इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
दोहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दोहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 26 अगस्त 2025

हरितालिका तीज

मोहन लाल कौशिक


हिन्दूधर्मी   नारि   के, तीजा   बड़े   तिहार।
भाद्र सुदी तिथि तीज के, महिमा अपरंपार।।

शैलसुता हर व्रत रखिस, निर्जल आठों याम।
अर्धांगिनि शिव के बनिस, पूरन होइस काम।।

तिजहारिन मन पूर्व दिन, खाथे ताजा भात।
तेकर  सँग  खाथे सबे , करू-करेला  साग।।

उमा महेश्वर के कथा, सुनथे सब चितलाय।
शिव भोला अनुहार ही, स्वामी रहै सहाय।।

अमर सुहागन ही रहॅव, पति परमेश्वर संग।
मया-प्रीत बाढ़य सदा, झन उतरय ये रंग।।

गिरिजा माँ शिव-शंभु प्रभु, दीजै यह वरदान।
अहिवाती  हरदम जिऊँ, मोर  होय  कल्यान।।

बिलासपुर (छ.ग.)

शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

सावन दोहा

                   राज साहू

आवय सावन झूम के, खुश होवय सब जीव।
राग  ददरिया गीत मा, रखय  किसानी  नीव।।
हरियर-हरियर रूख हे, हरियर  चारो ओर।
सावन के स्वागत करत, नाचत वन मा मोर।।
करिया बादर संग मा, पानी के बौछार।
पावन पबरित माह मा, सींचय अमरित धार।।
लाल  चिरइया, सेवती, फूले  सुघ्घर  फूल।
महके  भुइया  अंगना, इत्तर  गेहे घूल।।
नदियाँ नरवा भरत हे, पानी बरसत जोर।
टर्रावत हे मेचका, झींगुर करथे शोर।।
चूहत हे छानी खदर, झड़ी करत दिन रात।
भजिया रोटी रांध के, खावव ताते तात।।
मोरा ओढ़े खार मा, दाई गाये गीत।
खुमरी पहिरे खेत मा, करय बियासी मीत।।
सावन में जाथे सबो, महादेव के धाम।
गाँव गली काँवर धरे, बोलय शंभु नाम।।
बेल धतूरा फर चढ़े, चढ़थे नरियर  पान।
हाथ जोड़ सुमरन करे, पाथे वो वरदान।।
नदिया  नरवा बाढ़गे, हाक  परत  हे  रोज।
पानी खुसरय गाँव मा, जगा  ठोसहा  खोज।।
उबुक-चुबुक होवत गली, डूबय कतको जान।
पानी-पानी हे दिखत, दया करव भगवान।।
 ६२६३२३२१४३
नगर पंचायत समोदा

शुक्रवार, 26 मई 2023

कुछ दोहे

 

lhrkjke xqIrk]
usd  dke  djds  djsa  tks  fut efgekxku]
gksdj  Hkh  os  dqN cM+s   gksrs  ugha  egkuA

 

vgadkj dk  tc ryd  djks  ugha  fuLrkj]
izse  I;kj ikrk  ugha]   nqfu;k  esa  foLrkjA

 

nq[k esa gks dksbZ vxj  er dj  dqN rw [+kkl]
cl tkdj  gks tk  [kM+k  dsoy mlds iklA

 

va/kdkj  gS gj txg  ij  er  gks   ek;wl]
gj ysxk dy fQj frfej  lwjt  L;kghpwlA

 

nqfu;k esa  laHko lHkh]  ;”k  cy  izse  izHkko]
tks Hkh  ikuk  gS  ;gk¡  izcy  dhft,  HkkoA

 

pkgs  ftl  nj  tkb,  ysdj  viuh  vkl]
iwjh  mldks  djsxk]  eu  dk  gh  fo”oklA

 

Å¡pkbZ  dks  txr  dh  xj  djuk gS Li”kZ]
thou  esa  jf[k,  lnk  dqN  Å¡ps  vkn”kZA

 

x+yr ckr  ij  jgksxs  vxj  lnk  pqipki]
viuh  ut+jksa  esa  Lo;a  fxj tkvksxs  vkiA

 

laca/kksa  dh  uko  dks  ys  tkuk  tks  ikj]
mEehnksa  dk  Hkkj  tks  igys  mls  mrkjA

 

tks  efnjk  ih  izse  dh  jgrs  gSa  engks”k]
fjDr dHkh  gksrk ugha]  mudk thou  dks”kA

 

er  niZ.k ds  ikl tk  er rw  :i  fugkj]
eu&niZ.k  esa  >k¡ddj]  igys  mls  l¡okjA

 

gksrh  vius  vkils]  tc  thou  Hkj  tax]
Hkjrk  thou  esa  rHkh]   lPpkbZ  dk  jaxA

 

