इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
बाल कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाल कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 26 मई 2023

गलती का एहसास

 

प्रिया देवांगन "प्रियू"
 
          " ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका है। मैंने पहले ही तुमसे कहा था कि हम यहाँ से दूसरे वन को चले जाते हैं, लेकिन तुम मेरी एक नहीं सुनती; अपनी ही मनमानी करती हो। " थोड़ा चिंतित और उदास टीटू चिड़िया अपनी धर्मपत्नी विनी को समझा रहा था। 
          गर्भवती विनी टीटू की बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। चूँकि वे दोनों जानते थे कि यहाँ गर्मी में पानी की बहुत परेशानी होती है और घोंसला भी टूट रहा है। वैसे भी विनी को अकेला रहना पसंद था। किसी से ज्यादा मेल–मिलाप नहीं रखती थी वह। स्वभाव से थोड़ी घमंडी भी थी। टीटू उसको बहुत समझाता था; फिर भी विनी उसकी बातों को यूँ ही उड़ा देती और अपने में ही खुश रहती। 
          कुछ दिन बीते। जंगल में पानी की कमी होने लगी। सभी चिड़िया दाना–पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकल गए। लेकिन टीटू को विनी ने मना कर दिया। यहीं रहने की जिद पर उतर आयी। उसे अकेलापन पसंद था। विनी की जिद पर टीटू ने कुछ कहना चाहा तो विनी टीटू को शांत कराते हुए बोली– " चुप... ! मैं बोल रही हूंँ... मतलब मैं बोल रही हूँ...ना ! " तभी पास बैठी मिन्नी चिड़िया ने विनी से कहा कि तुम ऐसा क्यों सोचती हो विनी। तुम गर्भवती हो और तुम्हारा घोंसला भी टूटने वाला है। ऐसे में तुम अंडे कहाँ दोगी। तुम्हारी देखभाल कौन करेगा। टीटू भोजन की व्यवस्था करेगा या तुम्हारा ध्यान रखेगा। तुम्हें यह सब समझना चाहिए। अरे भाई....!  हम सब के बीच रहकर तो तुम खुश रहोगी। 
          मिन्नी की बातें सुन विनी तमतमा गयी। बोली-  " मुझे किसी की जरूरत नहीं है। तुम जा सकती हो मिन्नी दीदी। " मिन्नी वहाँ से चली गयी। धीरे-धीरे सभी चिड़िया वन छोड़कर चली गयीं। सारा वन सूना हो गया। फिर विनी के मन में तरह-तरह के सवाल उठने लगे। तभी विनी टीटू से बोली- " टीटू ! चलो ना हम आम वाले बगीचे में चलते हैं। मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है। टीटू को गुस्सा आया और चिढ़ाते हुए बोला- " नहीं.... नहीं... विनी। अब हम कहीं नहीं जायेंगे। तुम्हें तो अकेला रहना पसंद है ना ? तुम यहाँ से जाना भी नहीं चाहती। किसी से बात करना भी नहीं चाहती हो। रहो न अब, क्या हुआ ?" फिर विनी रोने लग गयी।
          कुछ समय पश्चात दोनों आम के बगीचे की ओर चल पड़े। टीटू बहुत परेशान था बेचारा। सोच रहा था कि अब कहाँ घोंसला बनाया जाय। सभी चिड़ियों ने घोंसले बना लिये होंगे। टीटू को अच्छी तरह पता था कि विनी के अंडे देने का समय भी लगभग आ ही चुका है।           
          बगीचे में पहुँचते ही विनी थकान महसूस करने लगी। गिड़गिड़ाने लगी- " अब और मैं नहीं उड़ सकती टीटू। मुझे बचा लो। " बोलते-हाँफते हुए विनी बेहोश हो गयी। टीटू घबरा गया। सभी चिड़िया अपने–अपने घोंसले से झाँक –झाँक कर देखने लगीं। विनी के रूखे व्यवहार के कारण किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे बात करने की। तभी एक डाल पर वृद्ध चिड़िया दम्पत्ती रहते थे। विनी की हालत देख कर उन्हें टीटू-विनी पर दया आ गयी। उन दोनों को उन्होंने अपने घर में रहने के लिए जगह दे दी।
          थोड़ी देर बाद विनी को होश आया।देखा कि वह एक बूढ़े दंपत्ती के घर में है। साथ में सभी चिड़िया भी आस–पास थी। विनी को पहली बार अपनापन का एहसास होने लगा। वृद्ध दंपत्ती विनी को समझाते हुए बोले कि  देखो विनी ! हमें सब के साथ मिलजुल कर रहना चाहिए। एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। तुमने कभी किसी से अच्छा व्यवहार नहीं किया, फिर भी आज सभी तुम्हें मदद करने आ गए। आज इन चिड़ियों ने तुम्हें नया जीवनदान दिया है। कभी भी इसका एहसान नहीं भूलना। 
          विनी की आँखों से आँसूओं की झड़ी लग गयी। विनी ने सबसे माफी माँगी। सबने उसे माफ कर दिया। तभी विनी अपने पास बैठी मिन्नी से कहने लगी- " मुझे माफ करना मिन्नी दीदी। मुझसे गलती हो गयी। मैंने तुम्हें गुस्से में बहुत कुछ बोल दिया। " 
          मिन्नी सुबकती विनी को अपनी चोंच से सहलाते हुए मुस्कुरा रही थी।
              ----///----

राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़


शनिवार, 12 नवंबर 2022

प्रभा के बालदिवस

 

         प्रिया देवांगन "प्रियू"
 
       

       प्रभा अउ शालू  दूनोंझन सहेली रिहिसे। सँघरा खेलय-कूदय। पर दूनोंझन स्कूल नइ जावत रहैं। सबले बड़का समस्या की वो मन देवार जाति मा पैदा होय रिहिसे। तेखर कारण पढ़ई-लिखई ले बनेच दुरिहा रहैं। प्रभा ला पढ़े-लिखे के अब्बड़ सउँख रहै। दूसर लइका मन ला स्कूल जावत देखय बेग, कॉपी-किताब,रंगीन ड्रेस त "अगास म उड़े अस लागय। काश ! महूँ स्कूल जातेंव। ओखर जाति मा शिक्षा ला जादा महत्व नइ देवत रिहिसे।
      प्रभा ह अपन माँ ल अब्बड़ जिद्द करे - "माँ महूँ स्कूल जाहूँ न वो... । दूसर ल देखथों त मोरो मन करथे। प्रभा के माँ प्रभा ला चुप करा दे - "काय करबे स्कूल जा के ?" हमर जाति मा पढ़ई-लिखई नइ करे; अउ टूरी मन तो अउ कुछू नइ कर सकँय। चुपचाप बोरी धर अउ जा कबाड़ी; कचरा ला बिन के लाबे, बेचबो तभे तो खाबो का ? कोन सा अफसर बनबे पढ़-लिख के ?"
          प्रभा चुपकन भीतरी मा चल दिस।
प्रभा - शालू ला अब्बड़ बोलय कि शालू चल न हमन घलो स्कूल जाबो। बढ़िया खेल-कूद अउ गाना सिखबो। शालू मना कर दे- "मोला सुउंँख नइ हे । तहू झन जा।"
          प्रभा ला थोर-बहुत हिंदी बोले ला आ जावत रिहिसे। स्कूल के लइका मन ल बोलत देखे त वहू कोशिश करे। अचानक एक दिन बिहनिया ले प्रभा स्कूल जाय के ठान लिस। आज मैं दाखिला करवा के रहूँ। वोहा हिम्मत कर के "अंधियार म तीर चलाये" के सोचिस।
गुरुजी- "मोला पढ़ने का अब्बड़ सउँख है। लेकिन माँ-बाबू मन झन पढ़ कहते हैं। उहाँ के लइका मन ओखर हिंदी ला सुन के अब्बड़ मजाक उड़ावय। गुरुजी ह कुछ सोच-विचार कर के बोलिस कि ठीक हे कल ले आ जाबे। 
प्रभा के खुशी के ठिकाना नइ रहै । प्रभा दउड़त शालू  करा गिस अउ बताइस गुरुजी ह कल ले स्कूल बुलाये हे शालू। तहू जाबे का? शालू मुँह बनात बोलिस - "नहीं मोला नइ जाना हे। प्रभा ठीक हे ! तोर मन!" काहत घर चल दिस।
          दूसर दिन प्रभा बोरी ल धरिस अउ चुपचाप घर ले निकल गे। घर वाले मन सोचिस के काम म जावत हे। शालू ल घर वाले मन ल बताये बर मना कर दे राहै। 
          प्रभा मन लगा के पढ़ाई-लिखाई करय। गुरुजी घलो खुश रहै ।ओखर देवार जाति के कारण ओला बहुत सारा परेशानी के भी सामना करना पड़ै। तभो ले प्रभा हार नइ मानय।
          कुछ दिन बाद स्कूल मा बाल दिवस मनाये बर सूचना दे गिस। प्रभा ये सब नइ जानत रिहिसे की ये होथे का ? ओहर गुरु जी ले पूछिस- "गुरुजी बाल दिवस का होथे। ये दिन लइका मन बाल कटवाथे का ?" गुरुजी हाँस दिस। अउ बताइस- "हमर स्वतंत्र भारत देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के जन्मदिन आय; अउ नेहरू जी ह लइका मन ला अब्बड़ मया-दुलार करै, तेखर सेती ये दिन स्कूल मन म बाल दिवस मनाथे अउ लइका मन ला चॉकलेट बाँटथे। हमर स्कूल म ये दिन जेन लइका पहला आय हे तेन ला इनाम घलो देबो। गीत, कविता, भाषण अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम घलो होही।
प्रभा के मन मा चले लगिस कि मैं भी कुछ बोलहूँ। 
          शालू ला बाल दिवस के बारे म बताइस त शालू के कान म जूँ तको नइ रेंगिस।
बालदिवस म खेल-कूद, भाषण के सूचना गाँव भर फइलगे। जम्मो लइका के दाई-ददा मन स्कूल जाय बर तइयार होगे। दूसर दिन बालदिवस के आयोजन होइस त प्रभा के दाई-ददा घलो गे राहय अउ ओखर समाज वाले मन तको गेय राहैं। प्रभा के दाई के नजर प्रभा ऊपर परिस त ओखर बाबू ला कहिथे देखव तो वो हमर प्रभा हरै लगत हे ड्रेस पहिरे हे त चिन्हात घलो नइ हे। प्रभा के ददा के घुस्सा तरवा मा चढ़ गे। ये टूरी के अतेक हिम्मत के बिन बताये स्कूल आवत हे, आज तो घर म घुसे ल नइ दों। ओखर दाई घलो घुस्सा करे लगिस। 
          स्कूल म खेल-कूद अउ भाषण  प्रतियोगिता होइसे। सब मा प्रभा भाग ले राहे। अउ जीतत भी रिहिसे। प्रभा अपन कक्षा मा पहिला आये रिहिसे, तेकर ईनाम के घोषणा उहाँ के बड़े गुरुजी करिस । जब नाम बताइसे त लोगन के पाँव तरी के जमीन खिसक गे। काबर की प्रभा पहला आये रिहिसे। जोरदार ताली बजाइस। सब के सब ।गुरुजी बताइस कि आज दुनिया म कोनों ल अशिक्षित नहीं रहना चाहिए। निरंतर प्रयास करना चाहिए। प्रभा के पढ़ई म लगन अउ मेहनत ल देख के मँय आगे पढ़ाये के सोचे हँव। येखर माँ-बाबू जी अउ पूरा देवार समाज ले निवेदन हे कि आप अपन समाज ल शिक्षित करव अउ एक दिन प्रभा ये काम ल पूरा करही। भाषण ल सुन के प्रभा के दाई-ददा अउ पूरा देवार समाज के आँखी म आँसू आगे। समझ म आइस की हमन गलत रेहेन। हमर लइका तो हीरा निकलगे। अउ बहुत खुश हो के ओला गला लगा लिस।          
       सबझन ताली बजाइन। ये सब ल देख के शालू ला अब्बड़ पछतावा होवत रिहिसे कि काश ! महूँ प्रभा के बात मान लेतेव त आज ओखर संग मा खड़े रहितेंव।

               -----//-----

रचनाकार
राजिम, जिला - गरियाबंद, छत्तीसगढ़
Priyadewangan1997@gmail.com

बालदिवस की सार्थकता

 टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला"
      

