इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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बुधवार, 23 सितंबर 2026

नवा महाभारत

एक दिन धृतराष्ट्र अपन चुकचुकहा आँखी ल चपकत-लिबलिबावत कहिथे - ‘देख तो रे संजय ! मोर आँखी के पुतरी दुर्योधनमन का करत हे ?’ 
संजय टी.बी. के बटन ल दबावत कहिस - ‘आज कइसे उदुपहा राजमहल के सुरता आ गे कका ?’ 
‘का करबे रे ! चिखला म गदफदाए मनखे पानी ल नइ सोरियाही त अउ काला सोरियाही ?’
संजय मने मन गुनथे - ‘एक गोड़ हँ कबर म ओरमे हे। तभो खुरसी के पाया म दम अरझेच्च् हे।’
टी.बी. के समाचार चैनल म समाचार चले लगिस। 
संजय बतावथे - ‘महराज ! जब ले दुर्योधन ल युवराज बनाए हस, तब ले देस के जनता त्राहि-त्राहि हो गे हे। तोर टूरामन सत्ती उप्पर बजनिया खेलत हे। उन ल गुण्डागर्दी, दलाली, जुआ-चित्ती अऊ मंद-मऊहा के छोड़ कुछु दिखबे-सूझबे नइ करत हे।
संजय के करू-करू गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के रूवाँ-रूवाँ ठढ़िया गे। भोभला मुँह के बाचे-खुचे दाँत ल हुँड़का कस किटकिटावत पूछथे - ‘का कहिथस संजय ? तोला बाय-बयरासू तो नइ धर ले हे। मोरे आघू म मोरे बेटामन के माँस बेचत हस।’
संजय हँ गाँधीछाप खादी के विनम्रता ल ओढ़के कहिथे - ‘गलत काहत होहूँ त पाँच पनही मार लौ महराज ! फेर अइसन चुगल-जुगलखोरी के लाँछन झन लगावव। येमा मोर का गलती हे ? जेन हे तेला बतावत हौं।’
बोले बर मुँहू तो नइ उलय-खुलय। फेर तोर लइकन के करनी हँ मुँह ल खोलवावथे। उन तो ठाड़ आगी म मूतत हे। अपन मुँह ल अतेक करिया कर डारे हे कि नीत-अनीत नइ चिन्हत-देखत हे। येमा तुँहरो कोनो दोस नइ हे महराज ! गँहू के रोटी टेड़गा राहय के कुबरा राहय, मीठे लगथे। तइसे अपन लइका चोरहा-ढोरहा रहय के अलाल-दलाल रहय नीके लगथे। 
तभो ले अपन लइका ल सरू झन काहय। पीतल के लोटा ल चरू झन काहय। अइसन म अपन पेंदी खियाए के डर जादा रहिथे। इत-उत उलण्ड-घोलण्डके मान-मरजाद म बाधा-ब्याधा परथे, तेन हँ अलग।
तैं तो जानत रेहेस के दुर्योधन हँ मोर चिरई के एक गोड़ वाले लइका हरे  कहिके। तभो आँखी म देखके माँछी ल खाए हस। नानपन के तोर सबके सब लइका मूत म दीया बरइया आय। तभो तैं जानबूझ के मुड़़ म पनही पहिरे हस। वोमन ल पंदोली देके रूख म चढ़ाए हस। 
संजय के अतेक मुँह म थूँकई ल देख-सुनके धृतराष्ट्र के मुँह सिला गे। आँखी के कोन्टा-कोन्टा म छबड़ाए चिपरा ल अपन पिताम्बर म पोंछत कहिथे - ‘अभी कोन मेर हे ? का करत हे ?’ 
संजय टी.बी. के आवाज ल थोरिक अऊ बढ़ा दिस। आगू बतावत हे। 
दुर्योधन हँ युवराज बनते साथ चउँक-चउँक म दारू भट्ठी खोल दे हे। अइसे कोनो चउँक नइ होही जिहाँ भट्ठी नइ होही। जिहाँ भट्ठी नइ हे, त समझ ले कि रिकार्ड के अनुसार वोहँ चउँक नोहय, समसान घाट हरे। 
पांडो मन ल दारू पीया-पीयाके जुआ खेलावत हे, उचकावत हे। युधिष्ठिर हँ एक के बाद एक जम्मो दाँव ल हारत जात हे। जम्मो दाँव ल दुर्योधन हँ बइमानी ले खेलत हे। मुँह म भाँचा मन म खाँचावाले कपटी ममा सकुनी हँ ओला पंदोली देवत हे। 
ममा-भाँचा मिलके अतेक माछी के पीत निकालत हे कि युधिष्ठिर के जम्मो राजपाट ल जीते के पाछू एकक करके पांडो मन ल घला दाँव म लगवा डरिस।
राजदरबार म माछी तको बइठे ल छोड़ दिस महराज ! उहाँ कोनो मरे रोवइया नइ हे। वोदे एक झन दुरपति बाचे रिहिसे। उहू दाँव म लग गे। पासा पर गे। ले अब ! दुरपति घलो दुर्योधन के दासी हो गे।
धृतराष्ट्र पूछिस - ‘संजय ! त का राजसभा म पितामह, द्रोनाचार्य, कृपाचार्य येमन कोनो नइ हे ?’ 
‘हावय महराज ! फेर वोमन तो मरे म मेंछा भर उपकारत हे। इन्कर राज-पाट आए के बाद उन मर-मरके जीयत हे। ये टूरामन तो जेने अँगरी ल धराके रेंगे बर सिखोए हे उन्करे लंगोट ल धर-धरके तीरत हे। उल्टा उही मन ल आँखी देखावत हे। 
सावन के अँधरा ल हरियरे-हरियर दिखथे कहिथे । कोन जनी जनम के अंधरा मन ल काए दिखत होही ते ? 
दुर्याधन हँ राजमहल के बरेण्डी म भुर्री बारके तापत हे। बाचे-खूचे कौरवमन चारो खूँट घूम-घूमके छीनत-झपटत बेंदरा बिनास करत हे। जिहाँ खुद राजा के मति छरिया जथे उहाँ मन कइच्चा, केंवची अउ केचहा हो जथे। अइसन राजपाट ले सबके मन उठ जथे। काँही उदीम कर लेवय। कोनो बेरा ककरो मन नइ गेदरावय। 
समाचार सरलग चलते हे। दुरपति ल दुसासन हँ जबरन बोहिके सभा म ले लाने हे। सभा के हॉल हँ मुँड़ धरऊल हो गे हे। बिचारी दुखिया हँ कोनो ल मुँहू देखाए के लइक नइ रहि गे हे। ओकर दसा हँ मुड़भर के हो गे हे। वोदे अब परलोखियामन एकक करके वोकर पहिरन-ओढ़न ल घलो तीरत हावय। वोहँ मुड़ी ल गड़ियाए कल्हर-कल्हर के रोवत हे।
अतका गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के आँखी हँ अजब-गजब किसम ले लिबलिबाए लगिस, चमके लगिस। हाथ-गोड़ फरके लगिस। कोन जनी वोकर मन म कोन रस के संचारी भाव संचरे लगिस ते ? अंतस के झरत-पझरत चुहत -चुचुवावत रसा तो भीतरे-भीतर सपेटा गे फेर ओकर मुँह के कोर-कोर म ‘चपचप-ले’ पचपचावत गाजा हँ गजगजाए लगिस। 
संजय समझे नइ सकिस। 
संजय आगू बताथे के एती दुरपति के चीरहरन होवथे। मीडिया वालेमन कोन्टिया -कोन्टियाके पोण्डा देख-देखके फोटू खींचत हे। वीडियो बनावत हे।
धृतराष्ट्र बड़ अचंभो म पर गे। मुँह ल बीता भर फारके पूछथे - ‘वोमन फोटू काबर खींचत हे ?’ 
संजय कहिथे - ‘कोन जनी महराज। जेन देस-राज के मीडिया हँ चड्डी भर पहिरे सनी लियोन, पूनम पांडे सहीन चिपरी-चिपरी टूरी ल रातो-रात स्टारडम बना सकत हे। उन्कर ये फोटू उतारे के पीछू घलो कोनो न कोनो जबर कारन जरूर होही। ये मीडिया के सोनजुग हरे महराज ! माने हमर परजातं़त्र हँ स्वतंत्र अउ मजबूत हो गे हे। येमा कोनो दू मत के बात नइ हे। 
धृतराष्ट्र मुड़ी ल पटकत कहिथे - ‘वो सभा म कोनो नर-नियाव हे, कि नहीं ?’ 
संजय कहिथे - ‘का नर-नियाव ल कहिबे। जिन्कर मुँह म नाक नइ होवय तिन्कर बर नारी अउ मरी दूनो बरोबर होथे महराज ! अउ कानून तो तुँहरे बनाए ये। उहू महारानी कस आँखी म टोपा बाँधे राजधरम निभावत हे।’ 
गँहू के रोटी ल जेती ले टोरबे तेती मुँह बन जथे। तइसे कानून ल जेती ले मोड़-तोड़, मुड़का-घुमा, लहुटा-पहुटाके देख ले। ओला तो सबूत चाही। साबूत सबूत ले ताबूत के मुरदा घलो उठके दऊड़े लगथे। कागज के भरोसा कोनो कोती रेंगा ले। गलत करे हस तभो वोला प्रमान चाही। सही करे हस तभो प्रमान चाही। कागज म जऊन लिखाए हे उहीच् ल तो असल प्रमान माने जाथे।
अब तो अपराधी अतका हुसियार हो गे हे कि करिया हाथी ल मारके घला हत्या आय के नोहय ओतके बर कानून ल दस साल घुमा देथे। अइसन कानून के का भरोसा करबे ? उहू खादी छाप कपड़ा अउ गाँधी छाप नोट के इसारा ल समझे-माने-चले लगे हे। 
संजय के बात ल सुनके जनम के इरखाहा, अनदेखना अउ अटेलिहा धृतराष्ट्र के लहू अउँटे लगिस। मन तो हो गे रिहिसे कि संजय ल नक्सल प्रचार अउ आतंकी सहयोगी बता देववँ। जेल म ठुँसुवा-ठोंकवाके खेले खतम कर देववँ। गज्जब टाँय-टाँय करत हे। 
उदुपहा फेर सोचथे - ‘अरे मैं मरवई देहूँ त जुवाब तो मुहीच् ल दे बर पर जही। तेकर ले मुखबीरी के बहाना नक्सलाइडे मन से धुँकुवा देथवँ। साँपो मर जही लाठियो नइ टूटही। हूँ उँ उँ......।’ 
फेर बूढ़त खानी अउ सिंघासन ले रिटायर होए के बाद कुछू तो मनोरंजन के साधन होना चाही। ये संजय रूपी टीबी ल फोर-फार देहूँ त मोर दिनो हँ तो नइ कटही। ये सब बात ल सोचके धृतराष्ट्र कट्ट-खाए चुप आँखी ल लिबलिबाके रहि गे।
पद जाए के बाद मनखे के काम आँखी लिबलिबाना अउ जीभ लपलपाना भर तो रहि जथे। अउ कोनो काम-बूता बर तो सक नइ चल सकय। 
संजय ओकर अंतस के उमड़त-घुमड़त धुँध-धुँगिया ल अपन सीसी टीबी के कैमरा ले देख डरिस। 
धमकावत कहिस - ‘ये मौन-मुक्का, भकुवाए अउ मनमोहना मुड़ी ल टेटका कस हलाना-डोलाना छोड़ दे कका ! तोर मन म का चलत हे ? सबके लेखा-जोखा मोला मिल गे हे। अभी स्टिंग आपरेसन चलाके तोर धनिया बो देहूँ। अतेक दिन ले पद म रहिके घाम म तपस्या भर नइ करे हौं।’
पद के प्रति निस्ठा, प्रतिस्ठा अउ गरिमा उही म होथे जब कद बढ़ाके गदफद गदर मचाए जाय। अउ अइसन करइया ही असल अधिकारी होथे। 
धृतराष्ट्र सकपका गे। माने मीडिया के मार म महराजो मूतथे। 
नंगा ले खुदा डरे।
संजय आगू कहिस - ‘सुन ! सरी दिन के भुईयाँ म पसीना ओगरइया पांडो मन ल दुर्योधन काहत हे।’ 
‘का काहत हे रे ?’  - धृतराष्ट्र बोहावत नाक ल सड़सड़ ले तीरत-सरमेटत पूछिस। 
‘अब ये भुईयाँ म तुँहर अधिकार नइ हे। हमर राज ये। हम जब चाहन जइसे चाहन, ये भुईयाँ के उपयोग-उपभोग करन कि येमा अखारा खोलन। तुँहर पूछे -गउँछे के काम नइ हे। हम चाहन त राष्ट्रभक्त ल देसद्रोही कहिके फाँसी चढ़ा देवन। चाहन त देसद्रोही ल सर्वोच्च सम्मान दे देवन। चमत्कार ल बलत्कार काहन कि बलत्कार ल चमत्कार कहि देवन, हमर मरजी।’ 
कहिथे - ‘तुमन तो अब दास हो गेव रे ! एक ठो खुरसी के लाइक नइ रहि गेव। अब तो तुमन इहाँ बइठे-बोले घला नइ सकव। विरोध करई तो गजब दुरिहा के बात हो गे।’
ले, जेने मालिक ये उन्करे मुँह म पैरा गोंजके मुँह ल सीलत हे।
दुर्योधन के मुँह अउ चाल दूनो म कीरा पर गे हे। जम्मो दरबारी मुँह ओथराए कलेचुप बइठे हे। पांडो मन उठके रेंगत हे अब। 
धृतराष्ट्र आधा खुसी आधा गम के रम ल ढरकावत-ढोंकत पूछथे - ‘कहाँ जावत हे पांडो मन रे ?’
‘महाभारत के तियारी करे बर जाथे महराज ! अउ कहाँ जाही !’ 
धर्मेन्द्र निर्मल 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

कुकुर कटायन

धर्मेन्द्र निर्मल

राम रमायण तिहाँ कुकुर कटायन। जिहाँ शुभ काम के शुभारंभ होथे, उहाँ कुकुरमन के पहुँचना जरूरी होथे। कुकुर मन के अइसन शुभ पदार्पण ल देखके कभू-कभू सुग्घर भरम होय लगथे कि हमर बसेरा सरग म हे। 
कभू-कभार खोपड़ी म ये प्रश्न अभर-उभर जथे कि शुभ-अशुभ कोनो किसम के बूता होवय, इन्कर बिना असंभव हे का ? जइसे छट्ठी होवय कि मरनी, नाचा होवय कि रामलीला नेता मन के उद्घाटन करे बिना व्यर्थ, गारद अउ असंभव होथे। 
कोनो मेर दू चार झिन मिलके बने विचार-विमर्ष करत रहिबे। ओतके बेरा इन आके अलकरहा झगरा होवत विचार के बाँधा ल बाधा बन फोर-भंगला देथे। बने-बने सोचत-गुनत कलेचुप अपन रस्ता म जावत रहिबे। इन आगू म आके अपने -अपन भूँके लगथे। 
गाड़ी म रहिबे तभो दूरिहा के जावत ले भूँकत दऊड़ाथे। जानो-मानो अवइया-जवइया हँ सत्ता पार्टी के हरे अउ अपन हँ विपक्ष के कोनो कद्दावर खद्दरधारी। बिन मुद्दा के हुद्दा लगाए बर सरीदिन लुकपुकाए रहिथे। जतके भागबे उन ओतके भूँकथे-कुदाथे। कहूँ ‘चुप्प-बे’ कहिके दबकार देबे, ताहेन ‘सट्ट-ले’ चुप होके पूछी ल हलावत झटपट सुटुर-सुटुर रेंगे लगथे। 
अब ये भूँकना-डरवाना हँ दुनिया के रीत-चलागन होगे हावय । जे मनखे जतके डर्राथे दुनिया हँ वोला ओतके डरवाथे, भूँकथे, कुदाथे, हबकथे -चाबथे। 
छूटभइया पीलवा कुकुरमन के तो बाते झन पूछ ! रस्ते-रस्ता म लुहुर-तुकुर होवत रहिथे। तैं सोचते रहिबे वोहँ ओती जाही कहिके अउ वो जवान उदुप ले आके तोर गाड़ी म झपा जही। ताहेन उल्टा चिचियाके तोंही ल गारी-गुप्तार देना सुरू कर देही - ‘कमीना ! हरामजादा !!  कोन जनी अउ का का ?  देखके गाड़ी नइ चला सकस रे।’
लोगन मन गाड़ी वाले ल दोस देथे।
हमर डोकरी दाई कहय-‘कुकुर बिलई अउ छेरी-बछरू ले देख-बाँचके चलना चाही। मनखे ल उन्कर रस्ता नइ काटना चाही। कुकुरमन ल मनखे अउ मनखे के रस्ता दूनो ल काटे के जन्मसिध्द अधिकार होथे।’ 
सही बात ल कहय।
येमन लार बोहावत जीभ ल लमाके लपलपावत, टेड़गा पूछी ल सोझियाए हलावत आथे। जनम के सरू अउ भीखमँगा कस बोट-बोट देखत दुवारी म खड़ा हो जथे। वो बेरा इन ल देखके चुनाव के सुरता हँ मन म हलोर मारे लगथे। राजपथ के नेवरिया पथिक मन ल दुम हलाए के कला कुकुरमन ले सीखना चाही। 
इन्कर ऊपर कहुँ तरस खाके एक घँव बासी-रोटी देस, ताहेन येमन दुवारी ल छोडबे नइ करय। तैं काँही करले। जइसे फायदावाले पद ल पाके मनखे जात छोड़े के नाम नइ लेवय। 

