इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

फ़िल्म काबुलीवाला : बिमल राय(1961)

अजय चन्द्रवंशी


       प्रेम और सम्वेदना मनुष्य की सहजवृत्ति हैं। हमारा संवेदनात्मक लगाव केवल 'अपनों' से नही अपितु 'दूसरों' से भी हो सकता है। या यों कहें कि जिनसे हमारा लगाव हो जाता है उसे हम अपना समझने लगते हैं।इस लगाव के कई रूप और नाम हैं। स्त्री पुरुष का प्रेमाकर्षण है, मित्रता है, बड़ों के प्रति सम्मान छोटो के प्रति स्नेह है तो दीन-दुखियों के प्रति करुणा भी है।इन विविध रूपों में एक रूप सन्तान के प्रति प्रेम है। मनुष्य का अपने सन्तान से अत्यधिक लगाव होता है; वह उसकी सलामती और सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अपनी संतान से तो सब प्रेम करते हैं मगर इसका उदात्त रूप वहां दिखाई देता है जब व्यक्ति 'दूसरे' की संतान को अपनी संतान की तरह प्रेम करने लगता है।
      प्रेम और करुणा जाति-धर्म-भाषा-मुल्क के सीमाओं से परे होते हैं मगर विडम्बना है कि नफ़रत के लिए उपर्युक्त आधार आज बेहद प्रचलित हो चले हैं। आज एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को बिना उसे जाने केवल उसके धर्म या मुल्क के आधार पर उससे नफ़रत कर सकता है, करता है।सामाजिक समरसता आज इस कदर विखण्डित हो रहा है कि लोगों की अपने से भिन्न सांस्कृतिक पहचान समूह से एक अघोषित दूरी बनती जा रही है। ऐसे में 'काबुलीवाला' जैसे कहानी और फ़िल्म में चित्रित प्रेम और सम्वेदना किसी और 'दुनिया' की बात लग सकती है। मगर मनुष्यता ऐसे संकटों से कई बार गुजरती रही है। उम्मीद की जानी चाहिए वह सुबह फिर से आएगी।
      फ़िल्म में काबुल का एक पठान(खान) [बलराज साहनी] आर्थिक समस्या के समाधान के लिए पलायन कर हिन्दोस्तान के कलकत्ता शहर आता है। इस 'आने' को अप्रत्याशित नही कह सकते क्योंकि प्राचीन काल से विभिन्न देशों में व्यापार आदि कारणों से भिन्न देश के लोग आते-जाते रहे हैं। आवागमन के यांत्रिक साधनों ने इसमे अवश्य अप्रत्याशित तेजी दी है। जाहिर है काबुल(अफ़गानिस्तान) से भी लोग अपने भौगोलिक परिवेश के उपज काजू,पिस्ता, बादाम, सूखा मेवा, तथा कारीगरी के सामान जैसे साल आदि को बेचने भारत आते रहे हैं। फ़िल्म का 'काबुलीवाला' भी बचपन से अपने परिवेश में यह देखता रहा होगा; इसलिए भारत आने का विचार उसके मन में आया होगा। अवश्य वह कुछ लोगों के साथ समूह में आया होगा। शहर में ये एक साथ एक जगह रहते भी दिखाए गए हैं।
       काबुलीवाला काबुल में अपनी चार-पाँच साल की नन्ही बेटी  को अपनी माँ के सहारे छोड़कर आया है।पत्नी नही है। बेटी  की याद संजोकर रखने के लिए उसकी हथेलियों की छाप कागज पर ले आया है। जब बेटी की याद आती है तो उसे देख लेता है। वह फेरीवाला है। फेरी लगाकर शहर में अपना सामान बेचता है। इसी दौरान एक दिन उसकी 'मिनी' से पहचान होती है। मिनी उसकी बेटी की हमउम्र है। उसे उसमे अपनी बेटी की छवि दिखाई देती है। मिनी एक चंचल बातूनी लड़की है। उसके पिता लेखक हैं। माँ गृहणी है। मिली काबुलीवाले से हिल-मिल जाती है। अपनी स्वाभाविक चपलता में उससे बतियाती है। काबुलीवाला का पितृत्व भी उससे प्रेम करने लगता है। काबुलीवाला अपना कुछ सामान सहजता से उसे देने लगता है, मगर मिनी के पिता अक्सर पैसे दे देते हैं।
