इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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शनिवार, 22 नवंबर 2014

भाव और भाषा के साधक : गजानंद प्रसाद देवांगन ' दिशाबोध '

पुण्‍य तिथि - 9 दिसम्‍बर 
वीरेन्‍द्र ' सरल ' 
छत्तीसगढ़ के मानचित्र पर, छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम के दक्षिण एवं श्रृंगीऋषि की तपोस्थली सिहावा के उत्तर में, चित्रोत्पला महानदी और पावन पैरी नदी के बीच के भू-भाग को विकासखंड मगरलोड़ के नाम से जाना-पहचाना जाता है। इसी भू-भाग में पैरी नदी के पावन तट पर अवस्थित है ग्राम धौराभाठा, जहाँ गूँजती रही है, स्व श्री गजानंद प्रसाद देवांगन 'दिशाबोध' की बचपन की किलकारियाँ और जहाँ की आबो - हवा में घुली हुई है उनकी वाणी की मिठास। यह गाँव दिशाबोध जैसे विरल व्यक्तित्व को अपनी गोद में खिलाकर धन्य हुआ है और गौरवान्वित हुई है यहाँ की माटी। इसी गाँव की सोंधी माटी की महक लेकर चल पड़े थे दिशाबोध, भटके हुये लोगों को दिशाबोध कराने। सम्पर्क में आने वाले हर आदमी  के सामने है उनका आकर्षक व्यक्तित्व और आँखों में समायी है, उनकी छवि। वैसे तो शुभ्रधवल वस्त्रो से अपने आप को सुसज्जित करके समाज में स्वयं को महिमामंडित करने वाले लोगों की कमी नहीं है , मगर वस्त्रों की उज्जवलता के समान ही मन की पवित्रता और चरित्र की शुचिता पर ध्यान देने वाला कोई विरला ही होता है, ऐसे ही विरल व्यक्तित्व में से एक थे - गजानंद प्रसाद देवांगन 'दिशाबोध'। आज जब लोग मेरे कपड़े की सफेदी से तुम्हारे कपड़े की सफेदी ज्यादा कैसे के चक्कर में एक - दूसरे के प्रतिद्वंदी बने हुये हैं। ऐसे माहौल में मेरे चरित्र की उज्जवलता से ज्यादा तुम अपना चरित्र बनाओ का संदेश देने वाले विभूतियों मे से एक थे दिशाबोध जी।
गौर वर्ण, उन्नत ललाट, सौम्य-मधुर मुस्कान, बड़ों के प्रति सदैव आदर का भाव और छोटों के प्रति आंखों से झरती हुई स्नेह की निर्झरणी। वाणी में इतनी मिठास कि दुश्मन को भी दोस्त बना दे और रामचरित मानस पाठ करने का ऐसा अनूठा अंदाज जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर झूमने पर मजबूर कर दे। प्रवचन में भावों का ऐसा अतिरेक जो पत्थर को भी पिघला दे और मुर्दो में भी प्राण फूंक दे। कुल मिलाकर यही कहना ज्यादा उचित होगा कि गजानंद प्रसाद देवांगन जी एक चुंबकीय व्यक्तित्व थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी अक्षुण्ण स्मृतियां हमें आज भी सम्पूर्ण वैचारिक प्रखरता के साथ दिशाबोध करा रही है।
संत कबीर की तरह एके साधै सब सधै के मूलमंत्र को आत्मसात करके उन्होंनें मन की साधना की थी। मन के सधते ही बाकी साध्य तो स्वमेव उनके व्यक्तित्व मे समाहित हो गये। शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म, योग, साहित्य इत्यादि। उनका मन सदैव समृद्ध राष्ट्र ,स्वच्छ समाज के लिए संकल्पित रहा। सही मायने में वे भाव, और भाषा के साधक थे। उनका संवेदनशील कवि मन जीवन के विविध रंगों को बहुत निकट से जाना-पहचाना था। वे आम आदमी की पीड़ा को अपनी लेखनी के माध्यम से जीवन भर कोरे कागज पर उतारते रहे। इस उम्मीद के साथ कि कभी - न - कभी, कहीं - न - कहीं उनकी कविता पत्थर में तब्दील होते हुये मानव हृदय में संवेदना की अन्तर्धारा प्रवाहित करने में जरूर समर्थ होगी। भ्रष्टाचार के असुर का वध करने के लिए जरूर अवतरित होगी कोई दुर्गा। मंहगाई के रावण को मारने के लिये आयेगा कोई राम। समतामूलक समाज की स्थापना के लिये पैदा होगा कोई गाँधी। अपनी लेखनी के माध्यम से हमारे चिन्तन को झकझोर कर सही दिशा में चलने के लिये प्रेरित करने वाले लेखनी के समर्थ सिपाही, भाव और भाषा के साधक स्व श्री गजानंद प्रसाद देवांगन को मेरा नमन और विन्रम श्रद्धांजली।
बोडरा ( मगरलोड)
जिला - धमतरी ( छ.ग.)

शनिवार, 30 अगस्त 2014

छत्‍तीसगढी साहित्‍याकाश का ध्रुवतारा - विशंभर यादव '' मरहा ''

वीरेन्‍द्र '' सरल '' 

विशंभर यादव '' मरहा ''
वीरेन्‍द्र '' सरल ''
जब भी आपके मानस पटल पर किसी ऐसे कवि की तस्वीर उभर आए जो अपने पतले-दुबले शरीर में अपने विराट व्यक्तित्व को समेटे हुए काव्य मंचो पर दहाड़कर कह रहा हों कि ''पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक बेईमान हैं। मैं झूठ कह रहा होऊँ तो मुझे हथकड़ी लगाकर जेल भिजवाओ, मगर पहले जाँच तो करवाओ।'' तो आप तुरन्त समझ जाइए कि वह शख्स विशंभर यादव 'मरहा' ही हो सकता है। भ्रष्ट व्यवस्था को इतनी निर्भीकता से ललकारने का साहस वही कवि कर सकता है जिसके भीतर सत्य के लिए मर-मिटने का हौसला हो और जिसके हृदय में आम आदमी की पीड़ा की छटपटाहट।
मरहा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को जाने-समझे बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य को समझना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। मरहा जी छत्तीसगढ़ी साहित्याकाश के ध्रव तारा हैं। आकाश में अनगिनत तारों के बीच जैसे ध्रुव तारे की अलग पहचान है, ठीक वैसे ही अनेक छत्तीसगढ़ी कवियों के बीच मरहा जी की विशिष्ट पहचान है। पृथ्वी के घूर्णन अक्ष पर स्थित होने के कारण ध्रुव तारा की स्थिति पृथ्वी के किसी भी स्थान के सापेक्ष बदलती हुई दिखाई नहीं देती, वह हमेशा उत्तर दिशा में स्थित प्रतीत होता है। रात्रि के गहन अँधेरे में भटके हुए राहगीर जैसे ध्रुव तारा को देखकर अपनी दिशा तय करते हैं, वैसे ही छत्तीसगढ़ी के अनेक नवोदित कवि मरहा जी की रचना संसार की चमक देखकर अपनी दिशा तय करते हैं।
अक्सर लोग मरहा जी के बारे में लिखते या कहते हैं कि वे पढ़े-लिखे नहीं थे। निपट अनपढ़ थे मगर जिस कवि ने जीवन भर आम आदमी की पीड़ा को पढ़कर अपनी संवेदना की स्याही से जनमानस के कोरे कागज पर हजारों कविताएँ लिखी हो, ऐसे बहुआयामी प्रतिभा के धनी कवि को मेरा मन आज तक अनपढ़ स्वीकार नहीं कर पाया। भले ही उनके पास किताबी शिक्षा न रही हो मगर मरहा जी जीवन - शिक्षा में अच्छे-अच्छे शिक्षित लोगों से भी काफी आगे थे। वैसे भी कविता बौद्धिकता की नहीं संवेदनशीलता की माँग करती है। मरहा जी कहा करते थे कि डॉक्टर, इंजिनियर, शिक्षक और वैज्ञानिक बनाने के लिए सरकार के पास विद्यालय और विश्वविद्यालय है पर कवि बनाने के लिए नहीं, यह तो एक ईश्वरीय देन है जो किसी-किसी को किसी विशेष प्रयोजन के लिए मिलती है। कवि के शब्दों में 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय' प्रेम के ढाई आखर को पढ़कर पांडित्य को प्राप्त करने वाले मरहा जी की पारखी आँखें 'ढोल के अंदर के पोल' और 'दीया तले के अंधेरे' को बहुत गहराई तक देखती और महसूस करती थी। उनके अनुभवजन्य संसार का फलक इतना व्यापक था कि समाज और प्रशासन के भीतर की कोई भी विषमता और विसंगतियाँ उनकी आँखों से छिपी नहीं रह सकी। वे जीवन भर समाज, परिवार, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन से लेकर जीवन के विविध आयाम का एक्स-रे करते रहे और जनमानस को इनकी सच्ची तस्वीर दिखाकर जागते रहो का संदेश देते रहे। 'जो घर जारै आपना, चले हमारे साथ 'के मूलमंत्र को आत्मसात करके इन्हीं विसंगतियों और विद्रुपताओं की सर्जरी करते हुए जीवन भर काव्य मंचों पर घूम-घूमकर जनजागरण करते रहे।
ना केवल अपनी कविताओं के माध्यम से बल्कि अपने चरित्र के माध्यम से भी लोकशिक्षण करने वाले लोक शिक्षकों में भी मरहा जी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। गाँधी जी के रामराज्य के सपनों को अपनी आँखों पर संजोये, सिर पर गाँधी टोपी धारण किये हुए और मेडलों से सुसज्जित जाकेट के साथ स्वच्छ धोती और कुरता पहने मरहा जी जब काव्य मंचों पर मंचासीन होते थे तो उनका सौन्दर्य देखते ही बनता था। बिल्कुल असंख्य तारों के बीच पूर्णिमा की चन्द्रमा की तरह। मरहा जी को देखकर श्रोताओं के मन में एक कौतूहल होता था कि आखिर ये निपट देहाती दिखने वाला कवि सुनायेगा भी तो क्या सुनायेगा? लेकिन मरहा जी जब काव्य पाठ करना शुरू करते थे तो लोग अपनी भाषा की मिठास और माटी की सौंधी महक के साथ हास्य की अनोखी दुनिया में ऐसे खो जाते थे कि समय का पता ही नहीं चलता था। लोग मंत्रमुग्ध होकर मरहा जी को घंटों सुनते रहते थे। उनकी कविता-अइसे मिलिस आजादी, ये आजादी के हलकारे, रामकाव्य के मुसलमान साहित्यकार, आजादी के आधार, सिंह मन के योगदान, सिंधी वीर सेनानी जब शुरू होती थी और अविराम चलती थी तो श्रोता के रूप में बैठे हुए इतिहास के विद्यार्थी, प्रोफेसर और तमाम बुद्धिजीवी सब के सब आवाक रह जाते थे। मरहा जी की स्मृति देख वे दाँतों तले उंगलियाँ दबाकर चमत्कृत और नतमस्तक हो जाते थे। उन्हें अपनी अल्पज्ञता का बोध होने लगता था और वे सोचने के लिए बाध्य हो जाते थे कि ठेठ ग्रामीण और निपट अनपढ़ दिखने वाला यह कवि निसंदेह विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न है। सबको सम्मोहित कर देने का हुनर मरहा जी की अमूल्य निधी थी।
मरहा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे कबीर परम्परा के सिद्धहस्त कवि थे। एक अनोखा साम्य है मरहा जी और कबीर के व्यक्तित्व तथा कृतित्व में, बिल्कुल वही निर्भीकता, फक्कड़ता, र्निलोभता और स्वावलंबी तथा अनुशासित जीवन शैली तथा समाज सुधार की दिशा में सतत प्रयत्नशीलता। आज के समय में अपनी डायरी पर दो-चार कविताएँ लिखकर काव्य मंचों पर काव्य पाठ करने के लिए अपना मूल्य निर्धारित करने वाले कवियों के बीच अपनी स्मृति कोश में हजारों कविताओं को सुरक्षित रखकर, बच्चों जैसे उत्साह और निच्छल हँसी के साथ घंटों काव्य पाठ करने वाले मरहा जी छत्तीसगढ़ महतारी के ऐसे अनमोल रतन थे जिन्होंने कविता पढ़ने के लिए कभी किसी से पैसों की मांग नहीं की। मार्ग व्यय मिल जाए तो भला और न मिले तो भी भला।
हर परिस्थिति में खुश रहने वाले मरहा जी को एक गृहस्थ संत कहें, एक फकीर बादशाह कहें या निरालों में भी निराला कहें, सारे उपमान उनके व्यक्तित्व के सामने बौने लगते हैं। संत कवि पवन दीवान की भाषा में कहें तो 'वह वामन का अवतार हिमालय से भी ऊँचा था' यह कहना भी अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा।
जीवन के विविध रंगों की मनमोहक और इन्द्रधनुषी छटा है मरहा जी के  रचना संसार में, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक और बूढ़ी अम्मा से लेकर नवयुवती तक के मनोभावों का सुस्पष्ट रेखाँकन है उनकी कविताओं में एक ओर जहाँ वे छत्तीसगढ़ की सामाजिक समरसता का प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं कि-
''देखव हमर छत्तीसगढ़़ महतारी के,
हिरदय कतेक बिशाल  हे,
माँ के ममता के आघू में,
 सबे लाल एकेच बाल-गोपाल हे।।''
वहीं दूसरी ओर वे छत्तीसगढ़ वासियों को सावधान करते हुए लिखते हैं कि-
''बसुला जइसे सबला सकलइय्या
कजूंस मत बनव।
रेंदा जइसे सब कुछ दान करइय्या
दानी मत बनव।
आरी जइसे काटव,
सबला बरोबर बाँटव,
दोनों कोती ला देखव,
कुछ देवव कुछ लेवव।''
उनकी निर्भीकता की झलक निम्न पँक्तियों में स्पष्ट झलकती है, देखिए-
''सच बोलब में काके डर हे,
झूठ बोलई में मन डर्राय''
  आज के विषमतापूर्ण समाज की भयावहता देखकर भी मरहा जी लोक को अपनी कविता के माध्यम से आशान्वित करते हैं कि आज स्थिति चाहे जैसी भी हो पर आने वाला कल निश्चित ही बेहतर होगा। मरहा जी जीवन और व्यवस्था से निराश लोगों के भीतर आशा का संचार करते हुए कहते हैं कि-
''मोर भैय्या तहू अकेल्ला चल,
चलत रहिबे रद्दा म झन गँवाबे एको पल।
डहर तोला जरूर मिल जाही
आज नहीं तो कल।''
अपनी कविता और अपने चरित्र से जीवन भर लोक शिक्षण करने वाले, कलम के सजग सिपाही और समतामूलक समाज के स्वप्नदृष्टा विशंभर यादव 'मरहा' जी के प्रणम्य प्रतिभा को मेरा विनम्र नमन।
पता 
बोड़रा ( मगरलोड ), पोष्‍ट - भोथीडीह 
व्‍हाया - मगरलोड, जिला - ध्‍ामतरी (छ.ग.) 
मोबाईल : 07828243377