कुकुर हँ बिना खाए दुवारी ले जाबे नई करय, त मनखे हँ बिना पाँच साल बिताए दुवारी म आबे नइ करय। इही सुभाव भर म मनखे अउ कुकुर मन के बीच थोरिक फरक पाए जाथे। ध्यान रहय अभीन जे मनखे के बात होवत हे वोहँ उँच कोटि के आईएसआई मार्का कोटधारी नीच प्रवृत्ति के मनखे के बारे म होवत हे। 
कहूँ खाए बर नइ दिए त इन बदला ले बर घलो नइ छोड़य। नवा-नवा चमकत गाड़ी ल लान के दुवारी म खड़ा कर दे। इन स्वागत-सत्कार खातिर पहिली पानी ओरसे बर तीन टाँग त तियार खड़े रहिथे।
 
इन मनखे जात के सहनसीलता के बड़का परीक्षक तको होथे। दुवारी म बइठे कुकुर ल दुए चार दिन झन धुत्कार। स्टाम्प ल लिखाके ले लौ। देख लेहू कहूँ के मरी के हाड़ा-माँस ल लानके बीच मुँहाटी म छोड़ दिही।
मनखे तो मनखे इन भगवानो ल नइ छोड़य। कोनो जगा सुघ्घर ले सुघ्घर मुरति के थापना कर दे। चाहे वोहँ शनिदेव के होवय चाहे गुस्सेलहा शंकर के। जल चढ़ाए बर इहीमन अगुवा रहिथे। भगवानो हँ खुश होके अवइया जनम म इन ल मनखे बना देथे। मनखे अउ कुकुर के सुभाव म एकरे सेती गजब समानता देखे बर मिलथे।


पहिली कुकुरमन गजब स्वामीभक्त अउ ईमानदार होवय। जेन हँ अब खर्रू होके लुप्त होए के कगार म खड़े हे। बाचे-खुचे स्वामीभक्त कुकुरमन के हाईब्रीड तियार हो गे हावय। वोमन ल बड़े-बड़े कोठी-बंगला म संरक्षित करके राखे के उदीम-उपाय होवत हे। बाढ़त बिरोधी ल छापा मारके डरवाए, चाबे, गिराए बर इन्कर उपयोग गजब सुग्घर, सुलभ अउ सहज रूप म करे जा सकथे। 

कुकुर दू किसम के होथे- पालतू अउ फालतू। येला हरू अउ गरू घला कहि सकथन। इन्कर रूप अउ गुन म गजब बिरोधाभास देखे बर मिलथे। बल्कि बिरोधाभास ल उल्टनहा सबद कहिबो तभो कोनो किसम के अतिबकर अउ लपरही-चटरही -टेचरही गोठ नई होही। 

पालतू कुकुर एकदम हरू होथे, फेर पद, पावर, खान-पान-मान सबो म गरू होथे। उही किसम फालतू कुकुर गरू होए बर होथे फेर बाकी पद, पावर, खान-पान-मान सबो म हरू होथे।
 
कुकुर कोनो किसम के होवय सबके अंतआर्त्मा बरोबर होथे : इरखाहा (ईर्ष्याहा), जीछुट्््््टा, चापलूस अउ भूँकर्रा। एक कुकुर दूसर कुकुर ल खावत कभू नइ देख सकय। चाहे वोहँ अपने सग भाई-बाप काबर न हो जय। सेम-टू-सेम मनखे तको एक मनखे ल बाढ़त नइ देख सकय।
 
जूठा पतरी ल फेंक दे। सबके सब किचकिचावत दऊड़ परथे। एक खावत रहिही त दूसर ओला गुर्रावत रहिथे। कभू-कभू झूमा-झटकी घलो होए लगथे। 

कोनो-कोनो कुकुर हँ बड़ सिधवा, डरपोकना अउ लो बीपी के बीमरहा किसम के होथे। जब वोला दूसर कुकुर मन हबके-चाबे बर घेरे-धरे-झपटे लगथे त वोहँ पूछी ल पीछु कोती छपटाके खुदो छपट जथे। मुड़ी ल थोरिक तिरछा करके जीभ ल ओरमा देथे। सबो दाँत ल दँतला कस ‘खबखब-ले’ निकाल लेथे। नागिन डॉन्स के स्टाइल म अपने जगा खड़े-खड़े तीन पइत अइँठ जथे। जना-मना बैरी कुकुर मन ल एको नई बँचाही।
 
फेर हुँकय न भूँकय। छपटे, छपटाए, तिरछा ओरमाए, खबखब ले निकाले, रेचका कस एकंगु खड़े देखत भर रहिथे। जादा होथे त बिन धकियाए अपने-अपन उलन्ड-घोलन्ड जथे। ओतका बेरा वो कुकुर ल देखके अइसे लगथे जना-मना कोनो सभा के मनोनीत सदस्य हरे। 

कुछु करे धरे नइ सकिस त आखिर म जगा-जगा अपन नकामी ल दबाए-छुपाए-लुकाए बर बयानबीर बने घूमथे कि राजपाठ हँ मोला रास नइ आइस। येहँ मनखे अउ कुकुर दूनो के महानता अउ उदारता के महान लक्षण हरे जऊन अपन कमजोरी ल उघारके देखावत अपन गलती स्वीकार कर लेथे।
 
हपाटे-झपटे,खाए -दबाए अउ चाबे-चमकाए के मामला म येमन अपन-बीरान नइ चिन्हय। कुकुरमन के ये गुन हँ मनखे म डिक्टो-म-डिक्टो पाए जाथे। मनखेमन के ये आदत हँ प्रमाणित करथे के मनखे हँ मनखे जनम ले के पहिली कुकुर रिहिस होही।
 
कुकुर योनि ले मनखे योनि म तुरते-ताही आए रहिथे तेकर पाय के वोला नइ भूलाय राहय। ओकरे सेती जब मनखे-मनखे झगरा होथे त एक दूसर ल ‘तैं कुकुर-तैं कुकुर’ कहिके आशीर्वचन देथे। 

कभू-कभू सुअर घलो कहि देथे। कभू कोनो ल ‘उल्लू के पट््ठा’ तको काहत सुनथन। येकर मतलब मनखे हँ कुकुर जनम धरे के पहिली सुअर रिहिस होही। सुअर के अउ पहिली उल्लू रिहिन होही। तेकर सेती उल्लू के पट््ठा बहुतेच कम सुने बर मिलथे। काबर के वोहँ दूरिहा के बात होगे।

जइसे मनखेमन के पीछु जनम ले जुड़ाव हो जाय रहिथे। तइसे कुकुर मन के आगू जनम ले लगाव हो जाय रहिथे।
मनखे हँ सब जिनावर ले जादा सुख-सुविधा अउ एसो-अराम से रहिथे। येला देखके मृत्युलोक-सरगलोक सबो लोक के वासीमन मनखेच् जनम धरे के साध मरथे। 

मोला बड़ इच्छा होइस के मनखे-मनखे लड़थे त, ‘तैं कुकुर तैं कुकुर’ कहिथे। कुकुर-कुकुर लड़त होही त का काहत होही ? ये बात ल जाने खातिर मैं एक दिन घर ले मुँड़ म राख डारके निकल गेवँ। रेंगे-रेंगे मुन्सीपाल्टी के कचरा डब्बा तीर जाके खड़े-खड़े चुपचाप देखे लगेवँ । 

एक ठिन कुकुर हँ डब्बा म थोथना ल घुसेरे खवई म मगन राहय। जइसे आजकाल के मनखे मन बफर सिस्टम म थोथना ल हुबेस के उत्ता-धुर्रा बोजई म मगन रहिथे। ओतके बेरा दूसर कुकुर हँ मार किटकिटावत किचकिच-किचकिच दऊड़त आइस। 

पहिली कुकुर संभल गे। दूसर कुकुर आते साथ चमकाइस- ‘अरे सुरा ! येमा मोरो बाँटा हे।’ 
पहिली कुकुर सुरा के नाम सुनके सुरा ले अउ आगु वाले जनम म कूद दिस। 
कहिस-‘आना त रे उल्लू के पट्ठा ! तँहू खा ले। कोन मना करत हावय।’
दूसरा कुकुर अपन जगा म खड़े-खड़े खुरच-खुरचके कचरा ल खदर-बदर गदर-फदर खदबदाए-गदफदाए लगिस। सोचिस होही अँटियावत-सनियावत देखके डर्राही ते डर्रई जही। 

कुछु उदबत्ती नइ जलिस, त कहिस - ‘घूँच अब। अपन बाँटा ल तैं खा-चाँट डरेस। अतका ल मैं अकेल्ला बोजहूँ।’ 
पहिली कुकुर तको मनखे बरोबर जिद्दी निकलिस, कहिस -‘हाँ ! ठेंगवा ल खाबे।’
सुनके दूसर कुकुर भड़क गे-‘जादा मत लगा। नइ तो मोर मइंता भड़कही त एकात गफ्फा लगा देहूँ।’
 
पहिली कुकुर घला थोरिक पहुँच, पावर अउ पइसावाला रिहिसे। कान ल टेंड़के चारो गोड़ ल अँड़िया के खड़ा हो गे- ‘लेत मार ! लेत मार ‼ लेन मार रे !!! कतका दमवाले हस देख लेथवँ।’ 

पहिली कुकुर के बेद्दम दम ल देखके दूसरइया कुकुर थोरिक सोंच म पर गे। लाली रिहिसे ते चेहरा के रंग हँ पींवरागे। तभो ले एक घँव अउ काँख के जोर से भूँकिस-‘तैं कहाँ घूँचबे रे घेक्खर ! अप्पत मनखे हो गे हावस।’

मनखे नाम सुनके पहिली कुकुर बमक गे-‘तैं मनखे, तोर ददा मनखे, तोर पूरा खानदान मनखे रे नीच !’
दूसर जुवाब दिस-‘नीच कहि लेस ते कहि लेस रे कमीना ! ‘नीच मनखे’ काबर कहेस रे ! ओतका म दूनो पाल्टी के एकक दूदी झन सगा-सहोदर, भाई-बंधु अउ चेला-चपाटी मन आ गे रहय। 
उन खड़े-खड़े देखत-ताकत-परखत राहय कि कोन जादा पोठलगहा हावय ? वोकरे कोती ले कूद-फाँद, भूँक-चाब अउ लड़-झगर के गदर मताए जाही।
 
पहिली कुकुर ल भरम होगे के मोर संगवारी जादा आए हावय। वोहँ गरजिस- ‘कहिबोच्च। एक घँव नहीं दस घँव कहिबो। तैं खातस त हम तो कुछु नइ काहन। हमार जूठा अउ बाँटा पतरी म तैं काबर झपटस रे अनदेखना ! कायर ‼ जेन पहिली आइस तेन पहिली पाइस रे हरामजादा ‼ 

अइसे तइसे उन्कर झगरा बाढ़ गे। तैं चोर, तैं मंदहा, तैं गँजहा, तैं भाई, तैं तहसील-कलेक्टर के बाबू, तैं अधिकारी, तैं दलाल करत-करत एक झिन के मुँह ले -‘तैं नेता’ निकल गे। नेता के नाम सुनिस ताहेन एक कुकुर के पारा असमान चढ़ गे। वोहँ आव देखिस न ताव अउ ‘तैं नेता-तैं मंतरी’ काहत झपट्टा मारके कूद परिस। 

दूनो कुकुर गुथ्थम-गुथ्था हो गे। सकेलाए कुकुरमन अपन-अपन सकऊ कुकुरमन ऊपर कूदके हला-हलाके हबके-चाबे लगिन। वो जगा पूरा गदफद मात गे।

एक्का दुक्का डरपोकना कुकुरमन दुरिहा ले खड़े-खड़े मोरे कस झगरा के मजा ले लगिन। मोला अइसे लगे लगिस मानो मैंहँ कोनो मंत्रिमंडल के कार्यवाही देखत खड़े हाववँ।
 
