सहारनपुर । साहित्यिक
संस्था 'साहित्य चेतना मंच', सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) ने अपने चतुर्थ
"ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान" के लिए दस नामों की घोषणा की।
साहित्य चेतना मंच के अध्यक्ष डॉ. नरेन्द्र वाल्मीकि ने बताया कि यह सम्मान
लेखकों के साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों को ध्यातव्य में रखकर चयनित किया
जाता हैं। इस बार उत्तर प्रदेश से डॉ. एन. सिंह, सोहन लाल 'सुबुद्ध' और
सुरेश सौरभ, राजस्थान से जयप्रकाश वाल्मीकि, झारखंड से अजय यतीश, दिल्ली से
प्रो. लालचन्द राम और डॉ. प्रेम कुमार, तेलंगाना से डॉ. जगदीश चन्द्र
सितारा, पंजाब से डॉ. नविला सत्यादास और बिहार से बिभास कुमार का नाम चयनित
किया गया है। बता दे कि साहित्य मनीषियों के उत्कृष्ट योगदान हेतु
'ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान' 30 जून को साहित्यकार ओमप्रकाश
वाल्मीकि जी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है। संस्था के
महासचिव श्याम निर्मोही ने बताया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के विचारों को जन-जन
तक पहुचना हमारा उद्देश्य है। संस्था सचिव रमन कुमार ने बताया कि यह
सम्मान 30 जून 2023 को वेब कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।
इस अंक के रचनाकार
.
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2023
मंगलवार, 29 नवंबर 2022
आदिवासी पर अन्याय और तकनीक से बदलतीदुनिया पर गहमागमी चर्चा
समय से संवाद के विमोचन पर न्यायपालिका, मानवाधिकार और तकनीक पर गहमागहमी
आदिवासियों पर अन्याय और तकनीक से बदलती दुनिया पर गहमागहमी भरी चर्चा
पटना पुस्तक मेले में इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से संवाद
गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने किया ‘समय से संवाद’ पुस्तक का लोकार्पण
पटना
पुस्तक मेला में प्रेम कुमार मणि और प्रमोद रंजन
द्वारा सम्पादित पुस्तक ' समय से संवाद : जन विकल्प संचयिता' पुस्तक का
लोकार्पण गहगहमी भरे माहौल में किया गया. पुस्तक का लोकार्पण मानवाधिकार
कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, प्रख्यात कवि आलोकधन्वा किया गया. लोकार्पण
समारोह में बड़ी संख्या में पटना के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, सामाजिक
कार्यकर्ता और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे.
सर्वप्रथम
प्रेम कुमार मणि ने पुस्तक के संबंध में बताया "मेरे व प्रमोद रंजन के
संपादन में 'जनविकल्प' पत्रिका निकलती थी। इसके 11अंक निकले थे. उसी
पत्रिका में छपे लेखों को लेकर यह किताब छपी है।” उन्होंने कहा कि
“जनविकल्प में प्रकाशित चुनिंदा सामग्री का यह संकलन इक्कसवीं सदी के पहले
दशक की सामाजिक,साहित्यिक, और राजनीतिक हलचलों का दस्तावेजीकरण है।”
मानवाधिकार
कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने कहा “मेरे ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने पांच लाख
का जुर्माना लगाया। हमने कहा कई जुर्माना नहीं देंगे भले हमें आप
गिरफ्तार की कीजिये। बस्तर में 16 लोगों की हत्या कर दी गई थीं। एक बच्चे
की उंगली काट दी गई थी, एक औरत के सर पर चाक़ू मार दिया था। मैं उसी
मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा आपको पुलिस की
जांच पर भरोसा करना चाहिए थे। मैंने कहा कि यहां पुलिस ही तो आरोपी
है। तब फिर वह कैसे जांच करेगी। मैंने 519 मामले सौंपे हैं सुरक्षा बलों
के अत्याचार के यह बात ह्यूमन राइट्स संगठनों ने किया था। पर सरकार
द्वारा जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। गांधी और भगत सिंह दोनों ने
एकन्ही बात की थीं। जब भगत सिंह को फांसी दी थी तो पंजाब के गर्वनर को
खत्म लिखा था कई जनता पर युद्ध थोपा गया है और युद्ध जनता की निर्णायक
विजय के साथ ही समाप्त होगा। गांधी जी के अनुसार अंग्रेज़ी विकास का
मॉडल शैतानी मॉडल है प्रकृति ने सबको बराबर दिया है इस विकास के मॉडल
में ताकतवर का ही विकास हो सकता है। अंग्रेज़ अपने विकास को मॉडल को
फैलाने के लिए दुनिया भर में खून बहाते रहे हो। गांधी ने एकनदिन यह भी
कहा था कि एक दिन अपने लोगों के खिलाफ आप युद्ध करेंगे। सुरक्षा बल
छट्ठीसगढ़ में प्राकृतिक संसाधनों को लूटने गई है। देश के प्राकृतिक
संसाधनों का मालिक समुदाय यानी जनता है यदि किसी पूंजीपति को जमीन
चाहिए तो उसके लिए पुलिस किसानों पर गोली चलाती है और जेल में डालती
है। सरकार की तरफ से जो भी बंदूक ले का आ रहा है वह संसाधन पर कब्जा करना
चाहता है। सरकार ने संसाधन पर कब्जा और श्रम लूटने के लिए युद्ध थोप रहा
है यहीँ बात भगत सिंह कह रहे थे. हमारे सिपाही आदिवासी इलाकों में
क्यों गए हैं? वे उनके संसाधनों को लूटने गए हैं. आज पूरी दुनिया में
पूंजीवाद संकट है। यहां के पूंजीपति सिर्फ आदिवासी इलाकों पर ही नहीं
बल्कि कृषि क्षेत्र में घुसेगा। यह आपके बैंक के पैसा, रोजगार पर कब्जा
करती हैं। उसके लिए जाति व धर्म पर लड़ाने की बात करती है। सस्ती शिक्षा
माँगने वाले बच्चों के माथे फोड़ देता है जैसा जे.एन. यू के साथ किया
गया।"
उन्होंने कहा कि “आज सरकारें और
पूंजीपतियों का गठजोड़ जिस प्रकार का अन्याय आदिवासियों के साथ कर रहा है,
उसका विरोध शहरी मध्यम वर्ग नहीं करता। उन्हें लगता है कि जो आदिवासियों के
साथ हो रहा है, वह हमारे साथ कभी नहीं होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। ये ताकतें
हमारी कृषि समेत सभी कुछ को कब्जे में लेंगी तब मध्यम वर्ग को अपनी गलती
का अहसास होगा।” उन्होंने कहा कि “दुनिया के कई विकसित देशों की चमक दमक के
पीछे वहाँ के आदिवासियों का खून लगा हुआ है।अमेरिका आस्ट्रेलिया कनाडा
जैसे देशों में दूसरे देश से आये गोरों ने वहाँ रहने वाले आदिवासियों की
हत्याएं करी और उनके जंगलों खनिजों और पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया इन देशों
में एक आदिवासी की लाश लाने पर इनाम मिलता था। आज भारत में भी पूंजीपति
घरानों और सरकारों की साठगांठ से आदिवासियों को उनके जंगल और जमीन से बेदखल
किया जा रहा है। भारत में भी सरकारों ने आदिवासियों को नक्सली घोषित कर
दिया है।एक आदिवासी को मारने या उसे जेल में बंद करने वाले पुलिस अधिकारी
को इनाम और तरक्की मिलती है।”
प्रमोद रंजन ने कहा
कि “जनविकल्प के के प्रकाशन के 15 साल बीत चुके हैं और, इस बीच भी काफी
कुछ बदल चुका है। कोरोना वायरस महामारी की आड़ में इन बदलावों को एक ऐसी
आंधी का रूप दे दिया गया, जिसमें बहुत दूर तक देख पाना कठिन हो रहा है।
लेकिन, हम इतना तो देख ही सकते हैं कि मानव-सभ्यता के एक नए चरण का आगाज हो
चुका है। स्वाभाविक तौर पर इन परिवर्तनों से, विचार और दर्शन की दुनिया भी
बदल रही है। इसका दायरा मनुष्योन्मुखी संकीर्णता का त्याग कर समस्त
जीव-जंतुओं और बनस्पितयों तक फैल रहा है। एंथ्रोपोसीन और उत्तर मानववाद
जैसी विचार-सरणियों के तहत इनपर जोरशोर से विमर्श हो रहा है। हमें इन
परिवर्तनों को एक आसन्न संकट की तरह नहीं, बल्कि परिवर्तन की अवश्यंभावी
प्रक्रिया के रूप लेना चाहिए और इसके उद्देश्यों की वैधता पर पैनी नजर रखनी
चाहिए। लेकिन दुखद है कि हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के साहित्य और वैचारिकी
में इसकी गूंज सुनाई नहीं पड़ रही।” उन्होंने मौजूदा लेखन की प्रवृत्तियों
की आलोचना करते हुए कहा कि “कालजयिता के चक्कर में हम प्रासांगिकता को
भूल जा रहे हैं, जबकि लेखन के चिरजीवी होने के लिए इसका सबसे अधिक महत्व
है।” उन्होंने कहा कि “आज से 15 साल पहले वैश्वीकरण के बारे यह स्टैंड
लिया था कि हमें अपनी शर्तो के साथ उसमें शामिल होना चाहिए था। जब यह
पत्रिका छपती थी तब हमने मीडिया के साम्राज्य पर बाद की थी। हमारी हिंदी
की दुनिया सोशल मीडिया और उसका अलगोरिद्म कैसे काम करता है। यह तकनीक के
अलगोरिद्म का प्रभाव है कि जातिवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले
लडके आज जाति जे गहवर में फंसे हैं।"
लोकार्पण
समारोह में मौजूद लोगों में प्रमुख थे अतुल माहेश्वरी जफर इक़बाल, पंकज
शर्मा, दानिश, संतोष, राघव शरण शर्मा, बिद्युतपाल, राकेश रंजन, मनोज
कुमार, अशोक कुमार क्रांति, प्रणय प्रियंवद, जयप्रकाश, विनीत राय, गौतम
गुलाल, सामजिक कार्यकर्ता संतोष आदि।
*पुस्तक के बारे में*
अनन्य
प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘समय से संवाद’ मासिक पत्रिका ‘जन विकल्प'
में प्रकाशित चुने हुए लेखों और साक्षात्कारों का संकलन है। जन विकल्प का
प्रकाशन प्रेमकुमार मणि और प्रमोद रंजन के संपादन में पटना से जनवरी 2007
में आरंभ हुआ था और इसका अंतिम अंक उसी वर्ष दिसंबर में आया था। उस सयम इस
पत्रिका की जनपक्षधरता, निष्पक्षता और मौलिक त्वरा ने समाजकर्मियों और
बुद्धिजीवियों को गहराई से आलोड़ित किया था।
पुस्तक
में 42 अध्याय हैं, जिन्हें छह भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग
में 11 अध्याय हैं, जिसमें प्रेमकुमार मणि द्वारा जन विकल्प में लिखी गई
संपादकीय टिप्पणियाँ हैं। दूसरे भाग में 7 अध्याय हैं। जिसमें ‘आधुनिक
हिंदी की चुनौतियां' (अरविंद कुमार),‘बौद्ध दर्शन के विकास और विनाश के
षड्यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्त्राब्दी’ (तुलसी राम), ‘प्राचीन भारत
में वर्ण व्यवस्था और भाषा' (राजू रंजन प्रसाद), ‘ऋग्वैदिक भारत और संस्कृत
: मिथक एवं यथार्थ' (राजेंद्र प्रसाद सिंह), ‘आधुनिक हिंदी की चुनौतियां'
(अरविंद कुमार), ‘खड़ी बोली का आंदोलन और अयोध्या प्रासाद खत्री’ (राजीव
रंजन गिरि), ‘उत्तरआधुनिकता और हिंदी का द्वंद्व’ (सुधीश पचौरी), ‘बहुजन
नजरिये से 1857का विद्रोह’ (कंवल भारती) के लेख शामिल हैं। किताब के तीसरे
भाग में 14 अध्याय हैं। इसमें “गीता : ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना का
षड्यंत्र” (प्रमोद रंजन), “दंडकारण्य: जहां आदिवासी महिलाओं के लिए जीवन का
रास्ता युद्ध है” (क्रांतिकारी आदिवासी महिला मुक्ति मंच का वक्तव्य,
“संविधान पर न्यायपालिका के हमले के खिलाफ.” (शरद यादव), “सच्चर रिपोर्ट की
खामियां” (शरीफ कुरैशी), “माइक थेवर को जानना जरूरी है” (रवीश कुमार),
‘मैं बौद्ध धर्म की ओर क्यों मुड़ा’ (लक्ष्मण माने), ‘पेरियार की दृष्टि में