गुरुवार, 22 मई 2014

अव्दितीय क्रांतिकारी कवि - कुंज बिहारी चौबे

आचार्य सरोज व्दिवेदी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में छत्तीसगढ़ के जिन महापुरुषों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और सामाजिक क्राति के बीज बोए उनमें स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे का नाम सम्मान पूर्वक लिया जाएगा। स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे स्वतंत्रता और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थे मात्र 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता और समाज सुधार का  इतना काम किया कि छत्तीसगढ़ तथा राजनांदगांव के लिए वह गौरव की बात है।
स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन दौर में श्री कुंज बिहारी का जन्म 16 जुलाई 1916 को राजनांदगांव के निकट बजरंगपुर - नवागांव में सभ्रांत ब्राम्हा्रण परिवार में हुआ। छह पुत्रियों के बाद जन्में इस बालक को पिता छबिराम चौबे ने बहुत लाड़ प्यार दिया। परिवार के इस स्नेह ने उन्हें क्रोधी और जिद्दी तो बनाया साथ ही कुछ कर गुजरने की अद्भुत प्रेणना भी दी। प्रखर प्रतिभा के धनी श्री चौबे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के प्रबल  प्रवाह में बहते चले। इस प्रवाह ने उन्हें महात्मा गाँधी और ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसे क्रांतिकारी  लोगों के साथ ही डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे साहित्यकार का चहेता बना दिया। साथ ही अनेक महापुरूषों के क्रांतिकारी  विचारों से प्रभावित श्री चौबे जीवन में ऐसा कुछ कर गये जो हमारे लिये अनुकरणीय है।
छात्र जीवन में ही श्री चौबे ने स्टेट हाईस्‍कूल के विद्यार्थी के रूप में ऐसा कर दिखाया जो बड़े क्रांतिकारियों के लिए ही संभव था। उन्होंने स्‍कूल पर लगा यूनियन जैक उतार कर जला दिया तथा उसके बदले तिरंगा फहरा दिया और हेडमास्टर के पूछने पर साहसपूर्वक अपना यह अपराध स्वीकार लिया। इसके लिए उन्हें इतनी बेंते खानी पड़ी थी कि मारने वाला भी थक गया।  इस घटना से पूरे नगर में सनसनी फैल गई और वह अंग्रेजों की नजर  में चढ़ गये। उन पर निगरानी रखी जाने लगी।
इस घटना ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। और वह राष्ट्रीय आंदोलन और समाज सुधार के गीत गाने लगे। उन्होंने कालेज में प्रवेश तो लिया किन्तु पढ़ाई छोड़कर क्रांति के गीत गाने लगे। उन्हें रियासत से निकाल दिया गया तब वह कुछ समय के लिए गाँधी जी के पास सेवाग्राम चले गए। बाद में वापस आकर उन्होंने गृहस्थी बसाई। साथ ही प्रखर लेखनी से देशभक्ति और समाज सेवा की कविताएं लिखते रहे, उन्होंने अंग्रेजों को ललकारा  -
तैंहर ठग डारे हमला रे गोरा,
आँखी में हमर धुर्रा झोंक दिये
मुड़ म थोप दिये मोहनी,
अरे बैरी जान तोला हितवा
गंवाएन हम दूधो - दोहनी,
अंग्रेज तैं हमला बनाए कंगला
सात समुंदर विलायत ले आ के,
हमला बना दे भिखारी जी
हमला नचाए तैं बेंदरा बरोबर,
बन गए तैंहा मदारी जी
साथ ही उन्होंने नवयुवको को देशभक्ति और समाज सेवा के लिए प्रेरित किया -
नवयुवक उठ, बंधनों को तोड़
बहस औ मुबाहिसे कर बंद
ले न वाद - विवाद में आनंद
व्यर्थ बातों का बतंग्गड़ त्याग
बंधनों को काट हों स्वच्छंद
उन्होंने शराब की बुराइयों के प्रति आगाह करते हुए अनेक कविताएं लिखी। जिनमें एक कविता बड़ी प्रसिद्ध है जो उन्होंने मध्य प्रांतीय कवि सम्मेलन रायपुर में पढ़ी -
मदिरा विष है इससे बढ़कर,
इस दुनिया में कोई पाप नहीं
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे को किसानों के प्रति अत्यधिक हमदर्दी थी। किसान की दशा पर उन्होंनें अनेक कविताएं लिखीं जिनमें प्रसिद्ध है -
चल मोर भैया बियासी के नागर
अरे, कैसे मजा के बियासी के नागर
बोये हो ऐ दारी खांड़ी जी,
दू खांड़ी के लाने हौं बाढ़ी जी
बुढ़वा हों गे हे मोर बइला के जोड़ी
औ अतरो में छूटे ला है लागा बोड़ी
मुड़ ले हो गे हे करजा ह आगर
चल मोर भैया बियासी के नागर
उन्होंने कुछ चिंतनशील और आध्यात्मिक कविताएं भी लिखी जिसमें एक है मृत्यु भय -
मेरे मन में क्यों बार - बार
उठता है भय का मौन ज्वार ?
यों लगता है तन का अन्तिम
उच्छवास निकलने वाला है
छग - दीप बुझ रहे मेरे
मेरे जग का मिट रहा उजाला है
इस तरह उन्होंने अनगिनत कविताएं लिखी। उनका जीवन असाधारण था और कविताएं विलक्षण थी। वह सभी काम समाज के ढर्रे से हटकर करते थे और सभी बातों पर अपनी प्रखर विचारधारा से विलक्षण तर्क प्रस्तुत करते थे। जिसे देख - सुनकर सभी लोग अचंभित होते थे। यह विलक्षण जीवन जीकर विलक्षण और आकस्मिक ढंग से 5 जनवरी 1944 को काल के गाल में समा गए।
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे की मृत्यु पर डॉ. नंदूलाल चोटिया ने लिखा -
ह्दय वेदना, शब्द समूहों को
धरती पर मेल रही है
अब भी उसके आँगन पर
उसकी कविता खेल रही है
अब भी अश्रु  ढलक पड़ते है
सिहरे, कर्मठ ज्ञान विचारी
मेरा कवि था, कुंज बिहारी
उनके निधन पर डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नर्मदा प्रसाद खरे, अवतार श्री मेहर बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के अनेक महापुरूषों ने उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा करते हुए अविस्मरणीय और उल्लेखनीय संस्मरण लिखे हैं।
राजनांदगांव की धरती संस्‍कारधानी कहलाती है क्योंकि यहां उपजे अनेक महापुरूषों ने पुराने संस्‍कारों में परि किया है तथा नये संस्‍कारों को जन्म दिया है, स्व.कुंज बिहारी चौबे ने नांदगांव की माटी को सुगंधि दी है। उनसे हमारा मस्तक जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़ के कर्णधार बने हैं तब हम आशा करते हैं कि महान स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर क्रांतिकारी कवि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर कुछ रचनात्मक कार्य अवश्य ही होंगे।
स्वर्गीय चौबे की कुछ कविताओं का संकलन कुछ महान व्यक्तियों के संस्मरणों के साथ उनके  सुपुत्र श्री अविकल चौबे ने अवशेष नाम से प्रकाशित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अभी बहुत काम बाकी है।
मेरा सुझाव है कि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर राजनांदगांव में एक शोध पीठ की स्थापना होनी चाहिए और इस महान कवि की रचना पर काम करके छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाना चाहिए।  
पता 
ज्‍योतिष कार्यालय, मेन रोड,
 तुलसीपुर, राजनांदगांव ( छ.ग.)

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

हिन्दी साहित्य के अनन्य उपासक : प्रोफेसर देवीसिंह चौहान

मनोज कुमार  शुक्ल ‘‘मनोज’’
साहित्यकार  भूगोल की  सीमाओं से सदैव अपने आप को ऊपर पाता है तभी संस्‍कारधानी के माटी में जन्मा जब मैं छत्तीसगढ़ की माटी में गया तो वहॉं के सभी साहित्यकारों से मुझे इतना अपना पन मिला कि मुझे अपनी जन्म भूमि का अपनापन बौना नजर आने लगा। वहॉं साहित्य के ऐसे दो वट वृक्ष की छाया मिली जिनकी शीतल छाया में बैठ कर कब ग्यारह साल गुजर गये इसका मुझे भान ही नहीं रहा। एक थे साहित्य मनीषी आदरणीय देवी सिंह चौहान जो कि राजकुमार कालेज में उप प्राचार्य के पद पर रह चुके थे । कहते हैं  पहले इस कालेज में  कभी राजा रजवाड़ों के राजकुमार बगैरह पढ़ा करते थे। दूसरे थे आदरणीय सरयूकान्त  झा जो कि छत्तीसगढ़ कालेज के संस्थापक एवं प्राचार्य रहे हैं । रायपुर नगर में ही नहीं आसपास के दूर -  दूर क्षेत्रों में इनकी चर्चा  बनी रहती  थी । इनके बगैर  साहित्यिक  कार्यक्रम सदैव सूना -  सूना ही लगता था । सभी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति रहती थी ।
रायपुर में चौहान जी एक समर्पित हिन्दी साहित्यकार थे । जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की साधना में ही समर्पित कर रखा था  उन्होंने लगभग तीस ग्रंथों की रचना की थी । जिनमें आठ काव्य संकलन ' रक्त का प्रमाण दो ' , ' लहर और चाँद ' , ' क्रान्ति के शोले' , ' हॅंसते ऑंसू ' ' बढ़ो- बढ़ो बलिदानी ' ' इन्द्रधनुष ' ' सुमनांजलि ' आदि । एक खण्ड काव्य ‘‘खूब लड़ी मर्दानी ’’ महारानी लक्ष्मी बाई पर लिखा । सात बाल साहित्य एक निबंध संग्रह के साथ ही लगभग तेरह प्रेरक जीवनी ग्रंथ आजादी के परवाने, नये भारत के शिल्पी, आजादी और नेहरू, मुक्ति -आन्दोलन और क्रांतिकारी, याद करो कुर्बानी, महाक्रांति के उद्यांचल-रासबिहारी बोस, अखंड भारत के उद्घोषक-वीर सावरकर, गणेश शंकर विद्यार्थी एक अहिंसक क्रांतिकारी, शहीद शिरोमणि -रामप्रसाद बिस्मिल, क्रांतिवीर चन्द्रशेखर आजाद, शहीदे आजम - सरदार भगतसिंह, मेवाड़ और स्वातंत्रय सूर्य महाराणा प्रताप ,राष्ट्रनायक छत्रपति शिवाजी आदि पुस्तको का सृजन किया। राष्ट्रीय विचारधारा का रक्त उनके शरीर में सदैव मचलता रहता था। उनकी सभी पुस्तकों में देश हित, प्रेम सौहार्द और राष्ट्रवाद की प्रखर धारा बहती नजर आती है। संस्‍कारधानी जबलपुर में अशोका होटल के सामने रायबहादुर परिवार में उनकी ससुराल थी । उनके समस्त लेखन कार्य में उनकी सहधर्मिणी श्रीमती ऊषा चौहान का योगदान रहा है ये स्वंय एक प्रसिद्ध शिक्षाविद् रही हैं ।
रायपुर नगर में चौबे कालोनी स्थित एक भव्य दो मंजिला भवन कार्नर का प्लाट उसके आधे हिस्से में एक खूबसूरत बगीचा सलीके से बनी हुईं क्यारियॉं, फब्बारों के इर्द गिर्द  दुर्लभ रंगबिरंगे फूल पौधे हर मेहमान का मन मोह लेते थे । सामने लोहे की जाली से घिरा एक  बड़ा बरामदा जो प्रथम आगन्तुक कक्ष के रूप में था । दोनों ओर कुर्सियॉं लगी रहती थीं । सामने मेज के पीछे उनकी  एक कुर्सी जिस पर एक नेपकिन  लटकती रहती । मेज पर कागजों का एक पुलंदा और पेन स्टैंड । जब लिखते पढ़ते माथे पर पसीने की बूंदे झिलमिलाती तो वे पसीने को नेपकिन से पौंछतें। घर के बरामदे के दोंनो ओर स्टील की कॉच वाली आलमारियॉं जिसमें साहित्य का अपार भंडार भरा था। उनके गोल मटोल चेहरे में राजपूतों वाली उठी हुई मूॅंछे जो उनके स्वाभिमान एवं राजपूती आन बान को दर्शाती थी। किन्तु चश्में के अन्दर से झॉंकती मुस्‍कराती दो ऑंखें उनकी सहजता सरलता की राम कहानी कह जाती थीं। घर में आये सभी अतिथि को वे सदा बड़ी विनम्रता से  गले लगाकर अपनी आत्मीयता का परिचय दे देेते थे।
रायपुर में साहित्यिक संस्थाएॅं तो अनेकों थी। किन्तु नियमित पाक्षिक - मासिक गोष्ठी केवल हिन्दी साहित्य मंडल की ही होती थी। गोष्ठियॉं मोती बाग, सिन्धी धर्मशाला, सोनकर धर्मशाला, मैथिल ब्राम्हण सभा भवन, जैतू साव मठ आदि विभिन्न जगहों पर होती थीं। सरलता सहजता में वे इतने थे कि उनके साथ दो थेैले हमेशा चलते जिसमें संस्था का बैनर व अन्य आवश्यक सामग्री रहती। बिछावन के कार्य में भी वे तनिक संकोच न करते। संस्था का यह कार्य वे सरस्वती की आराधना स्थल कह कर बड़े मनोयोग से सम्पन्न कराते। ऐसे दुर्लभ ही  साहित्यकार इस दुनिया में होते हैं । तीज त्यौहर जैसे उत्सव मनाने का उनका विरला ही अंदाज था। होली-दीवाली-दशहरा पर उनके यहॉं हलवाई आकर मिठाई, पकवान,नमकीन बनाते सभी स्नेहीजनों को बुलाकर गले मिलते, त्यौहारों की बधाई देते, आतिथ्य सत्‍कार करते  और हर उत्सव का भरपूर आनंद उठाते। उनके बैठक रूम के हाल में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. शिवमंगल सिंह सुमन, श्री रामेश्वर शुक्ल अंचल, श्री भवानी प्रसाद मिश्र, श्री भवानी प्रसाद तिवारी, डा. राजेश्वर गुरू, श्री नर्मदा प्रसाद खरे, डा. रमेशचन्द्र मेहरोत्रा, डा. राममूर्ति त्रिपाठी, श्री हरिठाकुर, श्री दानेश्वर शर्मा ,आचार्य सरयूकान्त झा, डा. सालिकराम शलभ, डा. रामकुमार बेहर, श्री विनय पाठक, डा. रामप्रताप सिंह विमल,  मनोज श्रीवास्तव  लखनऊ, डा. कृष्णचन्द्र वर्मा, प्रो. बालचन्द कछवाहा, श्री अमर नाथ त्यागी, श्री लखन लाल गुप्ता, श्री  केयूर भूषण, डा. प्रेम शंकर, डा. शोभाकान्त झा, श्रीमती आशा श्रीवास्तव, डा. साधना कसार आदि अनेक साहित्य दिग्गजों की गोष्ठियॉं  होती रही हैं व उनका सानिध्य मिलता रहा है । उनका संदेश आज भी हमारे कानों में गूंजता है:-
‘‘ हर मानव अपने जीवन का भाग्य विधाता है ,
बोता  जैसे  बीज , कर्म - फल  वैसा पाता है ।
समय  शिला  पर  कर्मठ  ही पद - चिन्ह  बनाता  है ,
सुमन -सुमन पर वह मधुरिम -मधुमास खिलाता है । ’’
वहीं वे दूसरी ओर कहते हैं:-
‘‘उगता सूरज उन्नति के, सोपान दिखाता है । 
मंजिल पाता वही,जिसे चढऩा भी आता है ।
हर आने वाला पल ,कल का नव निर्माता है ।
फल पाता है वही ,कर्म से जिसका नाता है ।। ’’
उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था। वे सदा अपनी दो पंक्तियॉं को गुनगुनाया करते थे :-
‘‘ मुझको  दीपक  सा  जलना है ,आलोक   सभी को देना है ।
जग कह दे दीपक खूब जला,बस और मुझे क्या लेना है ?’’
उनकी कलम ने अपने खण्ड काव्य ‘‘खूब लड़ी मर्दानी में ’’ सुभद्रा कुमारी चौहान की याद तरोताजा कर दी है:-
‘‘जिस ओर झपट जाती रानी ,मैदान साफ  हो जाता था ।
जिस पर होता वार अभागा , विदा त्वरित हो जाता था ।।
जिस ओर भृृकृटियॉं तन जाती , उस ओर कहर सा छा जाता ।
श्मशान  दृष्य   समरांगण  में , आनन फानन  में छा जाता ।।’’   
राष्ट्रप्रेम की धारा उनके रग- रग में समायी थी तभी तो वे सीना तान के कहा करते थे:-
 ‘‘अगर देश पर गर्व न हो , तो जीने का अधिकार नहीं है ।
लानत है जीवन यदि, जननी-जन्मभूमि से प्यार नहीं है ।’’
पहले देश व्यक्ति है पीछे  वे सदा यही बात दोहराते थे:-
‘‘कष्टों के कंटक झेलो पर,मत पियो गरल अपमानों का।
शोलों  को  कुचलो पैरों   से ,रौंदो   घमंड   चट्टानों का ।’’
इस प्रखर राष्ट्रभक्ति शौर्य वीरता के साथ उनके अंदर एक कोमल मन भी छिपा था। प्रेमी मन भी बसा था तभी वे कह उठते थे:-
 ‘‘झाँकती जब तुम  सलिल में ,तो कमल के फूल खिलते।
हास से कलियाँ विहँसती , चूमने को अलि मचलते।
दृष्टि पड़ते ही तुम्हारी , सृष्टि में मधुमास छाता ,
चाल में नवताल का - सा , गीत हर मन को लुभाता।।’’
उनकी रचना में विरह वेदना कुछ यूॅ  झलकती है:-
‘‘ शूल  का  चुभना , मधुर  चुपचाप  मैं   सहता   रहा ,
क्योंकि परिमल स्त्रोत,अविरल श्वास में बहता रहा।।
विरह का दुख - मधु  मिलन की,राह में पलता रहा।
और मैं प्रेमी शलभ सा , अनवरत जलता रहा ।। ’’
वे देश की दिग्भ्रमित राजनीति को आगाह करते हुये कहते है:-
दिग्भ्रमित  दिशा निदेशक घातक होता है। उसकी प्रवंचना ही छलना बन जाती है।
 पर्याय ढूंढना अनिवार्य तब अवश्य मेव है, वरना निज तट पर नाव डूब ही जाती है ।
इसके बावजूद उनकी लेखनी आशाओं का संचार कर लोगों को जगाती है। देश में वर्तमान निराशा और विसंगतियों के बादलों के पीछे से एक आशा की किरण झाँकती हुई देश से कह  रही है:-
 ‘‘मजबूती से आशा का दामन थाम सखे ,विश्वास भरें लोगों में चेतना लायें।
थोथे नारों को निशा हवाले कर,हम  पुन:  उजाले को घर-घर छिटकायें।’’
ऐसे प्रखर राष्ट्रभक्त राष्ट्र ,समाज और मानव के हित चिंतक हमारे साहित्य के पुरोधा वीर और ओज के साहित्य मनीषीश्री देवी सिंह चौहान को उनकी 16 जुलाई 2013 की प्रथम पुण्य तिथि पर हिन्दी साहित्य जगत की ओर से विनम्र श्रृद्धाजंलि अर्पित है । जिन्होंने अपना सारा जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया। ऐसे दिव्य साहित्य पुरूष के चरणों में श्रृद्धा सुमन समर्पित है ।
पता - 58, आशिष दीप,
उत्तर मिलौनीगंज,जबलपुर  (म.प्र.)
मोबाईल:-09425862550
मेल : mkshukla48@gmail.com

