इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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शनिवार, 29 अगस्त 2015

अंधरी के बेटा

विट्ठल राम साहू '' निश्‍छल''

        एक झन राजा रिहिस। ओ हा अपन राज म बजार लगवाय। ओखर फरमान रिहिस कि जऊन जिनिस हा सांझ के होवत ले नई बेचाही तौन जिनिस ला राजा के खजाना ले पइसा दे राख लेय जाय। एक झन मूरति बनईया करा राक्छसिन के मूरति बांचगे ओला कोन्हों नई लीन। जानबूझ के माछी कौन खाय? पइसा दे के राक्छसिन ला कोन लेही। सांझ किन ओ मूरति ल राजा ल लेय बर परगे। राक्छसिन तो राक्छसिन ये। राक्छसिन हा राजा ला कहिथे - मोला पइसा डार के लेय हस, बने बात ए। फेर मैं जौंन कहूं तौन ला तोला माने बर परही।
        राजा किहिस - मानहूं का बात ये बता। त राक्छसिन कहिथे - तोर तीनों रानी के आंखी ल निकार के ओमन ला जंगल डाहार खेदार दे। राजा बपुरा का करय, अपन तीनों रानी के आंखी ला निकाल के खेद देथे। छोटे रानी हा पेट में रहिथे। बिचारी ह कटाकट जंगल मा एक ठन पीपर रूख के तरि मां बइठे पीपर के फर मन ला बीन - बीन के खावय अऊ डबरा - खोंचका के पानी ल पिए। एक दिन ओखर एक ठन बेटा होईस। ओखर नाव राखिस बिजयपाल। ओखर बेटा हा दिन के दिन बाढ़हत गिस। एक दिन एक झन राजा हा उही सोज ले जावत राहाय। ओखर मेर ले तीर - कमान मांग लिस। अब ओ हा सिकार करे लगिस। सिकार मा जौंन मिलय तेन ला अपन दाई मन ला अऊ अपनो खावय। एक दिन ओ हा अपन दाई मन के अंधरी होय के किस्सा ला सुनिस। सुन के ओ राक्छसिन मेर गिस। उहां जाके कहिथे - अब मैं हा इंहे रहूं। राक्छसिन डर्रागे।
        ओ किहिस - पहिली तैं मोर दाई मेर जा के ओखर सोर ले के आ तब राखहूं। राक्छसिन हा चाल चले रिहिस। ये टूरा हा ऊंहा जाही त मोर दाई येला बचावय नहीं। खा डारही। राक्छसिन के दाई के पता - ठिकाना ला पूछके बिजयपाल हा ऊहां पहुंचगे। ऊहां जा के ओ राक्छसिन ला ममादाई केहे लगिस अऊ ऊंहे रेहे लगिस। कुछ दिन बिते ले बिजयपाल हा पूछथे - कस ममादाई ये छै ठन आंखी हा टंगाय हे, तेन हा काखर ये? राक्छसिन हा कहिथे - ये हा एक झन राजा के तीन झन रानी मन के आय बेटा। तोर दाई हा ये आंखी ला निकलवा के इंहे भेजे हावय। ओखर ले फेर पूछिस - ये आंखी हा फेर कइसे लग जही ममादाई? राक्छसिन किहिस - एक जघा मा रोज नांवा - नांवा धान के खेत हावय ऊंहा रोज धान बोथें अऊ रोज धान लुथें। ओ धान के चाउर के पसिया मा ये आंखी ला चटका देय ले आंखी ले दिख जथे।
         अब का पूछबे। बिजयपाल हा ओ आंखी मन ला धर के ले लानिस अऊ धान के खेत मां पहुंचगे। खेत के पांच बाली ला टोर के धर लीस अऊ घर आगे। चार बाली ला कूट के भात रांधिस। ओखर पसिया मां अपन तीनों झन महतारी मन के आंखी ला चटका दिस। एक ठन बाली ला बो दिस। जब धान हा पाक के तियार हो गिस त लू के कूट - छर के रोज भात रांध - रांध के ओ मन ला खवाए लगिस।
        उंखर आंखी म दिखे लगिस। धीरे - धीरे ओखर खेती किसानी बाढ़ गे। नौकर - चाकर होगे। बड़े जनी घर घलो बना डारिस। एक दिन फेर अपन राक्छसिन ममादाई घर पहुंचिस। ओ हा राक्छसिन ममादाई घर एक ठन डंडा देखिस। डंडा के बारे मं पूछिस त ममादाई बतईस - ये हा अइसन डंडा आय बेटा, जेखर हांत मा ये डंडा रही तौन हा कतको ढोर - ढांगर अदमी ला अपन बस म कर सकत हे।
        बिजयपाल हा मऊका देख के ओ डंडा ला ले लानिस। घर आ के डंडा ला धर के बरदी के बरदी गाय, भईंस, बईला मन ला अपन घर ले लानिस। खेती - बारी मजदूरी करईया अउ ढोर चरईया कतको आदमी मन ला डंडा के बल म ले लानिस। अब ओखर कारोबार जोरदार चले लगिस।
        एक दिन एक झन राजा अईस। ओ हा अपन लड़की के बिहाव बिजयपाल से कर दिस। अपन राजपाठ तक ला दे दिस। बिजयपाल अब राजा बनगे। फेर सोचिस कि कहूं ओ राक्छसिन ला जनबा हो जही त मोला छोंड़य नहीं। तेखर ले उहू ल ठिकाना लगा देना चाही। ओ हा फेर राक्छसिन ममादाई करा पहुंचिस। दु ठन सेंदूर भरे के डबिया ला देख के पूछिस - कस ममादाई ये हा का के डबिया आय?
        राक्छसिन बतईस - बेटा एला झन छूबे। ये डबिया मां तोर दाई अऊ मोर जीव हे। डबिया ल खोलते साठ हम दूनों झन महतारी - बेटी मर जबो बेटा। एक दिन बिजयपाल हा कलेचुप ओ डबिया मन ला धर के ले लानिस। जइसे ओला खोलिस ओ राक्छसिन महतारी - बेटी मन मर गें। अब बिजयपाल अपन बाप मेर पहुंचिस। अपन परचय दिस। बाप - बेटा एक - दूसर ला पोटार के मिलीन। बाप के राजपाठ ह घलो बिजयपाल ला मिलगे। अब का पूछबे, ओखर दिन सोन के अउ रात चांदी के होगे।
कहिनी उरकगे मने -  मन येखर अरथ समझव। अंधरी के बेटा सहिक तुंहरो भाग जागे।
मौवहारी भाठा, महासमुन्‍द (छ.ग.)