      मिनी की माँ एक अजनबी परदेशी से उसके घुलने-मिलने को सहज नही ले पाती। उसका मन आशंकित रहता है। अक्सर फेरीवालों के प्रति समाज मे एक कल्पित भय अथवा अफ़वाह रहता है कि वे बच्चे चुरा लेते हैं। ऐसा भी नही की कभी बच्चा चोरी की घटना हुई ही न हो, मगर अधिकांशतः इसमे अफ़वाह ही रहता है।मगर मिनी के पिता काबुलीवाले के सह्रदयता को देखकर उसके प्रति कभी आशंकित नही रहें। पत्नी के कई बार मना करने पर वह द्वंद्वग्रस्त हो जाते हैं, मगर दोनो के एक दूसरे के प्रति लगाव को देखकर कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं।
      टैगोर जी की कहानी छोटी है; इसलिए फ़िल्म को अपेक्षित लंबाई देने के लिए छोटे-छोटे पूरक प्रसंग जोड़े गए हैं, जो सहज बन पड़े हैं।ये कहानी के प्रवृत्ति के अनुरूप हैं। मसलन एक बार मिनी बीमार होती है, और ठीक नही हो रही होती है तो माता-पिता के साथ काबुलीवाला भी दुखी रहता है। जब माता-पिता दवा कराते रहते हैं तो वह दुआ करते रहता है। एक दिन तो वह रात-भर मिनी के घर के बाहर बैठकर दुआ मांगता रहता है।
      इसी तरह एक दूसरी घटना में जब मिनी की माँ आशंकाग्रस्त होकर उसे रोज़ घर न आने के लिए पति से कहलवाती है तब मिनी उसका रोज़ राह देखा करती है और एक दिन उसे ढूँढने गली में निकल जाती है और भटक जाती है। इधर मॉं-बाप परेशान उधर काबुलीवाला भी परेशान होकर ढूंढता है। अफ़वाह फैल जाती है कि काबुलीवाले ने बच्ची चुरा लिया है। संयोग से मिनी काबुलीवाले को ही मिलती है।मगर उसी समय भीड़ आ जाती है काबुलीवाले को पीटने लगती है। मिनी रोने लगती है। संयोग से मिनी के पिता वहां आकर स्थिति सम्हालते हैं और वास्तविकता का पता चलता है।
      इसके बाद कहानी में नाटकीय मोड़ आता है। इन घटनाओं से काबुलीवाले के मन मे अपने देश लौटने की इच्छा प्रबल हो जाती है। वह अपना काम समेटने लगता है। मगर उधार में दिए सामान के पैसे वसूलने के दौरान एक ग्राहक के साफ मुकर जाने और गाली-गलौच करने से हुए झड़प में वह उसे चाकू मार देता है।पुलिस जब उसे कैद कर  ले जाते रहती है तब मिनी के घर के पास से गुजरती है। मिनी उसे पूछती है आप कहाँ जा रहे हो तब वह कहता है "अपने ससुर के घर"। दरअसल वह मिनी से इसी तरह का मज़ाक किया करता था।
      उसे दस साल की सजा हो जाती है।जेल में दिन गुजरने लगता है। समय का चक्र चलते रहता है। आख़िर वह दिन भी आता है जब वह रिहा होता है। वह सबसे पहले मिनी को देखने उसके घर आता है। इधर छोटी मिनी किशोर वय की हो चुकी रहती है। उस समय उसके घर मे शहनाई बज रही होती है। दरअलस उसकी शादी हो रही थी। काबुलीवाला जब वहां आता है तो मिनी के पिता को सुखद आश्चर्य होता है। काबुलीवाला मिनी को देखना चाहता है। उसके पिता पहले तो शादी के कारण बेमन से मना करते हैं मगर जब काबुलीवाला लौटने लगता है तो ख़ुद को रोक नही पाते और मिनी को बुलाते हैं। काबुलीवाला जब मिनी को देखता है तो पहले तो समझ नही पाता, उसके मन में नन्ही मिनी बसी थी।उसके लिए समय जैसे दस वर्ष से ठहरा हुआ था, जैसे वह स्वप्न में था।मिनी बचपन की बातें लगभग भूल चुकी थी, वह उसे पहचान नही पाती।उसके पिता उसे याद दिलाते हैं। काबुलीवाला अचानक जैसे  चेतना में लौटता है और उसे ध्यान आता है कि उसकी बेटी भी बड़ी हो गई होगी। वह भाव विभोर होकर रोने लगता है।
      मिनी के पिता सह्रदय व्यक्ति रहते हैं। वह मिनी के बचपन में पत्नी के विरोध के बावजूद उसे काबुलीवाले से मिलने देते थे।इस समय भी वह काबुलीवाले की भावना देखकर उसके वतन वापसी के लिए चिंतित हो उठते हैं। कोई उपाय न देखकर मिनी के विवाह खर्च जैसे बाजा, रौशनी मे कटौती कर कुछ रुपयें उसे देते हैं ताकि वह अपने देश लौट सके। मिनी भी अपना एक कंगन उसकी बेटी के लिए उसे देती है। और इस तरह फ़िल्म समाप्त हो जाती है। अवश्य दर्शक के मन यह बात गूंजते रहती है कि इस दौरान इसकी बेटी का क्या हुआ होगा!