लौह नगरी दल्ली राजहरा के कैम्प वन पिस्दापारा के मीडिल स्कूल में बालदिवस का मंचीय कार्यक्रम आयोजित था। सुसज्जित मंच पर ही एक कोने में ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती व स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के तैल चित्र थे। मंच के ठीक नीचे दोनों ओर तिरंगे लहरा रहे थे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री डी. एल. ठाकुर जी विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी डोंगरगाँव थे। मंच की दायीं ओर सभी शिक्षक बैठे हुए थे; और सामने था दर्शकवृंद, जिसमें बच्चे, युवा, महिला व बड़े-बुजुर्ग थे। सबको काव्यशिखा सिन्हा का नाटक "माँ भारती और पंडित नेहरू" के मंचन का बेसब्री से इंतजार था। तभी मंच पर बच्चों का राष्ट्रपिता बापू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोहम्मद अली जिन्ना के रूप में आगमन होते ही करतल ध्वनि हुई। उन महान विभूतियों के रूप में बच्चे सबको बड़े अच्छे लग रहे थे।
          मंच के सामने बैठे बच्चों का पहनावा बड़ा गजब का था। स्कूल युनीफॉर्म में तो सभी थे; पर आज तो हर कोई पंडित नेहरू जी बनने की फिराक में था। कोई ब्लैक कलर कोट पहना था, तो कोई सर पर सफेद खादी की टोपी। किसी ने अपनी शर्ट पर लाल गुलाब खोंसा था; तो किसी ने पंडित नेहरू जी का चित्र बना हुआ चमकीला बैज लगाया था। सारे बच्चे नेहरुमय हो गये थे; और सभी के हाथों में तिरंगे थे।
          मंच पर नाटक की बड़ी सुंदर प्रस्तुति हो रही थी। सबका ध्यान मंचस्थ बच्चों पर था। दर्शकों द्वारा उनका हौसला अफजाई हो रही थी। देखते ही देखते स्कूल परिसर में भीड़ बढ़ती जा रही थी। व्यवस्था न गड़बड़ाये, इससे पहले हेडमास्टर आर. सी. कौर जी के कहने पर शिक्षक यदु जी ने प्यून रवि को मंच के पीछे और प्लास्टिक कुर्सियाँ जमाने के लिए इशारा किया।
          पहले से ही स्कूल परिसर के बाहर हाथठेले से कुर्सियाँ मँगवा ली गयी थी। फिर ठेलावाला एक-एक करके कुर्सियाँ ठेले से उतार कर जमीन पर रखने लगा। नीचे रखी कुर्सियों को उसका बेटा प्यून को देते जा रहा था, और खुद लाकर भी यथास्थान रखते जा रहा था। उस बालक की उम्र लगभग तेरह-चौदह वर्ष की रही होगी। वह कुर्सियों को रखते-रखते बार-बार मंच की ओर देखता था। उसे कार्यक्रम बहुत अच्छा लग रहा था।
          सब के सब मंचस्थ प्रस्तुति पर ध्यानमग्न थे। तभी मुख्य अतिथि ठाकुर जी की नजर कुर्सी जमा रहे बालक पर पड़ी। उन्हें बड़ा आश्चर्य लगा कि इतनी कम उम्र का बच्चा यह काम कर रहा है; और वो भी स्कूल परिसर में और युनीफॉर्म में ही। लग तो नहीं रहा था कि वह आज स्कूल आया है। उस बालक का बार-बार खड़े होकर व मुड़-मुड़कर कार्यक्रम देखना ठाकुर जी को सोचने पर विवश कर दिया था। आखिर उनसे नहीं रहा गया। अपने समीप बैठे हेडमास्टर कौर जी से जानकारी ली। 
          उस बालक का नाम था करण। उसके पिता मोहन लाल इसी शहर के ही एक स्लम एरिया हरिनगर का रहने वाला था। मोहन लाल की पत्नी गोदावरी का साल भर पहले एक लम्बी बीमारी के चलते देहावसान हो चुका था। रह गये थे उनके दोनों बच्चे करण और हेमा बिटिया। दोनों बच्चे बड़े इंटिलीजेंट थे। पत्नी के चले जाने से मोहन लाल की स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी। करण भी अपने पिता की परेशानी से वाकिफ़ था। एक दिन उसने कहा था- "बाबूजी ! मैं अब स्कूल नहीं जाऊँगा। घर की हालत ठीक नहीं है। मैं आपके साथ काम पर जाऊँगा। आपको मदद करूँगा।" कुछ देर तक करण की बातें सुन मोहन लाल खामोश रहा; फिर उसे समझाया - "पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है बेटा। मैं कमाऊँगा, और तुम्हें पढ़ाऊँगा। तुम अभी पढ़ाई मत छोड़ो। अभी तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई की उम्र है।" लेकिन करण अपनी जिद पर अड़ा रहा। बोला- "आप भी बहुत कमजोर हो चुके हैं बाबूजी। अब आप अकेले से ही घर नहीं चलेगा। हम दोनों काम करेंगे। वैसे भी मैं सातवीं पास तो हो ही गया। मैं अपना नाम भी लिख लेता हूँ; पढ़ना भी तो आ जाता है सब। मैं स्कूल जाऊँगा, और आप काम पर। यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा।" 
          फिर मोहन लाल चिंतित स्वर में बोला- "फिर हेमा का क्या होगा ? वह कैसे जाएगी अब स्कूल। तुम्हारे साथ ही जाती थी। घर में अकेली भी नहीं रह सकती।" दोनों पिता-पुत्र कुछ देर तक शांत रहे। फिर मोहन लाल ने कहा- " एक काम करते हैं। उसके लिए भी बस स्टैंड के एक होटल में बात करते हैं। होटल वाला बोल रहा था उस दिन, एकाध बच्चे मिल जाते तो अच्छा होता। हमारी हेमा उस होटल में रहेगी तो अच्छा भी होगा। हम सब एक ही जगह पर रह जाएँगे दिन भर के लिए।" इस तरह पिता-पुत्र की योजना तैयार हो गयी।
          मोहन लाल रोज करण और हेमा को ठेले पर बिठा कर बस स्टैंड ले जाया करता था। करण को वह अपने साथ रखता था; हेमा को होटल में छोड़ देता। करण ठेला पेल-खींचकर व समान उतार-चढ़ा कर अपने पिता की मदद करता था। नन्हीं हेमा होटल में कप-प्लेट उठाने का काम करती थी। आसपास के दुकानदारों को चाय पिलाया करती थी। उसे यह सब करना बड़ा अच्छा लगता था। वह खेल-खेल में यह सब कर लेती थी। दिन भर उसे पिता व भाई भी दिख जाते थे। वह बहुत खुश थी। साँझ होते ही तीनों एक साथ घर आ जाते थे। इस तरह मोहन लाल की गृहस्थी चल रही थी।
          खंड शिक्षा अधिकारी ठाकुर जी को पूरा मामला समझ आ गया। वे सोच-विचार में डूब गये। यह मुद्दा उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। फिर हेडमास्टर कौर जी ने खंड शिक्षा अधिकारी ठाकुर जी के कहने पर करण, हेमा और मोहनलाल को स्कूल में बुलवाया। मंच पर कार्यक्रम चल ही रहा था। ठाकुर जी के साथ सबके-सब एक कमरे में गये। करण-हेमा के शाला त्याने पर गम्भीर चर्चा हुई। इस दरम्यान छोटी-मोटी कड़ुवी बातें भी हुई। सब अपनी-अपनी सुरक्षा के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहे। शिक्षा जैसे एक संवेदनशील महकमे का यह अति संवेदनशील मामला था, सो सबने विवेक से इस सीरियस मैटर को सिम्पली सुलझाना उचित समझा। अंततः हर हाल में करण और हेमा का पुनः स्कूल आना तय हो गया। सभी मंच के समीप अपनी-अपनी जगह पर आकर बैठे।
          अब सूरज पश्चिम की ओर खिसकने लगा। शाम होने लगी। सांस्कृतिक कार्यक्रम का समापन हुआ। सबने बालदिवस की महत्ता व कार्यक्रम की सफलता पर बातें रखीं। अंत में ठाकुर जी ने आतिथ्य उद्बोधन में बहुत सारी बातें रखते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही- "... मुझे और बहुत सारी बातें कहनी थी, पर अब बहुत ही संक्षिप्त में बात रख रहा हूँ। इस विद्यालय के दो बड़े होनहार बच्चे करण और हेमा, जो भाई-बहन हैं, ने अपनी पढ़ाई -लिखाई छोड़ दी थी; वे पुनः स्कूल आएँगे। इनका नियमित स्कूल आना अनिवार्य व अनवरत जारी रहेगा। इनका स्कूल आना अब किसी प्रकार बाधित नहीं होगा। जब तक इन दोनों की स्कूल आने की समुचित व्यवस्था नहीं होती है, तब तक ये दोनों बच्चे मेरे घर में रहेंगे। साथ ही, इन बच्चों की अध्ययन सामग्री सम्बंधित व्यवस्था हेडमास्टर कौर जी की जिम्मेदारी होगी।" दोनों बच्चे खंड अधिकारी ठाकुर जी के अगल-बगल खड़े थे। शाला परिसर में उपस्थित जनसमूह शांत होकर अधिकारी महाशय की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे। अपने पिता की द्रवित आँखें देख करण और हेमा उससे लिपट गये।
          इस बार बालदिवस को स्कूल कैम्पस से बाहर निकलते हुए लोग बतिया रहे थे - " एक अधिकारी को ऐसा ही होना चाहिए। शिक्षा की ऐसी व्यवस्था होनी ही चाहिए। इस साल लगा बालदिवस मनाये जैसा।" एक व्यक्ति ने तो यह तक कह डाला कि आज तो स्वर्ग से पंडित चाचा नेहरू भी मुस्कुरा रहे होंगे कि उनका जन्मदिवस मनाना सार्थक रहा।"
          -----//-----
व्याख्याता (अंग्रेजी)
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय - घोटिया
जिला - बालोद (छत्तीसगढ़)
सम्पर्क : 9753269282.

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

बादल और बच्चे

 

           
टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला"
 
        सावन का आठवाँ दिन था। सुबह की स्वर्णिम धूप बड़ी रमणीय थी। दोपहर होते तक वातावरण उमस हो गया। शाम तक नीलगगन में बदली छा गयी। अंधेरी रात और अधिक घनी होने लग गयी। मध्य रात को तेज हवा चलने लगी। आकाश में छाए बादलों के टुकड़े हिलने-डुलने लगे। न चाहते हुए भी उन्हें इधर-उधर होना पड़ा। अब तो बस तीन टुकड़े ही रह गये। दो बड़े और एक बहुत ही छोटा टुकड़ा। फिर तीनों टुकड़े भी उड़ने की तैयारी कर रहे थे, तभी छोटे टुकड़े बादल ने कहा-  "पापा जी ! मैं यहाँ अकेला नहीं रहूँगा। मैं भी जाऊँगा आप दोनों के साथ।"
            "नहीं बेटा ! तुम अभी बहुत छोटे हो। हवा भी तेज चल रही है। पता नहीं, हमारा कहाँ जाना होगा। तुम यहीं इधर-उधर होकर अपना समय बिताओ।" पापा बादल ने अपने बेटे छोटकू बादल को समझाया।
            "नहीं जी, हम अपने बेटे को यहाँ अकेले नहीं छोड़ेंगे। आजकल हवा बहुत मनचली हो गयी है। उसका कोई ठिकाना नहीं है। इसे कब और कहाँ उड़ा कर ले जाय।" इससे अच्छा हम इसे अपने साथ ले चलते हैं।" मम्मी बादल बोली‌।
            आखिर छोटकू बादल का मम्मी-पापा के साथ जाना तय हो ही गया। तीनों बादल रातभर आकाश में उड़ते रहे। जंगल, झाड़ी, नदी, पहाड़-पर्वत से होकर एक गाँव में पहुँचे; तब तक सुबह भी हो गयी। गाँव वाले अपने-अपने काम में व्यस्त थे। तभी अचानक बादलों की नजर मैदान में खेल रहे बच्चों पर पड़ी। बच्चे उन्हें बड़े प्यारे लगे। जरा रुके; और उन्हें खेलते हुए देखने लगे। फिर वहाँ से उनकी चलने की तैयारी हो ही रही थी कि छोटकू बादल बोला- "पापा जी ! मम्मी जी ! मैं यहीं रुक जाऊँ क्या ? इनके साथ मेरा खेलने का मन कर रहा है। इन्हें मैं अपना मित्र बना लूँ ?"
            "तुम भी न...!" पापा बादल ने मुस्कुराते हुए कहा।         
            "ठीक है बेटा। पर इन बच्चों के पास मत जाना। वे डिस्टर्ब होंगे। यहीं से तुम उन्हें देखते रहना; और यहीं आसपास ही रहना। यहाँ से कहीं और दूसरी जगह बिल्कुल नहीं जाना।" मम्मी बादल छोटकू के पास जाकर बोली। फिर मम्मी-पापा दोनों वहाँ से चले गये।
            शोरगुल करते हुए बच्चे अपने में बड़े मस्त थे। उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं था। मैदान के चारों ओर हरियाली थी। नीला  आकाश बड़ा सुंदर लग रहा था। खेलते हुए बच्चों को देख छोटकू बादल का उनसे मिलने का मन कर रहा था। पर उसे अपने मम्मी-पापा की हिदायत याद थी। आखिर बच्चा बच्चा ही होता है। मन सच्चा भी होता है; और कच्चा भी। अब उससे नहीं रहा गया। उसने आवाज लगायी- "मित्रों !" 
             बच्चों ने एक अपरिचत आवाज सुनी। वे इधर-उधर देखने लगे। तभी अचानक उनकी नजर ऊपर आकाश की ओर गयी। उन्हें एक छोटा सा बादल दिखाई दिया। फिर एक ने पूछा- "कौन...?"
            "मैं छोटकू बादल हूँ।" ऊपर से आवाज आयी।
            "छोटकू बादल ! कौन छोटकू बादल ?" बच्चों को आश्चर्य हुआ। 
            "तुम सभी जैसा मैं भी एक बादल बच्चा हूँ।" छोटकू बादल बोला। 
            "तो तुम क्या चाहते हो हमसे ?" बच्चे बोले।
            "मैं तुम सब से दोस्ती करना चाहता हूँ। मुझे भी अपना दोस्त बना लो। मैं तुम सब के साथ खेलना चाहता हूँ। छोटकू बादल ने अपनी मन की बात कही।
            "यह कैसे हो सकता है ?" बच्चों का अचम्भित स्वर निकला।
             "हो सकता है मेरे मित्रों। देखो... ना गर्मी भी बढ़ रही है। तुम सब तक मेरे पहुँचने से वातावरण में नमी आयेगी। हल्की सी बारिश होगी। और फिर बारिश में भीगते हुए खेलने में बड़ा मजा आएगा।" छोटकू बादल के मन में बड़ा उतावलापन था। 
             "बारिश होगी तुम्हारे आने से;  हम सबको बहुत मजा आएगा। वो कैसे भाई ?" कुछ समय तक बच्चे खामोश रहे। आपसी सलाह-मशविरा हुआ; और फिर सबने हामी भर दी।
               छोटकू बादल के धरती पर आते ही बच्चे खुशी से झूम उठे। खूब नाचे-कूदे। खूब किलकारी गूँजी। देखते ही देखते शाम होने लग गयी। वे अपने-अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे, तभी छोटकू बादल ने उनसे कहा-"मित्रों ! कल और आना।"
          ‌‌ ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌   "ठीक है। पर अब तुम क्या करोगे ? कहाँ जाओगे ?" दो-तीन बच्चों ने पूछा। 
              "देखो मित्रों, वातावरण में फिर ऊष्णता आ रही है। मैं अब वाष्प बनकर ऊपर जाऊँगा। मेरा अपने जल रूप से वाष्प बनना ही वाष्पीकरण है।" कहते ही छोटकू बादल का पानी से वाष्प बनना शुरू हुआ।
             "अच्छा मित्र ! अब हम लोग भी चलते हैं। सी यू अगैन टुमॉरो। बॉय।" कहते हुए बच्चे घर लौट गये।
             इस तरह दूसरे दिन से रोज बच्चों और छोटकू बादल का मिलना-जुलना और खेलना-कूदना चलने लगा। छोटकू बादल और बच्चों की मित्रता प्रगाढ़ होती गयी। बच्चे बढ़ने लगे। छोटकू बादल का आकार भी बढ़ने लगा।छोटकू बादल को वहाँ से जाना उचित नहीं लगा। आसपास का क्षेत्र उसका निवास-स्थल हो गया। पूरे क्षेत्र में अच्छी बारिश होने लगी। खूब पेड़-पौधे उगने लगे। मिट्टी का कटाव बंद होने लगा। बारिश का पानी पर्याप्त मात्रा में जगह-जगह एकत्रित होने लगा; जिससे भूमि का जलस्तर बढ़ने लग गया। नदी-नाले, पोखर, कूप-सरोवर, जलपम्प सब लबालब होने लगे। लोगों को लगने लगा कि पेड़-पौधे अच्छी वर्षा होने में सहायक होते हैं। लोग पानी और बारिश का महत्त्व समझने लगे। जगह-जगह बांध बनवाये जाने लगे। वृक्षारोपण का काम युद्धस्तर पर होने लगा। अनावश्यक जलप्रवाह की रोकथाम की जाने लगी। कृषि उपज में वृद्धि होने लगी। पूरे अंचल में हरियाली व्याप्त होने लगी। सुख-समृद्धि बढ़ने लगी। लोगों का जीवन ही बदल गया।


