोलो कल बोलता है।
दृश्य: 05
(करमा सोचते हुए जा रहा है।)
करमा:- तुम्हारी बीबी को आराम होगा! करमा की बीबी! वारिसगंज टिसन मगहिया डोमों के तंबू। उठती उमेरवाली छौंड़ी। नाक में नथिया। नाक और नथिया में जमे हुए काले मैंले। पीले दाँतों में मिस्सी!! करमा अपने हाथ का बना हुआ हलवा-पूरी उस छौंड़ी को नहीं खिला सका। एक दिन कागज की पुड़िया में ले गया। लेकिन वह पसीने से भीग गया। उसकी हिम्मत नहीं हुई। यदि वह छौंड़िया चिल्लाने लगे कि तुम हमको चुरा छिपाकर हलवा काहे खिलाता है? ओ--मइयो-यो-यो-यो-यो। बाबू हजार कहे ? करमा का मन नहीं मानता कि उसका घर संथाल परगना या राँची की ओर कहीं होगा। मनिहारीघाट में दो दो बार रह आया है वह। उस पार के साहेबगंज कजरौटिया के पहाड़ ने उसको अपनी ओर नहीं खींचा कभी! और वारिसगंज, कदमपुरा, कालूचक, लखपतिया का नाम सुनते ही उसके अंदर कुछ झनझना उठता है। जाने-पहचाने, अचीन्हे, कितने लोगों की भीड़ लग जाती है। कितनी बातें सुख-दुख की! खेत खलिहान, पेड़-पौधे, नदी पोखरे, चिरई-चुरमुन- सभी एक साथ टानते हैं, मुझकोे! सात दिन से वह काला जंगल और ताड़ का पेड़ उसको इशारे से बुला रहा है। जंगल के ऊपर आसमान में तैरती हुई चील आकर करमा को क्यों पुकार जाती है? क्यों?
(रेलवे हाता पार करने के बाद भी कुत्ता नहीं लौटा तो करमा ने झिड़की दी।)
करमा:- तू कहाँ जाएगा ससुर? जहाँ जाएगा झाँव-झाँव करके कुत्ते दौड़ेंगे। जा! भाग! भाग!!
( कुत्ता रुककर करमा को देखने लगा। धनखेतों से गुजरनेवाली पगडंडी पकड़कर करमा चल रहा है। धान की बालियाँ अभी फुटकर निकली नहीं हैं। )
करमा:-  इनको देखकर हेडक्वाटर के चैधरी बाबू की गर्भवती घरवाली की याद आई। सुना है, डॉक्टरनी ने अंदर का फोटो लेकर देखा देखा है- जुड़वाँ बच्चा है पेट में!
इधर हथिया नच्छत्तर अच्छा झरा था। खेतों में अभी भी पानी लगा हुआ है। मछली? पानी में माँगुर मछलियों को देखकर अपन की देह अपने आप बँध गई।
(वह साँस रोककर चुपचाप खड़ा रहा। फिर खेत की मेंड़ पर चला गया। मछलियाँ छलमलाईं। आईने की तरह थिर पानी अचानक नाचने लगा। )
करमा:- क्या करे? उधर की मेंड़ से सटाकर एक छेंका देकर पानी को उलीच दिया जाए तो---?
करमा:- है है - है है! साले! बन का गीदड़, जाएगा किधर? और छलमलाओ! अरे काँटा करमा को क्या मारता है? करमा नया शिकारी नहीं। आठ माँगुर और एक गरई मछली! सभी काली मछलियाँ! कटिहार हाट में इसी का दाम बेखटके तीन रुपया ले लेता।
( करमा ने गमछे में मछलियों को बाँध लिया। ऐसा संतोख उसको कभी नहीं हुआ, इसके पहले। बहुत बहुत मछली का शिकार किया उसने!)
( एक बूढ़ा भैंसवार अपनी भैंस को खोजते हुआ आया।)
भैंसवार:- ए भाय! उधर किसी भैंस पर नजर पड़ी है?
करमा:- नहीं तो।
भैंसवार:- बीड़ी होगी?
करमा :- मैं बीड़ी नहीं पीता।
भैंसवार:- (अचरज से) कैसा आदमी है? न बीड़ी पीता है, न तंबाकू खाता है।
( भैंसवार नाराज होकर जिरह करना शुरू किया।)
भैंसवार:- इधर कहाँ जाना है?
करमा:- उधर वो गांव जाना है।
भैंसवार:- गाँव में तुम्हारा कौन है?
करमा :- तुमसे मतलब?
भैंसवार:- मछली कहाँ ले जा रहा है?
करमा:- तुम्हें क्यों बताऊँ?
( भैंसवार अपने रास्ते चला जाता हैै।)
करमा:- ताड़ के पीछे आया कि गाँव आ गया, गाँव में कोई तमाशावाला आया है। बच्चे दौड़ रहे हैं। हाँ भालूवाला ही है। डमरू की आवाज सुनकर हमने समझ लिया है।
आह! गाँव की पहली गंध! गंध का पहला झोंका!
( गाँव का पहला आदमी। यह बूढ़ा गोभी को पानी पटा रहा है। दोनों के आँखे मिलती है। बूढ़ा भी पहचान जाता है।)
बूढ़ा:- क्या है, भाई! इधर किधर?
करमा:- ऐसे ही । घूमने फिरने! आपका घर इसी गाँव में है?
(बूढ़ा हँसा। सरसतिया हुक्के पर चिलम चढ़ाकर फूँकती हुई आई। चिलम को फूँकते समय उसके दोनों गाल गोल हो गए थे। करमा को देखकर वह ठिठकी। फिर गोभी के खेत के बाड़े को पार करने लगी। )

बूढ़ा :-चल बेटी, दरवाजे पर ही हम लोग आ रहे हैं।
( हाथ पैर धोकर बाहर आया।) चलो!
सरसतिया:- बाबा, यह कौन आदमी है?
बूढ़ा :- भालू नचानेवाला आदमी।
सरसतिया:- धेत्त!
( करमा लजाया। क्या उसका चेहरा भालू नचानेवाला जैसा है।)
बूढ़ा :- तुम रिलिफिया बाबू के नौकर हो न?
करमा:- नहीं, नौकर नहीं। ऐसे ही साथ रहता हूँ।
बूढ़ा :- ऐसे ही? साथ में? तलब कितना मिलता है?
करमा:- साथ रहने पर तलब क्या मिलेगा?
( बूढ़ा  हुक्का पीना भूल गया।)
बूढ़ा :- बस? बेमतलब का ताबेदार?( सरसतिया से) सरसतिया ! जरा माय को भेज दो, यहाँ। एक कमाल का आदमी।
( बूढ़ी टट्टी की आड़ में खड़ी थी। तुरत आई।)
बूढ़ा :- जरा देखो, इस किल्लाठोंक-जवान को। पेट भात पर खटता है। क्यों जी कपड़ा भी मिलता है? इसी को कहते हैं- पेट-माधेराम मर्द!
( सरसतिया की पतली खिलखिलाहट, भालू नचानेवाला कहीं पड़ोस में ही तमाशा दिखा रहा है। करमा सोच रहा है।)
करमा:- डमरू के ताल पर भालू हाथ हिला हिला कर थब्बड़ थब्बड़ नाच रहा होगा- थुथना ऊँचा करके!