       इस तरह यह फ़िल्म मानवीय प्रेम और करुणा की अमरता का संदेश भी देती है।हालात कितने भी ख़राब हो जाएं, ये बचे रहते हैं, बचे रहेंगे। फ़िल्म का मन्ना डे के स्वर में गाया गीत "ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन" काफ़ी लोकप्रिय है। यह गीत काबुलीवाला और उसके साथी अपने वतन (अफ़गानिस्तान) को याद कर गाते हैं। मगर देशप्रेम सार्वभौमिक होता है। हर व्यक्ति अपनी मातृभूमि से प्रेम करता है। हम सब भी जब इस गीत को सुनते हैं अपना देश याद आता है, अफ़गानिस्तान नही।मगर इधर कुछ ऐसी हवा चली है कि कुछ लोग कला-साहित्य-संगीत को भी जाति-धर्म की नज़र से देखने लगे हैं।उम्मीद है यह स्थिति हमेशा न रहेगी।


कवर्धा (छ. ग.)
मो. 9893728320

शनिवार, 22 नवंबर 2014

हैदर जो कू. ए. यार से निकले तो सू.ए.दार चले

उमाशंकर सिंह 

मोटे तौर पर यह माना जाता है कि फिल्म के पेशे से जुड़े लोगों को उनके वक्त की फिल्मों के बारे में राय जरूर रखनी चाहिए पर उन्हें उन पर कोई लिखित निर्णय या उसकी विस्तृत विवेचन मीमांसा करने या फिल्मी पत्रकारिता करने से बचना चाहिए। फिल्म लिखना, बनाना और फिल्मी पत्रकारिता करना दोनों दो जुदा चीजें हैं। उन्हें आपस में मिक्स ना किया जाए, यही बेहतर है। वरना फिल्म समीक्षा कर फिल्मी जनसंपर्क बढ़ाने या वाजिब बात या सच लिख कर संबंधित पक्षों से बिगाड़ मोल लेने वालों की कोई कमी नहीं है। यही बातें सोच कर इन पंक्तियों के लेखक ने फारवर्ड प्रेस पत्रिका में अपना सिनेमा का कॉलम करीब पांचेक माह में ही बंद कर दिया कि अपना काम फिल्म लिखना है ना कि फिल्म पर लिखना। वैसे भी फिल्म लिख लेने या लिखने का मौका पाने के जद्दोजहद के इस वक्त में अपने मूल काम में ही अपनी सारी ऊर्जा लगानी व्यावहारिकता है। पर कुछ फिल्में होती हैं जो आपसे आपको कौल तुड़वा देतीं हैं। हैदर उन्हीं चंद फिल्मों में से है।
यह मानने से कोई गुरेज नहीं है कि इंटरटेनमेंट सिनेमा का एक प्रमुख दायित्व है। पर वह सिनेमा का इकलौता दायित्व नहीं है। पर इधर हिंदी सिनेमा इंटरटेनमेंट के नाम पर जिस तरह बेसिर पैर  की  कॉमेडी के पीछे जिस पागलपन से पड़ा हुआ है, हम भूल गऐ थे कि सिनेमा का एक काम सवाल उठाना भी है। हैदर सिनेमा के सवाल उठाने के इस बिसरा दिए गए गुण - धर्म की याद दिलाती है। वह ऐसे सवाल उठाती है जो असुविधाजनक हैं, जोखिम भरे हैं, जिसका जवाब अभी हमारे समय के दर्शन, राजनीति और व्यवस्था के पास नहीं हैं। कुछ सवालों के जवाब सैकड़ों साल बाद मिलते हैं। पर उस कालखंड का सवालशून्य होना दरअसल संवदेनाशून्य होना है। फिल्म का नायक हैदर फिल्म की नायिका से संवाद में जो दरअसल उसका आत्मालाप ही है, कहता भी है कि सवाल का जवाब भी एक सवाल ही है। निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी ना हो और फौरी निर्णय देने का लोकप्रियतावादी लोभ ना हो, तो हम सवाल के जवाब में असल में एक दूसरे सवाल पर ही पहुंचते हैं।