व्याख्याता (अंग्रेजी )
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)
सम्पर्क : 9753269282

सोमवार, 30 मई 2022

कटखनी बिल्ली

सुधा भार्गव

     एक बिल्ली थी बड़ी मरखनी बड़ी कटखनी। किसी को देखते ही दाँत निकालकर घुर्राने लगती और किसी चूहे को देख लिया तो समझो उसकी खैर नहीं। चूहा भाग बिल्ली आई कहते ही बनता। उसमें एक खास बात थी। एक दिन में वह एक ही चूहा खाती और मजे से खर्राटे भर सो जाती । फिर तो चूहा उसकी कमर पर ही क्यों न फुदकने लगे उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं।
      बिल्ली के कारण चूहे बड़े परेशान! चाहे जब उनके परिवार से एक गायब हो जाता। कोई अपनी माँ को खोजता - सुबकता नजर आता तो कोई माँ बाबरी सी बच्चे को ढूंढती मिलती। सुबह उठते ही न राम - राम न श्याम - श्याम बस चेहरे पर दुख की काली परछाईं रहती ..आज कौन कटखनी का शिकार हुआ!
     एक दिन एक बुजुर्ग चूहे ने सब चूहों को बुलाया और कहा - रोज बिल्ली हममें से किसी एक को न जाने कब - कब में चुपचाप गटक जाती है.... पता ही नहीं चलता । इससे तो अच्छा है हममे से कोई एक खुद ही उसके सामने हाजिर हो जाए। लेकिन पहले किसको भेजा जाए?
    नासमझ चूहे बच्चे फुदकते सामने आए - हम,हम जाएँगे, हम जाएँगे।
- अरे भागो यहाँ से। तुम्हारी तो खाने - खेलने की उम्र है। तुममें से कोई नहीं जा सकता। एक बड़ा चूहा चिल्लाया।
बच्चे डरकर पीछे हो गए। उनकी जगह जवान चूहों ने ले ली। बड़े जोश से चिल्ला - दादा चिंता न करो,हम जाएँगे।
- अरे चुप करो। तुममें से कोई चला गया तो तुम्हारी चुहिया रानी और बच्चों को कौन देखेगा? आश्चर्य से जवान पीछे हट गए कि अब कौन जा सकता है।
      बूढ़े चूहे दादा ने सिर खुजलाते हुआ कहा - सोच रहा हूँ मैं ही पहले चला जाऊँ। मेरे बच्चे भी बड़े हो गए हैं। जिंदगी भी बहुत जी ली। बच्चे मेरे सामने कटखनी के पेट में चले जाएँ, यह मैं नहीं सह सकता।
- यह तुमने ठीक सोचा। पर तुमको अपने से पहले कैसे जाने देंगें। तुमसे मैं बहुत प्यार करता हूँ दोस्त। तुम्हारे बिना कैसे रहूँगा! दूसरा बुजुर्ग चूहा बोला।
- ठीक कह रहा है यह। लेकिन सबसे पहले मैं जाऊंगा। तुम लोग बाद में जाना। अन्य मित्र आगे निकलकर बोला।
- यह कैसे हो सकता है? पहले मैं जाऊंगा। पहले मैं जाऊंगा। सारे वृद्ध चूहे दो पैरों के बल खड़े होकर पूंछ हवा में हिलाने लगे।
- उफ, तुम समझते क्यों नहीं। एक बार में तो एक ही जाएगा। मैं तुम सब से बड़ा हूँ, इस नाते मेरी बात भी माननी चाहिए। और हाँ, तुममे से एक उस बिल्ली को खबर कर देना कि उसे कष्ट उठाने की जरूरत नहीं। हममें से एक चूहा खुद ही उसके पास पहुँच जाएगा।
      सबको दादा चूहे की बात माननी पड़ी पर उनकी आँखों के कोने गीले थे। बिल्ली को जब मालूम हुआ कि उसका शिकार खुद चलकर उसके पास आयेगा तो रात भर खुशी से इठलाती रही।
     किसी भी वृद्ध चूहे को रात भर चैन न पड़ा। भोर होते ही वे अपने बिलों से निकल पड़े और एक लाइन में धीरे - धीरे जंगल की ओर बढ़ने लगे। बिल्ली के पास आकर ही रुके। वहाँ बूढ़ा दादा पहले से ही मौजूद था। न ही बिल्ली समझ पाई कि यह मामला क्या है। न ही दादा की समझ में कुछ आया। बस दोनों अपलक उनकी ओर देख रहे थे। अंत में बिल्ली ने ही चुप्पी तोड़ी - इतने सारे चूहे! तुम यहाँ क्या करने आए हो ? मैं तो केवल एक खाऊँगी।
- तुम हमारी जानी दुश्मन हो पर लगती तो बहन ही हो। अच्छा बहन बताओ,हम कैसे सहन कर सकते हैं कि हमारे रहते बड़ा भाई हमसे बिछुड़ जाए। हम इसके बिना नहीं रह सकते है। इससे तो अच्छा है इसको छोड़ मुझे खा लो। दूसरा चूहा बोला।
- अरे तू कैसी बात कर रहा है। बहन इसकी बात न सुनो। इसकी तो मति मारी गई है। जब यह मेरे बिना नहीं रह सकता तो मैं इस छोटे के बिना कैसे रहूँगा। जल्दी से मुझ खाकर अपनी भूख मिटाओ। तुम्हें भूख भी लग रही होगी। बूढ़े दादा बोले।
      बिल्ली उनकी बातें सुन हैरत में रह गई। उसने न कभी किसी को इतना प्यार किया था और न ही किसी को इतना प्यार करते देखा था। वह तो सिर्फ अपने को प्यार करती थी और अपने लिए दूसरों की जान लेने को तैयार थी। वह उनके प्यार के झरने में ऐसी नहाई कि उसका कठोर दिल मोम की तरह पिघलने लगा।
बोली - जब तुमने मुझे बहन कहा है तो बहन का फर्ज भी पूरा करना ही पड़ेगा। मैं अब तुम्हें कैसे नुकसान पहुंचा सकती हूँ?
वह बिना किसी को खाये चुपचाप वहाँ से ओझल हो गई।

सुधा भार्गव
बैंगलोर

रविवार, 23 मई 2021

सोने का पत्‍ता

एक समय की बात है एक औरत अपने छोटे से घर में अपने दो बच्चों के साथ रहा करती थी वह बहुत ही गरीब थी। वे इतनी गरीब थे कि उन्हें खाने पीने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता था कभी-कभी तो उन्हें भूखे पेट ही सो जाना पड़ता। ऐसे में वह औरत रोज रात को आसमान की ओर देखकर एक ही बात कहती कि काश हमारी जिंदगी सुधर जाए और हम सब अच्छे से रहने लगे। और उनके साथ ऐसा हुआ भी। एक रात वहां से एक परी गुजर रही थी और उस परी ने उस औरत की दुर्दशा देखी और उसकी बातों को ध्यान से सुना।
उसे सुनकर उस परी को दया आ गई और परी ने उस औरत को एक पेड़ दिया और उसे कहा कि इस पेड़ में से जब कभी भी कोई पता नीचे गिरेगा वह सोने का बन जाएगा। उस सोने को तुम बाजार में बेचकर पैसे ला सकती हो और अपने घर को खुशी-खुशी चला सकते हो।
यह सब होता देखो औरत बहुत ही खुश हुई। अब उसके हालात पहलें से सुधर चुके थे। अब उसे और उसके बच्चों को जी भरकर खान भी मिलता।
वह औरत उस पेड़ का अच्छे से खयाल रखने लगी और समय पर उसे सोना मील जाता। धीरे-धीरे पेड़ उन्हें ज्यादा पत्तियाँ देने लगा। ऐसे मे वें ओर भी अमीर होते चले गए।
लेकिन, उस औरत की लालच बढ़ती चली गई ओर उसने सोचा की क्यो ना पूरी पत्तियों को एक साथ निकालकर बेच आती हूँ इससे रोज़-रोज़ का का कोई झंझट नही होगा ओर पैसे हमारे पास एक साथ आ जायेंगे। उस औरत ने ऐसा ही किया। औरत ने पेड़ के सारे पत्ते निकाल लिए और फिर वह पत्तों को सोने मे बदले का इन्तज़ार करने लगी। समय बिता लेकिन पत्ते सुख गए और ऐसे ही रह गए।
अब पेड़ भी सुख गया और औरत के पैसे धीरे-धीरे खतम होने लगे। कुछ महिनो पश्चात महिला वापस गरीब हो गए। अब उसकी हालात पहले जैसे हो चुकी थी।

हीरा और ज्ञानी पेड़

          एक समय की बात है। एक गाँव में मेहनती किसान रहता था। उसका नाम हीरा था। वह इतना मेहनती था की लोगो ने उसका नाम ही मेहनती रख दिया था। अब दिक्कत यह थी की वह जितना भी मेहनत करता उससे उतना फल कभी नहीं मिला। गाँव मे ऐसे बहुत से लोग थे जो कम मेहनत किए भी ज्यादा धन दौलत कमाते थे।खुशी खुशी जीवन जीते थे। इन्हे देख हीरा उदास हो जाता ओर सोचता की ऐसा क्या करें जिससे मेरा जीवन भी सुधर जाए। और भी दूसरो की तरह जीवन जी सकूँ।
          इन्हीं सब बातों को सोच कर वह दुखी रहने लगा। ऐसा करके अपना सारा दिन व्यर्थ कर देता। एक दिन जब वह जंगल के मार्ग से जा रहा था। तो वह थक कर एक पेड़ के निच्चे बैठ गया। पेड़ के निच्चे बैठ कर वह उन्ही बातों को सोचकर अपने आप को कोस रहा था। तभी वहाँ पिच्चे से आवाज़ आई, “तुम्हारें परेशानियों का कारण मैं जनता हूँ और मैं तम्हें उसे दूर कैसे करना हैं यह भी बता सकता हूँ”
          अचानक यह आवाज सुनकर हीरा घबरा गया। उसने अपने आसपास देखा लेकिन उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया तो वह चिल्लाकर बोला, “कौन है जो यह बातें कह रहा है?”
           फिर एक आवाज आई, “यह मैं बोल रहा हूं तुम्हारे पीछे का यह पेड़ जिसके नीचे तुम बैठे हो। मैं एक ऐसा पेड़ हूँ जो लोगों की इच्छाएं पूरी करता है। और तुम्हें निराश देखकर मुझे लगता है कि मुझे तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करना चाहिए। तो कहो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं?”
          ऐसे में हीरा बहुत देर तक घबराकर सोचता रहा कि आखिर यह हो क्या रहा है। फिर थोड़ा समय लेने के बाद हीरा ने उस पेड़ से कहा, ” मैं जितनी मेहनत करता हूं इतनी मेहनत कोई भी नहीं करता लेकिन उसके अनुरूप मुझे फल नहीं मिलता। तो मैं चाहता हूं कि मुझे थोड़ी धन दौलत मिले जिससे मैं अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर सकूं।”
          पेड़ ने हीरा की बात सुनी और उससे कहा कि जाओ तुम्हारी इच्छा में पूरी करता हूं अगले 30 दिन तक तुम्हें जितने भी धन की जरूरत होगी, वो तुम्हें अपने आप मिल जाएगी और तुम्हें उसका जिस तरह से इस्तेमाल करना हो तुम वह कर सकते हो।
          वैसे में हीरा बहुत ही खुश हो गया और खुश होकर सीधे अपने घर की ओर चल पड़ा घर जाते ही उसने देखा कि उसके अलमारी की तिजोरी पूरी पैसों से भरी पड़ी थी। उसने उन पैसों से सारी ऐसो आराम की चीजें खरीदी और जहां हो सकता था वहां उस पैसे को खर्च किया। ऐसा करते-करते उसने अगले के 30 दिन पूरे आशाराम और अच्छे से पैसे खर्च करने में लगा दिया।
          समय समाप्त हो चुका था। हीरा को जितने भी पैसे मिले उसने सारे खर्च कर दिए थे और अब उसके पास एक भी पैसा नहीं बचा था। ऐसे में हीरा फिर से उदास हो गया और अपने आगे की चीजों को लेकर फिर से चिंतित हो गया।
          हीरो फिर से उस पेड़ के पास गया और जाकर उसे कहने लगा कि मुझे और भी पैसे चाहिए और भी समय चाहिए ताकि मैं उन पैसों को जमा कर सकूं।
          फिर पेड़ ने उसे कहा कि यही तो तुम्हारी परेशानी है कि तुम जितना मेहनत करते हो तुम्हें उसके अनुसार पैसे भी मिलते हैं लेकिन तुम उन पैसों की कदर नहीं करते और उन्हें जहां मिले वहां खर्च कर देते हो। जिससे कि तुम्हारे पास भविष्य के लिए पैसे नहीं बचते और तुम दूसरों से अपनी तुलना करना चालू कर देते हो तो मगर दूसरों को देखो तो दूसरी पैसों की कदर करके उसे अपने भविष्य के लिए बचाते हैं और खुशहाल होकर जिंदगी जीते हैं।
          यह सुनकर हीरा की आंखें खुल गई और उसने अपने निर्णय लिया कि मैं जितनी भी मेहनत करूंगा और उसका जितना भी मुझे पैसे मिलेगा मैं उसे सही तरीके से खर्च करूंगा और अपने भविष्य के लिए बचा लूंगा। बच्चों की कहानियाँ ।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