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

कविता के लिए जीना और मरना मैंने नायक में देखा

आचार्य सरोज द्विवेदी
कृष्णकुमार नायक अभाव एवं संघर्षों का कवि था। वह तब तक जीवित रहा जब तक अभावों में रहा और जब सुख - सुविधा मिली तो उसने अपने जीवन का त्याग कर दिया।
इस साहित्यिक नगरी में वह धूमकेतु के तरह उभरा और उसी तरह विलीन हो गया। उसकी पैनी दृष्टिï ने नई कविता को अच्छी गति दी। श्री नायक लगभग एक दशक तक खूब लिखता और छपता रहा। इस बीच उसने $ग$जल, नई कविता खूब लिखी। स्व. डां. नन्दूलाल चोटिया न सिर्फ कृष्णकुमार नायक की रचनाओं को अपितु स्व.ï नायक को भी खूब पसंद करते थे। उसने इसी तरह अन्य साहित्यिक लोगों से अच्छा संपर्क बना कर रखा। नई कविता पर उसकी समझ बहुत गहरी थी और दृष्टिï पैनी थी।
1980 में मेरे छत्तीसगढ़ झलक छोड़ने के बाद वह वहां काम पर लगा। पत्रकारिकता में भी उसकी कलम बड़ी तीखी और पैनी थी। कुछ ही वर्षों में उसने इस साहित्यिक नगरी में अपनी अच्छी पहचान बना ली। किन्तु इस बीच उसका जीवन अभावों और कठिन संघर्षों में बीतता रहा। उसकी दिनचर्या लड़खड़ायी हुई थी। कभी - कभी उसे खाने और सोने के भी लाले पड़ते थे किंतु वह अपने निजी मामलों को दबाकर पूरे विश्वास पूर्वक साहित्यिक चर्चा किया करता था। बाद में उसे आदिम जाति कल्याण विभाग में शिक्षक की नौकरी मिली और न जाने क्यो नौकरी में आने के बाद वह सशंकित और भयभीत रहने लगा। साल दो साल की नौकरी में ही स्व. नायक टूट सा गया। और आखिरी के कुछ दिन पूर्व वह अपने मित्रों से जीवन की नीरसता की चर्चा करने लगा। और अचानक एक दिन हमने सुना - नायक नहीं रहे ...। कविता के लिए ही जीना, कविता को सब कुछ समझना और कविता के लिए मरना मैंने नायक में देखा।
ज्योतिष कार्यालय, मेन रोड, तुलसीपुर
राजनांदगांव 6 छग. 8

कृष्णकुमार नायक : अद्भुत कवि, गजलकार

संजय यादव
कृष्णकुमार नायक, जी हां यही नाम था, साहित्याकाश के उस उभरते हुए नक्षत्र का जो असमय ही काल कावलित हो गया। लगभग 27 -28 वर्ष के संभावनाओं ेस ओतप्रोत युवक ने नई कविता से लेकर गीत एवं $ग$जल के क्षेत्र में इतना कुछ दिया जिसे वर्तमान मेें सहेजकर रखना दुष्कर कार्य हो गया है। जिस तरह उभरकर कृष्णकुमार नायक नामक नक्षत्र लुप्त हो गया वह साहित्य जगत के लिए गंभीर हादसा था।
जी हां, कृष्ण कुमार नायक की काफी कुछ अप्रकाशित कृतियाँ उसके भाईयों के पास नष्टï होते पड़ी हुई है। प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर संजय यादव, गणेश गुप्ता और शत्रुघनसिंह राजपूत ने यथासंभव कोशिश की कि कृष्णकुमार की अप्रकाशित कृतियों का संपादन कर उसे प्रकाशित किया जाए लेकिन नायक के परिजन कोई न कोई बहाना बनाकर रचनाएं देने के मामले को टाल दिया। वर्तमान में भी स्थिति पूर्ववत है। नायक की रचनाएं जिसमें उसकी कुछ कहानियाँ भी है, कहा नहीं जा सकता कि वह सब कुछ सुरक्षित भी है अथवा नहीं। इतना अवश्य है कि उनकी गीत, $ग$जलें एवं नई कविताओं की संख्या इतनी है कि उसे पुस्तकाकार रूप देकर उसका मूल्यांकन किया जा सकता है।
जी हां, कृष्णकुमार नायक की रचनाएं ओज से भरपूर ही नहीं अपितु विषय वस्तु की दृष्टिï से प्रयोगधर्मिता एवं शब्द प्रयोग की दृष्टिï से अनंत संभावनाओं से ओतप्रोत थी। $ग$जल के क्षेत्र में उसने सुप्रसिद्ध $ग$जलकार दुष्यंत कुमार को अपना गुरू माना था, वहीं नई कविता के क्षेत्र में गिरिजा कुमार माथुर एवं मुक्तिबोध से प्रभावित थे। इन सब के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अपना अलग शिल्प चुन लिया था। नायक  की रचनाओं को मांजने एवं दिशा निर्देश देने में स्वर्गीय डॉ. नन्दूलाल चोटिया का अविस्मरणीय योगदान रहा।
उनके गीत, $ग$जल एवं नई कविताओं का प्रथम श्रोता मैं स्वयं था। लघुकथाकार, कवि, लेखक आचार्य सरोज द्विवेदी भी नायक की रचनाओं के प्रबल प्रशंसक थे उन्होंने उसे हरदम लेखन के लिए प्रोत्साहित किया। विवेचना की दृष्टिï से मैंने कई बार उसे परखने की कोशिश की और कुछ त्रुटियाँ भी निकाली लेकिन शिल्प एवं भाव संयोजन की दृष्टिï से उसकी रचनाएं अद्वितीय थी, इसे मैंने काफी गंभीरता से महसूस किया था। सरेश्वर दयाल सक्सेना की नई कविताओं ने उसे काफी प्रभावित किया था। उसने कुछ नई कविताएं उसके पास भेजी थी जिसकी सराहना करते हुए सक्सेना ने उसे अनंत संभावनाओं से ओतप्रोत बतलाया था।
आर्थिक पीड़ा उपेक्षा से आक्रांत कृष्णकुमार नायक ने भूख को आत्मसात करते हुए साहित्य सृजन किया। वह दृढ़ प्रतिज्ञ था और उसे अच्छी तरह मालूम था कि अतिशीघ्र साहित्य के क्षेत्र में उसे सम्मान मिलेगा, लेकिन अल्पायु में उसे मौत अपने पास बुलाकर उसका सब कुछ समेट लेगी, यह उसे नहीं मालूम था। उसकी रचनाएं जिसमें नवगीत, $ग$जल एवं नई कविताएं भी थी सर्वप्रथम साप्ताहिक दावा, छत्तीसगढ़ झलक, छत्तीसगढ़ युग, जनतंत्र जैसे साप्ताहिक समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। इसके बाद सबेरा संकेत, अमृत संदेश, देशबन्धु एवं नवभारत ने उनकी रचनाओं को काफी कुछ समेटा, अमृत संदेश ने उसकी चार - पांच कविताओं को एक साथ प्रकाशित किया जिससे नायक की रचनाधर्मिता, शिल्प एवं भाव संयोजन की काफी चर्चा हुई। नायक ने कुछ समय तक छत्तीसगढ़ झलक का संपादन भी किया।
नायक यदि कुछ वर्ष और जी लेते तो डां. बल्देवप्रसाद मिश्र, डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी एवं गजानन माधव मुक्तिबोध की यह नगरी निश्चय ही अटूट रचनाधर्मिता की साक्षी बनती। यह काफी कष्टïप्रद है कि राजनांदगांव के रचना शिल्पियों ने उसे भूला दिया। बेरोजगारी भोग रहे नायक को तब एक ठौर मिला जब उसे शिक्षक की नौकरी मिल गई लेकिन आदिवासी अंचल में हुई नियुक्ति को वे पचा इसलिए नहीं पाए कि वहां सतत अध्ययन, मनन एवं लेखन की सुविधा नहीं मिल रही थी। ले देकर उसने डोंगरगांव में अपना तबादला कराया। इसके कुछ समय बाद मोतीपुर रेल्वे पर चलते हुए अपनी सोच को केन्द्रित रखने के कारण रेल दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। भाई सर्वेद स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक के विस्मृत साहित्यिक अवदान को रेखांकित करना चाहते हैं, उनके आग्रह पर कृष्णकुमार नायक को मेरी विनम्र संस्मरण - शोकांजलि।
सृजन आवास, ग्राम - बोरी
 राजनांदगांव 6 छग. 8 

मेरी स्मृति में कृष्णकुमार नायक

चन्द्रकांत ठाकुर
 मैं प्रेस में बैठा था कि एक दुबला - पतला नवयुवक आया। उसके हाथ में एक कागज थी। उसे मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा - सर, मैंने ये कविता लिखी है। मैं चाहता हूं इसे आप अपने अखबार में प्रकाशित करें।
तब मेरा अखबार छत्तीसगढ़ झलक साप्ताहिक निकला करता था। मैंने कागज ले ली। उस युवक से बैठने कहा। उसकी कविता पढ़ी। उस युवक ने कहा - सर, मेरा नाम कृष्णकुमार नायक है। मैं मोतीपुर में रहता हूं। आपने मुझे पढ़ाया है। तब मेरी मूंछ नहीं ऊगी थी।
- अच्छा - अच्छा ....। इससे ज्यादा मैं और कुछ नहीं कहा। कविता प्रकाशित होने का आश्वासन ले वह प्रेस से चलता बना।
एक दिन पुन: वही युवक आया। कहने लगा - सर, मैं आपकी प्रेस में सेवा देना चाहता हूं।
 चूंकि उन दिनों छत्तीसगढ़ झलक साप्ताहिक निकला करता था। आर्थिक स्थिति उतनी सुदृढ़ नहीं थी कि कर्मचारी रखा जा सके और फिर साप्ताहिक समाचार पत्र होने के नाते मैं अकेला ही उसे देखने में सक्षम था। मैं उसे टालना तो चाहा पर टाल नहीं सका। उससे कहा - शाम चार बजे आ जाना ...। वह अपने समय पर आ गया। तब मेरा कार्यालय साहित्य का केन्द्र हुआ करता था। वहां शहर के अनेक साहित्यकार बैठे करते थे। चर्चाएं होती थी। कृष्णकुमार बगैर नाम के रचनाएं प्रकाशित करता था तो उस रचना  संबंध में साहित्य बिरादरी पूछा करते - ये रचनाएं किनकी है ? तब मेरा उत्तर हुआ करता था कि जो दुबला - पतला लड़का मेरे यहां बैठता है उसी की रचना है। एक दिन कृष्णकुमार नायक के साथ हाफ पैंट पहने एक और युवक आया। कृष्णकुमार नायक ने उसके संबंध में बताया - सर, इनका नाम लक्ष्मण कवष है। यह बहुत अच्छा लिखता है। इनकी भी कविता छाप दे। और फिर उस दिन से कवष भी प्रेस में बैठने लगा। बाद में कवष ने प्रेस में बैठना बंद कर दिया।
मुझे धीरे - धीरे यह अनुभव होने लगा था कि कृष्णकुमार नायक की रचनाओं में कुछ न कुछ तो है। मैं चाहता था उनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर से हो। मेरे कहने पर उसे अनुबंध पत्र भेजा गया। कृष्णकुमार नायक जब रिकार्डिंग करने रायपुर जाने लगे तो उसे बहुत समझा कर भेजा था। वापस आया तो पूछा - क्यों कृष्ण रिकार्डिंग हो गई ...?
- नहीं ... । उसका संक्षिप्त उत्तर था।
- मगर क्यों ... ? मेरा प्रश्र था।
- मैं वहां रचनाएं पढ़ नहीं सका। कंपकपी छूटने लगी। मुंह सूखने लगा। और मैं रचना पढ़े बगैर वापस आ गया।
- आकाशवाणी में कार्यक्रम पाने लोग तरसते रहते हैं और तुम रचना पढ़े बगैर वापस आ गये।
मैंने उसे पुन: तैयार किया और अपनी मोटर साइकिल में बिठाकर रायपुर ले गया। तब वहां आकाशवाणी केन्द्र के केन्द्र निदेशन देवेन्द्र नाथ हुआ करते थे। मैंने उनसे कृष्णकुमार नायक की रचनाओं को रिकार्डिंग करने आग्रह किया। उन्होंने न सिर्फ मेरी बात मानी अपितु जब श्री नायक रिकार्डिंग रूम में गया और कविताएं पढ़ने लगा तो कांच के बाहर से देवेन्द्र नाथ उसे कविताएं पढ़ने उत्साहित करने लगे और तब तक उत्साहित करते रहे जब तक कि उसने कविताएं पूरी पढ़ नहीं ली। फिर तो कृष्णकुमार की क्षणिकाएं, मुक्तक, गज़ल कविताएं लगातार आकाशवाणी केन्द्र से प्रसारित होने लगी। अनेक पत्र - पत्रिकाओं में उसकी रचनाएं छपने लगी।
ईमानदारी की बात तो यह है कि तब भी मैं यह नहीं मान रहा था कि कृष्णकुमार नायक कोई बहुत बड़े साहित्यकार है। मुझे यह पता ही नहीं चल पाया था कि श्री नायक की रचनाओं पर दिग्गजों की भी नजर है। मगर उस दिन आश्चर्य में पड़ गया जब प्रलेस द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मंच से डां. मलय जो कि मेरे अध्यापक ही नहीं अपितु बहुत बड़े साहित्यकार भी थे ने कृष्णकुमार नायक एवं लक्ष्मण कवष की रचनाओं की प्रशंसा की।
मेरा ध्यान अब कृष्णकुमार नायक की रचनाओं की ओर जाना स्वाभाविक था और मैंने पाया वास्तव में उसकी रचनाशैली में दम है। समय सरकने के साथ उसे आदिम जाति कल्याण विभाग में शिक्षक की नौकरी लग गयी। प्रथम नियुक्ति उसकी मानपुर के मिंजगांव में हुई। वहां रहकर जहां उसके जीवन जीने की शैली में परिवर्तन आया वहीं उसने रचनाएं लिखी और खूब रचनाएं लिखी। दुर्भाग्य कहा जाए कि उसे एक बीमारी गठियावात ने घेर लिया। उसके उपचार के लिए वैद्यों का सहारा लिया। इधर उधर खूब घूमा मगर उसकी बीमारी ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इसी बीच स्थानांतरण डोंगरगांव हो गया। वह विवाह करने की इच्छुक था। मगर संभवत: वह बीमारी को झेल नहीं पाया और एक दिन खबर लगी कि साहित्याकाश का एक नक्षत्र रेल पटरी में अस्त हो गया ....।
साहित्य को क्षितिज तक पहुंचाने में अपना अमूल्य योगदान देने वाले उस कमलकार की स्मृति में स्वगींय नंदूलाल चोटिया के संयोजन में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी। वहां एक कमेटी बनायी गयी। जिसका मैं भी एक सदस्य था। वहां प्रस्ताव पारित किया गया कि स्वर्गीय कृष्णकुमार नायक की रचनाओं का संग्रह प्रकाशित किया जाएगा। इसके लिए प्रयास किए गए मगर असफल रहे .... ।
सम्पादक -छत्तीसगढ़ झलक, बाम्हा्रणपारा
राजनांदगांव 6 छग. 8

भाषा चमत्कार को नकारते थे बख्शीजी

भाषा चमत्कार को नकारते थे बख्शीजी
कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी
 पर पूज्य गुरुदेव पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी को लोग मास्टर जी के संबोधन से ही जानते थे। साहित्य प्रिय बख्शी जी सम्पूर्ण जीवन संत स्वरूप रहे। जीवन के प्रारम्भ 16 -17 वर्ष के उम्र से जो साहित्य साधना उन्होने प्रारम्भ की वह जीवन के अंतिम अध्याय 1971 तक अविरल चलती रही। इन तमाम वर्षो में बख्शी जी न जाने कितने कष्टïों को झेले लेकिन मुस्का कर उन्हें सुखद साहित्य में बदल दिए। वास्तव में उनका लेखकीय कर्म जन जीवन में आये विसंगतियों का एक दार्शनिक हल था। आज भी उनकी कविताएँ लेख निबंध प्रासंगिक हैं।
खैरागढ़ के एक संभ्रात कायस्थ परिवार में 26 मई सन्ï 1894 को शनिवार को बख्शी जी का जन्म हुआ था।  बख्शी जी को परिवार में पूर्णत: साहित्यिक वातावरण मिला। खैरागढ़ रियासत से जुड़े बख्शी के परिवार में सरस्वती, भारत मित्र, हित वार्ता पत्रिका आती थी। जिसका अध्ययन बख्शी जी नियमित किया करते थे। यही नहीं उनके दादा पिता माता जी एवं अन्य परिवार के सदस्य भी साहित्य साधना किया करते थे। इस प्रकार एक अच्छे सुशिक्षित परिवार में बख्शी जी का जन्म हुआ था। बख्शी का प्राम्भिक शिक्षा खैरागढ़ में हुई वे पढ़ाई में बहुत अच्छे नही थे उनकी गणित कमजोर थी। कक्षा में वे अनुत्तीर्ण भी हुए लेकिन बाद के वर्षो में वे उन्होने असफलता का मुंह नही देखा। उन्ही दिनों वे श्री देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चन्द्रकांता संतति के दिवाने थे। इसके कई किस्से लोगों में प्रचलित है। 1912 में वे मेट्रिक उत्तीर्ण हुए और अपने बड़े भाई के साथ बनारस पढ़ने भेजे गये। यहाँ उन्हे पूरा साहित्यिक वातावरण मिला और 1913 से उनकी रचनाएँ हित कारिणी में प्रकाशित होने लगी। 1916 में बख्शी जी ने बी ए की परीक्षा उत्त्तीर्ण की।  इस समय तक तत्कालीन स्व नाम घन्य पत्रिका सरस्वती में उनकी कई कहानी  प्रकाशित हुई।
बख्शी जी का विवाह 18 वर्ष की उम्र में 1912 में ही हो गया था लेकिन उनकी धर्म पत्नी लक्ष्मी देवी 1916 मेें ही बहू बनकर आई जब वे बी ए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।
बख्शी 1916 में ही राजनांदगांव रियासत के हाईस्कूल में अध्यापन करने लगे थे तब तक उनकी साहित्यिक प्रतिभा का ज्ञान उस समय के महान विभूतियों को हो गया था। उसी समय श्री माधवराव सप्रे जी उन्हें कर्मवीर के सह सम्पादक के लिए आमंत्रित करने आये। तब तक बख्शी को सरस्वती के सम्पादन के लिए स्वीकृति आ चुकी थी इस प्रकार उन्होंने 1920 में सरस्वती का भार सम्हाल पाया। सरस्वती का सम्पादन करते उन्हें पांच वर्ष हुए थे कि उनके पिताजी का देहावसान हो गया। वे इलाहाबाद छोड़ खैरागढ़ आ गये। खैरागढ़ में उन्हें कोई उनके लायक काम नहीं मिलने के कारण 1926 में वे पुन: इलाहाबाद चले गये। स्थापित प्रतिष्ठïा के अनुरूप बख्शी जी ने सरस्वती पत्रिका को उच्च शिखर तक पहुंचाने में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। जो हिन्दी साहित्य के लिए उल्लेखनीय है। 1929 में उनके छोटे पुत्र रविन्द्र कुमार की मृत्यु के बाद उन्हें इलाहाबाद से विरक्ति हो गई और वे  खैरागढ़ आ गये। राजनांदगांव के राजामहंत सर्वेश्वरदास के कर्मचारी श्री सखाराम दुबे के सहयोग से उन्हें शासकीय शाला में नियुक्ति मिल गई। बाद में उन्होंने 1952 से 55 तक सरस्वती का सम्पादन खैरागढ़ से ही करते रहे। पर विषमताओं ने बख्शीजी का पीछा नहीं छोड़ा और उन्हें 1934 से शासकीय शाला से अलग कर दिया गया। 1935 से 1959 तक उन्होंने यायावर जिन्दगी जी। कभी खैरागढ़ में अध्यापन तो कभी राजकुमारियों को पढ़ाना तो कभी महाकौशल रायपुर में सम्पादन इस प्रकार बख्शीजी को जीवन निर्वाह में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। अंत में पंडित किशोरीलाल शुक्ल ने उन्हें राजनांदगांव दिग्विजय कालेज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति दिलायी। जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे राजनांदगांव में ही रहे। 28 दिसम्बर 1971 को महान साहित्यिक मनीषी ने दिवस का अंत पूर्ण करने की अपूर्णिनीय इच्छा के लिए देह त्याग दिए।
विलक्षण व्यक्तित्व के धनी बख्शी जी साहित्य से भरा पूरा एक लम्बी विरासत छोड़ गये। उनके कृतित्व आज भी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है। बख्शीजी अपनी किस विद्या के लिए पहचाना जायेंगे ? एक कवि के रूप में ... बख्शी जी जहां महान रचनाकारों रविन्द्र नाथ टैगोर, वर्डसवर्थ के कविताओं का अनुवाद किया वहीं भक्तिभाव लिए काव्य रचनाएं की। उन्होंने काव्य में आत्म अभिव्यक्ति को विशेष महत्व दिए। एक निबंधकार के रूप में बख्शी को पूर्ण सफलता मिली। उनका दार्शनिक आत्मान्वेषी व्यक्तित्व निबंध के रूप में साकार हुआ। निबंधकार के रूप में उन्होंने जीवन के विभिन्न मूल्यों को कथानात्मक स्वरूप में प्रस्तुत कर जन मानस में भावनात्मक अभिरूचियों को आत्मसात करने का मार्ग प्रशस्त किया। कथाकार के रूप में वे कहानी में अपनी विशिष्टï शैली में पारिवारिक वातावरण  को स्पष्टï करते हुए भावना को प्रमुख रूप से रेखांकित करते हैं।
बख्शीजी के सम्पूर्ण रचनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वे भाषा के चमत्कार को नकारते हैं। वे शब्दों के पाण्डित्यपूर्ण प्रदर्शन की अपेक्षा भावों को महत्व देते हैं। उनकी रचनाओं में भावों के स्वाभाविक विस्तार देखने को मिलता है। सजीवता व भावों को यथेष्टï चित्रण उनकी रचनाओं को पठनीय बनाते हैं।
बख्शी जी का साहित्य संसार जीवन की विपदाओं के विरूद्ध मौन सहनशीलता का बोध कराती है। उनके साहित्यिक साधना का अमृत आज भी हिन्दी साहित्य के लिए अनमोल है। विश्व साहित्य के इस संत की जीवन यात्रा के समस्त पड़ाव उनके रचनाओं के माध्यम से हमारे समक्ष है। उनकी सरसता, आत्मपरकता, चिन्तनशीलता, दार्शनिकता हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है। महान मनीषी के चरणों में सादर नमन।
संकल्प, दिग्विजय कालेज रोड, जमातपारा, राजनांदगांव 6 छग. 8