घर म आके देखथवँ त टीबी म उन्कर सीधा प्रसारण होवत राहय।


9406096346

सोमवार, 15 सितंबर 2025

अभूतपूर्व मित्र हो गए भूतपूर्व

     महेंद्र बघेल
   मेरा एक मित्र था।था मतलब यह नहीं कि अब वह भभूतपूर्व हो चुके हैं। हाँ भूतपूर्व जरूर हो गए हैं। क्या करें, सप्ताह में एक-दो बार हम प्राय: टकरा ही जाते हैं।  टकराव का राजमार्ग अमूमन बाजार की सकरी गलियों से होकर गुजरा करता है।
   मैं हमेशा यही चाहता हूँ कि उनसे कभी ना टकराऊँ। शायद उसके मन में भी टकरा जाने के भाव का सर्वथा अभाव रहता होगा। पर परिस्थितियों की प्रतिकूलता का क्या कीजिएगा। ये बड़ी निष्ठुर होती हैं। अप्रत्याशित रूप से न टकराने की आशातीत अपेक्षाओं पर पानी फेरने के लिए जैसे घात लगाए बैठे रहती हैं। 
  आप अनुमान लगा रहे होंगे की ये दोनों आखिर कितनी तीव्रता से टकराते होंगे। इनकी टकराहट घातक,संघातक, प्रहारक या मारक, किस प्रकार की होती होगी? पर यहाँ टकराने का आशय टक्कर मारना या टक्कर खाना से नहीं है, ओरभेट्टा होने से ही है। 
  संयोग ऐसा कि बाजार के उस सकरी गली में उसके आने और मेरे जाने के समय साम्य के कारण हम आज फिर टकरा गए। परंतु आदतन और प्रोफेशनल टरकू की तरह वे तुरंत टरक लिए। उसके टरक विद्वत्ता को देखकर लगता है कि उसने जरूर टरक शास्त्र में पी.एच.डी. किया होगा।
  हमारी मित्रता की गुणवत्ता किशन-विशन की मित्रता की गुणवत्ता से कतई कम न थी। जरूरत पड़ने पर हम एक दूसरे के लिए कभी भी मर मिटने को तैयार रहते थे। अति आधुनिक डिजिटल सभ्यता के इस युग में आज जब भाई ही अपने ही सगे भाई से सीधा मुँह बात करने से परहेज करता है। वहां हमारी मित्रता की कहानी ऐसी थी कि उसे गिनीज बुक न सही लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में आसानी से घुसेड़ा जा सकता था।पर अफसोस विपक्षी खेमो के अपरहेजी तत्वों ने ऐसा होने नहीं दिया।   
  इसी मित्रता की मजबूत बुनियाद पर हमने कई कारनामें फतह किए थे।आखिर कारनामें फतह करने के लिए उसके तह में जाना भी तो एक आर्ट है।पर मंडली कम चंडाल चौकड़ी के वे अपरहेजी तत्वों के साइंस ने परहेज कर-करके हमारे आर्ट्स को गच्चा दे दिया। उन्हें हमारी मित्रता की फतेही बुनावट से एकदम एलर्जी थी। वे बात-बात पर अक्सर हमारी दोस्ती के मखमली कारपेट पर कांटा बिछाने का काम किया करते थे। फतहकारी मित्रता करने के बुनियादी बातों को भला वे क्या जानें।
  बुनियादी बातों को याद करना यानी इतिहास के पन्नों को उलट-पुलट करना । यहाँ इस मुहावरे का आशय पन्नों को फाड़ना के निकटवर्ती अर्थों में भी समझा जा सकता है। इतिहास के अमहानता वाले त्रुटि पूर्ण पन्नों को फाड़कर जमीदोंज करना ही वर्तमान का नूतन दस्तावेजीकरण है। आजादी के बाद इन दोनों महत्वपूर्ण कार्यों में जैसे ताला ही जड़ दिये गये थे। पर अब वर्तमान के ओपनरों ने फाड़ने और खोदने के काम को अपने कंधों पर ले रखा है। वे कहते हैं कि खुदाई का काम अतीत के खुदाई करिश्में को समझने के लिए भी जरूरी है। बिना खोदे तो पानी भी नहीं निकलता। रेत ,पत्थर,कोयला और अयस्कों की तो बात ही छोड़ो। खुदाई और फाड़ाई  दोनों स्थायित्व वर्धक क्रियाएँ हैं ।इससे कुर्सी के पायों को लंबे समय तक अंगद की पैर की तरह स्थायित्व प्रदान करने के लिए उर्जा मिलती है। खुदात्मक और फाड़ात्मक संतुष्टि प्राप्त होती है सो अलग। इस चरणबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत आस्था के स्थलों की खुदाई और इतिहास के पन्नों से अमहानता के अ को फाड़कर उसकी जगह पर महानता का म नामक नया चैप्टर चिपकाना प्रमुख है।
  पर हमारी दोस्ती के कारनामें, जिसने कई रिकॉर्ड फतह किए थे, उसमें स्वर से अनुस्वार तक अ और म का नामोनिशान मिलना नामुमकिन है। यहाँ आधुनिक ओपनरों के द्वारा खुदाई और फाड़ाई करने की धृष्टता के बावजूद आपको फाड़ात्मक और खोदात्मक जैसे ऐतिहासिक रससिक्त स्वादों का सर्वथा अभाव मिलेगा।
  मित्रता के बेमिसाल उदाहरण सभी युगों के शास्त्राभिलेखों में पढ़ने को मिल जाते हैं। उदाहरणार्थ- जनक तनया सीता की खोज में वन-वन भटकते हुए दशरथ नंदन राम अनुज सहित जब ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे तब सर्वप्रथम उनके वायु सेना के एयर चीफ मार्शल पवनसुत हनुमान ने वानर राज सुग्रीव से उनकी भेंट मुलाकात करवाई। दोनों पक्षों के डेलीगेशनों के बीच वार्ता के दौरान आपस में डोजियर सौपे गए। फिर सुग्रीव को बाली मुक्त राज्य और राम को सीता की खोज में मदद करने के वचन के साथ ऋष्यमूक मैत्री समझौता पर मैत्रीमय हस्ताक्षर कर लिए गए। 
  बाली की व्याभिचारिक अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए वायु सेना के वानर रेजिमेंट के सभी जवानों ने समवेत स्वर में गगन भेदी नारा लगाते हुए जंगल के निस्तब्ध वातावरण में हलचल मचा दिया- अवर डियर फ्रेंड आनरेबल सुग्रीव जी, एंपरर आफ ऋष्यमूक माउंटेन, अब की बार सुग्रीव सरकार..,अब की बार सुग्रीव सरकार..। अंतत: "बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा" के मूल भावों को अंगीकार करते हुए मित्रता की पराकाष्ठा से रामजी और सुग्रीवजी ने अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।
  द्वापरयुगीन गुरु सांदीपनी के आश्रम को मित्रता की नर्सरी कहना भला अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है। पर कृष्ण और सुदामा के बीच मित्रता की कहानी इसी आश्रम के प्लेटफार्म पर परवान चढ़ी थी। बालकृष्ण अपने बाल सखा सुदामा जी को मित्रता की महीन कसौटी पर कसते हुए माखन चोरी का लाभार्थी बना पाए या नहीं ये वे ही जाने, पर गुरु सांदीपनी के आश्रम के कैरिकुलम में आर.टी.ई. के तहत निर्धन सुदामा को मेन सब्जेक्ट से वंचित कर देना कतई उचित नहीं था। कालांतर में सुदामा जी को घोर गरीबी का सामना करना पड़ा। सुदामा ने जैसे प्रण ही कर लिया था कि वह बीपीएल में जियेगा और बीपीएल में ही खपेगा। पर उनकी धर्मपत्नी देवी सुशीला हमेशा अपने परिवार को बीपीएल से एपीएल में अपग्रेड करने के जुगाड़ में रहा करती थी। इसलिए वे सुदामा जी को जब-तब श्रीकृष्ण की मित्रता की याद दिलाती रहती थी। गरीबी से तंग आकर और पत्नी के बार-बार जोजियाने पर सुदामा जी को द्वारिकाधीश के राज दरबार में याचनार्थ कूच करना ही पड़ा। देवी सुशीला कृष्ण और सुदामा के निश्चल मित्रता की महीन डोर को मजबूत करना चाहती थी। इसलिए उसने कृष्ण के लिए सुदामा के हाथों एक पोटली में पैक करके जोरन भी पठोयी थी। इधर द्वारिकाधीश के राजमहल में प्रवेश करते ही सुदामा राजशाही के चकाचौंध में अकबका कर बकबका गए और देखते ही देखते संकोचवश मित्रता धर्म को हवा में उड़ाते हुए उस पोटली को टोटली छुपाने की गुस्ताखी करने लगे। पर उधर मुस्कराते हुए द्वारिकाधीश ने मित्रता का रिव्यू न लेते हुए खजानी को तुरंत लपक लिया।
  पर हमने अपनी मित्रता को सुदामा की पोटली में छुपा कर रखने की गुस्ताखी कभी नहीं की। बल्कि मित्रता नामक सपाट पिच के बीचों-बीच साझेदारी के कई कीर्तिमान गाड़े और पुराने कीर्तिमानों को जड़ से उखाड़े। मसलन कठिन से कठिन अवसरों पर "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे,तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे" जैसे धधकते बारूदी गीत को अपने धमनी-शिरा में प्रकाश की गति से भी तेज दौड़ाने की भरपूर कोशिश की। नतीजतन दोस्ती 37 डिग्री सेल्सियस के समानांतर पटरी पर दौड़ती रही, कभी डिरेल ना हुई। 
  हमने जय और वीरू की तरह नहीं सिर्फ जय की तरह नए आयाम गढ़े, फिसलन भरी दुरूह रास्तों पर हरदम आगे बढ़े कभी उतरे ही नहीं, चढ़े ही चढ़े। हमारे हाथों में हेड एंड टेल का गठबंधन नहीं बल्कि हेड टू हेड और टेल तू टेल जैसे आपसी अंडरस्टैंडिंग वाला सिक्का जो था। बसंती ने भी रंग दे बसंती चोला की तरह वीरू को मित्रता के बहुरंगी रंग में रंगने की भरपूर कोशिश की। पर जय ने दोस्ती के बीच आने वाली हर दरो-दीवार को मौसी के सहारे नेस्तनाबूत कर दिया। परेतिन की तरह कंदील जलाती हुई डिंपल वाली श्वेतपरिधानी ठाकुराइन का अंतस भी जय के लिए रह-रहकर हिलोरे मारती रही। पर दोस्ती के आलंबन के मद्देनजर जय ने अपने दिल के ट्यूबलाइट को जलने से पहले ही स्विच ऑफ कर दिया।
  "सब दिन होत न एक समाना" की तरह एक दिन हमारी मित्रता की सुरम्य वादियों में अविश्वास के काले-काले बादल फट ही गए। उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हमारी मित्रता के मित्र मार्ग पर पर स्वार्थ की पहली बारिश ने दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे की तरह जगह-जगह गड्ढे कर दिए। समर्पण रूपी मंदिर के गर्भगृह में जगह-जगह पानी चूने लगे। सब्र के बाँध एयरपोर्ट की डोम की तरह भरभराकर टूट गए और विश्वास का धरातल सैलाब में डूबने लगे।तब विवश होकर मैं अपनी मित्रता की कहानी के सेंटर पॉईंट तक पहुँचने का फैसला लिया । नितांत निस्तब्ध वातावरण में सिंहावलोकन करने का साहस बटोरा। और बंद पड़े फाइल को खोलने के लिए अपने मेमोरी कार्ड को एक्टिव करने मशक्कत करने लगा। इस दरमियान बमुश्किल एक पेज खुल पाया, जो मुझे घनघोरात्मक ढंग से चिढ़ाते हुए नजर आया। पर मैंनें आपा न खोया। शांत भाव से उस पेज को पढ़ने लगा।
  उसे पेज में दर्ज विवरणों के अनुसार मेहमान नवाजी के चक्कर में अपनी गरीबी को श्वेत वस्त्रों से ढककर घर के आंगन में मित्र को मित्रवत झूला झूलाया। अक्खा  वेजिटेरियन होते हुए भी मैंने कलेजा और भेजा फ्राई से उसका सत्कार किया। मित्रता धर्म के मूल भावों को स्थायित्व प्रदान करने की चाह में बिन बुलाए उसके बर्थडे में जाकर गिफ्ट को शिफ्ट करता रहा। अपना समझकर केक खाया खीर-पूरी सपेटी। बिटिया की शादी के लिए पाई-पाई जोड़कर सहेजे गए लाख रुपए को उसके आड़े वक्त में उसके अंटे में अड़ाकर सहयोग किया।
  पर अब वापसी का समय जो आया है तो उसने अपना मुँह फेर लिया है। तगादा करने पर लाल ऑंखे दिखाता है। उसके टरकाने के अदा को देखकर ऐसा लगता है मानो मैं ही उसका कर्जदार हो गया हूँ। क्या कहें, वह तो जन्मजात ही अभूतपूर्व व्यक्ति था। मुझे भभूत लगाकर भूतपूर्व हो गया है ।आखिरकार दोस्ती का डंका बजाने के चक्कर में अपनी ही लंका लग ली है।
   अब "दोस्त दोस्त ना रहा" के जंक्शन में आकर मित्रता की पटरिया उखड़ गई है।दोस्ती की रेलगाड़ी डिरेल होकर चकनाचूर हो गई है।
  टकराते वक्त के संयोजन के समय उसके टरकाने का प्रयोजन भी शायद यही है। अपनी दोस्ती के इतिहास के एक ही पेज का यह अभिलेख मुझे मेरी सीमाएँ याद दिलाने के लिए पर्याप्त है।

बुधवार, 20 अगस्त 2025

लुकलुकी फोटू छपवाय के ......

 

रोशन साहू 'मोखला'                        

     रोटी,कपड़ा अउ मकान हा मनखे के मूल जरूरत आय फेर मनखेपन के सुग्घर मान बर स्वास्थ्य,शिक्षा,सुरक्षा घलो मिंझरे हवय। अउ संगे-संग मनोरंजन घलो। अब के समे मा ये मनोरंजन हा हमर जिनगी मा अइसे समागे हावय जइसे रिश्वतखोर मन के सगुरिया रूपी जेब मा खुरचन पानी अइसे समा जाथे कि कतकोन नदिया नरवा मन उलेन्डा पूरा मारत खुसर जथे कि ई.डी,सी.बी.आई,जइसन जांच एजेंसी मन के हाल हा अर्जुन कस हो जाथे जेन हा लड़ई-भिड़ई नइ करँव काहत अपन हथियार डार देय रिहिस। फेर घूसखोरी के लहरा ले घर परिवार लोग लईका बर आनी-बानी के जिनिस आवत रहिथे। जेकर ले घर वाली के मुस्की मुस्कान अइसे जनाथे जइसे माधुरी दीक्षित प्रियंका चोपड़ा हा लोटा भर पानी मढ़ा के सुवागत करत हें।अईसन सुख ल अध्यात्मवादी मन क्षणिक सुख कहिथें। परम सुख तो वो आय जेकर ले इहलोक अउ परलोक दूनों सुधर जाथे। इहि बात के उदिम मा लगथे फोटो खिंचवई के नवा संस्कार जनम धरे होही। छट्ठी-बरही,बर-बिहाव होय चाहे गोष्ठी संगोष्ठी। कोन्हो भी कार्यक्रम मा फोटू खिंचवाके सोशल मीडिया मा डारे ले अलौकिक सुख जनाथे।
     आस्था,संस्कार,सत्संग अउ आने-आने चैनल मा अवइया बड़े-बड़े मुनि महात्मा मन ला ये विषय ला अपन सत्संग मा जरूर जघा देना चाही ? फेर अइसे लगथे वहू मन इही परम सुख ला भोगत फोटू खिंचवऊ फोटू छपवउ संस्कृति सागर मा उबुक-चुबुक होवत हें। फेर आस लगे रहिथे कि कभू फोटू खिंचवउ के विषय म ग्यान अमरित मिल पातिस त हमर जईसन नान्हे मति मन ला पराज्ञान लब्ध होय ले चौरासी लाख योनि के चक्कर ले मुक्ति थोरिक सरल हो पातिस।काबर येकर वोकर रेख ला छोट करे के उदिम मा हरि भजन तो अइसे नंदागे हे जइसे " राजनीति मा परमारथ भाव अउ जन सेवा। कतको परयास करव "ढूंढते रह जाओगे।"
गोसाई तुलसीदास जी लिखिन-
बारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥
फेर फोटू खिंचाऊ सोशल मीडिया डारू मनखे मन के एकेच सिद्धांत हावय-
सबो के बीच आय बर, जहू- तहू ल ढकेल।
फोटू देखत मगन हिय,फेसबुक ट्विटर मेल।।
     सामूहिक फोटू खिंचवाय के बेरा अपन ले जादा गुनी अनुभवी मनखे ला धकियावत तिरियावत बीचों-बीच जघा बनाय बर पुरखन ले मिले संस्कार,यम,नियम,संयम ला छर्री-दर्री कर पाना सबो मनखे के वश मा कहाँ हे? ये उदिम ला जियत मनखे कभू नइ कर सकय। खुद कतको फोसवा रहँय फेर खुद ला सबले बड़े 'माननीय' मनई बड़ जबर 'विल पावर' इच्छाशक्ति के पहिचान आय। खुद कतेक पानी मा हावन,खुद जतेक जानबो कोई दूसर मनखे नइ जान सकँय,भीतरौंधी बइठे आत्मा सदा जनवात रहिथे रे बाबू! काबर मटमटावत हस? लाज बीज नइ लागे का रे तोला? बड़े-छोटे के खयाल हवय कि नइहे रे तोला? फेर अईसन भाव पैदा नइ होवन देना,कोन्हो होई गे त ओकर टोंटा ला मसक देना येहा सबो मनखे के वश मा कहाँ होथे? फोटू खिंचवा के अखबार मा छपवाय के लुकलुकी के समानता नवा बहुरिया के शुरुआती प्रयास ले कभू कम नइ हो सकय,जे घेरी-घाँव अपन सास-ससुर के पूछ-परख बर चाय बनाव का मम्मी ? सब्जी अउ लाँव का पापा जी? प्याज निमऊ ठण्डा पानी लागही का पापा जी? समय मा टिफ़िन ले लेबे जी? काहत अपन गोसईया ला काम मा जावत बेरा घेरी-बेरी टाटा बाय-बाय करत रहिथे।''दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे" फिलिम कस चलत दृश्य ला घर भर के सदस्य मन देख-देख लजावत रहिथें। दाई-ददा मन मने-मन सोंचथे राम जाने! येकर आय ले पहिली हमर बेटा सदा भूख-दुख मरत रिहिस होही का भगवान ? अईसन किसम के मनखे मन हा लोगन के तारीफ पाय बर अतेक पुचपूचावत रहिथे जइसे नारद मुनि हा बेंदरा मुँह धरे विश्व मोहिनी संग बिहाव करे बर आघू-पाछू मटमटावत रिहिन। भविष्य मा कोनो किसम के पुरुस्कार,इनाम,सनमान, चुनाव टिकिट के जुगाड़ बर अपन प्रोफाइल के वजन बढ़ाय बर मनखे पांच रूपिया पाकिट म मिलईया हल्के-फुल्के ले हल्का हो जाथें। राम जाने!
फोटू छपवऊ मनखे मन अउ एक ठन बात ल सोच-सोच के सण्डेवा काड़ी कस दुबरावत सुखावत रहिथंय कि मरे के बाद उँकर मरे के समाचार हा कतेक ट्रेंड करही? ये समस्या के समाधान बर ब्रम्हा जी ला अपन सिरजन के नियम मा अपडेशन जरूर करना चाही। मनखे के मरे के चार-छह घण्टा बाद कम से कम एक घण्टा 'टाइम आउट' के समे मिलना चाही, तेकर ले देख सकँय कि वोकर मरनी के समाचार सोशल मीडिया मा कतेक कोस के यात्रा करिस? उँकर जिनगी के महत्तम के बखान मा कोन काय लिखिन?
     कोन-कोन उन ला श्रद्धाजंलि देइन?दू चार बछर पुण्यतिथि मनाहीं का नइ मनाहीं? उँकर नांव मा चौंक, चौराहा,गली सड़क के नामकरण हो पाही के नहीं? यहू बात के अंदाजा मरघट मा बइठे लोगन के बातचीत ले हो जाही। काबर यहू संसो के कारन अईसन मनखे जियत-जियत मा राहेर काड़ी कस होत रहिथें? ये सब के समाधान इही अतिरिक्त 'टाइम आउट' के बेरा मा हो सकत हावय। मरईया मनखे खुद अपन आँखी ले लोगन के भाव ला देखत अपन आत्मा ला शांत कर सकत हें। मरघट्टी मा जुरियाय सकलाय मनखे मन ला आखरी राम रमुउवा करत अउ अपन जिनगी के बारे में दू शब्द गोठियाय के मौका मिले ले अपन फोटूछपिया आदत के महत्तम माटी देवईया मन ला 'दू टप्पा' मा बतावत, भगवान ले मिले परमानेंट डेथ सर्टिफिकेट देखत, सुख चैन पावत, अपन आँखी ला मूंद सकत हें। वोला मिले 'टाइम आउट' ले एक फायदा जरूर होही कि भटकत आत्मा बर गरुड़ पुरान करवाय साँकर दाहरा,राजिम, प्रयागराज,काशी जवई-अवई के खरचा अऊ समे बाँच जाही।
     फेर जेन मनखे के आत्मा ला जियत-जियत शांति नइ मिल पाय हवय त मरे बाद शांति मिल पाही ?अईसन सोचना दूर के कौड़ी कस जनाथे? जइसे ये बियंग लेख ला छपवाय के लुकलुकी मा मेल करई ...?
रोशन साहू 'मोखला'(राजनांदगांव)
7999840942

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

चेनल चूँ चूँ का मुरब्बा धोनी और भैंस


 

 

जसबीर चावला

बेहद परेशान थे टीवी चैनल सीसीकेएम (पूरा मतलब चूँ चूँ का मुरब्बा) के सीईओ इन दिनों.परेशानी का सबब था उनके चैनल की कमाई का गिरता ग्राफ़. दूसरे चैनल खूब चाँदी काट रहे थे, उनकी टीआरपी भारत सरकार की साख की तरह घट रही थी.

उन्होंने आनन-फ़ानन में अपने अपने सारे एंकर से लेकर फ़ील्ड संवाददाता,प्रोड्यूसर,केमरामैन सबकी आपात् बैठक बुलाई.सबको देश में - तेज़ी से लेकर सुस्त चलने वाले,१० मिनट में २०० ख़बरें परोसने वाले,चैन की नींद सोने के बहाने जगाने वाले कई चैनलों के कामयाब नुस्खे वाले कार्यक्रम दिखाये,विशेषज्ञों के भाषण करवाये.

उन्होंने कुछ टीवी क्लिपिंग दिखलाई,जिनसे उन चैनलों के दिन फिर गये थे.उनमें कुछ के नमूने ये थे."मिल गया,मिल गया,रावण का महल मिल गया. वह एअरपोर्ट भी मिल गया जहाँ उसका विमान लेडिंग करता था"- पार्श्व में रामायण सीरियल की धुन बजने लगी."आज रात बाज बकरी को रात आठ बजे उठा ले जायेगा,देखना न भूलें,आपके अपने टीवी'इंडिभार'पर".अगला चैनल-"अंतरिक्ष से उड़न तश्तरियाँ आ कर गायों को ले जा रही हैं,हमारे जाँबाज पायलटों ने हेलिकॉप्टर से पीछा किया पर वे चकमा देकर भाग गईं"-अगला समाचार-"आकाश से एलियन आ चुके हैं,कहीं आपकी खिड़की से झाँक तो नहीं रहे उठ कर देख लीजिए"-पार्श्व में खौफनाक संगीत बजता है.

अगला चैनल-"मिल गया भगवान श्रीकृष्ण का शंख"-नेपथ्य में शंख ध्वनि."मिल गई सीता की रसोई जहाँ वे भोजन बनाती थी."पार्श्व में रामायण की चौपाईयां.

