महेंद्र बघेल
मेरा एक मित्र था।था मतलब यह नहीं कि अब वह भभूतपूर्व हो चुके हैं। हाँ भूतपूर्व जरूर हो गए हैं। क्या करें, सप्ताह में एक-दो बार हम प्राय: टकरा ही जाते हैं। टकराव का राजमार्ग अमूमन बाजार की सकरी गलियों से होकर गुजरा करता है।
मैं हमेशा यही चाहता हूँ कि उनसे कभी ना टकराऊँ। शायद उसके मन में भी टकरा जाने के भाव का सर्वथा अभाव रहता होगा। पर परिस्थितियों की प्रतिकूलता का क्या कीजिएगा। ये बड़ी निष्ठुर होती हैं। अप्रत्याशित रूप से न टकराने की आशातीत अपेक्षाओं पर पानी फेरने के लिए जैसे घात लगाए बैठे रहती हैं।
आप अनुमान लगा रहे होंगे की ये दोनों आखिर कितनी तीव्रता से टकराते होंगे। इनकी टकराहट घातक,संघातक, प्रहारक या मारक, किस प्रकार की होती होगी? पर यहाँ टकराने का आशय टक्कर मारना या टक्कर खाना से नहीं है, ओरभेट्टा होने से ही है।
संयोग ऐसा कि बाजार के उस सकरी गली में उसके आने और मेरे जाने के समय साम्य के कारण हम आज फिर टकरा गए। परंतु आदतन और प्रोफेशनल टरकू की तरह वे तुरंत टरक लिए। उसके टरक विद्वत्ता को देखकर लगता है कि उसने जरूर टरक शास्त्र में पी.एच.डी. किया होगा।
हमारी मित्रता की गुणवत्ता किशन-विशन की मित्रता की गुणवत्ता से कतई कम न थी। जरूरत पड़ने पर हम एक दूसरे के लिए कभी भी मर मिटने को तैयार रहते थे। अति आधुनिक डिजिटल सभ्यता के इस युग में आज जब भाई ही अपने ही सगे भाई से सीधा मुँह बात करने से परहेज करता है। वहां हमारी मित्रता की कहानी ऐसी थी कि उसे गिनीज बुक न सही लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में आसानी से घुसेड़ा जा सकता था।पर अफसोस विपक्षी खेमो के अपरहेजी तत्वों ने ऐसा होने नहीं दिया।
इसी मित्रता की मजबूत बुनियाद पर हमने कई कारनामें फतह किए थे।आखिर कारनामें फतह करने के लिए उसके तह में जाना भी तो एक आर्ट है।पर मंडली कम चंडाल चौकड़ी के वे अपरहेजी तत्वों के साइंस ने परहेज कर-करके हमारे आर्ट्स को गच्चा दे दिया। उन्हें हमारी मित्रता की फतेही बुनावट से एकदम एलर्जी थी। वे बात-बात पर अक्सर हमारी दोस्ती के मखमली कारपेट पर कांटा बिछाने का काम किया करते थे। फतहकारी मित्रता करने के बुनियादी बातों को भला वे क्या जानें।
बुनियादी बातों को याद करना यानी इतिहास के पन्नों को उलट-पुलट करना । यहाँ इस मुहावरे का आशय पन्नों को फाड़ना के निकटवर्ती अर्थों में भी समझा जा सकता है। इतिहास के अमहानता वाले त्रुटि पूर्ण पन्नों को फाड़कर जमीदोंज करना ही वर्तमान का नूतन दस्तावेजीकरण है। आजादी के बाद इन दोनों महत्वपूर्ण कार्यों में जैसे ताला ही जड़ दिये गये थे। पर अब वर्तमान के ओपनरों ने फाड़ने और खोदने के काम को अपने कंधों पर ले रखा है। वे कहते हैं कि खुदाई का काम अतीत के खुदाई करिश्में को समझने के लिए भी जरूरी है। बिना खोदे तो पानी भी नहीं निकलता। रेत ,पत्थर,कोयला और अयस्कों की तो बात ही छोड़ो। खुदाई और फाड़ाई दोनों स्थायित्व वर्धक क्रियाएँ हैं ।