रामकथा’ (सुरेश पंडित), ‘मार्क्स को याद करते हुए' (राजू रंजन प्रसाद),
‘जनयुद्ध और दलित प्रश्न’ (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल), ‘हाशिये के लोग और
पंचायती राज्य अधिनियम' (लालचंद ढिस्सा), ‘सामाजिक जनतंत्र के सवाल'
(प्रफुल्ल कोलख्यान), प्रेमचंद की दलित कहानियां : एक समाजशास्त्रीय
अध्ययन’ (धीरज कुमार नाइट), ‘मुक्ति संघर्ष के दो दस्तावेज’ (रेयाज-उल-हक),
‘राजापाकर काण्ड’ (नरेंद्र कुमार) आदि हैं।
किताब
के भाग चार में 10 ऐसे इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों, फिल्मकारों और
जन-बुद्धिजीवियों के साक्षात्कार शामिल किए गए हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र
में महारत रखते हैं। इस खंड में ‘प्राय: मानवीय मुद्दों को नजरअंदाज कर
दिया जाता है’(अमर्त्य सेन), ‘जाति केवल मानसिकता नहीं’ (योगेंद्र यादव),
‘भूमंडलीकरण को स्वीकार करना होगा (बिपन चंद्र), ‘वैश्वीकरण के साथ खास तरह
के संवाद की जरूरत’ (सीताराम येचुरी), ‘हम जनता की लामबंदी में यकीं रखते
हैं' (गणपति), ‘यह सीधे-सीधे युद्ध है और हर पक्ष अपने हथियार चुन रहा है’
(अरुंधती रॉय), ‘पाँच सौ वर्ष पुराना है कश्मीर की गुलामी का इतिहास’ (संजय
काक), ‘भारतीय इतिहास लेखन मार्क्सवादी नहीं, राष्ट्रवादी है’ (सुधीर
चंद्र), ‘साहित्य प्रायः उनका पक्ष लेता है जो हारे हुए हैं’ (अरूण कमल)
आदि के साक्षात्कार भी शामिल हैं।
भाग पाँच में
‘यवन की परी’ कविता पुस्तिका को प्रकाशित किया गया है। इसमें ‘एक खत
पागलखाने से’ शीर्षक से एक अनाम कवि की कविता है। यह कवयित्री किसी अज्ञात
यवन देश के पागलखाने में कैद थी। वह कवियित्री कौन थी, क्या करती थी, यह
कोई नहीं जानता। उसने पागलखाने में आत्महत्या करने से पहले यह कविता लिखी
थी। अक्का महादेवी और मीरा की काव्य-परंपरा की याद दिलाने वाली यह कविता
अपनी शुरुआती पंक्तियों से ही विज्ञान, ईश्वर, साहित्य, संगीत, कला और
युद्ध की निरर्थकता को अपने वितान में समेटे में इतने ठंडे लेकिन तूफानी
आवेग से आगे बढ़ती है कि हम सन्न रह जाते हैं।
पुस्तक के अंतिम भाग में जन विकल्प में प्रकाशित सामग्री की सूची और विमोचन से संबंधित समाचार व समीक्षाएं उद्धृत हैं।
जैसा
कि पुस्तक के फ्लैप पर भी कहा गया है, यह किताब धर्म, विज्ञान, भाषा,
इतिहास और पुनर्जागरण पर केंदित सामग्री नए तथ्यों को एक कौंध की तरह इतने
नए दृष्टिकोण के साथ पाठक के सामने रखती है कि अनेक मामलों में सोच का
पारंपरिक ढांचा दरकने लगता है। इसमें शामिल अनेक लेख उन हाशियाकृत समाजों
के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्षों को शिद्दत से सामने लाने की
कोशिश करते हैं, जिन्हें मौजूदा अस्मिता विमर्श में भी जगह नहीं मिल सकी
है। यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन करने वालों के लिए तो एक आवश्यक संदर्भ ग्रंथ है ही, इक्कीसवीं
सदी के आरंभ में जारी राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक हलचलों काे समझने के
लिए भी उपयोगी है।
सोमवार, 7 मार्च 2022
डॉ नीलम महेंद्र को अहिन्दी भाषी हिंदी सेवा सम्मान
अखिल
भारतीय साहित्य परिषद से सम्बद्ध मध्यभारतीय हिंदी साहित्य सभा, ग्वालियर
द्वारा आयोजित कार्यक्रम में डॉ नीलम महेंद्र जी एवं श्री हरिहर शर्मा जी
साहित्य सभा द्वारा वर्ष 2021 के लिए साहित्य में विशेष योगदान करने हेतु
सम्मानित किया गया ।
विवेकानंद मार्ग राष्ट्रोत्थान न्यास भवन ग्वालियर में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय संगठन मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद श्रीयुत श्री श्रीधर पराड़कर ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व आकाशवाणी उद्घोषक श्री श्यामलाल सरीन एवं मुख्य वक्ता के रूप में विश्व संवाद केंद्र के पूर्व निदेशक श्री हरिहर शर्मा जी उपस्थित थे।
drneelammahendra@media.ind.inबुधवार, 18 अगस्त 2021
विचार गोष्ठी : आदमी स्वर्ग से
( पाठक मंच खैरागढ़ )
विगत दिनों दिनांक 09-08-2021 दिन सोमवार को पाठक मंच खैरागढ़ के तत्वाधान में छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन से आयी श्री विष्णु नागर की चर्चित उपन्यास 'आदमी स्वर्ग पर ' पर विचार गोष्ठी पेंसनर भवन दाऊचौरा में संपन्न हुई।
विचार गोष्ठी में आधार व्यक्तव्य में श्री संकल्प यदु ने कहा कि मौजूदा हालात में उपजी संकीर्ण मानसिकता को देखते हुए यह उपन्यास हिंदू धर्म के स्वर्ग-नरक की मान्यताओं के खिलाफ प्रयास लगता है जबकि स्वर्ग नरक कल्पना लगभग सभी धर्मों में है । नागर जी ईश्वर - स्वर्ग के फैंटेसी का आश्रय लेकर मनुष्यता को लगातार चोट पहुंचाते मानवीय प्रवृत्ति गैदमल जैसो पर व्यंग्यात्मकता प्रहार करते हैं और समकालीन व्यवस्थाओं की पहचान कराते हैं । यह उपन्यास स्वर्ग-ईश्वर की फैंटेसी का आश्रय लेकर मानवता और मनुष्यता के अंतर्संबंध और अंतर्द्वंद की पहचान कराती कथा है ।
विचार गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए श्री सुविमल श्रीवास्तव ने कहा कि मनोविकार से ग्रस्त आदमी वर्तमान से चूक जाने के बाद सुविधा सम्पन्न होने पर कल्पना भोग कर यथार्थ को समझने में असमर्थ हो असामान्य जीवन जीता है ।श्री टी. ए. खान ने कहा कि धर्मों के स्वर्ग -नर्क के डर को आधार बनाकर अपनी बात कहते हैं और पशु-पक्षियों, पेड़ का स्वर्ग में वर्णन उपन्यास को नया रूप देता है। श्री बलराम यादव ने कहा कि चापलूसी करके बड़े बनने की प्रवृति इस उपन्यास का आधार है। यह प्रवृत्ति आज हमारे आसपास ज्यादा दिखाई देती है । स्वर्ग की कल्पना उपन्यास को रोचक बनाता है ।
श्री तीरथ चंदेल ने कहा की आज के समय में श्री विष्णु नागर जी का यह उपन्यास प्रासंगिक है । स्वर्ग-नर्क के बहाने हमारे समाज की पड़ताल करते हैं। श्री कमलाकांत पाण्डेय ने कहा कि लेखक की लेखन शैली में कल्पना उपन्यास को रोचक बनाते हैं । मूल बात पाठक के दिलो-दिमाग मे गहरी पैठ बनाती है ।
श्री विनय शरण सिंह ने कहा कि हर धर्म में स्वर्ग नरक की अवधारणा को लेकर ढेर सारे आडंबर रचे गए । लगभग सभी व्यंग कारों ने इस पर लिखा और इस उपन्यास मैं मैं भी यही दिखाई देता है । स्वर्ग की पौराणिक मान्यताओं को सभी जानते हैं और इसे भुनाया भी जाता है। गैंदमल के सहारे हमारे समय के यथार्थ को धरातल पर इस उपन्यास में उतारा गया है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ प्रशांत झा ने कहा कि मानव की स्वेच्छा चरित्र पर इस उपन्यास में जबरदस्त व्यंग नागर जी ने किया है ।
गोष्ठी को पूर्णता प्रदान करते हुए डॉ.जीवन यदु ने कहा कि डर से उपजे धर्म के चरित्र गठन के आधार पर यह बेजोड़ उपन्यास है। मानव की प्रवृति के इसी सत्य को कल्पना के सहारे कहने का सार्थक प्रयास नागर जी ने किया है ।
डॉ. प्रशांत झा
संयोजक
पाठक मंच खैरागढ़
सोमवार, 6 जनवरी 2020
वीरेन्द्र आस्तिक को 'साहित्य भूषण सम्मान'
लखनऊ : लखनऊ में सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित सम्मान समारोह में विख्यात कवि एवं आलोचक श्री वीरेंद्र आस्तिक (कानपुर) को 'साहित्य भूषण सम्मान' (दो लाख रुपये) से अलंकृत किया गया। आस्तिक जी को यह सम्मान माननीय विधानसभा अध्यक्ष डॉ हृदय नारायण दीक्षित के कर-कमलों से प्रदान किया गया।
इस अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि साहित्य समाज का मार्गदर्शक होता है। साहित्य का अर्थ है, जिसमें सबका हित हो। साहित्य के माध्यम से ही हम किसी समाज, राष्ट्र व संस्कृति को संबल प्रदान कर सकते हैं। साहित्यकार को समाज की ज्वलंत समस्याओं को रचनात्मक दिशा देने का प्रयास करना चाहिए। जब हम अपनी लेखनी को खेमे, क्षेत्रीयता व जातीयता में बांटने का प्रयास करेंगे, तो इससे साहित्यिक साधना भंग होगी। साथ ही समाज व देश का बड़ा नुकसान होगा।
सोमवार को लखनऊ में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा जब आस्तिक जी को 'साहित्य भूषण सम्मान' से सम्मानित किया गया, तब उन्हें और उनके परिवार को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ देने वालों का तांता लग गया। नवगीत सृजन एवं आलोचना के जरिए ख्याति प्राप्त करने वाले श्री वीरेंद्र आस्तिक मानते हैं कि नवगीत मूलत: गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है। गीत वास्तव में ऋग्वेद से विरासत में मिला है जोकि अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर आज समकालीन संदर्भो को समोकर नवगीत के रूप में लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है। आज के दौर में नवगीत के क्षेत्र में लगातार युवा चेहरे आ रहे हैं। इनकी सोच भी काफी अच्छी है और वे चीजों को अलग तरीके से देख रहे हैं। इसलिए नवगीत इस समय तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है।
'धार पर हम- एक और दो' के प्रकाशन से जबरदस्त ख्याति पाने वाले आस्तिक जी कहते हैं कि उन्होंने 1964 में एयरफोर्स ज्वाइन किया। इसके बाद 1970 से उन्होंने लेखन का कार्य शुरू किया। 1974 में एयरफोर्स छोड़ने के बाद 1975 से टेलीफोन विभाग में कार्य किया और 2007 में बीएसएनएल से सेवानिवृत्त हुए। वह मुख्य रूप से कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील के रहने वाले हैं। 'परछाईं के पांव', 'आनंद! तेरी हार है', 'तारीखों के हस्ताक्षर', 'आकाश तो जीने नहीं देता', 'दिन क्या बुरे थे', 'गीत अपने ही सुनें' आदि काव्य-कृतियों ने उन्हें नई ऊंचाई पर पहुंचाया। हाल ही में उनकी आलोचना पुस्तक - 'नवगीत : समीक्षा के नए आयाम' के जरिए उन्होंने नवगीत क्या है, इसे समझने-समझाने का प्रयास किया।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. सदानंद प्रसाद गुप्त , डॉ. भगवान सिंह, डॉ. मनमोहन सहगल, जलशक्ति मंत्री श्री महेंद्र सिंह, डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा, डॉ. उषा किरण खान , डॉ. कमल कुमार, डॉ. ओम प्रकाश पांडेय, आचार्य श्री श्यामसुन्दर दुबे, आचार्य श्री रामदेव लाल विभोर, डॉ रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' आदि गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।