दृश्य परिवर्तन
भालूवाला:- (भालू से) अच्छा जी भोलेराम, नाच तो खूब बनाया तैने। अब एक बार दिखला दे कि फूहड़ औरत गोद में बच्चा को सुलाकर किस तरह ऊँघती है।
भालू:- ( वैसा करके बताता है)
भालूवाला:- वाह जी भोलेराम!
सभी:-( हँसते हैं)हा हा हा
दृश्य परिवर्तन
बूढ़ा:- तुम्हारा नाम क्या है जी?
करमा:- करमचन
बूढ़ा:- वाह, नाम तो सगुनिया है। लेकिन काम? काम चूल्हचन?
करमा:- (लजाते हुए बात को मोड़ दिया।) आपके खेत का बैंगन बहुत बढ़िया है। एकदम घी जैसा।
( बूढ़ा हँसता है और बूढ़ी की हँसी करमा की देह में जान डाल देती है।)
बूढ़ी:- बेचारे को दम तो लेने दो। तभी से रगेड़ रहे हो।
बूढ़ा:- मछली है? बाबू के लिए ले जाओगे?
करमा:- नहीं। ऐसे ही रास्ते में शिकार।
बूढ़ा:- सरसतिया की माय! मेहमान को चूड़ा भूनकर मछली की भाजी के साथ खिलाओ! (करमा से) एक दिन दूसरे के हाथ की बनाई मछली खा लो जी!
(जलपान करते समय करमा ने सुना, लखमी और सरसतिया बात कर रहे हैं।)
लखमी:- ए सरसतिया की माय! कहाँ का मेहमान है?
बूढ़ी:- कटिहार का।
लखमी:- कौन है?

बूढ़ी:- कुटुम ही है।
लखमी:- कटिहार में तुम्हारा कुटुम कब से रहने लगा?
बूढ़ी:- हाल से ही।

( फिर एक खिलखिलाहट! कई खलखिलाहट!! चिलम फूँकते समय सरसतिया के गाल मोसंबी की तरह गोल हो जाते है। )
बूढ़ी:- अच्छा ए बबुआ! तार के अंदर से आदमी की बोली कैसे जाती है? हमको जरा खुलासा करके समझा दो। ( करमा जा रहा है) बूढ़े की बात का बूरा न मानना। जब से जवान बेटा गया, तब से इसी तरह उखड़ी उखड़ी बात करता है कलेजे का घाव। एक दिन फिर आना। अपना ही घर समझना।
( लौटते समय करमा को लगा, तीन जोड़ी आँखें उसकी पीठ पर लगी हुई है। आँखें नहीं- डिसटन सिंगल, होम सिंगल और पैट सिंगल की लाल लाल गोल गोल रोशनी।)
दृश्य: 06
( करमा वापस आ रहा है। रास्ते में ढोढ़िया साँप मिलता है।)
करमा :- ढोढ़िया साँप ! फों फों करता हुआ भागा। हद है! कुत्ता अभी तक बैठा मेरा राह देख रहा है। ( कुत्ता खुशी के मारे नाचने लगा।) बूढ़े ने उसे बनाकर ठग लिया। तीन रुपए की मोटी मोटी मांगुर मछलियाँ एक चुटकी चूड़ा खिलाकर , चार खट्टी मीठी बात सुनाकर।
( करमा ने मछली की बात अपने पेट में रख ली।)
बाबू:- करमा, तुम्हारी देह से कच्ची मछली की बास आती है। मछली ले आए हो।
करमा:- ( मन ही मन) बाबू तो पहले से जान लेने वाला अगरजानी है। (चुप रहा) जिन्दगी में पहली बार किसी बाबू को विश्वासघात किया है। मछली देखकर बाबू जरूर नाचने लगते।
( परदा गिरता है।)
दृश्य:- 07
( करमा सो रहा है, पर उसे नींद नहीं आ रही है, वह सोच रहा है।)
करमा:- पंद्रह दिन देखते ही देखते बीत गया। अभी रात की गाड़ी से टिसन से साल्टन मास्टर बाबू आए हैं- बाल बच्चों के साथ। पंद्रह दिन से चुप फैमिली क्वाटर में कुहराम मचा है। भोर के गाड़ी के साथ करमा अपने बाबू के साथ हेड-क्वाटर लौट जाएगा। इसके बाद मनिहारीघाट? न आज रात भी करमा को नींद नहीं आएगी नहीं अब वार्निश चूने की गंध नहीं लगती। बाबू मजे में सो रहे हैं। बाबू सचमुच गोपाल बाबू जैसे हैं। न किसी जगह से तिल भर मोह, न रत्ती भर माया। करमा क्या करे? ऐसा तो कभी नहीं हुआ। एक दिन रि आना , अपना ही घर समझना। कुटुम है, पेट माधोराम मर्द।
( करमा सपना देख रहा है।)
अचानक करमा को एक अजीब गंध लगी, वह उठा। किधर से यह गंध आ रही है? उसने धीरे से प्लेटफार्म पार किया। चुपचाप सूँघता हुआ आगे बढ़ता गया। रेलवे लाइन पर पैर पड़ते ही सभी सिंगल- होम, डिसटट और पैट- जोर जोर से बिगुल फूँकने लगे। फैमिली क्वाटर की एक औरत चिल्लाने लगी- चो-ओ-ओ-र। वह भागा। एक इंजिन उसके पीछे-पीछे दौड़ा आ रहा है। मगहिया डोम की छौंड़ी? तंबू में वह छिप गया। सरसतिया खिलखिलाकर हँसती है। उसके झबरे केश, बेनहाई हुई देह की गंध, करमा के प्राण में समा गई। वह डरकर सरसतिया के गोद में--- नहीं उसकी बूढ़ी माँ की गोद में अपना मुँह छिपाता है। रेल और जहाज के भोंपे एक साथ बजते हैं। सिंगल की लाल लाल रोशनी।
बाबू:- करमा उठ! करमा सामान बाहर निकालो।
( करमा एक गंध के समुद्र में डूबा हुआ है। उसने उठकर कुरता पहना। बाबू का बक्सा बाहर निकाला।)
पानी पाँड़े:- कहा सुना माफ करना।
करमा:- ( गंध में डूबा रहा।)---।
( गाड़ी आई। बाबू गाड़ी में बैठे। करमा ने बक्सा चढ़ा दिया। वह सरवेंट दर्जा में बैठेगा। )
बाबू:- सब कुछ चढ़ा दिया तो? कुछ छूट तो नहीं गया?
करमा:- नहीं, कुछ छूटा नहीं है।
( गाड़ी ने सीटी दी। करमा ने देखा , प्लेटफार्म पर बैठा हुआ कुत्ता उसकी ओर देखकर कूँ कूँ कर रहा है। बेचैन हो गया कुत्ता।)
करमा:- बाबू?
बाबू:- क्या है?