इससे कुर्सी के पायों को लंबे समय तक अंगद की पैर की तरह स्थायित्व प्रदान करने के लिए उर्जा मिलती है। खुदात्मक और फाड़ात्मक संतुष्टि प्राप्त होती है सो अलग। इस चरणबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत आस्था के स्थलों की खुदाई और इतिहास के पन्नों से अमहानता के अ को फाड़कर उसकी जगह पर महानता का म नामक नया चैप्टर चिपकाना प्रमुख है।
पर हमारी दोस्ती के कारनामें, जिसने कई रिकॉर्ड फतह किए थे, उसमें स्वर से अनुस्वार तक अ और म का नामोनिशान मिलना नामुमकिन है। यहाँ आधुनिक ओपनरों के द्वारा खुदाई और फाड़ाई करने की धृष्टता के बावजूद आपको फाड़ात्मक और खोदात्मक जैसे ऐतिहासिक रससिक्त स्वादों का सर्वथा अभाव मिलेगा।
मित्रता के बेमिसाल उदाहरण सभी युगों के शास्त्राभिलेखों में पढ़ने को मिल जाते हैं। उदाहरणार्थ- जनक तनया सीता की खोज में वन-वन भटकते हुए दशरथ नंदन राम अनुज सहित जब ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे तब सर्वप्रथम उनके वायु सेना के एयर चीफ मार्शल पवनसुत हनुमान ने वानर राज सुग्रीव से उनकी भेंट मुलाकात करवाई। दोनों पक्षों के डेलीगेशनों के बीच वार्ता के दौरान आपस में डोजियर सौपे गए। फिर सुग्रीव को बाली मुक्त राज्य और राम को सीता की खोज में मदद करने के वचन के साथ ऋष्यमूक मैत्री समझौता पर मैत्रीमय हस्ताक्षर कर लिए गए।
बाली की व्याभिचारिक अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए वायु सेना के वानर रेजिमेंट के सभी जवानों ने समवेत स्वर में गगन भेदी नारा लगाते हुए जंगल के निस्तब्ध वातावरण में हलचल मचा दिया- अवर डियर फ्रेंड आनरेबल सुग्रीव जी, एंपरर आफ ऋष्यमूक माउंटेन, अब की बार सुग्रीव सरकार..,अब की बार सुग्रीव सरकार..। अंतत: "बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा" के मूल भावों को अंगीकार करते हुए मित्रता की पराकाष्ठा से रामजी और सुग्रीवजी ने अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।
द्वापरयुगीन गुरु सांदीपनी के आश्रम को मित्रता की नर्सरी कहना भला अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है। पर कृष्ण और सुदामा के बीच मित्रता की कहानी इसी आश्रम के प्लेटफार्म पर परवान चढ़ी थी। बालकृष्ण अपने बाल सखा सुदामा जी को मित्रता की महीन कसौटी पर कसते हुए माखन चोरी का लाभार्थी बना पाए या नहीं ये वे ही जाने, पर गुरु सांदीपनी के आश्रम के कैरिकुलम में आर.टी.