Å¡pkbZ  ij  igq¡puk  ugha  dfBu  rw tku]
ynk  gqvk tks ihB ij  de dj ns lkekuA

 

ftlus  thou  esa  ugha  fd;k  dHkh  la?k’kZ]
mls  lQyrk ij ugha  gks  ldrk  gS  g’kZA

 

ftuds eu  jgrs lnk  dqfRlr dqfVy fopkj]
muds  eu  gksrk  ugha   vk”kk  dk  lapkjA

 

tks thou iFk ij  pysa  vius eu dks  lk/k]
gksrk  mudk gh  lnk  thou  iFk  fuckZ/kA
 
jfg,  nkSyrghu  gh   cs”kd   uke   vuke]
dBiqryh  er  vkSj  dh   cuuk  lhrkjkeA

 

,-Mh- 106 lh-] ihreiqjk]
fnYyh & 110034
eksck0 ua0 9555622323

Email : srgupta54@yahoo.co.in

रविवार, 5 मार्च 2023

दोहे

lhrkjke xqIrk]

usd  dke  djds  djsa  tks  fut efgekxku]
gksdj  Hkh  os  dqN cM+s   gksrs  ugha  egkuA 
 
vgadkj dk  tc ryd  djks  ugha  fuLrkj]
izse  I;kj ikrk  ugha]   nqfu;k  esa  foLrkjA
 
     nq[k esa gks dksbZ vxj  er dj  dqN rw [+kkl]
cl tkdj  gks tk  [kM+k  dsoy mlds iklA
 
va/kdkj  gS gj txg  ij  er  gks   ek;wl]
gj ysxk dy fQj frfej  lwjt  L;kghpwlA
 
      nqfu;k esa  laHko lHkh]  ;”k  cy  izse  izHkko]
tks Hkh  ikuk  gS  ;gk¡  izcy  dhft,  HkkoA
 
      pkgs  ftl  nj  tkb,  ysdj  viuh  vkl]
iwjh  mldks  djsxk]  eu  dk  gh  fo”oklA
 
       Å¡pkbZ  dks  txr  dh  xj  djuk gS Li”kZ]
thou  esa  jf[k,  lnk  dqN  Å¡ps  vkn”kZA
 
x+yr ckr  ij  jgksxs  vxj  lnk  pqipki]
viuh  ut+jksa  esa  Lo;a  fxj tkvksxs  vkiA
 
laca/kksa  dh  uko  dks  ys  tkuk  tks  ikj]
mEehnksa  dk  Hkkj  tks  igys  mls  mrkjA
 
tks  efnjk  ih  izse  dh  jgrs  gSa  engks”k]
fjDr dHkh  gksrk ugha]  mudk thou  dks”kA
 
       er  niZ.k ds  ikl tk  er rw  :i  fugkj]
eu&niZ.k  esa  >k¡ddj]  igys  mls  l¡okjA
 
       gksrh  vius  vkils]  tc  thou  Hkj  tax]
Hkjrk  thou  esa  rHkh]   lPpkbZ  dk  jaxA
 
Å¡pkbZ  ij  igq¡puk  ugha  dfBu  rw tku]
ynk  gqvk tks ihB ij  de dj ns lkekuA
 
       ftlus  thou  esa  ugha  fd;k  dHkh  la?k’kZ]
mls  lQyrk ij ugha  gks  ldrk  gS  g’kZA
 
ftuds eu  jgrs lnk  dqfRlr dqfVy fopkj]
muds  eu  gksrk  ugha   vk”kk  dk  lapkjA
 
tks thou iFk ij  pysa  vius eu dks  lk/k]
gksrk  mudk gh  lnk  thou  iFk  fuckZ/kA
 
     jfg,  nkSyrghu  gh   cs”kd   uke   vuke]
dBiqryh  er  vkSj  dh   cuuk  lhrkjkeA

 