फिल्म में एक शब्द बार - बार आता है - डिसएपीयर! कश्मीर में हजारों औरतों के दिलकश शौहर, बूढे मां - बापों की जवां - अधेड़ औलादें डिसएपियर हैं। फिल्म के वे तमाम पात्र जिन्हें थोड़ी सी सत्ता या व्यवस्था या दलाली की ताकत हासिल है के पास असुविधाजनक और नागवार लोगों के लिए एक आसान और प्रिय धमकी है। डिसएपीयर करा दूंगा! फिल्म में डिसेपीयर कराने की धमकी ऐसी दी जाती है जैसे फेसबुक पर कुछ सिरफिरे असहमतों को ब्लॉक करने की धमकी देते हैं। जैसे फेसबुक पर एक बटन या एक कमांड भर से किसी को ब्लॉक किया जा सकता है उससे रत्ती भर भी जादा मुश्किल उनके लिए कश्मीर में किसी को डिसेपीयर करवाना नहीं है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा के राष्ट्रवादी मंत्र के जाप को नजरअंदाज कर दें तो असल हिंदुस्तान ने वास्तव में पूरे कश्मीर को ही अपने लिए डिसेपीयर मान लिया है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है के अलावा कश्मीर की किसी भी वाक्य के रूम में हमारे लिए मौजूदगी हमें पवित्र भाषाई व्याकरण को कबूल नहीं है। क्या यह अनायास है कि अभी कुछ दिन पूर्व उज्जैन विश्वविद्यालय के कश्मीरी पंडित कुलपति पर इस लिए राष्ट्रवादी लड़ाकों ने हमले किए क्योंकि उनने बाढ़ की भयानक विभीषिका से गुजर रहे कश्मीर के लिए राहत सामग्री जुटाने की देशद्रोही अपील कर दी थी!
जब ऐसे कश्मीर की पृष्ठभूमि पर फिल्म बनेगी और इन सवालों से कन्नी काटेगी तो वह एक बेईमान फिल्म ही होगी। पर कश्मीर का सवाल यहां केंद्रीय सवाल नहीं है। केंद्रीय है हैदर का द्वंद्व! क्या करूं और क्या ना करूं ? कश्मीर जैसा रक्तरंजित हो चुका उसका जीवन, जिसे प्रतिशोध की आग जला रही है और नायिका आशी अपने प्रेम के ठंडे छीटों से हैदर के दिलो - दिमाग के ताप को बुझा कर उसे शीतल कर देने की मासूम ख्वाहिश पाली हुई है। पर आग के गोलों के सामने पानी की छीटें कितने नाकाफी होते हैं ना!
हैदर का द्वंद्व बर्फ  की वादी कश्मीर को उसके लिए रेगिस्तान बना देता है जिसमें वह दर - दर भटकता है। कुछ नहीं कर पाने की विवशता में उसका पूरा जीवन ही फिल्म में गीतकार का क्रेडिट पा शायर फैज अहमद फैज की इस शायरी सरीखा हो गया है। मकाम फैज कोई राह में जंचा ही नहीं,जो कू. ए.यार से निकले तो सू. ए. दार चले! हैदर के कूचा, यार और सु. ए. दार के बीच है उसकी मां को प्यार, ताकत और फरेब से हड़प चुके उसके चचा जान खुर्रम का षडयंत्र। नायिका के पिता और जम्मू - कश्मीर पुलिस के ऑफिसर और श्रीनगर के एसपी का वार। नायिका के पुलिस ऑफिसर का पिता एक दृश्य में कुछ कथित आतंकवादियों को किसी बिना के बगैर यह कहते हुए अचानक गोलियों से भून देता है कि मरा हुआ आतंकवादी भी लाख रूपये का होता है। हैदर तो फिर आतंकवादी सरीखा भी है और उसकी बेटी का प्रेमी भी, जो अपनी लपटों में उसकी बेटी की जिंदगी भी खाक कर डालेगा। उसके क्या तो क्रूर और शातिर वार होंगे! इन सबके बीच पुलिस में अदद नियुक्ति पा लेने का ख्वाहिशमंद बचपन के दोस्त सलमान द्वय का हैदर के साथ विश्वाशघात। हैदर कहां जाए कहां ना जाए! क्या वह अपनी प्रेमिका आशी के सीने में अपना सर छुपाकर शतरमुर्ग हो जाए ? अपनी मां की गोद में छुप के अपने जख्म सहला ले ? पर वही गोद एक वक्त के बाद उसे उसकी पिता के हत्या की सेज लगने लगती है!