एक तोता और एक बूढ़ा बैगा

डॉ. विजय चौरसिया

        एक बूढ़ा बैगा अपनी बूढ़ी बैगीन पत्नी के साथ रहता था। उनकी एक भी संतान नहीं थी। उनका परिवार अत्यंत गरीब था। उनके पास खेत - बाड़ी जमीन कुछ भी नहीं था। एक दिन उस बूढ़े बैगा ने सुबह - सुबह अपने हाथ में कुल्हाड़ी रखी और लकड़ी काटने जॅगल की ओर गया। जॅगल में जाकर उसने दो पेड़ों को काटा तो वह थक गया और विश्राम करने के लिए उन्हीं पेड़ों की छाया में बैठ गया। उसी समय करीब एक लाख बॅदर उस बूढ़े बैगा के पास आकर एकत्र हो गये। बॅदरों ने आकर उस बढ़े से पूछा - क्यों दादा आप थक गए हो क्या? उस बूढ़े ने कहा हॉं मैं थक गया हूं।
        फिर बंदरों ने पूछा दादा- आप लकड़ी काट रहे थे क्या? बूढ़े ने कहा हां मैं लकड़ी काट रहा था। बंदरों ने पूछा- तुम लकड़ी क्यों काट रहे थे? तो बूढ़े ने कहा मेरा विचार खेत की बाड़ी तैयार करने का है। जब बंदरों ने बूढ़े बैगा की यह बात सुनी तो बंदरों ने उस बैगा की कुल्हाड़ी ली और जंगल की ओर भाग गए। कुछ समय बाद बंदरों ने ढेर सारी लकड़ी काट कर उस बैगा के पास लाकर रख दी। इसके बाद सभी बंदर जंगल की ओर भाग गये। बूढ़ा बैगा भी लकड़ियों को वहीं छोड़कर अपने घर की ओर चला गया।
        एक सप्ताह बाद जब सभी लकड़ियाँ सूख गई। तो एक दिन वह बूढ़ा अपने खेत में आया और उन लकड़ियों को छोटे - छोटे टुकड़ों में काटा और पूरे खेत में फैलाने लगा। काम करते - करते बूढ़ा बैगा थक गया और फिर वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया।
        कुछ समय बाद फिर से एक लाख बंदरों की फौज उस बूढ़े के पास आ गई और उसकी कुल्हाड़ी लेकर उन लकड़ियों के छोटे - छोटे टुकड़े कर दिये और उन लकड़ियों को पूरे खेत में फैला दिया।
        उस बूढ़े बैगा ने अपने खेत के पास उन पेड़ों से एक नागर बनाया। फिर वह कटी हुई लकड़ियों को पूरे खेत में फैलाने लगा। बूढ़े बैगा को ऐसा करते देख बंदरों ने भी लकड़ियाँ उठाई और पूरे खेत में फैलाने लगे। एक लाख बंदरों ने एक ही दिन में पूरे खेत को तैयार कर दिया। इसके बाद उस बूढ़े बैगा ने पूरे खेत में पड़ी सूखी लकड़ियों में आग लगा दी। इसके बाद सभी बंदर जंगल की ओर भाग गये और वह बूढ़ा बैगा अपने घर आ गया। जब बरसात आई तब पूरे खेत में पानी आ गया। फिर एक दिन वह बूढ़ा बैगा एक टोकनी में धान के बीज रखकर अपने खेत में आया और उसने पूरे खेत की राख में धान के बीज बो दिये। कुछ दिनों बाद उसके खेत में पड़े धान के बीजों में अंकुर निकल आये। तब एक दिन बूढ़ा बैगा अपने खेत में आया और उसने अपने खेत के चारों ओर ऊपर नीचे कटीले काँटों की बाड़ी बना दी। बूढ़े बैगा ने अपने खेत को चारों तरफ से ऐसा घेरा कि कहीं से भी एक चूहा या चिड़िया भी खेत के अंदर न प्रवेश कर सके। इतना करके वह अपने घर वापस आ गया।
कुछ दिनों बाद जब धान की फसल तैयार हो गई। तब एक दिन बूढ़ा बैगा अपने खेत से खरपतवार निकालने के लिये गया। वह जैसे ही खेत में पहुंचा तो उसने देखा कि उसके खेत में धान का एक भी दाना नहीं है। एक दिन उसके खेत में करीब दो लाख तोतों का झुंड आया और उसके खेत के छप्पर में एक छेदा बनाया और सभी तोता खेत के अंदर प्रवेश कर गये और उसके खेत की पूरी धान को कुतर डाला और धान के अंदर के चांवल को खा कर भाग गये। जब उस बूढ़े बैगा ने अपने खेत की यह दशा देखी तो वह रोने लगा। उसने अपने खेत के चारों ओर घूम कर देखा की तोता कैसे उसकी धान को ले उड़े। तब उसने देखा की तोतों का एक बड़ा झुंड उसकी धान को लेकर उड़ गये थे, जिसके कारण रास्ते भर में उस धान का भूसा बिखरा पड़ा था।
        बूढ़ा बैगा उसी रास्ते पर चल दिया जिस रास्ते से तोतों का झुंड़ गया था। कुछ देर बाद बूढ़ा बैगा उस स्थान पर पहुंच गया जहाँ पर तोतों का झुंड़ निवास करता था। बूढ़े बैगा ने देखा की तोतों का झुंड़ जंगल में बहुत बड़े बरगद के पेड़ पर निवास कर रहा था। ऐसा देखकर बूढ़ा बैगा अपने घर की ओर चला गया,घर पहुॅचकर बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी बूढ़ी बैगीन को अपने खेत के समाचार बताए। यह सुनकर बूढ़ी बैगीन रोने लगी। तब उस बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी से एक बहुत बड़ी पाँच हाथ लम्बी और पाँच हाथ चौड़ी रोटी बनाने को कहा तथा एक मिट्टी के मटके में दस - पंद्रह किलो रमतिला का तेल भरने को कहा। बूढ़ा बैगा बहुत ही शक्तिशाली था। उसकी जो कुल्हाड़ी थी। उसको उठाने के लिये हमारे तुम्हारे जैसे करीब बीस लोगों की जरुरत पड़ेगी और उसका हॅसिया इतना वजनदार था कि उसको पकड़ने में हमारे तुम्हारे जैसे बीस आदमी लगते थे। उसने उस रोटी को और तेल वाले मटके को एक चादर के सहारे अपनी कमर में लपेट कर गठान बॉध ली।
        इसके बाद वह बूढ़ा बैगा जंगल की ओर गया। वहा पर उसने थुआ के अनेकों पेड़ों को काटकर उसका ढेर सारा दूध निकाला और उस थुआ के दूध को अपने साथ में ला रमतिला के तेल में मिला दिया। जिससे उस बूढ़े बैगा ने पक्षियों को पकड़ने के लिए चौप तैयार कर लिया। इसके बाद बूढ़ा बैगा उसी विशाल बरगद के पेड़ के पास गया! जहॉ पर तोतों का बसेरा था। उस समय उस बरगद पर एक भी तोता नहीं था। सभी तोते आसपास के खेतों में आनाज चुगने गए थे। बूढ़े बैगा ने यह अच्छा अवसर देखा और वह उस बरगद के पेड़ पर चढ़ गया और बरगद की टहनियों में चौप लगा दिया। बूढ़ा बैगा पेड़ से उतरकर नीचे आया और पास के पेड़ों में जाकर छुपकर बैठ गया। शाम के समय तोतों का झुंड दाना चुगकर अपने बसेरा में लौटने लगे। सभी तोते बरगद के पेड़ के ऊपर आकर बैठने लगे। वे जैसे ही पेड़ की डंगालों पर बैठते उसी समय उनके पंख और पैर उन डगालों से चिपक जाते। थोड़ी ही देर में दो लाख तोते उस बरगद के पेड़ पर बैठे और चिपक कर लटक गये और कुछ देर बाद वे जमीन पर आ कर गिर गये।
         कुछ समय बात उन तोतों का राजा बुद्वसेन उस बरगद के पास उड़ते - उड़ते आया और जैसे ही वह अपने घौसले में जाकर बैठा उसी समय उसके पंख और पैर उस चौप में चिपक गये। अब तोतों का राजा बुद्वसेन जोर - जोर से चिल्लाने लगा। वह रो - रोकर तड़फने लगा। जिससे उसके सभी तोता साथियों को पता चल गया की उसका राजा भी चौप में फँस गया है। जिससे सभी तोते सर्तक हो गये और धीरे - धीरे वे जमीन में लुढ़कते हुए वहां से भाग गये। कुछ देर बाद राजा बुद्वसेन फड़फड़ाता हुआ जमीन पर गिर गया।