,-Mh- 106 lh-] ihreiqjk]
fnYyh & 110034
eksck0 ua0 9555622323

Email : srgupta54@yahoo.co.in

सोमवार, 25 नवंबर 2019

अंकुर सहाय 'अंकुर' के दोहे

1.
गुणा - योग के चिह्न को,सही -सही पहचान।
भाग रही है ज़िन्दगी, घटा जा रहा मान।।
2.
जीवन सत्ता झूठ की, करके सच्चा भोग।
वाह - वाह करते हुए, हवा हुए हैं लोग।।
3.
तन पर तम छा जाय पर, बुझे न मन का दीप।
मन है मोती प्रेम का, तन है उसका सीप।।
4.
कौन छला? किसको छला? किसकी कैसी चाल।
सस्ता जीवन हो गया, मँहगी रोटी दाल।।
5.
काँव - काँव हर ओर है, नहीं छाँव में ठाँव।
राम हुए राजा! पड़ा, आज कीच में पांव।।
6.
नैन निहारे नेह से, नभ के भी उस पार।
जहाँ ईश साकार हो,हो प्रियतम का द्वार।।
7.
नये दौर का आदमी,बदल रहा है ढंग।
रंगत उसकी देख के, है गिरगिट भी दंग।।
8.
ख़त्म हुई संवेदना, आज हुए निष्प्राण।
कब आंसू की धार ने, पिघलाये पाषाण।।
9.
अम्मा बूढ़ी हो गयी,रही एक ही चाह।
बच्चे को मेरे कहीं, लगे न कोई आह।।
10.
बदल गए हालात अब, बदल गए संयोग।
रिश्ते भी कपड़े हुए, रोज बदलते लोग।।
11.
मां ममता की छांव है, करुणा सिन्धु अथाह।
आंचल में जिसके सदा, रहता प्रेम प्रवाह।।
12.
अंकुर मन के प्यास की, कौन सुनेगा पीर।
चुप्पी सागर साध कर,पी डाला सब नीर।।
13.
देख बुढ़ापा सामने, बिलख उठे मां - बाप।
अपने कन्धे पर हमें, ईश उठा लें आप।
14.
वंश वृक्ष अपना फले,खुले  स्वर्ग का द्वार।
इक बेटे की आस में, बिटिया जनमी चार।।

ग्राम - खजुरी,
वाया - अहरौला, तहसील - बूढ़नपुर
जिला - आज़मगढ़, पिन.223221
मोबाइल नम्बर- 9454799898
ईमेलः asstava1985@gmail.com

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

अमन चाँदपुरी के दोहे

रुख़ से रुख़सत कर दिया, उसने आज नकाब।
लगा अब्र की कैद से,  रिहा हुआ महताब।।

आँखें ज़ख्मी हो चलीं, मंज़र लहूलुहान।
मज़हब की तकरार से,  मुल्क हुआ शमशान।।

लब करते गुस्ताख़ियाँ  नज़रें करें गुनाह।
ज़हन - ओ - दिल बस में नहीं, कर मुआफ़ अल्लाह।

इश्क मुहब्बत में मियां,  ज़ीस्त हुई बर्बाद।
ज़िंदा रहने के नये, सबब करो ईज़ाद।।

खिड़की से परदा हटा, जाग उठी उम्मीद।
कई रोज़ के बाद फिर हुई चाँद की दीद।।

एक पुत्र ने माँ चुनी, एक पुत्र ने बाप।
माँ - बापू किसको चुने, मुझे बताएँ आप?

अमन तुम्हारी चिठ्ठियाँ, मैं रख सकूँ सँभाल।
इसीलिए संदूक से, गहने दिये निकाल।।

मिट्टी को सोना करें, नव्य सृजन में दक्ष।
कूंज़ागर के हाथ हैं, ईश्वर के समकक्ष ।।

राजनीति के हैं अमन बहुत निराले खेल।
गंजों को ही मिल रहे, शीशा, कंघी, तेल।।

अपनी मुख से कीजिए, मत अपनी तारीफ़।
हमें पता है, आप हैं, कितने बड़े शरीफ़।।

प्रेम किया तो फिर सखे! पूजा - पाठ फुजूल।
ढाई आखर में निहित, सकल सृष्टि का मूल।।

किसकी मैं पूजा करूँ, किसको करूँ प्रणाम।
इक तुलसी के राम हैं, इक कबीर के राम।।

अंगारों पर पाँव हैं, आँखों में तेज़ाब।
मुझे दिखाए जा रहे, रंगमहल के ख्¸वाब।।

मानवता के मर्म का, जब समझा भावार्थ।
मधुसूदन से भी बड़े, मुझे दिखे तब पार्थ।।

सृष्टि समूची चीख़ती, धरा बनी रणक्षेत्र।
नीलकंठ अब खोलिए, पुनः तीसरा नेत्र।।
मिट्टी को सोना करें, नव्य सृजन में दक्ष।
कुम्भकार के हाथ हैं, ईश्वर के समकक्ष ।।

लगा सोचने जिस घड़ी, दूर बहुत है अर्श।
गुम्बद के साहस ढहे, हँसी उड़ाये फर्श।।

उनकी फ़ितरत सूर्य - सी, चमक रहे हैं नित्य।
मेरी फ़ितरत चाँद - सी, ढूँढ रहे आदित्य।।

कुंठित सोच - विचार जब, हुआ काव्य में लिप्त।
शब्द अपाहिज हो गए, अर्थ हुए संक्षिप्त।।

दूषित था, किसने सुनी, उसके मन की पीर।
प्यास - प्यास रटते हुए, मरा कुएँ का नीर।।

भोर हुई तो चाँद ने, पकड़ी अपनी बाट।
पूर्व दिशा के तख्¸त पर, बैठे रवि - सम्राट।।

शहर गए बच्चे सभी, सूनी है चौपाल।
दादा - दादी मौन हैं, कौन पूछता हाल?