ई. के तहत निर्धन सुदामा को मेन सब्जेक्ट से वंचित कर देना कतई उचित नहीं था। कालांतर में सुदामा जी को घोर गरीबी का सामना करना पड़ा। सुदामा ने जैसे प्रण ही कर लिया था कि वह बीपीएल में जियेगा और बीपीएल में ही खपेगा। पर उनकी धर्मपत्नी देवी सुशीला हमेशा अपने परिवार को बीपीएल से एपीएल में अपग्रेड करने के जुगाड़ में रहा करती थी। इसलिए वे सुदामा जी को जब-तब श्रीकृष्ण की मित्रता की याद दिलाती रहती थी। गरीबी से तंग आकर और पत्नी के बार-बार जोजियाने पर सुदामा जी को द्वारिकाधीश के राज दरबार में याचनार्थ कूच करना ही पड़ा। देवी सुशीला कृष्ण और सुदामा के निश्चल मित्रता की महीन डोर को मजबूत करना चाहती थी। इसलिए उसने कृष्ण के लिए सुदामा के हाथों एक पोटली में पैक करके जोरन भी पठोयी थी। इधर द्वारिकाधीश के राजमहल में प्रवेश करते ही सुदामा राजशाही के चकाचौंध में अकबका कर बकबका गए और देखते ही देखते संकोचवश मित्रता धर्म को हवा में उड़ाते हुए उस पोटली को टोटली छुपाने की गुस्ताखी करने लगे। पर उधर मुस्कराते हुए द्वारिकाधीश ने मित्रता का रिव्यू न लेते हुए खजानी को तुरंत लपक लिया।
पर हमने अपनी मित्रता को सुदामा की पोटली में छुपा कर रखने की गुस्ताखी कभी नहीं की। बल्कि मित्रता नामक सपाट पिच के बीचों-बीच साझेदारी के कई कीर्तिमान गाड़े और पुराने कीर्तिमानों को जड़ से उखाड़े। मसलन कठिन से कठिन अवसरों पर "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे,तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे" जैसे धधकते बारूदी गीत को अपने धमनी-शिरा में प्रकाश की गति से भी तेज दौड़ाने की भरपूर कोशिश की। नतीजतन दोस्ती 37 डिग्री सेल्सियस के समानांतर पटरी पर दौड़ती रही, कभी डिरेल ना हुई।
हमने जय और वीरू की तरह नहीं सिर्फ जय की तरह नए आयाम गढ़े, फिसलन भरी दुरूह रास्तों पर हरदम आगे बढ़े कभी उतरे ही नहीं, चढ़े ही चढ़े। हमारे हाथों में हेड एंड टेल का गठबंधन नहीं बल्कि हेड टू हेड और टेल तू टेल जैसे आपसी अंडरस्टैंडिंग वाला सिक्का जो था। बसंती ने भी रंग दे बसंती चोला की तरह वीरू को मित्रता के बहुरंगी रंग में रंगने की भरपूर कोशिश की। पर जय ने दोस्ती के बीच आने वाली हर दरो-दीवार को मौसी के सहारे नेस्तनाबूत कर दिया। परेतिन की तरह कंदील जलाती हुई डिंपल वाली श्वेतपरिधानी ठाकुराइन का अंतस भी जय के लिए रह-रहकर हिलोरे मारती रही। पर दोस्ती के आलंबन के मद्देनजर जय ने अपने दिल के ट्यूबलाइट को जलने से पहले ही स्विच ऑफ कर दिया।
"सब दिन होत न एक समाना" की तरह एक दिन हमारी मित्रता की सुरम्य वादियों में अविश्वास के काले-काले बादल फट ही गए। उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हमारी मित्रता के मित्र मार्ग पर पर स्वार्थ की पहली बारिश ने दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे की तरह जगह-जगह गड्ढे कर दिए। समर्पण रूपी मंदिर के गर्भगृह में जगह-जगह पानी चूने लगे। सब्र के बाँध एयरपोर्ट की डोम की तरह भरभराकर टूट गए और विश्वास का धरातल सैलाब में डूबने लगे।तब विवश होकर मैं अपनी मित्रता की कहानी के सेंटर पॉईंट तक पहुँचने का फैसला लिया । नितांत निस्तब्ध वातावरण में सिंहावलोकन करने का साहस बटोरा। और बंद पड़े फाइल को खोलने के लिए अपने मेमोरी कार्ड को एक्टिव करने मशक्कत करने लगा। इस दरमियान बमुश्किल एक पेज खुल पाया, जो मुझे घनघोरात्मक ढंग से चिढ़ाते हुए नजर आया। पर मैंनें आपा न खोया। शांत भाव से उस पेज को पढ़ने लगा।