        बूढ़े बैगा ने तोतों के राजा बुद्वसेन को जमीन में फड़फड़ाते देखा तो उसने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और उसके पीछे भागा और उसको पकड़ लिया। इसके बाद उस बूढ़े बैगा ने राजा बुद्वसेन से पूछा - तुमने अपने साथियों के साथ मेरे धान के खेत की पूरी धान क्यों खा ली। इसकी सजा यह है कि मैं तुमको मृत्यु दंड दूंगा। तब बुद्वसेन ने कहा - बैगा बाबा तुम मुझे मत मारो मैं तुम्हारे घर की रखवाली करुॅगा।
        बूढ़े बैगा ने उस तोते के राजा की बात मान ली और उसे अपने घर लेकर आ गया। जब बूढ़ा बैगा घर में आया तो उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या तुमने एक ही तोता को मारा है दूसरे तोते कहां गये? बूढ़े बैगा ने कहा- हां, एक ही तोता पकड़ पाया दूसरे तोते उड़ गये। बूढ़ी बैगीन बोली - मैं इस तोता को मार डालूंगी। इसने हमारे खेतों को बरबाद कर दिया है। इसके कारण हम लोग दाना - दाना को मोहताज हो गये हैं।
        तोतों का राजा बुद्वसेन उस बूढ़ी बैगीन से क्षमायाचना करके कहा-  दादी मुझे मत मारो। मैं तुम्हारे घर की रखवाली करुंगा। तब उस बूढ़ी बैगीन ने सोचा मेरे तो बाल - बच्चे नहीं हैं। क्यों ना मैं इसका अपने बच्चे की तरह पालन पोषण करु। फिर बूढ़े बैगा ने तोतों के राजा बुद्वसेन के लिए एक पिंजरा बनवाया और उसमें तोता को रख दिया बूढ़ी बैगीन रोज उस तोते को सुबह- शाम खाने के लिए चना की दाल और अच्छा - अच्छा खाना देने लगी। तोतों का राजा बुद्वसेन सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
        इस प्रकार तोतों का राजा बुद्वसेन को बूढ़े बैगा के पास रहते हुए दस वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन तोता ने अपने मालिक बूढ़े बैगा से कहा-  बाबा मुझे इस प्रकार से पिंजरा में रखने से आपको कोई फायदा नहीं। आप मुझे किसी शहर में ले जाकर बेच दो जिससे आपको धन प्राप्त होगा। तब बूढ़े बैगा ने कहा - बुद्वसेन तुमने तो बहुत अच्छी बात कही है। उसी समय बूढ़े बैगा ने अपनी पत्नी से पांच हाथ लंबी और पांच हाथ मोटी एक रोटी बनाने को कहा। उसकी पत्नी ने एक बड़ी रोटी तैयार कर दी। इसके बाद बूढ़े बैगा ने उस रोटी को एक कंबल में रखकर अपनी कमर में लपेट लिया तथा तोता के पिंजरा को अपने हाथ में रखकर शहर की ओर चला गया। रास्ते में उसको एक गाय चराने वाला अहीर मिला। जब उसने बूढ़े बैगा को सुआ ले लो, सुआ ले लो! कहते सुना तो उसने बूढ़े बैगा को अपने पास बुलाया और कहा - बैगा बाबा, यहां आना मुझको तुम्हारा सुआ खरीदना है। बूढ़ा बैगा तुरंत उस गाय चराने वाले अहीर के पास चला गया। अहीर ने कहा- बाबा इस तोता की कीमत क्या है। तुम इसको कितने में बेचोगे? तब बूढ़े बैगा ने कहा -मैं मोल भाव करना नहीं जानता तुम तोता से ही पूछ लो। उसकी कीमत। अहीर ने तोता से पूछा -क्यों तोता जी, आपकी कीमत क्या है? तो तोता ने कहा- मेरी कीमत पूरे एक लाख रुपया है। तब अहीर ने कहा - मेरे गृह में दरियाई घोड़े,गाय,बैल,भैंस और हजारों बकरियाँ हैं। उन सभी की कीमत भी जोड़ी जाये तो एक लाख रुपया नहीं होंगे। इसलिए मैं तुमको नहीं खरीद सकता। ऐसा सुनते ही बूढ़ा बैगा सुआ ले लो सुआ! बोलने वाला सुआ ले लो! कहते हुये आगे बढ़ गया।
        बूढ़ा बैगा शाम के समय उस राज्य के राजमहल के सामने से गुजरा। उस राज्य के राजा ने बैगा की आवाज सुनी तो उसने बैगा को अपने पास बुलाया और उस बैगा से पूछा - बैगा बाबा आपने इस पिंजरा में तोता रखा है क्या? बूढ़े बैगा ने कहा- महाराज जी, इसमें तोता ही है। तब राजा ने उस तोता की कीमत पूछी तो बूढ़े बैगा ने कहा - राजा जी, मैं इसकी कीमत नहीं जानता। आप इस तोते से ही उसकी कीमत पूछ लें। राजा ने तोता से पूछा- तोता राम आपकी कितनी कीमत है ? तो तोता ने कहा- राजा जी, मेरी कीमत पूरे एक लाख रुपया है।
        राजा जी ने उस बूढ़े बैगा को तुरंत एक लाख रुपया दे दिया। तब बूढ़े बैगा ने एक लाख रुपया अपनी कमर में लपेटने के लिए कंबल को खोला तो उसमें से रोटी गायब हो गई थी। क्योंकि बूढ़े बैगा ने उस रोटी को रास्ते में ही खा लिया था। तब उसने कंबल को खोला और उसमें रुपयों को रखकर उस कंबल को अपनी पीठ में बांध लिया और अपने घर की ओर चल दिया। बूढ़े बैगा ने उन एक लाख रुपयों से गाय,बैल,भैंस,बकरियाँ और घोड़े सहित बहुत सारा समान खरीदा और अपने घर वापस आ गया। अब वह बूढ़ा बैगा बड़ा आदमी बन गया था। पहले गाँव के लोग उसे भूमिया बैगा कहकर बुलाते थे पर उसके पास पैसा आने के बाद गाँव के लोग उसे पटैल और गाँव का मुकद्दम कहकर बुलाने लगे।
        तोतों का राजा बुद्वसेन राजमहल में एक लोहे के पिंजरे में रहने लगा। उस राजा की सात रानियाँ थी। राजा ने अपनी सातों रानियों को आदेश दिया कि प्रतिदिन एक रानी तोता को खाना देंगी। उस राजा की सातों रानियों में से छ: रानियों का स्वभाव अच्छा नहीं था! मात्र सबसे छोटी रानी का स्वभाव सबसे अच्छा था। तोता सभी रानियों के स्वभाव से परिचित हो गया था। इसलिये वह मात्र सबसे छोटी रानी के हाथ से ही खाना खाता था। वह खराब स्वभाव वाली छयों रानियों के हाथ से खाना नहीं खाता था। जब छयों रानियों ने देखा कि तोता सिर्फ  छोटी रानी के ही हाथ से खाना खाता है और बाकी रानियों के हाथ से रखा हुआ खाना को छूता भी नहीं है। तो रानियां उस तोता के ऊपर नाराज हो गई और छोटी रानी से जलने लगीं।
        राजा की छह रानियों ने नाराज होकर खाना- पीना छोड़ दिया और बीमारी का बहाना बनाकर अपने - अपने बिस्तरों में जाकर सो गई। रानियों ने राजा से अपना इलाज कराने के लिये गुनिया,पंड़ा और वैद्य बुलाने के लिए कहा। परंतु राजा यह जानता था कि तोता उन रानियों के हाथ से खाना - पीना नहीं करता! इसलिये वे नाराज होकर सो गई हैं। इसलिये राजा ने किसी गुनिया या वैद्य को नहीं बुलाया। रात को सभी छह रानियों ने तोता को मार डालने का विचार किया। जब सुबह हुई तो वे रानियां राजा के पास जाकर अपना इलाज कराने के लिये कहने गई। तब राजा ने उन रानियों से पूछा तुम लोग किस प्रकार की दवा से ठीक होगी। तब उन रानियों ने कहा- राजा जी, यदि हम लोगों को उस तोता का कलेजा और उसकी दो आँखें मिल जायेंगी! तो हम लोग स्वस्थ हो जायेंगी और हम लोग खाना भी खाने लगेंगी।