नृत्य कर रही चाक पर, मन में लिए उमंग।
है कुम्हार घर आज फिर, मिट्टी का सत्संग।।

अलग - अलग हैं रास्ते, अलग - अलग गन्तव्य।
उनका कुछ मंतव्य है, मेरा कुछ मंतव्य।।

राम तुम्हें तो मिल गये, गद्दी सेवक दास।
पर सीता ने उम्र भर, झेला है वनवास।।

पलकें ढोतीं कब तलक, भला नींद का भार।
आँखों ने थक हारकर, डाल दिये हथियार।।

अधरों पर ताले पड़े, प्रतिबंधित संवाद।
हमने हर दुख का किया, कविता में अनुवाद।।

जर्जर  है  फिर  भी खड़ी, माटी  की  दीवार।
कब तक देगी आसरा, कुछ तो सोच - विचार।।

पायल  छम - छम  बज रही, थिरक  रहे  हैं  पाँव।
कहती मुझको ब्याह कर, ले चल प्रियतम गाँव।।

पोखर,  जामुन,  रास्ता, आम - नीम की छाँव।
अक्सर मुझसे पूछते, छोड़ दिया क्यों गाँव।।


ग्राम व पोस्ट-  चाँदपुर,तहसील-टांडा,
जिला- अम्बेडकर नगर(उ.प्र.)224230
मोबाः 09721869421
ई.मेल .kaviamanchandpuri@gmail.com

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

चउमासा बर दोहा

जीवन यदु

धरती रानी करे हवय, का निरजला उपास।
पूछे बर चउमास ला, भेजे हवय अगास।

पहली बूँद अगास ले, जे दिन गिरिस मितान।
छींचत हे तइसे लगिस, बादर बिजहा धान।

बादर पहली बेर जब, गरजिस जग - झगझोर
कोतवाल पारत हवय, हाँका जइसे खोर।

खुडुवा कस खेलय कभू, दउड़े पल्ला - मार।
पढ़वैया लइका सहीं, बादर के ब्योहार।

बिजुरी चमके रात मा, झक ले लगे अंजोर।
कोंटा में अंधियार तब, सपटे जइसे चोर।

चाहे घर - परछी चुहय, रेला धर ले धार।
तभो बरस बादर बबा, पानी प्रान - अधार।

बाँवत बर पानी गिरय, बाँवत माते खेत।
जेवन धर खटला खड़े, खाये के नइ चेत।

बड़ दानी बादर बबा, मन - भर देवय दान।
तरिया - नदिया दान मा, होवत हें भगवान।

सतरंगिया कमठा धरे, इन्दर खड़े अगास।
धरती बोलय- '' छोड़ सब, झटकुन खेत अपास ''
 गीतिका
दाउचौंरा, खैरागढ़
जिला - राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