उसे पेज में दर्ज विवरणों के अनुसार मेहमान नवाजी के चक्कर में अपनी गरीबी को श्वेत वस्त्रों से ढककर घर के आंगन में मित्र को मित्रवत झूला झूलाया। अक्खा वेजिटेरियन होते हुए भी मैंने कलेजा और भेजा फ्राई से उसका सत्कार किया। मित्रता धर्म के मूल भावों को स्थायित्व प्रदान करने की चाह में बिन बुलाए उसके बर्थडे में जाकर गिफ्ट को शिफ्ट करता रहा। अपना समझकर केक खाया खीर-पूरी सपेटी। बिटिया की शादी के लिए पाई-पाई जोड़कर सहेजे गए लाख रुपए को उसके आड़े वक्त में उसके अंटे में अड़ाकर सहयोग किया।
पर अब वापसी का समय जो आया है तो उसने अपना मुँह फेर लिया है। तगादा करने पर लाल ऑंखे दिखाता है। उसके टरकाने के अदा को देखकर ऐसा लगता है मानो मैं ही उसका कर्जदार हो गया हूँ। क्या कहें, वह तो जन्मजात ही अभूतपूर्व व्यक्ति था। मुझे भभूत लगाकर भूतपूर्व हो गया है ।आखिरकार दोस्ती का डंका बजाने के चक्कर में अपनी ही लंका लग ली है।
अब "दोस्त दोस्त ना रहा" के जंक्शन में आकर मित्रता की पटरिया उखड़ गई है।दोस्ती की रेलगाड़ी डिरेल होकर चकनाचूर हो गई है।
टकराते वक्त के संयोजन के समय उसके टरकाने का प्रयोजन भी शायद यही है। अपनी दोस्ती के इतिहास के एक ही पेज का यह अभिलेख मुझे मेरी सीमाएँ याद दिलाने के लिए पर्याप्त है।
मेरा एक मित्र था।था मतलब यह नहीं कि अब वह भभूतपूर्व हो चुके हैं। हाँ भूतपूर्व जरूर हो गए हैं। क्या करें, सप्ताह में एक-दो बार हम प्राय: टकरा ही जाते हैं। टकराव का राजमार्ग अमूमन बाजार की सकरी गलियों से होकर गुजरा करता है।
मैं हमेशा यही चाहता हूँ कि उनसे कभी ना टकराऊँ। शायद उसके मन में भी टकरा जाने के भाव का सर्वथा अभाव रहता होगा। पर परिस्थितियों की प्रतिकूलता का क्या कीजिएगा। ये बड़ी निष्ठुर होती हैं। अप्रत्याशित रूप से न टकराने की आशातीत अपेक्षाओं पर पानी फेरने के लिए जैसे घात लगाए बैठे रहती हैं।
आप अनुमान लगा रहे होंगे की ये दोनों आखिर कितनी तीव्रता से टकराते होंगे। इनकी टकराहट घातक,संघातक, प्रहारक या मारक, किस प्रकार की होती होगी? पर यहाँ टकराने का आशय टक्कर मारना या टक्कर खाना से नहीं है, ओरभेट्टा होने से ही है।
संयोग ऐसा कि बाजार के उस सकरी गली में उसके आने और मेरे जाने के समय साम्य के कारण हम आज फिर टकरा गए। परंतु आदतन और प्रोफेशनल टरकू की तरह वे तुरंत टरक लिए। उसके टरक विद्वत्ता को देखकर लगता है कि उसने जरूर टरक शास्त्र में पी.एच.डी. किया होगा।
हमारी मित्रता की गुणवत्ता किशन-विशन की मित्रता की गुणवत्ता से कतई कम न थी। जरूरत पड़ने पर हम एक दूसरे के लिए कभी भी मर मिटने को तैयार रहते थे। अति आधुनिक डिजिटल सभ्यता के इस युग में आज जब भाई ही अपने ही सगे भाई से सीधा मुँह बात करने से परहेज करता है। वहां हमारी मित्रता की कहानी ऐसी थी कि उसे गिनीज बुक न सही लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में आसानी से घुसेड़ा जा सकता था।पर अफसोस विपक्षी खेमो के अपरहेजी तत्वों ने ऐसा होने नहीं दिया।