करमा:- मैं नहीं जाऊँगा।
( करमा चलती गाड़ी से उतर गया। धरती पर पैर रखते ही ठोकर लगी। लेकिन सँभल गया।)
(परदा गिरता है।)
( फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से।)  

सोमवार, 23 जनवरी 2023

 एक आदिम रात्रि की महक

( फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से।)  
एकांकी रूपान्तरण:- सीताराम पटेल सीतेश
पात्र परिचय
करमा:- एक अनाथ लड़का

धरमा:- करमा की छाया
बाबू:- रेलवे कर्मचारी
गोपाल बाबू:- रेलवे कर्मचारी
बौमा:- गोपाल बाबू की पत्नी
पानी पाँड़े:- रेलवे कर्मचारी
पैटमान:- रेलवे कर्मचारी
भैंसवार:- गांव का भैंसवाला
बूढ़ा:- एक का आदमी
बूढ़ी:-बूढ़ा की पत्नी
सरसतिया:- बूढ़ा की बेटी
लखमी:- बूढ़ी की पड़ोसी
कुत्ता:- करमा का साथी
भालूवाला:- मदारी
भालू:- पालतू जानवर


दृश्य: 01
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- रात्रि बारह बजे
( दोनों अलग अलग लोहे के खाट में सो रहे हैं, दोनों को नींद नहीं आ रही है।)
करमा:- (मन ही मन) न --- मुझको नींद नहीं आएगी। नए मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चवन्नी भर दर्द चिनमिनाता रहता है। पुराने लाइन के पुराने इस्टिसन सब हजार पुराने हों, वहाँ नींद तो आती है। ---- ले नाक के अंदर फिर सुड़सुड़ी जगी ससुरी---!
( करमा छींकने लगा। नए मकान में उसकी छींक गूँज उठी।)
बाबू :- (करवट लेते हुए पूछा) करमा, नींद नहीं आती?
करमा:- (गमछे से नथुने को साफ करते हुए) यहाँ नींद कभी नहीं आएगी, मैं जानता था, बाबू!
बाबू:- मुझे भी नींद नहीं आएगी।(सिगरेट सुलगाते हुए) नई जगह में पहली रात मुझे नींद नहीं आती।
करमा:- (मन ही मन) नए पोख्ता मकान में बाबू को भी चूने की गंध लगती है, क्या? कनपटी के पास दर्द रहता है हमेशा क्या?
बाबू:- (गीत गुनगुनाने लगा) सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है, न हाथी है, न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।
(एक कुत्ता गश्त लगाता हुआ आया और बरामदे के पास आकर रुक गया। करमा चुपचाप कुत्ते की नीयत को ताड़ने लगा।  कुत्ते ने बाबू की खटिया की ओर थुथना ऊँचा करके हवा में सूँघा। आगे बढ़ा।)
करमा:- (मन ही मन )जरूर जूता-खोर कुत्ता है साला! नहीं ,सिर्फ सूँघ रहा था।
( कुत्ता अब करमा की ओर मुड़ा। हवा को सूँघने लगा। फिर मुसाफिरखाने की ओर दुलकी चाल से चला गया।)
बाबू:- तुम्हारा नाम करमा है या करमचंद या करमू?
करमा:-(मन ही मन ) सात दिन रहने के बाद, आज आधी रात के पहर में बाबू ने दिल खोलकर एक सवाल के जैसा सवाल किया है। (प्रकट) बाबू नाम तो मेरा करमा ही है, वैसे लोगों के हजार मँुह है, हजार नाम कहते हैं। निताय बाबू कोरमा कहते थे, घोस बाबू करीमा कहकर बुलाते थे, सिंघ जी ने सब दिन कामा ही कहा और असगर बाबू तो हमेशा करम करम कहते थे। खुश रहने पर दिल्लगी करते थे- हाय मेरे करम! नाम में क्या है बाबू? जो मन में आए कहिए। हजार नाम---!
बाबू:- तुम्हारा घर संथाल परगना में है, या राँची-हजारीबाग की ओर?
करमा:- ( अचकचा कर, मन ही मन) घर? जहाँ धड़, वहाँ घर। माँ-बापजी- भगवान जी! लेकिन बाबू को ऐसा जवाब तो नहीं दे सकता! बाबू आप भी खूब हैं। नाम का अरथ निकालकर अनुमान लगा लिया। घर संथाल परगना में है, या राँची- हजारीबाग की ओर होगा, किसी गाँव में? करमा-पर्व के दिन जन्म हुआ होगा, इसलिए नाम करमा पड़ा। माथा, कपाल, होंठ और देह की गठन देखकर भी---। बाबू तो बहुत गुनी मालूम होते हैं। अपने बारे में करमा को कुछ मालूम नहीं। और बाबू नाम और कपाल देखकर सब कुछ बता रहे हैं। इतने दिन बाद एक बाबू मिले है, गोपाल बाबू जैसे!
(प्रकट) बाबू, गोपाल बाबू भी यही कहते थे! यह करमा नाम गोपाल बाबू का ही दिया हुआ है! गोपाल बाबू कहते थे, आसाम से लौटती हुई कुली-गाड़ी में एक डोको के अंदर तू पड़ा था, बिना बिलटी-रसीद के ही--- लावारिस माल। ( बाबू का नाक बजता है।) चलो बाबू को नींद आ गई। नाक बोलने लगी। गोपाल बाबू का किस्सा अधूरा रह गया। (कुतवा फिर गस्त लगाता हुआ आया।) यह कातिक का महीना है न! ससुरा पस्त होकर आया है। हाँफ रहा है। ले, तू भी यहीं सोएगा? ऊँह साले की गंध यहाँ तक आती है-धेत्त!धेत्त!
बाबू:-(जगकर) हूँ-ऊ-ऊ! तब क्या हुआ तुम्हारे गोपाल बाबू का?
( कुत्ता बरामदे के नीचे चला गया। उलटकर देखने लगा। गुर्राया। फिर दो-तीन बार दबी आवाज में बुफ-बुफ कर जनाने मुसाफिरखाने की अंदर चला गया। जहाँ पैटमान जी सोता है।)
करमा:- बाबू सो गए क्या? चलो बाबू को नींद आ गई! बाबू की नाक ठीक बबुआनी आवाज में डाकती है! पैटमान जी तो लगता है, लकड़ी चीर रहे हैं। गोपाल बाबू की नाक बीन-जैसी बजती थी- सुर में!! असगर बाबू का खर्राटा --, सिंघ जी फुफकारते थे और साहू बाबू नींद में बोलते थे- ए- डाउन दो, गाड़ी छोड़ा!
दृश्य परिवर्तन
( करमा सपना देख रहा है।)
(तार की घंटी! स्टेशन का घंटा! गार्ड साहब की सीटी! इंजिन की बिगुल! जहाज का भोंपा! सैकड़ों सीटियाँ-- बिगुल ---भोंपा--भों-ओं-ओं-ओं--!
हजार बार लाख कोशिश करके भी अपने को रेल के पटरी से अलग नहीं कर सका, करमा। वह छटपटाया। चिल्लाया, मगर जरा भी टस-से-मस नहीं हुई उसकी देह। वह चिपका रहा। धड़धड़ाता हुआ इंजिन गरदन और पैरों को काटता हुआ चला गया। लाइन के एक ओर उसका सिर लुढ़का हुआ पड़ा था, दूसरी ओर दोनों पैर छिटके हुए! उसने जल्दी से अपने कटे हुए पैर को बटोरा- अरे, यह तो एंटोनी गाट साहब के बरसाती जूते का जोड़ा है! गम-बूट! उसका सिर क्या हुआ? धेत्त, धेत्त! ससुरा नाक कान चबा रहा है! )
बाबू:- करमा!