अमूमन हिंदी सिनेमा में व्यंग्य हंसने - हंसाने या बहुत हुआ तो तंज करने की ही चीज रहा है। पर व्यंग्य भी तो एक प्रतिरोध है। इस प्रतिरोधी व्यंग्य में आफस्पा यहां चुत्सफा हो चुका है! प्रचलित शब्दावली में कहें तो चुत्सफा असल में व्यवस्था का अपने नागरिकों के साथ किया गया केएलपीडी है। आस्फपा में जितनी अमानवीय जरूरता है चुफत्सा में उतना ही कहीं का ना छोड़ने वाला स्खलन। कश्मिरियों के साथ हर कदम पर उस बच्चे की तरह चुत्सफा किया जा रहा है जिसे कहा गया था कि उसके गान में गाना सुनाया जाएगा और जब उसने अपना कान बढ़ाया तो उसका कान ही काट लिया गया!
फिल्म ने कश्मीरी जीवन की सभी प्रमुख विसंगतियों को उसकी पूरी मार्मिकता के साथ पकड़ने की कोशिश की है। तलाशियों के दृश्य दिखाते हैं कि किस कदर कश्मीरी लोग अपने पहचान पत्र को अपने शरीर के अनिवार्य अंग की तरह अपने से लगाए रखते हैं। हाथ - पैर - आंख जैसे शरीर के अंग ना हो तो कश्मीरियों का जीवन चल सकता है आईकार्ड ना हो तो चार कदम भी नहीं चल सकता।
निरूपा राय जैसी मांओं के आदी भारतीय पट्टी के लिए गजाला के रूप में तब्बू नए किस्म की मां है। जिसमें इच्छा है वासना है साथ ही स्नेह और वात्सल्य भी है। अपने पति डॉक्टर साहब से एक निर्लिप्त किस्म की प्यार, शिकायत और दूरी है और अपने देवर की वासना को प्रेम समझने का तरूणियों या किशोरियों वाला भटकाव भी। वह इस बाहरी अदालत में अपने लिए रहम नहीं, बस अपनी नजर से चीजों को एक बार देखने की मिन्नत ही करती है। वह जानती है कि विलन वही होगी चाहे वह इस तरफ  रहे या उस तरफ। पर उसमें प्यार और वात्सल्य से ज्यादा पश्चाताप है। फिल्म के अंत में जिसकी आग में जलकर वह खाक हो जाती है। पर क्या वह सिर्फ  इसलिए खाक हुई कि उसे बुरी नहीं, अच्छी औरत के रूप में याद किया जाए ? फिर से वही बात एक बार फिर कि सवाल का जवाब भी दरअसल एक सवाल ही है। फिल्म की दूसरी नायिका किरदार आशी अपने बुने गए सुर्ख लाल मफलर जो उसके ख्वाब बुनने का प्रतीक है, उससे जकड़कर अपनी मौत को गले लगा लेती है। जाहिर है पुरूषों के इस आपसी रंजिश, तीनतिकड़म और गुणा गणित में सबसे पहले औरतों की जिंदगी ही होम होती है।
अब लोग कलाकार को पक्षकार नहीं मानते,चीजों के प्रस्तोता भर में रिड्यूस कर देते हैं। विशाल याद दिलाते हैं एक फिल्मकार का अपना पक्ष होना जरूरी है। फिल्म के अलग - अलग फ्रेम फिल्मकार के अलग - अलग पक्षों की कहानी बयां करते हैं। कुछ लोग गलत कहते हुए इसे संतुलन की कवायद का नाम दे देते हैं।
इस फिल्म से पहले तक व्यापक जनता यह मानती थी कि कश्मीर जमीन का एक टुकड़ा है जिसे हमेशा हिंदुस्तानी मानचित्र के सीखचे में होना चाहिए। कश्मीरी उस पर रह सकते हैं सिर्फ  रह सकते हैं। कब्जा कैसे कर लेंगे ? उस बारे में कोई फैसला लेने का उनका कोई हक नहीं बनता। गोया कश्मीर हमारा मकान हो और कश्मीरी महज किरायेदार। फिल्म को देखने के बाद संवेदनशील जन महसूस करेंगे कश्मीर जमीन का महज एक टुकड़ा नहीं है। उस पर जिंदा लोग रहते हैं। उन लोगों कें अपने दुखदर्द हैं। जिसे इस या उस तरफ  की सत्ता - व्यवस्था ने अपने हित में और गाढ़ा किया है उसे आंच ही दी है। उस पर मरहम नहीं लगाया। इंतकाम से इंतकाम को भड़काया। नतीजा यह हुआ कश्मीर में जितनी बस्तियां वीरान हुई हैं  उससे कहीं ज्यादा कब्रिस्तान आबाद हुआ है। ऐसे में फिल्म का क्लाईमेक्स का कब्रिस्तान में घटित होना हैदर की सहज परिणति थी ना कि फिल्मकार के ड्रामा को क्रिऐट करने का दबाव।