        तब राजा ने तुरंत एक सिपाही को बुलाया और उसे आदेश दिया कि तुम अभी जाओ और तोता को मारकर उसका कलेजा और दोनों आँखें लाकर रानियों को दे दो। सिपाही ने तोता का पिंजरा उठाया और उनकी आज्ञा का पालन करते हुए उस तोते के पिंजरा को बगीचा में लाया और तोता को बाहर निकालकर उसकी गर्दन दबाने लगा। उसी समय तोता ने सिपाही से अपने जीवन की रक्षा के लिए विनती की और कहा- सिपाही जी, आप मुझे जान से मत मारो। कभी राजा को फिर से मेरी जरुरत पड़ी तो तुम मुझे कहाँ से लाओगे? मैं तोतों का राजा हूँ! यदि तुमने मुझे मार दिया तो संसार के सभी तोते मर जायेंगे। तब सिपाही ने कहा - आप भी राजा हो, और वो भी राजा हैं! मैं किसका कहना मानूॅ। अब आप ही बताइये मैं क्या करुॅ! मैं अपने राजा की आज्ञा को कैसे पूरा करुॅ? तब तोता ने कहा- यह तो सबसे सरल बात है, तुम शहर में जाओ और वहां की प्रजा से कहो कि राजा ने प्रजा से पांच मुर्गो का इंतजाम करने के लिए कहा है। इसके बाद तुम पांच मुर्गों का शिकार करके खा लेना और एक मुर्गा की दो आँखें और उसका कलेजा निकालकर राजा को दे देना। राजा समझेगा की वह तोता का कलेजा और आँखें हैं। राजा उस कलेजा और आँखों को रानियों को खिला देगा। तोता का सुझाव सिपाही के समझ में आ गया।
         उस सिपाही ने बगीचा के एक बड़े पेड़ के ऊपर चढ ़कर पिंजरा को एक डंगाल में लटका दिया और पिंजरा का दरवाजा खोल दिया! जिससे तोता निकलकर पेड़ की एक डंगाल पर बैठ गया। तब सिपाही ने तोता से पूछा -क्यों तोता राम जी, जब राजा तुमको बुलायेंगे तब तुम वापस आ जाओगे की नहीं? तब तोता ने कसम खाकर कहा सिपाही जी,जिस दिन भी राजा मेरे को बुलायेंगे,उसी दिन मैं लौटकर आ जाऊँगा। इतना कहकर तोता उस पेड़ के ऊपर से उड़ कर आकाश की सैर करने लगा।
        वह सिपाही महल से निकलकर अपने दो साथियों के साथ शहर में आ गया। शहर में आकर उन सिपाहियों ने प्रजा के लोगों को एकत्र किया और कहा - राजा जी को पाँच मुर्गों की जरुरत है, आप लोग तुरंत पाँच मुर्गा लाकर दे दो। प्रजा ने जैसे ही यह आदेश सुना उन्होंने उन सिपाहियों को पाँच मुर्गा लाकर दे दिया। सिपाहियों ने अपने घर जाकर चार मुर्गों को पकाया और छक कर भोजन किया। इसके बाद पाँचवें मुर्गे का कलेजा और दो आँखें निकालकर एक पत्ता में रखकर राजमहल की ओर चल दिये।
        सिपाही जैसे ही राजमहल पहुँचा राजा ने पूछा - तुमने उस तोते को मार डाला कि नहीं? तब सिपाही ने कहा जी, महाराज मैंने उस तोते को मार डाला है,यह रहीं उसकी दोनों आँखें और कलेजा! राजा ने दोनों आँखें और कलेजा ले जाकर उन छयों रानी को दे दिया। छोटी रानी ने जैसे ही सुना की छयों दुष्ट रानियों ने तोता की हत्या करवा दी है। तो उसे बहुत दुख हुआ और दुख के कारण वह रोने लगी। परंतु छयों रानियाँ बहुत खुशी मना रहीं थीं।
          जबसे राजा ने तोता को महल से बाहर किया था। तबसे राजा के ऊपर मुसीबतें आने लगीं। कुछ दिनों में राजा बहुत गरीब हो गया। राजमहल के बाग - बगीचा सूख गये। उसके राजमहल का तालाब सूख गया। राजा ने अपनी रानियों की सुख सुविधा के लिए हीरा -  जवाहरात,सोना - चाँदी राज्य के सेठों को बेच दिये। एक दिन जब राजा बिलकुल गरीब हो गया और उसके पास खाने तक को आनाज नहीं था। तब एक दिन एक ब्राम्हण उसके पास आया और राजा से भिक्षा माँगने लगा,राजा ने कहा - महराज, मेरे पास तो खुद ही खाने का एक दाना नहीं है। मैं आपको भिक्षा कहाँ से दू? तब उस ब्राम्हण ने कहा- ऐसा कैसे हो सकता है, आप इतने बड़े राजा हो और आपके यहाँ खाने को नहीं है। यह सब कैसे हो गया? राजा ने कहा- मुझे खुद नहीं मालूम कि मैं अचानक इतना गरीब कैसे हो गया। उस ब्राम्हण ने अपनी पोथी निकाली! जिसमें भूत - भविष्य की जानकारी थी।
ब्राम्हण उस पोथी को पढ़ने लगा। कुछ देर बाद ब्राम्हण ने बताया कि राजा जी, आपके घर में एक तोता था। जिस दिन से वह घर से बाहर गया है। उस दिन से आपको गरीबी ने आकर घेर लिया है। आप अपने उस तोता को फिर से बुला लो तो आपके दिन फिर से पहले जैसे हो जायेंगे। परंतु आपकी रानियों का स्वभाव बहुत खराब है! सिर्फ  आपकी सबसे छोटी रानी का स्वभाव सबसे अच्छा है।
         राजा ने तुरंत अपने उसी सिपाही को बुलाया और कहा - तुम कहीं से भी उस तोता को लेकर आओ जिस को महल से ले गये। सिपाही ने कहा - महाराज मैं तोता को कहाँ से वापस लेकर आऊँ। आपने तो उसे मरवा डाला है। तब राजा ने कहा- मैं कुछ नहीं जानता, तुम कहीं से भी उस तोते को वापस लेकर आओ। मुझे उस तोते की बहुत जरुरत है,यदि तुमने उस तोते को वापस नहीं लाया तो मैं दंड स्वरुप तुमको फाँसी में चढ़वाकर अंधे कुआँ में फिकवा दूंगा। सिपाही ने जब राजा के यह वचन सुने तो वह घबड़ा गया और राजमहल के बगीचा के उस पेड़ के पास गया जहाँ पर उसने तोता का पिंजरा रखा था। जब सिपाही उस पिंजरा के पास गया तो उसने देखा कि वह पिंजरा तो खाली था। तोता खेतों में दाना चुगने कहीं चला गया था। सिपाही उसी पेड़ के नीचे बैठ गया और तोता की राह देखने लगा। वह एक माह तक तोता की राह देखता रहा पूरे एक माह बाद तोता उस पिंजरे के पास आया। सिपाही ने तोता को देखा और कहा तोता राम जी, आपको हमारे राजा जी ने याद किया है। तुम अभी इस पिंजरा में आ जाओ? जैसा तुमने मुझसे वायदा किया था।
        तोता ने कहा मैं पिंजरा में नहीं आता! राजा मुझे मार डालेगा। तब सिपाही ने कहा- तुम पिंजरा में आ जाओ, मैं वायदा करता हूँ कि तुमको कोई भी नहीं मारेगा। सिपाही ने बड़ी मुश्किल से तोता को पिंजरा में आने के लिए राजी किया। सिपाही पेड़ के ऊपर चढ़ा और जैसे ही तोता ने पिंजरा के अंदर प्रवेश किया सिपाही ने पिंजरा का दरवाजा बंद कर दिया और उस पिंजरा को पेड़ से नीचे उतार लिया। सिपाही तोता को लेकर जिस रास्ते से जा रहा था। उस रास्ते के तालाबों में पानी भर गया,उस राज्य के कुँआ पानी से लबालब भर गये। बगीचों में आम के वृक्ष हरे हो गये। सिपाही जब राजा के महल के पास पहुँचा उसके पहले ही रानियों के हीरा जवाहरात,सोना,चाँदी,रुपया - पैसा जो राजा ने खाना- पानी के लिये बेच दिये थे सभी राजमहल में आ गया। सिपाही ने तोता वाले पिंजरा को लाकर राजा के सामने रख दिया।
        राजा तोता को देखकर बहुत खुश हो गया। उसने तोता को अपने महल में जीवन भर के लिये रख लिया। राजा ने अपनी पाँचों दुष्ट रानियों को मरवा दिया। केवल सबसे छोटी रानी को जीवन दान मिला क्योंकि उसका स्वभाव सबसे अच्छा था।