करमा:- ( सोते हुए)धेत्त! धेत्त!
बाबू :- उठ करमा, चाय बना?
करमा:- (धडपड़ाकर उठकर बैठा) ले बिहान हो गया। मालगाड़ी को थुरू-पास करके पैटमान जी हाथ में बेंत की कमानी घुमाता हुआ आ रहा है। साला! ऐसा भी सपना होता है, भला? बारह साल में, पहली बार ऐसा अजूबा सपना देखा हमने। बारह साल में एक दिन के लिए रेलवे-लाइन से दूर नहीं गया। इस तरह एकसिडंटवाला सपना कभी नहीं देखा उसने!
( परदा गिरता है।)
दृश्य: 02
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन छह बजे
( करमा धरमा से बातचीत कर रहा है।)
करमा:- मैं रेल कंपनी का नौकर नहीं। मैं चाहता तो पोटर, खलासी पैटमान या पानी पाँडे की नौकरी मिल सकती थी। खूब आसानी से रेलवे-नौकरी में घुस सकता था। मगर मन को कौन समझाए! मन माना नहीं! रेल-कंपनी का नीला कुर्ता और इंजिन-छाप बटन का शौक मुझे कभी नहीं हुआ।
धरमा:- क्यों नहीं हुआ करमा?
करमा:- रेल कंपनी क्या, किसी भी नौकरी मैंने कभी नहीं की।
धरमा:- क्या काम करते हो?
करमा:- नाम धाम पूछने के बाद सभी लोग पेशे के बारे में पूछते हैं।  मैं एक ही  जवाब देता है कि मैं बाबू के साथ रहता हूँ। एक पैसा भी मुसहरा न लेने वाले को नौकर तो नहीं कह सकते।
धरमा:- तुम्हारी कहानी मजेदार है करमा? और सुनाओ ना।
करमा:- गोपाल के साथ, लगातार पाँच वर्ष! इसके बाद कितने बाबुओं के साथ रहा, यह गिनकर बतलाना होगा! लेकिन एक बात है- रिलिफिया बाबू को छोड़कर किसी सालटन बाबू के साथ नहीं रहा। सालटन बाबू माने किसी टिशन में परमानंटी नौकरी करने वाला -फैमिली के साथ रहनेवाला! जा रे गोपाल बाबू! वैसा बाबू कहाँ मिले, मेरा माय बाप भाय बहिन कुल परिवार जो बूझिए - सब गोपाल बाबू! बिना बिलटी रसीद के लावारिस माल था, मैं! रेलवे अस्पताल से छुड़ाकर अपने साथ रखा, गोपाल बाबू ने। जहाँ जाते मैं जाता। जो खाते, मैं भी खाता। लेकिन आदमी की मति को क्या चाहिए, रिलिफिया काम छोड़कर सालटनी काम में गए। फिर एक दिन शादी कर बैठे। बौमा गोपाल की फैमिली - राम हो राम! वह औरत थी? साच्छात चुड़ैल! दिन भर गोपाल बाबू ठीक रहते। साँझ पड़ते ही उनकी जान चिड़िया की तरह लुकाती फिरती। आधी रात को कभी कभी इसपेसल पास करने के लिए बाबू निकलते। लगता, अमेरिकन रेलवे इंजिन के बायलर में कोयला झोंककर निकले हैं, मैं क्वाटर के बरामदे पर सोता था। तीन महीने तक रात में नींद नहीं आई कभी। बौमा फों फों करती - बाबू मिनमिनाकर कुछ बोलते। फिर शुरू होता रोना कराहना गाली गलौज। मारपीट। बाबू भागकर बाहर निकलते और वह औरत झपटकर माथे को केश पकड़ लेती। तब मैंने एक उपाय निकाला। ऐसे समय में मैं  उठकर दरवाजा खटखटा कर कहता-
दृश्य परिवर्तन
करमा:- बाबू इसपेसल का कल बोलता है। बाबू की जान कितने दिनों तक बचाता मैं?
(बौमा एक दिन चिल्लाई)
बौमा:- ए छोकरा हरामजादा को दूर कोरो। यह चोर है, चो-ओ-ओ-र!
दृश्य परिवर्तन
करमा:- इसके बाद से ही किसी टिसन के फैमिली क्वाटर को देखते ही मेरे मन में एक पतली आवाज गूँजने लगती है- चो-ओ-ओ-र! हरामजादा! फैमिली क्वाटर ही क्यों- जनाना मुसाफिरखाना, जनाना दर्जा, जनाना- जनाना नाम से ही मुझको  उबकाई आने लगती है।  ( चुप हो जाता है , जैसे कुछ याद कर रहा हो।)
धरमा:- फिर क्या हुआ धरमा?
करमा:- एक ही साल में गोपाल बाबू को हाड़ गोड़ सहित चबाकर खा गई, वह जनाना! फूल जैसे सुकुमार गोपाल बाबू! जिन्दगी में पहली बार फूट-फूटकर रोया था, मैं।  रमता जोगी, बहता पानी और रिलिफिया बाबू ! हेड-क्वाटर में चैबिस घंटे हुए कि परवाना कटा- फलाने टिसन का मास्टर बीमार है, सिक रिपोट आया है। तुरत जोआयेन करो। रिलिफिया बाबू का बोरिया बिस्तर हमेशा रेडी रहना चाहिए। कम से कम एक सप्ताह, ज्यादा से ज्यादा तीन महीने से ज्यादा किसी एक जगह में जमकर नहीं रह सकता, कोई रिलिफिया बाबू। लकड़ी के एक बक्से में सारी गृहस्थी बन्द करके - आज यहाँ, कल वहाँ।  पानीपाड़ा से भातगाँव, कुरैठा से रौताड़ा। फिर हेड क्वाटर कटिहार!
( चुप हो जाता है , जैसे कुछ याद कर रहा हो।)
धरमा:- आज मुझे जिन्दगी में पहली बार इतना मजा आ रहा है। आगे सुनाओ।
करमा:- गोपाल बाबू ने ही घोस बाबू के साथ लगा दिया था- खूब भालो बाबू। अच्छी तरह रखेगा। लेकिन घोस बाबू के साथ एक महीना से ज्यादा नहीं रह सका करमा। घोस बाबू की बेवजह गाली देने की आदत ! गाली भी बहुत खराब खराब! माँ बहन की गाली। इसके अलावा घोस बाबू में कोई ऐब नहीं था। अपने समांग की तरह रखते थे। घोस बाबू आज भी मिलते हैं तो गाली से ही बात शुरू करते हैं। की रे --करमा? किसका साथ में हैं आजकल मादर्च---? घोस बाबू को माँ बहन की गाली देने वाला कोई नहीं। नही ंतो समझते कि माँ बहन की गाली सुनकर आदमी का खून किस तरह खौलने लगता है। किसी भले आदमी को ऐसी खराब गाली बकते नहीं सुना है करमा ने आज तक।
धरमा:- ओ हो बहुत ज्यादा मजा आ रहा है करमा। आगे सुनाओ।
करमा:- राम बाबू की सब आदत ठीक थी। लेकिन भा-आ-री इस्की आदमी। जिस टिसन में जाते, पैटमान पोटर सूपर को एकांत में बुलाकर घुसुर फुसुर बतियाते। फिर रात में कभी मालगोदाम की ओर तो कभी मुसाफिर खाना की में, तो कभी जनाना पैखाना में -छिः-छिः -- जहाँ जाते छुछुआते रहते। क्या जी असल-माल-वाल का कोई जोगाड़ अंतर नहीं लगेगा। आखिर वही हुआ जो मैंने कहा था- माल ही उनका काल हुआ। पिछले साल जोगबनी लाइन में एक नेपाली ने खुकरी से दो टुकड़े काटकर रख दिया। और उड़ाओ माल! जैसी अपनी इज्जत वैसी पराई!