इस अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि साहित्य समाज का मार्गदर्शक होता है। साहित्य का अर्थ है, जिसमें सबका हित हो। साहित्य के माध्यम से ही हम किसी समाज, राष्ट्र व संस्कृति को संबल प्रदान कर सकते हैं। साहित्यकार को समाज की ज्वलंत समस्याओं को रचनात्मक दिशा देने का प्रयास करना चाहिए। जब हम अपनी लेखनी को खेमे, क्षेत्रीयता व जातीयता में बांटने का प्रयास करेंगे, तो इससे साहित्यिक साधना भंग होगी। साथ ही समाज व देश का बड़ा नुकसान होगा।
सोमवार को लखनऊ में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा जब आस्तिक जी को 'साहित्य भूषण सम्मान' से सम्मानित किया गया, तब उन्हें और उनके परिवार को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ देने वालों का तांता लग गया। नवगीत सृजन एवं आलोचना के जरिए ख्याति प्राप्त करने वाले श्री वीरेंद्र आस्तिक मानते हैं कि नवगीत मूलत: गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है। गीत वास्तव में ऋग्वेद से विरासत में मिला है जोकि अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर आज समकालीन संदर्भो को समोकर नवगीत के रूप में लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है। आज के दौर में नवगीत के क्षेत्र में लगातार युवा चेहरे आ रहे हैं। इनकी सोच भी काफी अच्छी है और वे चीजों को अलग तरीके से देख रहे हैं। इसलिए नवगीत इस समय तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है।
'धार पर हम- एक और दो' के प्रकाशन से जबरदस्त ख्याति पाने वाले आस्तिक जी कहते हैं कि उन्होंने 1964 में एयरफोर्स ज्वाइन किया। इसके बाद 1970 से उन्होंने लेखन का कार्य शुरू किया। 1974 में एयरफोर्स छोड़ने के बाद 1975 से टेलीफोन विभाग में कार्य किया और 2007 में बीएसएनएल से सेवानिवृत्त हुए। वह मुख्य रूप से कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील के रहने वाले हैं। 'परछाईं के पांव', 'आनंद! तेरी हार है', 'तारीखों के हस्ताक्षर', 'आकाश तो जीने नहीं देता', 'दिन क्या बुरे थे', 'गीत अपने ही सुनें' आदि काव्य-कृतियों ने उन्हें नई ऊंचाई पर पहुंचाया। हाल ही में उनकी आलोचना पुस्तक - 'नवगीत : समीक्षा के नए आयाम' के जरिए उन्होंने नवगीत क्या है, इसे समझने-समझाने का प्रयास किया।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. सदानंद प्रसाद गुप्त , डॉ. भगवान सिंह, डॉ. मनमोहन सहगल, जलशक्ति मंत्री श्री महेंद्र सिंह, डॉ. अरिबम ब्रजकुमार शर्मा, डॉ. उषा किरण खान , डॉ. कमल कुमार, डॉ. ओम प्रकाश पांडेय, आचार्य श्री श्यामसुन्दर दुबे, आचार्य श्री रामदेव लाल विभोर, डॉ रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' आदि गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।
Abnish Singh Chauhan, M.Phil & Ph.D
Professor&PrincipalBIUCollege of Humanities & JournalismBareilly International UniversityBareilly-243006 (U.P.) India
Editor : Creation and Criticism(www.creationandcriticism.com)
Editor : International Journal of Higher Education and Research (www.ijher.com)
संपादक : पूर्वाभास (www.poorvabhas.in)
Professor&PrincipalBIUCollege of Humanities & JournalismBareilly International UniversityBareilly-243006 (U.P.) India
Editor : Creation and Criticism(www.creationandcriticism.com)
Editor : International Journal of Higher Education and Research (www.ijher.com)
संपादक : पूर्वाभास (www.poorvabhas.in)
शनिवार, 24 अगस्त 2019
पुरस्कार हेतु पुस्तकें आमंत्रित
राष्ट्रीय ख्याति के बाईसवें अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति पुरस्कारों हेतु कृतियाँ आमंत्रित
साहित्य सदन, भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के बाईसवें अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं। उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग्य, निबंध एवं बाल साहित्य विधाओं में, प्रत्येक विधा के लिए इक्कीस सौ रुपये राशि के साहित्य - पुरस्कार प्रदान किये जाएँगे। दिव्य - पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ, लेखक के दो छायाचित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा। हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रा अवधि 1 जनवरी 2015 से लेकर 31 दिसंबर 2018 के मध्य होना चाहिए।
राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठापूर्ण, चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति पत्रों से सम्मानित किया जाएगा। श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादकों को भी दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जाएँगे। अन्य जानकारी हेतु उपरोक्त पते एवं मोबाईल पर सम्पर्क किया जा सकता है। पुस्तकें प्रेषित करने का पता है - श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन, 145,ए साईंनाथ नगर, सी - सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल - 462042 पुस्तकें प्राप्त होने की अंतिम तिथि है 30 दिसंबर 2019 है।
साहित्य सदन, भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के बाईसवें अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं। उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग्य, निबंध एवं बाल साहित्य विधाओं में, प्रत्येक विधा के लिए इक्कीस सौ रुपये राशि के साहित्य - पुरस्कार प्रदान किये जाएँगे। दिव्य - पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ, लेखक के दो छायाचित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा। हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रा अवधि 1 जनवरी 2015 से लेकर 31 दिसंबर 2018 के मध्य होना चाहिए।
राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठापूर्ण, चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति पत्रों से सम्मानित किया जाएगा। श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादकों को भी दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जाएँगे। अन्य जानकारी हेतु उपरोक्त पते एवं मोबाईल पर सम्पर्क किया जा सकता है। पुस्तकें प्रेषित करने का पता है - श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन, 145,ए साईंनाथ नगर, सी - सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल - 462042 पुस्तकें प्राप्त होने की अंतिम तिथि है 30 दिसंबर 2019 है।
जगदीश किंजल्क
संयोजक, दिव्य पुरस्कार
साहित्य सदन,145 ए,सांईनाथ नगर,
सी - सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल - 462042
संपर्क - 09977782777, 0755 - 2494777
ईमेल : jagdishkinjalk@gmail.com
शुक्रवार, 20 मई 2016
राष्ट्रीय ख्याति के अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकें आमंत्रित
भोपाल । साहित्य सदन भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के उन्नीसवे अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं । उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग, निबन्ध एवं बाल साहित्य विधाओं पर। प्रत्येक के लिये इक्कीस सौ रुपये राशि के पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे । दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ, लेखक के दो छाया चित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा ।
हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1जनवरी 2014 से लेकर 31 दिसम्बर 2015 के मध्य होना चाहिये । राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठा पूर्ण चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति .पत्रों से सम्मानित किया जायेगा । श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को भी दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे। अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नं. 09977782777, दूरभाष . 0755.2494777 पर सम्पर्क किया जा सकता है । पुस्तकें भेजने का पता है - श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन, 145.ए, सांईनाथ नगर, सी सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल. 462042 । पुस्तकें प्राप्त होने की अंतिम तिथि है 30 दिसम्बर 2016 । कृपया प्रेषित पुस्तकों पर पेन से कोई भी शब्द न लिखें ।
हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1जनवरी 2014 से लेकर 31 दिसम्बर 2015 के मध्य होना चाहिये । राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठा पूर्ण चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति .पत्रों से सम्मानित किया जायेगा । श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को भी दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे। अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नं. 09977782777, दूरभाष . 0755.2494777 पर सम्पर्क किया जा सकता है । पुस्तकें भेजने का पता है - श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन, 145.ए, सांईनाथ नगर, सी सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल. 462042 । पुस्तकें प्राप्त होने की अंतिम तिथि है 30 दिसम्बर 2016 । कृपया प्रेषित पुस्तकों पर पेन से कोई भी शब्द न लिखें ।
जगदीश किंजल्क
संपादक दिव्यालोक
साहित्य सदन 145.ए, सांईनाथ नगर, सी. सेक्टर
कोलार रोड, भोपाल ; मध्य प्रदेश - .462042
मोबा: 09977782777
साहित्य सदन 145.ए, सांईनाथ नगर, सी. सेक्टर
कोलार रोड, भोपाल ; मध्य प्रदेश - .462042
मोबा: 09977782777
सोमवार, 9 नवंबर 2015
इंटरनेट की दुनिया में तेजी से पांव पसार रही है हिन्दी : यादव
जोधपुर। हिंदी पखवाड़ा के समापन अवसर पर जोधपुर प्रधान डाकघर में 28 सितंबर को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव का सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने स्वागत किया और हिंदी पखवाड़ा के दौरान आयोजित कार्यक्रमों की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सृजन एवं अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी दुनिया की अग्रणी भाषाओं में से एक है। हिंदी हमारे रोजमर्रा की भाषा है और इसे सिर्फ पखवाड़ा से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम इसके प्रचार - प्रसार और विकास के क्रम में आयोजनों से परे अपनी दैनिक दिनचर्या से भी जोड़ें।