ख़बरें,बनारस मे बरगद का पेड़ जिसमें तीन पत्ते लगते हैं-ब्रम्हा विष्णु महेश.जनता पूजा कर रही है.अगला समाचार -दार्जीलिंग के कुर्सीयांग में एक उड़न तश्तरी ज़मीन पर गिरी.जमीन पर एक २ फ़ुट लोहे की डिस्क जो किसी मशीन का पुर्ज़ा था पड़ी थी.वाचक संवाददाता उसे उड़न तश्तरी मान कर चर्चा करने लगे-"लोग डरे तो नहीं,पूजा शुरू हुई की नहीं"-वाचक चाहता था कि लोग पूजा शुरूं करें तो कहानी लंबी खिंचे.

"सांई बोलने लगे-आँखें झपकने लगी".दो चैनलों नें इस एनिमेशन फ़िल्म ओर उसके परम रहस्य को कई दिनों तक दर्शंकों को समझाया."बंदर जो केवल गोरी लड़कियों का दीवाना है"-"आज सिर्फ़ देखिये हमारे चैनल पर.बाबा सूर्यदेव की घोषणा-२०१४ में धरति पर प्रलय"- नेपथ्य में भूकंप की गढ़गढ़ाती आवाज़ें ,समुद्र का गर्जन,भक्त जनों का कीर्तन.
 चैनल सीसीकेएम उर्फ़ चूँ चूँ का मुरब्बा के सीईओ ने उन्हें बाबा घासाराम,चरायणसांई,भूतप्रेत,सेक्स,अपराध,अघोरी,तंत्र-मंत्र,धर्म-अध्यात्म के फ़िल्मी काकटेल,आश्रमों हो रही रास लीलाएँ ,अंधिवश्वास के खेल तमाशे कच्चे अधपके चुनावी स्टिंग आप्रेशन और इनसे चैनलों को बढ़ती टीआरपी ओर कमाई,सब की वीडियो दिखलाई.ख़बरें बनती कैसे है,यह भी उदाहरणों के साथ समझाया.एक खबर की क्लिपिंग में श्रीनगर के लालचौक में अलगाववादी तिरंगा खरीदते ओर जला देते. अब उनसे कौन पूछे की भइयै,वहाँ कोई झंडे की दुकान भी है क्या? यह सब अंग्रेज़ी के एक अख़बार की नक़ली प्रायोजित फ़ोटो थी. "आँखो-देखी" की बिहार में दादाओं द्वारा बूथ केपचरिंग की स्टोरी गढ़ी हुई थी.बनारस में २ वर्ष पूर्व १५ विकलागों की गुमटियां अतिक्रमण में हटना थी.उन्हें चैनलों ने उकसाया की वे ज़हर खा लें हम कैमरे से शूट करेंगे,और तुम्हें बचा लेंगे.सबने टीवी पर इसे देखा.उन्होंने सचमुच ज़हर खा लिया.५ की जान चली गई पर चैनलों की टीआरपी आसमान छूने लगी.
सीईओ ने चेलेंज किया जो कोई धाँसू स्टोरी - चाहे गढ़कर लाये चाहे स्टिंग कर के,उसे १० लाख रुपये नक़द और थाईलैंड की सैर पर भेजा जायेगा.सारे रिपोर्टर दौड़ पड़े -'इस्टोरी'की तलाश में.जिस झारखंडी रिपोर्टर की स्टोरी चुनकर टेलिकास्ट हुई वह कुछ ऐसी थी.
"मिल गया,धोनी के चौकों छक्कों का राज.आज रात प्राइम टाईम में ८ बजे चैनल सीसीकेएम पर.कौन है जो उसे ऊर्जा से भर देती है,कौन है वह सलोनीश्यामा.जिसका राज धोनी भी नहीं जानता,हम उठायेंगे पर्दा इस रहस्य से जिसे हमारे संवाददाता कूड़ाप्रसाद नें जान पर खेल कर उठाया है".
क्रिकेट इस देश का सन्निपात बुखार है और कभी उतरता ही नहीं. सारा देश सदा तपता रहता है.देश में इस खबर से हलचल मच गई.देश थम गया,चर्चाओं का बाज़ार गर्म हो उठा.परम जिज्ञासा से सब 'चू चूँ का मुरब्बा'देख रहे थे.
"जी हाँ धोनी के चौके छक्के के पीछे जिस व्यक्ति का हाथ है वह हैं मुक्तिकुमार यादव,जिनकी भैंसों का दूध धोनी पीते हैं"- कैमरा मुक्तिकुमार पर फ़ोकस होता है."ये भैंसें पालते हैं,दूध निकालते हैं,- दूध जो अमृत होता है जिसकी देश में नदियाँ बहती थी"-मुक्तिकुमार जी गदगद् हैं.पीछे उनकी घरवाली लजाती सकुचाती नज़र आती है जिस पर केमरा अब फ़ोकस है,जो भैंस का दूध निकाल रही है.कैमरा कभी मैदान में चरती भैंसों पर जाता है कभी मैदान में क्रिकेट खेलते चौके छक्के लगाते धोनी पर कभी दूध निकालती मिसेज़ मुक्तिकुमार पर कभी गिलास से दूध पीते ओर मलाई पोंछते धोनी पर जाता है.बड़ा ही मनोहारी द्रश्य बनता है.दूध निकालती घरवाली,बाल्टी में झागदार दूध,भैंस,मैदान ओर धोनी के चौके छक्के..........! तभी मुक्तिकुमार बतलाते हैं की धोनी की फ़ेवरेट भैंस कोई और ही है....! रहस्य...रोमांच...! रहस्य भरा संगीत....।
स्टूडियो से वाचक घोषणा करता है- जाइयेगा नहीं हम मिलेंगे ब्रेक के बाद,और दिखायेंगे उस भैंस ओर तबेले को जिसे मुक्तिकुमार से इजाज़त न मिलने पर भी 'जान पर खेल कर' ढंूड निकाला है,हमारे संवाददाता ने सारा देश टकटकी लगाये टीवी से चिपका रहा- परम रहस्य से पर्दा जो उठना था.
ब्रेक के बाद केमरा घोसीपुरा में मुक्तिकुमार के तबेले में घूम रहा है.संवाददाता के कपड़े गोबर-गंदगी से भरे पड़े हैं.केमरा चारा,रस्सीयां,गोबर,मरियल से बिजली के लट्टू,टोके,गडासे से होता हुआ भैंसों की क़तार दिखाता हुआ एक ख़ास श्यामासलोनी 'भैंस' पर टिक जाता है.संवाददाता उवाच-"यही है वह वह अनमोल प्यारी भैंस जिसका दूध पीकर धोनी रनों की बरसात कर देता है"पार्श्व में गाना बजता है-"तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".अब केमरा भैंस की आँखों पर जाता है,रुकता है-गाने की आवाज़-"झील सी इन आँखों में डूब डूब जाता हूँ".अब केमरा भैंस के सींगों के क्लोज़ से उसकी पूँछ तक मिडशॅाट से लांग शॅाट में जाता है.वाचक पूछता है -"इसकी उम्र क्या है"-संवाददाता-""बाली उम्र है"-शरारत से"महिलाओं की उम्र नहीं पूछते".संवाददाता भैंस के नज़दीक़ हो गया-क्लोजप शॉट-भैंस ने उसका गाल चाट लिया-संवाददाता लजाता है.भैंस रंभाती है,सारा देश इस अद्भुत कौतुक को देख तालियाँ बजाता है.
चैनल सीसीकेएम पर यह स्टोरी टुकड़ा टुकड़ा कई दिनों तक सारा सारा दिन चली टीआरपी उछल कर सातवें आसमान पर चढ़ गई.खूब विज्ञापन मिले.चैनल निहाल हो गया.रिपोर्टर को १० लाख रुपये और बैंकाक में सुंदरियों से मसाज का अवसर मिला -उसके पहले बोनस में गोआ ट्रिप अलग से.
जैसे उस "चूँ चूँ का मुरब्बा" तथा उस रिपोर्टर के दिन फिर सब चैनलों के दिन फिरें.

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

ईश्वर बड़ा विलक्षण है

-भारतेंदु हरिश्चंद्र

भला यह संसार बनाने का क्या काम था? व्यर्थ इतने उल्लू एक संग पिंजड़े में बन्द कर दिए. किसी को दुःखी बनाया किसी को सुखी, किसी को राजा बनाया किसी को फकीर. इसी से मैं कहता हूँ कि ईश्वर बड़ा विलक्षण है.

सब उसमें लय रहता है, किसी के कुछ दुःख-सुख का अनुभव नहीं होता है, वह केवल परम आनंदमय अपने में रहता है, इसी से....

कोई इसको हाँ कहता है कोई नहीं, कोई मिला कोई अलग, कोई एक कोई अनेक तो उसको अपने माहात्म्य की दुर्दशा क्यों करानी थी, इसी से...

उसको सर्व सामर्थ्यवान सुनकर भी लोग सर्वदा उसको नहीं मानते. पर हां, जब कुछ दुःख पड़ता है तब स्मरण करते हैं. जब लोगों का कुछ बनता है तो धन्यवाद तो थोड़े लोग देते हैं पर जो कुछ काम बिगड़ता है तो गाली सभी देते हैं. पानी न बरसे तो, घर का कोई मर जाए तो, रोग फैले तो, हार जाएं तो सब प्रकार से यह गाली सुनता है, इसी से....

अनेक प्रकार के जीव, विचित्र स्वभाव, अलग अलग धर्म और रूचि, विचित्र रंग काम-क्रोध-मद, ईर्ष्या, अभिमान, दम्भ, पैशुन्य, आमृत्य इत्यादि अनेक प्रकार के स्वभाव बनाकर लम्बा-चौड़ा गोरखधंधों का जाल फैलाकर इस घनचक्कर में सब को घुमा दिया है, इसी से...

एक बिचारा सुख से अपना काल क्षेप करता है. कुछ उसके काम में विध्न डालकर व्यर्थ बिना बात बैठे-बिठाए उसको रुला दिया. कोई दुःख में है उसको एक संग सुख दे दिया, इसी से...

एक को घटाया एक को बढ़ाया, एक को बनाया एक को बिगाड़ा, राई को पर्वत किया, पर्वत को राई, राजा को रंक किया रंक को राजा, भरी ढलकाया खाली भरा, इसी से....

उदार और पंडित, दरिद्र, मूर्ख, धनवान, और सुंदर रसिक को कुरूपा, कूढ़ स्त्री, कुरसिक को सुंदर वा रसिक स्त्री, सुस्वामी को कुसेवक, सुसेवक को कुस्वामी इत्यादि संसार में कई बातें बेजोड़ हैं, इसी से....

प्रत्यक्ष लोग देखते हैं कि हमारे बाप दादा इत्यादि मर गए और नित्य लोग मरते जाते हैं तब भी लोग जीते हैं. सोचते हैं कि संसार का पट्टा मैंने लिखवा लिया है. पहिले तो में मरूंगा ही नहीं, और मरा भी तो सब मेरे साथ जाएगा, इसी से...

सच है मनुष्य यह कैसे सोचे यह हम बैठे हैं, खाते-पीते हैं, चैन करते हैं कभी सोचते नहीं कि हमारी दशांतर भी होगी. हम कैसे मरेंगे कदापि नहीं आता. इसी से....

मजा है, तमाशा है, खेल है, धूम है, दिल्लगी है, मसखरापन है, लुच्चापन है, हंसी है, मूर्खता है, खिलौने हैं, बालक हैं, पट्ठे हैं, नासमझ हैं, जड़ हैं, जीव हैं... मोहित हैं, उल्लू के पट्ठे हैं, सब हैं परंतु उसके समझ में और उसके लोगों की समझ में भेद हैं. इसी से....

उसके नाते परस्पर सब केवल सगे भाई बहन हैं. पर लोग जाति-कुजाति-वर्ण-आश्रम, नीच-ऊंच, राजा-प्रजा, स्त्री-पुत्र इत्यादि अनेक भेद समझते हैं. इसी से....

यह उसी का विलक्षणपन है कि हिंदुओं को सब के पहिले उसने लक्ष्मी और सरस्वती दी और चिरकाल तक उनको इस देश में स्थित किया. परंतु अब वह हिंदू दासधर्म शिक्षित हो रहे हैं. इसी से...

यह उसी का विलक्षणपन है कि जिस भूमि में उदयन, शूद्रक, विक्रम, भोज ऐसे राजा कालिदास, वाण से पंडित दिए, उसी भूमि में हमारे-तुम्हारे से लोग हैं. यह उसी का विलक्षणपन है कि मुसलमानों ने हिंदुस्तान को बहुत दिन तक भोगा अब अंग्रेज भोगते हैं, मुसलमानों को अपनों का पक्षपात है, अंग्रेजों को अपने का, हिन्दू दोनों की समझ में मूर्ख हैं. इसी से....

यह उसी का विलक्षणपन है कि हिंदू निर्लज्ज हो गए हैं. ऐसे समय में जब कि आगे बढ़ा चाहते हैं वे चूकते हैं और पीछे ही रहे जाते हैं. विशेष सब संसार का आलस्य पश्चिमोत्तर देशवासियों में घुसा है और अपने को भूल रहे हैं, क्षुद्र पना नहीं छूटता, इसी से...

यह उसी का विलक्षणपन् है कि हम लोग समाचार पत्र लिखते हैं और यह अभिमान करते हैं कि हमारे इन लेखों से हमारे भाइयों का कुछ उपकार होगा. भला, नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता है, सब अपने रंग में उसकी माया से मस्त हैं. उनको क्यों नहीं छोड़ते हैं, क्यों नहीं विराग करते, संसार मिटे हमको क्या! हम कौन जो कहें, पर यह नहीं समझते, हम अपने ही अभियान में चूर हैं यह भी सब उसी की माया है. इसी से हम कहते हैं कि ईश्वर बड़ा विलक्षण है.

बस की यात्रा


हरिशंकर परसाई
 
हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुँच जाएँगे। हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शामवाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं, बस डाकिन है।

बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी। ख़ूब वयोवृद्ध थी। सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!
बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमने उनसे पूछा—यह बस चलती भी है? वह बोले—चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमने कहा—वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने आप चलती है यह? हाँ जी, और कैसे चलेगी?

ग़ज़ब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है।
हम आगा-पीछा करने लगे। डॉक्टर मित्र ने कहा—डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विश्वसनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।

हम बैठ गए। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आँखें कह रही थीं—आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है, सो जाएगा—राजा, रंक, फ़क़ीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।
इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फ़ौरन खिड़की से दूर सरक गए। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था कि हमारी सीट के नीचे इंजन है।

बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक़्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता सीट बॉडी को छोड़कर आगे निकल गई है। कभी लगता कि सीट को छोड़कर बॉडी आगे भागी जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है।
एकाएक बस रुक गई। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकालकर उसे बग़ल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस-कंपनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएँगे, जैसे माँ बच्चे के मुँह में दूध की शीशी लगाती है।

बस की रफ़्तार अब पंद्रह-बीस मील हो गई थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फ़ेल हो सकता है, स्टीयरिंग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे जिन पर पक्षी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इंतज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।
एकाएक फिर बस रुकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें की पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया था, कंपनी के हिस्सेदार कह रहे थे—बस तो फ़र्स्ट क्लास है जी! यह तो इत्तफ़ाक़ की बात है।

क्षीण चाँदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गई हो। हमें ग्लानि हो रही थी कि बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसको अंत्येष्टि करनी पड़ेगी।
हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गई थी।
धीरे-धीरे वृद्धा की आँखों की ज्योति जाने लगी। चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती—निकल जाओ, बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।
एक पुलिया के ऊपर पहुँचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। वह बहुत ज़ोर से हिलकर थम गई। अगर स्पीड में होती तो उछलकर नाले में गिर जाती। मैंने उस कंपनी के हिस्सेदार की तरफ़ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा। वह टायरों की हालत जानते हैं फिर भी जान हथेली पर लेकर इसी बस से सफ़र कर रहे हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते तो देवता बाँहें पसारे उसका इंतज़ार करते। कहते—वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।
दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक़्त पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना क्या, कहीं भी, कभी भी पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िंदगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक को प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव ख़त्म हो गए। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गए। चिंता जाती रही। हँसी-मज़ाक़ चालू हो गया।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

चुनाव ऋतु - संहार


यशवंत कोठारी

हे! प्राण प्यारी, सुनयने, मोर पंखिनी, कमल लोचनी, सुमध्यमे, सुमुखी कान धर कर सुन और गुन ऐसा मौका बार - बार नहीं आता। इस कुसमय को सुसमय समझ और रूठना बंद कर, चल आ जा। मइके से लौट आ वहां रहने की ऋतुएं तो और भी आ जायगी। लेकिन हे मृग नयनी यह जो चुनाव रुपी बसंत आपने बाणों के साथ हिमालय से उतर कर पूरे आर्यावर्त में महंगाई की तरह बढ़ रहा है, ऐसा सुअवसर बार - बार नहीं आता है। इसका स्वागत करने के लिए तू मैके से लौट आ।

देख! बाहर खिड़की से बाहर देख, कैसी हवा चल रही है। वृक्षों, पेड़ पौधों, मैदानों, पहाड़ों और नदी नालों पर यह जो इंद्र धनुषी रंग छा गया है। यह अकारण नहीं है। जरूर इसका राज है और राज की नीति है। जो समझे है वे इस चुनावी वैतरणी को पार पा लेंगे और जो नासमझ है वे सदा की तरह इस भंवर में डूब जायेंगे।