इसी मित्रता की मजबूत बुनियाद पर हमने कई कारनामें फतह किए थे।आखिर कारनामें फतह करने के लिए उसके तह में जाना भी तो एक आर्ट है।पर मंडली कम चंडाल चौकड़ी के वे अपरहेजी तत्वों के साइंस ने परहेज कर-करके हमारे आर्ट्स को गच्चा दे दिया। उन्हें हमारी मित्रता की फतेही बुनावट से एकदम एलर्जी थी। वे बात-बात पर अक्सर हमारी दोस्ती के मखमली कारपेट पर कांटा बिछाने का काम किया करते थे। फतहकारी मित्रता करने के बुनियादी बातों को भला वे क्या जानें।
बुनियादी बातों को याद करना यानी इतिहास के पन्नों को उलट-पुलट करना । यहाँ इस मुहावरे का आशय पन्नों को फाड़ना के निकटवर्ती अर्थों में भी समझा जा सकता है। इतिहास के अमहानता वाले त्रुटि पूर्ण पन्नों को फाड़कर जमीदोंज करना ही वर्तमान का नूतन दस्तावेजीकरण है। आजादी के बाद इन दोनों महत्वपूर्ण कार्यों में जैसे ताला ही जड़ दिये गये थे। पर अब वर्तमान के ओपनरों ने फाड़ने और खोदने के काम को अपने कंधों पर ले रखा है। वे कहते हैं कि खुदाई का काम अतीत के खुदाई करिश्में को समझने के लिए भी जरूरी है। बिना खोदे तो पानी भी नहीं निकलता। रेत ,पत्थर,कोयला और अयस्कों की तो बात ही छोड़ो। खुदाई और फाड़ाई दोनों स्थायित्व वर्धक क्रियाएँ हैं ।इससे कुर्सी के पायों को लंबे समय तक अंगद की पैर की तरह स्थायित्व प्रदान करने के लिए उर्जा मिलती है। खुदात्मक और फाड़ात्मक संतुष्टि प्राप्त होती है सो अलग। इस चरणबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत आस्था के स्थलों की खुदाई और इतिहास के पन्नों से अमहानता के अ को फाड़कर उसकी जगह पर महानता का म नामक नया चैप्टर चिपकाना प्रमुख है।
पर हमारी दोस्ती के कारनामें, जिसने कई रिकॉर्ड फतह किए थे, उसमें स्वर से अनुस्वार तक अ और म का नामोनिशान मिलना नामुमकिन है। यहाँ आधुनिक ओपनरों के द्वारा खुदाई और फाड़ाई करने की धृष्टता के बावजूद आपको फाड़ात्मक और खोदात्मक जैसे ऐतिहासिक रससिक्त स्वादों का सर्वथा अभाव मिलेगा।
मित्रता के बेमिसाल उदाहरण सभी युगों के शास्त्राभिलेखों में पढ़ने को मिल जाते हैं। उदाहरणार्थ- जनक तनया सीता की खोज में वन-वन भटकते हुए दशरथ नंदन राम अनुज सहित जब ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे तब सर्वप्रथम उनके वायु सेना के एयर चीफ मार्शल पवनसुत हनुमान ने वानर राज सुग्रीव से उनकी भेंट मुलाकात करवाई। दोनों पक्षों के डेलीगेशनों के बीच वार्ता के दौरान आपस में डोजियर सौपे गए। फिर सुग्रीव को बाली मुक्त राज्य और राम को सीता की खोज में मदद करने के वचन के साथ ऋष्यमूक मैत्री समझौता पर मैत्रीमय हस्ताक्षर कर लिए गए।