गाड़ासरई,
जिला ड़िड़ौरी(म.प्र.)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

महराज के बेटा

वीरेन्द्र ‘सरल‘

      एक गांव में महराज अउ महराजिन रहय। महराज गजब विद्वान मनखे रहय, तीर-तखार में ओखर जजमानी चलय। ओहा कथा-भागवत पढ़े के ले जउन दान-दक्षिणा मिले तउने में अपन गुजर-बसर कर लेवय। दूसर के चीज बर महराज कभु लाालच नइ करय। सब मनखे ला मिहनत के कमई खाय के अउ बने मिलजुल के रहे के पाठ पढ़ावय। तिही पाय के उखर गजब मान सम्मान रहय। महराज महराजिन के तीन झन बेटा घला रहय फेर तीन झन अपढ़ अउ निरबुद्धि रहय। जइसे-जइसे ओमन जवान होवत रहय महराज रातदिन उखरे संषों -फिकर में घुरत रहय।
      धीरे-धीरे समें निकलत गिस महराज अब निचट सियान होगे। आंखी दिखय नहीं, कान सुनावय नहीं। जांगर चलय नहीं तिही पाय के ओहा कथा भागवत घला नइ पढ़ सके। अब दान-दक्षिणा मिलना बंद होगे। गरीबी के सेती खाय-पिये बर दुख मिले लगिस। महराज अपन तीनो झन जवान बेटा मन ला गजलब समझावय फेर तीनो के तीनो निचट कोढ़िहा अउ अपढ़। दूबर बर दू असाढ़ अब महराज बपरा काय करे, ओला कुछु समझ में नइ आवय।
       एक दिन खिसिया के महराज ह अपन तीनों झन बेटा मन ला अपन तीर में बला के कहिस-‘‘ अरे! कुलबोरूक हो। तुमन ला थोड़को लाज षरम हे कि नहीं? काम-बुता बर तुहर गतर ह चले नहीं अउ रंग-रंग के खाय पिये के साध करथो। तुहरे असन मन बर सियान मन हाना कहे हावे कि खाय बर लरकू अउ कमाय बर टरकू। घर के गरीबी ह घला तुंहर आंखी में नइ दिखत होही। जब तक मोर जांगर चत रिहिस तब तक गुजर बसर ह कइसनो करके हो जावत रिहिस अब तो महू सियान होगे। चार अक्षर पढ़े रहितेव तो कहूं मेर कथा भागवत पढ़ के दान-दक्षिणा पातेव, तुम तो निचट निबुद्धि हो। आज तो तुमन कहूं करा ले चार पइसा कमाके लावव तभे घर के चूल्हा बरही । नहीं ते भूख पियास में सबके जीव छूठ जही।‘‘
      ददा के बात ला सुनके तीनो भाई ठाढ़ सुखागे । हक्का फूटे न बक्का। ओमन सोचे लगिन कहां ले कमा के लानन ददा। तीनो झन एक ठउर में सकलाके विचार करिन, हमर ददा ह इतवार के इतवार राजा के दरबार में जाके दक्षिणा मांग के लावय। आजो इतवार आय, चलो हमू मन राजा के दरबार में जाबो। अपन घर के दसा ला बताबो, राजा बने दयालू जीव आय। हमरी कुछु न कुछु मदद जरूर करही।
      तीनो भाई राजा के दरबार में जाय बर अपन घर ले निकलगे फेर रद्दा रेंगत ओमन सोचिन-राजा ह दान-दक्षिणा करही तब ओला आशीष देबर लागही हमन ला तो अशीष देय बर घला नइ आय काय अशीष देबो? कोन्हों अन्ते-तन्ते कहि पारबो तब राजा ह हमर मूर्खता ला जान डारही। तेखर ले इही मेरन बइठ के तीनो झन सुन्ता हो जथन।‘‘ फेर बड़े भाई किहिस-‘‘ अरे अभी ले संषो करबो तब तो बेरा इही मेरन पोहा जही। जब के बात तब बनत रही । सियान मन कहिथे के जइसे-जइसे पानी गिरथे तइसे-तइसे छाता ओढ़ना चाही अउ जे दिन के नाचा ते दिन के बाजा, समझगेव। अभी तो जल्दी से राजा के दरबार में चलव। ओमन तीनो झन आधू बढ़गे।
      रद्दा रेंगत बड़े भाई देखथे कि तरिया के पार में मछरी के ताक में एक ठन कोकड़ा ह चुप्पे मिटका के बइठे रहय। मनखे के आरो पाके ओहा कड़ाग-कड़ाग रेंगिस। बड़े भाई किहिस-मोला मंतर मिलगे। राजा ह मोला दक्षिणा दिही तब मैहा रेगे कड़ाग-कड़ाग कहिके आशीष देहूं।
      थोड़कुन अउ आघू बढ़िस तब मझला भाई देखथे के एक खेत के मेड़ ला एक ठन मुसवा ह बिला बनात रहय। मंझला भाइ्र के मुहूं ले निकलगे कि खोदे भुसाभुस, देखे मुलामुल। ओहा किहिस, अशीष देबर महुं ला मंतर मिलगे।
      ओमन  फेर आघू बढ़िन तब छोटे भाई देखथे कि एक पेड़ के ओघा में एक ठन कोलिहा ह सपट के बइठे रहय जउन ह तीन झन मनखे मन ला अपन कोती आवत देख के पल्ला भागिस। छोटे भाई कहि पारिस अब काबर भागथस लकर-धकर। ओहा इही ला अपन मंतर बना डारिस।
      अइसे किसम के तीनो झान ला अशीष देबर मंतर मिलगे। एखर काय मतलब होथे ओला ओ तीनो मूरख मन जानबे नइ करय फेर अपन -अपन मन में ठान लिन के राजा ह जब दक्षिणा दिही तब हमन अइसनेच अशीष देबो।
      फेर तीनो झन के मन में एक चिन्ता बने रिहिस कि राजा ह एक मतलब पूछही तब काय बताबो? तीनो झन सुनता होइन कि राजा ह पूछही तब हमन येला कागज में लिख के दे देबो अउ लिखके बता देबो कि आज हमर मौन व्रत हे हमन आज कुछु बोलबेे नइ करन। दक्षिण ला धरके के तुरते लहुट जाबो। बाद में राजा ह एखर मतलब ला सोचत रही हमन ला काय करना हे। ओमन अइसने सुनता होके राा के दरबार में पहुंचगिन।
राजा ह अपन दरबार में तीनो झन महराज मन ला देख के गजब खुष होइस ,उखर बढ़िया स्वागत सत्कार कसि, सियनहा महराज के हाल चाल पूछिस अउ अड़बड़ अकन दान दक्षिण दे दिस। महराज के तीनो बेटा मन अपन-अपन गढ़े मंतर ला कागज में लिख के राजा ला थमा दिन। वतका बेरा तो राजा ह कुछु नइ किहिस अउ ओमन दरबार ले बिदा करके अपन काम काज में लगगे।
      राजा ह रतिहा के बेरा बने फरसुदहा में महराज के बेटा मन के लिखे अशीष ला पढ़े लगिस फेर ओमन लिखाय मंतर ह राजा ला कुछु समझ में नइ आवय । राजा घेरी बेरी ओला पढ़े अउ ओखर मतलब समझे के उदिम करे। अइसने-अइसने अधरतिहा होगे।
      उहीच बेरा राजा के घर में तीन झन चोर मन सेंधमारी करत रहय। तीनो झन मिलके राजा के कुरिया के दीवार ला संध बनात रहय। राजा ह कागज के मंतर ला जोर से पढ़िस जेमा लिखाय रहय, रेंगे कड़ाग-कड़ाग। येला सुनके एक झन बने ऊंचपुर चोर ह डर्रागे। ओहा समझिस राजा ह जान डारिस तइसे लागथे । मोरे गोड़ ह लाम-लाम हावे। फेर दूसर चोर ह आध डर आध बल करके येती ओती ला देखत दीवार ला खोदे में लगे रहय। अब राजा ह दूसर मंतर ल पढ़िस ‘खोदे भुसाभुस देखे मुला मुल‘ येला सुनके दूसर चोर के पोटा कांपगे। चोर मन समझिन राजा ह जान डारिस तइसे लागथे ददा। कहूं राजा ह गोहार पारही तहन ओखर सैनिक मन हमन ला पकड़ के काली राजदरबार में लेगही अउ राजा ह हमन ला फांसी के सजा दे दिही । इहां ले भागना ही ठीक हे। ओमन उहां ले भागे के तियारी करिन। तभे राजा ह तीसर मंतर ला पढ़िस अब काबर भागथस लकर-धकर‘। तीनो चोर मन उहां ले जीव पराण दे के भागिन। राजा के नींद घला पड़गे अउ धीरे-धीरके रतिहा पोहागे।
      बिहान दिन राजा के घर चोर मन संधमारी करे हे कहिके हल्ला मातगे। चारो कोती देखो-देखे होगे। सिपाही मन चोर ला खोजे के उदिम करत रहिन।
      येती राजा के दरबार लगे हे तभे मंझनिया बेरा तीनो झन चोर मन डरेच के मारे राज महल में  आत्म समर्पण करे बर पहुंचगे अउ अपराध ला कबूल करत हिहिन-‘‘ राजा साहेब! सिरतोन म आप मन त्रिकालदर्शी आव। अधरतिहा के बेरा घला अपमन हमर मन के करनी ला बिना देखे जान डारेव। हमन अपन अपन अपराध के सजा पाय बर आपके दरबार में आय हन अब आप जउन सजा दंहू ओहा हमन ला स्वीकार हे।
चोर मन के गोठ ला सुनके राजा के दिमाग घुमगे। ओहा मने मन गुणिस -अरे! मैहा तो कुछु नइ जानव फर येमन काय बात ला गोठियाथे। उदुप ले ओला सुरता आगे कि रतिहा नी दनइ आवत रिहस तब महराज के बेटा मन के लिखे मंतर ला पढ़के ओखर अरथ समझे के उदिम करत रहेंव, ये चोर मन उही ला सुनके डर के मारे भागे हे तइसे लागथे। राजा ह मने मन हांसिस अउ ओ चोर मन ला जेल खाना में बंद करवा दिस।
      अब राजा ह तुरते महराज के तीनो झन बेटा मन ला बलवाय बर अपन करमचारी मन ला उखर घर भेजिन। राजा के बुलावा ला सुनके महराज के बेटा मन जीव धुकधकागे। उहू मन डर्रात रहय कि दक्षिणा के लालच में हमन जउन मन में अइस तउने आषिर्वाद आय कहिके कागज में लिख के दे पारे हन। लगथे राजा ला हमर मूर्खता के जानबा होगे। अब ओहा बला के कहि हमन ला सजा झन सुना दे। फेर काय करबे राजा के डर धुन बबा के डर ओमन ला राज दरबार में जाना पड़िस।
      ओमन राज दरबार में पहुंचिन तब राजा ह ओमन ला बने ऊँच पीढ़ा में बइठार के उखर गजब मान-सन्मान कसि अउ अड़बड़ अकन दान-दक्षिणा घला दिस। महराज के तीनो झन बेटा मन एक-दूसर ला बेक बोक देखत रहय। राजा काय बर उखर सन्मान करत हे येहा ओमन ला समझ में आबे नइ करत रहय।
अब ओमन दक्षिणा ला धरके राजदरबार ले निकलगे। अउ बइहा भुतहा कस कट्ठल-कट्ठल के हाँसे लगिन। एक झन किहिसइही हरे रे करम के नांगर ला भूत जोते अउ अल्लाह मेहरबान तब गदहा पहलवान ,समझगेव?
पता
बोड़रा ( मगरलोड )
पोष्‍ट-  भोथीडीह, व्‍हाया - मगरलोड
जिला - धमतरी ( छग )