हे! सुमुखी, सुनो चारों ध्वनि विस्तारक यंत्रों के कारण कैसा शोर व्याप रहा है। दिग दिगंत गूँज रहे हैं। ये मंगल स्वर अवश्य ही किसी कारण विशेष से आ रहे हैं। जरा देखो बाहर नव ऋतुराज चुनाव तो अपनी प्रत्यंचा पर बान नहीं चढ़ा रहा है। प्रत्येक नगर की हर दीवार पर लगे ये नाम पट्ट बिल, पोस्टर, आदि किस पुण्य चीज का स्मरण करा रहे हैं ? हे, सखी तू देख तो सही बाहर आमों के बाग में ये कैसी कोयालियाँ - मत दो, वोट दो कूक रहीं है। बिचारे पपीहे इस मौसम में सर्दी - गर्मी की परवाह किये बगैर कैसे बरसाती मेंढकों की तरह टर्र टर्र कर रहे हैं। जरूर कोई विशेष बात है, क्यों सखी? और देख, सदा सूखा रहने वाला नगरपालिका का यह नल हवा की जगह पानी दे रहा है, नगर निगम की लाइटें ठीक हो रही है। सड़कों की मरम्मत, मत दाताओं की हजामत एक साथ हो रही है। जरूर कुछ अघटनीय घट रहा है। देख पार्टी दफ्तरों के सामने ये लम्बी और सघन क्यू क्यों लग रही है ? टिकिट के आकांक्षी मृत प्राय मुर्दे भी सहारा लेकर क्यू में खड़े हो रहे हैं। चारों और अभिसारों की, मनुहारों की मानापमानों की, कम्पन की, आशा की, निराशा की, भाषा मौन की पीने पिलाने की असीम कोशिशें जारी है। ये किसी बड़े उत्सव की पूर्व वेला है। कही अबोला है तो कही अघोरी है। तो कही तांत्रिकों का डेरा है तो कहीं ज्योतिषी का फेरा है ऐसे अपूर्व क्षण अकारण नहीं आते। सखी तू भी बहती गंगा में हाथ धो ले। तूने कभी सोचा कि ये नव कुबेर, नवराजा तेरी झोपड़ी पर आये और करबद्ध खड़े रहे। देख यह कोई सपना नहीं है। साक्षात् वोटों के भिखारी तेरे द्वार पर खड़े हैं। जैसे तेरे द्वार खड़ा रे जोगी भगत भर दे रे वोटों की झोली।

प्राण प्रिये! देख यह राजा प्रजा पर कम्बल, मदिरा, धन धान्य, आश्वासनों की कैसी निरंतर वर्षा कर रहे हैं? इस सुखद घड़ी को देख आकाश से देवता पुष्प वर्षा कर अपने जीवन को सार्थक कर रहे हैं।

सुनयने, तुम तो वाम्लिास में जगत प्रसिद्ध हो। चूको मत और वार करो। इस कठिन परीक्षा में अगर तुम पास हुईं तो सिंहासन और मंत्री पद चरण चूमेंगे। यदि यह न हो सका तो हारा हाथी सवा लाख का, तुम ढाई लाख की हो जाओगी।

हे प्राणवल्लभे, दिग दिगंत गूँज रहे हैं। सैकड़ों कृष्ण सैकड़ों अर्जुनों को चुनावी गीता का उपदेश देकर इस महाभारत में उतरने का आह्वान कर रहे हैं। सोशल मीडिया के वैज्ञानिक रिपुदल का नाश करने में दिन रात लगे हुए हैं और विशेषज्ञ आंकड़ों के माया जाल से सबको भ्रमित कर रहे हैं। ऐसी मनोहारी बेला में आओ हम भी इन योद्धाओं को प्रणाम करे और अपना जीवन कृतार्थ करें।

हे सुभद्रे, देख चारों ओर मतों के बारे में क्या - क्या भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं। यह पेंसठ्वीं कला पूर्ण रूपेण भारतीय है, जो सब कलाओं में श्रेष्ठ है। सभी प्रकार के आसन, प्राणायाम, योग सीख कर योद्धा इस मैदान में आये है।

ऋतु वर्णन के इस मौके पर कालिदास, पद्माकर, बिहारी को भूलना असंभव है। कालिदास ने तो ऋतु वर्णन के नाम पर क्या - क्या लिख दिया है। ऐसी दीपमालिका तो उज्जैन के राजा के वक्त भी नहीं हुयी होगी।
देखो सखी, दिल्ली का क्या वर्णन करूँ। दिल्ली तो बस दिल्ली है, इस बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधे। इधर पिछले वायदों की याद जनता को उसी तरह आ रही है जिस तरह प्रेमियों की याद विरहनियों को आती है। सत्ता और कुर्सी के विरह में डूबे नेताओं को अपनी नौका के खेवेय्या की तलाश है।
चुनावी कामदेव भी इस बार पांच फूलों के बान छोड़ रहे हैं और बेचारे नेता जनता के चरणों में साष्टांग दंडवत कर रहे हैं।
अस्तु, हे सुनयने, सुमुखी, प्राणवल्लभे, मृग लोचिनी, घने, लम्बे, काले केशों की स्वामिनी, सिंह वाहिनी तू मैके से लौट आ मुझे तुम्हारे कुवारें हाथों से लिखे भाषण की अत्यंत आवश्यकता है।

86, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर -302002

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

हे करुणामयी, जीवनदायिनी, कृपालु और दयालु भारत की सरकार! आपका जितना गुणगान किया जाए कम है। आप तो अंतर्यामी हैं। आपने हमारे सूखे कंठों की पीड़ा सुनकर जो कृपा की है, उसे कभी नहीं भूलेंगे। मधुशाला खुलवाकर हम पर जो उपकार किया है, उसका ऋण हम जीते जी नहीं चुका पायेंगे। चाहे कोरोना से ही क्यों न मर जाएँ, लेकिन आपका ऋण अवश्य चुकायेंगे। भारत के नागरिक होने के नाते क्या हम आपके लिए इतना भी नहीं कर सकते? लानत है ऐसे जीवन पर जो सरकार के इस प्राणदायी निर्णय का समर्थन न कर सके! जय हो भारत सरकार! जय हो! तालाबंदी के समय आपका यह उपकार सदा के लिए आपके यश का कीर्तिस्तंभ बनेगा।

मधुप्रेमियों की चिंता में भारत सरकार कमजोर हो गयी है। अब वह दिन दूर नहीं जब पुस्तकों में लिखा जाएगा कि इंसान को जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान नहीं बल्कि शराब की जरूरत पड़ती है। सड़कों पर मधुप्रेमियों की लंबी-लंबी कतारें अंगार बरसाती गर्मी की परवाह किए बिना अपने अदम्य साहस का परिचय दे रही है। हमारा यह अदम्य साहस सदैव याद रखा जाएगा। रामायण और महाभारत के युद्ध मधुशाला के पास जुटी भीड़ की मधु भिड़ंत के सामने ओछे नजर आते हैं। सोशल डिस्टेसिंग के नाम पर इतने दिन जान हथेली पर लिए घर में दुबके बैठे मधुप्रेमियों का मधुशाला की चौखट पर जान लुटाने का यह साहस, इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। हे भारत के मधुप्रेमियो! आपको देश मधु सलाम करता है।

कोरोना मंथन के विकराल समय में सरकार मोहिनी बनकर आयी है। सुरा समान मधु की बूँदें छलकाकर गरीबी, महँगाई, धर्म, जाति, वर्ग, भाषा के सारे कलह जड़ से मिटाने का प्रयास कर रही है। भारत सरकार महान है! उसका यह सर्वोत्कृष्ट उपकार असंख्य मधुप्रेमियों की जान बचाने का रामबाण इलाज है। सरकार अपने मधुप्रेमियों का पूरा ध्यान रखती है। गणितज्ञ, वैज्ञानिक, चिकित्सक किसी भी दृष्टि से देखा जाए, उसका मधुशाला श्रीगणेश निर्णय सही सिद्ध होता है। यह सच भी है। जहाँ कोरोना से बड़ी मुश्किल से डेढ़ हजार लोग मरे वहाँ अमृत बरसाती सुरा बूँदों की कमी से असंख्य मधुप्रेमी मर जाते, तब इस बदनामी का बोझ कौन उठाता?

एक समय था जब हमारे शासक मधु सेवन को महापाप मानते थे। अब इसके सेवन से बचने वाले को महापापी मानते हैं। मधुसेवन तो सोशल स्टेटस माना जाता है। आज हमारा देश इन्हीं मधुप्रेमियों के कारण जीवित है। वरना कब का मर जाता। सरकारी योजनाओं को पूरा करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। देश में टैक्स चोर इतने बढ़ गए हैं कि हमारी योजनाएँ पूरी होनी से रही! वह तो खैर मनाओ कि हमारे मधुप्रेमी कभी पत्नी का मंगल सूत्र, तो कभी बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए जुटाए गई संपत्ति, तो कभी लड़की के विवाह के लिए पाई-पाई जोड़ी गई गाढ़ी कमाई की परवाह किए बिना मधुसेवन के लिए सब कुछ स्वाहा कर देते हैं। देश की चमचमाती सड़कें, बड़े-बड़े भवन, पुल, अस्पताल, कर्मचारियों का वेतन सभी इन्हीं के त्यागों का गुणगान गाते हैं। यदि आज हमारे दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी जीवित होते उनके इस त्याग को देखकर उनका मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता। धन्य हो मेरे देश के मधुप्रेमियो!

अब सरकार को न कोरोना का रोना है न सोशल डिस्टेसिंग का। सब गए भाड़ में। अब तो एक ही अजेंडा है- खूब पिलाओ पैसा कमाओ। इस आर्थिक अकाल में यदि कोई कामधेनु गाय है तो वह है – मधुशाला। मधुशाला को धन की वर्षा कराने में महारथ प्राप्त है। सरकार के लिए यह पारसमणि का पत्थर है। तालाबंदी के इस विकट समय में लोगों को आर्थिक सहायता करने के चक्कर में सरकारी खजाने खाली होते जा रहे हैं। इन खजानों को भरने पर ही योजनाएँ पूरी की जा सकती हैं। जय हो मधुशाला-जय हो मधुप्रेमियों। हर एक मधुप्रेमी देशभक्त बनकर कई किलोमीटर लंबी कतारों में खड़ा है। देश के लोगों की भूख मिटाने और आर्थिक दशा सुधारने के लिए अपने जान की परवाह किए बिना मुश्तैदी से अपना दायित्व निभा रहा है। हरिवंशराय बच्चन ने मधुशाला के बारे में सही कहा था- बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला। इन कतारों में खड़े होने वाले मधुप्रेमी जात-पात, धर्म-अधर्म, ऊँच-नीच सभी भेदभावों को मिटाकर एकजुटता के साथ मधुशाला के मंदिर पर माथा टेक रहे हैं। मधु प्रसाद प्राप्त करने के लिए खुले दिल से चढ़ावा चढ़ा रहे हैं। वास्तव में आज के आधुनिक भोजन श्रृंखला के अनुसार घांस पर मेंढ़क, मेंढ़क पर सांप, और सांप पर चील निर्भर रहता है। उसी प्रकार गरीब योजनाओं पर, योजनाएँ सरकार पर और सरकार मधुप्रेमियों पर निर्भर रहते हैं। यह श्रृंखला कभी नहीं टूट सकती।

सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार

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शुक्रवार, 26 मई 2023

जियो और जीने दो

श्यामल बिहारी महतो

' आखिर उसने जो कहा,कर ही डाला '
मंच,मंच पर हमने नेताओं का रूप बदलते, पार्टी बदलते और नीति बदलते भी देखा है। लेकिन यह आदमी तो जरा भी नहीं बदला। लोग क्या कहेंगे,लोग क्या सोचेंगे - एक पल भी नहीं सोचा । अपने भाव, अपनी विचारों को खुला रूप देते, सार्वजनिक करते हुए उन्हें ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। ज़रा भी सोचा -विचारा नहीं उसने। डंके की चोट पर, एक दम से खुला-खुला ! आओ बुढ़वा खेलें होली। अपने रंग हजार। जीवन एक बार ही मिलता है -बार-बार नहीं। जितना हो सके, हंसी -खुशी से जी लो । यह दुनिया एक मुसाफिरखाना है । एक सराय है । रैन बसेरा । जीने के लिए जो सांसें मिली है, उसे पूरा पूरा जी लो । यह जीवन भी एक सराय ही है । यहां कोई अपना कोई पराया नहीं । पैसा हैं तो प्यार है, पावर है तो सब हैं, पास-पास ! क्योंकि पैसा है तो प्रेम है । पैसा नहीं तो सब तरफ विरानी, उजाड़ ! मलाल ! ऐसा जीवन से अच्छा है प्रेम से दो पल जी लो - जी उठोगे "
यह किसी महान संत का विचार या किसी दार्शनिक की कही बात नहीं थी । बल्कि अपने ही गांव के शंभू काका का कथन था।
वह एक बुजुर्ग सम्मेलन था। खुला मंच था ।  हर किसी को अपनी बात रखने की खुली छूट दी गई थी। और कहने वाले भी कहने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे थे। किसी ने जीवन की तरक्की में आई रूकावटों का रोना रोया, कोई पेंशन लागू न होने पर रूदन विलाप किया तो कोई मंहगाई पर भस्म कर देने वाली विचारों से सरकार को श्रद्धांजलि देकर उत्तर गया। लेकिन शंभूवा काका एक दम निराले निकले। उसकी एक एक बात निराली थी। बातों से लगता जैसे कोई युवा किसी वार्षिक सम्मेलन में अपने जीवन के सपनों को सार्वजनिक कर रहा हो "  सोचता हूं फिर सांघा बिहा कर लूं " कह लोगों को चौंकाया था। उसने कहना जारी रखा " काफी दिन हो गए शादी किए। जब हमारी शादी हुई थी, बाराती पैदल और दुल्हा गरूगाडी ( बैलगाड़ी) पर होता । तब तिलक-दहेज नहीं होता, दुल्हन ही दहेज है,कहा जाता । पहले वरमाला नहीं होता, दुल्हे का द्वार लगी होता,  शादी के पहले लड़का लड़की को देख नहीं पाता,अब वरमाला के साथ ही लड़के को लड़की सौंप दी जाती है " देखा- देखी कर लो, संग संग नाच लो, फोटो सोटो खिंचवा लो " यह देख मेरा भी जिया ललचा उठा । और इसी के साथ फिर सांघा करने को, मेरा मन मचलने लगा ।  पहले बेरोजगार था, एक साइकिल और एक गाय तिलक दहेज के रूप में लड़की के साथ भेज दिया गया था ।  अब रोज़गार में हूं । नौकरी है, अच्छी खासी सेलरी है, घर है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, यार दोस्तों के बीच अच्छी पकड़ है, किसी चीज की कोई कमी नहीं है। बस रात को उल्लू की तरह जागता रहता हूं । पहली वाली तो बेवफा निकली,लोक छोड़ परलोक में जा बसी । उसकी याद में आंसू बहाता रहता हूं। मुझे रोता देख एक दिन उसने आकर कहा " मेरी याद में कब तक आंसू बहाते रहोगे, दूसरी कर ले, तुम्हें तकलीफ़ होती होगी । मैं मान गया । अब मन फिर बाप बनने को उकसा रहा है । तिलक दहेज नहीं चाहिए, सिर्फ एक जोड़ी कपड़े में लड़की विदा कर दो..!" वह एक पल को रूका था । सभा स्थल में खुसर फुसर होने लगी थी " किस सनकी पागल को माइक थमा दिया गया है,जो मन में आ रहा है, बके जा रहा है..!"
" कल और आज का फर्क बता रहा है..!" कोई बोल उठा।
" हमें तो लग रहा है,यह सभा को संबोधित नहीं, अपनी दूसरी शादी का प्लान बता रहा है..!"
" पर बोल तो अच्छा रहा है..!" उस पर लोग बोलने शुरू कर दिए  थे।
पर शंभूवा काका का रेडियो बंद नहीं हुआ था । विविध भारती की तरह उसने चालू रखा "  बुजुर्गों ने भी फ़रमाया है कि यह दुनिया एक सराय है। एक मुसाफिर खाना है। जब तक जीवन है जिते ही जाना है । यही नहीं, लोगों को बीच बीच में शादी-बिहा करते रहना चाहिए, जैसे पहले के बुढ़- बुजुर्ग किया करते थे और जैसे आज के नेता लोग बीच बीच में पार्टी बदलते रहते हैं और लड़कियां दोस्त ! फिर हम पीछे क्यों रहें? आखिर उम्र ही क्या हुई है मेरी !  पचपन का हूं पर दिल तो बचपन का है, अच्छी खासी सेलरी है और क्या चाहिए.आज की लड़कियों को ? पैसे वाला हो तो आज की लड़कियां बुढ़ा-सुढा, काला- गोरा और ठिगना भी नहीं देखती और सीधे हां कर झपट लेती है - जैसे बाज़ कबूतरों पर झपटता हैं..!"
" कर लो ! कर लो ! " कुछ ने उकसाने वाली आवाज लगाई ।
" तशेड़ी, नशेड़ी,गंजेड़ी, चार पांच लाख तिलक पा रहा है..!" शंभूवा काका कहते रहे " माना कि वे कुंवारे हैं, अरे,तो हमें भी कुंवारे समझ लो न,घंटा भी फर्क नहीं पड़ेगा। बोलो, कोई मेरा दूबारा बिहा करवा सकते हैं, कोई दूर द्राष्टा ! कोई महानुभाव है ! बिहा सिर्फ मेरे साथ होगा, हमारे घर परिवार के साथ नहीं । जीवन भर का साथ मैं दूंगा। हमारे घर परिवार से उसका कोई लेना देना नहीं रहेगा । परिवार का किसी तरह का भार उस पर पड़ने नहीं दूंगा। खाना भी उसे बनाना नहीं पड़ेगा । बर्तन भी मांजने नहीं पड़ेंगे । लेकिन लड़की किसी जाति की नहीं होनी चाहिए - बस सिर्फ लड़की होनी चाहिए। वह फेसबुक,वाटशप, ट्विटर और इंस्टाग्राम वगैरह में सिर्फ चेटिंग करने का काम करेगी, हमेशा ऑनलाइन रहेगी और ऑनलाइन खाना मंगवा कर मुझे खिलाएगी और खुद भी खाएगी । सप्ताह में एक दिन हम किसी पार्क में घूमने जायेंगे, फोटो शूट करेंगे और फिर किसी दिन किसी नदी में नहाते, किसी झरने के नीचे अपनी कोमल देह को सहलाते-नहलाते वो फोटो शूट करेंगी..! फिर उसे फेसबुक पर अपलोड़ करेंगी । इंस्टाग्राम में चेपेंगीं और हर साल हम शादी सालगिरह मनायेंगे,जो अभी तक हमने पहली के साथ नहीं मनाए थे..! क्या कहा आपने  ? पहली शादी के बारे बताऊं, और बेटा-बेटी के बारे भी बताऊं, ठीक है तो सुनिए..
चालीस साल पहले बिना तिलक दहेज की मेरी शादी हुई थी। तब मेरी उम्र यही कोई बारह साल की होगी, और हाई स्कूल तेलो में वर्ग आठ में पढ़ता था। मूंछ दाढ़ी अभी निकली नहीं थी और हाथ में मोबाइल नहीं कॉपी किताबें होती थी। आज तो पैदा होते ही बच्चों के हाथ में मोबाइल आ जाता है और कितने तो मोबाइल के साथ ही पेट से निकल आते हैं जैसे महाभारत का कर्ण कवच कुंडल पहने पैदा हुआ था । हमारे भी तीन बेटे पैदा हुए। जैसे किसी युग में तीन भगवान पैदा हुए थे, ब्रह्मा, बिष्णु और महेश ! तब से कइयों युग गुजर गये। लेकिन अब धरती पर भगवानों ने पैदा होना बंद कर दिया। अब वे सिर्फ स्वर्ग और नरक का काम देखते हैं । हालांकि हमारे तीनों बेटे बड़ी सरलता से पैदा हुए। किसी ने हस्पताल का मुंह नहीं देखा और न  आज के बच्चों की तरह किसी हस्पताल का नाम उनके नामों के साथ जुड़ा ! पर सभी  के साथ कुसराइन ( गांव में बच्चा पैदा कराने वाली चमारिन) नाम जरूर जुड़ा हुआ था । अपने लालन पालन में भी उन तीनों ने कोई मुश्किल पैदा होने नहीं दी और तीनों जर्मन सेफर्ड की तरह पले -बढ़े ! बड़े हुए तो, एक एक कर हमने तीनों की शादी कर दी, तब भी वो नहीं बदले,तब भी वो तीनों जर्मन सेफर्ड की तरह आज्ञाकारी बने रहे । लेकिन मेरे नहीं - अपनी-अपनी पत्नियों के ! तभी से उनकी सोच बदली थीं - हमारे प्रति। अपने बाप के प्रति। बाप के जीवन और ज़िन्दगी के प्रति। साल भर पहले की बात है। छः माह पहले पत्नी मर चुकी थी । बाहर कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । मैं अपने कमरे में कंबल ओढ़े गठरी बने बैठा हुआ था । तभी सुबह आंगन में आग के अलाव को घेरे तीनों जर्मन सेफर्ड बेटों के बीच गुफ्तगू हो रही थी। शुरुआत बड़े ने की । कह रहा था " रिटायर होने के पहले अगर बाप किसी कारण वश मर जाता है, तो बाजार चौक की वो दस डिसमिल वाली जमीन मैं लूंगा। उस पर मैं एक शानदार "  शंभू मार्केट " प्लेस बनाऊंगा और सभी किराए पर लगा दूंगा। यही मेरा रोजी रोजगार होगा ..।"
" नहीं, नहीं, ऐसा नहीं होगा..।" मांझिल ने एतराज जताया " उसमें मेरा भी हिस्सा होगा। बाप के मरने के बाद मिलने वाले सारे पैसे हम दोनों बांट लेंगे ..।"
" आप दोनों तो बड़े मतलबी निकले। जमीन में दोनों का हिस्सा, रूपए भी दोनों बांट लेंगे और मैं क्या बाबा का घंटा बजाऊंगा। मैं क्या पेड़ की खोंढर से पैदा हुआ हूं !" छोटका छटाक भर उछल पड़ा था ।
" अरे छोटे, नाराज़ काहे होते हो । तुम्हारे लिए नौकरी तो हम दोनों छोड़ ही रहे हैं। तुम मज़े से नौकरी करना..। "
" नहीं, नहीं,भले पैसे मत देना, लेकिन मार्केट में दो कमरा मुझे भी चाहिए..!"
" ठीक है, मंजूर..।" बड़ा बोला।
" ठीक है ..। " ,मंझिला भी सहमत।
" तो फिर ठीक है,तब मुझे एतराज नहीं। "
तीनों ने मेरा उसी दिन तेरहवीं पार कर दिया ।
" आज के श्रवण !" भीड़ से किसी ने कहा।
" तभी मैंने निश्चय कर लिया, जर्मन सेफर्ड बेटों की सोंच और उनके हसीन सपने पर सुतली बम लगाने का...! " शंभूवा काका कहते चले गए " काम पर मैंने अपना और बेटों के प्लान के बारे अपने कुछ खाश दोस्तों को बताए । कुछ ने मजाक में लिया और कुछ ने बेहद गंभीरता से।
" गजब की कुंठित चाहत, बाप अभी मरा नहीं और घर में जलाने के समान आ गये ..!" एक साथी ने कहा
" आज कोई अपना नहीं,सबका सपना मनी -मनी !" दूसरा बोला ।
" शंभू दा, जिंदगी तो वही है, जो अपनी मर्ज़ी से जिया जाए, कौन क्या कहता है, क्या सोचता है,कान देने की जरूरत नहीं..!" तीसरे ने जीवन की लोजिक बताया
उस दिन के बाद से ही मैंने रातों को सोना कम कर दिया और जागना शुरू कर दिया। कहीं ऐसा न हो जिस छत के नीचे की कड़ी से बेटों के लिए कभी झूले लगा दिए करते थे, क्या पता किसी दिन उसी कड़ी से बेटे बकरे की भांति मुझे टांग दें ..!" शंभूवा काका की बातों ने एक समा सा हो बांध दिया था। कहिए तो कुछ कुछ सहमा सा दिया था । जो लोग शुरू में उनकी बातों से उकता कर जाने को उठे थे, पुनः अपनी जगह पर दिल थाम कर बैठ गए थे । शाम होनी अभी बाकी थी। उनका भी और उस सभा की भी।
जीवन की ढलान पर शंभूवा काका के अंदर एक तुफान सा उठा था। समाज की गोष्ठी - बैठकों में जाते रहता था । कह रहा था " एक दिन समाज की मीटिंग से शाम को रामगढ़ से घर लौट रहा था। गोला चौक में दो स्त्री - पुरुष के बग़ल में एक लड़की गाड़ी के इंतजार में खड़ी थी। पता चला पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य वृद्धि के विरोध में सवारी गाड़ियां दिन भर रोड़ पर नहीं चली । और शाम हो चली थी। पर गाड़ियों का अब भी पता नहीं था। तीनों परेशान दिखे। मैंने गाड़ी रोक दी और बाहर निकल आया । पूछा - " क्या बात है..?"
" हमें बहादुरपुर जाना है और कोई गाड़ी मिल नहीं रही है..।" लड़की ने बताया।
" मैं उधर ही जा रहा हूं, फुसरो, चाहो तो मेरे साथ आप लोग चल सकते हैं ।"
" डेढ़ दो घंटा से खड़े हैं, एक भी गाड़ी नहीं आई..!" स्त्री ने आदमी की ओर देखा।
" और रूकना ठीक नहीं है..!" आदमी का मुंह धीरे से खुला ।
" मां,आओ, इन्हीं के साथ चलते हैं..!" लड़की बोली और गाड़ी के बग़ल में आकर खड़ी हो गई। मैंने गेट खोल दिए। वह आगे मेरे बगल की सीट पर आकर बैठ गई। मां बाप दोनों पीछे की सीट पर समा गये । मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पहली बार मैंने लड़की का अवलोकन किया। गौर से देखा। अंदर से महसूस किया। मासूम लगी । वह आगे देख रही थी। सूनी मांग ! पर आंखों में सपनों की उड़ान बाकी !
लड़की विधवा थी और पेट से भी थी । कुदरत की करिश्मा कहिए या जीवन का संयोग। घंटा भर पहले मीटिंग में विधवा विवाह पर मेरे जोरदार भाषण को लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किए थे । मैं कह रहा था " हर विधवा स्त्री को, एक और ज़िन्दगी जीने का अवसर मिलना चाहिए। एक ही जिन्दगी में उसका सब कुछ खत्म नहीं हो जाता..!" अपनी ही कही बातें याद आ रही थीं मुझे ।
" आप क्या करते हैं..?" अचानक से वह पूछ बैठी।
" नौकरी..!"
" घर कहां हुआ..?"
" मुंगो गांव..!"
" पत्नी क्या करती है?"
" वह चल बसी, इस दुनिया में नहीं है..!"
वह चुप हो गई। एक बार उसने मुझे देखा और कुछ पल मूडी गड़ाए बैठी रही । शायद कुछ सोचने लगी थी । मेरे बारे, अपने बारे या फिर समय की विडंबना पर ।
बहादुरपुर आ गया था । सामने विशाल शिव मंदिर खड़ी थी । बुढ़ा बाबा का एक और घर ! मैंने गाड़ी रोक दी और बाहर निकल आया। पूर्णिमा का चांद आसमान पर उग आया था । इक्का दुक्का लोग आ जा रहे थे । जैसे शाम को लोग टहल को निकले हों ।सबकी अपनी धून अपनी चाल !
"  बाहर.आ जाओ.!" मैंने लड़की से कहा। वह बेधड़क गाड़ी से नीचे उतर आई । आगे बढ़ कर मैंने उसका हाथ थाम लिया। वह सहजता के साथ मेरे सामने खड़ी हो गई । निरखने सा भाव-मुंद्रा ! ऊपर-नीचे ताकने लगी ।
उसकी कोमल हथेलियों को सहलाते हुए मैंने कहा " मेरे साथ, हमारे घर चलोगी? मैं भी जीवन में अकेला हूं,अब तुम भी अकेली हो गई हो । शायद इसी लिए जीवन के मोड़ पर किस्मत ने हम दोनों को मिलाया है । उम्र में भले बड़े हूं पर बूढ़ा नहीं हूं । आखिरी सांस तक साथ दूंगा। कभी किसी चीज की कमी होने नहीं दूंगा..!"
" मैं,.. मेरे पेट में बच्चा पल रहा है...!" वह हकलाई थी।
" सब कुछ देख, समझ कर ही मैंने यह प्रस्ताव रखा है  " बच्चा, तुम्हारे नयनों का तारा होगा और मैं तुम दोनों का माली.- शंभू माली.. शंभू नाम है मेरा !"
" मैं फूलमती, फूलमती महतो.!"  उसने मेरी आंखों में झांका । जहां उसे एक पूरा जीवन मंडल विराजमान नजर आया । तब उसने मां बाप की ओर देखा, हमें गाड़ी से उतरे देख वे दोनों भी  उतर गए थे और अचंभित भाव पूर्ण नजरों से हम दोनों को देख रहे थे.. "
" फिर क्या हुआ...?" भीड़ ने पूछा ।
" क्या आप लड़की को साथ लेते आए..?"
" लड़की के माता पिता ने क्या कहा..?"
" तभी उसकी मां आगे बढ़ी थी ..!" सवालों के जवाब समेटते हुए शंभूवा काका ने कहा -"  पहले तो उसने बेटी के सर पे हाथ रखा और मंदिर के अंदर चली गई। लौटी तो उसके हाथ में कागज से लिपटी सिंन्दुर की पुड़िया थी । पुड़िया उसने मेरे हाथ पर रख दी और बेटी से कहा -" यह सिंन्दुर मांग में भर लो बेटी ! भगवान  घर का है, सदा जगमगाती रहेंगी..!"
"  शादी के छः माह बाद ही तुम्हारी किस्मत में छेद हो गई। अब उसी किस्मत ने तुम्हें एक मौका फिर दिया है, जाओ बेटी, इस फ़रिश्ते के साथ सदा खुश रहना  !" बाप ने फूलमती के सर पर हाथ रख  दिया था..!"
" घर में स्वागत हुआ या आफ़त आई...!" किसी ने बीच में फिर पूछ बैठा।
" धमाका हुआ ! जर्मन सेफर्ड बेटों के सपनों पर सुतली बम फट गया ..!" शंभूवा काका ने जैसे जीत की डफ़ली बजाते कहा था " बहादुरपुर से छूटे तो हम सीधे बोकारो मॉल में जा घुसे। फूलमती की वेश भूषा भी तो बदलनी थी । नये परिधानों में वह सचमुच की फूलकुमारी लग रही थी । खुद का नया रूप देख खुद से शर्मा गई और देर तक मुझसे लिपटी रही । रास्ते में हमने एक होटल में खाना खाये । घर पहुंचे तो रात काफी हो चुकी थी और सभी अपने अपने कमरे में गहरी नींद सो रहे थे। हमने किसी को जगाया नहीं और हमेशा की तरह किसी ने उठ कर हमसे पूछा नहीं कि " खा कर आ रहे हो, या खाना भी है..!" हमेशा की तरह हमने अपने पास की चाबी का इस्तेमाल किया। पहले गाड़ी अंदर की फिर फूलमती को बाहों में लिए अंदर अपने कमरे में समा गए। लगा बहुत बड़ी जंग जीतकर लौटा हूं। सोए तो दोनों यही दुआ कर रहे थे कि इस रात की फिर सुबह न हो। लेकिन फिर सूरज उगा, फिर सुबह हुई, और ऐसी सुबह हुई, कि बहुतों के सालों साल की नींद उड़ा दी। कौवे छत की मुंडेर से उड़ गए और मैनों ने डाल बदलने से मना कर दिया।
सुबह सबसे पहले फूलमती ही उठी । शौचालय से निवृत्त होकर मुझे उठाया। आंगन में जर्मन सेफर्ड पुत्रों को अपनी पत्नियों के संग खड़े पाया । बड़ा पुत्र दहकते अंगारों सा आंख किए आगे बढ़ आया " पापा,यह आपने क्या कहर बरपाया ? बुढ़ापे में दूसरी शादी कर लाया..!"
बड़े का शह पाकर मांझिल भी बढ़ आया -
" लोग क्या कहेंगे ज़रा भी न सोचा , खुद को जवान समझा,  क्या है यह लोचा..?"
तभी छोटा था फुसफुसाया " खाने को बप्पा को कोई नहीं पूछता था। आज बप्पा ने हम सबके खाने में जहर मिलाया..!"
" कल तक बप्पा को कोई पूछ नहीं रहा था। आज बप्पा का किसी का साथ पाना बहुत अखर रहा है । जाओ तीनों मिल बना लो शंभू मार्केट। लगा दो किराए पर, हम चले अपनी राह..!" कह साबुन तौलिया लिए मैं बॉथरूम में जा घुसा और फूलमती मुर्झाए सूरजमुखी पौधों को पानी देने लगी ..।"