उदार मना बख्शी जी

हीरालाल अग्रवाल
साहित्य वाचस्पति डा. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जिनके नाम के सामने तत्कालीन परम्परानुसार च्च्प्रेमचंद बी. ए. ज्ज् की तरह च्च् बी. ए . ज्ज् जुड़ा हुआ होता था, आधुनिक हिन्दी साहित्य की नीव के पत्थरों में से एक थे। चूँकि उनका जन्म खैरागढ़ मेें हुआ था, यही पले बढ़े , पढ़े - पढ़ाये इसलिए उन्हें देखना - सुनना कोई बड़ी बात नहीं थी। वे खैरागढ़ के प्रथम अखिल भारतीय हस्ती थे। विद्यार्थी जीवन में ही कथा - साहित्य के प्रति उनकी गहन अनुरक्ति एवं सादगी से संबंधित अनेक संस्मरण सुनने को मिलते थे। वे जब कभी स्थानीय पुराने बस स्टैंड, जहां मेरा घर हुआ करता था के जय स्तंभ में बीड़ी पीते बैठे होते, मैं उन्हें श्रद्धाभाव से निहारा करता। मेरे मन में प्रश्र भी उठता कि मटमैले रंग का कुर्ता और साधारण सी धोती पहने बीड़ी फूंक रहा क्या यही आदमी तब की सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रिका च्च् सरस्वती ज्ज् का सम्पादक था ? क्या यही वह आदमी है, जिसके कार्यालय में सामान्य सी दरी पर बैठने में पं. जवाहरलाल नेहरू को संकोच नहीं हुआ ? क्या यही वह आदमी है जिसने पाण्डेय बेचन शर्मा च्च् उग्र ज्ज् की रचना लौटा दी थी ? क्या यही वह आदमी है, जिसने सुमित्रानंदन पंत जैसे कवि से पंगा ले लिया था ? और क्या यही वह आदमी है जिस पर निराला जी ने पंतजी के प्रति पक्षपात का आरोप मढ़ा था ?
बख्शी जी अक्सर यहाँ गोलबाजार में कोठारी जी की कवेलू वाली दूकान, जहॉ अब गौतम सांखला का किराना स्टोर्स है, में बैठा करते थे। तब कुर्सी की जगह गद्दी बिछी हुई होती थी। पूर्व विधायक विजयलाल ओसवाल तो उन पर असीम श्रद्धा रखते थे। इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति गुलाबचंद मुणोत के यहॉ तो उनके नाम पर एक कमरा ही बुक रहा करता था। मुझे अच्छी तरह याद है कि सनï् 1966 के आसपास स्थानीय बाँके बिहारी मंदिर परिसर में दुर्गोसत्सव के अवसर पर बख्शी जी का भी कार्यक्रम रखा गया था। अब इसे आप भाषण कहिए या प्रवचन। गणेशजी एवं दुर्गासप्तशती से संबंधित मधु कैटभ आदि पात्रों की आधुनिक संदर्भों में पहली बार बौद्धिक व्याख्या मैंने बख्शी जी से सुनी। काश मैं उसे लिपिबद्ध कर लिया होता। बख्शीजी की आदत बोलकर लिखाने की थी, अत: उनका बोला हुआ अपने आप में सुसंपादित होता। गणेशजी के संबंध में, जितना मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि एक कुशल नेता के उनमें सारे गुण थे। इसका प्रमाण है, पहली बौद्धिक - परीक्षा [ इसे कूट परीक्षण भी कह सकते हैं ] जिसमें उन्हें देवताओं के साथ प्रतिस्पर्धा के अंर्तगतï् पृथ्वी की परिक्रमा करनी थी, में त्रिकोकीनाथ की परिक्रमा कर एवं तार्किक तौर पर उसे सिद्ध कर सफलता अर्जित कर लेना। उनकी आँखें छोटी है,इसका तात्पर्य है कि उनकी दृष्टिï पैनी है। उनके कान इतने बड़े हैं कि दूरदराज के लोगों की आवाज भी उन्हें सुनाई दे देती है। वे कान के  कच्चे नहीं है कि दूसरे उन्हें कुछ का कुछ कहकर गुमराह कर सकें। उनकी सूंड इतनी लंबी है कि जन - समस्याओं को वे दूर से ही सूंघ लेते हैं, परिणाम यह होता है कि उनके विकराल रूप धारण करने के पूर्व ही समाधान ढूंढ लेते हैं। उनके पैर ऊँचे। वे दौड़ने पर नहीं वरनïï् लम्बे - लम्बे डग भरने पर विश्वास रखते हैं। इससे विकास की गति थमती नहीं। उनके पेट बड़ी से बड़ी बातों को पचाने की क्षमता रखते हैं। गरिष्ठ वस्तुएँ भी अनुकुल हो जाती है। उनका शरीर विशाल है। जनता को उनकी शक्ति पर भरोसा है। वह शारीरिक एवं बौद्धिक दोनों दृष्टिï से सक्षम है।
बख्शी जी से मेरी पहली मुलाकात इसी अवधि में हुई। वे प्राय: सराय भवन, जहाँ उनके ज्येष्ठï पुत्र महेन्द्र कुमार बख्शी का निवास था, से प्राय: तुरकारी पारा एवं दीवानबाड़ा होते हुए गोलबाजार की ओर जाया करते थे। दीवान बाड़ा के सामने वाले उसी मकान में जहॉ बख्शी जी कभी रहा करते थे, हमारे एक मित्र एम. एस. खान बतौर किरायेदार रहा करते थे। हमेशा की तरह अपने साथियों के साथ हम वहां गपियाते बैठे हुए थे कि खिड़की से मेरी नजर पैदल चले आते बख्शी जी पर पड़ी। चादर ओढ़े हुए बख्शीजी, बस बख्शीजी - सी वेशभूषा में थे। हमारे बीच उपस्थित शिवकुमार तिवारी ने जो हमसे उम्र में काफी बड़े थे, बख्शी जी को प्रणाम कर साग्रह आमंत्रित किया। स्वाभाविक है कि हम सबने चरण स्पर्श कर उनका आर्शिवाद लिया। यहां मैं जो रेखांकित करना चाहता हूं, वह यह है कि जिस प्रकार आत्मा शरीर छोड़ देने के पश्चात् उस ओर लौटकर नहीं देखती, बख्शीजी अपने उस पुराने मकान के प्रति रंचमात्र उत्सुकता प्रगट नहीं की और इस तरह आकार उस कमरे में बैठे कि जैसे वे पहिली बार इस  उस मकान में प्रवेश कर रहे हों। तब मकान का स्वरूप लगभग पूर्ववतïï था। न उन्होंने इधर - उधर झांका और न ही उस संबंध में कोई पूछताछ की। मैं तो उनके सामने बैठने के सुख से गौरवान्वित एवं हर्षाभिभूत था। अपनी ओर से हमने साहित्य पर ही चर्चा केन्द्रित रखी। उन्होंने एक कहानी सुनाकर कहानी लेखन प्रक्रिया पर ही विस्तार से प्रकाश डाला था। हम मंत्रमुग्ध भाव से उन्हें सुने जा रहे थे। अंधों में काना राजी की हैसियत से मैं उनसे प्रतिप्रश्र करता। उस समय तक कुछ मुक्तक सहित मात्र मेरे दो आलेख प्रकाशित हुए थे। एक युगधर्म रायपुर - नागपुर संस्करण में और दूसरा बद्रीविशाल अग्रवाल द्वारा संपादित एवं रायपुर से प्रकाशित च्च्विजयेता ज्ज् मासिक के द्वितीयांक में। संयोग से उसी अंक में बख्शीजी का भी एक आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके कारण मैं विशेष आल्हादित था। उन्होंने कहा था - च्च् अब देखो न बाबू, हम तो नांदगांव म रहिथी। हमला का मालूम कि इहॉ के कोन - कोन लइका मन लिखत हे। कभू नांव के नीचे खैरागढ़ लिखे दिखथी त बड़ खुशी होथे। तुम्हार लेख ल तो पढ़े रेहेन, फेर तु्म्हीं हीरालाल हो कहिके आज जानेन, काखर लइका हो तुम ? ज्ज्यहां यह  उल्लेख करना आवश्यक है कि बातचीत में बख्शीजी की पहली प्राथमिकता छत्तीसगढ़ी होती, गैरछत्तीसगढ़ियों के साथ ही वे हिन्दी में बात करते। उन्होंने आगे कहा था - च्च् लिखो बाबू, खूब लिखो। कहानी, कविता, लेख नई लिख सको त डायरी लिखो, हर व्यक्ति म मौलिकता होथे। का पता तुम कोन से अइसे वाक्य लिख दो कि अमर हो जाय। ज्ज् बख्शीजी लगभग घंटा भर हमारे बीच बैठे रहे। उनका व्यक्तिव आतंक पैदा करने वाला नहीं, श्रद्धाभाव जगाने वाला था। वे हमारे बीच घर के बुजुर्ग जैसा लगे। खान साहब ने चाय की व्यवस्था की। बीड़ी तो उनके पास रहती ही थी।
ऊपर जिस मकान का उल्लेख हुआ है, उसी कारण एक अप्रिय प्रसंग ने समाचार पत्रों में सुर्खियों का रूप ले लिया था। दरअसल यह मकान रानी पदï्मावती देवी [पूर्व मंत्राणी म.प्र. एवं सांसद राजनांदगांव ] के नाम पर था, जिसे रहने के लिए बख्शी परिवार को दिया गया था किन्तु उसे वापस ले लिया गया था। समूचा म.प्र. साहित्य जगत बख्शीजी के समर्थन में एकजूट एवं उद्वेलित था। लेकिन उदारमना बख्शीजी ने एक बयान में रानी साहिबा को च्च् मातृ - स्वरूपा ज्ज् बतलाकर उस पर विराम लगा दिया। स्वाभाविक है कि समूचा खैरागढ़, व्यंग्योक्तियों का शिकार होने लगा, जबकि नगरवासियों में बख्शीजी के प्रति हमेशा से अगाध श्रद्धा रही है। इस श्रद्धा - भाव को अभिव्यक्ति देने के उद्देश्य से स्थानीय नवयुवक साहित्य समिति ने, जिसका मैं भी एक सक्रिय कार्यकर्ता हुआ करता था, बख्शीजी के सार्वजनिक अभिनंदन का बीड़ा उठाया। एक बार फिर से बख्शीजी से रूबरू होने का अवसर मिला। मेरे साथ शिवेन्द्र संस्कृत पाठशाला [आज नगर पंचायत भवन] के प्राचार्य, बख्शीजी के लगभग हम उम्र एवं सुपरिचित, पं. कृष्णानंद शास्त्री भी थे। महेन्द्रकुमार बख्शी इन्हीं के अधीन सहायक शिक्षक थे। मैंने बख्शी जी से मिलने वाली सहमति के दौरान यह अनुभव किया कि अभिनंदन की अपेक्षा खैरागढ़ आने का अवसर लाभ प्राप्त करने की उत्कंठा उनमें अधिक थी। आमजन में साहित्याभिरूचि उत्पन्न करने की दृष्टिï से रात्रिकालीन कवि - सम्मेलन की योजना बनाई गई, जिसमें तब के अंर्तराष्टï्रीय ख्याति के हास्य रस सम्राट काका हाथरसी सहित बाबू जांजगिरी, प्रभाकर चौबे, केदारनाथ झा च्च् चंद्र ज्ज्, शरदकपूर, एवं स्थानीय कवि के बतौर मैंने सिरकत की थी। संचालन डां. नंदूलाल चोटिया ने किया था। चूंकि काकाजी को हाथरस से सीधा खैरागढ़ आना था, इसलिए यह अपेक्षा थी कि वे समय के पूर्व आ जायेंगे और बख्शीजी के मध्यान्हकालीन आयोजन की गरिमा बढ़ जायेगी, किन्तु दुर्भाग्यजनक से ट्रेन लेट हो जाने के कारण अभिनंदन समारोह के बाद ही वे आ पाये। उनके प्रिय शिष्य विधायक विजयलाल ओसवाल भी किन्ही अपरिहार्य कारणों से उपस्थिति नहीं दे पाये थे। इस अभिनंदन समारोह की विशेषता यह थी कि खैरागढ़, छुईखदान एवं गंडई के आमजन ने छोटी - छोटी राशि के माध्यम से अपनी सहभागिता प्रदर्शित की। यही कारण है कि एक ठेठ साहित्यकार के अभिनंदन समारोह में भी इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय का दरबार हाल दिनांक 24 मार्च 67 को, भरी दोपहरी में भी, ठसाठस विशेषकर गैरसाहित्यकारों से भरा हुआ था। बख्शीजी वाणी सिद्ध थे। उनके संबोधन का एक एक वाक्य सरस्वती के पूर्व संपादक के मुख से स्वमेव संपादित निकलते। नामवर सिंह में यह विशेषता है। राजनीतिज्ञ होने के बावजूद डां. द्वारका प्रसाद मिश्र के भाषण में भी ऐसी परिपक्वता की झलक मिलती थी। बख्शीजी के भाषण में जहां खैरागढ़ के प्रति प्रणाम - भाव था, वहीं नवरचनाकारों के लिए प्रेरक शब्द। अभिनंदन के अवसर पर भेंट की गई तुच्छ राशि को उन्होंने नगर से मिलने वाले च्च् प्रसाद ज्ज् की तरह ग्रहण किया। जब मैंने काका हाथरसी को अभिनंदन समारोह में न पहुंच पाने के लिए उल्हाना दी तो उन्होंने छूटते ही कहा था - अरे, आपसे ज्यादा बख्शीजी से नहीं मिल पाने का अफसोस हमें है। हम तो मात्र लोगों का मनोरंजन करने वाले हैं। वे तो सही मायने में साहित्य मनीषी है। बख्शीजी के लिए अभिनंदन पत्र डां. नंदूलाल चोटिया ने अपनी संपूर्ण भाषिक एवं वैचारिक क्षमता के साथ सश्रद्ध तैयार किया था। इस बहाने बख्शीजी से मेरा तीसरी बार सान्निध्य हुआ।
सनï् 1971 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एक पद व्याख्याता के रिक्त होने का विज्ञापन निकला। दसवीं की बदौलत च्च् निम्र श्रेणी शिक्षक ज्ज् का पद पा जाने के बाद घिसटते - घिसटते मैंने निजी तौर पर हिन्दी विषय में द्वितीय श्रेणी में एम. ए. कर लिया था। पिछले दस वर्षों से प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक स्तर पर पढ़ा रहे इस शिक्षक का च्च् हीनता बोध ज्ज् ही कहिए, मुझमें आवेदन के लिए कोई उत्सुकता नहीं थी लेकिन अपनी छुटपुट साहित्यिक गतिविधियों के कारण मैं यहां साहित्यकार समझा जाने लगा था। अंतत: विश्वविद्यालय के ही पटेल बाबू ने मुझसे साग्रह आवेदन करवाया। तब संगठनात्मक गतिविधियों में मेरी इस कदर व्यस्तता थी कि इस कर्तव्यभीरू शिक्षक के पास जो अतिरिक्त समय बचता, उसका बहुलांश उसमें एवं शेष नून- तेल - लकड़ी की चिंता में चला जाता था। तात्पर्य यह कि लेखन उतना ही जितना कि ऊपर का उल्लेख है। मेरे जेहन में था, बख्शीजी द्वारा मेरा एक आलेख पढ़ा जाना। मैंने सोचा आवेदन कर्त्ताओं के पास यदि पी. एच . डी . हो तो मेरे पास कम से कम बख्शीजी का दिया प्रमाण पत्र ही सही। तुच्छ बुद्धि कहिए या कूट बुद्धि मैंने एक चारित्रिक प्रमाण पत्र रानी पदï्मादेवी, विश्वविद्यालय की संस्थापिका से भी जुगाड़ लिया था। दस जनवरी 71 को मैं अपने अग्रज लोक संगीत मर्मज्ञ पं. रामकृष्ण तिवारी के साथ राजनांदगांव पहुंचा। चरण वंदना एवं इधर उधर की बातों के बाद तिवारीजी ने भूमिका बांधी। बख्शीजी ने कहा - च्च् का चाहत हो, एक नमूना लिख के दे दो बाबू।ज्ज् मैंने एक नमूना तैयार किया। जिसमें आधा झूठ आधा सच के रूप में एक वाक्य लिखा - मैं उनके एक दो लेख पढ़ चुका हूं। मेरे कुल  जमा दो लेख तो प्रकाशित ही हुए थे। अब प्रमाण पत्र देखिए - इसमें पूरी की पूरी बख्शीजी की भाषा है। बख्शीजी बोल रहे थे और तिवारीजी लिख रहे थे -  च्च् मैं श्री हीरालाल अग्रवाल जी को बचपन से जानता हूं। प्रारंभ से उनमें विद्याभिरूचि थी। यही कारण है कि अध्ययनशील होने के कारण स्वाध्याय द्वारा एम. ए . हो गये। उनमें एक विशेष प्रतिभा है और साहित्य की सेवा करने के लिए एक उत्साह है, उनके दो - तीन लेखों को मैं पढ़ चुका हूं। शिक्षा केे  प्रति भी उनकी विशेष अभिरूचि है। उसी क्षेत्र में वे अभी तक काम करते आ रहे हैं। मैं समझता हूं कि यदि महाविद्यालय मेें काम करने का अवसर मिल जाए तो वे अवश्य एक सफल अध्यापक सिद्ध होंगे।ज्ज् प्रमाण पत्र तो मैंने सादर ग्रहण कर लिया। इसी बीच मुझे ज्ञात हुआ कि डां. रमाकांत श्रीवास्तव वर्तमान अध्यक्ष प्रगतिशील लेखक संघ छत्तीसगढ़ मेरे प्रमुख प्रतिद्वंदी हैं। मेरा दुर्भाग्य था कि डां. साहब को मैं एक साहित्यकार के रूप में जानने लगा था। उनके स्थान पर कोई भी अज्ञात नामधारी होने पर नि: संकोच मैं मैदान में उतर जाता। इंटरव्यूह की तिथि एवं बी. एडï् प्रशिक्षण हेतु शिक्षा - महाविद्यालय सागर में ज्वायन करने की तिथि एक थी। मैंने सागर प्रस्थान करना उचित समझा। एक दो, दो - तीन आज भी मेरे पीछे हैं। उस महानात्मा की दयालुता का न जाने कितनों ने शोषण किया होगा। इस बात का मुझे संतोष है कि उस प्रमाण - पत्र का मैंने दुरूपयोग नहीं किया और उनके एक - दो को दो - तीन करने आज भी थोड़ा बहुत कलम चला रहा हूं। एक सौ चौदहवीं जयंती के अवसर पर क्षमा - याचना सहित उन्हें शतश: प्रणाम। यह मेरी उनसे अंतिम मुलाकात थी।
 नया बस स्टैण्ड, खैरागढ़
जिला - राजनांदगांव 6 छग. 8
      भाषा चमत्कार को नकारते थे बख्शीजी
कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी
 पर पूज्य गुरुदेव पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी को लोग मास्टर जी के संबोधन से ही जानते थे। साहित्य प्रिय बख्शी जी सम्पूर्ण जीवन संत स्वरूप रहे। जीवन के प्रारम्भ 16 -17 वर्ष के उम्र से जो साहित्य साधना उन्होने प्रारम्भ की वह जीवन के अंतिम अध्याय 1971 तक अविरल चलती रही। इन तमाम वर्षो में बख्शी जी न जाने कितने कष्टïों को झेले लेकिन मुस्का कर उन्हें सुखद साहित्य में बदल दिए। वास्तव में उनका लेखकीय कर्म जन जीवन में आये विसंगतियों का एक दार्शनिक हल था। आज भी उनकी कविताएँ लेख निबंध प्रासंगिक हैं।
खैरागढ़ के एक संभ्रात कायस्थ परिवार में 26 मई सन्ï 1894 को शनिवार को बख्शी जी का जन्म हुआ था।  बख्शी जी को परिवार में पूर्णत: साहित्यिक वातावरण मिला। खैरागढ़ रियासत से जुड़े बख्शी के परिवार में सरस्वती, भारत मित्र, हित वार्ता पत्रिका आती थी। जिसका अध्ययन बख्शी जी नियमित किया करते थे। यही नहीं उनके दादा पिता माता जी एवं अन्य परिवार के सदस्य भी साहित्य साधना किया करते थे। इस प्रकार एक अच्छे सुशिक्षित परिवार में बख्शी जी का जन्म हुआ था। बख्शी का प्राम्भिक शिक्षा खैरागढ़ में हुई वे पढ़ाई में बहुत अच्छे नही थे उनकी गणित कमजोर थी। कक्षा में वे अनुत्तीर्ण भी हुए लेकिन बाद के वर्षो में वे उन्होने असफलता का मुंह नही देखा। उन्ही दिनों वे श्री देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चन्द्रकांता संतति के दिवाने थे। इसके कई किस्से लोगों में प्रचलित है। 1912 में वे मेट्रिक उत्तीर्ण हुए और अपने बड़े भाई के साथ बनारस पढ़ने भेजे गये। यहाँ उन्हे पूरा साहित्यिक वातावरण मिला और 1913 से उनकी रचनाएँ हित कारिणी में प्रकाशित होने लगी। 1916 में बख्शी जी ने बी ए की परीक्षा उत्त्तीर्ण की।  इस समय तक तत्कालीन स्व नाम घन्य पत्रिका सरस्वती में उनकी कई कहानी  प्रकाशित हुई।
बख्शी जी का विवाह 18 वर्ष की उम्र में 1912 में ही हो गया था लेकिन उनकी धर्म पत्नी लक्ष्मी देवी 1916 मेें ही बहू बनकर आई जब वे बी ए की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।
बख्शी 1916 में ही राजनांदगांव रियासत के हाईस्कूल में अध्यापन करने लगे थे तब तक उनकी साहित्यिक प्रतिभा का ज्ञान उस समय के महान विभूतियों को हो गया था। उसी समय श्री माधवराव सप्रे जी उन्हें कर्मवीर के सह सम्पादक के लिए आमंत्रित करने आये। तब तक बख्शी को सरस्वती के सम्पादन के लिए स्वीकृति आ चुकी थी इस प्रकार उन्होंने 1920 में सरस्वती का भार सम्हाल पाया। सरस्वती का सम्पादन करते उन्हें पांच वर्ष हुए थे कि उनके पिताजी का देहावसान हो गया। वे इलाहाबाद छोड़ खैरागढ़ आ गये। खैरागढ़ में उन्हें कोई उनके लायक काम नहीं मिलने के कारण 1926 में वे पुन: इलाहाबाद चले गये। स्थापित प्रतिष्ठïा के अनुरूप बख्शी जी ने सरस्वती पत्रिका को उच्च शिखर तक पहुंचाने में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। जो हिन्दी साहित्य के लिए उल्लेखनीय है। 1929 में उनके छोटे पुत्र रविन्द्र कुमार की मृत्यु के बाद उन्हें इलाहाबाद से विरक्ति हो गई और वे  खैरागढ़ आ गये। राजनांदगांव के राजामहंत सर्वेश्वरदास के कर्मचारी श्री सखाराम दुबे के सहयोग से उन्हें शासकीय शाला में नियुक्ति मिल गई। बाद में उन्होंने 1952 से 55 तक सरस्वती का सम्पादन खैरागढ़ से ही करते रहे। पर विषमताओं ने बख्शीजी का पीछा नहीं छोड़ा और उन्हें 1934 से शासकीय शाला से अलग कर दिया गया। 1935 से 1959 तक उन्होंने यायावर जिन्दगी जी। कभी खैरागढ़ में अध्यापन तो कभी राजकुमारियों को पढ़ाना तो कभी महाकौशल रायपुर में सम्पादन इस प्रकार बख्शीजी को जीवन निर्वाह में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। अंत में पंडित किशोरीलाल शुक्ल ने उन्हें राजनांदगांव दिग्विजय कालेज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति दिलायी। जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे राजनांदगांव में ही रहे। 28 दिसम्बर 1971 को महान साहित्यिक मनीषी ने दिवस का अंत पूर्ण करने की अपूर्णिनीय इच्छा के लिए देह त्याग दिए।
विलक्षण व्यक्तित्व के धनी बख्शी जी साहित्य से भरा पूरा एक लम्बी विरासत छोड़ गये। उनके कृतित्व आज भी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है। बख्शीजी अपनी किस विद्या के लिए पहचाना जायेंगे ? एक कवि के रूप में ... बख्शी जी जहां महान रचनाकारों रविन्द्र नाथ टैगोर, वर्डसवर्थ के कविताओं का अनुवाद किया वहीं भक्तिभाव लिए काव्य रचनाएं की। उन्होंने काव्य में आत्म अभिव्यक्ति को विशेष महत्व दिए। एक निबंधकार के रूप में बख्शी को पूर्ण सफलता मिली। उनका दार्शनिक आत्मान्वेषी व्यक्तित्व निबंध के रूप में साकार हुआ। निबंधकार के रूप में उन्होंने जीवन के विभिन्न मूल्यों को कथानात्मक स्वरूप में प्रस्तुत कर जन मानस में भावनात्मक अभिरूचियों को आत्मसात करने का मार्ग प्रशस्त किया। कथाकार के रूप में वे कहानी में अपनी विशिष्टï शैली में पारिवारिक वातावरण  को स्पष्टï करते हुए भावना को प्रमुख रूप से रेखांकित करते हैं।
बख्शीजी के सम्पूर्ण रचनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वे भाषा के चमत्कार को नकारते हैं। वे शब्दों के पाण्डित्यपूर्ण प्रदर्शन की अपेक्षा भावों को महत्व देते हैं। उनकी रचनाओं में भावों के स्वाभाविक विस्तार देखने को मिलता है। सजीवता व भावों को यथेष्टï चित्रण उनकी रचनाओं को पठनीय बनाते हैं।
बख्शी जी का साहित्य संसार जीवन की विपदाओं के विरूद्ध मौन सहनशीलता का बोध कराती है। उनके साहित्यिक साधना का अमृत आज भी हिन्दी साहित्य के लिए अनमोल है। विश्व साहित्य के इस संत की जीवन यात्रा के समस्त पड़ाव उनके रचनाओं के माध्यम से हमारे समक्ष है। उनकी सरसता, आत्मपरकता, चिन्तनशीलता, दार्शनिकता हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है। महान मनीषी के चरणों में सादर नमन।
संकल्प, दिग्विजय कालेज रोड, जमातपारा, राजनांदगांव 6 छग. 8