खींच जायेगी खाल

ठाकुर दास सिध्‍द

पानी अपनी उम्मीदों पर फिरता आया।
है जन - जन का, मौसम - मौसम मन मुरझाया।।
जो ऊँचे पद पर बैठे हैं, वे नाचें बेताल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।1।।
वहाँ खनकते रहते मदिरा के नित प्याले।
और यहाँ जल की बूँदों के होते लाले।।
उनके सुख की खातिर आते, अपने देश अकाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।2।।
उजले - उजले तन होते पर नीयत खोटी।
होते उनके हाथ, हमारी होती चोटी।।
मुख खोला तो सर पर अपने, नहीं बचेंगे बाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।3।।
धन धनवानों का बढ़ता है, दिन.दिन दूना।
नित निर्धन के सपनों को है, लगता चूना।।
पोर - पोर इनका बिकने को है उनकी टकसाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।4।।
होता उसका जीवन - यापन ख़ूँ पी - पी के।
इधर तिमिर है, उनके घर पर, दीपक घी के।।
हथिया सूरज - चाँद.सितारे, शैताँ है खुशहाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।5।।
इठला - इठला कर चलते हैं, झूठ हठीले।
निज को पर्वत समझ रहे हैं बौने टीले।।
अपने मन में ऊँचाई के भ्रम को रखते पाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।6।।
कोई ना हो रोक - टोक कर पाने वाला।
उनका मन है होवे हर इक मुख पर ताला।।
तुरत दबा देते वे अपने उठते हुए सवाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।7।।
क्या बतलाएँ अभी पड़ेगा क्या - क्या खोना।
अब जाने क्या हाल गुलिस्ताँ का है होना ।।
फौज उलूकों की है बैठी आ के इक - इक डाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।8।।
आए अंधों की महफिल में पुजते काने ।
कहाँ शिकायत लिखवाएँ जब उनके थाने।।
उनके आघातों पर हँसना होना हमें निहाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।9।।
उनकी रग - रग में ख़ूँ के संग हिंसा दौड़े ।
ये निर्बल हैं वो बलशाली हाथ हथौड़े ।।
जो जयकार न की उसकी तो देगा फोड़ कपाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।10।।
झूठों का दरवार लगा बस झूठे जाते ।
दूर - दूर से देखो उनको शोर मचाते ।।
भूले से हम जो जा पहुँचे देंगे हमें निकाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।11।।
भेद भरे ही होते आए हैं बँटवारे।
अपने हक को वे खाते हैं ले चटकारे।।
भरी - भरी हैं देहें उनकी अपने तन कंकाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।12।।
मतलब साधे वह आश्वासन देकर झूठा।
दिखला देता है हमको वह फिर अंगूठा।।
मतलब होगा तो आश्वासन देगा पुन: उछाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।13।।
कुछ मत कह वह चाहे जितना पीटे - मारे ।
मुख खोला तो उगले उसका मुख अंगारे ।।
आँसू की इक बूँद न टपके चाहे हो बेहाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।14।।
सभी बिके हैं कौन करेगा उस पर शंका।
सच सुबके है झूठे का ही बजता  डंका।।
मौन खड़ा है सिहर गया सच, झूठा है वाचाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।15।।
काम रहे तक नित - नित उसका आना - जाना।
काम नहीं तो काम रहा है आँख  चुराना।।
व्यर्थ गया हर बार हमारे उर में उठा उबाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।16।।
अपनेपन का लगा मुखौटा घर पर आता।
घुसकर घर में फिर जी भर वह लूट मचाता।।
जो चुपचाप नहीं लुटता है उससे उसे मलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।17।।
कड़वापन है नख.शिख लेकिन मीठी वाणी।
नहीं कहीं है और अजूबा ऐसा  प्राणी।।
हिय होता ना होने जैसा होता पेट विशाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।18।।
लगी हाट ही दिखती चहुँदिश जिधर निहारो।
वे धन खनका कर कहते हैं मोल  उचारो।।
होता इन्सानों का सौदा पाते माल दलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।19।।
कदम - कदम पर छल के बल वे हम से जीते।
लपक लिए हैं उनने जग के सभी सुभीते।।
अपने मुख पर काली कालिख उनके भाल गुलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।20।।
आते लेकर नूतन - नूतन  नित.नित घातें।
हर दम उगला करते वे विस्फोटक बातें।।
वे आते तो उनके संग - संग आ जाता भूचाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।21।।