श्री यादव ने कहा कि डिजिटल क्रान्ति के इस युग में हिन्दी इन्टरनेट की दुनिया में भी तेजी से पाँव पसार रही है। आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और ब्लॉगिंग के माध्यम से हिन्दी को नये रूप में स्वीकार रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दी में विश्व भाषा बनने की क्षमता है। आज हिन्दी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में बोली जाती है। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। दुनिया में चीनी भाषा के बाद हिन्दी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। आज जहाँ कम्प्यूटर एवं इंटरनेट पर हिन्दी की लोकप्रियता चरम पर है, वहीं विदेशों से लोग भारत में हिन्दी सीखने के लिए आ रहे है। श्री यादव ने हिन्दी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज परिवर्तन और विकास की भाषा के रूप में हिन्दी के महत्व को नये सिरे से रेखांकित किया जा रहा है। डाक निदेशक श्री यादव ने जोर देकर कहा कि ऐसे में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिये सरकारी कार्यक्रमों से परे अगर हर हिन्दी भाषी ठान ले कि उसे हिन्दी में ही कार्य करना है तो हिन्दी को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।
प्रवर डाक अधीक्षक, जोधपुर मंडल श्री पी आर करेला ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा के साथ - साथ राजभाषा भी है और लोगों तक पहुँच स्थापित करने के लिए टेक्नॅालाजी स्तर पर इसका व्यापक प्रयोग करने की जरूरत है।
सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने कहा कि हिंदी पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा है और सरकारी कामकाज में भी इसे बहुतायत में अपनाया जाना चाहिये।
हिंदी पखवाड़ा के दौरान प्रधान डाकघर में आयोजित कार्यक्रम के विजेताओं को इस अवसर पर निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने सम्मानित भी किया। निबंध प्रतियोगिता में दुर्ग सिंह भाटी, नीतू प्रजापत, सुनील जोशी और कमल खन्ना एवं डाकिया संवर्ग में सत्य प्रकाश, वाद - विवाद प्रतियोगिता में रूपाराम, रमेश सोठवाल, नरेंद्र सोनी और प्रवीण कुमार वैष्णव एवं काव्य पाठ प्रतियोगिता में नीतू प्रजापत को पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन सुनील जोशी ने किया और आभार ज्ञापन सहायक डाक अधीक्षक मुख्यालय श्री विनय कुमार खत्री द्वारा किया गया।
कुमारी स्मृति और राहुल वर्मा ' अश्क ' की पुस्तक ' एहसास ' का विमोचन
पटना। जिन्दगी में एहसास बहुत जरुरी होता है और जीने के लिए भी एहसास की बहुत जरुरत होती है जैसे प्यार का एहसास,पढाई का एहसास, सच्चाई का एहसास, और बहुत कुछ इसी एहसास को पटना बिहार की रहने वाली कवयित्री कुमारी स्मृति और हरियाणा फरीदाबाद बल्लभगढ़ के रहने वाले कवि राहुल वर्मा अश्क ने एक पुस्तक में पिरोया है। हकीकत में कवि और कवयित्री ने मिलकर बहुत सुंदर पुस्तक का निर्माण किया है जिसे पढ़कर जीवन में प्रेम, सहानुभूति, मित्रता, आदि का एहसास होता है। मोहब्बत की इस पुस्तक में कवि और कवयित्री के प्रेम का अनूठा संगम दिखाई दिया। इस पुस्तक का लोकार्पण बल्लभगढ़ जिले में बालाजी महाविद्यालय और पटना जिले में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में किया गया। इस पुस्तक के विषय में अनेक कवियों ने समीक्षा की है जो की सार्थक रही है।जब - जब इस पुस्तक की गजलों को एक रूहानी एहसास के साथ पढ़ा जाता है तो सच में ह्रदय को एहसास का एहसास होता है। कवि और कवयित्री ने इस पुस्तक की गजलों को बहुत ही भिन्न तरीके से लिखा है, शायद ही किसी कवि और कवयित्री ने ऐसा लिखने का प्रयास किया होगा। दोनों का ये प्रयास एक अनोखा प्रयास है। बड़े शायरों और कवियों ने ही इसे इतिहास का अनोखा प्रयास बताया है, और लिखने की बात आती है तो इस दोनों ने इस पुस्तक को फेसबुक के माध्यम से लिखा है। गजल में मतला कवि का तो एक शेर कवयित्री के द्वारा लिखा गया है। दोनों ने इसी क्रम में लगभग 80 गजलों को सुंदर शब्दों से रचा है। इतनी दूरी का फासला होने के बाबजूद ये अपने प्रयास पर खरे उतरे और हमारे बीच इस युगलबंदी का एक ऐसा अनोखा तत्व प्रस्तुत किया है।
इस पुस्तक के लोकार्पण में अनेक रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति दी।साथ ही इस अवसर पर
सोमवार, 23 फ़रवरी 2015
आकांक्षा को '' परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान ''
मई माह में 21हजार की धनराशि के साथ श्रीलंका में होंगी सम्मानित
उ. प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कर चुके हैं आकांक्षा को सम्मानित
संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने बताया कि आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लॉग जगत में कदम रखा और विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लॉग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लॉगिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लॉगिंग को भी नये आयाम दिये। “शब्द-शिखर“ ¼http://shabdshikhar.blogspot. in½ इनका प्रमुख ब्लॉग है, जो कि हिंदी के लोकप्रिय ब्लॉगों में गिना जाता है। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रुचि रखने वाली आकांक्षा यादव अग्रणी महिला ब्लॉगर हैं और इनकी रचनाओं में नारी-सशक्तीकरण बखूबी झलकता है। इनके ब्लॉग को अब तक लाखों लोगों ने पढा है और करीब सौ ज्यादा देशों में इन्हें देखा-पढा जाता है। आकांक्षा यादव निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव की पत्नी हैं, जो कि चर्चित हिंदी ब्लॉगर और साहित्यकार हैं।
गौरतलब है कि आकांक्षा यादव को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इससे पूर्व भी ब्लॉगिंग हेतु तमाम प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा “अवध सम्मान“, हिंदी ब्लॉगिंग के दशक वर्ष में “दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति“ का सम्मान, नेपाल में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में “परिकल्पना ब्लॉग विभूषण सम्मान“ से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डॉक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘डॉ. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘ व ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, निराला स्मृति संस्थान, रायबरेली द्वारा मनोहरादेवी स्मृति सम्मान सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु दर्जनाधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं ।
-रत्नेश कुमार मौर्य
संयोजक - “शब्द-साहित्य“
इलाहाबाद
संयोजक - “शब्द-साहित्य“
इलाहाबाद
3 मई को साकेत परिषद की वार्षिकोत्सव एवं सम्मान समाराेह
सुरगी . साकेत साहित्य परिषद् सुरगी की आगामी सोलहवीं वार्षिक उत्सव एवं सम्मान समारोह का आयोजन दिनांक 3 मई 2015, रविवार, समय - दोपहर 12 बजे से, सुरगी में आयोजित की गई है। जिसमें कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित है प्रथम सत्र में वैचारिक सत्र अंतर्गत अतिथिगण निम्नानुसार है जिसमें मुख्य अतिथि - मान. खुमान साव (लोक संगीतकार, चंदैनी गोंदा), अध्यक्षता - मान. जयप्रकाश साव (वरिष्ठ साहित्यकार, दुर्ग), विशेष अतिथि - मान. नूतन प्रसाद शर्मा (वरि.साहित्यकार करेला), मान. आचार्य सरोज द्विवेदी (साहित्यकार एवं ज्योतिषाचार्य) , मान. डॉ. नरेश कुमार वर्मा (साहित्यकार एवं भाषाविद्, भाठापारा), मान. डॉ. पीसी लाल यादव (साहित्यकार, गंडई), मान. डॉ. दादूलाल जोशी (वरिष्ठ साहित्यकार, फरहद), मान. प्रो. थानसिंग वर्मा (समीक्षक एवं साहित्यकार), मान. प्रो. ओंकारलाल श्रीवास्तव (समीक्षक, राजनांदगांव), पद्मलोचन शर्मा ' मुहफट' (प्रसिद्ध मंचीय कवि), मान. यशवंत मेश्राम (साहित्यकार एवं समीक्षक), मान. सुरेश सर्वेद (संपादक, विचारवीथी), होंगे। जिसका विषय - लोक साहित्य म लोक प्रतिरोध के स्वर रखा गया है।
द्वितीय सत्र में सम्मान समारोह एवं स्मारिका विमोचन समारोह का आयोजन दोप. 2 बजे रखा गया है जिसमें अतिथिगण उपस्थित होंगे मुख्य अतिथि - मान. मधुसूदन यादव (महापौर व पूर्व सांसद, राजनांदगाव), अध्यक्षता - मान. भरत वर्मा (अध्यक्ष, जिला भाजपा राजनांदगांव), विशेष अतिथि - मान. कोमल सिंह राजपूत (महामंत्री, जिला भाजपा, राज.), मान. श्रीमती मधु सुकृत साहू (सदस्य, जि.पं. राज.), मान. लीलाधर साहू (अध्यक्ष, ग्रामीण भाजपा मंडल, राज.), मान. विक्रांत दीपक (जनपद सदस्य, सुरगी), मान. श्रीमती बोधनी बाई (सरपंच, ग्राम पंचायत सुरगी), मान. भीखम ढीमर (उपसरपंच, ग्राम पंचायत, सुरगी), मान. श्रीमती कुमलेश्वरी साहू (पूर्व सरपंच, सुरगी) उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर साकेत सम्मान 2015 खुमान साव (लोक संगीतकार, चंदैनी गोंदा), महेन्द्र बघेल 'मधुÓ (कवि, कलडबरी) को दिया जायेगा।
उक्त जानकारी थनवार निषाद ' सचिन' एवं लखनलाल साहू ' लहर ' ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दी।
द्वितीय सत्र में सम्मान समारोह एवं स्मारिका विमोचन समारोह का आयोजन दोप. 2 बजे रखा गया है जिसमें अतिथिगण उपस्थित होंगे मुख्य अतिथि - मान. मधुसूदन यादव (महापौर व पूर्व सांसद, राजनांदगाव), अध्यक्षता - मान. भरत वर्मा (अध्यक्ष, जिला भाजपा राजनांदगांव), विशेष अतिथि - मान. कोमल सिंह राजपूत (महामंत्री, जिला भाजपा, राज.), मान. श्रीमती मधु सुकृत साहू (सदस्य, जि.पं. राज.), मान. लीलाधर साहू (अध्यक्ष, ग्रामीण भाजपा मंडल, राज.), मान. विक्रांत दीपक (जनपद सदस्य, सुरगी), मान. श्रीमती बोधनी बाई (सरपंच, ग्राम पंचायत सुरगी), मान. भीखम ढीमर (उपसरपंच, ग्राम पंचायत, सुरगी), मान. श्रीमती कुमलेश्वरी साहू (पूर्व सरपंच, सुरगी) उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर साकेत सम्मान 2015 खुमान साव (लोक संगीतकार, चंदैनी गोंदा), महेन्द्र बघेल 'मधुÓ (कवि, कलडबरी) को दिया जायेगा।
उक्त जानकारी थनवार निषाद ' सचिन' एवं लखनलाल साहू ' लहर ' ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दी।
साकेत के कवियों ने बिलासपुर में वाहवाही लूटी
सुरगी. छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा बिलासपुर में तृतीय प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में साकेत साहित्य परिषद सुरगी के कवियों ने शिरकत कर काव्य पाठ किया। साकेत के संरक्षक कुबेर सिंह साहू ने कहानी पाठ किया।