ईमानदारी का ईनाम

कल्‍पना  कुशवाहा


एक गाँव में कृष्णा नामक व्यक्ति रहता था। वह बहुत गरीब था। वह कम पढ़ा लिखा था और गाँव के ही सेठ जी के अनाज के गोदाम में हिसाब - किताब का काम किया करता था। उसके घर में उसकी पत्नी विमला दो बच्चे नन्दू और नन्दिनी थे। नन्दिनी दो साल की और नन्दू छह साल का था, जो गाँव के ही एक विद्यालय में दूसरी कक्षा में पढ़ता था। कृष्णा का बड़ा अरमान था कि वो अपने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाकर बेटे को बड़ा अफसर और बेटी को डॉक्टर बनाएगा मगर उसका गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था।
कृष्णा की पत्नी इस बात से हमेशा उदास रहती थी।
एक दिन उसने कृष्णा से कहा - अजी कब तक ऐसे ही चलेगा? आप कुछ करते क्यों नहीं?
कृष्णा ने कहा - मैं और क्या करूँ? जितना जो बन पड़ता है, सब करता हूँ फिर भी पूरा ही नही पड़ता।
- अरे सेठजी से कर्ज़ ही ले लीजिये या फिर मदद माँग लीजिये। देखिए, अपने पड़ोसी रामू को आपके साथ काम करता था आज उसके दो बीघे खेत हैं। और हमारे पास क्या है?
- अरे भाग्यवान, कर्ज लेना भी चाहें तो कौन देगा? हमारे पास कुछ गिरवी रखने को भी तो नहीं है। और वो दो महीने की सजा भी तो काट के आया है जेल में, हेराफेरी के चक्कर में। देखो भाग्यवान, हमें ईमानदारी से अपना काम करना चाहिए और जो है उसी में खुश रहना चाहिए बाकी सब भगवान पर छोड़ देना चाहिए।
- भगवान पर छोड़ दो, ईमानदार रहो, घर में चाहे बच्चे भूख से मर जाएँ। कहते कहते विमला आँखों में आँसू लिए घर के बाहर चली गयी।
नन्दू ने पूछा - पिताजी, ये ईमानदारी क्या होती है?
कृष्णा ने उसे अपनी गोद में बिठाकर कहा - हमें अपना हर काम सही से करना चाहिए। किसी से बगैर पूछे उसकी चीज नहीं लेनी चाहिए। झूठ नहीं बोलना चाहिए। बेईमानी नहीं करनी चाहिए। कभी रिश्वत नहीं लेनी चाहिए। चाहे कितनी भी बड़ी समस्या हो हमें हमेशा ईमानदार रहना चाहिए।
नन्दू ने कहा - अच्छा पिताजी।
कृष्णा ने कहा - हाँ अब जाओ और जाकर खेलो।
कृष्णा के गाँव बगल के गाँव के एक मास्टर जिनका नाम दीनानाथ था। उनकी गाँव में काफी जमीन जायदाद थी मगर फिर भी उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा था वो रोज विद्यालय के बाद साइकिल से उसके गाँव के विद्यालय में पढ़ाने के बाद साहूकार के घर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आते थे।
नन्दू हर रोज आते - जाते उनको नमस्ते किया करता था। मास्टर जी भी नन्दू को आशीर्वाद देकर चले जाते।
आज भी ठीक वैसा ही हुआ मास्टर जी अभी कुछ दूर ही पहुंचे थे कि उनकी जेब से एक लिफाफा नीचे गिर गया। नन्दू जोर से बोला - मास्टर जी आपकी जेब से कुछ नीचे गिर गया।
जो कि मास्टर जी को सुनाई नहीं दिया और वो साइकिल लेकर आगे बढ़ गए। नन्दू दौड़कर गया और वो लिफाफा उठाया। मास्टर जी अभी भी उसे दिखाई दे रहे थे।
वो उनके पीछे चिल्लाते हुए दौड़ने लगा और रास्तेभर चिल्लाता रहा, मगर मास्टर जी ने उसकी आवाज नहीं सुनी।
रास्ते में मास्टर जी एक चाय की दुकान पर चाय पीने के लिए रुके कुछ ही देर में नन्दू दुकान पर पहुंच गया और हांफते हुए बोला - मास्टर जी! मास्टर जी ये आपकी जेब से नीचे गिर गया था। मैंने बहुत आवाज लगाई मगर आपने सुनी नहीं इसलिए मैं दौड़कर आपको ये देने के लिए आया हूँ।
मास्टर जी ने नन्दू के हाथ से लिफाफा लिया और नन्दू को अपने पास बिठाया। उसे पानी पिलाया और उसके लिए कचौड़ी भी मंगाई मगर नन्दू ने खाने से इंकार कर दिया और कहा - मुझे घर छोड़ दीजिए मैं घर नहीं जा पाऊंगा।
मास्टर जी ने उससे पूछा - नन्दू मैं तो रोज तुम्हारे घर के सामने से निकलता हूँ, तुम ये लिफाफा कल भी तो मुझे दे सकते थे। उतनी दूर से यहाँ तक दौड़कर आने की क्या जरूरत थी।
नन्दू ने बड़ी ही मासूमियत से उत्तर दिया - मास्टर जी, ये आपका था इसे मैं कैसे रख सकता था। पिताजी ने कहा था दूसरे की चीज कभी नहीं लेनी चाहिए और कैसी भी स्थिति हो हमें हमेशा ईमानदार रहना चाहिए।
मास्टर जी ने नन्दू की बातें सुनकर उसे शाबाशी दी और अपनी साइकिल पर बिठाकर वापिस उसके घर ले गए। नन्दू के माता - पिता बहुत परेशान थे उन्होंने नन्दू को देखा तो कृष्णा ने झट से उसे अपनी गोद में उठा लिया और कहा - कहाँ चला गया था तू और मास्टर जी आप यहाँ।
नन्दू ने उन्हें सारी बात बताई फिर मास्टर जी बोले वाह भाई कृष्णा, तुम्हारा बेटा नन्दू तो बहुत ही होशियार और ईमानदार है। उन्होंने कुछ पैसे कृष्णा को देते हुए कहा - मैं तुम्हारी समस्याओं से वाकिफ  हूँ। तुम चाहो तो मेरे यहाँ नौकरी कर सकते हो।
कृष्णा ने कहा - अरे नहीं मास्टर जी इन पैसों की कोई जरूरत नहीं है। मैं कल से ही काम पर आ जाऊंगा।
मास्टर जी ने कहा - रख लो, और मेरे बेटे का शहर में विद्यालय है तुम्हारे दोनों बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वहीं पढ़ेंगे अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो।
कृष्णा ने कहा - आपकी बहुत दया होगी मास्टर साहब, आप बड़े दयालु हैं। हमें कोई आपत्ति नहीं है।
विमला बोली - मास्टर साहब, हम आपका ये अहसान मरते दम तक नही भूलेंगे।
- नहीं - नहीं बेटी, ये अहसान नहीं। ये नन्दू की ईमानदारी का इनाम है। इतना कहकर मास्टर साहब अपनी साइकिल से अपने गाँव की तरफ चल पड़े।
- आप सही कहते थे जी ईमानदारी कभी नही छोड़नी चाहिए। विमला ने कहा।
तभी नन्दू बोल पड़ा - पिताजी आपने ये नहीं बताया था कि ईमानदारी का इनाम भी मिलता है।
कृष्णा ने हँसते हुए कहा - मिलता है बेटा, मिलता है। ईमानदारी का इनाम मिलता है। जैसे आज तुम्हें मिला ईमानदारी का दामन कभी ना छोड़ना कहते हुए कृष्णा ने नन्दू को गले से लगा लिया।
पुरवा, उन्‍नाव ( उत्‍तरप्रदेश )