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

ममतामयी मिनीमाता : तीन यादें




- दादू लाल जोशी ' फरहद '
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ममतामयी मिनीमाता आज हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनसे जुड़ी हुई, कुछ भूली-बिसरी यादें यदाकदा हमारे मनोमस्तिष्क में उभरती हैं। तब महसूस होता हैं कि उनका व्यक्तित्व कितना सहज, सरल लेकिन विराट था। उनकी वाणी मधुर और व्यवहार ममतापूर्ण व स्निग्ध होते थे। उनके सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने समझने को मिलता था।
यह मेरा सौभाग्य ही था क तीन मर्तबा भेंट करने का अवसर मुझे मिला। उन तीन मुलाकातों में उनसे कुछ न कुछ शिक्षा मुझे अवश्य मिली थी।
मिनीमाता जी से जब मेरी प्रथम मुलाकात हुई थी तब मैं मात्र पंद्रह वर्ष का था। शायद उस समय मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था। मुझे हल्की सी याद है, यही कोई सितंबर या अक्टूबर का महीना था। संध्या के चार बजे सोमनी के बस स्टॉप पर एक बस आकर रुकी। उस बस में अन्य यात्रियों के साथ एक गोरी और सामान्य कदकाठी की पतली सी महिला उतरी। बार्डर युक्त सफेद साड़ी और गहरे हरे रंग के ब्लाऊज में उस महिला का चेहरा दमक रहा था। ओठों में मधुर मुस्कान लिये उन्होंने थोड़ी देर खड़ी होकर इधर-उधर देखा। तभी लगभग दस-बारह व्यक्ति अपने-अपने चप्पलों को पैरों से झटका देकर पीछे की ओर फेंक दिये और उस महिला की ओर दौड़ पड़े। वे सब अपने सिरों को उस महिला के चरणों पर टिकाते गये। महिला सबको दीर्घायु होने का आशीर्वाद दे रही थी। अद्भुत था वह दृष्य। मैंने पहली बार किसी का इतने समर्पित श्रद्धाभाव से सम्मान होते देखा था। मैं अभिभूत हो आश्चर्य के साथ उस अविस्मरणीय दृष्य को देख रहा था। मेरे साथ ही वहाँ पर उपस्थित अन्य नर-नारी  भी विस्मय से वह नजारा देख रहे थे। थोड़ी देर में ही और दस-पंद्रह लोग वहाँ आ गये थे, उनके ही मुँह से सुना कि - वह महिला मिनीमाता थी।
बस स्टॉप में ही सड़क के किनारे एक बैलगाड़ी खड़ी थी। उस पर थोड़ा सा पैरा रखा था और उसके ऊपर एक नई स्वच्छ चादर बिछी हुई थी। सहसा मैंने मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. श्री भारत दास जी गौटिया को बैलगाड़ी के पास से आते हुए देखा। उन्होंने माता जी के पास आकर उनका चरण स्पर्ष किया और कहा - माता जी! बैलगाड़ी तैयार हे, चलव बइठौ।''
यह सुनकर माताजी ने कहा - गाँव ह तो नजदीक म हवै गा, रेंगत चल देबों। गाड़ी के जरूरत नई हे।''
माता जी की बात को सुनकर सभी लोग एक साथ बोल पड़े - नहीं माता! रेंगत काबर जाहू? चलौ, गाड़ी म बइठौ।''
लोगों के आग्रह को माता जी टाल नहीं सकीं। वे गाड़ी में बैठ गई। बैलगाड़ी चल पड़ी। उसके पीछे-पीछे सभी लोग पैदल चलने लगे। वह प्रभावशाली, गरिमामयी माता जी मेरे ही घर जा रही हैं; यह जानकर मुझे बेहद खुशी हुई। दूसरे दिन पूरे समय माता जी और मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. भारतदास जी गौंटिया के बीच किसी खास समस्या पर गंभीर चर्चा होती रही। ज्येष्ठ पिता स्व. भारतदास जी मालगुजारी प्रथा के अंतर्गत ग्राम फरहद के अंतिम मालगुजार थे। यह गाँव छोटा सा है। इस गाँव में पिछली कई सदियों से हमारा परिवार मालगुजारी करते आ रहे थे। इसलिये लोगबाग हमारे परिवार के सभी सदस्यों को गौंटिया ही कहा करते थे। मेरे पिता जी को मिलाकर वे लोग चार भाई थे। सबसे बड़े स्व. भारत दास जी गौंटिया, उसके बाद स्व. नारद दास जी (जिनकी मृत्यु बहुत पहले ही हो चुकी थी) उसके बाद तीसरे क्रम में मेरे पिता जी स्व. खेदू राम जी तथा चौंथे क्रम में चाचा स्व. श्री छोटे लाल जी (पटवारी) थे। मालगुजारी प्रथा को देखने और भोगने वाले वे चारों अब सतलोकवासी हो चुके हैं। उनके साथ ही मालगुजारी प्रथा के सारे आन बान और माल भी समाप्त हो चुके हैं। कभी -कभी यह बात मजाक में मैं अपने भाइयों के बीच बोल देता हूँ कि मालगुजारी का सारा माल तो कब का गुजर गया है, अब केवल गुजारा ही बाकी है। यह सुनकर सब हँस देते हैं। खैर! इन बातों को यहाँ प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किन्तु ' गौंटिया ' शब्द आने के कारण ही प्रसंगवश इन बातों का उल्लेख करना पड गय़ा। इसके लिये पाठक गण मुझे क्षमा करेंगे। वैसे संस्मरण लिखते समय इस तरह की कुछ निजी बातों का उल्लेख आ ही जाता है।
माता जी तीसरे दिन मोवा (रायपुर) चली गई। पहली ही मुलाकात में उनकी पैदल चलने की इच्छा से मैं बहुत प्रभावित हुआ और यह समझा कि व्यक्ति चाहे कितने ही ऊँचे पद पर पहुँच जाय; कितनी ही संपत्ति का मालिक बन जाय; उसे अपना काम स्वयं करना चाहिये तथा शारीरिक श्रम से जी नहीं चुराना चाहिये। साथ ही अपने समर्थकों से तथा समाज से बहुत ज्यादा सुविधा व मान-सम्मान पाने की कामना भी नहीं करनी चाहिये।
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मिनीमाता जी से मेरी दूसरी मुलाकात भी मेरे ही परिवार के मध्य हुई थी। प्रथम मुलाकात से यही कोई डेढ़- दो वर्ष बाद की बात है। एक दिन दोपहर के समय मैंने ज्येष्ठ पिता के मकान में प्रवेश किया। बरामदे (छपरी) में आराम कुर्सी (इजी चेयर) में माता जी विराजमान थी। बाजवट (लकड़ी का बिना डिब्बे वाला वर्गाकार दीवान) पर मेरे ज्येष्ठ पिता स्व. श्री भारत दास जी बैठे थे। पास ही एक कुर्सी पर सोमनी निवासी डॉ. मुरलीमनोहर मिश्र जी एक बच्चे की नाड़ी परीक्षण कर रहे थे। डॉ. मुरलीमनोहर मिश्र सोमनी के अतराब में बेहद ख्यातिलब्ध एवं सिद्धहस्त चिकित्सक माने जाते रहे हैं। छ: फुट लंबे गौर वर्ण के भरे पूरे सुडौल गात के स्वामी डॉक्टर साहब का व्यक्तित्व अतिशय भव्य है। वे कुशल चिकित्सक तो हैं ही, सिद्ध कवि भी हैं। उनकी वाणी मधुर किन्तु ओजपूर्ण है। उनका शालीन विनोदी व्यवहार और बात-बात में ' धन्यवाद' कहना उनके व्यक्तित्व की निराली विशेषता है।
डॉक्टर साहब के क्रियाकलाप को मिनीमाता जी काफी देर से अवलोकन कर रही थी। अचानक माता जी ने प्रश्न किया - डॉक्टर साहब क्या आप नाड़ी छूकर हर तरह की बीमारियों को पहचान लेते हैं?''
- आफकोर्स! निश्चय ही।'' डॉक्टर साहब ने जवाब दिया।
- अब तो रोग परीक्षण के आधुनिक यंत्रों का इज़ाद हो चुका है, फिर भी आप प्राचीन पद्धति का ही सहारा लेते हैं?'' माता जी ने फिर प्रश्न किया।
आधुनिक यंत्रों का भी उपयोग हम करते हैं किन्तु आयुर्वेद के अनुसार शरीर में बिमारियों की उत्पत्ति त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के विकृत अथवा असंतुलित हो जाने के कारण होती है, जिनका प्रभाव हृदय पर भी पड़ता है। उसके स्पंदन की गति को नाड़ी के स्पर्ष के द्वारा मालूम कर लेते हैं। जिससे बिमारी किस दोष के कारण पैदा हुई हैइसका पता चल जाता है। यह भी वैज्ञानिक विधि ही है।'' डॉक्टर साहब ने कहा।
- ठीक है, अपना-अपना तर्क है। हाँ, डॉक्टर साहब! कल से मुझे जुकाम हो गया है। सिर में दर्द है। कोई अच्छी सी दवा हो तो दीजिये।'' मिनीमाता जी ने कहा।
डॉक्टर साहब ने बैग से दवा (पन्नी में पैक टेबलेट) निकाली और माता जी को देकर उसे लेने की विधि भी समझा दी।
- दवा का चार्ज (कीमत) क्या है?'' माता जी ने पूछा।
- ओह! नो चार्ज। मुफ्त में दे रहे हैं आपको।'' डॉक्टर साहब ने कहा।
- दवा तो मुफ्त मिलती नहीं है, इसलिये पैसे (चार्ज) तो आपको लेना ही होगा।'' मिनीमाता ने दृढ़ता के साथ कहा।
- धन्यवाद! धन्यवाद! पैसे लेने का का तो प्रश्न ही नहीं है। हम आपको इसे भेट स्वरूप दे रहे है। धन्यवाद।'' डॉक्टर ने भी आग्रह के साथ कहा।
- वाह डॉक्टर साहब! दवा भी मुफ्त दे रहे हो और धन्यवाद भी आप ही दिये जा रहे हैं। धन्यवाद के पात्र तो आप हैं।'' मिनीमाता ने हँसकर कहा।
यह घटना बहुत साधारण सी ही थी। किन्तु इसमें निहित शिक्षा काफी महत्वपूर्ण थी। उससे मैंने जाना कि कभी भी किसी से कोई वस्तु मुफ्त में ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि विवशतावश कीमत स्वरूप किसी तरह का प्रतिदान न दे सकें तो कम से कम धन्यवाद तो देना ही चाहिये तथा आभार मानना चाहिये। इस तरह हम देने वाले के अहसानों तले दबेंगे भी नहीं और मुफ्तखोरी का हम पर इल्जाम भी नहीं लगेगा।
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मिनीमाता जी से मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात  18 दिसंबर 1981 को ग्राम भाटापारा (राजनांदगाँव) के जयंती समारोह में हुई थी। उस समय मैं शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यलय दुर्ग का छात्र था और बी. ए. प्रथम वर्ष में पढ़ता था। उस दिन सुबह के दस बजे मैं सोमनी (गाँव) के बस स्टॉप पर खड़ा था। उसी समय एक एम्बैसडर कार आकर रुकी। कार में उस वक्त के दुर्ग जिले के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता स्व. श्री उदय राम वर्मा जी कुछ लोगों के साथ विराजमान थे। वे लोग भी जयंती समारोह में शरीक होने भाटापारा ही जा रहे थे। तब राजनांदगाँव जिला का निर्माण नहीं हुआ था और दुर्ग जिला के अंतर्गत था। वर्माजी के कार में बैठकर मैं भी भाटापारा पहुँचा।
ठीक 11 बजे एक जीप में मिनीमाता जी भूतपूर्व मंत्री श्री कन्हैयालाल कोसरिया जी के साथ भटापारा आई। बाजे-गाजे के साथ उनका सवागत करके उन्हें मंच तक लाया गया। उस दिन अपने उद्बोधन में मिनीमाता जी ने नारी शिक्षा एवं नारी जागृति पर जोर दिया। कुछ दिनों पूर्व ही माता जी विदेश यात्रा से लौटी थी। भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के साथ माता जी भी विदेश प्रवास पर गई थी। वहाँ के अनुभव सुनाते हुए उनहोंने कहा - विदेशों में नारियाँ अपने अधिकारों के प्रति बहुत जागरुक हैं। इसका कारण यह है कि वहाँ महिलाएँ शत प्रतिशत पढ़ी-लिखी होती हैं। आप लोग भी अपनी बेटियों को खूब पढ़ाओ-लिखाओ। खासकर सतनामी समाज की प्रत्येक बालिका को अनिवार्य रूप से स्कूल भेजना होगा।''
भाटापारा का जयंती समारोह लगभग तीन बजे समाप्त हुआ। वर्माजी भाटापारा से ही दुर्ग लौट आये। इसलिये मैंने माता जी और श्री कन्हैयालाल कोसरिया जी को अपना परिचय दिया। श्री कोसरिया जी मेरे ज्येष्ठ पिता जी और चाचा जी को अच्छी तरह जानते पहचानते रहे हैं। परिचय के बाद मैंने उनके साथ रायपुरा गाँव जाने की इच्छा व्यक्त की। अत: उन दोनो ने ही प्रसन्नता पूर्वक मुझे रायपुरा (डौण्डी लोहारा) के जयंती कार्यक्रम में चलने को कहा। मैं तो तैयार था ही। साढ़े तीन बजे के आस-पास हमने माता जी के साथ भाटापारा से प्रस्थान किया। चार बजे हम लोग नंदई चौक राजनांदगाँव पहुँचे। माता जी और कोसरिया जी ने वहाँ भी लगभग एक घंटे का समय दिया। राजनांदगाँव से हम लोग सवा पाँच बजे रवाना हुए और सात बजे के आस-पास रायपुरा गाँव पहुँच गये। वहाँ काफी संख्या में लेग बाग माता ही का इंतिजार कर रहे थे। उनमें काफी संख्या में महिलाएँ भी थी। रात के सात-आठ बज रहे थे फिर भी अच्छी भीड़ थी। वह दिन मेरे लिये अविस्मरणीय हे। रायपुरा गाँव में उस दिन मेले जैसा दृष्य उपस्थित था। यही वह स्थान था जहाँ ममतामयी मिनीमाता जी के विचारों को, उनकी वाणी को सुनने का अंतिम बार   मुझे अवसर मिला था। उस सभा में भी उन्होंने अपनी विदेश यात्रा के संस्मरण सुनाते हुए महिला जागृति और महिला शिक्षा पर जोर दिया था। उन्होंने कहा - बालिकाओं को हर हालत में स्कूल भेजो और उन्हें भरपूर शिक्षा दिलाओ। इसी में आपका परिवार और सतनामी समाज का सही कल्याण हो सकता है।'' कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् माता जी और कोसरिया जी लौट गये। मैं रायपुरा में रुक गया। प्रात: सामाजिक बंधुओं से मेल मुलाकात हुई। उस समय के प्रतिभाशाली एवं होनहार युवक श्री यू. डी. बघेल के आग्रह पर मैं उनके गाँव गारका चला गया।