रहते उनके पास लूट के सौ हथकंडे।
देवालय का माल उड़ाते आए पंड़े।।
देखे सदियों ने निज नयनों, उनके कपट कमाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।22।।
वह कहता है लूट हमारी है लाचारी।
नामुमकिन है करे घास से घोड़ा यारी।।
वाह - वाह कहिए जब शैताँ देता गजब मिसाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।23।।
बैठ मचानों पर कुछ कायर वीर कहाते।
था साहस तो उतर धरा पर नीचे आते।।
कितने खतरे साथ हमारे दिशा.- दिशा दोनाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।24।।
बँधे हाथ मुख आजादी का राग अलापें।
अपने श्रम के औजारों पर उनकी छापें।।
जो अपने हाथों में है वो अपनी नहीं कुदाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।25।।
कपट छुपा कर सम्मुख आकर कहते भाई।
हैं युग - युग से करते आए कुटिल कुटाई।।
नयनों में गीलापन लेकर आते हैं घड़ियाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।26।।
वह चाहे उसके हों होटल पाँच.सितारे।
आम आदमी चाहे घुट - घुट दिवस गुजारे।।
मिले पेट को रोटी तो हो ठुमरी और खयाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।27।।
ख़ास.ख़ास का पल पल उत्सव सा है होता।
खाता खुशियों के सागर में नित.नित गोता।।
आम आदमी का इक.इक पल जीवन का जंजाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।28।।
लगी चोर के हाथ हमारे घर की चाबी।
रोक सकेगा कोई कैसे यहाँ खराबी ।।
अपने घर का कोना - कोना लेगा चोर खंगाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।29।।
उनका भारी भार उठाना है लाचारी।
निरख.निरख हलकापन उनका मन है भारी।।
कितना भारी जीवन होगा दिवस लगे जब साल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।30।।
गद्दा तकिया सिफ़र्  विदेशी उनको होना।
हमें शिलाओं पर ही पड़ता आया सोना।।
हमको केवल मुख ढकने को मिलता नहीं रुमाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।31।।
खेल रहा है उनका हर दम  ख़ून - खराबा।
अलग - अलग हैं उनके कारण काशी - काबा।।
उनकी तेगें कंठ हमारे होना हमें हलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।32।।
क्या कहिएगा हुई व्यवस्था कैसी लूली।
अब लाखों की लूट कहाती है मामूली।।
नई सदी के द्वार खड़ा है कैसा काल कराल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।33।।
आयातित है गाड़ी उसकी सरपट भागे।
बचना! उसको जीवन अपना सस्ता लागे।।
हम जिसको कहते अनहोनी होती होनी टाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।34।।
जिसको अपना समझा उसने गरल परोसा।
अगर करे तो कोई किस पर करे भरोसा।।
तूफाँ के हो गए यार हैं  निज नौका के पाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।35।।
होती हर दम उनके सम्मुख अपनी थाली।
हमको  खाने मिलती केवल उनकी गली।।
पूरे तन में आग लगाती उठी पेट की ज्वाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।36।।
उनके सम्मुख सारे मंतर पड़ते ढीले।
टप - टप टपके जहर ज़ुबाँ से हैं जहरीले।।
डसने को तत्पर हैं चहुँ दिश फन फैलाए व्याल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।37।।
देखो इतरा कर चलते हैं साहब - जादे।
तम का शासन भटकी दुनिया कौन दिशा दे।।
फैशन में आ गया पतन तो लेगा कौन सँभाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।38।।
कौन खरा है कौन यहाँ पर होता खोटा।
जो श्रम करता वह कहलाता आया छोटा।।
बड़ा वही कहलाता जो है होता बड़ा अलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।39।।
महल दुमहलों की ड्योढी पर बैठे चंदा।
सूरज के भी गले पड़ा  शैताँ का फंदा।।
तम के किरण.किरण पर पहरे रोती फिरे मशाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।। 40।।
लगे दूर से बड़े ज्ञान की चर्चा होती।
रुपया - पैसा हीरा - पन्ना माणिक - मोती।।
चोरी - चुरफंदी की बातें चोरों की चौपाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।। 41।।
हैं पग - पग पर जाल बिछे हम को उलझाने।
मनभावन लगते हैं उनके ताने - बाने।।जो उलझा फिर नहीं निकलता ऐसा मायाजाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।42।।