बोकारो, झारखंड
फ़ोन नं 6204131994

तुम तो सफेद हथिनी लगती हो

 महेश कुमार केशरी
      भाई शब्द  की महिमा  अपरंपार  है l भाई भरत का सिंहासन पर ना बैठना l और राम के खडाऊ का वंदन करना भारतीय  पुरातन परंपरा में एक विरला और एक  अद्वितीय   उदाहरण  है l उनका ये भ्रातृ प्रेम कलियुग  में हमारे यहाँ की महिलाओं का सुरक्षा कवच भी बनकर सामने आया है l जिसने हम झोला छाप मजनूँओं की वाट लगा दी है l  इधर भारतीय राजनीति में नीरव  मोदी , और , विजय माल्या ने जितना दोहन हमारे भारतीय बैंकों का किया है l   उससे कहीं ज्यादा  दोहन  या कह लें कत्ल हमारी तथाकथित भारतीय सुंदरियों  ने हम आशिक मिजाज आशिकों को " भईया " का संबोधन कहकर किया है l भारतीय सुंदरियों  के लिये  " भईया " शब्द  एक तरह का सुरक्षा कवच  होता है  l जैसे दुश्मन से बचने के लिये हमारी सेना बंकरों का इस्तेमाल   करती है l वैसे ही ये महिलायें  " भईया " शब्द का उपयोग , अभेद किले के तौर पर करतीं हैं l 
     बहुत पुराने समय की बात है l सुघड़ जी नाम के एक ऋषि हुआ करते थें l सुघड़ पुराण जिन- जिन मनीषियों  ने पढ़ा है l उनको सुघड़ ऋषि के बारे में अवश्य जानकारी  होगी l सुघड़ पुरण का  एक  प्रसंग है , जिसे मैं आपको सुनाता हूँ l 
      जुगाड़ू  जी की एक स्टेशनरी की दुकान थी l उनके यहाँ एक हथिनी जी अक्सर आती- जातीं थीं l जुगाड़ू  जी बेचारे बहुत ही सीधे- साधे आदमी थें l उन्हें तीन - पाँच से कोई मतलब नहीं था l उनके शहर में एक बार एक खेल आयोजन " हथिनी जी के  महाविधालय "   में होना तय हुआ था l सफेद हथिनी  जी की नाक चपटी थी , जो 
      उनकी सुंदरता में चार - चाँद लगाती थी l कद -काठी ठिगनी सी थी l मुश्किल  से चार - सवा- चार फीट की थीं , सफेद हथिनी जी  l उनको देखकर कोई घोड़ा क्या  बंदर भी घास नहीं डालता l लेकिन , उन्हें गुमान था कि शहर के हर मर्द की नजर उन पर है l और हर नजर उन्हें  गोश्त के एक टुकड़े की तरह देखता है l इसलिए  प्राय: वो सभी मर्दों से एक निश्चित  दूरी बनाकर रखतीं l किसी कारण वश यदि बातचीत करना बहुत जरूरी भी हो तो वे बड़ी होशियारी  से सामने वाले से भाई का रिश्ता  जोड़ लेतीं l जैसा कि प्राय: सभी महिलायें  आत्ममुग्ध  होती हैं l तो , हथिनी  जी भी आत्ममुग्ध  थीं l प्रार्चाय  थीं  तो काॅलेज के मजनूँनुमा टीचरों  से मुफ्त  के मोबाईल रिचार्ज करवातीं l सैर - सपाटे , पिकनिक  - सिनेमा भी साथ देख आतीं l मुफ्त की आईसक्रीम भकोसतीं l इस तरह हर मजनूँनुमा आशिक के वे मजे लेतीं l जब आशिक आजिज आ जाता l  या उसे लगता कि उसकी अच्छे  से ली जा रही है l तो , ठीक उसके कुछ कहने से पहले ही वो कह देतीं l अरे , तुम तो मेरे भाई जैसे हो l 
     पर कटा हुआ आशिक  , तब बुरी तरह से लूटने- पिटने के बाद जार - जार रोता l 
     हथिनी जी को लेकर एक किंवदंती  भी है l कि हथिनी जी पिछले जन्म  में मेनका या रंभा की तरह अप्सरा हुआ करतीं थीं l बला की खूबसूरत l सुघड़ जी उस समय धरती पर तपस्या  कर रहें थें l वे तीनों लोकों को जीत चुके थें l अब हर ओर सुघड़ जी की जय- जयकार  हो रही थी l भगवान  इँद्र का सिंहासन जब खतरे में पड़ा तो l तो भगवान  इँद्र , भगवान विष्णु  के पास गये l और बोले  -प्रभु ये अदना सा आदमी आपको अपनी तपस्या से खुश करके l मेरे इंद्र लोक पर कब्जा करना चाहता  है l कुछ , कीजिए,  प्रभु , कुछ कीजिए ! 
      तब भगवान् विष्णु  ने हथिनी को मेनका का रूप देकर सुघड़ जी की तपस्या  भंग करने के लिये  भेजा l सुघड़  जी घोर तपस्या  में लीन थें l जब हथिनी ने ,   मेनका बनकर उनकी तपस्या भंग कर दी l तब , सुघड़ जी ने मेनका को क्रोधित नेत्रों  से देखते हुए श्राप दिया कि  - हे  मूर्ख  स्त्री ! तूने मेरे वर्षों की तपस्या  को भंग किया है l जा तू अगले जन्म  में एक हथिनी के रूप में जन्म  लेगी l तेरी हरकतें देखकर तेरी , जो बाद की जातियाँ   पैदा होंगी l वो मक्कार पैदा होंगीं l मर्दों से मोबाइल के फ्री रिचार्ज  करवायेंगीं l होटलों में ठूँस- ठूँस कर खायेंगी l मुफ्त के आईसक्रीम  भकोसेंगीं l  मर्दों के पैसों पर खूब सैर- सपाटे करेंगीं l जिन्हें  केवल पैसे से प्रेम होगा l आदमी से नहीं l 
     जिनकी अक्ल घुटनों में होगी l कोई भला मानुष भी उनसे प्रेम करने की सोचेगा l तो उस आदमी में हर औरत को   एक भेंडिया ही दिखाई देगा l सच्चा प्रेम उन्हें कभी नहीं मिलेगा l वो सबको शक की नजरों से देखेंगीं l जिस तरह तूने छल करके मेरी तपस्या  भंग की है l तू भी अपने धोखे के कारण छली जायेगी l जा अगले जन्म  में तू भैंसी बनेगी l 
       लेकिन ; अगले जन्म  में मेनका भैंसी तो ना हुई l अलबत्ता  हथिनी  जरूरी हो गई l छलने वाली बात भी उल्टी पड़ गई l उसे लोग क्या ठगते l वो ही लोगों को ठग लेती l कभी मुफ्त की रिचार्ज  करवा लेती l कभी मेला- सिनेमा घूम आती l कभी  मुफ्त की 
आइसक्रीम भकोसती l जब तक उसके आशिक को पता चलता l तब तक वो कोई नया आसामी ढूँढ़ लेती l
      हथिनी जो को किसी ने  कह रखा था ,  कि आपकी नाक चपटी है तो क्या हुआ ?  आपका रंग तो गोरा है l वैसे भी  हमारे देश में कलर को लेकर मारा -मारी है l और , लोग कलर को लेकर काॅमप्लिकेशन  पाले हुए हैं l नहीं तो मार्केट  में गोरा होने के इतने सारे ब्यूटी प्रोडक्ट की बाढ़ नहीं आती l 
जैसे अंधों में काना राजा होता है l वैसे ही आप नाटी  हैं तो , क्या हुआ ? वैसे  आप  भैंस के मोटापे को भी फेल करने में महारत  रखती हैं l  हमारी हथिनी बिरादरी की आप , सेरेना विलियम्स  हैं  l फिर , क्या  था ? करेला नीम को चढ़ा वाली कहावत हो गई l हथिनी  जी भी अपने को "मिस - वर्ल्ड "  समझने लगीं l वैसे तो हथिनी जी जुगाड़ू   जी से अपने काम से काम रखतीं थीं l  लेकिन " महाविधालय के खेल प्रतियोगिता आयोजन वाले दिन " उनको अपना नंबर जुगाड़ू  जी को देना पड़ गया l उनका सातवाँ  सेंस खुल गया l  जैसे लोहे को लोहा काटता है l कि तर्ज पर रिश्ते को रिश्ते  से काटा जाये वाली खुराफात  हथिनी  जी को सूझी l वो , जुगाड़ू 
       जी को " भईया " कहकर संबोधित करने लगीं l तब जुगाड़ू  जी चकराये l बोले -" ये औरत तो बड़ी खुराफाती  दिमाग की है l " 
मैनें कहा-" हाँ  ,जुगाड़ू  जी , ये सेफ-जोन में रहकर हर गेम खेलतीं हैं l मैनें और शिक्षकों  के आशिक बनने और जिबह होने के किस्से उनको सुनाये l " 
वो दिन है था l और आज का दिन है l जुगाड़ू 
जी ने कभी हथिनी  जी को फोन नहीं मिलाया l

मेघदूत मार्केट  फुसरो
बोकारो ( झारखंड)
पिन-829144

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

बाबागिरी में बमबम

 

राजेन्द्र कुमार सिंह
 
       बड़े भैया जहमतलाल का पढ़ाई में मन कुछ कम लगता था और बाबागिरी में उनका मन खुब रमता था।इसलिए मैट्रिक फेल क्या हुए नए खेल में जम गए।इस क्षेत्र में जम गई शाख,अब कमा रहे लाखों-लाख।कल तक साइकिल पर चलने वाले मर्सिडीज़ पर चल रहे हैं।दुगूने रफ्तार से आगे निकल रहे हैं।आज मंदिरों में जाकर ध्यान लगाते हैं कभी खाने के लल्ले पड़ते थे।आज बढ़िया-बढ़िया दबाकर खाते हैं प्रभु का गुण गाते हैं।
      जहमतलाल हर क्षेत्र में माहिर है यह बात जगजाहिर है।लेकिन पढ़ाई लिखाई का क्षेत्र इनको रास नहीं आए इसलिए कुछ खास नहीं कर पाए। इनके बारे में कितना गिनाए।एकदम काहिल है या यूं कहें कि जाहिल है।वगैर पढ़ें,नौकरी में कैसे पांव आगे बढ़े।तब बाबागिरी वाला लाइन इन को बहुत भाया। यही एक लाइन है जिसमें ज्वाइन करने के लिए पढ़ने-लिखने कि या योग्यता की जरूरत नहीं पड़ती।बस कुछ ट्रिक या तिकड़म भीड़ाना आ जाए।यथा-'जैसे मुहूर्त देखनेआना चाहिए,दान-पुण्य करने का महिमा बताना चाहिए।और इस तरह के खेल में अपना जहमतलाल तो खिलाड़ियों के खिलाड़ी,सबसे अगाड़ी हैं।इनको मालूम है कि यही एक क्षेत्र है जिसमें गाड़ीआगे बढ़ सकती है।आज हजारों में चढ़ावा आता है कल वह लाख से ऊपर वाला पायदान पर चढ़ सकता है।इसलिए पढाई में फिसड्डी,जहमतलाल को इस कार्य में दीखी नोटों की गड्डी-ही-गड्डी।आगे क्या करना हैअपने बखान को बाबूजी के कान में डाल दिए हैं।बाबू जी से बोल दिए हैं कि बाबागिरी बहुत अच्छा धंधा है।इस तरह के क्षेत्र में मेरा मन रमता है।
बाबूजी इनके बातों को सुनकर नाक नहीं धुने बल्कि बेटा 
      जहमतलाल के दिमाग को दाद दिए।क्योंकि भक्तों की तादाद हाल-फिलहाल बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है।उस हिसाब से उनका ध्यान रखने वाले पंडों की कमी निहायत खल रही है।पिताजी को भी मालूम चल गया है उसी भक्तों को समझाने बुझाने वालों की मात्रा उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए।जैसे स्कूल में बच्चे अधिक है तो शिक्षकों की संख्या को उसी हिसाब से बढ़ाना होता है।इसलिए बाबागिरी वाले लाइन में अपने बेरोजगार दोस्तों को भी भिड़ा दिए।और वह स्वयं परम गुरु के चरणों के सानिध्य में रहकर ध्यान लगाना शुरू कर दिए।
      जहमतलाल को मालूम है कि एक बार जम गया कारोबार तो भक्तों के मार्केट में अपना पैठ बनाकर करोड़ उखाड़ सकते हैं।फिर मेरे दोस्त मेरे शिष्य भी आज नहीं तो कल करोड़ों में खेलेंगे।भक्ति का बाजार दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कारोबार में इजाफा हो रहा है।जहां पैसा और प्रतिष्ठा दोनों हो तोऔर क्या चाहिए।एक अनपढ़ गंवार के चरणों में देश के नंबर वन कैटेगरी के लोग सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक तथा शैक्षणिक समाज उनके चरणों में शरण पाता है।इससे बढ़कर बढ़िया क्या कारोबार होगा।वगैर पूंजी का व्यापार,फलता फूलता कारोबार। हल्द लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
 यदि इसमें भी थोड़ा बहुत प्रवचन पर कमांड कर लिया जाए तो यूट्यूब जैसा प्लेटफार्म भी भक्तों को अपने प्रवचन का क्लोरोफॉर्म सुंघाकर बढ़िया आमदनी टान सकते हैं।
        मैं भी सोच रहा हूं कि लेखन के कारोबार से तिलांजलि ले लूं। क्योंकि इसमें कभी-कभी रोटी पर नमक भी मुहाल हो जाता है।स्वाद के लिए मुंह भी बेहाल हो जाता है।पाठक गण आपलोग क्या कहते हैं?
        एक बार इस कारोबार में कूद कर देखता हूं।ऊंच-नीच संभालने वाले बाबागिरी कारोबार के महान पुरोधा बड़े भैया जहमतलालआखिर किस दिन काम आएंगे।मेरा भी सेटिंग पक्का ही समझिए।जय हो बाबागिरी संस्थान के महान स्वामी  गुरु जहलाल महान की।जहमत लाल भैयाआबाद रहे।
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सम्पर्क सूत्र.......
लिलीआर्केड,फ्लैट नं-101
मेट्रो जोन बस स्टैंड,महाजन हास्पिटल समोर
नाशिक-422009,(महाराष्ट्र)
मो-8329680650

टैग बिना चैन कहाँ रे

 

-- अरुण अर्णव खरे --

-- अरुण अर्णव खरे --

       कुछ ही महीने बीते हैं जब सुदूर प्रांत से उनका मित्रता अनुरोध आया था | मैं स्वभाव से जितना धर्मनिरपेक्ष हूँ उतना ही लिंगनिरपेक्ष भी हूँ | बिना लैंगिक भेदभाव किए मैं समान रूप से सभी के मित्रता अनुरोध पर्याप्त छानबीन के उपरांत स्वीकार कर लेता हूँ | उनका मित्रता अनुरोध स्वीकार करने से पहले मैंने उनकी प्रोफाइल में जाके ठीक-ठाक पड़ताल भी कर ली थी | वह भी साहित्यिक रुचि के व्यक्ति थे यद्यपि उनकी वाल पर बहुत ही चलताऊ ढंग की तुकबंदियों की भरमार थी | मैंने कुछ पल सोचा भी था कि उन्हें मित्र बनाया जाए या नहीं | पर मन के किसी अंदरूनी कोने से आवाज आई थी कि हो सकता है वह तुम्हें बड़ा साहित्यकार मानते हों, तुम्हारी रचनाओं के मुरीद हों और तुम्हें मित्र बनाकर धन्य होना चाहते हों | ये मन का भीतरी कोना मुझे अक्सर दुविधा की स्थिति से उबार लेता है और खुश होने की ऐसी-ऐसी स्थितियाँ निर्मित कर देता है कि मैं आत्ममुग्ध होने लगता हूँ | खुद पर गुरूर करने की इच्छा होने लगती है | जिस तरह की तार्किक किरणें इस भीतरी कोने से उत्सर्जित होती हैं वैसी ही मुझे लगता है या तो आर्कमिडीज के मन में "यूरेका .. यूरेका" चिल्लाते समय हुई होंगी या फिर पेड़ से सेव को टपकता देख न्यूटन के दिल में फूटी होंगी | ऐसी ही किरणों से उत्सर्जित ज्ञान ने उस अपरिचित लेकिन संभावनाशील प्रशंसक को मेरा मित्र बना दिया था |
शाम होते-होते उस नए बने मित्र ने तीन तुकबंदियाँ अपनी वाल पर पोस्ट की और मुझे टैग कर दिया | सौजन्यतावश मैंने उनकी सभी पोस्ट पर सुंदरम् लिखकर एक 'थम्स अप' इमोजी को भी चिपका कर भेज दिया | उन्होंने विनय पूर्वक आभार व्यक्त किया और अगले दिन तीन और तुकबंदियों में मुझे नत्थी कर दिया | सौजन्यता के साथ-साथ विनयशीलता भी मुझमें कूट-कूट कर भरी हुई है अतएव इस बार भी मैंने 'वाह, क्या बात है' लिखकर अँगूठे के साथ जवाब दे दिया | एक हफ्ते तक यह सिलसिला उनकी ओर से बदस्तूर जारी रहने के बाद उनके दूसरे मित्रों ने भी मुझे टैग करना शुरु कर दिया | उनके मित्र तो और भी उस्ताद थे | वे मुझे मुंडन से लेकर शवयात्रा तक की कहानियों और तस्वीरों में टैग करने लगे | कुछ दिन बाद उनके मित्रों के मित्र भी मुझे टैग करने लगे | अब मेरी वाल पर मेरी पोस्ट ढूढ़ने पर भी दिखाई नहीं देती और टैग की गई पोस्टों में मैं अपना अस्तित्व ढूढ़ता रहता | इसी तरह कुछ दिन और बीत गए कि एक दिन अचानक एक वरिष्ठ साहित्यकार का मेसैज आ गया - "कैसा साहित्यिक स्तर है तुम्हारा, मुझे समझ में आ गया है .. तुम कैसी-कैसी कविताओं को पसंद करते हो, देख कर मुझे शर्म आती है .. तुम्हारे स्तर की सारी कलई खुल गई है .. मेरी मित्रता सूची में तुम्हारा नाम रहने से मेरी प्रतिष्ठा पर आँच आ रही है .. वर्षों की तपस्या के बाद बनी मेरी इमेज तुम्हारे कारण धूल-धूसरित होने लगी है |" अपने मेसैज में मेरी धज्जियाँ उड़ाने के बाद उन्होंने मुझे अपनी मित्रता सूची से भी विदा करने में ज्यादा देर नहीं की | उनकी देखादेखी अगले ही दिन दो और वरिष्ठों ने अपनी मित्रता-सूची से मेरा नाम उड़ा दिया |
        वरिष्ठों का इस तरह जाना मुझे खतरे की घंटी लगा | ये सभी वरिष्ठ किसी न किसी साहित्यिक संस्था की पुरस्कार समितियों में थे या फिर से उनके आने की संभावना थी | उनकी नाराजगी यानि कि छोटे-मोटे पुरस्कार-सम्मान तक से बेदखल हो जाना था | अब व्यक्ति साहित्यकार हो और उसके परिचय में लिखने के लिए एक अदद सम्मान का नाम भी न हो, तो मित्रों को छोड़िए, परिवार-जन भी लानत मलामत करने लगते हैं | जबसे वरिष्ठों ने मेरा त्याग किया था, यह विचार बार-बार मन को व्यथित कर रहा था |
       मेरी सौजन्यता और विनयशीलता के बारे में आप जान ही चुके हैं .. पर संकोच के साथ बताना चाहता हूँ कि मैं सज्जन भी उसी दर्जे का हूँ | इसके लिए इतना प्रमाण ही काफी है कि मैंने आजतक अपने स्मार्टफोन में न तो कोई पासवर्ड डाला है और न ही किसी पैटर्न लॉक का इस्तेमाल किया है | मेरी पत्नी कभी भी मेरे फोन को उठाकर उसका निरीक्षण / परीक्षण, जो भी करना उसे आता है, कर डालती है | उन अपरिचित सज्जन को मित्र बना कर अब मेरी सज्जनता मुझे ही मुँह चिढ़ाने लगी थी | सज्जनता को एकदम उतार फेंकना भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए बीच का रास्ता निकाल कर मैंने सज्जनता के थोड़े पर कतरना उचित समझा | इसके बाद मैंने अब अपरिचित नहीं रहे उस मित्र की पोस्ट से 'रिमूव टैग' का इस्तेमाल कर उसके टैगियापन को कुतरना शुरु कर दिया | पर इसका भी उस पर कोई असर नहीं हुआ, मानो मुझे टैग किए बिना उसे चैन ही नहीं मिलता था | मुझे लगने लगा कि वह मेरी कुंडली में उच्च के शुक्र को अपदस्थ कर आ विराजे हैं | यदि वह मुझे इसी तरह टैग करते रहे तो मेरी साहित्यिक कुंडली में शनि की अनंतकालीन महादशा लगने का योग बनते देर नहीं लगेगी | अत: मैंने अपनी सज्जनता के थोड़े पर और कतरे तथा सेटिंग में जाके मेरी सहमति के बिना मुझे टैग करने का ऑप्शन एक्टिव कर दिया | संभवतया उनको यह मेरी बदतमीजी लगी होगी, वे बहुत मर्माहत हुए होंगे तभी अगले ही दिन उन्होंने मुझे अपनी फ्रेंड लिस्ट से बेमुरब्बत तरीके से बेदखल कर दिया था |