जनवरी 1972 में मैं शासकीय सेवा में आ गया था। मैं प्राथमिक शाला जंतर (कोकपुर) में शिक्षक के पद पर पदस्थ था। 11 अगस्त 1972 की सुबह ड्यूटी में जाने के लिये राजनांदगाँव के बस स्टैण्ड परपहुँचा। वहाँ जगह-जगह चार-पाँच के झुण्ड में खड़े होकर लोग कुछ गंभीर बात कर रहे थे। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आज लोग इस तरह खड़े होकर बातें क्यों कर रहे हैं। समय काटने के लिये मैंने एक अखबार खरीद लिया। अखबार के मुख पृष्ठ के हेडजाइन को देखकर मैं स्तब्ध रह गया। उसमें मोटे अक्षरों में लिखा था - वायुयान दुर्घटना में सांसद मिनीमाता का निधन। नीचे दुर्घटना का विस्तृत ब्यौरा दर्ज था। मेरा हृदय शोक और दुख से भर गया। माता जी की मृत्यु पर केवल सतनामी समाज ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ शोक संतप्त हो उठा था।
माता जी के दशगात्र के दिन प्रत्येक गाँव में जहाँ सतनामी समाज निवास करते हैं, उनके द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन किया गया। परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर दशगात्र के दिन जिस तरह का क्रियाकर्म सम्पन्न किया जाता है ठीक वैसा ही क्रियाकर्म माता जी के दशगात्र के दिन गाँव-गाँव में सम्पन्न किया गया। उसी दिन जाना कि सतनामी समाज अपने रहनुमाओं का कितना सम्मान करता है। जो लोग सतनामी समाज के हित में नि:स्वार्थ भाव से काम करते हैं, सतनामियों की एकता, समृद्धि और प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना खून पसीना बहाते हैं, सतनामियों के दुखदर्द को ईमानदारी से दूर करने का प्रयास करते हैं, उन्हें सतनामी समाज अपने हृदय में बैठा लेता है और उन्हें भरपूर आदर और सम्मान देता है। मिनी माता के दशगात्र के दिन यह तथ्य स्पष्टत: उभर कर सामने आया। उस दिन एक और अच्छा काम यह हुआ कि जिन लोगों को किसी कारणवश समाज से छोड़ दिया गया था अथवा बहिस्कार कर दिया गया था, उन्हें भी बिना शर्त के माता जी के मृत्युभोज में शामिल कर लिया गया।
इस तरह ममतामयी मिनीमाता जी अपने जीवन भर सतनामियों की एकता के लिए प्रयास करती रहीं। विभिन्न समस्याओं को हल करने में जुटी रहीं; वहीं अपने मृत्यु के बाद सतलोकवासी होकर भी सतनामी समाज को एकता की सूत्र में बांध दिया।
धन्य है सतनामी समाज और धन्य है ममतामयी मिनीमाता जी।
  • ग्राम - फरहद ,पों. - सोमनी, जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

फक्कड़ कवि थे निराला



- कृष्ण कुमार यादव  -
निराला हिन्दी के उन चंद कवियों में हैं, जिनकी लोकप्रियता व फक्कड़पन को कम ही लोग छू पाये हैं। यद्यपि अर्थाभाव के कारण निराला को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा पर न तो वे कभी झुके और न ही अपने उसूलों से समझौता किया। यही कारण है कि उन पर अराजक और आक्रमण होने तक के आरोप लगे, पर वे इन सबसे बेपरवाह अपने फक्कड़पन में मस्त रहे। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1897 को पं. रामसहाय त्रिपाठी के पुत्र रुप में हुआ था। कालान्तर में आप इलाहाबाद के दारागंज की तंग गलियों में बस गये और वहीं पर अपने साहित्यिक जीवन के तीस - चालीस वर्ष बिताए। निराला जी गरीबों और शोषितों के प्रति काफी उदार व करुणामयी भावना रखते थे और दूसरों की सहायता के प्रति सदैव तत्पर रहते थे। चाहे वह अपनी पुस्तकों के बदले मिली रायल्टी का गरीबों में बांटना हो, चाहे सम्मान रुप में मिली धनराशि व शाल जरुरतमंद वृद्धा को दे देना हो, चाहे इलाहाबाद में अध्ययनरत विद्यार्थियों की जरुरत पड़ने पर सहायता करना हो अथवा एक बैलगाड़ी के एक सरकारी अधिकारी के कार से टकरा जाने पर अधिकारी द्वारा किसान को चाबुको से पीटा जाना हो और देखते ही देखते निराला द्वारा उक्त अधिकारी के हाथ से चाबुक छीनकर उसे ही पीटना हो। ये सभी घटनायें निराला जी के सम्वेदनशील व्यक्तित्व का उदाहरण कही जा सकती है।
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महोदेवी वर्मा के साथ छायावाद के सशक्त स्तम्भ रहे निराला ने 1920 के आस - पास कविता लिखना आरम्भ किया और 1961 तक अबाध गति से लिखते रहें। इसमें प्रथम चरण 1920 - 38 में उन्होंने अनामिका परिमल व गीतिका की रचना की तो द्वितीय चरण 1939 - 49 में वे गीतों की ओर मुड़ते दिखाई देते हैं। मतवाला पत्रिका में वाणी शीर्षक से उनके कई गीत प्रकाशित हुए। गीतों की परम्परा में उन्होंने लम्बी कविताएं लिखीं तो 1934 में उनकी तुलसीदास नामक प्रबंधात्मक कविता सामने आई। इसके बाद तो मित्र के प्रति, सरोज - स्मृति, प्रेयसी, राम की शक्ति - पूजा, सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति, भिखारी, गुलाब, लिली, सखी की कहानियाँ, सुकुल की बीबी, बिल्लेसुर बकरिहा जैसी उनकी अविस्मरणीय पद्य - गद्य कृतियाँ सामने आई। निराला ने कलकत्ता पत्रिका, मतवाला, समन्वय इत्यादि पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। राम की शक्ति - पूजा, तुलसीदास और सरोज - स्मृति को निराला के काव्य शिल्प का श्रेष्ठतम उदाहरण माना जाता है। निराला की कविता सिर्फ एक मुकाम पर आकर ठहरने वाली नहीं थी वरन अपनी कविताओं में वे अंत तक संशोधन करते रहते थे। तभी तो उन्होंने लिखा कि - अभी न होगा मेरा अंत / अभी - अभी तो आया है, मेरे वन मृदुल वसन्त / अभी न होगा मेरा अंत।
निराला की रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे पर ब्रजभाषा व अवधी में भी कविताएं गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश - पे्रम का जज्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आईना है। उनका जोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर था। सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखांकन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है - वह तोड़ती पत्थर / देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर / वह तोड़ती पत्थर / कोई न छायादार पेड़ / वह जिसके तले बैठी स्वीकार / श्याम तन, भर बंधा यौवन / नत नयन प्रिय, कर्म - रत मन / गुरु हथौड़ा हाथ / करती बार - बार प्रहार / सामने तरु - मल्लिका अट्टालिका, प्राकार / इसी प्रकार राह चलते भिखारी पर उन्होंने लिखा - पेट - पीठ दोनों मिलकर है एक / चल रहा लकुटिया टेक / मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को / मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता / दो टूक कलेजे के करता पछताता।
राम की शक्ति पूजा के माध्यम से निराला ने राम को एक समाज में एक आदर्श के रुप में प्रस्तुत किया। वे लिखते हैं - होगी जय, होगी जय / हे पुरुषोत्तम जीवन / कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन। सौ पदों में लिखी गयी तुलसीदास निराला की सबसे बड़ी कविता है जो कि 1934 में लिखी गयी और 1935 में सुधा के पाँच अंकों में किस्तवार प्रकाशित हुई। इस प्रबंध काव्य में निराला ने पत्नी के युवा तन - मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को बखूबी दिखाया है - जागा, जागा संस्कार प्रबल / रे गया काम तत्क्षण वह जल / देखा वामा, वह न थी, अनल प्रमिता वह / इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान / हो गया भस्म वह प्रथम भान / छूटा जग का जो रहा ध्यान।
निराला की रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बंधकर नहीं लिख पाते थे और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला की जूही की कली कविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया है - विजन - वन वल्लरी पर / सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्र मग्न अमल कोमिल तन तरूणी जूही की कली / दृग बंद किये, शिथिल पत्रांक में / वासंती निशा थी। यही नहीं निराला एक जगह स्थिर होकर कविता पाठ भी नहीं करते थे। एक बार एक समारोह में आकाशवाणी को उनकी कविता का सीधा प्रसारण करना था तो उनके चारों ओर माइक लगाए गए कि पता नहीं वे घूम - घूम कर किस कोने से कविता पढ़े। निराला ने अपने समय के मशहूर रजनीसेन, चण्डीदास, गोविन्द दास, विवेकानन्द और रवीन्द्र नाथ टैगोर इत्यादि की बांग्ला कविताओं का अनुवाद भी किया। यद्यपि उन पर टैगोर की कविताओं के अनुवाद को अपना मौलिक कहकर प्रकाशित कराने के आरोप भी लगे। राजधानी दिल्ली को भी निराला ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति दी - यमुना की ध्वनि में / गूंजती सुहाग - गाथा / सुनता है अंधकार खड़ा चुपचाप जहाँ / आज वह फिरदौस, सुनसान है पड़ा / शाही दीवान, आम स्तब्ध है हो रहा है / दुपहर को पार्श्व में / उठता है झिल्ली रद / बोलते पत्थर रात यमुना - कछार में / लीन हो गया रव / शाही अँगनाओं का / निस्तब्ध मीनार, मौन है मकबरे।
निराला की मौलिकता, प्रबल भावोद्वेग, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तर्निहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। वसन्त पंचमी और निराला का संबंध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन हर साहित्यकार उनके सानिध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा - रोक - टोक से कभी नहीं रुकती है / यौवन - मद की बाढ़ नदी की / किसे देख झुकती है / गरज - गरज वह क्या कहती है, कहने दो / अपनी इच्छा से प्रबल वेग से बहने दो। यौवन के चरम में प्रेम के वियोगी स्वरू को भी उन्होंने उकेरा - छोटे से घर की लघु सीमा में / बंधे हैं क्षुद्र भाव / यह सच है प्रिय / प्रेम का पयोधि तो उमड़ता है / सदा ही नि:सीम भूमि पर।
निराला के काव्य में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की झलक मिलती है। पर लोकमान्यता के आधार पर निराला ने विषयवस्तु में नये प्रतिमान स्थापित किये और समसामयिकता के पुट को भी खूब उभारा। अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन और साहित्यकारों के एक गुट द्वारा अनवरत अनर्गल आलोचना किये जाने से निराला अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में मनोविक्षिप्त से हो गये थे। पुत्री के निधन पर शोक - सन्तप्त निराला सरोज स्मृति में लिखते हैं - मुझे भाग्यहीन की तू सबल / युग वर्ष बाद जब हुई विकल / दुख ही जीवन की कथा रही / क्या कहूं आज, जो नहीं कही।
15 अक्टूबर 1961 को अपनी यादें छोड़कर निराला इस लोक को अलविदा कह गये पर मिथक और यथार्थ के बीच अन्तर्विरोधों के बावजूद अपनी रचनात्मकता को यथार्थ की भावभूमि पर टिकाये रखने वाले निराला आज भी हमारे बीच जीवन्त है। मुक्ति की उत्कट आकांक्षा उनको सदैव बेचैन करती रही, तभी तो उन्होंने लिखा - तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा / पत्थर की, निकलो फिर गंगा - जलधारा / गृह - गृह की पार्वती / पुन: सत्य - सुन्दर - शिव को सँवारती / उर - उर की बनो आरती / भ्रान्तों की निश्चल धु्रवतारा / तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा।
  • भारतीय डाक सेवा निदेशक डाक सेवाएं
अंडमान व निकोबर द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर - 744101