सिद्धालय 672/ 41 सुभाष नगर, 
दुर्ग - 491001 (छत्तीसगढ़ )
मो.919406375695

शेष आगामी अंक में ....

शनिवार, 29 नवंबर 2014

अन्‍दर के शैतान की

श्‍याम ' अंकुर '
अन्दर की शैतान की बात करेगा कौन?
सबके मन में चोर है, लोग तभी सब मौन।।
अन्दर के शैतान की,पूछ रहे क्यों जात?
नहीं किसी को छोड़ता, करता सबसे घात।।
अन्दर के शैतान की, बुझी न अंकुर प्यास।
कलियों को है नोंचता, लाज करे खल्लास।।
अन्दर के शैतान की, बढ़ती जाती भूख।
नोंच रहा हैं बोटियां, बनकर यह उल्लूख।।
अन्दर के शैतान की,चर्चा चारों ओर।
छीन रहा हैं रंक के, मुँह की रोटी कौर।।
अन्दर के शैतान की, बात न पूछो यार।
बाहर से तो मोम सा, अन्दर से खूँखार।।
अन्दर के शैतान की, खूनी है आवाज।
प्यार जता के मारता, लूट रहा है लाज।।

- पता - 
 हठीला भैरुजी की टेक
बन्डोला वार्ड, बारां - 325205
मो. - 09461295238

शनिवार, 30 अगस्त 2014

निष्‍ठुर निडर उदाघ ने

शिवशरण दुबे

निष्ठुर निडर उदाघ ने, निगल लिया नेह।
ढूँढे नदिया रेत में, अपनी चंचल देह।।
शुष्क नदी के तीर पर, खड़े रोवासे पेड़।
तपी दुपहरी ले गई, सबकी खाल उधेड़।।
चिड़ियों के जल - पात्र हों, प्याऊ के घट चार।
उसी गृही का घर लगे, गर्मी में हरि - द्वार।।
लहरों ने स्वागत किया, पढ़ें माङ्गलिक छन्द।
सागर के छूकर चरण, चले बलाहक वृन्द।।
मेघ मरुत - सहयोग से उड़कर चले सवेग।
ठहर - ठहर देते चले, गाँव - नगर को नेग।।
अनगिन जल - याचक मिले, खेत, पठार, पहार।
मेघों ने उपकृत किया, देकर शीतल प्यार।।
बहुत दिनों के बाद फिर लौटे हैं घनश्याम।
एक शाम आओ लिखें इन बूँदों के नाम।।
उतरी हिना हथेलियाँ, चढ़ा महावर पाँव।
सावन के आँगन नचा, फागुनवाला गाँव।।
झूमे लट, नथ, झुबझुबी ईंगुर चमके भाल।
सावन में झूले चढ़ी, चुनरी लगे रुमाल।।
नदिया अल्हड़ मनचली, चंचल लड़की एक।
हँसती रहती है सदा, सभी खिलौने फेंक।।
नदी नहीं अभिमानिनी, देती सबको ठाँव।
जो भी आये पास में, धोती सबकी पाँव।।
मन में सुन्दर भाव तो सुन्दर यह संसार।
बेटा, पिल्ला देखकर मन में उपजे प्यार।।
मन चंगा रैदास - सा हो जाये इक बार।
मिले कठौती में उसे गंगा जी का प्यार।।
जिसकी जैसी प्रकृति है उसका वैसा वास।
भौंरा रहता फूल में, गीदड़ मरघट - पास।।
जिससे हित, उसकी सुचित, सुन लो कड़वी बात।
बन्धु, दुधारु गाय की, सहनी पड़ती लात।।
सङ्कट को मत न्योतिये, करके अग्रिम शोर।
टेरे टिटिही साँप को, ज्यों चिंगनों की ओर।।
कूटनीति परिवार में, घुसी तोड़ दीवार।
डॉट - डपट आँगन करे, द्वार - देहरी रार।।
राजनीति के कर्म में, पेट - पीठ दो मर्म।
पेट दिखाना शर्म है, पीठ दिखाना धर्म।।
प्रेम कभी याचक नहीं, न ही याचना - दान।
प्रेम न प्रेमी से पृथक, प्रेम स्वयं भगवान।।
होती अन्धी वासना - वशीभूत जब वृत्ति।
होती हिरनाकुश - सदृश, असुरों की उत्पत्ति।।
जीवन मधुवन की हवा, जीवन संगीत।
जीवन अमृत - पान तब, जब जीवन से प्रीत।।
जीवन जगमग दिवास है, मौत अँधेरी रात।
जन्में दोनों साथ में चलते दोनों साथ।।
व्याही दसा जिन्दगी, बिना विवाही सौत।
आगे - पीछे चल रही, परछाई की मौत।।
मानव लोहा - वज्र है, मानव पत्थर - मोम।
मानव तारा - दीप है, मानव सूरज - सोम।।
लोभ - काम की बाढ़ में, घिरा फँसा संसार।
बही जा रही सभ्यता, तड़प रहे संस्कार।।
मिटे न कोरे ज्ञान से, भूख - ज्वाल विकराल।
पाणिनि प्रिय जब पेट में, पहुंचे रोटी - दाल।।
मैंने पूछा साधु से, क्या है यह संसार।
खाक हथेली पर रखा, फूँका हाथ पसार।।
आँगन ही देखो नहीं, देखो कभी पछीत।
कितने उगे बबूल या, लगे कहाँ भिड़ भीत।।
संबंधों की भीड़ में, सुख समीप भरपूर।
है सब कुछ तृण - तुल्य यदि माँ की ममता दूर।।
लघु दोहा प्रस्तुत करे, अमित अर्थ - विस्तार।
शहनाई प्रगटे यथा, बहुतक सुर - सिंगार।।

पता - 
दमदहा पुल के पास
कटनी मार्ग,
बरही म.प्र. - 483770 

गुरुवार, 22 मई 2014

दो दोहे

जगन्‍नाथ '' विश्‍व ''
बच्‍चे पुष्‍प समान 
बच्चे पुष्प समान है खुशबू के भंडार
खुशबू को गुरु लोग ही देते है विस्तार

गिरधर से भी है बड़ा गुरुवर का स्थान
इसीलिए है वंदनीय सारस्वत सम्मान

वेतन मिलता है तभी टीचर को सौ टंच
आवेदन पर ठोक दें ठप्पा गर सरपंच

वर्ष भर सहता रहता अध्यापक अपमान
शिक्षक दिवस इक मात्र ही मिल पाता सम्मान

लक्ष्मी देवी जम गई उल्लूओं के द्वार
डिग्री लेकर पढ़ा लिखा घूम रहा बेकार

चाता तो अनुकूल था गया धूल में मूल
उम्र सारी बीत गई बोये बीज बबूल

शनि कर्क संग हो गया ले आँधी तूफान
जब- जब भी ऐसा हुआ होता लहुलुहान

बंदर दाँत दिखा रहा पाकर लम्बी पूँछ
अकड़ रहा है आदमी और मरोड़े मूँछ
पर्यावरण आधार
धरती दुल्हन सी लगे पर्यावरण आधार
जन जीवन फूले फले हरियाली  ही सार

प्रदूषण मुक्ति के लिए चलो हमारे साथ
पौधे रोपे रोज ही सभी हजारों हाथ

अच्छा है हम जी रहे अपने अपने गाँव
यदि शहर में होते तो आते उल्टे पाँव

रोपा अब अनुकूल था पर पाया प्रतिकूल
गैरों को क्या दोष दें बोये बीज बबूल

गौ माता के देश में है गोबर का काल
बाँध सको तो बाँध लो पानी पहले पाल

सड़क ढूंढते - ढूंढते  बिगड़ गई रे चाल
बिजली भी बीमार है हाल हुआ बेहाल

भूले चंदन की महक भूले रंग गुलाल
इक दूजे पर बेशरम कीचड़ रहे उछाल
'' मनोबल '' ,25 एम.आई.जी.
हनुमान नगर, नागदा जं. म.प्र. 456335
ई मेल : jagannthvishwa@ gmail.com 