धरमा:- यही तो मजा है, नौकरी वालों के साथ रहने पर, खाना और मनोरंजन और क्या चाहिए जीवन में करमा।
करमा:- (अपने मग्न होकर कहे जा रहा है।) सिंघ जी भारी पुजेगरी! सिया सहित राम-लछमन की मूर्ति हमेशा उनकी झोली में रहती थी। रोज चार बजे से ही नहाकर घंटी हिलाते रहते। इधर कल की घंटी बजती। जिस घर में ठाकुर की झोली रहती, उसमें बिना नहाए कोई पैर भी नहीं दे सकता था। कोई अपनी देह को उस तरह बाँधकर हमेशा कैसे रह सकता है। कौन दिन में दस बार नहाए और हजार बार पैर धोए! सो भी जाड़े के मौसम में। जहाँ कुछ छुओ कि हूँहूँहूँ- हाँहाँहाँ- अरेरेेरे- छू दिया न? ऐसे छुतहा आदमी को रेल कंपनी में आने की क्या जरूरत? सिंघ जी का साथ नहीं निभ सका।
धरमा:- आगे क्या हुआ?
करमा:- साहू बाबू दरियादिल आदमी थे। मगर मदक्की ऐसे कि दिन-दोपहर को पचास-दारू एक बोतल पीकर माल गाड़ी को थुरूपास दे दिया और गाड़ी लड़ गई। करमा को याद है, एक्सिडन्ट की खबर सुनकर साहू बाबू ने फिर एक बोतल चढ़ा लिया। आखिर डॉक्टर ने दिमाग खराब होने का साटिफिकेट दे दिया। लेकिन उस एकसिडंट के समय भी किसी रात को मैंने ऐसा सपना नहीं देखा!
( परदा गिरता है।)
दृश्य:03
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन सात बजे
करमा:- (मन ही मन) न भोर भोर ऐसी कुलच्छन भरी बात बाबू को सुनाकर ठीक नहीं किया। रेलवे की नौकरी में अभी तुरत घुसवै किए हैं। न बाबू के मिजाज का टेर पता अब तक करमा को नहीं मिला है। करीब एक सप्ताह तक साथ रहने के बाद कल रात में पहली बार दिल खोलकर दो सवाल- जवाब किया बाबू ने। इसीलिए सुबह को करमा ने दिल खोलकर अपने सपने की बात शुरू की थी।
( चाय की प्याली सामने रखने के बाद उसने हँसकर कहा)
हँह बाबू , रात में हम एक अ-जू-ऊ-ऊ-बा सपना देखा। धड़धड़ाता इंजिन -- लाइन पर चिपकी हमारी देह टस-से-मस नहीं--- सिर इधर और पैर दोनों लाइन के उधर -- एंटोनी गाट साहेब का जूते का जोड़ा--- गमबोट---।
बाबू:- धेत्त ! क्या बेसिर-पैर की बात करते हो, सुबह सुबह? गाँजा -वाँजा पीता है क्या?
करमा:- (मन ही मन) करमा ने बाबू को सपना की बात सुनाकर अच्छा नहींे किया।
(करमा उठकर ताखे पर रखे हुए आईने में अपना मुँह देखने लगा।  उसने अ-जू-ऊ-ऊ-बा  कहकर देखा।)
छिः उसके होंठ तीतर की चोंच की तरह।
(पानी पाँड़े आता है।)
पानी पॉड़े:- का करमचन? का बन रहा है?
करमा:-( मन ही मन) पानी पाँड़े ? यह पानी पाँड़े भला आदमी है। पुरानी जान पहचान है इससे, करमा की। कई टिसन में संगत हुआ है। लेकिन यह पैटमान लटपटिया आदमी मालूम होता है। हर बात पर पुच पुचकर हँसने वाला।
पानी पॉड़े:- करमचन, बाबू कौन जाति के हैं?
करमा:- क्यों? बंगाली हैं।
पानी पॉड़े:-  भैया बंगाली में भी साढ़े-बारह बरन के लोग रहते हैं।
करमा:- पानी पॉड़े  जी, सो तो मैं नहीं जानता। मगर बहुत गुनी आदमी हैं। आपका नाम का मतलब निकालकर- चेहरा देखकर सब कुछ बता देंगे। लीजिए, घंटी पड़ गई दुब्ज्जी गाड़ी की, और मेरी तरकारी अभी तक चढ़ी नहीं है।
पानी पॉड़े:-  (जाते जाते कहा) थोड़ी तरकारी बचाकर रखना करमचन!
( पानी पॉड़े जाता है।)

करमा:- (मन ही मन) घर कहाँ? कौन जाति? मनिहारी घाट के मस्तान बाबा का सिखाया हुआ जवाब, सभी जगह नहीं चलता, हरि के भजे सो हरि का होई! मगर हरि की भी जाति थी! ले यह घटही गाड़ी का इंजन कैसे भेज दिया लाइन में आज? संथाली-बाँसी जैसी पतली सीटी-सी-ई-ई!!
( धरमा आता है।)
धरमा:- करमा भाई! और कुछ कुछ सुनाओ?
करमा:- ले फक्का! एक भी पसिंजर नहीं उतरा, इस गाड़ी से भी। काहे को इतना खर्चा करके रेल कंपनी ने यहाँ टिसन बनाया, मेरे के बुद्धि में नहीं आता। फायदा? बस नाम ही आमदपुरा है- आमदनी नदारद। सात दिन में दो टिकट कटे हैं और सिर्फ पाँच पसिंजर उतरे हैं, तिसमें दो बिना टिकट के। इतने दिन के बाद पंद्रह बोरा बैंगन उस दिन बुक हुआ। पंद्रह बैंगन देकर ही काम बना लिया, उस बूढ़े ने। उस बैंगनवाले की बोली बानी अजीब थी। मुझसे खुलकर गप करना चाहता था बूढ़ा। घर कहाँ है? कौन जाति? घर में कौन कौन हैं? मैंने सभी सवालों का एक ही जवाब दिया था- ऊपर की ओर दिखलाकर! बूढ़ा हँस पड़ा था। अजीब हँसी! घटही -गाड़ी! सी-ई- ई-!!
धरमा:- तुम्हारी बातों में मुझे बहुत रस मिल रहा है, तुम्हारी बातें गन्ने की रस की तरह मीठे हैं, करमा।
करमा:- मनियारी घाट टिसन में भी रहा हूँ, तीन महीने तक एक बार, एक महीने में दूसरी बार। इसकी बात निराली है। कहाँ मनियारी घाट और कहाँ आदमपुरा का यह पिद्दी टिसन। नई जगह में नए टिसन पर पहंुॅचकर आसपास के गाँवों में एकाध चक्कर घूमे फिरे बिना मुझको न जाने कैसा कैसा लगता है। लगता है अंधकूप में पड़ा हुआ है। वह डिसटन-सिंगल के उस पार दूर दूर तक खेत फैले हैं। वह काला जंगल ताड़ का वह अकेला पेड़, आज बाबू को खिलाकर मैं निकलूँगा। इस तरह बैठे सहने से उसके पेट का भात नहीं पचेगा। यदि गाँव भर और खेत का मैदान में नहीं घूमता-फिरता तो वह पेड़ पर चढ़ना कैसे सीखता? तैरना कहाँ सीखता?