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

विश्वंभर यादव ' मरहा '

  • -  ओमप्रकाश साहू ' अंकुर'   -
बिश्‍वंभर यादव ' मरहा '
ओमप्रकाश साहू ' अंकुर '

दुर्ग जिले के ग्राम बघेरा में 6 अप्रैल 1931 को जनकवि विश्वंभर यादव मरहा का जन्म हुआ था। उनके पिताजी भजनहा के नाम से जाने जाते थे। ग्राम बघेरा लोक सांस्कृतिक संस्था चंदैनी गोंदा के सर्जक दाऊ रामचन्द्र देशमुख की कर्मस्थली है। श्री मरहा मुश्किल से सप्ताह भर स्कूल गए। उनकी शिक्षा बस  इतनी थी कि वे बमुश्किल  अपना हस्ताक्षर कर पाते थे। इतना अवश्य था कि उन्हें स्वरचित सैकड़ों कविताएं मौखिक याद थी। वे अपनी कविताओं से श्रोताओं का न सिर्फ मनोरंजन करते थे अपितु चिंतन के लिए भी विवश कर  देते।  विश्वंभर यादव ने दाऊ रामचन्द्र देशमुख के यहां भी कुछ दिन काम किया। उनके उपनाम मरहा नामकरण की भी अपनी कहानी है। एक भव्य कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में दाऊ रामचन्द्र देशमुख उपस्थित थे अध्यक्षता संत पवन दीवान कर रहे थे। इसी अवसर पर कार्यक्रम का संचालन कर रहे श्यामलाल चतुर्वेदी ने उन्हें  अनायास ही मरहा नाम से सम्बोधित कर दिया और उस दिन से वे विश्वंभर यादव से मरहा बन गये। उनकी कविताओं में हमर अमर तिरंगा, मरहा के आँसू, वो भारत के खोज बहुत प्रसिद्ध हैं।  उनकी सबसे लम्बी कविता वो भारत के खोज है जो लगभग 45 मिनट का है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने भारत पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के एक होने की कामना की है। जहां उनकी कविताओं में राष्ट्रीय एकता व भाई चारा के  संदेश होते हैं वहीं हास्य कविताओं के माध्यम से वे लोगों को लोट - पोट कर देते।
छत्तीगसढ़िया व्यक्तित्व के धनी विश्वंभर यादव मरहा धोती कुर्ता में नजर आते थे।  और सदैव गाँधी टोपी पहने रहते थे। वे समय के पाबन्द थे। कवि सम्मेलनों या सभा संगोष्ठियों के लेट लतीफी पर  वे आयोजकों पर जमकर प्रहार करते थे। वे रामचरित मानस स्पर्धा में कवि के रुप में बुलाये जाते थे। वे इस माध्यम से छत्तीसगढ़ का कोना - कोना घूम चुके थे। जब वे कविता पढ़ते थे तो उनका शारीरिक हाथ भाव देखते ही बनता था। दुबले - पतले मरहा जब देश की दुर्दशा और विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कविता पढ़ते तो ऐसा लगता कि उनके मन में देश में पनप रही विसंगतियों के प्रति काफी आक्रोश है। जब वे हास्य कविताएं पढ़ते तो श्रोतागण सुन सुन कर के लोट - पोट हो जाते थे। उनके कविता पढ़ने का ढंग बेहद निराला था। वे विशाल जनसमुदाय को अपनी काव्य वर्षा से सराबोर कर देते थे। मरहा लोगों की नब्ज पहचानते थे और अपनी कविता रुपी ईलाज से लोगों के चेहरों पर हंसी की छटा बिखेर देते थे। वाकई वे जनकवि थे। छत्तीसगढ़ के काव्य रसिक उसे सर आँखों पर बिठाने से नहीं हिचकिचाते थे।
जिस तरह से कवि - सम्मेलन में राष्ट्रीय स्तर पर नीरज नाईट चलता था उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में मरहा नाइट चलता था। उन्हें अनेक सम्मान मिले। उनका इस संबंध में कहना था - पहिली - पहिली जब सम्मान पत्र / स्मृति पत्र मिले तब कोरा में रखत रहेंव ,फेर झोरा म अब बोरा म रखथंव। उनकी कविता की एक बानगी देखिए -
साबर - साबर जइसे चुराके
हक जमा लेव परिया म।
सूजी जइसे दान करके
कोड़ा देव तरिया ल।
एक बार राघवेन्द्र भवन बिलासपुर में  कवि नीरज का सम्मान कार्यक्रम और नीरज नाईट  कार्यक्रम आयोजित किया गया। नीरज को सुनने अपार जनसमूह उमड़ पड़ी। ठीक  एक सप्ताह बाद उसी भवन में मरहा कार्यक्रम रखा गया और वहीं भीड़ थी जो नीरज के कार्यक्रम में थी। मरहा के सम्मान में श्री रमेश गर्ग न्यायाधीश उच्च न्यायालय बिलासपुर ने कहा था - पहले कबीर के बारे में सुना था, पढ़ा था आज साक्षात सुन रहा हूं, देख रहा हूं। वहां श्री मरहा को काव्य शिरोमणि की उपाधि दी गयी।
विश्वंभर यादव मरहा द्वारा रचित कविताओं के संग्रह प्रकाशन में डॉ. गिरधर शर्मा की भूमिका स्तुत्य है। सहज सरल मिलनसार व्यक्तित्व के धनी विश्वंभर यादव मरहा ने साकेत साहित्य परिषद के कार्यक्रम में आने के लिये कभी अनाकानी नहीं की। मेरा सौभाग्य रहा कि उनके साथ मंच पर मुझे भी
कविता पढ़ने का अवसर मिला। ऐसी प्रतिभा को शत् - शत् नमन।
  • पता- ग्राम पोष्ट - सुरगी, तहसील - जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.) 

शनिवार, 29 जून 2013

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पुरखा : मंदराजी दाऊ




-  कुबेर  -
कुबेर

लोकनाट्य ह वोतकच पुरातन आय जतका मनुष्य के सामाजिक जीवन। सत्य अउ सनातन के खोज म लोक कलाकार मन जउन सपना देखथें अउ वोला मंच म अभिनय के माध्यम ले प्रगट करथे विही  लोकनाट्य ल हम नाचा कहिथन। नाचा कलाकार मन लोक - जीवन से जुड़े अपन अनुभव ल जउन सरलता, सहजता अउ सुंदरता ले प्रस्तुत करथें विही ह नाचा के संप्रेषणीयता के राज आय। एकरे ले नाचा म सामूहिक सम्मोहन के प्रभाव पैदा होथे। देखइया मन नाचा के मोहनी म अतका मोहा जाथे कि रात भर अपन जघा ले टसमस नइ होवंय। लोक संस्कृति के सतरंगी चमक, मनमोहक खुशबू अउ लोकहित के भाव ह नाचा के आत्मा आय। नाचा के कोनों संवाद ह लिखित म नइ रहय। कलाकार मन भुक्त संवेदनात्मक आवेग के भावात्मक ताकत से उत्पन्न विलक्षण हाजिरजवाबी द्वारा प्रसंग अनुसार अपन संवाद ल खुदे बोलत जाथें। इंखर संवाद म हंसी - मजाक तो रहिबेच करथे, समाज के आर्थिक, धार्मिक अउ सामाजिक शोषण - जनित दुख - पीरा ऊपर करारा ब्यंग घला रहिथे।
छत्तीसगढ़ के नाट्य परंपरा ह संसार के सबले पुरातन नाट्य परंपरा आय। रामगढ़ के पहाड़ी म स्थित रंगशाला ल दुनिया के सबले जादा जुन्नेट रंगशाला माने जाथे। फेर नाचा के जउन सरुप ल आज हम देखथन वो ह जादा पुरातन नो हे। पहिली खड़े साज के चलन रिहिस हे। जेवन करके गाँव के कोनो चंउक म सब सकला जावंय। कलाकार मन मुंह मा छुही - कोयला पोत के हाजिर हो जावंय। तबलची, मंजीरहा, चिकरहा, मसालची अउ परी सब मिल के खड़े - खड़े ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया  भजन गावंय। गम्मत नइ होवय। कोनो संगठित नाचा पार्टी नइ रहय। नाचा पार्टी ल संगठित करके वोला आज वाला सरुप देवइया महान लोक - रंगकर्मी, संगीतकार, सुंदर सामाजिक शुचिता अउ सौहाद्र के स्वप्र - द्रष्टा, समाज सुधारक अउ नाचा बर अपन तन - मन - धन ल अर्पित करइया महान विभूति के नाम रिहिस - दाऊ दुलार सिंह साव जउन ल हम मंदराजी दाऊ के नाम से जानथन।
मदराजी दाऊ के जन्म 1 अप्रैल 1911 ई. में राजनांदगांव ले सात किलोमीटर दुरिहा रवेली गाँव के संपन्न मालगुजार परिवार म होय रिहिस। पिताजी के नाव श्री रामाधीन साव  अउ माताजी के नाव श्रीमती रेवती बाई साव रिहिस। इंखर प्राथमिक शिक्षा कन्हारपुरी म होइस। बचपनेच ले इंखर रुचि गाना - बजाना म रिहिस। कहावत हे - होनहार बिरवान के होत चीकने पात। गाँव म कुछ लोक कलाकार रिहिन। इंखरे संगत म पड़ के बचपनेच म ये मन तबला अउ चिकारा बजाय बर सीख गें। वो समय इहां हारमोनियम के नामोनिशान नइ रिहिस।
माता - पिता के इच्छा रिहिस कि बेटा ह पढ़ - लिख के मालगुजारी ल संभालय, फेर बेटा के मन तो नाचा के सिवा अउ कुछू म रमेच नहीं। बाप ल ये सब चिटको नइ सुहावय। बेटा ल हाथ से निकलत देख के वोला फिकर होय लगिस। बेटा ल बांध के रखे खातिर अब वोला एकेच उपाय दिखिस। चौदह साल के बालपन म ही राम्हिन बाई नाव के सुंदर कन्या के संग दुलार सिह के बिहाव कर दिन। फेर मंदराजी के मूड़ म तो नाचा के भूत सवार रहय। दुनियादारी म वो कहाँ बंधने वाला रिहिस ?
दुनिया के कोनो माया - मोह ह मंदराजी दाऊ ल नाचा ले अलग नइ कर सकिन। एक समय वो ह नाचा बर नरियर झोंक डरे रहय। घर म बेटा ह बीमार पड़े रहय। भगवान ल परछो लेना रिहिस। विही दिन बीमार बेटा के सांस टूट गे। पुत्र  - सोग ले बढ़के दुनिया म अउ कोनों दुख नइ होवय, फेर वो तो रिहिस ए युग के राजा जनक वीतरागी। बेटा के लहस ल छोड़ के पहुंचगे नाचा के मंच म। रात भर नाचा होइस। देखइया मन रात भर मजा लूटिन। मदरांजी के मन के दुख ल कोई नइ जान सकिन, न देखइया मन, न संगवारी कलाकार मन। बिहिनिया नाचा खतम होइस। मंदराजी के दूनों आँखी ले तरतर - तरतर आँसू बोहय लगिस। संगवारी मन चकरित हो गें। अइसन रिहिस मदराजी दाऊ ह।
दुलार सिंह ले मंदराजी बने के घला बड़ रोचक किस्सा हे। बचपन म बड़े पेट वाला हट्टा - कट्टा दुलार सिंह ह अंगना म खेलत रहय। तुलसी - चवरा म वइसने एक ठन पेटला मूर्ति ओधे रहय जउन ह मंदरासी मन सरिख दिखय। नाना ह विही ल देख के बालक ल कहि दिस - मदरासी। काकी - भउजी मन ल घला इही नाम ह भा गे अउ दुलार सिंह ह बनगे मदरासी। इही मदरासी ह सुधरत - सुधरत हो गे मंदराजी अउ जहरित हो गे जग म।
नाचा अउ मंदराजी दाऊ अब एक - दूसर के पहिचान बन गें। समाज के कुरीति अउ अंगरेज के गुलामी वोकर मन ल निसदिन कचोटय। मंदराजी दाऊ ह इंखर से लड़े खातिर नाचा ल हथियार बना लिस। अब वो ह नाचा ल अपन मनमाफिक रुप देय बर भिड़गे। 1927 - 28 ई. म वो ह नाचा के प्रसिद्ध कलाकार मन ल जोड़ के नाचा पार्टी बनाय के उदिम शुरु कर दिस। खल्लारी के प्रसिद्ध परी नारद निर्मलकर, प्रसिद्ध गम्मतिहा लोहरा भर्रीटोला के सुकालू ठाकुर अउ खेरथा अछोली के नोहर दास कन्हारपुरी राजनांदगांव के तबलची राम लाल निर्मलकर अउ चिकरहा के रुप म खुद। पांचों झन मिल के नाचा पार्टी के गठन करिन। इही ह पहिली संगठित नाचा पार्टी बनिस।
मंदराजी दाऊ के नांव अब छत्तीसगढ़ म जहरित हो गे। 1930 ई. म वो ह संगवारी मन संग कलकत्ता जा के हारमोनियम लाइस। नाचा म अब पहिली बार हारमोनियम बजे लगिस। नाचा के रंग - ढंग ल दाऊ जी ह अब चुकता बदले ल भिड़गें। नाचा के मंच म अब चंदेवा लगे के शुरु हो गे। बजनिहा मन बर बाजवट माढ़े लगिस। मशाल के जघा गियास बत्ती [पेट्रोमेक्स] जले लगिस। खड़िया अउ हरताल के जघा स्नो पाउडर आ गे। ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया भजन के जघा भाई रे तंय छुआ ल काबर डरे अउ तोला जोगी जानेव रे भाई जइसे गीत बजे लगिस आगू चल के फिल्मी गीत घला आगे। गम्मत होय लगिस अउ इही गम्मत मन म समाज के ढोंग ल उजागर करे के उदिम अउ देश के आजादी होय के बात होय लगिस। नाचा अबरात के दस बजे ले बिहिनिया के होवत ले होय लगिस।
जनता नाचा के दिवानी हो गे। दिन डुबतहच जघा पोगराय बर बोरा - दरी जठे के शुरु हो जाय। दुरिहा - दुरिहा के आदमी गाड़ी - खांसर म जोरा - जोरा के आय। नाचा के लोकप्रियता के हिसाब रायपुर म सन् 50 - 51 म एकर प्रदर्शन से लगाय जा सकथे। डेढ़ महीना तक रोज नाचा होइस। नाचा के समय जम्मों टाकीज मन बंद हो जावंय। टाकीज वाले मन थर खा गें।
मंदराजी ह नाचा अउ नाचा कलाकार मन बर अपन सब कुछ ल होम कर दिस। अंत म सौ एकड़ के मालिक ये दधीचि के पास हारमोनियम के सिवा अउ कुछू नइ बचिस। दाऊ जी ह एक बात हरदम कहय - दुनिया म धन कमाना सरल हे, नाम कमाना कठिन हे। दुनिया म सबो खाली हाथ आथें अउ खालिच् हाथ जाथें, फेर महापुरुष मन अपन नांव ल दुनिया म छोड़ जाथें। उंखर कर्म के महक ह सदा - सदा के लिये समाज म बस जाथे।
दाऊ मंदराजी 24 सितंबर 1984 ई. म ये दुनिया ले बिदा हो गे।
वोकर जन्म स्थान रवेली म वोला भक्ति भाव अर्पित करे बर हर साल 1 अप्रेल के दिन लोक कलाकार मन के मेला लगथे। राज्य सरकार ह वोकर सम्मान म लोक कलाकार मन बर दो लाख रुपिया के मंदराजी सम्मान देथे।
  • पता - व्याख्याता, शास. उच्च. माध्य. विद्या.कन्हारपुरी जिला - राजनांदगांव [छ.ग.]