बाली की व्याभिचारिक अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए वायु सेना के वानर रेजिमेंट के सभी जवानों ने समवेत स्वर में गगन भेदी नारा लगाते हुए जंगल के निस्तब्ध वातावरण में हलचल मचा दिया- अवर डियर फ्रेंड आनरेबल सुग्रीव जी, एंपरर आफ ऋष्यमूक माउंटेन, अब की बार सुग्रीव सरकार..,अब की बार सुग्रीव सरकार..। अंतत: "बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा" के मूल भावों को अंगीकार करते हुए मित्रता की पराकाष्ठा से रामजी और सुग्रीवजी ने अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया।
द्वापरयुगीन गुरु सांदीपनी के आश्रम को मित्रता की नर्सरी कहना भला अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है। पर कृष्ण और सुदामा के बीच मित्रता की कहानी इसी आश्रम के प्लेटफार्म पर परवान चढ़ी थी। बालकृष्ण अपने बाल सखा सुदामा जी को मित्रता की महीन कसौटी पर कसते हुए माखन चोरी का लाभार्थी बना पाए या नहीं ये वे ही जाने, पर गुरु सांदीपनी के आश्रम के कैरिकुलम में आर.टी.ई. के तहत निर्धन सुदामा को मेन सब्जेक्ट से वंचित कर देना कतई उचित नहीं था। कालांतर में सुदामा जी को घोर गरीबी का सामना करना पड़ा। सुदामा ने जैसे प्रण ही कर लिया था कि वह बीपीएल में जियेगा और बीपीएल में ही खपेगा। पर उनकी धर्मपत्नी देवी सुशीला हमेशा अपने परिवार को बीपीएल से एपीएल में अपग्रेड करने के जुगाड़ में रहा करती थी। इसलिए वे सुदामा जी को जब-तब श्रीकृष्ण की मित्रता की याद दिलाती रहती थी। गरीबी से तंग आकर और पत्नी के बार-बार जोजियाने पर सुदामा जी को द्वारिकाधीश के राज दरबार में याचनार्थ कूच करना ही पड़ा। देवी सुशीला कृष्ण और सुदामा के निश्चल मित्रता की महीन डोर को मजबूत करना चाहती थी। इसलिए उसने कृष्ण के लिए सुदामा के हाथों एक पोटली में पैक करके जोरन भी पठोयी थी। इधर द्वारिकाधीश के राजमहल में प्रवेश करते ही सुदामा राजशाही के चकाचौंध में अकबका कर बकबका गए और देखते ही देखते संकोचवश मित्रता धर्म को हवा में उड़ाते हुए उस पोटली को टोटली छुपाने की गुस्ताखी करने लगे। पर उधर मुस्कराते हुए द्वारिकाधीश ने मित्रता का रिव्यू न लेते हुए खजानी को तुरंत लपक लिया।
पर हमने अपनी मित्रता को सुदामा की पोटली में छुपा कर रखने की गुस्ताखी कभी नहीं की। बल्कि मित्रता नामक सपाट पिच के बीचों-बीच साझेदारी के कई कीर्तिमान गाड़े और पुराने कीर्तिमानों को जड़ से उखाड़े। मसलन कठिन से कठिन अवसरों पर "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे,तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे" जैसे धधकते बारूदी गीत को अपने धमनी-शिरा में प्रकाश की गति से भी तेज दौड़ाने की भरपूर कोशिश की। नतीजतन दोस्ती 37 डिग्री सेल्सियस के समानांतर पटरी पर दौड़ती रही, कभी डिरेल ना हुई।