धरमा:- आम के रस की तरह तुम्हारे बोल लग रहे हैं। सुनाओ सुनाओ कुछ और सुनाओ, करमा।
करमा:- लखपतिया टिसन का नाम कितना जब्बड़ है! मगर टिसन पर एक सत्तू-फरही की भी दुकान नहीं। आसपास में पाँच कोस कोई गाँव नही। मगर टिसन से पूरब जो दो पोखरे हैं, उन्हें कैसे भूल सकता है मैं? आईना की तरह झलमलाता पानी। बैसाख महीने के दोपहरी में, घंटों गले भर पानी में नहाने का सुख! मुँह से कहकर बताया नहीं जा सकता! मुदा, कदमपुरा - सचमुच कदमपुरा है। टिसन से शुरू करके गाँव तक हजारों कदम के पेड़ हैं। कदम की चटनी खाए एक युग हो गया।
धरमा:- संजय जैसे तुम्हारी बातें लग रही है, करमा।
करमा:- वारिसगंज टिसन, बीच कस्बा में है। बड़े बड़े मालगोदाम हजारों गाँठ-पाट, धान-चावल के बोरे, कोयले सीमेंट चूना की ढेरी। हमेशा हजारों लोगों की भीड़! करमा को किसी का चेहरा याद नहीं। लेकिन टिसन से सटे उत्त्र की मैदान में तंबू डालकर रहनेवाले गदहावाले मगहिया डोमों की याद हमेशा आती है। घाघरीवाले औरतें हाथ में बड़े बड़े कड़े, कान के झूमके, नंगे बच्चो, कान में गोल गोल कुंडल वाले मर्द! उनके मुर्गे! उनके कुत्ते!
धरमा:- नाम तो मेरा धरम है, पर तुम धरम कर रहे हो करमा। आदमी को कर्म को ही पूजा समझना चाहिए और कर्म करते रहना चाहिए। आगे सुनाओ।
करमा:-बथनाहा टिसन के चारों ओर हजार घर बन गए हैं। कोई परतीत करेगा कि पाँच साल पहले बथनाहा टिसन पर दिन दोपहर को टिटही बोलती थी। कितनी जगहों कितने लोगों को याद आती है। सोनबरसा का आम, कालूचक की मछलियाँ, भटोतर की दही, कुसियारगांव का ऊख। मगर सबसे ज्यादा याद आती है मनिहारीघाट की टिसन। एक तरफ धरती दूसरी ओर पानी। इधर रेलगाड़ी, उधर जहाज। इस पार खेत-गाँव मैदान, उस पार साहेबगंज कटरोटिया का नीला पहाड़। नीला पानी-सादा बालू! तीन एक चार! चार महीने तक तीसों दिन गंगा में नहाया है करमा। चार जनम तक पाप का कोई असर नहीं होना चाहिए। इतना बढ़िया नाम शायद ही किसी टिसन का होगा - मनिहार। बलिहारी! मछुवे जब नाव से मछलियाँ उतारते तो चमक के मारे करमा की आँखें चैंधिया जाती। रात में उधर जहाज चला जाता-धु धु करता हुआ। इधर गाड़ी छकछकाती हुई कटिहार की ओर भागती। अजू साह की दुकान की झाँपी बंद हो जाती। तब घाट पर मस्तान बाबा की मंडली जुटती।
धरमा:- ऐसी बातें रोज रोज सुनने को मिले तो, आदमी खाना भूल जाए।
करमा:- मस्तान बाबा  कुली कुल के थे। मनिहारी घाट पर कुली का काम करते थे। एक बार मन ऐसा उदास हो गया कि दाढ़ी और जटा बढ़ाकर बाबाजी हो गए। खंजड़ी बजाकर निरगुन गाने लगे। बाबा कहते- घाट घाट का पानी पीकर देखा- सब फीका। एक गंगाजल मीठा। बाबा एक चिलम गाँजा पीकर पाँच किस्सा सुना देते। सब बेद पुरान का किस्सा ! मैंने ग्यान की दो चार बोली मनियारी घाट पर ही सीखाीं। मस्तान बाबा के सत्संग में। लेकिन गाँजा में उसने कभी दम नहीं लगाया। आज बाबू ने झुँझलाकर जब कहा, गाँजा- वाँजा पीते हो क्या, तो करमा को मस्तान बाबा  की याद आई। बाबा कहते - हर जगह की अपनी खुशबू-बदबू होती है! इस आदमपुरा की गँध के मारे मुझको खाना- पीना नहीं रुचता। मस्तान बाबा को बाद देकर मनिहारीघाट की यााद कभी नहीं आती।
(परदा गिरता है।)

दृश्य: 04
स्थान:- सिगनल केबिन नया क्वार्टर  समय:- दिन दो बजे
( करमा ने ताखे पर रखे आईने में फिर अपना मुखड़ा देखा। उसने आँखें अधमुँदी करके दाँत निकालकर हँसते हुए मस्तान बाबा  के चेहरे की नकल उतारने की चेष्टा की। - मस्त रहो! सदा आँख कान खोलकर रहो। धरती बोलती है। गाछ- बिरिच्छ भी अपने को पहचानते हैं। फसल को नाचते देखा है कभी। रोते सुना है कभी अमावस्या की रात को? है--है--- है--- मस्त रहो। करमा को क्या पता कि बाबू पीछे खड़े होकर सब तमाशा देख रहे हैं। बाबू ने अचरज से पूछा।)
बाबू:- तुम जगे जगे खड़े होकर भी सपना देखता है? कहता है कि गांजा नहीं पीता?
(सचमुच वह खड़ा खड़ा सपना देखने लगा था। मस्तान बाबा का चेहरा बरगद की पेड़ की रह बड़ा होता गया। उसकी मस्त हँसी आकाश में गूँजने लगी। गाँजा का धुआँ उड़ने लगा। गंगा की लहरें आईं। दूर जहाज का भोंपा सुनाई पड़ा- भों-ओं-ओं!
बाबू:- खाना परोसो।  देखूँ, क्या बनाया है? तुमको लेकर भारी मुश्किल है। ( पहला कौर निगलकर) लेकिन खाना तो बहुत बढ़िया बनाया है। खाना बनाना किसने सिखलाया तुमको? गोपाल की घरवाली ने?
करमा:- गोपाल की घरवाली? माने बौमा? बौमा का मिजाज तो इतना खट्टा था कि बोली सुनकर कड़ाही का ताजा दूध फट जाए। वह किसी को क्या सिखावेगी? फूहड़ औरत?
बाबू:- और यह बात बनाना किसने सिखलाया तुमको?
करमा:- बाबू सिखलाएगा कौन? सहर सिखाए कोतवाली!
बाबू:- तुम्हारी बीबी को खूब आराम मिलेगा।
करमा:- बाबू, आज हमको जरा छुट्टी चाहिए।
बाबू:- छुट्टी! क्यों? कहाँ जाएगा?