डॉ. दादूलाल जोशी ' फरहद ' एवं ' विचार वीथी ' के संपादक सुरेश सर्वेद ने भी अपनी सहभागिता दी। छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन में थनवार निषाद सचिन, ओमप्रकाश साहू (अंकुर), लखनलाल साहू (लहर), महेन्द्र बघेल (मधु), फागुदास कोसले, पवन यादव, यशवंत मेश्राम ने काव्य पाठ कर खूब वाहवाही लूटी। राज्य स्तरीय कवि सम्मेलन का संचालन पद्मलोचन शर्मा (मुंहफट) ने कर एक अमिट छाप छोड़ी।
संवेदनाओं के स्वर का लोकार्पण
विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मलेन नागपुर में
नागपुर। विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मलेन नागपुर में मनोज कुमार शुक्ल '' मनोज'' की पुस्तक '' संवेदनाओ के स्वर'' काव्य संग्रह का लोकार्पण विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मलेन नागपूर के सभागार में साहित्यिकी के अंतर्गत गीतांजलि में हुआ। पुस्तक का लोकार्पण संस्था के साहित्य सचिव एवं पत्रकार श्री परमात्मानंद पाण्डेय द्वारा संम्पन्न हुआ। उक्त अवसर पर श्रीमती सपना दुबे व्याख्याता प्रिदर्शनी कालेज नागपुर एवं कार्यक्रम के सहसंयोजक श्री विनोद नायक सहित मनोज कुमार शुक्ल '' मनोज '' मंचासी थे।
संस्था द्वारा कृतिकार का सम्मान करने के बाद काव्य गोष्ठी का आयोजन उनके मुख्य आतिथ्य में आयोजित किया गया। इस गोष्ठी में नागपुर के डा. सूर्यनाथ सिंह साधक, हाजी जफर अली राही, ब्रजेशनंदन सिंह, विनोद नायक, अविनाश बागडे, शमशाद शाद, एस पी सिंह मुरारी, मनीन्द्र सरकार, राजेंद्र तिवारी, लेखेश्वर बलियानील, अशोक कुमार तिवारी, के डी इंगले कमल, जयप्रकाश सूर्यवंशी, डां. भोला सरवर, मधुसूदन, विवेक असरानी, केशव प्रसाद साव, सतीश लखोटिया, सर्जेराव गलपट, बाल्मीकी भोयर आदि ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम संयोजक श्री परमात्मानंद पाण्डेय द्वारा किया गया। आभार प्रदर्शन के पश्चात् कार्यक्रम का समापन हुआ।
नागपुर। विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मलेन नागपुर में मनोज कुमार शुक्ल '' मनोज'' की पुस्तक '' संवेदनाओ के स्वर'' काव्य संग्रह का लोकार्पण विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मलेन नागपूर के सभागार में साहित्यिकी के अंतर्गत गीतांजलि में हुआ। पुस्तक का लोकार्पण संस्था के साहित्य सचिव एवं पत्रकार श्री परमात्मानंद पाण्डेय द्वारा संम्पन्न हुआ। उक्त अवसर पर श्रीमती सपना दुबे व्याख्याता प्रिदर्शनी कालेज नागपुर एवं कार्यक्रम के सहसंयोजक श्री विनोद नायक सहित मनोज कुमार शुक्ल '' मनोज '' मंचासी थे।
संस्था द्वारा कृतिकार का सम्मान करने के बाद काव्य गोष्ठी का आयोजन उनके मुख्य आतिथ्य में आयोजित किया गया। इस गोष्ठी में नागपुर के डा. सूर्यनाथ सिंह साधक, हाजी जफर अली राही, ब्रजेशनंदन सिंह, विनोद नायक, अविनाश बागडे, शमशाद शाद, एस पी सिंह मुरारी, मनीन्द्र सरकार, राजेंद्र तिवारी, लेखेश्वर बलियानील, अशोक कुमार तिवारी, के डी इंगले कमल, जयप्रकाश सूर्यवंशी, डां. भोला सरवर, मधुसूदन, विवेक असरानी, केशव प्रसाद साव, सतीश लखोटिया, सर्जेराव गलपट, बाल्मीकी भोयर आदि ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम संयोजक श्री परमात्मानंद पाण्डेय द्वारा किया गया। आभार प्रदर्शन के पश्चात् कार्यक्रम का समापन हुआ।
इसी तरह स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर मध्यप्रदेश आंचलिक साहित्य परिषद् एवं श्री जानकी रमण महाविद्यालय के संयुक्त तत्वधान में मनोज कुमार शुक्ल ' मनोज' ,श्री इरफान' झांस्वी' ,श्री सुरेश सोनी 'दर्पण' का सम्मान किया गया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. डी. पी. लोकवानी थे , अध्यक्षता डॉ. गार्गीशरण 'मराल' ने की। विशिष्ठ अतिथि कि रुप में श्री शरद भाई पालन थे ।कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में आचार्य भगवत दुबे की अध्यक्षता में अंचलों से पधारे कवियों द्वारा काव्य पाठ किया गया । इस कार्यक्रम का संचालन पड़वार से आये श्री वीरेन्द्र जेन विकल ने किया ।
जिन कवियों ने अपनी प्रस्तुति दी उसमें श्री नरेश जैन गोटेगॉंव, डॉ कमलेश व्यास पनागर , श्री महेंश मानव बरेला , डॉ बैजनाथ गौतम ,डॉ याम बिहारी चतुर्वेदी ,डॉ उदयभान तिवारी, अर्चना निगम, लता गुप्ता, जयन्त ढोक, मेराज जबलपुरी, इरफान झांस्वी, मनोज शुक्ल ' मनोंज ', सुरेश सोनी ' दर्पण ' शामिल है। पधारे अतिथियों एवं कवियों का आभार प्रदर्शन डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ने किया ।
इस अवसर पर श्री मोहन ऋषि,सनातन बाजपेई ,प्रमोद मुनि, द्वारका प्रसाद गुप्त ,राजसागरी अभिमन्यु जैन, कामता सागर, रचना मिश्रा,आदि उपस्थित थे।
इस अवसर पर श्री मोहन ऋषि,सनातन बाजपेई ,प्रमोद मुनि, द्वारका प्रसाद गुप्त ,राजसागरी अभिमन्यु जैन, कामता सागर, रचना मिश्रा,आदि उपस्थित थे।
राष्ट्रीय ख्याति के सत्रहवें अम्बिका प्रसाद दिव्य साहित्य पुरस्कार घोषित
श्री पंकज परिमल, डा शशि वर्धन शर्मा शैलेश, श्री वनाफरचन्द्र,
डा राकेश कुमार सिंह एवं श्री रवीन्द्र बडगैंया पुरस्कृत
सात लेखकों को दिव्य प्रशस्ति पत्र
दिव्य पुरस्कारों के संयोजक श्री जगदीश किंजल्क ने बताया कि इन पुरस्कारों हेतु देश के कोने-कोने से कुल 147 पुस्तकें प्राप्त हुई थीं ।सत्रहवे दिव्य पुरस्कारों के विद्वान निर्णायक हैं – प्रो. आनन्द त्रिपाठी,श्री माता चरण मिश्र, श्रीमती विजयलक्ष्मी विभा, श्री मयंक श्रीवास्तव, श्री राजेन्द्र नागदेव , श्री प्रियदर्शी खैरा, श्री संतोष खरे, प्रो.रामदेव भारद्वाज, श्री प्रभुदयाल मिश्र,श्री कुमार सुरेश, एवं श्री जगदीश किंजल्क । साहित्य सदन की व्यवस्थापक श्रीमती राजो किंजल्क ने बताया कि ये पुरस्कार शीघ्र ही विद्वानों को उपलब्ध कराये जायेंगे ।
महत्वपूर्ण साहित्यिक सरोकार
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राष्ट्रीय ख्याति के अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकें आमंत्रित
------------------------------भोपाल। साहित्य सदन भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के अठारहवें अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की जाती हैं । उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग एवं निबन्ध विधाओं पर प्रत्येक के लिये इक्कीस सौ रुपये राशि के पुरस्कार प्रदान किया जायेंगे। दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ, लेखक के दो छाया चित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा ।हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1 जनवरी 2013 से लेकर 31दिसम्बर 2014 के मध्य होना चाहिये। राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठापूर्ण चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य-प्रशस्ति पत्रों से सम्मानित किया जायेगा। अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नं. 09977782777, दूरभाष-0755-2494777 एवं ईमेल:jagdishkinjalk@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। पुस्तकें भेजने का पता है-श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन , 145-ए, सांईनाथ नगर सी-सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल-462042 । पुस्तकें प्राप्ति की अंतिम तिथि है 30 अक्टूबर 2015 । कृपया प्रेषित पुस्तकों पर पेन से कोई भी शब्द न लिखें ।
( जगदीश किंजल्क )
संयोजक: दिव्य पुरस्कार
साहित्य सदन,145-ए,
सांईनाथ नगर ,
सी-सेक्टर, कोलार रोड,
भोपाल-462042
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शनिवार, 22 नवंबर 2014
मनोज शुक्ल ' मनोज ' काव्यकृति विमोचित
जबलपुर। वरिष्ठ कहानीकार एवं कवि श्री मनोज कुमार शुक्ल ''मनोज'' की काव्यकृति '' संवेदनाओं के स्वर '' का विमोचन गुंजन कला सदन जबलपुर में किया गया। स्व.डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव के जन्मोत्सव एवं 25 वां बुंदेली दिवस रजत जयंती समारोह के इस अवसर पर शहीद स्मारक जबलपुर के सभागार में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी थे अध्यक्षता पूर्व अध्यक्ष संस्कृत पाली प्राकृत विभाग रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय एवं पूर्व निदेशक कालीदास अकादमी उज्जैन म.प्र., ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में आचार्य सनातन बाजपेयी ''सनातन '' ,डॉ. गार्गीशरण मिश्र ''मराल '', आचार्य डा. हरिशंकर दुबे , डॉ राजकुमार ''सुमित्र'', डॉ. विजय तिवारी '' किसलय'' उपस्थित थे।
यह गरिमामयी कार्यक्रम नगर के सभी साहित्यकारों के करतल ध्वनि के बीच प्रारंभ हुआ। कृतिकार मनोज ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस कृति में उन्होंने अपनी मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं को प्रस्तुत किया है। सामाजिक , राजनैतिक विसंगतियों को अपने ढंग से रखा है। अपने पिता श्री रामनाथ 'श्री नाथ '' की साहित्यिक विरासत को संजाऐं रखने में हम कहॉं तक सफल हुए हैं, यह हमारे पाठक ही बता सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन श्री राजेश पाठक 'प्रवीण' ने एवं आभार व्यक्त संस्था संस्थापक ओंकार श्रीवास्तव ने किया।
शनिवार, 30 अगस्त 2014
डॉ. इकबाल देश प्रेम और मुहब्बत का पैगाम देने वाले शायर
साहित्य अकादमी मप्र संस्कृति परिषद का सफल आयोजनशिवपुरी। डॉ. इकबाल को इसलिए याद नहीं किया जाता कि वह अपने समय के चर्चित शायर थे अपितु इसलिए भी याद किया जाता है कि देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ समकालीन मानव उनकी शायरी के केन्द्र में था जिसके उत्थान के लिए वह निरंतर रचनात्मक संघर्ष करते रहे. वह वस्तुत: मानवतावादी शायर थे. अपने समय के मनुष्य को जाग्रत करना ही उनका लेखकीय धर्म था. उक्त उद्गार साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने म.प्र. संस्कृति परिषद के अललामा इक़बाल प्रभाग द्वारा डॉ. इकबाल के कलाम, हयात, फ़न और शख्सियत पर स्थानीय संस्था श्री रामकिशन सिंहल फाउण्डेशन के सहयोग से दुर्गामठ में आयोजित व्याख्यानमाला का शुभांरभ करते हुए व्यक्त किये. इस अवसर पर अकादमी की उप निदेशक नुसरत मेहदी ने बताया कि इस तरह के कार्यक्रम डॉ. इकबाल के मुहब्बत के पैगाम को लोगों तक पहुंचाने के लिए किये जा रहे हैं ताकि जनमानस में व्याप्त उनसे संबंधित भ्रांतियों का निवारण हो सके.