शनिवार, 22 नवंबर 2014

ठोली बोली

किसान दीवान 

एक ठन गांव म नाऊ राहय। बड़ चतुरा अऊ चड़बांक। तइहा पइंत के कंथली आय। जाने ले तुंहरेच नी जाने ले तुंहरेच, गांव भर के हक - हुन्नर, मगनी, बरनी, छटठी, बरही अऊ कोनो घला चरझनियां बुता बर छड़ीदार राहय। घरो - घर नेवता जोहारे अऊ ओट्टिंट आघात  ले झारे - झार जेवन सपेटे। अक तहा घला झोंकावय। घर लेगय। ओकरो घर एक झन टूरा पिला होइस। त कोनो - कोनो ओलियांय। कइसे मर्दनिया तैं सबके घर नेवता खाथस, तोर टूरा के जस बर कब मांदी बलावत हस?
त नाऊ मेंछरा के ही - ही करय। नीते एती ओती बहका के बेंझा देवय। बहू कतेक दिन पूरही ओखी - खोखी सब बसनागे। ठोली - बोलीस से धे धरलिस। मने मन गुसियावय अऊ तरमरावत कुछु उदीम भंजावय। बियाकुल मन हा तौंरत राहय। ठोली बोली कइसे रोके जाय ? कभू बगिया के कुछू ठोसरा देवय त ओमन जरे म नून डारे कस काहंय - अरे ठाकुर अइसने ठट़ठा करत रेहेंव ? बिधुन होके उदीम करे के सेती, रद्दा पागीस।
दूसर दिन ले जौनों हर छटठी  भात बर ठोलियावय, नाऊ काहय - भईगे ये दे ओदे नेवता खवाहूं एक दिन नेवता खवाय के दिन घला जोंग दीस। ओ दिन हर तीन दिन बांचे राहय। तसने गांव के घरोघर ले रांधे पसाय के कराही, घघरा, हंउला, बटकी, भाड़ा थारी लोटा मांगिस। तुंही मन खाहू दऊ हो। दई मई हो। ताहन लान देहूं। नाऊ घर नेवता खाय के लालच म जौन मांगिस, घरोघर दीन।
रात होईस ताहन सबे बर्तन भांड़ा ला बोरा म भरके, छकड़ागाड़ी म लाद के सहर गीस। सब ला बेंचिस अऊ आनी बानी के साग - दार तेल, घी, सक्कर, गुर, बिसा के लानिस। छकड़ा भर खार पीये के जिनिस देख के सबे गांव वाला मन पनछाय धर लिन कब चूरय त कब सपेटन। दिन - रात जेहू - तेहू भिड़ गिन रांधे बर अइरसा, सुंहारी, करी लाड़ू, तसमई, जलेबी, जुर मिल रांधिन। दूसर दिन नेवता झारेझार रिहिस।
नाऊ घर के नेवता माहरे माहर होगे। सबे मगन राहंय। अपन थारी लोटा के चेत भुलागे। जुर मिलके पोरसिन अऊ मेंछरा - मेंछरा के मांदी पंगत खईन। दोना - पतरी अऊ ठेंकवा चुकिया म जेवन पानल देवत रांहय। नाऊ हर पंखा धर के ओरी - ओर बइठे पंगत मन ला हावा धूंकत राहय। खवइया मन नाऊ के जस - गुन गावत राहंय। जेन काहय वाह भई मर्दर्निया, तगड़ा नेवता खवाय जी तेहा नाऊ काहय - तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न, मोर तो हावा च हावा।
सुनइया मन ओकरो मजा लेंवय नेवता हिकारी निपट गीस। दूसर दिन सब झिन अपन थारी लोटा ला मांगिन त नाऊ कथे। तुंहला तो बता देय हो जी, उही मेर तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न, मोर तो हावाच हावा। सुन्नेच सुन्न। कहिके सबे झन मूंड ठठाईन उही दिन ले हाना बनगिस - तुंहरे अन्न, तुंहरे पुन्न। मोर तो सुन्ने - सुन्न।
पता :- 
नर्रा  बागबाहरा,महासमुन्द [छ.ग.]
www.gurturgoth.com से साभार 