करमा:- ( हाथ से इशारा ) जरा उधर घूमने फिरने।
( पैटमान पुकारता है।)
पैटमान:- करमा ! बाबू को बोलो कल बोलता है।

दृश्य: 05
(करमा सोचते हुए जा रहा है।)
करमा:- तुम्हारी बीबी को आराम होगा! करमा की बीबी! वारिसगंज टिसन मगहिया डोमों के तंबू। उठती उमेरवाली छौंड़ी। नाक में नथिया। नाक और नथिया में जमे हुए काले मैंले। पीले दाँतों में मिस्सी!! करमा अपने हाथ का बना हुआ हलवा-पूरी उस छौंड़ी को नहीं खिला सका। एक दिन कागज की पुड़िया में ले गया। लेकिन वह पसीने से भीग गया। उसकी हिम्मत नहीं हुई। यदि वह छौंड़िया चिल्लाने लगे कि तुम हमको चुरा छिपाकर हलवा काहे खिलाता है? ओ--मइयो-यो-यो-यो-यो। बाबू हजार कहे ? करमा का मन नहीं मानता कि उसका घर संथाल परगना या राँची की ओर कहीं होगा। मनिहारीघाट में दो दो बार रह आया है वह। उस पार के साहेबगंज कजरौटिया के पहाड़ ने उसको अपनी ओर नहीं खींचा कभी! और वारिसगंज, कदमपुरा, कालूचक, लखपतिया का नाम सुनते ही उसके अंदर कुछ झनझना उठता है। जाने-पहचाने, अचीन्हे, कितने लोगों की भीड़ लग जाती है। कितनी बातें सुख-दुख की! खेत खलिहान, पेड़-पौधे, नदी पोखरे, चिरई-चुरमुन- सभी एक साथ टानते हैं, मुझकोे! सात दिन से वह काला जंगल और ताड़ का पेड़ उसको इशारे से बुला रहा है। जंगल के ऊपर आसमान में तैरती हुई चील आकर करमा को क्यों पुकार जाती है? क्यों?
(रेलवे हाता पार करने के बाद भी कुत्ता नहीं लौटा तो करमा ने झिड़की दी।)
करमा:- तू कहाँ जाएगा ससुर? जहाँ जाएगा झाँव-झाँव करके कुत्ते दौड़ेंगे। जा! भाग! भाग!!
( कुत्ता रुककर करमा को देखने लगा। धनखेतों से गुजरनेवाली पगडंडी पकड़कर करमा चल रहा है। धान की बालियाँ अभी फुटकर निकली नहीं हैं। )
करमा:-  इनको देखकर हेडक्वाटर के चैधरी बाबू की गर्भवती घरवाली की याद आई। सुना है, डॉक्टरनी ने अंदर का फोटो लेकर देखा देखा है- जुड़वाँ बच्चा है पेट में!
इधर हथिया नच्छत्तर अच्छा झरा था। खेतों में अभी भी पानी लगा हुआ है। मछली? पानी में माँगुर मछलियों को देखकर अपन की देह अपने आप बँध गई।
(वह साँस रोककर चुपचाप खड़ा रहा। फिर खेत की मेंड़ पर चला गया। मछलियाँ छलमलाईं। आईने की तरह थिर पानी अचानक नाचने लगा। )
करमा:- क्या करे? उधर की मेंड़ से सटाकर एक छेंका देकर पानी को उलीच दिया जाए तो---?
करमा:- है है - है है! साले! बन का गीदड़, जाएगा किधर? और छलमलाओ! अरे काँटा करमा को क्या मारता है? करमा नया शिकारी नहीं। आठ माँगुर और एक गरई मछली! सभी काली मछलियाँ! कटिहार हाट में इसी का दाम बेखटके तीन रुपया ले लेता।
( करमा ने गमछे में मछलियों को बाँध लिया। ऐसा संतोख उसको कभी नहीं हुआ, इसके पहले। बहुत बहुत मछली का शिकार किया उसने!)
( एक बूढ़ा भैंसवार अपनी भैंस को खोजते हुआ आया।)
भैंसवार:- ए भाय! उधर किसी भैंस पर नजर पड़ी है?
करमा:- नहीं तो।
भैंसवार:- बीड़ी होगी?
करमा :- मैं बीड़ी नहीं पीता।
भैंसवार:- (अचरज से) कैसा आदमी है? न बीड़ी पीता है, न तंबाकू खाता है।
( भैंसवार नाराज होकर जिरह करना शुरू किया।)
भैंसवार:- इधर कहाँ जाना है?
करमा:- उधर वो गांव जाना है।
भैंसवार:- गाँव में तुम्हारा कौन है?
करमा :- तुमसे मतलब?
भैंसवार:- मछली कहाँ ले जा रहा है?
करमा:- तुम्हें क्यों बताऊँ?
( भैंसवार अपने रास्ते चला जाता हैै।)
करमा:- ताड़ के पीछे आया कि गाँव आ गया, गाँव में कोई तमाशावाला आया है। बच्चे दौड़ रहे हैं। हाँ भालूवाला ही है। डमरू की आवाज सुनकर हमने समझ लिया है।
आह! गाँव की पहली गंध! गंध का पहला झोंका!
( गाँव का पहला आदमी। यह बूढ़ा गोभी को पानी पटा रहा है। दोनों के आँखे मिलती है। बूढ़ा भी पहचान जाता है।)
बूढ़ा:- क्या है, भाई! इधर किधर?
करमा:- ऐसे ही । घूमने फिरने! आपका घर इसी गाँव में है?
(बूढ़ा हँसा। सरसतिया हुक्के पर चिलम चढ़ाकर फूँकती हुई आई। चिलम को फूँकते समय उसके दोनों गाल गोल हो गए थे। करमा को देखकर वह ठिठकी। फिर गोभी के खेत के बाड़े को पार करने लगी। )

बूढ़ा :-चल बेटी, दरवाजे पर ही हम लोग आ रहे हैं।
( हाथ पैर धोकर बाहर आया।) चलो!
सरसतिया:- बाबा, यह कौन आदमी है?
बूढ़ा :- भालू नचानेवाला आदमी।
सरसतिया:- धेत्त!
( करमा लजाया। क्या उसका चेहरा भालू नचानेवाला जैसा है।)
बूढ़ा :- तुम रिलिफिया बाबू के नौकर हो न?
करमा:- नहीं, नौकर नहीं। ऐसे ही साथ रहता हूँ।
बूढ़ा :- ऐसे ही? साथ में? तलब कितना मिलता है?
करमा:- साथ रहने पर तलब क्या मिलेगा?
( बूढ़ा  हुक्का पीना भूल गया।)
बूढ़ा :- बस? बेमतलब का ताबेदार?( सरसतिया से) सरसतिया ! जरा माय को भेज दो, यहाँ। एक कमाल का आदमी।
( बूढ़ी टट्टी की आड़ में खड़ी थी। तुरत आई।)
बूढ़ा :- जरा देखो, इस किल्लाठोंक-जवान को। पेट भात पर खटता है। क्यों जी कपड़ा भी मिलता है? इसी को कहते हैं- पेट-माधेराम मर्द!