शुक्रवार, 18 मई 2018

गप्‍पी लाल का किस्‍सा

        अज्जू के साथ अजब मुसीबत थी। जाने क्या बात थी कि वह झूठ बोले बगैर रह ही नहीं पाता था। दोस्तों के बीच डींगें मारने का मौका मिलता, तब तो उसकी कल्पना के पंख लग जाते और मन छलाँगें लगाने लगता। ऐसी - ऐसी बातें कहता कि सुनने वाले पहले तो हैरान होने का नाटक करते, फिर उसके झूठ की कलई खोल ऐसा तंग करते कि बेचारे से भागते ही बनता।
बेचारा अज्जू ऐसे क्षणों में अपनी इस इजीब सी आदत को लेकर मन ही मन रोया करता था। सोचता था - बहुत हुआ। अब आगे से ऐसी उल्टी - सीधी गप्पें नहीं हाँका करूँगा। पर वह लाचार था। जाने क्या बात थी,जहां चार दोस्त इक_े हों, वहाँ ऐसी बातें कहे बगैर उसे चैन ही न पड़ता था। इन बातों का कोई सिर - पैर तो होता नहीं। इसलिए फौरन पकड़ में आ जातीं और अज्जू की खूब लानत - मलानत होती।
धीरे - धीरे तो हालत यह हो गई कि अज्जू ज्यों ही गप्प हाँकने के लिए मुँह खोलता, उसके दोस्त ही .. ही ..ही करके हँसना शुरू कर देते। उसकी आधी बात मुँह की मुँह में ही रह जाती। और मारे शर्म के उसका चेहरा लाल हो जाता।
एक दिन ऐसे ही दोस्तों ने अज्जू का बुरी तरह मजाक उड़ाया। वह छुट्टी के बाद स्कूल के पास वाले मुरली बाबा के बगीचे में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। रह - रहकर उसे रोना आ रहा था। सोच रहा था - क्या करूँ, क्या न करूँ ? क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि मुझे रोज - रोज की इस बेइज्जती से छुटकारा मिल जाए! हो सकता है,जरूर हो सकता है! उसे एक महीन सी आवाज सुनाई दी।
- कौन ? अज्जू हैरान होकर इधर - उधर देखने लगा। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या सचमुच अभी - अभी कोई बोला था या फिर ....?
- इधर - उधर क्या देख रहे हो अज्जू ? मैं कह रही हूँ न, कि तुम्हें रोज - रोज की इस मुसीबत से छुटकारा मिल सकता है, जरूर मिल सकता है!
अज्जू को लगा, यह आवाज तो जरूर इस पीपल के पेड़ के ऊपर से आ रही है। उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो एक सुंदर सी रंग - बिरंगी चिड़िया को अपनी ओर देखते पाया।
अज्जू को लगा, हो न हो, यह चिड़िया ही अभी - अभी उससे बोल रही थी। लेकिन भला यह आदमी की - सी आवाज में कैसे बोल लेगी ? अज्जू अभी यही सोच ही रहा था कि देखा, पंख लहराती हुई, वही सुंदर, रंग - बिरंगी चिड़िया उड़कर उसके सामने आ बैठी। वह लाल - हरे रंग की प्यारी सी चिड़िया थी। उसकी गरदन नीली थी और सिर पर पीले रंग की सुंदर कलगी थी।
- अरे, अभी - अभी क्या तुम्हीं बोल रहीं थीं ? अज्जू ने हैरानी से चिड़िया को देखते हुए पूछा।
- हाँ! उसे लगा कि अरे, यह चिड़िया तो हँसती भी है। हाँ कहते - कहते जरूर धीमे - धीमे हँस रही थी।
लेकिन अज्जू तो अपनी ही मुश्किलों से घिरा था बोला - बताओ नन्ही, अच्छी चिड़िया। बताओ, भला तुम कैसे मुझे मेरी मुश्किलों से छुटकारा दिला सकती हो ?
- बस, ऐसे कि जब तुम कुछ ज्यादा ही गप्पें हाँकने लगोगे, तो मैं चीं - चीं, चीं - चीं करके तुम्हें सावधान कर दूँगी। मेरी आवाज बस तुम्हीं को सुनाई पड़ेगी,किसी और को नहीं! तुम झट समझ जाना और गप्पें हाँकना बंद कर देना। चिड़िया बोली।
- अरे! यह आइडिया तो अच्छा है। अज्जू उछल पड़ा और जोर - जोर से तालियाँ बजाते हुए बोला - धन्यवाद, नन्हीं चिड़िया धन्यवाद!
बस, खुश होकर अज्जू ने अपना बस्ता उठाया और चिड़िया को टा टा करके घर चल दिया। उसे लगा, उसके सिर पर से चिंताओं की भारी गठरी उतर गई है।
अगले दिन अज्जू स्कूल पहुँचा, तो खुश - खुश सा था। अभी क्लाश शुरू होने में काफी देर थी। इसलिए बच्चे टोली बनाकर आपस में बातें कर रहे थे। दीपू कह रहा था - कल शाम मैं अपने अंकल के यहाँ दावत में गया था। वहाँ कई तरह की चाट थी रसगुल्ले थे, आइसक्रीम भी थी। खूब मजा आया!
-ठीक है, दावत अच्छी होगी। पर मेरे नाना ने एक बार मेरे जन्मदिन पर जो दावत दी थी, उसका भला कौन मुकाबला करेगा ? आहा! ऐसी दावत थी, ऐसी कि कोई सोच भी नहीं सकता!
अज्जू कह रहा था तो चिड़िया ने बीच - बीच में दो - एक बार चीं - चीं करके इतना शोर मचा दिया कि बेचारा अज्जू परेशान। अपनी गलती सुधारता हुआ बोला - नहीं, दस हजार तो नहीं थे। मैं शायद कुछ ज्यादा कह गया। हाँ, हजार लोग तो जरूर थे। नहीं, हजार नहीं, बस सौ - डेढ़ सौ! हाँ सौ - डेढ़ सौ तो जरूर होंगे।
- तो इसमें क्या खास बात ? दीपू बोला।
- खास बात! खास बात पूछते हो, तो सबसे खास बात तो उसमें यह थी कि छत्तीस तरह की सब्जियाँ थीं, सूखी भी, रसेदार भी। और छत्तीस तरह की चाट। ओह, न जाने क्या - क्या चीजें थीं! मुझे तो नाम भी याद नहीं आ रहे।
अज्जू ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि चिड़िया ने इस बुरी तरह से चीं - चीं, चीं - चीं का शोर मचा दिया कि अज्जू को लगा, अपनी गलती को सुधारना ही पड़ेगा, वरना चिड़िया की चीं - चीं रुकेगी नहीं और उसका दिमाग खराब हो जाएगा।
अज्जू कुछ सोचकर गंभीर होकर बोला - दोस्तों, लगता है, मैं कुछ गलत बोल गया। छत्तीस तरह की सब्जियाँ नहीं थीं और छत्तीस तरह की चाट भी नहीं थी। असल में सब्जियाँ, चाट, आइसक्रीम और मिठाइयाँ, ये सारी चीजें मिलाकर छत्तीस थीं। अब मुझे याद आया। हाँ, ठीक - ठीक याद आ गया!
सुनकर दोस्त हैरान होकर अज्जू की ओर देख रहे थे। सोच रहे थे, आज इसे हुआ क्या है ? खुद ही अपनी बात कहता है, खुद ही काटता है। शायद इसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं है या परेशान सा है। इसलिए अज्जू का मजाक उड़ाना छोड़कर वे चुप हो गए। फिर भी दो - एक दोस्त तो खुदर - खुदर हँस ही रहे थे। और आँखें नचा - नचाकर अज्जू का मजाक उड़ा रहे थे।
उस दिन आधी छुट्टी के समय अज्जू फिर दौड़कर मुरली बाबा की बगिया में गया और उसी पीपल के नीचे आकर बैठ गया। वह बहुत उदास था। फौरन कल वाली दोस्त चिड़िया फुदककर उसके पास आ गई। बोली - क्या बात है अज्जू, तुम तो आज भी उदास हो।
- हाँ, क्या करूँ ? मेरी मुश्किलें तो कम होंने में ही नहीं आ रहीं। कहते - कहते अज्जू रो पड़ा। और फिर उसने सुबकते हुए चिड़िया को आज की पूरी बात सुना दी।
चिड़िया बोली - मेरी चीं - चीं तो बस तुम्हें सावधान करने के लिए है। लेकिन तुम खुद भी कोशिश करो न!
बात अज्जू की समझ में आ गई। चिड़िया को धन्यवाद देकर फिर वह झटपट अपनी क्लास में आ गया।
उस दिन स्कूल से छुट्टी होने पर सारे बच्चे हँसते, बात करते हुए घर जा रहे थे। उन्हीं के बीच अज्जू भी था। दोस्त जब बातें कर रहे थे, तो बीच - बीच में अज्जू का मन होता, वह भी दो - चार गप्पें लगा दे और अपनी धाक जमा दे। लेकिन तभी उसे चीं - चीं चिड़िया की बात याद आई और उसने अपने मन को बड़ी मुश्किल से काबू में किया।
ऐसे ही दो - तीन दिन निकल गए। बार - बार अज्जू का मन डींगें हाँकने का होता, लेकिन हर बार चीं - चीं चिड़िया की सलाह उसे याद आ जाती और वह गप्पें हाँकने की बजाए, सीधे - सादे ढंग से अपनी बात कहने लगता।
अज्जू के दोस्त बड़ी हैरानी से देख रहे थे। अज्जू बदल कैसे रहा है ? एक दिन गोपाल ने कहा - जरूर किसी ने इसे अच्छी सीख दी है। लेकिन देखता हूँ, यह बाहर - बाहर से ही बदला है या भीतर से भी!
- वह तुम कैसे पता करोगे। दोस्तों ने पूछा।
- बस, देखते रहो! गोपाल बोला।
उसी दिन छुट्टी होने के बाद सब बच्चे बातें करते हुए घर जा रहे थे। तभी गोपाल ने अज्जू को बुलाकर कहा - अरे सुनो अज्जू, कल तो बड़ा मजेदार किस्सा हुआ। मेरे पापा शिकार खेलने गए थे। एक हिरन मारकर लाए। जानते हो, कितना बड़ा था ... बहुत बड़ा था, बहुत बड़ा! कहते - कहते गोपाल ने अपने दोनों हाथ फैला दिए।
- अरे, कितना बड़ा होगा ? ज्यादा से ज्यादा पाँच - छह फुट। लेकिन तुम्हें यह नहीं पता कि मेरे दादा जी कितने बड़े शिकारी थे! दूर - दूर तक उनका नाम था। और आदमी तो क्या, जंगल के जानवर भी उनका नाम सुनकर थर - थर काँपते!
अज्जू जब यह बोल रहा था, तो चिड़िया ने दो - तीन बार चीं - चीं करके उसे चेताया। पर अज्जू कहाँ मानने वाला था! बहुत दिनों बाद मौका मिला था, इसलिए वह पूरी तरह अपना सिक्का जमा देना चाहता था।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

लोमड़ी की तरह नहीं, शेर की तरह बनो

एक बौद्ध भिक्षु भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था कि उसने कुछ अनोखा देखा। उसने एक बिना पैरों की लोमड़ी देखी जो ऊपर से स्वस्थ दिख रही थी। उसने सोचा कि आखिर इस हालत में ये लोमड़ी जिन्दा कैसे है
वह अपने विचारो में खोया था कि अचानक हलचल होने लगी। जंगल का राजा शेर उस तरफ  आ रहा था। भिक्षु भी तेजी से एक पेड़ पर चढ़ गया और वहां से देखने लगा।
शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ  बढ़ रहा था। उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया, बल्कि उसे खाने के लिए मांस के टुकड़े भी दे दिए। भिक्षु को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि शेर लोमड़ी को मारने की बजाय उसे भोजन दे रहा है।
भिक्षुक बुदबुदाया। उसे अपनी आँखों पर भरोसा नही हो रहा था। इसलिए वह अगले दिन फिर वहीं गया और छिप कर शेर का इंतजार करने लगा। आज भी वैसा ही हुआ। भिक्षुक बोला कि यह भगवान के होने का प्रमाण है। वह जिसे पैदा करता है, उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है। आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर जिऊंगा। वही मेरे भोजन की व्यवस्था करेगा।
यही सोचकर वह एक वीरान जगह जा के बैठ गया। पहले दिन बिता। कोई नहीं आया। दूसरे दिन कुछ लोग आए पर किसी ने भिक्षुक की ओर नहीं देखा। धीरे - धीरे उसकी ताकत खत्म हो रही थी। वह चल - फिर भी नहीं पा रहा था। तभी एक महात्मा वहां से गुजरे और भिक्षु के पास पहुँचे।
भिक्षु ने अपनी पूरी कहानी महात्मा को सुनाई और बोला - आप ही बताए कि भगवान मेरे प्रति इतना निर्दयी कैसे हो गया ? किसी को इस हालात में पहुंचाना पाप नही है?
- बिलकुल है। महात्मा जी ने कहा- लेकिन तुम इतने मुर्ख कैसे हो सकते हो? क्यों नहीं समझते कि ईश्वर तुम्हें उस शेर की तरह बनते देखना चाहते थे, लोमड़ी की तरह नहीं।
जीवन में भी ऐसा ही होता है कि हमें चीजे जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो हमें महान बना सकती हैं। जरुरत है उन्हें पहचानने की,यह ध्यान रखने की कि कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं।

मंगलवार, 23 मई 2017

बिजली और तूफान

         बहुत समय पहले बिजली और तूफान धरती पर मनुष्यों के बीच रहा करते थे। राजा ने उन्हें मनुष्यों की बस्ती से दूर रखा था।
         बिजली तूफान की बेटी थी। जब कभी किसी बात पर बिजली नाराज हो उठती, वह तड़प कर किसी के घर पर गिरती और उसे जला देती या किसी पेड़ को राख कर देती या खेत की फसल नष्ट कर देती। मनुष्य को भी वह अपनी आग से जला देती थी।
        जब - जब बिजली ऐसा करती, उसके पिता तूफान गरज - गरजकर उसे रोकने की चेष्टा करते। किंतु बिजली बड़ी ढीठ थी। वह पिता का कहना बिलकुल नहीं मानती थी। यहाँ तक कि तूफान का लगातार गरजना मनुष्यों के लिए सिरदर्द हो उठा। उसने जाकर राजा से इसकी शिकायत की।
राजा को उसकी शिकायत वाजिब लगी। उन्होंने तूफान और उसकी बेटी बिजली को तुरंत शहर छोड़ देने की आज्ञा दी और बहुत दूर जंगलों में जाकर रहने को कहा।
        किंतु इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। बिजली जब नाराज होती, जंगल के पेड़ जला डालती। कभी - कभी पास के खेतों का भी नुकसान कर डालती। मनुष्य को यह भी सहन न हुआ। उसने फिर राजा से शिकायत की।
        राजा बेहद नाराज हो उठा। उसने तूफान और बिजली को धरती से निकाल दिया और उन्हें आकाश में रहने की आज्ञा दी। जहाँ से वे मनुष्य का उतना नुकसान नहीं कर सकते थे जितना की धरती पर रहकर करते थे। क्रोध का फल बुरा होता है।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अनोखी तरकीब

पराग ज्ञानदेव चौधरी

      बहुत पुरानी बात है। एक अमीर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गयी। बहुत तलाश करने के बावजूद सामान न मिला और न ही चोर का पता चला। तब अमीर व्यापारी शहर के काजी के पास पहुँचा और चोरी के बारे में बताया।
     सब कुछ सुनने के बाद काजी ने व्यापारी के सारे नौकरों और मित्रों को बुलाया। जब सब सामने पहुँच गए तो काजी ने सब को एक - एक छड़ी दी। सभी छड़ियाँ बराबर थीं। न कोई छोटी न बड़ी।
सब को छड़ी देने के बाद काजी बोला - इन छड़ियों को आप सब अपने - अपने घर ले जाएँ और कल सुबह वापस ले आएँ। इन सभी छड़ियों की खासियत यह है कि यह चोर के पास जा कर ये एक उँगली के बराबर अपने आप बढ़ जाती हैं। जो चोर नहीं होता, उसकी छड़ी ऐसी की ऐसी रहती है। न बढ़ती है, न घटती है। इस तरह मैं चोर और बेगुनाह की पहचान कर लेता हूँ।
     काजी की बात सुन कर सभी अपनी अपनी छड़ी ले कर अपने - अपने घर चल दिए।
उन्हीं में व्यापारी के यहाँ चोरी करने वाला चोर भी था। जब वह अपने घर पहुँचा तो उसने सोचा - अगर कल सुबह काजी के सामने मेरी छड़ी एक उँगली बड़ी निकली तो वह मुझे तुरंत पकड़ लेंगे। फिर न जाने वह सबके सामने कैसी सजा दें। इसलिए क्यों न इस विचित्र छड़ी को एक उँगली काट दिया जाए। ताकि काजी को कुछ भी पता नहीं चले।
     चोर यह सोच बहुत खुश हुआ और फिर उसने तुरंत छड़ी को एक उँगली के बराबर काट दिया। फिर उसे घिस - घिस कर ऐसा कर दिया कि पता ही न चले कि वह काटी गई है।
      अपनी इस चालाकी पर चोर बहुत खुश था और खुशी - खुशी चादर तान कर सो गया। सुबह चोर अपनी छड़ी ले कर खुशी - खुशी काजी के यहाँ पहुँचा। वहाँ पहले से काफी लोग जमा थे।
काजी एक एक कर छड़ी देखने लगे। जब चोर की छड़ी देखी तो वह एक उँगली छोटी पाई गई। उसने तुरंत चोर को पकड़ लिया। और फिर उससे व्यापारी का सारा माल निकलवा लिया। चोर को जेल में डाल दिया गया।
सभी काजी की इस अनोखी तरकीब की प्रशंसा कर रहे थे।