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-- अरुण अर्णव खरे
डी-1/35 दानिश नगर
होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०),
पिन: 462026
मोबा०: 9893007744      ई मेल: arunarnaw@gmail.com
: परिचय : 
 
24 मई 1956 को अजयगढ़, पन्ना (म०प्र०) में जन्म । भोपाल विश्वविद्यालय से मेकैनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक । सम्प्रति लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से मुख्य अभियंता पद पर कार्यरत रहते हुए सेवा निवृत |
साहित्य की सभी विधाओं में लेखन .. कहानी और व्यंग्य लेखन में देश भर में चर्चित नाम | देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, जिनमें प्रमुख हैं- दैनिक हिंदुस्तान, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, जनसंदेश टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, अमर उजाला, पूर्वांचल प्रहरी, वागर्थ, कथादेश, साप्ताहिक हिंदुस्तान, आज, विभोम स्वर, पुस्तक संस्कृति, गगनांचल, अक्षरा, अक्षर पर्व, नारी शोभा, नूतन कहानियाँ, साक्षात्कार, समहुत, ककसाड़, आलोक पर्व, सरिता, सखी, सरस सलिल, व्यंग्ययात्रा, अट्टहास, मंतव्य, किरण वार्ता, मनस्वी, सुबह सवेरे, हिंदी मिलाप, वार्ता, रचनाकार, हस्ताक्षर, स्वर्गविभा आदि | एक उपन्यास "कोचिंग@कोटा", दो व्यंग्य-संग्रह - "हैश, टैग और मैं" और "उफ्फ! ये एप के झमेले" तथा तीन कहानी संग्रह - "भास्कर राव इंजीनियर", "चार्ली चैप्लिन ने कहा था" तथा "पीले हाफ पैंट वाली लड़की" सहित दो काव्य कृतियाँ - "मेरा चाँद और गुनगुनी धूप" तथा "रात अभी स्याह नहीं" प्रकाशित । एक व्यंग्य उपन्यास "पानी का पंचनामा" व एक व्यंग्य संग्रह "एजी, ओजी, लोजी, इमोजी" शीघ्र प्रकाश्य | तकरीबन बीस साझा व्यंग्य, कहानी, लघुकथा व काव्य संकलनों में रचनाएँ सम्मिलित | "गीतिका है मनोरम सभी के लिए" (मुक्तक संग्रह), अट्टहास के "मध्यप्रदेश विशेषांक" और पर्तों की पड़ताल के "व्यंग्य विशेषांक" का सम्पादन | कथा-समवेत एवं साहित्य समर्था द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिताओं में क्रमश: "मकान" एवं "पीले हाफ पैंट वाली लड़की" कहानियाँ पुरस्कृत | डॉ सुनील सिंह स्मृति सम्मान (व्यंग्य विधा) तथा गुफ़्तगू सम्मान इलाहाबाद सहित साहित्यिक उपलब्धियों के लिए दसाधिक पुरस्कार एवं सम्मान | उपन्यास "कोचिंग@कोटा", शिक्षाविद पृथ्वीनाथ भान सम्मान, जयपुर, साहित्य एवं व्यंग्य संस्थान, रायपुर तथा निर्मला स्मृति साहित्य-रत्न सम्मान, चरखी दादरी से पुरस्कृत | व्यंग्य संग्रह "उफ्फ! ये एप के झमेले" को अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन का पं. कुंजीलाल दुबे स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार | कहानी संग्रह "चार्ली चैप्लिन ने कहा था" को कादम्बरी, जबलपुर का स्व देवदास मायला सम्मान | इनके अतिरिक्त खेलों पर भी आठ पुस्तकें प्रकाशित । भारतीय खेलों पर एक वेबसाइट www.sportsbharti.com का संपादन | आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं का प्रसारण | गया प्रसाद स्मृति कला, साहित्य व खेल संवर्द्धन मंच का संयोजन एवं अट्टहास पत्रिका के म०प्र० प्रमुख।
वर्ष 2017 में अमेरिका व 2018 में मॉरिशस में काव्यपाठ | वर्ष 2015 में भोपाल तथा 2018 में मॉरिशस में सम्पन्न 10वें व 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रतिभागिता | मॉरिशस में "हिन्दी की सांस्कृतिक विरासत" विषय पर आलेख की प्रस्तुति |
पता - डी-1/35 दानिश नगर,
 होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०) 462 026
मोबाइल नं० : 09893007744   

सोमवार, 9 जनवरी 2023

सपना के पंचनामा

                    महेंद्र बघेल

       भारत के लोकतंत्र म सबला समानता के अधिकार हे,फेर असमानता के बड़े जन गड्डडा  घलव हे । समता अउ एकता के भाव ल कहुॅं देखना हे, त वोला एके जगा देख सकत हव। रतिहा सुते-सुते अपने नींद के सपना म..! ये लोकतंत्र अउ संविधान के देय अधिकार नोहे भलुक प्रकृति डहर ले मिले उपहार आय।
    सूते-सूते होय चाहे जागे-जागे सपना सबला देखना चाही, येहा गलत नोहे। बेरोजगार ल रोजगार के, ररूहा ल दार-भात के, ग्राहक ल सस्ता समान अउ पंदरा लाख के, बाईकर ल सस्ता पेट्रोल के, ट्रक वाले ल आधा टोल के अउ जनता ल नेता के सत्य-बोल के सपना खच्चित देखना चाही। सपना ह कतिक अपना हे येहा तो सपना के वेराइटी अउ क्वालिटी उपर डिपेंड करथे।
       सपना शास्त्र के महान सपनज्ञ मन बताथे कि पाहती कुकरा बासे के बेरा म देखे गय सपना के बड़ महत्त्व हे। येला सपना के राजा माने गेहे।आजकल टेलीविजन म अवतरित होके सपना देखाय के शासकीय,अर्द्ध शासकीय अउ निरवा निजी प्रोग्राम चलत हे। उपर ले ये मन सपना ला जागत-जागत देखव कहिथे। जेमन सपना देखाय के ठेकेदारी ले हवय अउ आगू-पाछू ले सपना देखावत घूमत हे। उन आभासी विशेषज्ञ मन के बात ल कहुं मान लेबे ते धारे-धार बोहा जबे।
         बनेच हे ,रात के जगा दिनमान घलव जागत-जागत सपना देखे जा सकथे।अइसन सपना देखे के प्रचलन ह बड़ जुन्ना बात घलव आय। आजकल येकर विकेंद्रीकरण होगे हे।फेर डिजिटल इंडिया के सरकारी प्लेटफार्म म सपना देखे-देखाय के नवा उदीम ह कोंटा म लोर गेहे।इही कड़ी म स्टार्टअप इंडिया के बोरे बासी ह थोथना ओरमाय बइठे हे।अउ मेक इन इंडिया के कढ़ी ल बसियाहा पसिया संग परोसे के शास्त्रीय जतन ह घलव हफरत हे।
           समाज म कोरोना के साइड इफेक्ट के धुॅंधराहा रूप ह एती-ओती जग-जग ले देखे बर मिल जथे।जेन लइका मन पढ़ई-लिखई के चढ़उ रद्दा मा कभू चढ़ नइ पाॅंय,पाछू डहर ढुल जाॅंय, पेल-ढकेल के लटपट म पास होवॅंय,वहू मन आनलाईन परीक्षा माता के सेती दसवीं-बारवीं के रिजल्ट म अनुदान अंक झोंकत नब्बे के ओ पार अमरगे।
       कोरोना के काल अउ कका के चाल ले पोचवा-फोसवा लइका मन चित ले पट होगे। भुइयां ले उठके बादर म चघगें।लइका के भाग म झोथ्था-झोथ्था लटलट ले फरे नंबर ल देखके उनकर दाई-ददा के मया ह उबुक-चुबुक होय लगिस।
     अउ आगू पढ़ा-लिखाके डाक्टर, इंजीनियर अउ कलेक्टर बनाय बर सोचिन।
लइका के उज्जर भविष्य खातिर सुग्घर-सुग्घर सपना देखे लागिन।दाई-ददा मन अपन संग म लईका मन ला बड़े-बड़े सपना देखे बर कहिन।तब लईका मन आधा अपन अउ आधा दाई ददा के सपना ल मिंझार के महासपना देखिन। ददा के  धुतंगा ल अधार मानके ओकर खीसा के वजन ल तराजू म तौलिन।अउ महासपना के प्रथम चरण म नीट ,दूसर चरण म पीएससी अउ तीसर चरण म यूपीएससी कोचिंग के योजना  के सूची बनइन।
       योजना ल साकार करे बर सपरिवार मिल बइठके सहमति बनाइन।आखिर म सपना ल सिरजाय बर लइका मन नीट के पीठ म मुहर लगा दिन अउ कोचिंग सेंटर के बाॅंड़ा म ओइल गॅंय।
   बड़े-बड़े शहर के गली-गली म फूटू कस फूटे कोचिंग दुकान के चुम्बकीय शक्ति ह बड़ तगड़ा रहिथे ।इमका-ढिमका ऑफर अउ विशेष सुविधा म अरझावत कोचिंग दुकान के सेठ मन अपन ग्राहक ल अपन कति खींचे बर टाॅठ-टाॅठ नियम शर्त ल ढिल्ला कर देथें। जइसे चुनाव के पहली पांच किलो अनाज देवत जनता ल लुहाय के जतन..! हाथ म गंगाजल उठाके झन्नाटा (दारू) बंद करे के कसम, दैनिक वेतन भोगी  कर्मचारी ल परमानेंट करे के वादा , त ओती साल पुट दू करोड़ नौकरी के वादा,स्मार्ट सिटी ,बुलेट ट्रेन.., अउ पता नहीं का का ..।आखिर ये जुमला ह जनता के संग इमोशनल अत्याचार नोहे त अउ का हरे।
        समय बितत गीस फेर  कका अभी जिंदा हे वाले नारा के उपभोगी लइका मन के गोड़ ह लद्दी म सटकगे।अनुदानी महासपना देखे के साद म लइका मन नीट परीक्षा म निटोर दिन, धन-दोगानी ल कोचिंग म बोर दिन अउ दाई-ददा के सपना ल रट्ट ले टोर दिन।
       ददा-बबा काल म शासन म बैठे भारत के मंत्री-संत्री मन नसबंदी अभियान के जरिए बढ़त अबादी ल कम करे के सपना देखिन। सपना ल सिरजाय बर जंगल म हिरन के शिकार करे कस सुधवा जनता मन ल धर-बाॅंध के शिविर म ले गॅंय अउ जबरन नसबंदी कर दिन। त उनकर भरे पूरे परिवार अउ भुक्तभोगी समाज म खलबली मचगे।निरवा शुद्ध आबोहवा म छोछंद जीवन यापन करइया पांच ले लेके आठ-आठ, दस-दस लइका के दाई-महतारी मन के  धार्मिक भावना म ठेस पहुंचे लगिस।तब गारी-बखाना म सनाय ये कलबलाय मनखे मन के एके बोल रहिस," हत रे पापी हो, लोग-लइका होवई ह तो भगवान के देती आय रे, वहू म तुमन काट-छाट करत हव, जरे तुम्हर करम ह, अधर्मी हो..।"
            जेन मन नसबंदी अभियान ले एती-ओती बुचक गय रहिन।उनकर छिटके-बगरे आल-औलाद मन के बोली-बचन ह आजकल गजबे हो हल्ला मचावत हे।ईंकर अभिनय अउ संवाद ह फिल्मी दुनिया ल खदबदाके राजनीति म चिखला मतावत हे। ईंकर चाल-चरित्तर ल देखके लगथे कि (बच्चे दो ही अच्छे वाले) नसबंदी समाज के नारा के पलीता इही मन लगाहीं।  
 ऐतिहासिक पात्र के ये अवशेषी महामानव मन के कहना हे कि इनकर दाई-ददा ल जबरन धर-बाॅंध के सेंटर म  काबर नइ लेगे गीस अउ ओ मन ल काबर बुचकन दिन। तेकर सेती येमा पूर्व सरकार अउ मंत्री-संत्री ल ही दोषी माने जाही न..!
      येमन खुदे पूर्ण विराम ल छोड़ के अल्प विराम के पूछी ल धरे बैठे ,बेटा के अगोरा म परिवार ल बढ़ावत, खुद के करनी बर पर के दोष गिनावत हें। ये महाधार्मिक टाइप के मनखे मन आज के तारीख म तीन-तीन ,चार-चार लइका के बाप हें अउ पता नइ प्रतीक्षा सूची के का हाल-चाल हे। इक्कीसवीं सदी के तीसरा दशक म देश के धड़कन दिल्ली म चीं-पों करत इनकर अटेलहा तर्क ल सुनके लगथे कि इही मन डिजिटल इंडिया के महान राष्ट्रवादी विचारक ऑंय।बेटी अउ बेटा के बीच भेदभाव ल मीडिया म बगरावत ये बहुरूपिया मन पता नइ काकर भला करत हें।
        नसबंदी के अभियान ले परिवार म नवा लइका के बढ़ोतरी तो नइ होइस। फेर नसबंदी के कवरेज म अवइया आधा ले जादा दीदी-बहिनी मन के काया म लाइफ टाइम कनिहा पीरा के बासा जरूर होगे। जेन मन हाड़ा टोर मेहनत करॅंय, उन बपरी मन बर जिनगी पहाड़ होगे, दुब्बर ल दू असाड़ होगे।
         नींद अउ उसनिंदा म सपना देखई के अपन खास महत्तम हे। येला तो सबे मन जानथन, फेर टीवी म अवतरित होके पूरा देश ल सपना देखाय के  बातें अलग हे। जनता मन रतिहा के बेरा म बियारी ले उठके हाथ पोछत रहिन तभे अठबज्जी टीवी म एक ठन सपना के झटका ल लांच करे गीस।जेमा आतंकवादी मन के वाट लगाय बर अउ काला धन वाले काला कलूठा मन के कनिहा-कुबर ल टोरे बर सपना देखावत नोटबंदी लागू कर दे गीस।
   फेर का पूछना हे बैंक वाले मन के परसादे काला धन वाले मन के भाग जागगे। बैंक के पाछू मोहाटी डहर ले काला-पीला होय के बोहनी होगे। पेट्रोल पंप वाले मन के पांचों ॲंगरी घीव म, उपराहा म येमन पूरा डराम के घीव में डुबक-डुबक के उबुक-चुबुक के होवत ले तऊॅंरिन। सियान दाई-दीदी मन के गुप्ती, सुपेती अउ ॲंचरा के जम्मो सकेलल पैसा-कौड़ी मन देखते-देखत फाऊ होगे। अपन पारी के अगोरा करत ए टी एम के लईन म खड़े-खड़े कई झन बपरा-बपरी मन के हैप्पी बर्थ-डे घलव होगे।धनी मन पोक्खा ,गरीब मन चोक्खा अउ दूनो के बीच म अवइया मनखे के जिनगी म बजुर कस धोक्खा,येमन गहूॅं के कीरा कस पिसागे। आतंकवादी, भ्रष्टाचारी, नक्सलवादी अउ कालाधन वाले के वाट लगाय के चक्कर म आम जनता के हलवा टाइट होगे।
       छे साल बाद एक ठो खंभा के खूॅंटादार मन ल ये सपना ह बड़ फभिस। आम जनता ल इनकर ले जादा सोचे बोले के अधिकार घलव नइहे। तब अठबज्जी झटका ले लरघाय जनता के अंतस के धड़कन ल नपइया नवा स्टेथेस्कोप के अगोरा हे।
      मिल्खा सिंह, पी टी उषा अउ हिमा दास कस धावक बने बर पल्ला दौड़ना पड़ही ,गेंड़ी चढ़के रिचिरिचि अउ भौरा के भुन्न-भुन्न करे म काम नइ चले।
हवई चप्पल पहिर के हवई जिहाज म उड़े के सपना ह हवा-हवई होगे।नरी ल टेड़गा करके उड़त जिहाज ल देखे के चक्कर म जनता मन भुईयाॅं म भदरस ले गिरत हें।ओकर भाग म घोषणा ल सूंघे अउ चुचरे के छोड़ कुछ बाचे हे का गोतियार..! अइसन दिन  घलव मत आय कि हवई चप्पल पहिर के सड़क म रेंगे बर ठेकेदार डहर ले पाबंदी  लग जाय।
          सपना शास्त्र के महान चिंतक  मन अपन बदलत विचार अउ डोलत आस्था के आधार म कहिथें कि सपना देखे के सबला अजादी हे। सपना अइसे देखव कि ककरो भावना ह आहत झन होय। नइते भावना आहत गेंग के क्षेत्रीय पदाधिकारी मन सक्रिय हो जहीं अउ सपना देखई के बाईकाट शुरू कर दिहीं।आईटी सेल के चिरकुट मन ट्रोल अउ टीवी के अनुदानी एंकर मन फड़फड़ाना शुरू कर दिहीं। डर हे इही तीनो के भरोसा जीयत-खात भड़कचिल्ली नेता मन के अनुशंसा म वित्त मंत्री ह सपना देखई म घलव जी एस टी झन लगा दय।
    त खबरदार रहव, बस जियत रहव, सपना के शरबत म जुमला ल घोर के पियत रहव..?

महेंद्र बघेल डोंगरगांव