फिल्म देखते हुए बाज दफा कश्मीर के मसले पर बनीए शेक्सपीयर के हैमलेट की तरह ही लंबी संजय काक की जश्ने आजादी नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म की सहसा याद आती है। हैदर को भी अर्काइब के शॉटों से कई जगह प्रमाणिक बनाया गया है। पर अगले ही पल विशाल अपने दर्शकों की अंगुली पकड़ कर उन्हें कश्मीर से निकालकर अपने पात्रों के दुख, दर्द और द्वंद्व में शरीक कर लेते हैं। फिल्म में एक कोई किरदार, एक कोई दृश्य यहां तक कि एक कोई शॉट गैरजरूरी नहीं है। फिल्म में यूज हुई प्रापर्टी तक सिर्फ  खाली जगहों को भरने के लिए व्यवहार में नहीं लाई गई हैं वे अपने साथ गहरे अर्थ भी रखती हैं। फिल्म की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि वह जटिल चीजों के सरलीकरण के लोकप्रियतावाद में नहीं पड़ती है। यह जटिल यथार्थ का जटिल बयान है इसलिए तह के करीब है। हैदर के एकालाप नुमा लंबे संवाद भी तो वैसे ही हैं। गालिब के बक रहा हूं जुनूं में क्या कुछ, कुछ ना समझे खुदा करे कोई की मानिंद। वैसे भी ऐसी फिल्में जुनूं और साहस से ही पर्दे पर उतरती है।
विशाल फिल्म के निर्देशक होने के साथ जानेमाने कश्मीरी पत्रकार बशारत पीर के साथ फिल्म के पटकथाकार हैं। संवाद लेखक हैं। साथ ही संगीतकार भी हैं। पर उनका संगीत शब्दों और भावनाओं के बीच में नहीं आता है। इसलिए वह शोर नहीं लगता। यहां कब्र खोदते कुदाल शब्दों से ताल मिलाते हैं। चलन के खिलाफ  मगर फिल्म के साथ चलते इस संगीत को अनसुना करना संगीत प्रेमियों का अपना नुकसान कराना ही है।
निवेदन पॉपकार्न खाने के साथ सिनेमा देखने वाले, पापकॉर्न खाने की तरह सिनेमा देखने वाले, अपने व्हाटसएप और फेसबुक के मैसेज को तुरंत जवाब देना जरूरी समझने वाले, अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ किनारे की सीट तलाशेने वाले युगल या नवजात बच्चों के साथ आउटिंग करने की तरह सिनेमा देखने वाले इस फिल्म को थियेटर में ना देखें। ऐसा करके वे फिल्म के कलेक्शन में रत्ती भर का असर जरूर डालेंगे पर सिनेमा को पाठ की तरह, हमारे वक्त के हलफ  की तरह पढ़ने वाले दर्शकों पर बड़ा एहसान करेंगे।
उमाशंकर लेखक हैं कहानी और फिल्मों की पटकथा लिखते हैं। इनसे संपर्क कर सकते हैं।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

हिन्दी फिल्मों के आइनें में नक्सलवाद


  • डॉ. पूनम रानी
  • असिस्‍टेंट प्रोफेसर, महारानी लक्ष्‍मीबाई, महाविद्यालय

नक्सलवाद के  जन्मदाता के तौर पर चारु मजूमदार और कानू सान्याल का नाम लिया जाता है। 1967 के पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव में जन्मा ये आंदोलन आज देशव्यापी शक्ल ले चुका है। नक्सलबाड़ी से निकला यह आंदोलन आज देश के 14 राज्यों के 2500 से अधिक थाना क्षेत्रों में फैल चुका है। देश के 626 जिलों में से 231 जिलों में इसकी पहुंच है। 2 लाख सशस्त्र लड़ाको और समर्थक इस आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा सहज ही करा देते हैं। साथ ही भारत के अनेक बुद्धिजीवियों के साथ दुनिया के बुद्धिजीवियों की सहानुभूति भी यह आंदोलन पाता है। हिन्दी के मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, धुमिल अपनी नई कविताओं में इस आंदोलन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं। हिन्दीतर में गोरखपांडे, पाश और महाश्वेता देवी का नाम लिया जा सकता है।