मेंढक और गिलहरी 
 
      एक था मेंढक और एक थी गिलहरी। एक दिन दोनों में दोस्ती हो गई। राज दोनों साथ - साथ खेलते और मौज मनाते। खेलते - खेलते एक दिन मेंढक ने कहा - गिलहरी बाई! मुझे तो अब ब्याह करना है।
     गिलहरी बोली - बड़ी अच्छी बात है। इसमें देर क्यों हो? चलो, मैं तुम्हारा ब्याह अभी करा देती हूं। यह काम तो झटपट हो सकेगा। तुम चाहोगे तो मैं तुम्हारा ब्याह किसी राजकुमारी से करवा दूंगी।
मेंढक बोला - तो फिर चलो।
     गिलहरी और मेंढक दोनों चल पड़े। चलते - चलते रास्तें में ताड़ का एक पेड़ मिला। गिलहरी की इच्छा हुई कि वह इस पेड़ पर चढ़ जाय। उसने कहा - मेंढक भैया, तुम कुछ देर यहीं खड़े रहो। मैं जरा इस पेड़े पर चढ़ लूं।
मेंढक बोला - अपने साथ मुझे भी पेड़ पर ले चलो।
     गिलहरी ने कहा - आओ, मेरी पीठ पर बैठ जाओ। तुम मुझे अच्छी तरह पकड़े रहना।
गिलहरी ने मेंढक को एक पत्ते पर बैठा दिया। कुछ देर बाद गिलहरी एक ही सपाटे में पेड़ से नीचे उतर गई और मेंढक आंखें फाड़े पेड़ पर बैठा रहा। मेंढक मन - ही - मन बोला -गिलहरी से दोस्ती की,ताड़ पर डेरा डाला। ब्याह तो एक ओर,पेड़ से नीचे उतरना भी भारी पड़ गया!
     गिलहरी आगे बढ़ गई। मेंढक उतावली में ताड़ पर से कूदा और उसके प्राण निकल गये।

बुधवार, 9 नवंबर 2016

जंगली

रामनरेश उज्‍जवल

       जंगी पूरा जंगली था। ज्यादातर जंगल में ही रहता। पशु - पक्षियों का शिकार करता। उन्हें पका कर खाता। इस काम में उसे बड़ा मजा आता।
       उसके परिवार के लोग समझाते - देखो, जीवजन्तुओं को मारना पाप है। इनमें भी हम लोगों की तरह जान होती है। इन्हें दर्द होता है। इन्हें भी जीने का अधिकार है। इन्हें मारना - खाना ठीक नहीं।
       - इन्हें दर्द होता है, तो मैं क्या करूँ? मुझे इनका गोश्त अच्छा लगता है। ये जब तड़प - तड़प कर मरते हैं, मुझे बहुत मजा आता है।
       वहीं पर एक चुहिया फुदक - फुदक कर खेल रही थी। जंगी की नजर उस पर पड़ गयी। उसने झपट कर उसे पकड़ लिया। चुहिया चीं - चीं करने लगी।
       जंगी ने उसकी पूँछ बाँधकर उल्टा लटका दिया। नीचे आग जला दी। चुहिया चीं - चीं कर रही थी। जंगी उसे घुमा - घुमा कर आग की लौं में पका रहा था। कुछ देर में चुहिया शान्त हो गई।
       अब नरम - नरम गोश्त पककर तैयार था। जेब में वह हर समय नमक - मिर्च की पुड़िया रखता ही था।
       जंगी आज जंगल में भटकते - भटकते काफी दूर निकल आया। अभी तक कोई शिकार नहीं मिला था। चारों तरफ  सन्नाटा था। नजरें शिकार ढूँढ रही थीं।
       उसी समय जंगी की कनपटी पर वार हुआ। वह धड़ाम् से जमीन पर मुँह के बल गिर गया। जैसे ही उठने लगा फिर वार हुआ। जंगी धूल चाट गया। किसी ने उसकी पीठ पर भारी - भरकम पैर रख दिए। जंगी कराहने लगा।
- क्यों बे, पुलिस का आदमी है। एक कड़कती हुई आवाज सुनाई दी।
जंगी की साँस फूल रही थी। बड़ी मुश्किल से बोल पाया - नहीं।
- फिर यहाँ क्या कर रहा है। वही आवाज आई।
- शिकार करने ...। जंगी की बात अधूरी रह गई।
- साले! शिकार के बच्चे। एक जोरदार लात पड़ी। जंगी लुढ़क गया। उसके सामने आठ - दस काले - कलूटे आदमी खड़े थे। जंगी ने उन्हें देखकर अंदाजा लगाया - हो न हो ये लुटेरे ही होंगे। यही गाँवों में अक्सर लूट - पाट मचाते हैं। पुलिस भी इनकी तलाश में रहती है।
       जंगी ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा - माफ  कर दीजिए,फिर नहीं आऊँगा।
एक कलूटे आदमी ने जंगी के सीने पर पैर रखते हुए कहा - हम अपना शिकार छोड़ते नहीं बच्चू।
       जंगी थर - थर काँप रहा था। लूटेरों ने उसे मजबूत रस्सी से बाँध दिया। वह हिल भी नहीं सकता था। एक कलूटे ने जंगी की तलाशी ली। नमक - मिर्च के अलावा कुछ नहीं मिला। उसे गुस्सा आ गया। उसने जंगी के पाँव में चाकू से चीरा लगा दिया। जंगी बड़ी जोर चीख पड़ा।
       दूसरे कलूटे ने जंगी के मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। कहा - चीखना मत।
       पहले कलूटे ने जंगी के जख्म में नमक - मिर्च भर दिया। जंगी अन्दर ही अन्दर चीख कर रह गया। आवाज बाहर नहीं निकाली। दोनों कलूटों ने कहा - शाबाश! फिर उन्होंने जंगी को उठा कर घोड़े की पीठ पर लाद दिया। जंगी की आँखों में डर देखकर सब एक साथ हँसने लगे। जंगी के मुँह में कपड़ा ठुँसा था, वरना उसकी चीख फिर निकल जाती।
       एक कलूटे ने घोड़े को थोड़ी दूर जाकर ही लाठी से कोंचा। वह दौड़ने लगा। जंगी ने डर कर आँखें बन्द कर लीं। जंगी घोड़े से नीचे गिर गया। उसने आँखें खोलीं। घोड़ा वापस जा रहा था। वह एक गड्ढे में गिरा पड़ा था।
जंगी खूब कसमसा रहा था। रस्सी मजबूती के साथ बँधी थी। तभी आसमान में हजारों गिद्ध मँडराने लगे।
       धीरे - धीरे गिद्ध नीचे उतर आए। जंगी ने सोचा - अरे! ये तो मुझे मुर्दा समझ रहे हैं। चार - पाँच गिद्धों ने उसे चोंच मारना शुरू कर दिया। जंगी जोर - जोर से चीख रहा था। मगर आवाज बाहर नहीं आ पा रही थी। मुँह में कपड़ा जो ठुँसा था।
       मैं हिल भी नहीं सकता हूँ। नहीं तो गिद्ध जान जाते कि मैं जिन्दा हूँ। तब ये सब दुम दबा कर भाग जाते। जंगी सोच रहा था - मैं इनका शिकार करता था। आज ये मेरा शिकार कर रहे हैं।
       जंगी का मांस खाने के लिए गिद्ध लड़ रहे थे। एक गिद्ध जंगी के मुँह पर बैठ गया। जंगी दोनों आँखों से उसे टुकुर - टुकुर निहार रहा था। गिद्ध भी इधर - उधर मुँह घुमा - घुमा कर उसकी चलती -फिरती आँखें ताक रहा था।
- कहीं यह मेरी आँखें तो नहीं खाना चाहता ? जंगी ने यही सोचकर आँखें मूँद लीं। वह लहू - लुहान हो गया था। गड्ढा भी जैसे नाप कर बनाया गया था। जंगी उसमें लुढ़क भी नहीं सकता था। करवट बदलने की उसकी सारी कोशिशें बेकार हो गईं ।
       जंगी के हाथ - पैर बँधे थे। वह मन ही मन गिड़गिड़ा रहा था .भगवान, अबकी बचा लो। अब जीव - जन्तुओं का शिकार नहीं करूँगा।
       उसी समय हाथ के पास कुछ गुलगुल - गुलगुल महसूस हुआ। जंगी ने सोचा - लगता है,शायद भगवान आ गए।
       एक गिद्ध जंगी के कान खींचने लगा। जंगी अन्दर ही अन्दर बिलख पड़ा - हे भगवान, मुझे मुर्दा करके ही मानोगे क्या?
       थोड़ी देर बाद उसने कुछ ढीलापन महसूस किया। लगा, जैसे हाथ खुल गए। जंगी ने हाथ निकालने की कोशिश की फटाक से हाथ बाहर आ गए। जंगी ने पहले मुँह से कपड़ा निकाला, फिर चीख पड़ा।
       सारे गिद्ध मुर्दे को जिन्दा देखकर भाग खड़े हुए। जंगी कराहते हुए उठ गया। अपने शरीर के सारे बंधन खोल डाले। फिर घूमकर गड्ढे में देखने लगा। एक छोटी सी चुहिया फुदक रही थी। वह बड़ी खुश थी।
       जंगी समझ गया - इसी की वजह से मेरी जान बची।
       जंगी को उस नन्हीं चुहिया में एक दयावान और समझदार आत्मा दिखाई पड़ रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह चले। वह उसे उठाकर चूमने लगा। चुहिया भी पूँछ हिला रही थी, जैसे जंगी की भावनाएँ समझ रही हो।
- अब मैं किसी जीव का शिकार नहीं करूँगा। जंगी ने मन ही मन निश्चय किया और चुहिया को गड्ढे में छोड़ दिया। चुहिया पूँछ हिलाती हुई अपने बिल में घुस गई।

मुंशी खेड़ा
पो0.अमौसी एयरपोर्ट
लखनऊ.226009

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

बुद्धुराम की बुद्धि

सृष्टि शर्मा
उसका नाम बुद्धुराम था। वह निरक्षर था। निरक्षर होने के कारण जो जैसा कहता वह मान जाता था। उस दिन वह गौंटिया के पास गया। उसकी ओर अगंूठा बढ़ाते हुए कहा -  लो गौंटिया जहाँ चाहो अगूंठा दबवा लो। मेरा मुनवा तीन दिन से खाट में पड़ा है। दिन भर लड़ - जूझकर कमाने पर भी दवाई गोटी के लिए पांच पैसे बच नहीं पाता। ज्ज्
स्टाम्प पेपर ने उसका अगूंठा दबवाया। रूपये गिने कहा - पांच पैसे बचाने के भी उपाय है बुद्धुराम। पर उसके लिए आवश्यकता होती है - बुद्धि की। समझे ... ? ज्ज्
 - ये बुद्धि क्या होती है गौटिया ? ज्ज् बुद्धुराम ने रूपये लेकर प्रश्र सूचक दृष्टिï गौटिया पर टिका दी।
गौटिया मुसकराया और कहा - जब तुम बुद्धि क्या होती है नहीं जानते तो तुम्हारी लुटिया - डोरी डूबेगी ही। अब अगर हम तुम्हें समझाने भी बैठे तो तुम्हें समझ में नहीं आयेगा। आखिर तुम्हारे पास बुद्धि का अभाव जो है। ज्ज्
- कितने में आती है बुद्धि गौटिया ? मैं भी खरीदना चाहता हूं। लो , एक अगूंठा और दबवा लो, जो कीमत लगे दे दो पर मुझे बुद्धि दे दो। ज्ज्
गौटिया ने खिलखिलाकर हंसा। कहा - फिलहाल तो स्टाक में बुद्धि नहीं है। दो - चार दिन में आ जायेगी तब तुम ले जाना। ज्ज्
बुद्धुराम ने उठते हुए कहा - मैं जा रहा हूं गौटिया। आप मेरे लिए एक बुद्धि अवश्य रख लेना। जैसे ही खबर मिलेगी मैं आकर ले लूंगा। ज्ज्
बुद्धुराम चला गया। गौटिया बुद्धुराम की बातों को मन ही मन सोचकर हंसता रहा। सोचता रहा - कितना नासमझ है बुद्धुराम। बुद्धि भी कहीं बिकती है, बेवकूफ कहीं का ?
बुद्धुराम कुछ दिन बाद फिर गौटिया के पास पहुंच बुद्धि की मांग करने लगा। गौटिया ने उसे फिर स्टाक में बुद्धि नहीं होने की बात कह कर लौटा दिया। मगर बुद्धुराम को तो बुद्धि चाहिए था। वह जब तब गौटिया के पास पहुंच बुद्धि की मांग करने लगता। अब तो अपने ही मजाक में गौटिया फंस गया था। एक दिन फिर जब गौटिया के पास बुद्धुराम पहुंचा तो गौटिया ने कहा - कुछ दिन और सब्र धरो। उसने एक कलम और स्लेट देते हुए कहा - इसमें तुम वही लिखते जाना जो मैं ऊपर लिखा रहूंगा। फिर वही दोहराना जो मैं कहूंगा। इससे समय भी आसानी से कट जायेगा और बुद्धि भी आ जायेगी। ज्ज्
बुद्धुराम ने हां में सिर हिला दिया। अब वह प्रतिदिन गौटिया के पास आता। गौटिया जो लिखता, उसे वह लिखता। गौटिया जो कहता, उसे वह दोहराता। धीरे - धीरे उसकी समझ में सारी बातें आ गयी। उसे बुद्धि मिल गयी।
अन्य ग्रामीणों को ज्ञात हुआ तो वे दौड़कर गौटिया के पास गये और बुद्धि मांगने लगे। गौटिया ने बुद्धुरा की ओर संकेत करते हुए कहा - भाईयों, जितनी बुद्धि मेरे पास थी, उसे मैंने बुद्धुराम को दे दी है। अब वही तुम लोगो को देगा। उसी से मांगो। ज्ज्
ग्रामीण , बुद्धुराम पर झपटे। चीखने - चिल्लाने लगे - पहले हमें बुद्धि दो ... पहले हमें बुद्धि दो ...। ज्ज्
बुद्धुराम ने सबको शांत कराते हुए कहा - शांत रहो, सबको बुद्धि मिलेगी। सब लाइन लगाकर बैठ जाओ। ज्ज्
ग्रामीण वहीं पर बैठ गये।
बुद्धुराम ने उन सबको एक एक कलम और स्लेट दी। एक तख्ती दीवार से लटकायी। स्वयं चाकमिटï्टी ली और कहा - भाईयों, मैं जो भी इस तख्ती में लिखूं, तुम भी लिखो। मैं जो कहूं तुम भी कहो। कुछ दिन के इंतजार बाद बुद्धि आ जायेगी फिर मैं तुम लोगो में वितरित कर दूंगा। ज्ज्
बुद्धुराम जो तख्ती में लिखता उसे ग्रामीण स्लेट पर उतारते। वह जो कहता, ग्रामीण उसे दोहराते। धीरे - धीरे उनकी भी समझ में सारी बातें आ गयी।
एक ग्रामीण ने कहा - भाई, हम कितने बेवकूफ हैं। बुद्धि तो हमारे पास है और हम खरीदने चले थे। ज्ज्
कुछ ग्रामीण बैंक से ऋण लेना चाहते थे। वे बैंक गये। बैंक मैनेजर ने उनसे कहा - आओ, यहां अगूंठा दबाओ ...। ज्ज्
- अगूंठा क्यों ... ? ज्ज् मनहर ने कलम उठायी कहा - अब तो हम हस्ताक्षर करेंगे, हस्ताक्षर ...। ज्ज्
बैंक मैनेजर ने रजिस्टर पर दृष्टिï डाली। वास्तव में मनहर ने स्पष्टï शब्दों में हस्ताक्षर किया था।    