मंगलवार, 25 जून 2013

अगमजानी


  • मंगत रवीन्द्र

एक झन डोकरी रहिस तेकर एक ठन नाती ... नाती के नाव डहारु। दाई - ददा नई रहिस, नानपन के मुरहा ए। बूढ़ी दाई हर पालपोस के बढ़ावत हे। ओकर दाई - ददा मन डहारु के नानपन म पर्रा म बिहाव कर देहे रहीन। अतका गेदा के डहारु ल अपन बिहाव के सुरता नइ रहिस।
एक दिन बूढ़ी दाई ल कथे - दाई, पारा के जम्मों टूरा - टूरी मन के बिहाव होगे। मोरो बिहाव ल कर देते। सुन के डोकरी हाँसत कथे - बेटा, तोर नानपन के बिहाव होगे हे। जा, तोर दुलही ल देख के आ जा। बाढ़ गे होही। अतका ल सुन  के डहारु कुलक भरिस अऊ बिहान दिन सम्हर-पकर के दूल्हीन देखे बर चल दिस। इचबन बीच बन पकइ नार तीन ठन, सूक्खा ठिड़गा ठाय करें बुड्ढा भालू हाय करे जइसे बन ल नाहकत गइस। एक गांव नाकिस, दूसर गांव नाकिस नाकत-नाकत कई गांव के बाद तीसरावन दिन संझवाती एक गांव म हबरिस। बेरा बुड़त रहै...मुंधियार के करिया हर चारों डहर बगरत हे। कुकरी - कुकरा अपन गोधा म सकलागे हें। गाय - गारु कोठा के खूंटा म बंधाए पैरा ल पगुरात हे।
डहारु गुनथे - मुधियार होगे। इही गांव म रात काट लौं। बेर उही तहाँ ससुरार ल खोजिहौं ... अऊ का, बस्ती के छें घर के ओइरछा म अपन पटकू ल दसा के सूतगे। नींद नइ परे ए। ओ घर म एक झन डोकरी एक झन छोकरी रहै। रतिहा होगे। नानकुन दीया धीमिक - धीमिक बरत रहै। डोकरी अऊ छोकरी नइ जानत रहैं के हमर ओइरछा म कोनो परदेसी आ के डेरा डारे हे। ओ तो बाहिर के फरिका ल दे के घर भीतर हावैं ...।
ओ रात डोकरी दाई के घर अंगाकर रोटी बने रहै। जेवन के बेरा ए। डोकरी हर रोटी ल झर्राके टोरत रहिस त तीन टुकड़ा होगे। एक फारी ल नोनी ल देइस अऊ एक फोरी ल अपन खाइस। नोनी पूछथे - दाई, ए फोरी काकर ए ?
- टोरत - टोरत, टूटगे ... जा, एला पठेरा म रख दे। नोनी हर घेरी बेरी पूछै। डोकरी कहै - टोरत - टोरत टूटगे। छोकरी मानबे नइ करै आखिर म असकटाके कहिस - तोर दूल्हा बर ए ...। तहां नोनी हर एक फारी रोटी ल पठेरा म टाँग दीस। एती सब गोठ ल आँट म सुते परदेसी हर सुनत रहै। खाइन - पीइन, दीया बुझागे, सूत गीन ...।
बेरा उइस। चिरई - चुरगुन मन ए डारा ले ओ डारा करे लगीन। गाय - गोरु रम्भात हे। पनिहारिन पानी भरत हे। सीमंदिर म शंख धुनी होवत हे। तहाँ आँट के परदेसी आँखी निंमजत उठगे। गांव - गली के रेंगइया एक झन ल पूंछथे के लटियारिन डोकरी के घर कहाँ लंग हे ?
- जेकर आँट म सुते रहे उही तो लटियारिन माई के घर ए। सुन के थोकिन अचरित होइस। तहाँ कुलक भरिस। गुनथे - सारे बुजा ल चुक होगे। रात भर गुड़ चबवाए हौं। कोरा म लइका अउ गाँव भर हिंदोल। तहाँ दसना पटकू झर्रावत, खखारत घर कती समाइस।
लटियारिन दाई अंगना के मचिया म बइठे माखुर मलत रहै। पहुना ल देखिस तहां टुरी ल कथे - मोंगरा, पहुना कस लागथे बेटी। ला पानी - पीढ़ा दे। नोनी लाइस पानी दीस। पीढ़ा दीस। तहां डोकरी हर पूंछथे - बाबू, चीन नइ पावत हौं। बता तो कहाँ ले आवत हस बेटा ? पहुना कहिस - करमपुरा के जनक के बेटा औं दाई। अतका ल सनीस तहाँ डोकरी लटियारिन कुलक भरिस। कहिस - कती के राजा मरिस त आए हस बेटा। बने - बने हे घर डहर। तोर बूढ़ी दाई बने हे ?
- हां, सब बने हे। डोकरी के मन तरंग होगे। नाती दामाद आ गे। ले मोंगरा, तोर ओई ए ... जल्दी जेवन बना अऊ तोर धनी ल परोस के खवा - अतका ल सुनीस त मोंगरा नोनी लजा भरिस। ओतके बेरा टूरा कहिस - रात के मोर रोटी कुटा ल देवौ। जेला पठेरा म टांगे हौ। भूख म पेट अगियावत हे। अतका ल सुनीस त लटियारिन डोकरी अचरज होगे के रतिया के रोटी ल कइसे जानीस। हो न हो दमाद बाबू अगमजानी ए। फेर अऊ का। नोनी मोंगरा हर धनिया पताल के चटनी पीस कटोरा म लान मढ़ा दीस। डहारु भूखाए रहिस। हिया लगा के खाइस।
लटियरिन डोकरी तो पचरहीन ए। एक्के घरी म रोटी के गोठ ल गांव भर बगरा डारिस। ए कान ले ओ कान बगरगे - लटियारिन के नाती दमाद हर अगमजानी ए। राज के राजा तक गोठ हबरगे। कान ले कान सुनीन, आए हे अगमजानी। गाँव के पंडित किसान अऊ अड़हा गुनी ज्ञानी।
एक दिन राज के राजकुमारी हर सात चेरिया आगू, सात चेरिया पाछु लेके सरोवर नहाए गीस। अंग - अंग के गहना उतार के मल - मल के नहा हे। लछिमन पखरा निरमल पानी। पार के बिरुवा म कोइली बानी। फूल कमल सेत बरन, भौंरा मन गुनगुनावत हे।
बिरीछ तरी पठरु पगुरावत चेरिया सबो नहावत हे। जम्मो नहा खोर के मांजे गहना गुजरिया दौरी म धरिन अऊ राजमहल ल लौटिन। राजकुमारी फेर सिंगार करथे त ओकर पांव के एक ठन बिछिया नइ रहै। खोज डरिन मिलीस नहीं। गइस त गइस कहाँ ? सातों चेरिया सहित हलाकान। राजकुमारी रो - रो के आँखी ल फुलो डारिस। बात राजा के कान म हबरगे के बेटी के ए हाल। मंत्री कथे - राजा साहब, हमर राज म अगमजानी आए हे। राज दरबार म बला के बिचार करवाया जाए। मंत्री के बात राजा ल बने लागीस अऊ बनसेर गाँव दूत भेजे गइस।
डोकरी लटियारिन के अंगना म राजा के दूत हबरगे। राजकुमारी के दसा ल बताइस अऊ कहिस के राजा के आज्ञा हे अगमजानी हर राजदरबार म जाए अऊ राजकुमारी के गंवाएं बिछिया ल बताए। मुंह मांगा इनाम मिलही। राजा के दूत ल देख के डहारु के पागी ढिलियागे। ओ कब के अगमजानी ए ? आँट म सुते रहिस त रोटी ल जानीस। अब एला  कइसे जानही ? पर धीरज धरके कथे - चलौं, तोर हबरते सांत राजदरबार म पहुंच जाहूं। दूत चल दिस।
एती दमाद बाबू ल भूख पियास नइ हे। गुनान पेल दीस। गाल ल थपके - थपके गुनत हे - मोर पुरगे। गड़हरा धंधागै। डोकरी रोटी के गोठ ल बगरा के मोर जी के काल कर दीस। संसो के पूरा म पोहावत जावत हे। घरी घरी पहार होगे। मुड़ धरे मचिया म बइठे हे तिही बेरा दु झन मुटियारी मन हफरत चोकरत आ के दमाद बाबू के गोड़ तरी गिरत कथे - अगमजानी बाबू, हमर नाव झन लेबे। हमन राजकुमारी के चेरी अन। लालच म ओकर एक ठन बिछिया ल सरोवर के घठोन्धा पखरा तरी लुका दे हन। नाव बताए तहां हमर पुरगे। फांसी दिही। हमर कोरा म नान - नान गेदा लइका हे। ले ए दे हमर गला के हार ल। नाव छिपा के बिछिया गवाएं के नाम ले देबे। तोरो मान रही। हमरो जान बचही। अतका ल सुनीस त दमाद बाबू पहली तो अपन अंगठी ल दांत म चबाइस फेर तरी - तरी अनंद मगन होगे। कहिस - जाओ छुछिन्द होगे। ओती ल बना लेहूं। बिचारी मन ल हाय जी लागीस अऊ चल दीन।
एती अगमजानी दमाद बाबू सावन कस घटा राजा के दरबार कती रेंगीस। खसखस ले राज दरबार लगे रहै। अगमजानी ल देख के सभा मन उठ के सनमान करिन। ऊँचा आसन म बइठारिन फेर राजा साहेब हर अपन राजकुमारी के हाल ल सुनाइस। अगमजानी कथे - राजा साहब, ए लिखरी बात म संसो करत हौ। सरोवर के घाट पखरा के सांटा म बिछिया परे हे। जा के ले आओ। राजा साहब तुरते दूत भेजिस। पखरा टार के देखथें ता दगदग ले बिछिया परे रहे। ए दे लाइन। राजकुमारी के आँसू थिरकीस अऊ रंगमहल म आनंद बधाई होइस। अगमजानी ल खूब इनाम देके बिदा करिन। दमाद बाबू अपन दुलरी ल गवना कराके अपन घर लाइस सुख म जिंनगी पहावत हे।
मोंगरा फुलगे, किस्सा पुरगे। ए गांव ले ओ गांव जुरगे।।