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. परशुराम विरही के मत में डॉ. इकबाल की रचनायें ब्रिटिश शासन के खिलाफ थी. उन्हें फारसी का विशद ज्ञान था. उनकी फारसी शायरी के कारण ही विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुए. युसुफ अहमद कुरेशी ने कहा कि डॉ. इकबाल का संदेश सारे इन्सानों, समस्त भारतीयों के लिए था. उन्हें मुसलमान अपना समझने की भूल करते हैं. डॉ. तबस्सुम खान श्योपुर के मुताबिक उनकी दार्शनिक एवं सूफियाना शायरी ने सारी दुनिया को प्रभावित किया. डॉ. मीनाक्षी स्वामी इंदौर ने बताया कि डॉ. इकबाल अकेले भारतीय हैं जिनके कलाम का अनुवाद दुनिया की अनेक भाषाओं में हुआ है. डॉ. लखनलाल खरे के अनुसार इक़बाल का नज़रिया हिन्दुस्तानी संस्कृति का संवाहक था. वह सच्चे वतनपरस्त शायर थे.मुख्य अतिथि प्रो. विद्यानंदन राजीव ने डॉ. इकबाल को युगनिर्माता और महान चिंतक निरूपित किया.
कासिम रसा ग्वालियर, के संचालन में सम्पन्न व्याख्यानमाला के अंत में साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल व उपनिदेशक नुसरत मेंहदी ने संस्था सचिव डॉ. महेन्द्र अग्रवाल के स्वर आधारित व्यंग्य संग्रह ''स्वरों की समाजवादी संवेदनायें'' का विमोचन किया.इस अवसर पर फाउण्डेशन के सचिव डॉ. महेन्द्र अग्रवाल व अध्यक्ष अशोक मित्तल ने संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह भेट किये.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में नई ग़ज़ल के लीजेंड शायर डॉ. महेन्द्र अग्रवाल की सदारत, मशहूर शायर अतुल अजनबी की निज़ामत व साहित्य अकादमी की उपनिदेशक नुसरत मेंहदी की विशेष उपस्थिति में एक मुशायरा मुनक्किद हुआ. जिसमें शायर हजरात सुकून शिवपुरी,रफीक़ इशरत,याकूब साबिर,डा.एच.पी.जैन,मनीष जैन रोशन बेकरां,राशिद गुनाबी,दीपक जैन,अतुल अजनबी,नुसरत मेंहदी,डॉ. महेन्द्र अग्रवाल ने अपना कलाम पेश कर श्रोताओं को देर रात तक बांधे रखा.
कार्यक्रम की सफलता में विनय प्रकाश नीर,अखलाक खान,प्रकाशचंद्र सेठ,जितेन्द्र गौड,शिवनारायण सेन, आशीष पटैरिया, भूपेन्द्र विकल, प्रदीप अवस्थी आदि का विशेष सहयोग रहा.
प्रेमचंद की विरासत क्यों
राजनांदगांव। प्रगतिशील लेखक संघ इकाई राजनांदगांव के तत्वावधान में दिनांक 3.08.2014 को कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती चर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में ''प्रेमचंद की विरासत क्यों '' विषय पर अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कथाकार श्री नरेश श्रीवास्तव ने कहा कि सामान्य जीवन में हम जहां से भी हम बात करते हैं प्रेमचंद की विरासत वही से शुरू हो जाती है। स्वाभिमान, आत्म सम्मान, कर्तव्य, संघर्ष हमारी ही नहीं यह विश्व की भी विरासत है। प्रेमचंद की विरासत असीम है।चर्चा को आगे बढ़ाते हुए श्री संजय अग्रवाल ने कहा कि सामाजिक, सांस्कृतिक दायित्य लेखक की विरासत है प्रेमचंद जी ने हासिए पर जीने वाले दबे कुचले व्यक्ति के जीवन से ही पात्रों का चयन किया और उस पर लेखन किया, लेकिन आज हासिए पर जीने वाले व्यक्ति पर चर्चा सिमट कर रह गई है। यथास्थिति बदलनी होगी, वंचितों को हासिए से बाहर लाना होगा।
प्रो. थानसिंह वर्मा ने कहा कि प्रेमचंद के समय के घिसू और माधव आज की व्यवस्था में भी बने हुए हैं। आज भी लोग अबोधता में जी रहे हैं अपने दुशमन की पहचान नहीं कर पा रहे हैं प्रेमचंद के समय सामंतवाद /साम्राज्यवाद जनता का दुशमन था आज किसानों की जमीन छिनकर कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाया जा रहा है विकास के पैमाने के विषय में फिर से सोचने की जरूरत है।
श्री कैलाश श्रीवास्तव ने प्रेमचंद की विरासत पर चर्चा करते हुए कहा कि धर्म, राजनीति और व्यापार के गठ -जोड़ ने शोषण, कालाबाजारी, टेक्स चोरी करते हुए एक-दो नंबर की दुनिया निर्मित कर चुके हैं, इस विशाल तंत्र में मोहला से लेकर शिकागो तक के पूंजीपति शामिल हैं इसके विशाल और सघन तंत्र को समझना आवश्यक है, इसके विरूद्ध संघर्ष और इस विशाल तंत्र को तोड़ना एक बड़ा काम है इसके लिए सभी जनवादी ताकतों को एकजुट होकर सतत् संघर्ष को जरूरत है और इस तथ्य को गांव-गांव, घर-घर जाकर लोगों को समझाना जरूरी है।
इस अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ राजनांदगांव इकाई के अध्यक्ष श्री प्रभात तिवारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मुशी प्रेमचंद के संघर्षशील, ईमानदार, कर्तव्य निष्ठ पात्र हमारे गांव, शहर में आज भी उपस्थित है इनके संघर्ष को अपने कथा कहानी, रचनाओं में शामिल करना चाहिए, कमोबेश बिहार की अनपढ़ तिलिया मुंशी प्रेमचंद की ऐसी ही पात्र है जो दलित, शोषित की आवाज उठाती दिखती है।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री वाई.के. तिवारी जी ने कहा कि प्रेमचंद अपने रचना संसार मेेंं पूरे सामाजिक ताने बाने को लेते हैं उनसे कोई कोना नहीं छूटता हर वर्ग का बेहतर चित्रण है प्रेमचंद की रचना में सर्व कालिकता दिखती है उनके समय जो सामाजिक ढांचा था वह आज भी है। कहानियों में मार्मिकता, दयनीयता, लाचारी, शोषण को अच्छे से रेखांकित किया गया है। कहानियां उत्सुकता जगाती है, संवेदना जगाती है, हृदय परिवर्तन करती है।
कार्यक्रम में श्री यशवंत मेश्राम ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
गुरुवार, 22 मई 2014
हाना न केवल छत्तीसगढी भाषा की प्राण है अपितु यह इस भाषा का स्वभाव और श्रृँगार भी है - कुबेर
गंडई पंडरिया में साकेत साहित्य परिषद् सुरगी का पंद्रहवाँ सम्मान समारोह एवं वैचारिक संगोष्ठी सम्पन्न
राजनांदगांव। 23 फरवरी 2014 को गंडई पंडरिया में साकेत साहित्य परिषद् सुरगी का पंद्रहवाँ सम्मान समारोह एवं वैचारिक संगोष्ठी सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रगतिशील विचारधारा के सुप्रसिद्ध समालोचक - साहित्यकार डॉ. गोरेलाल चंदेल (खैरागढ़) ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध भाषाविद्, साहित्यकार व संपादक डॉ. विनय कुमार पाठक (बिलासपुर) एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. जीवन यदु, डॉ. दादूलाल जोशी, डॉ. पीसीलाल यादव, डॉ माघीलाल यादव, आचार्य सरोज द्विवेदी, श्री हीरालाल अग्रवाल तथा डॉ. सन्तराम देशमुख थे। ’छत्तीसगढ़ी जनजीवन पर हाना का प्रभाव’ विषय पर केन्द्रित संगोष्ठी के प्रारंभ में आधार वक्तव्य देते हुए परिषद् के संरक्षक कथाकार कुबेर ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा में मुहावरों, कहावतों और लोकोक्तियों को ’हाना’ कहा जाता है। हाना न केवल छत्तीसगढी भाषा की प्राण है अपितु यह इस भाषा का स्वभाव और श्रृँगार भी है। आम बोलचाल में छत्तीसगढिय़ों का कोई भी वाक्य हाना के बिना पूर्ण नहीं होता। कभी - कभी तो पूरी बात ही हानों के द्वारा कह दी जाती है। छत्तीसगढ़ी हाना लक्षणा के अलावा व्यंजना शब्द शक्ति से भी युक्त होती है। इसके अलावा लोकोक्तियों के रूप में प्रयुक्त हानों में अन्योक्ति अलंकार का भी समावेश होता है। एक उदाहरण देखिये - आगू के भंइसा पानी पीये, पाछू के ह चिखला चांटे। इसका आशय है, सामूहिक भोज के समय पीछे रह जाने वालों के लिए भोजन कम पडऩे की संभावना रहती है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. विनय पाठक ने कहा कि हाना पूर्णत: अपने परिवेश और जनजीवन पर आधारित होते हैं। एक ऊक्ति है - ’कानून अंधा होता है।’ छत्तीसगढ़ में लोग कहते हैं - ’कानून होगे कनवा अउ भैरा होगे सरकार।’ यह लोक की निरीक्षण-शक्ति से उत्पन्न ऊक्ति है, जो उनके भोगे गये यथार्थ से आती है और इसीलिए यह ’ कानून अंधा होता है’ जैसे बहुप्रचलित ऊक्ति से कहीं अधिक मारक और तथ्यपरक है। लोकमान्यता में कानून अंधा नहीं बल्कि काना होता है जिसकी खुली आँख निम्न वर्ग की ओर रहती है, उसे उसके छोटे-मोटे हर अपराध के लिए तुरंत दण्डित करती है परन्तु बंद आँख उच्च वर्ग की ओर रहती है, और उनके बड़े से बड़े अपराध को भी अनदेखा करने के आरोप से खुद को बचाती है। आजकल शोधार्थियों द्वारा शब्दकोश से किसी हाना का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद करके प्रस्तुत करने का गलत प्रचलन बढ़ रहा है। ’ऊँट के मुँह म जीरा’ इसका उदाहरण है। छत्तीसगढ़ में न तो ऊँट होते हैं और न ही जीरा। इस आशय का छत्तीसगढ़ी हाना है ’हाथी के पेट म सोहारी।’ साकेत साहित्य परिषद ने हाना का संकलन व इस पर संगोष्ठियों की शुरूआत कर सराहनीय कार्य किया है।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. गोरेलाल चंदेल ने कहा कि हाना लोकभाषा और लोकजीवन के गाढ़े अनुभव से पैदा होते हैं। वस्तुतत्व को अतिशय प्रभाव से प्रस्तुत करने की कला ही हाना है। इसमें अनुभव और निरीक्षण, दोनों ही प्रभावी ढंग से परिलक्षित होते हैं। हाना में निश्चित ही व्यंजना होती है जिसके प्रभाव से यह अपने परिवेश से निकलकर वैश्विक रूप धारण कर लेता है। एक हाना है - ’कोढिय़ा बइला रेंगे नहीं, रेंगही त मेड़ फोर।’’ यह हाना ग्राम्य परिवेश में जितना सार्थक है उतना ही आज के तथाकथित बाहुबलियों और महाशक्तियों की राष्ट्रीय और वैश्विक परिवेश के लिए भी सार्थक है।