बुधवार, 11 सितंबर 2013

बुरी शिक्षा का परिणाम

कु.सृष्टि शर्मा
कि़सी नगर में दानी नाम का व्यापारी रहता था। उसका काम नाम के विपरीत था। वह स्वयं ही न दान देता था और न ही अपने परिवारजनों को दान करने देता था। जब भी कोई साधू उसके दहलीज पर खड़ा होता तो वह कह देता - आगे बढ़ो ... और वह इतनी सी बात कह कर टाल देता था।
दानी, दानी या धर्मी तो था नहीं। हां, वह अधर्म अवश्य करता था। उसके किराने की दूकान थी। वह जो भी सामग्री बेचता था, मिलावट करके ही बेचता था। मिलावट का कार्य एक अकेला करे ऐसी बात नहीं थी अपितु वह अपने परिवारवालों को भी मिलावट करके सामग्री बेचने प्रोत्साहित करता था। लोग अशुद्ध सामग्री लेकर ले जाते और अक्सर बीमार पड़ते रहते। दानी के पुत्र का नाम धनेश था। वह अक्सर पूछ बैठता - पिताजी, आप मिलावट क्यों करते हैं। इस पर दानी कह देता - बेटा शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है, इसलिए मिलावट करके बेचता हूं। उसने धनेश को भी मिलावट का काम सीखा दिया था।
धनेश अक्सर देखता कि दानी जो भी सामग्री घर के लिए निकालता है उसमें मिलावट नहीं रहती। धनेश सोचता कि इससे तो हम बीमार पड़ जायेंगे। वह मिलावट कर देता था। इसकी जानकारी न ही दानी को हो पाती थी और न ही उसकी पत्नी को। दरअसल दानी ने धनेश के दीमाग में भर दिया था कि मिलावट करते हैं इसकी चर्चा अन्यत्र  नहीं करनी चाहिए। इसलिए धनेश मिलावट तो कर देता, बताता किसी को नहीं था।
यद्यपि दानी घर के लिए शुद्ध सामग्री निकालता मगर मिलावट सामग्री खाता। उसे इसका अनुभव अवश्य होता कि खाद्य सामग्रियों में मिलावट हुई है मगर पूछ नहीं पाता था क्योंकि उसे विश्वास नहीं था कि उसके खाने की सामग्री में भी मिलावट की गई है। मिलावटी सामग्री खाने के कारण एक दिन दानी इतना बीमार पड़ गया कि वह खाट पर पड़ गया। अब वह खाट में ही पड़े - पड़े भोजन करता, दूध पीता। अक्सर दूध देने की जिम्मेदारी धनेश पर आ जाती। वह देखता जो दूध मां ने पिताजी के लिए दिया है वह शुद्ध है। इससे तो पिताजी की बीमारी और अधिक बढ़ जायेगी। इस विचार के साथ आधा दूध स्वयं पी जाता और आधे दूध में पानी मिलाकर दानी को दे देता।
दानी दूध तो अनुभव अवश्य होता कि इसमें पानी अधिक मात्रा में मिला है मगर तत्काल इससे असहमत भी हो जाता क्योंकि दूध घर का होता था। पानी मिलाने का प्रश्र ही नहीं उठता। मगर उसे संदेह हो गया।
एक दिन उसके दूध पीने का समय हुआ तो उसने खिड़की से पुत्र का काम देखा तो दंग रह गया। पुत्र आधा दूध तो पी गया और आधे में पानी मिलाकर पिता को देने आया है। दूध का गिलाश हाथ में लेते हुए दानी ने धनेश से पूछा - बेटा धनेश, क्या घर में और दूध नहीं है?
- नहीं, पूरे पांच किलो दूध और रखे हैं
- फिर तुमने उसमें का दूध पीने के बदले, मेरा दूध पीकर उसमें पानी क्यों मिलाया ?
- आप ही तो कहते हैं न, शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है मगर मम्मी आपके दूध में पानी नहीं मिलाती थी। मैंने सोचा - आपको शुद्ध दूध देने से आपकी बीमारी और बढ़ेगी। बीमारी न बढ़े यही सोचकर तो मैंने मिलावट करके देना उचित समझा।
बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था। तब से उसने स्वयं ने न मिलावट की और न ही किसी को मिलावट करने की शिक्षा दी अपितु मिलावट से होने वाली हानियां भी गिनाने लगा। इतना ही नहीं, अब जो भी उसके दरवाजे पर आता उसे भोजन अवश्य देता, वह भी एकदम शुद्ध .....। 

मन की सुंदरता

कु. अंकिता शर्मा
दिव्या स्कूल से आयी। आते ही मां से लिपटकर रोने लगी। मां ने रोने का कारण जानना चाहा। दिव्या सिसकती बोली - मां, मैं अब स्कू ल नहीं जाऊंगी। सहेलियां मेरी हंसी  उड़ाती है, कहते हैं कि मैं कोयले के समान काली हूं।,
मां ने दिव्या के आंसू पोंछते हुए कहा - दिव्या तुम व्यर्थ ही आंसू बहा रही हो। सहेलियां है इसलिए मजाक कर देती होंगी। और फिर व्यक्ति का मूल्यांकन चरित्र के द्वारा किया जाता है न कि गोरे काले रंग से। अर्थातï् अपने गुणों के अनुरूप व्यक्ति अच्छा या बुरा कहलाता है, समझी ......।
दिव्या को मां की बातों से संतुष्टिï नहीं मिली। स्कूल के एक शिक्षक अरविन्द कुछ ही दिनों बाद पदमुक्त होने वाले थे। छात्र - छात्राओं ने उन्हें उपहार देने की सोची और अपने अपने कक्षा के मांनिटर को पैसा एकत्रित कर दे दिए। दिव्या के कक्षा की मानिटर मिताली थी। मिताली अन्य सहेलियों के साथ उपहार योग्य वस्तु खरीदने जाने लगी कि दिव्या ने भी साथ चलने की बात कही। मिताली ने उसकी हंसी उड़ा दी। कहा - तुम्हें अपने साथ ले जाकर अपनी हंसी उड़वानी है क्या? उचित तो यही है कि तुम किसी कोयले की खान में दुबक कर रहो।
सहेलयों के व्यवहार से क्षुब्ध दिव्या घर लौटने लगी कि उसके मन में विचार उठा मैंने गुल्लक में जो पैसे जमा किए है। क्यों न एक उपहार लेकर शिक्षक को दे दूं। इस विचार के उदास मन को खुशी प्रदान किया। दिव्या ने घर पहुंचकर गुल्लक को तोड़ दिया। उनमें कुल जमा रूपए गिने। एक सौ पचास रूपए थे। दिव्या ने सोचा - इतने रूपये तो कक्षा भर के विद्यार्थी भी जमा नहीं कर पाए होंगे। इतने रूपए से तो अच्छा से अच्छा उपहार लिया जा सकता है। दिव्या बाजार पहुंच गई।
मिताली सहेलियों के साथ उसी बाजार में खरीददारी करने आई थी। दिव्या ने उन लोगों को देख लिया। वह उन लोगों से इसलिए बचकर निकल जाना चाहती थी क्योंकि उसकी फिर से खिल्ली न उड़े। दिव्या आंख बचाकर निकलती कि मिताली ने उसे देख लिया। वह सहेलियों के साथ दौड़कर दिव्या के पास आई। उनके चेहरे उतरे हुए थे। मिताली की आंखों में आंसू भरे हुए थे। उनकी स्थिति का निरीक्षण कर दिव्या ने पूछा - तुम लोगों के चेहरे क्यों उतरे हुए हैं?
सहेलियों में से विनीता ने कहा कि हमने खरीददारी करने मिताली को रूपए दिए थे। उसे उसने कही गिरा डाले। दो घण्टे हो गये खोजते - खोजते पर रूपए नहीं मिल रहे। इस पर मिताली ने रू आंसू होकर मिताली ने कहा - यह सच है मगर सहेलियां मुझ पर विश्वास नहीं कर रही हैं, कह रही है मैं चोर हूं। मैंने वह रूपए रख लिए हैं। मिताली की आंखों से आंसू टपक पड़े।
उसकी स्थिति को देख दिव्या को दया आ गई। दिव्या जिन रूपयों से स्वयं खरीददारी करने आई थी उसे मिताली की ओर बढ़ा दिया। मितानी ने थोड़ा न नुकूर करने के बाद दिव्या से उसके रूपए ले लिए। मन ही मन सारी सहेलियां लज्जित थीं।
दूसरे दिन मिताली ने भरी कक्षा में दिव्या की उदारता की प्रशंसा की। उसने अपने द्वारा किए दुर्व्यवहार के लिए दिव्या से क्षमा मांगी। अन्य सहेलियों ने भी दिव्या से क्षमा मांगी। स्कूल के सभी छात्र - छात्राओं ने दिव्या की उदारता को सराहा। अब दिव्या को लगा कि मां सच कहती है - तन की नहीं, मन की उदारता सर्वोपरि होती है।   

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

परीक्षा



- प्रस्तुतकर्ता शिवम वर्मा  -
एक बार राजा भोज और पंडित माघ घूमते हुए उज्जयिनी से बहुत दूर जा निकले। लौटते हुए वे रास्ता भूल  गए। भटकते-भटकते वे एक झोंपड़ी  में पहुँचे।
झोंपड़ी की मालकिन  एक बुढ़िया थी। उससे उन्होंने पूछा -  माँ! यह रास्ता कहाँ जाता है?''
बूढ़ी स्त्री दोनों व्यक्तियों को ध्यान से देखती हुई बोली-  यह रास्ता तो कहीं नहीं जाता। हाँ इस पर लोग आया-जाया करते हैं। आप लोग कौन हैं?''
माघ ने कहा-  हम यात्री हैं। यात्री!''
बुढ़िया बोली-  यात्री  तो सिर्फ दो हैं- सूर्य और चाँद। आप कैसे यात्री हुए? सच-सच बताइए, आप लोग कौन हैं? ''
-  हम क्षणभंगुर मनुष्य हैं!''
-  संसार में क्षणभंगुर तो बस दो ही वस्तुएं हैं- धन और यौवन।''
प्रश्नोत्तर में राजा भोज और माघ जैसे हार गए। फिर भी बोले- हम राजा हैं। ''
बुढ़िया ने कहा-  राजा भी सिर्फ दो ही होते हैं! इन्द्र  और यम। आप कैसे राजा हैं?''
माघ ने देखा, बुढ़िया का  ज्ञान साधारण नहीं है। संभल कर बोले- हम क्षमावान हैं। ''
-  भाई! क्षमावान तो एक पृथ्वी है, और दूसरी नारी। आप लोग तो इन दोनों  में से कोई भी नहीं लगते हैं।''
भोज और माघ कुछ घबराए। फिर भी धैर्यमय संयत स्वर में बोले-   माँ! हम परदेसी हैं। ''
-  असम्भव! परदेसी भी सिर्फ दो होते हैं। एक जीवन, दूसरा पेड़ के पत्ते।''
राजा भोज और माघ ने पूरी तरह हार मान कर सिर झुका लिये अपने अज्ञान  को स्वीकार करते हुए बोले- माँ! हम तो हार गए। ''
बुढ़िया ने इसे भी स्वीकार नहीं किया। फिर बोली-  हारे हुए व्यक्ति  भी सिर्फ दो ही होते हैं- एक तो कर्जदार और दूसरा लड़की का पिता।  सच-सच बतलाईये, आप लोग कौन हैं? ''
राजा भोज और पंडित  माघ लज्जित भाव से चुप-चाप मौन खड़े रहे। तब बुढ़िया स्त्री मुस्कुरा  कर बोली-  मैं जानती हूँ आप राजा भोज हैं और आप पंडित माघ....... कृपया जाईये यह राह सीधी उज्जयिनी जाती है।''
पता - श्रीजी निवास, जवाहर मार्ग, जैन कालोनी, नागदा जक्शन (म.प्र.)
email -  shivamverma081@gmail.com
ph. 07366-241336