उसके हाथों में नहीं

ब्रजभूषण चतुर्वेदी '' ब्रजेश ''
उसके हाथों में नहीं आजादी की रेख।
अब भी धनिया ढो रही, सिर पर मैला देख।।
संविधान ने दे दिया, समता का अधिकार।
पर होरी के भाग्य में, लिखी वही बेगार।।
सब रिश्तों को भूल कर, बस दौलत से प्यार।
आज आदमी कर रहा, यह कैसा व्यवहार।।
बहशी बाजों ने किया, जब से लहूलुहान।
खोई है उस रोज से, चिडिय़ा की मुस्कान।।
आजादी की भोर में होरी मिला उदास।
रहन महाजन के रखा खुशियों का मधुमास।।
काले धन की हो रही चर्चा चारों ओर।
कैद तिजोरी में हुई, आजादी की भोर।।
आज व्यवस्था दे रही, कैसे - कैसे घाव।
अंतर से उठने लगा, पीड़ा की सैलाव।।
लूट अपहरण हादसे, हत्या बलात्कार।
लाते हैं खबरें यही, रोज सुबह अखबार।।
नेताओं ने कर दिये, सपने लहूलुहान।
आजादी हित जो दिये, व्यर्थ गये बलिदान।।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

लोकतंत्र का रास


  • अशोक '' अंजुम ''
लोकतंत्र से लोक का, मुश्किल हुआ निबाह
राजाजी की जीभ पर, बैठा तानाशाह
लोकतंत्र की खाद का ये था असर महीन
समरसता की अंतत: बंजर हुयी ज़मीन

लोकतंत्र की राह में, राजतंत्र की धूम
शीश झुका जय - जय करे, उमड़ा हुआ हुजूम

बाहुबली कुर्सी चढ़े, हुए श्रेष्ठतम सिद्ध
जनता गौरैया बनी, नेता जैसे गिद्ध

मनमोहन की बाँसुरी, लोकतंत्र का रास
आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास

अंधकार का हो रहा, लोकतंत्र अभ्यस्त
करते - करते जागरण, हरकारे है त्रस्त

पोस्टमार्टम से हुआ, ये जनता को ज्ञान
नेताजी की अब तलक, थी कुर्सी में जान

समरसता के नाम पर, कर बापू को याद
राजघाट पर रोज ही, सिसके गाँधीवाद

मुँह बिचकार कह रही, ' अंजुम' जेल तिहाड़
कहाँ - कहाँ से भर दिया, लाकर यहाँ कबाड़

' अंजुमजी ' इस दौर में, यही कष्ट है मात्र
हो प्रविष्ट किस भाँति अब सही जगह पर पात्र 

पता
सम्पादक '  अभिनव प्रयास '
गली - 2,चन्द्रविहार कॉलोनी, 
क्वारसी बाइपास, अलीगढ़ 202001( उ.प्र.)
मोबाईल : 09258779744,09358218907

सोमवार, 3 जून 2013

दोहा

  • विट्ठल राम साहू 'निश्छल'    
गाँव - गाँव म उछा - मंगल, ढोलक मंजीरा झाँझ।
भरे - भरे सब खेत खार हे मुसकावत हे साँझ॥
अँगना म तुलसी हाँसे, बरसा गाये गीत।
डोहड़ू फूल मगन होगे, आगे मोर मनमीत॥

धीरे - धीरे गाँव के, सबो खेत होगे लीलाम।
परलोखिया सहर होगे, नउकरी हे न काम॥
दिन - दिन बदलत जात हे, लोगन के बेवहार।
तईहा ल बईहा लेगे, रीसता तीज - तिहार॥

बिसनी बासन मांजथे, नॉगर जोताय बलराम।
दाई बेटा के भाग म, इही लिखे हे काम॥
कहां खोजव आज मैं वो बुढ़ुवा बर के छाँव।
अपन गोदी म बइठारे जउन, धर के दुनों बाँह॥

मोल कोनो नई जाने गा, पीरा हे अनमोल।
बिते काल गवाही हे, का जानही गा भूगोल॥
अब न ये मोर घर लगे, न मोर मयारूक गाँव।
मया पिरीत नई हे इहाँ, चल मया पिरीत के ठाँव॥

मन कहिथे अब महूँ लिखैं, एक ठन अइसे किताब।
सुख - दुख के आखर जिंहा, मिलजुर करय हिसाब॥
निश्छल ये जग म आ के, करनी कर ले नेक।
अपन बर तो सबो जीथे, पर बर जी के देख॥