गुरुवार, 27 जून 2013

अन्तर्वेदना के कवि डॉ. रतन जैन

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ गीतकार एवं साहित्यकार डॉ. रतन जैन को श्रद्धासुमन ....



कवि डॉ. रतन जैन

- वीरेन्द्र बहादुर सिंह -
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह

पिछले लगभग सात दशकों से साहित्य साधना में रत रहे छत्तीसगढ़ के याशस्वी कवि एवं गीतकार डॉ. रतन जैन ने अपनी कविताओं के माध्यम से अंचल में अपनी पृथक पहचान बनायी है। उनकी रचनाएं भले ही प्रकाशन की दृष्टिï से क्षेत्रीयता के दायरे में सिमट कर रह गयी लेकिन उनकी रचनाएं उत्कृष्ट एवं अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं।
छायावादी, प्रगतिशील एवं प्रेरणादायी काव्य गंगा प्रवाहित करने वाले डॉ. रतन जैन का जन्म 02 मई सन्ï 1927 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर में एक दिगम्बर जैन कुलीन व्यवसायी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता श्री बालचंद जैन का निधन हो गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छुईखदान में ही हुई। सन्ï 1942 में झण्डा सत्याग्रह के दौरान एग्लो वर्नाकुलर मिडिल स्कूल छुईखदान में यूनियन जैक उतार कर उनके स्थान पर तिरंगा झण्डा लहराने के कारण डॉ. रतन जैन एवं मेघनाथ कन्नौजे को स्कूल से निकाल दिया गया था। जिसके कारण उनकी स्कूली शिक्षा अधूरी रही। बाद में उन्होंने 1945 में देवधर विद्यापीठ बिहार से 'साहित्य भूषण' एवं 1948 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से 'साहित्य रत्न' की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. जैन को कविता लिखने की प्रेरणा महात्मा गांधी के नोआखाली आंदोलन से मिली। उन्होंने पहली रचना छुईखदान रियासती आंदोलन के दौरान लिखी जो एक सामूहिक गीत था। उनकी रचनाएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वे आकाशवाणी के भी प्रिय गीतकार रहे तथा 1974 से 1992 तक लगातार आकाशवाणी के कवि गोष्ठिïयों में शामिल होते रहे तथा उनकी कविताएं आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी।
डॉ. जैन एक साहित्यकार होने के साथ-साथ एक सफल पत्रकार भी रहे हैं। प्रारंभिक दिनों में वे नागपुर से प्रकाशित साप्ताहिक आलोक में सहसंपादक थे। बाद में वे रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत एवं युगधर्म में लगभग 15 वर्षों तक संवाददाता के रूप में काम किया। उन्हें 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से प्रसिद्घ राष्ट्रकवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी का भी सानिध्य प्राप्त हुआ था। उन्होंने कवि सम्मेलनों के अनेक मंचों पर ख्यातिलब्ध कवि बालकवि बैरागी, माणिक वर्मा, नारायण लाल परमार, वसीम साही, प्रदीप चौबे, लक्ष्मण मस्तुरिया, दानेश्वर शर्मा, यावर हुसैन यावर एवं अशोक शर्मा के साथ काव्य पाठ किया था।
डॉ. रतन जैन हिन्दी साहित्य के अनन्य सेवक थे। बसंत पंचमी सन्ï 1948 को गठित हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के वे संस्थापक सदस्यों में से एक थे। सन् 1961 में समिति का पुनर्गठन होने पर उन्हें सर्वसम्मति से समिति का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने लगातार सात वर्षों तक बड़ी कुशलता के साथ समिति को नयी दिशा दी। 1973 को जब हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की ऐतिहासिक रजत जंयती मनाई गयी तो डॉ. साहब को रजत जयंती समारोह का स्वागत मंत्री बनाया गया। इस अवसर पर प्रकाशित 'स्मारिका' के कलेवर को संवारने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे समिति को संरक्षक के रूप में आजीवन मार्गदर्शन प्रदान करते रहे।
छुईखदान की सेवाभावी संस्था 'प्रेरणा' ने सुदीर्घ साहित्य सेवा के लिए 1995 में डॉ. जैन का सम्मान किया था। हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के स्वर्ण जयंती के अवसर पर 06 फरवरी 1998 को समिति द्वारा उनका सम्मान किया गया। 05 मई 2002 को हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान द्वारा डॉ. रतन जैन के 'अमृत महोत्सव' का आयोजन किया गया। समारोह में डॉ. साहब को अभिनंदन पत्र, स्मृति प्रतीक चिन्ह, शाल एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया। 'अमृत महोत्सव' के मंच से ही प्रस्तावित उद्ïबोधन देते हुए डॉ. रतन जैन के अभिन्न अनन्य एवं हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के पूर्व अध्यक्ष आचार्य रमाकान्त शर्मा ने डॉ. साहब का काव्य संकलन प्रकाशित करने का संकल्प लिया। 2002 में लिया गया यह संकल्प 06 वर्ष बाद फलीभूत हुआ। आचार्य रमाकांत शर्मा के अथक प्रयास और आर्थिक संबल से 82 वर्ष की आयु में डॉ. रतन जैन की चुनिंदा कविताओं का संकलन 'रक्त-पुष्प' का विमोचन 31 मई 2008 को समारोह पूर्वक किया गया। 'रक्त-पुष्प' का प्रकाशन कर हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान ने अपने अग्रज कवि के कालजयी सृजन साधना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सारस्वत उदाहरण प्रस्तुत किया। 'रक्त-पुष्प' की साहित्य जगत में सराहना हुई। डॉ. साहब ने 'रक्त-पुष्प' में कविताओं के चयन एवं संपादन का जिम्मा बड़े विश्वासपूर्वक इन पंक्तियों के लेखक को सौंपा। मुझे उनकी कसौटी पर खरा उतरने का आत्मिक संतोष है।
डॉ. रतन जैन ने अपनी कविताओं में जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, सौंदर्य बोध, जीवन संघर्ष, प्रकृति वर्णन, हास्य-व्यंग्य एवं करूणा को स्थान दिया है। उन्होंने हर प्रसंग, पर्व, त्यौहार, मौसम पर अपनी लेखनी चलाकर साहित्य को समृद्घ किया है।
हिन्दी के शोध निर्देशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गणेश खरे के अनुसार 'डॉ. रतन जैन पीड़ा की उष्मा से संचित धन के कवि हैं। उनकी कविताएं प्रगीत काव्य के अनियंत्रित भावोद्रेकों से युक्त है। उनमें मानवीकरण, कल्पना शीलता, सौंदर्य बोध और जीवन के प्र्रति दायित्वशीलता है, पलायन की भावना कहीं नहीं है।
गीतों में है धनीभूत पीड़ा की हलचल
जब पीड़ा से मन भर जाता,
तब गीत अचानक झर जाता।
पीड़ाओं की बस्ती में ही मैने अपना नीड़ बनाया
म्यान, मौन, वैराग्य, निराश्रित,
जीवन मेरा दग्ध तिरस्कृत।
ये छायावादी तत्व आज भले ही प्रासंगिक न हो पर जब डॉ. रतन जैन अपनी ये रचनाएं लिख रहे थे, तब वे प्रासंगिक भी थे और मूल्यवान भी। और मूल्यवान रचना हर युग में अपने मूल्य की संरक्षा करती है। जहां आत्मवेदना, रहस्य चेतना की भूमिका पर स्थित है यहां पर यह जीवन की विभीषिका के बीच मुखरित हुई है। डॉ. जैन को माखन लाल चतुर्वेदी जैसी महान भारतीय क्रांतिकारी आत्मा का सानिध्य भी कुछ समय तक मिला। उनका प्रभाव डॉ. जैन की रचनाओं में स्थायी रूप से विद्यमान है। पंक्तियां दृष्टब्य है।
मंहगाई की चढ़ी जवानी, अन्यायों का शोर है,
शासक, अपनी मद्मस्ती में बेसुध मस्त विभोर है।
नारों के इस प्रजातंत्र से भूखे सब इंसान है
भरे तिजोरी भ्रष्टाचारी, यह कैसा उत्थान है।
उपरोक्त पंक्तियों में भारतीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आकुलता और देश में बढ़ते हुए भ्रष्ट्राचार तथा नैतिक पतन के प्रति तीव्र आक्रोश है। डॉ. खरे के अनुसार डॉ. जैन की रचनाओं में आत्मपरकता और राष्ट्रीय चेतना के अतिरिक्त तीसरी विशेषता प्राकृतिक परिवेश में नव गीतों का सृजन है। हिन्दी के नवगीतों की श्रृंखला में डॉ. रतन जैन के ये गीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कवि की रचनाओं में फागुनी बयार आमंत्रण बांटता है, महुआ का जाम सबको रसविभोर करता है, सरेआम, आम मौर का मुकुट पहनता है और उन्मादी गीत वासना, गदराई गंध से युक्त सरसों भांवर के लिए बैठ जाती है। कवि को अगहन की धूप दुल्हन की तरह लगती है। यहां की डोली का मलयज, कहार अपने कंधे पर लेकर चल रहे हैं, सौंदर्य और मानवीयकरण की नइ उद्भावनायें है। राष्ट्रीय संचेतना से युक्त निम्न प्रतीकों की योजना भी देखिये-
संकल्पों की सीढ़ी टूटी,
हिंसा के नाखून बढ़े हैं
न्याय वीथियों में भटका है,
द्वार-द्वार अन्याय खड़े हैं।
अभिनंदन होता बबूल का,
बरगद व्याकुल है, निर्जन में,
नागफनी सम्मानित होती,
तुलसी रोती है आंगन में।
शोषण का विषधर विष बोता,
लोकतंत्र के वन-चंदन में।
प्राकृतिक परिवेश से चयनित से प्रतीक डॉ. रतन जैन को हिन्दी नवगीतों की परम्परा से न केवल जोड़ते है, वरन यह सिद्घ भी करते हैं कि ये रचनाएं एक सारश्वत कवि की महत्तम उपलब्धियां है और हिन्दी के नवगीत परम्परा इसे पाकर गौरवान्वित है। डॉ. खरे के अनुसार अंचल में हिन्दी पर शोध करने वाले विधार्थियों को डॉ. रतन जैन की आत्मिक पीड़ा की उन्मा में संचित साहित्य संपदा को भी शोध का विषय बनाना चाहिए।
अंचल के सुपरचित गीतकार डॉ. जीवन यदु के अनुसार छत्तीसगढ़ के वरिष्ठï गीतकार डॉ. रतन जैन अपने गीतों को ओढ़ने-बिछाने वाले रचनाकार हैं। उन्हें किसी विशिष्ट विचारधारा में आबद्घ नहीं किया जा सकता। वे भावों में बहने वाले कवि हैं। रचना के क्षणों में उनके मानस को जिस भाव ने उद्वेलित किया, वह भाव शब्दों का आधार लेकर प्रभावित हो गया। कसक और पीड़ा ही उनके गीतों की जननी है। 'वियोगी होगा, पहला कवि, विरह से उपजा होगा गानें जैसी पारम्परिक काव्य सिद्घांत को उनके गीतों में ढूढ़ लेना मुश्किल नहीं है। वे हृदय की कोमल और करूणाजन्य भावनाओं के शिल्पी हैं। डॉ. रतन जैन के लेखन का प्रारंभ उस काल में हुआ है, जब छायावादी कविताओं का वर्चस्व रहा है। अत: छायावाद की छाया का आच्छादन भी डॉ. रतन जैन के गीतों पर दिखाई देता है। डॉ. जैन की शैली एवं शिल्प पर छायावादी असर है। डॉ. जैन की कविताएं क्रमश: यह बात किसी से मत कहना, विश्वास चाहिए, नवल गीत तू गा दे, जागरण गीत जैसे जन संबोधित गीत तथा फागुनी बयार, आया बसंत है, फागुन का व्याकरण, पावस गीत जैसे प्रकृति समर्पित गीत उनकी पुष्टï रचनाएं है।
डॉ. यदु  का स्पष्टï मानना है कि डॉ. रतन जैन का काव्य संकलन रक्त-पुष्प इस अर्थ में महत्वपूर्ण और अर्थवान है कि छत्तीसगढ़ की गीत परम्परा के शोधार्थियों को इस संग्रह से होकर गुजरना ही पड़ेगा क्योंकि डॉ.रतन जैन उन गीत शिल्पियों में है जिन्होंने गीत की गगनचुम्बी इमारत की नींव में अपने भावों के कुछ सार्थक पत्थर डाले हैं।
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति जगदलपुर के अध्यक्ष एवं कवि हुकुमदास 'अचिंत्य' का मानना है कि डॉ. जैन ने कविताओं के माध्यम से अपने भीतर धधक रहे दावानल को मौलिक एवं मार्मिक ढंग से रेखांकित किया है। दर्द की पराकाष्ठा उनकी इन पंक्तियों में उभर कर परिलक्षित होती है।
शूल भरी जीवन पगडण्डी,
हारा थका रिक्त राही हूं,
आंसू से गीले आंचल से
जन्मी कविता की स्याही हूं।
इन पंक्तियों में कवि की गहन वेदना की झलक मिलती है। प्रकृति सौंदर्य पर उनकी कलम उसी धारा प्रवाह के साथ चली है। 'अगहन की धूप' शीर्षक रचना में सौंदर्य श्रृंगार की बानगी देखते ही बनती है।
रस भरे कापोल अरूण आमंत्रण ओंठ
मार रही चुपके से चितवन की चोट।
अल्हड़ है मधुर-मधुर गदराया रूप
दुल्हन सी लगती है अगहन की धूूप।
इन दृश्यों में सर्वथा नवीनता है और उपमानों में मौलिकता स्पष्टï रूप से से दृष्टिïगोचर हो रही है। डॉ. जैन ने प्रकृति का मानवीकरण और सौंदर्यबोध की नई परिकल्पना को साकार किया है।
देश में बढ़ते हुए, भ्रष्ट्राचार और समाज के हर क्षेत्र में आयी नैतिक गिरावट के प्रति डॉ. जैन ने तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। वर्तमान के बदलते हुए परिदृश्य पर कटाक्ष करती ये पंक्तियां दृष्टïव्य है।
नाविक बदले, धार न बदली,
जीर्ण-शीर्ण जलपोत वही है,
वही शक्ति, अभिव्यक्ति पुरानी,
शोषण के सब स्त्रोत वही है।
गीत वही है छंद वही है,
केवल युग के स्वर बदले हैं,
परिवर्तन के संग्रह में बस
पृष्ठों के अक्षर बदले है।
डॉ. जैन आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाले गीतकार हैं। जहां आदमी विषमता को लेकर अपने वर्तमान से नाखुश रहता है। 'ये बात किसी से मत कहना'  शीर्षक रचना में कवि ने वर्तमान व्यवस्था पर करारी चोट की है-
कौए मोती यहां खा रहे आजादी के,
और हंस आंसू पीते हैं बर्बादी के।
यहां गरीबी नारों से ही भाग गई है
और अमीरी एक रात में जाग गई है।
श्री अचिंत्य के अनुसार डॉ. जैन ने जिस तेवर की रचनाएं लिखी है वह हिन्दी के गीत विधा पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
डॉ. रतन जैन से पिछले छह दशकों से रचनात्मक जुड़ाव रखने वाले हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के पूर्व अध्यक्ष एवं 'रक्त-पुष्प' को पाठकों के सामने लाने वाले आचार्य रमाकांत शर्मा के अनुसार डॉ. जैन छंदधर्मी कविता के पोषक है। रस छंद और अलंकार का प्रयोग कर उन्होंने अपनी कविताओं और गीतों को हृदयग्राही बनाने का प्रयास किया। स्वाघ्याय के बल पर उन्होंने अत्यंत उच्चकोटि की रचनाएं लिखी। आचार्य शर्मा का मानना है कि छत्तीसगढ़ में कवियों की कुछ ऐसी पीढ़ी ने भी जन्म लिया जिनकी रचनाएं प्रकाशन के अभाव में चर्चित नहीं हो पायी। प्रकाशित हुई भी तो आंचलिक पत्र-पत्रिकाओं में। यही कारण है कि कई रचनाएं कालजयी होते हए भी प्रचार-प्रचार के अभाव में देशव्यापी ख्याति प्राप्त नहीं कर पायी। इसके बावजूद अनेक साहित्य साधक अपनी मौन साहित्य साधना में जुटे रहे। डॉ. रतन जैन ऐसे ही तपस्वी साहित्य साधक है। आचार्य शर्मा का दावा है कि डॉ. साहब की रचनाएं किसी भी दृष्टिïकोण से छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत, पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर एवं महादेवी वर्मा से कमतर नहीं है। उन्हें इस बात का खेद है कि डॉ. रतन जैन जैसा तपस्वी साहित्य साधक एक अंचल तक सिमट कर रह गया।
हिन्दी साहित्य के भंडार में पांच सौ कविताएं और सौ से ज्यादा कहानियों का योगदान देने वाले डॉ. रतन जैन का अभी हाल ही में विगत 13 जनवरी 2011 को उनके गृह नगर छुईखदान में देहावसान हो गया। उन्हीं की पंक्तियों के साथ उन्हें श्रद्घासुमन समर्पित है -
चाहता हूं मौत पर बस गीत कफन हो
अगला जनम हो तो यही मेरा वतन हो।

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