  • शास. उच्च. माध्य. विद्यालय, कापन, जिला - जांजगीर - चाम्पा ( छ.ग.)

रविवार, 16 जून 2013

बइला अउ पंडित

उत्तर भारत की लोककथा का छत्तीसगढ़ी रूपातंरण

  • अनुवादक - दिनेश चौहान
नवा ह छागे अउ जुन्‍ना नंदागे नोनी बाबू हो. तइहा के बात हे, जउन ल बात - बात में केहे जाथे तइहा के बात ल बइहा ले गे. एक ठन तइहा के बात में ह घानी अउ  घानी के बइला के बारे मे बताना चाहत हौं. आज तो तेल पेरे के मशीन आय घलो सौ अकन बछर ले घलो जादा होगे होही. आज तेली जात के नवा पीढ़ी के लइका मन ल घानी के बारे में पूछहू तौ काय घाय ए कहिके मुँहु ल फार दीही. फेर एक जमाना में तेली मन के पुस्तइनी धंधा रिहिस तेल पेरना. एखरे सेती ओखर जात के नाव तेली परे रिहिस. तेली मन घानी में एक ठन बइला ल फांद दे अउ ओखर आंखी में टोपा बांध दय  जेखर से ओला पता झन चलय के ओहर एके जगाच किर मारत हे.
अइसने एक ठन गांव में एक झन तेली ह घानी में तेल पेरत राहय . ओखर बइला के गर म बंधाय  घंटी बइला के रेंगे ले बाजय अउ बइला खड़े हो जाय तो घंटी बाजना बंद हो जाय . तेली ओला फेर सोंटिया के रेंगा दय . कुछ देर बाद तेली अपन बइठे के जघा में बड़का पखरा रख के अपन दूसर काम में भिड़ जाय . ऐती बइला समझे के तेली अपन जघा में बइठे हे. ओ बिचारा डर के मारे चकिर मरई ल बंद नी करय .
एक दिन ओ गांव में एक झन पंडित आइस. वो ह तेली के घानी, बइला, बइला के गर म घंटी अउ पखरा के बारे सुनिस त देखे ल चल दिस. अउ देखिस - घानी में बइला फंदाय हे, बइला के गर में घंटी बाजत हे. अउ तेली के बइठे के जगा में पखरा रखाए हे. ओखर दिमाग मे कइ ठन सवाल उठ गे. ओ ह तेली से पूछिस - अरे भई, बइला के गर में घंटी काबर बांधे हस ?''
- ऐ पाय  के महराज के बइला रेंगना बंद कर दिही त घंटी बाजना बंद हो जही अउ मोला गम लग जाही.'' तेली जवाब दिस.
- अउ पखरा ल काबर रखे हस ?''
- ऐ पाय के के बइला समझे पाछू म बइठे हौं. अउ रूक हूं त फेर परही सटाक ले.'' तभो ले पंडित के मन नी माढ़िस. एक ठन सवाल अउ पूछिस - ते तो अन्ते काम - बुता में भिड़े हस एती बइला खड़ा हो के मुड़ी हला के घंटी बजात रिही त तैं कइसे जानबे ?''
- महराज, बइला अतका ल जानतिस त घानी में काबर फंदातिस. वहू तोरे कस पंडित नी बन जातिस ?''
  • पता- शीतला पारा, नवापारा (राजिम) जिला - रायपुर (छ.ग.)

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

बलि

कंथली

  • आत्माराम कोशा '' अमात्य ''
बड़े भइया ह अपन मयारूक बहिनी ल तीजा ले के जावत राहय। तीन - चार साल के भांचा ल सुघ्घर अकन खंधैया म चढ़ाय नंदिया तीर पहुंचिस त डोंगा म आठ - दस झन मन चढ़गे राहय। भइया धरारपटा चढ़के अपन बहिनी ल हाथ दे के चढ़ाइस। डोंगा जइसे बीच दहरा म गीस त नई जाने कते डहर ले हवा - तूफान, बड़ोरा सरिक आवन लगिस। देखते - देखत उलेंडा पूरा आय सरीख पानी ह सनसना के बाढ़गे। डोंगा ह ऊबुक - चुबुक होय लगिस।
अकरसहा आय बिपत्ति ल देख के एक झन सियनहा जाने असन कहिथे - ये डोंगा म कोनो सगे ममा - भांचा अऊ सीग लइका वाले महतारी ह तो नई बइठे हे ? काबर के अइसने कारन म जलदेवती माता ह अतका परचंड रूप देखाथे। डोंगा म बइठे जम्मों झन म कांव - कांव एके सुर म करे लगिन - कोई हवव त बतावव न गा। अइसन समे म जल देवती माता ह बिगन भख लेय नइ मानय। डोंगहार ह घलोक कहिथे - अइसन स्थिति म एके ठन लइका के बलि देचल परही। नई ते डोंगा खपला जाही अऊ हम सब के जल समाधि हो जाही।''
अतका हो हल्ला सुनके बड़े भइया ह डर्रात - डर्रात बताथे कि जेन लइका ल ओहर धरे हवय वोहर ओखर सगा भांचा आवय अऊ ओखर बहिनी के सीग लइका। अब सब ल समझ आवय लगथे कि ये बिपत्ति के कारन का आवय। लइका के बलि देन बिगन कखरो कलयान नई हे।
अतका बात ल सुनके बहिनी के हाथ - गोड़ फूलजथे। डोंगा म ए झन मरारिन घलोक बइठे रहय। ओखर चरिहा म भांटा, मिरी, कुम्हड़ा, तुमा रहय। विपत्ति के संसों म ओखरो नरी सुखागे रथे, फेर का करे ? दूनों नारी परानी ह आँखी च आँखी म गोठियाथे, सुन्ता बांधथे। ऐला कोनो नई गम पावय। अतका म जोर ले छपाक के आवाज के संग जल देवती माता म कुछू बुड़े के आवाज होथे।
ऐती आवाज आइस अऊ ओती सनन - सनन, सन - सन पानी ह बिच्छी के झार उतरे कस उतरे लगथे। उबूक - चुबुक होवत डोंगा घलोक सम्हल जथे। सब ये समझे लगथे कि जल देवती माता ल लइका के बलि दे दे गीस। डोंगा के पार लगते सांठ सब डोंगा ले उतरे लगिन। ओमन देखिन - ममा हर अपन भांचा ल ओखर महतारी के अँचरा ले निकाल के सुन्दर अकन अपन खंधैहा म चढ़ा लहंग - लहंग रेंगत हवय। ओमन यहू देखिन कि मरारिन बड़े जान कुम्हड़ा दिखत नई हवय ... ?
अध्यक्ष
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति,
लखोली