( सरसतिया की पतली खिलखिलाहट, भालू नचानेवाला कहीं पड़ोस में ही तमाशा दिखा रहा है। करमा सोच रहा है।)
करमा:- डमरू के ताल पर भालू हाथ हिला हिला कर थब्बड़ थब्बड़ नाच रहा होगा- थुथना ऊँचा करके!
दृश्य परिवर्तन
भालूवाला:- (भालू से) अच्छा जी भोलेराम, नाच तो खूब बनाया तैने। अब एक बार दिखला दे कि फूहड़ औरत गोद में बच्चा को सुलाकर किस तरह ऊँघती है।
भालू:- ( वैसा करके बताता है)
भालूवाला:- वाह जी भोलेराम!
सभी:-( हँसते हैं)हा हा हा
दृश्य परिवर्तन
बूढ़ा:- तुम्हारा नाम क्या है जी?
करमा:- करमचन
बूढ़ा:- वाह, नाम तो सगुनिया है। लेकिन काम? काम चूल्हचन?
करमा:- (लजाते हुए बात को मोड़ दिया।) आपके खेत का बैंगन बहुत बढ़िया है। एकदम घी जैसा।
( बूढ़ा हँसता है और बूढ़ी की हँसी करमा की देह में जान डाल देती है।)
बूढ़ी:- बेचारे को दम तो लेने दो। तभी से रगेड़ रहे हो।
बूढ़ा:- मछली है? बाबू के लिए ले जाओगे?
करमा:- नहीं। ऐसे ही रास्ते में शिकार।
बूढ़ा:- सरसतिया की माय! मेहमान को चूड़ा भूनकर मछली की भाजी के साथ खिलाओ! (करमा से) एक दिन दूसरे के हाथ की बनाई मछली खा लो जी!
(जलपान करते समय करमा ने सुना, लखमी और सरसतिया बात कर रहे हैं।)
लखमी:- ए सरसतिया की माय! कहाँ का मेहमान है?
बूढ़ी:- कटिहार का।
लखमी:- कौन है?
बूढ़ी:- कुटुम ही है।
लखमी:- कटिहार में तुम्हारा कुटुम कब से रहने लगा?
बूढ़ी:- हाल से ही।

( फिर एक खिलखिलाहट! कई खलखिलाहट!! चिलम फूँकते समय सरसतिया के गाल मोसंबी की तरह गोल हो जाते है। )
बूढ़ी:- अच्छा ए बबुआ! तार के अंदर से आदमी की बोली कैसे जाती है? हमको जरा खुलासा करके समझा दो। ( करमा जा रहा है) बूढ़े की बात का बूरा न मानना। जब से जवान बेटा गया, तब से इसी तरह उखड़ी उखड़ी बात करता है कलेजे का घाव। एक दिन फिर आना। अपना ही घर समझना।
( लौटते समय करमा को लगा, तीन जोड़ी आँखें उसकी पीठ पर लगी हुई है। आँखें नहीं- डिसटन सिंगल, होम सिंगल और पैट सिंगल की लाल लाल गोल गोल रोशनी।)
दृश्य: 06
( करमा वापस आ रहा है। रास्ते में ढोढ़िया साँप मिलता है।)
करमा :- ढोढ़िया साँप ! फों फों करता हुआ भागा। हद है! कुत्ता अभी तक बैठा मेरा राह देख रहा है। ( कुत्ता खुशी के मारे नाचने लगा।) बूढ़े ने उसे बनाकर ठग लिया। तीन रुपए की मोटी मोटी मांगुर मछलियाँ एक चुटकी चूड़ा खिलाकर , चार खट्टी मीठी बात सुनाकर।
( करमा ने मछली की बात अपने पेट में रख ली।)
बाबू:- करमा, तुम्हारी देह से कच्ची मछली की बास आती है। मछली ले आए हो।
करमा:- ( मन ही मन) बाबू तो पहले से जान लेने वाला अगरजानी है। (चुप रहा) जिन्दगी में पहली बार किसी बाबू को विश्वासघात किया है। मछली देखकर बाबू जरूर नाचने लगते।
( परदा गिरता है।)
दृश्य:- 07
( करमा सो रहा है, पर उसे नींद नहीं आ रही है, वह सोच रहा है।)
करमा:- पंद्रह दिन देखते ही देखते बीत गया। अभी रात की गाड़ी से टिसन से साल्टन मास्टर बाबू आए हैं- बाल बच्चों के साथ। पंद्रह दिन से चुप फैमिली क्वाटर में कुहराम मचा है। भोर के गाड़ी के साथ करमा अपने बाबू के साथ हेड-क्वाटर लौट जाएगा। इसके बाद मनिहारीघाट? न आज रात भी करमा को नींद नहीं आएगी नहीं अब वार्निश चूने की गंध नहीं लगती। बाबू मजे में सो रहे हैं। बाबू सचमुच गोपाल बाबू जैसे हैं। न किसी जगह से तिल भर मोह, न रत्ती भर माया। करमा क्या करे? ऐसा तो कभी नहीं हुआ। एक दिन रि आना , अपना ही घर समझना। कुटुम है, पेट माधोराम मर्द।
( करमा सपना देख रहा है।)
अचानक करमा को एक अजीब गंध लगी, वह उठा। किधर से यह गंध आ रही है? उसने धीरे से प्लेटफार्म पार किया। चुपचाप सूँघता हुआ आगे बढ़ता गया। रेलवे लाइन पर पैर पड़ते ही सभी सिंगल- होम, डिसटट और पैट- जोर जोर से बिगुल फूँकने लगे। फैमिली क्वाटर की एक औरत चिल्लाने लगी- चो-ओ-ओ-र। वह भागा। एक इंजिन उसके पीछे-पीछे दौड़ा आ रहा है। मगहिया डोम की छौंड़ी? तंबू में वह छिप गया। सरसतिया खिलखिलाकर हँसती है। उसके झबरे केश, बेनहाई हुई देह की गंध, करमा के प्राण में समा गई। वह डरकर सरसतिया के गोद में--- नहीं उसकी बूढ़ी माँ की गोद में अपना मुँह छिपाता है। रेल और जहाज के भोंपे एक साथ बजते हैं। सिंगल की लाल लाल रोशनी।
बाबू:- करमा उठ! करमा सामान बाहर निकालो।
( करमा एक गंध के समुद्र में डूबा हुआ है। उसने उठकर कुरता पहना। बाबू का बक्सा बाहर निकाला।)
पानी पाँड़े:- कहा सुना माफ करना।
करमा:- ( गंध में डूबा रहा।)---।
( गाड़ी आई। बाबू गाड़ी में बैठे। करमा ने बक्सा चढ़ा दिया। वह सरवेंट दर्जा में बैठेगा। )
बाबू:- सब कुछ चढ़ा दिया तो? कुछ छूट तो नहीं गया?
करमा:- नहीं, कुछ छूटा नहीं है।
( गाड़ी ने सीटी दी। करमा ने देखा , प्लेटफार्म पर बैठा हुआ कुत्ता उसकी ओर देखकर कूँ कूँ कर रहा है। बेचैन हो गया कुत्ता।)
करमा:- बाबू?
बाबू:- क्या है?
करमा:- मैं नहीं जाऊँगा।
( करमा चलती गाड़ी से उतर गया। धरती पर पैर रखते ही ठोकर लगी। लेकिन सँभल गया।)

(परदा गिरता है।)