हाना बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया और शब्द शक्तियों के अंतर्संबंधों को हीरालाल अग्रवाल ने रोचक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा; डॉक्टर जब मरीज से पूछता है - ’’तोला कइसे लागत हे ? ’’ तब मरीज जवाब देता है - ’’कइसे लागत हे।’’ डॉक्टर और मरीज के शब्द ’कइसे लागत हे’ एक जैसे हैं, पर मरीज का जवाब, ’’कइसे लागत हे’’ उसकी अभिव्यक्ति कौशल के कारण, नया अर्थ ग्रहण करके एक हाना बन जाता है; ठीक वैसे ही, जैसे - ’’ऐसे-वैसे कैसे-कैसे हो गए, कैसे-कैसे, वैसे-वैसे हो गए।’’
आचार्य सरोज द्विवेदी ने कहा कि यदि मैं कहूँ - ’’एक रूपया चाँऊर’’ तो आपको इशारा समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी और आजकल ’’पप्पू’’ और फेंकू’’ का क्या मतलब है, इसे भी आप बखूबी जानते हैं। हाना ऐसे ही बनते है। डॉ. जीवन यदु ने कहा कि हाना प्रथमत: भाषा का मामला है। इसमें देश, समाज और अर्थतंत्र के अभिप्राय निहित होते हैं।
डॉ. दादूलाल जोशी ने कहा कि हाना में ’सेंस ऑफ ह्यूमर’ होता है, इसीलिए हाना में कही गई बातों का लोग बुरा नहीं मानते हैं। यशवंत मेश्राम ने कहा कि हाना में ’हाँ’ और ’न’ अर्थात स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता दोनों निहित होते हैं। हाना की अर्थ-संप्रेषणीयता और मारकता इन्हीं दोनों के समन्वित प्रभाव से आती है। प्रारंभ में डॉ. पीसीलाल यादव ने ’जिसकी लाठी उसकी भैंस,’ ’आँजत-आँजत कानी होगे’ तथा ’पान म दरजा हे फेर हमर म नहीं’, जैसे हानों की उत्पत्ति के संभावित प्रसंगों को रोचक कहानियों के द्वारा समझाया।
सम्मान की कड़ी में साहित्यकार श्री बी.डी.एल श्रीवास्तव, लोककलार-गायक श्री द्वारिका यादव (शिक्षक) तथा कवि-उद्घोषक श्री नन्द कुमार साहू (शिक्षक) को 2014 का साकेत सम्मान प्रदान किया गया। इस अवसर पर हाना पर केन्द्रित पत्रिका ’साकेत स्मारिका 2014’ तथा कथाकार-संपादक सुरेश सर्वेद की छत्तीसगढ़ी कहानियों का संग्रह ’बनकैना’ का विमोचन भी किया गया।
हाना पर केन्द्रित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी के लिए सभी अतिथियों ने साकेत साहित्य परिषद् सुरगी के प्रयासों को सराहा जिसके माध्यम से इतनी गहन, महत्वपूर्ण व सार्थक परिचर्चा संभव हो सकी। इस संगोष्ठी में साकेत साहित्य परिषद के सदस्य व पदाधिकारियों के अलावा कथाकार-संपादक सुरेश सर्वेद, डॉ. सन्तराम देशमुख, डॉ. माघी लाल यादव, राजकमल सिंह राजपूत तथा बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन ओमप्रकाश साहू ’अंकुर’ तथा आभार प्रदर्शन लखन लाल साहू ’लहर ने किया।
चक्रधर की साहित्यधारा का विमोचन
इलाहाबाद। प्रसिद्ध कहानीकार मार्कण्डेय की जन्मतिथि पर 2 मई को इलाहाबाद में म्यूजिम हॉल में दोपहर 2.30 बजे से आयोजित कार्यक्रम में लोकभारती से प्रकाशित मार्कण्डेय की कहानियों का संग्रह हलयोग तथा कल्पना पत्रिका में चक्रधर के नाम से साहित्यधारा स्तम्भ में लिखी टिप्पणियों के संकलन चक्रधर की साहित्यधारा का विमोचन प्रख्यात कहानीकार शेखर जोशी ने किया।
इस अवसर पर कहानीकार मार्कण्डेय विषय पर आयोजित संगोष्ठी में राँची से आये आलोचक रविभूषण ने कहा कि उनके सम्पादक स्तम्भकार आलोचक एवं कवि रूप को समझे बिना मुकम्मल बात नहीं हो सकती। मार्कण्डेय की कहानियों की चेतना में किसान हैं। वह किसान को भारत की संस्कृति और परम्परा का मूल केन्द्र मानते हैं। मार्कण्डेय नेहरूबियन आधुनिकता की तरह की आधुनिक कहानियाँ लिखने वाले नहीं थे। वह जमीनी हकीकत के कहानीकार हैं। उनके यहाँ पुराना और नया दोनों ही महत्वपूर्ण है। वह वर्तमान को बदलने वाले कहानीकार हैं। इस क्रम में उन्होंने मार्कण्डेय की कहानी साबुन जूते दूध और दवा कहानी की चर्चा की।
आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि मार्कण्डेय सोद्देश्य कहानियाँ ही लिखते थे। इनकी ग्रामीण कथानकों की कहानियों में नास्टेल्जिया नहीं है बल्कि ठोस यथार्थ है।
कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियों में व्यक्तित्व और यथार्थ का अन्तर्विरोध है जो उन्हें बड़ा कहानीकार बनाता है।
अध्यक्षता करते हुये शेखर जोशी ने कहा कि मार्कण्डेय की दो पुस्तकें प्रकाशित होना एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य हुआ है। कहानियों पर उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियों में एक फादर फिगर है जिसकी समाजिक स्थिति का मूल्याँकन वर्तमान पीढ़ी करती है।
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत मार्कण्डेय की पत्नी विद्यावती द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। वक्ताओं का स्वागत रमेश ग्रोवर ने किया। कार्यक्रम का संचालन बलभद्र ने किया तथा धन्यवाद लोकभारती के संचालक प्रबन्धक आमोद माहेश्वरी ने किया। इस अवसर पर कामरेड जिला उल हक अली अहमद फातमी प्रणय कृष्ण जीपी मिश्र हिमांशु रंजन संतोष भदोरिया केके पाण्डेय अविनाश मिश्र अरिन्दम तथा मार्कण्डेय के परिजनों में उनके पुत्र सौमित्र पुत्री सस्या दामाद चैतन्य आदि उपस्थित थे।
इस अवसर पर कहानीकार मार्कण्डेय विषय पर आयोजित संगोष्ठी में राँची से आये आलोचक रविभूषण ने कहा कि उनके सम्पादक स्तम्भकार आलोचक एवं कवि रूप को समझे बिना मुकम्मल बात नहीं हो सकती। मार्कण्डेय की कहानियों की चेतना में किसान हैं। वह किसान को भारत की संस्कृति और परम्परा का मूल केन्द्र मानते हैं। मार्कण्डेय नेहरूबियन आधुनिकता की तरह की आधुनिक कहानियाँ लिखने वाले नहीं थे। वह जमीनी हकीकत के कहानीकार हैं। उनके यहाँ पुराना और नया दोनों ही महत्वपूर्ण है। वह वर्तमान को बदलने वाले कहानीकार हैं। इस क्रम में उन्होंने मार्कण्डेय की कहानी साबुन जूते दूध और दवा कहानी की चर्चा की।
आलोचक राजेन्द्र कुमार ने कहा कि मार्कण्डेय सोद्देश्य कहानियाँ ही लिखते थे। इनकी ग्रामीण कथानकों की कहानियों में नास्टेल्जिया नहीं है बल्कि ठोस यथार्थ है।
कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियों में व्यक्तित्व और यथार्थ का अन्तर्विरोध है जो उन्हें बड़ा कहानीकार बनाता है।
अध्यक्षता करते हुये शेखर जोशी ने कहा कि मार्कण्डेय की दो पुस्तकें प्रकाशित होना एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य हुआ है। कहानियों पर उन्होंने कहा कि मार्कण्डेय की कहानियों में एक फादर फिगर है जिसकी समाजिक स्थिति का मूल्याँकन वर्तमान पीढ़ी करती है।
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत मार्कण्डेय की पत्नी विद्यावती द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। वक्ताओं का स्वागत रमेश ग्रोवर ने किया। कार्यक्रम का संचालन बलभद्र ने किया तथा धन्यवाद लोकभारती के संचालक प्रबन्धक आमोद माहेश्वरी ने किया। इस अवसर पर कामरेड जिला उल हक अली अहमद फातमी प्रणय कृष्ण जीपी मिश्र हिमांशु रंजन संतोष भदोरिया केके पाण्डेय अविनाश मिश्र अरिन्दम तथा मार्कण्डेय के परिजनों में उनके पुत्र सौमित्र पुत्री सस्या दामाद चैतन्य आदि उपस्थित थे।
बुधवार, 27 नवंबर 2013
आंचलिका का विमोचन और साहित्यिक विभूतियों का सम्मान
आंचलिक साहित्यकार परिषद छिंदवाड़ा की पत्रिका आंचलिका का लोकार्पण शहर के रवींद्र भवन हिंदी प्रचारिणी परिसर में सादे किंतु गरिमा पूर्ण परिवेश में किया गया।इस अवसर पर अंचल की विभूतियों को उनके विशिष्ट यॊगदान के लिये विभूति सम्मान से सम्मानित किया गया। आंचलिका जिले की बड़ी पुरानी साहित्यिक संस्था है जिसका प्रारंभ 1992 से हुआ था। वर्तमान अध्यक्ष रवींद्र नीलम और कार्यकारी अध्यक्ष शिवशंकर शुक्ल लाल के अथक प्रयासों से से संस्था ने अपनी अलग पहचान जिला एवं प्रदेश स्तर पर बनाई है। संस्था ने जिले भर के तीन पीढी के साहित्यकारों को एक ही माला में पिरोकर उसे धरोहर रूप में सजाकर एक सराहनीय कार्य किया है जो स्वागत योग्य है।