हिन्दी फिल्मों के बारे में प्रसिद्ध है कि विषय चाहे जो हो ट्रीटमेंट उद्योग तय करता है। नक्सलवाद पर बहुत सी फिल्में बनी पर कुछेक को छोड़कर बाकी को चालू मसालों से तैयार किया गया था। ख्वाजा अहमद अब्बास जो कि ' शहर और सपना ' और ' धरती के लाल ' जैसी जनपक्षधर फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, ने 1980 में ' नक्सलवादी ' फिल्म बनायी थी। फिल्म उद्योग में जनता से दुख दर्द से सचमुच संवेदना रखने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने 1980 के आसपास नक्सलवादी नाम से फिल्म बनाई, जो फिल्म चलाने के मसालों से दूर थी। इस फिल्म में बंगाल, आन्ध्रप्रदेश और केरल के 1967 - 71 तक नक्सली आंदोलन को केन्द्र में रखा था। मिथुन चक्रवर्ती , स्मिता पाटिल जैसे कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया था। फिल्म सत्ता की दमन दिखाते हुए नक्सलवाद की वजहों और कमजोरियों को भी दिखाती है। हालांकि चालू फार्मूलों के अभाव के चलते अच्छी फिल्म होने के बावजूद फिल्म चल नहीं पायी। सन् 2000 में आयी '' लाल सलाम '' '' प्रेम की चाशनी '' में पगी नक्सलवाद की परते उधेडऩे की कोशिश करती फिल्म है जो कि जनजातियों की संस्‍कृति  और परम्पराओं पर भी थोड़ी बहुत रोशनी डालती है। फिल्म कहीं न कहीं यह स्थापित करने की कोशिश करती है कि सरकारी दमन के अलावा अशिक्षा भी नक्सलवाद के कारणों में है। परन्तु नक्सलवाद पर उल्लेखनीय फिल्म नहीं कही जा सकती है। इसी बीच महाश्वेता देवी के उपन्यास पर निर्देशक गोविन्द निहलानी ने हजार चौरासी की माँ नाम से एक उल्लेखनीय फिल्म बनायी। इसकी कहानी एक साधारण महिला जो कि बैंक  कर्मचारी है, के इर्द - गिर्द घूमती है। सुजाता जया भादुड़ी का बेटा नक्सलियों के संग रहने के कारण मारा जाता है। उसकी लाश का नम्बर 1084 है और सुजाता बन जाती है 1084 की माँ।
सुधीर मिश्रा जो ' इस रात की सुबह नहीं ' और ' चमेली ' से सुर्खियों में आए / उनकी फिल्म इस रात की सुबह नहीं सार्त्र के नाटक '' नो एक्जि़ट ''  की याद दिलाती है। फिल्म की कहानी आपातकाल के समय को पुनर्जीवित करती है। कहानी तीन दोस्तों के इर्द - गिर्द घूमती है। तीनों की अपनी - अपनी ख्वाहिशें है। सिद्धार्थ के .के . मेनन क्रांति करना चाहता है। विक्रम हालांकि गांधीवादी पिता का पुत्र है पर गांधीवाद में कतई विश्वास नहीं करता है। गीता भी कुछ बड़ा करना चाहती है। कॉलेज से ये तीनों तीन दिशा में जाते हैं। सिद्धार्थ को क्रांति  बुला रही थी वह बिहार में नक्सली आंदोलन में सक्रिय हो जाता है। गीता ब्रिटेन में शिक्षा हेतु प्रवास कर जाती है। विक्रम दिल्ली में अपना धंधा चमकाने हेतु आफिस खोल लेता है। ख्वाहिशें कैसे दम तोड़ती है, आक्रोश की हवा कैसे निकलती है और उसके त्रासद अंत की कथा हजारों ख्वाहिशें ऐसी में देखा जा सकता है। सुधीर मिश्रा की '' हजारों ख्वाहिशें ऐसी '' के साथ एक दूसरी हालिया बहुचर्चित फिल्म '' चक्रव्‍यूह '' को साथ रखकर देखा जा सकता है। जिसे प्रकाश झा ने निर्देशित किया है। इसमें से पहली बीसवी सदी के सातवें दशक की  कहानी है तो दूसरी इक्‍कीसवीं  सदी के प्रथम दशक की ।