हमने जय और वीरू की तरह नहीं सिर्फ जय की तरह नए आयाम गढ़े, फिसलन भरी दुरूह रास्तों पर हरदम आगे बढ़े कभी उतरे ही नहीं, चढ़े ही चढ़े। हमारे हाथों में हेड एंड टेल का गठबंधन नहीं बल्कि हेड टू हेड और टेल तू टेल जैसे आपसी अंडरस्टैंडिंग वाला सिक्का जो था। बसंती ने भी रंग दे बसंती चोला की तरह वीरू को मित्रता के बहुरंगी रंग में रंगने की भरपूर कोशिश की। पर जय ने दोस्ती के बीच आने वाली हर दरो-दीवार को मौसी के सहारे नेस्तनाबूत कर दिया। परेतिन की तरह कंदील जलाती हुई डिंपल वाली श्वेतपरिधानी ठाकुराइन का अंतस भी जय के लिए रह-रहकर हिलोरे मारती रही। पर दोस्ती के आलंबन के मद्देनजर जय ने अपने दिल के ट्यूबलाइट को जलने से पहले ही स्विच ऑफ कर दिया।
"सब दिन होत न एक समाना" की तरह एक दिन हमारी मित्रता की सुरम्य वादियों में अविश्वास के काले-काले बादल फट ही गए। उच्चतम शिखर पर आरूढ़ हमारी मित्रता के मित्र मार्ग पर पर स्वार्थ की पहली बारिश ने दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे की तरह जगह-जगह गड्ढे कर दिए। समर्पण रूपी मंदिर के गर्भगृह में जगह-जगह पानी चूने लगे। सब्र के बाँध एयरपोर्ट की डोम की तरह भरभराकर टूट गए और विश्वास का धरातल सैलाब में डूबने लगे।तब विवश होकर मैं अपनी मित्रता की कहानी के सेंटर पॉईंट तक पहुँचने का फैसला लिया । नितांत निस्तब्ध वातावरण में सिंहावलोकन करने का साहस बटोरा। और बंद पड़े फाइल को खोलने के लिए अपने मेमोरी कार्ड को एक्टिव करने मशक्कत करने लगा। इस दरमियान बमुश्किल एक पेज खुल पाया, जो मुझे घनघोरात्मक ढंग से चिढ़ाते हुए नजर आया। पर मैंनें आपा न खोया। शांत भाव से उस पेज को पढ़ने लगा।
उसे पेज में दर्ज विवरणों के अनुसार मेहमान नवाजी के चक्कर में अपनी गरीबी को श्वेत वस्त्रों से ढककर घर के आंगन में मित्र को मित्रवत झूला झूलाया। अक्खा वेजिटेरियन होते हुए भी मैंने कलेजा और भेजा फ्राई से उसका सत्कार किया। मित्रता धर्म के मूल भावों को स्थायित्व प्रदान करने की चाह में बिन बुलाए उसके बर्थडे में जाकर गिफ्ट को शिफ्ट करता रहा। अपना समझकर केक खाया खीर-पूरी सपेटी। बिटिया की शादी के लिए पाई-पाई जोड़कर सहेजे गए लाख रुपए को उसके आड़े वक्त में उसके अंटे में अड़ाकर सहयोग किया।
पर अब वापसी का समय जो आया है तो उसने अपना मुँह फेर लिया है। तगादा करने पर लाल ऑंखे दिखाता है। उसके टरकाने के अदा को देखकर ऐसा लगता है मानो मैं ही उसका कर्जदार हो गया हूँ। क्या कहें, वह तो जन्मजात ही अभूतपूर्व व्यक्ति था। मुझे भभूत लगाकर भूतपूर्व हो गया है ।आखिरकार दोस्ती का डंका बजाने के चक्कर में अपनी ही लंका लग ली है।
अब "दोस्त दोस्त ना रहा" के जंक्शन में आकर मित्रता की पटरिया उखड़ गई है।दोस्ती की रेलगाड़ी डिरेल होकर चकनाचूर हो गई है।
टकराते वक्त के संयोजन के समय उसके टरकाने का प्रयोजन भी शायद यही है। अपनी दोस्ती के इतिहास के एक ही पेज का यह अभिलेख मुझे मेरी सीमाएँ याद दिलाने के लिए पर्याप्त है।
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