पुस्तक में नई पुरानी और मध्य पीढ़ी के चौहत्तर साहित्यकारों की कविताओं का समावेश है। 'कितना बड़ा मजाक है ये जिंदगी के साथ,चाहा किसी और को उम्र गुज़ारी किसी के साथ'। शफक अकोटवीइ सरीखे कई वरिष्ठ गज़लकारो की रचनायें भाव विभोर करने के लिये बहुत हैं। धृतराष्ट्र हो गया न्याय आज,दुर्योधन करते शासन हैं । आज़ादी का चीर हरण,नित करते यहां दु शासन हैं। शिवशंकर शुक्ल ने देश की पीड़ा बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त की है।
पुस्तक के लोकार्पण के बाद विभूति सम्मान पारंपरिक ढंग से किया गया।
[1]आशिक अली आशिक उर्दू अदब
[2] ,राम कुमार शर्मा साहित्य
[3] शफक अकोटवी उर्दू अदब
{4] जयशंकर शुक्ल[लॊक सेवा
[5] सालकराम यादव जन सेवा
[6] हनुमंत मनगटे कहानी
[7] प्रभुदयाल श्रीवास्तव बाल कविता
[8]विलास मेहता समाज सेवा
[9]गुरुदास राउत खेल
[ 10] कौशलकिशॊर श्रीवास्तव व्यंग
[11]हबीब शैदाउर्दू अदब
[12] गुलाब चंद वात्सल्य साहित्य
[13] आनंद बक्षी कला संस्कृति
[14] पदमा नरेन्द्र सिंह गायन
[15] पंकज सोनी नाट्य विधा और
[16] उमादीप शिखा गीत गज़ल
को उनके योगदान के लिये शाल श्रीफल प्रदान कर और शाल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। उन्हें स्मृति चिन्ह भी प्रदान किये गये।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विमलकांत येंडे सेवा नि.महानिदेशक आकाशवाणी मध्यक्षेत्र थे। विशिष्ठ अथिथि मधुकर राव ठेंगे थे। अध्यक्षता दैनिक भास्कर छिंदवाड़ा के संपादक संजय गौतम ने की। कार्यक्रम का सफल संचालन शिवशंकर लाल ने किया। संस्था के अध्यक्ष रवींद्र नीलम सचिव रामलाल सराठे वरिष्ठ उपाध्यक्ष रमाकांत पांडे और कोषाध्यक्ष गुलाम मध्य प्रदेशी के प्रयासों से कार्यक्रम सफलता पूर्वक समपन्न हुआ।
राजनीति रह गई सिमटकर अम्मा और हवाला तक, मज़हब के झगड़े पहुंचे हैं,घर से अल्ला ताला तक।
अहले अदब की परिभाषायें,कुछ पंकज ऐसी बदली हैं, शेरो सुखन की दुनिया पहुंची,गालिब से खंडाला तक।
पंकज सक्सेनाजी की ये पंक्तियां पुस्तक के स्तर का बयान कर रहीं हैं।
भारतीय साहित्य सृजन संस्थान एवं कथा सागर सम्मान, 2012
भारतीय साहित्य सृजन संस्थान,पटना,बिहार एवं चर्चित त्रैमासिकी कथा सागर द्वारा पुरस्कार -सम्मान हेतु देश भर से आमंत्रित पुस्तकों में से नताषा अरोड़ा के उपन्यास युगान्तर को रांगेय राघव साहित्य पुरस्कार, सेैली बलजीत (पठानकोट) के कहानी संग्रह टप्परवास को राजकमल चौधरी साहित्य पुरस्कार ,भास्कर चौधुरी (कोरवा,छ0ग0) के कविता संग्रह कुछ हिस्सा तो उनका भी है को अमृता प्रीतम साहित्य पुरस्कार,वीरेन्द्र सरल(धमतरी) के व्यंग्य संग्रह कार्यालय तेरी अकथ कहानी को हरिशंकर परसाई साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।
कथा सागर साहित्य सम्मान-पुरस्कार -2013
भारतीय साहित्य सृजन संस्थान और कथा सागर पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साहित्य सम्मान-पुरस्कार ,2013 हेतु हिंदी भाषी लेखकों साहित्यकारों तथा पत्रकारों से प्रत्येक विधा की साहित्यिक कृतियां 31 दिसम्बर 2013 तक आमंत्रित हैं। अपनी प्रत्येक प्रविष्ट के साथ लेखक सजिल्द या पेपरबैक दो पुस्तके ,आत्म परिचय,रंगीन चित्र,दो टिकटयुक्त स्व पता लिखित लिफाफा तथा पंजीयन शुल्क 200 रूपये मनीआर्डर से निदेषक, भारतीय साहित्य संस्थान, प्लाट-6, सेक्टर-2, हारून नगर कालोनी, फुलवारी शरीफ (समीप रेलवे स्टेशन) ,पटना पश्चिम- 801505, बिहार के पते पर भेज सकते हैं। विस्तृत जानकारी हेतु टिकटयुक्त तथा स्व पता लिखित लिफाफा भेजें अथवा ईमेल पते पर संपर्क करें।
नेहा परविन
प्रबंधक
भारतीय साहित्य सृजन संस्थान
प्लाट - 6, सेक्टर - 2, हारून कालोनी
फुलवारिफ , पटना, 801505
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गुरुवार, 12 सितंबर 2013
साकेत का वार्षिक साहित्यिक समारोह एवं वैचारिक गोष्ठी संपन्न
साकेत साहित्य परिषद् सुरगी, जिला राजनांदगाँव द्वारा अपनी स्थापना के चौदह वर्ष पूर्ण होने पर वैचारिक गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। विषय था - '' लोक-साहित्य में मिथक '' कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात प्रगतिवादी समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. गोरेलाल चंदेल, खैरागढ़, ने फेबल ( Fable ) मिथक ( Myth ) और लीजेण्ड, में अंतर बताते हुए कहा कि हिन्दी शब्दकोश के लिए मिथक नया शब्द है। मिथक शोषित वर्ग द्वारा अपने शोषण का प्रतिकार करने के लिए रची गई कहानियाँ है जिसमें समाज का शास्त्र और समाज दोनों विद्यमान रहते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध गीतकार एवं साहित्यकार डॉ. जीवन यदु, खैरागढ़, ने कहा कि मिथक का अभिप्राय मिथ्या भी होता है क्योंकि इनमें घटित घटनाएँ मिथ्या होती है और तर्क व ज्ञान के द्वारा इसकी व्याख्या संभव नहीं है परंतु इसके द्वारा ज्ञान की तार्किक व्याख्या अवश्य की जाती है। मिथकों की रचना इसीलिए की गई हैं। लोककला व लोककथा के मर्मज्ञ डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि न सिर्फ हमारा लोक साहित्य, अपितु पौराणिक साहित्य भी मिथकों से भरे हुए हैं। मिथक में लोक का ज्ञान छिपा रहता है। इसमें रहस्यमयी प्राकृतिक घटनाओं की लोकव्याख्या निहित होती है। प्राध्यापक डॉ. शंकरमुनि राय ने कहा कि किसी एक भाषा या एक क्षेत्र के ऐसे बहुत से मिथक हैं जो देश के अन्य हिस्सों में भी पाए जाते हैं। समाज में ऐसे मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी कहे जाते हैं जो मिथकों पर आधारित होते हैं। जाहिर है, मिथकों का सीधा संबंध समाज से है। श्री यशवंत मेश्राम ने कहा कि लोक-समाज मिथकों के द्वारा अपने शोषण का विरोध करता है। कार्यक्रम के प्रारंभ में अपने आधार वक्तव्य में परिषद् के संरक्षक एवं कथाकार श्री कुबेर ने मिथकों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मिथक, मिथकों की उत्पत्ति एवं समाज में मिथकों की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा कि मिथकों की रचना लोक-समाज के बौद्धिक वर्ग ने ही प्रकृति की अजेय, विकट व रहस्यमयी शक्तियों की अभ्यर्थना हेतु अथवा प्रकृति की ऐसी ही किसी घटना की व्याख्या करने के लिए अथवा प्रकृति की सुकोमल, विश्वकल्याणकारी स्वरूप से प्रेरित होकर अनायास ही किया होगा परंतु बौद्धिक वर्ग द्वारा रची गई इस तरह की कोई भी कहानी लोक-स्वीकार्यता और लोक-मान्यता प्राप्त करने के पश्चात् ही मिथक बन पाई होगी। ज्ञान के आधार पर मिथकों की रचना नहीं हुई है अपितु मिथकों के आधार पर ज्ञान का विकास अवश्य हुआ है। हर समाज, हर भाषा, हर जाति, हर देश का अपना-अपना मिथक होता है। मिथकों की रचना समाज की मान्यताओं और परिस्थितियों के अनुसार ही हुआ होगा।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक- संगीतकार श्री खुमान साव, साहित्यकार आचार्य सरोज द्विवेदी, श्री सुरेश सर्वेद (साहित्यकार एवं संपादक, विचार वीथी) तथा हास्य कवि श्री पद्म लोचन शर्मा ' मुँहफट ' ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर परिषद् के सदस्य श्री कुलेश्वर दास साहू को ' साकेत सम्मान-2013 ' से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में ' लोक साहित्य में मिथक ' विषय पर केन्द्रित परिषद् की स्मरिका ' साकेत - 2013 ' का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम में भिलाई से पधारे साहित्यिक संस्था सिरजन के प्रांतीय अध्यक्ष श्री लोकनाथ साहू तथा संयोजक श्री दुर्गा प्रसाद पारकर, राजनांदगाँव से पधारे श्री चन्द्रशेखर शर्मा, साकेत साहित्य परिषद् के सभी सदस्यों सहित बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी एवं ग्रामीणजन उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन परिषद् के सलाहकार श्री ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' तथा सचिव श्री लखनलाल साहू ' लहर ' ने किया। आभार प्रदर्शन परिषद् के अध्यक्ष श्री थनवार निषाद ' सचिन ' ने किया।
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