प्रकाश झा की '' चक्रव्‍यूह '' के अंत में वे वायज ओवर से आवाज उभरती है , '' कबीर और जुही की शहादत '' ने गोंविद और राजन के संघर्ष को और भी हवा दी। तेजी से बढ़ता नक्सलवाद देश के 200 जिलों में अपनी जड़ें जमा चुका है। हजारों हथियारबंद माओवादी गुरिल्ले अपने ही देश की सेना के साथ एक भयानक खूनी संघर्ष में लगे हुए हैं। एक भी दिन नहीं गुजरता जब भारत की धरती अपने ही बच्चों के खून से लाल न होती हो। इस चक्रव्‍यूह  से निकलने का रास्ता क्यों नहीं मिल रहा। आजादी के पैंसठ सालों में हमने तेजी से तरक्‍की तो की लेकिन उतनी ही तेजी से देश की एक बढ़ी आबादी दूर पीछे छूटती चली गई। चमकते भारत की सच्चाई ये है कि 25 प्रतिशत आमदनी पर बस कुछ 100 परिवारों का कब्जा है जबकि हमारी 75 प्रतिशत आबादी रोजाना 20 रुपये पर बसर करने को मजबूर हैं। इस अंतर से जन्मा अविश्वास और आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है और शायद वक्त हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। मगर समझ में यह नहीं आता, प्रकाश जिन 200 जिलों का जिक्र कर रहे हैं आखिर उनमें रहने वाले लोग फिल्म में कहाँ हैं। एक सीन में आदिवासी नज़र भी आते हैं तो प्रकाश ने उन्हें हास्यास्पद रुप से पोट्रेट किया है। इस दृश्य में पुलिसिया नायक को देख आदिवासी बेतहाशा भागने लगते हैं। लेकिन प्रकाश का नायक नए जमाने की रोशनी लिए है। वह एक घायल आदिवासी को पकड़ उसके जख्म पर ऐसे मलहम लगा रहा है जैसे वर्षों से जारी दमन पर मरहम लग रहा हो। प्रकाश ने पूरी फिल्म एक घटिया उपदेश की तरह बनायी है। वे ये क्यों मान लेते हैं कि सभी आदिवासी मूर्ख हैं। उन्हें भी विकास का वही माडल चाहिए जो सरकारों के पास है। वे दिखाते है आदिवासी दिल्ली और बंबई वाला विकास चाहते हैं, वे शहर आने के लिए मरे जा रहे हैं।
'' चक्रव्‍यूह '' की  कहानी बहुत ही साधारण किस्म की है। कहा यह गया था कि प्रकाश ने बहुत रिसर्च कर के यह फिल्म बनाई है। परन्तु आभास ऐसा होता है कि मीडिया रिर्पोटें पढ़कर प्रकाश ने काम चला लिया है। तकनीकी रुप से भी '' चक्रव्‍यूह '' एक कमजोर फिल्म कही जाएगी। संगीत पक्ष तो और भी खराब है। संवेदनशील मुद्दे को लेकर बनाई गई फिल्म में कुंडा खोल जैसे आईटम सांग की क्या जरुरत पड़ गई थी। क्या प्रकाश फिल्म की सफलता को लेकर पहले से ही आशंकित थे जैसे प्रश्‍न  स्वत: ही जेहन में आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त आदिवासियों को सिर्फ बीस तक गिनती जानना और उस पर कबीर को उनका मजाक उड़ाना इस बात की तरफ इशारा करता है कि नक्सली अपपढ़, अज्ञान हैं और बंदूक की नोक पर सत्ता को हथियाना चाहते हैं, बहुत ही सतही लगता है और अखरता है।
'' चक्रव्‍यूह '' का संघर्ष तो चलता जाता है लेकिन '' हजारों ख्वाहिशें '' को नायक संघर्ष की राह छोड़ विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी करने चला जाता है। नायिका को लिखे अपने अंतिम पत्र में लिखता है शायद मैं वापस आ जाउँ, बहुत संभव है वापस आकर यह आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व दूं। गीता गाँव में रहकर आदिवासियों की सेवा का बीड़ा उठाती है लेकिन अपने पुत्र को विदेश पढऩे भेज देती है। हजारों ख्वाहिशें ऐसी में बाहर से आए लोग गाँव वालों के लिए लड़ रहे हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी को यह फिल्म रेखांकित नहीं करती है। बावजूद '' हजारों ख्वाहिशे ऐसी '' '' चक्रव्‍यूह '' से अधिक यथार्थ पूर्ण ढंग से विषय को रुपांरित करती है। नक्सलवाद पर अच्छी मुख्यधारा की फिल्म का आना अभी बाकी है। अभी तक जो फिल्में आई हैं उनमें कुछेक को छोड़कर ज्यादातर झण्डू ब्राण्ड ही कही जा सकती हैं।
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