रविवार, 14 जुलाई 2013

सुरीली मैना और मोती



- डां. मंजरी शुक्ल -
हिमालय की घनी तराइयों के बीच में एक जंगल था जो कि चांदीपुर देश के समीप था। हरे- भरे पेड़ों और रंग- बिरंगे फूलों और लताओं से लदा यह जंगल बहुत ही खूबसूरत था। चारों और पशु - पक्षी निर्भय होकर घूमते रहते, क्योंकि वहाँ के बारे में कोई मनुष्य जानता नहीं था। उसी जंगल में एक विषाल वृक्ष पर एक छोटी सी मैना रहती थी। वह सारा दिन डालों पर फुदकती रहती और बड़े ही मीठे स्वर में गाना गाती। गाना तो वहां और भी पक्षी गाते थे,पर मैना के गाने में एक खास बात थी। जब वह गाती थी, तो उसके मुंह से एक सफेद मोती गिरता था। इसलिए उस पेड़ के चारों ओर चमकीले मोतियों का एक ढेर इक_ा हो गया था। सभी पक्षी दिन भर उन मोतियों से खूब खेलते और शाम को वापस उनका ढेर लगा देते इसी तरह हंसी खुशी उनके दिन व्यतीत हो रहे थे। एक बार वहाँ का राजा चंद्रसेन शिकार खेलते हुए रास्ता भटक गया और उस जंगल में पहुँच गया जहां मैना रहती थी। सफेद और चमकीले मोतियों के ढेर को जंगल में देखकर वह अचंभित रह गया। उसने पहले कभी इतने खूबसूरत मोती नहीं देखे थे वह कुछ बोलता इससे पहले मैना ने गाना शुरू कर दिया। मैना पत्तों की ओट में थी इसलिए वह राजा को नही देख पाई थी और ना ही राजा ने उसको देखा था जैसे ही मैना ने गाना खत्म किया तो उसके मुंह से एक चमकता हुआ मोती गिर गया। राजा तुरंत समझ गया कि यह किसी पक्षी के मुंह से निकल रहा है, पर पेड़ पर कई पक्षी बैठे होने की वजह से वह कुछ समझ नही पा रहा था। तभी वह मोतियों के ढेर के पास पहुँचा जहाँ पर बहुत सारे पक्षी मोतियों को चोच में दबाकर उनसे खेल रहे थे। राजा को देखते ही पक्षी डर गए और उड़कर पेड़ पर बैठ गए। राजा पक्षियों की ओर देखता हुआ बोला - मुझे वह पक्षी बता दो जिसके मुंह से यह मोती निकलता है,मैं उसको अपने साथ राजमहल ले जाऊंगा और सोने के पिंजरे में रखूंगा।
यह सुनते ही बेचारी मैना का दिल दहल गया और उसने डर के मारे अपनी आंखे बंद कर ली। पर कोई भी पक्षी कुछ नहीं बोला और चारों तरफ बिल्कुल सन्नाटा छा गया। राजा गुस्से से बोला - मै तुम सभी को ले जाऊंगा और पिंजरे में बंद कर दूंगा।
यह सुनकर तोता डरते हुए आगे आया और कहा - मुझे अपने साथ ले चलो तभी पीछे से अपने खूबसूरत पंखों को फैलाए मोर आगे आया और बोला - मेरे मुंह से मोती निकलता है,मुझे अपने साथ ले चलो। तोता मुझे बचाने के लिए झूठ बोल रहा है। फिर क्या था एक के बाद एक पक्षी आगे आकर राजा से अपने मुंह से मोती निकलने की बात कह रहे थे। अपने दोस्तों का यह प्यार देखकर मैना की आंखो से आंसू बह निकले। वह पत्तों के झुरमुट से बाहर आकर मोतियों के ढेर पर बैठ गई और बोली-  मेरे सभी दोस्त मुझसे बहुत प्यार करते है और वे मुझे पिंजरे में बंद नहीं देख सकते इसलिए झूठ बोल रहे है। मेरे ही मुंह से मोती निकलता है। और यह कहकर मैना गाना गाने लगी जैसे ही उसका गाना खत्म हुआ, एक चमकदार मोती तुरंत उसके मुंह से निकला मोती।
यह देखकर राजा ने दौड़कर मैना को पकड़ लिया। उसने एक हाथ से घोड़े को दौड़ाना शुरू किया और दूसरे हाथ में मैना को कसकर पकड़ लिया कि कही वह उड़ न जाए। पर मैना बिल्कुल चुपचाप और बिना हिले डूले बैठी हुई थी। राजा बहुत देर तक जंगल से बाहर जाने का रास्ता ढूँढ़ता रहा पर उसे इतने घने जंगल में कुछ भी सूझ नहीं रहा था। तभी मैना रूँधे स्वर में बोली - मैं आपको जंगल से बाहर जाने का रास्ता बताती हूँ। राजा ने मैना की तरफ देखा तो उसकी आँखों सें टप-टप आंसू गिर रहे थे।
राजा उसके द्वारा बताए गए रास्ते पर जाने के कुछ ही समय के बाद जंगल के बाहर पहुँच गया राजा ने देखा कि उसकी हथेली मैना के लगातार रोने से भीग गई है और वह सिर उठाकर बार-बार आसमान की ओर देख रही है। राजा ने जब ऊपर देखा तो वह आश्यर्च चकित रह गया। सभी पक्षी मैना के कारण उसके पीछे उड़कर आ रहे थे। राजा का मन ग्लानि से भर गया। उसने प्यार से मैना के सिर पर हाथ फेरकर बोला - तुम अपने मित्रों से बिछुड़ने के दुख में लगातार रो रही थी,उसके बाद भी तुमने मुझे जंगल के बाहर पहुँचने का रास्ता बताया। नही तो मैं शायद कभी भी इतने घने जंगल के बाहर नहीं आ पाता और यह कहकर उसने मैना को उड़ा दिया। पक्षियों ने जैसे ही मैना को अपनी ओर आते देखा तो वे खुशी के मारे चीख पड़े और वापस जंगल की ओर लौटने लगे और राजा मुस्कराता हुआ उन्हें तब तक देखता रहा, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए।
पता -
ए,301,जेमिनी रेसीडेंसी, राधिका काम्प्लेक्स के पास,
मेडिकल रोड ,गोरखपुर उ.प्र. 273006 मोबाइल : 9616797138

शनिवार, 22 जून 2013

पुरस्‍कार चतुराई का

  • सृष्टि शर्मा
एक बार एक राजा ने घोषणा करवाई कि पहला पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जायेगा जो ऐसी कहानी सुनाए जो दूसरों को एकदम सत्य लगे। दूसरा पुरस्कार उसे मिलेगा जिसके घर का बना पकवान सबसे अधिक स्वादिष्टï होगा और तीसरे पुरस्कार का अधिकारी वह होगा जो यह सिद्ध कर दे कि वह विश्व का सबसे खुशहाल व्यक्ति है।
इसकी घोषणा होते ही राजदरबार खचाखच भर गया। बड़े - बड़े विद्वान, कहानीकार, कलाकार, आए। निश्चित समय पर प्रधानमंत्री ने घोषणा की। वहां उपस्थित विद्वान, कलाकार, कहानीकार ने अपनी - अपनी बात रखी पर न राजा को उनकी कहानियां सच्ची घटना की तरह लगी और न ही राजदरबार में उपस्थित लोगों को। अभी प्रतियोगिता जारी थी कि एक व्यक्ति दौड़ते - दौड़ते दरबार में आया। उसने राजा से हाथ जोड़कर कहा - क्षमा करें महाराज, मुझे इस बात का संदेह है कि आपने जितने सोने की मोहरे देने की घोषणा की है उतने मोहरे तश्तरी में नहीं है। मुझे तश्तरी में रखी सोने के मोहरे गिननी पड़ेगी। क्या आप मुझे इसकी अनुमति देंगें?
राजा को उसकी बात सुनकर बहुत क्रोध आया। राजा ने क्रोध में कहा - तुम्हें दरबार तक पहुंचने की भी तमीज नहीं है, देर से आते हो और कहते हो संदेह है। पहले इसका उत्तर दो कि तुम यहां इतनी देर से क्यों आये?
- केले के हलुए का नाश्ता अधिक खा लेने के कारण मुझे आलस्य आ गया। और मैं सो गया। इसलिए यहां पहुंचने में देर हो गई। उस व्यक्ति का उत्तर था।
राजा को उसकी बात जंच गई मगर प्रधानमंत्री को विश्वास नही हुआ। उसने कहा - महाराज, यह आदमी असत्य कह रहा है। इस मौसम में तो हमारे देश में तो केले ही नहीं होते, फिर इसने केले का हलुआ कैसे खाया?
- मंत्री महोदय का कहना सत्य है। राजा ने कहा
- महाराज यह सत्य है कि इस मौसम में हमारे देश में केले नहीं होते किन्तु हमारे बगीचे में जो केले का पेड़ लगा है उस पर इस मौसम में भी केले के फल लगते हैं। इस पेड़ को मेरी पत्नी अपनी मायके से लाई है।
- तुम्हारी पत्नी केले का पेड़ मायके से कैसे उठा लाई। राजा ने आश्चर्य से पूछा।
उस आदमी ने मुस्करा कर कहा - महाराज मेरी पत्नी का मायका दूसरे देश में है। पिछली बार जब वह मायके से आयी तो केले के दो छोटी - छोटी कलम ले आई थी और अब वह एक पेड़ बन गया है। इस पेड़ पर बारहों महीने फल लगता है। आज प्रात: मेरी पत्नी ने इसी पेड़ से केले तोड़कर हलुवा बनायी थी। मैंने हलुवा इतना अधिक खा लिया कि मुझे नींद आ गई। महाराज, मुझे देर से पहुंचने के लिए क्षमा कर दीजिए।
राजा को वह आदमी बड़ा अजीब सा लगा। वह सोचने लगा कि यह आदमी बात - बात में अपनी पत्नी का ही जिक्र क्यों कर रहा है? शायद यह पत्नी का गुलाम है। राजा कुछ कहता इससे पहले वह आदमी फिर कहने लगा - महाराज, मेरी पत्नी जो केले का पौधा अपने मायके से लाई है वह कोई साधारण पौधा नहीं है। उसके एक - एक गुच्छे में सौ - सौ केले लगते हैं। आप ही बताइये, ऐसी पत्नी का भला गुणगान कौन नहीं करेगा।
राजा अब उसकी बातों में दिलचस्पी लेने लगा। पास बैठे प्रधानमंत्री ने कहा - महाराज, यह व्यक्ति हलुवे का जिस प्रकार वर्णन कर रहा है उससे तो लगता है कि ऐसा स्वादिष्टï हलुवा किसी ने आज तक चखा ही नहीं। राजन, आप इस आदमी को आदेश दे कि वह हलुवा जिसे इसने खाया है, दरबार में लेकर आये ताकि हम सब भी खा सके।
सिर्फ राजा को ही नहीं अपितु वहां उपस्थित सभी लोगों को प्रधानमंत्री की बात जम गई। राजा ने कहा - हां, प्रधानमंत्री ठीक कह रहे हैं, तुम अपने घर जाओ और हलुवा दरबार में लेकर आओ ताकि हम भी ऐसा स्वादिष्टï हलुवे का मजा ले सके।
अब वह आदमी उठा और सोने की मोहरों से भरी एक थाली को उठाने लगा, तभी राजा ने कहा - ये तुम क्या कर रहे हो ? तुम्हें किसने इस पुरस्कार को छूने का अधिकार दिया?
वह आदमी हंसा और कहने लगा - महाराज, मैं तो अभी अपना प्रथम पुरस्कार उठा रहा हूं। मैंने जो कहानी आपको सुनाई, वह काल्पनिक थी जबकि लोगों को एकदम सच्ची लगी। मैंने आपसे बात - बात में मेरी पत्नी मेरी पत्नी कहता रहा। और आप लोग विश्वास करते रहे जबकि सच तो यह है कि मैं अभी तक अविवाहित हूं।
उस व्यक्ति की बात सुनकर वहां बैठे सभी लोगों के मुंह आश्चर्य से खुले ही रह गए। राजा भी चकित हुआ। उन्होंने कहा - सच में तुमने असत्य कहानी गढ़ कर हमें उस पर विश्वास करने बाध्य कर दिया अत: प्रथम पुरस्कार पर तुम्हारा ही अधिकार बनता है, ले जाओ ...।
राजा अभी यह बात कह ही रहे थे कि उस व्यक्ति ने दूसरी थाली की ओर भी अपना हाथ बढ़ाया। राजा चीख उठे - अब इस थाली को क्यों उठा रहे हो ?
- महाराज, उस स्वादिष्टï हुलुए से अधिक स्वादिष्टï और कोई खाद्य पदार्थ क्या होगा जिसे चखने यहां बैठे सभी लोगों का मन ललचा आया। आप ही बताइये क्या दूसरे पुरस्कार पर मेरा अधिकार नहीं बनता ?
- बनता है ...। राजा ने कहा।
वह व्यक्ति तीसरी थाली की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा - महाराज, दो - दो पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति से अधिक खुशहाल भला यहां कौन होगा?
राजा ने प्रसन्न होकर कहा - सो तो तुम हो ही, यह लो, तीसरा पुरस्कार भी मैं तुम्हें ही देता हूं।
सारा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इस तरह राजा ने 3-3 पुरस्कार जीतने वाले उस व्यक्ति को खुशी - खुशी विदा किया।
तुलसीपुर राजनांदगांव (छ.ग)