इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

तरी हरि नाना मोर तरी हरि नाना वो सजगे मरार कुंवा बाढ़ी ।

गणेश्वर पटेल 
 
हमर छत्तीसगढ़ म पहिली गांव के सुचारू रूप ले संचालन बर बुता काम ल जातिगत विषेश रूप म बांटे गे रिहिसे। जईसे तेली मन के बुता तेल पेरई, कुम्हार मन के माटी के जीनिस बनई, कोस्टा मन के बुता कपड़ा बुनई के, अउ वइसने लोहार मन के बुता लोहा के बुता राहय। नऊ समाज के मन के दाढ़ी, बाल बनई के बुता राहय। वइसने सामाजिक बेवस्था म हमर मरार समाज के भाग म साग भाजी उगाए के अउ बेचे के अइसे। हमर मरार समाज के भाग म अड़बड़ मेहनत अउ अड़बड़ महत्वपूर्ण वाले बुता साग भाजी उगा के समाज म परोसे के सुघ्घर सौभाग्य प्राप्त होईस। आज भी हमर मरार समाज के प्रमुख बेवसाय बखरिच बाढ़ी के बुता ह हावय, आज भी हमर मरार समाज ह सल्लग अपन कर्तव्य के निर्वहन करत हे।
सुवा गीत हमर छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकगित मन म एक आए। छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य, सुवा नृत्य:-
थोरकुन जानकारी:-
सुवा गीत ह हमर राज्य के गोंड जाति के माईलोगन मन के नृत्य आए। आज सबो जाति के कन्या मन अउ महिला मन ए नृत्य ल करथे। एहा देवारी के परब म माईलोगन मन के द्वारा गाए जाने वाला गीत है। 
कईसे नाचथें सुवा नृत्य ल आवव जानन:-
धान लुवई के बेरा म ए लोकगीत ल अड़बड़ उत्साह के संग म गाए जाथे। एमा शि्व पार्वती के(गउरा गउरी) के बिहाव तको मनाये जाथे। माटी के गउरा गऊरि बनाके एकर चारों मुड़ा म घुमके सुवा गीत गाके नाचे के परम्परा हे।कुछ कुछ जगा म माटी के सुवा बनाके ए गीत ल गाए जाथे।
कब चालू होथे ए गीत ह आवव जानन:-
सुवा गीत ह देवारी के कुछ दिन पहिली चालू होथे अऊ देवारी के दिन ईसर गउरी गऊरा के बिहाव के संगे संग समाप्त हो जाथे। पुराना जमाना ले गाए जाने वाला ए गीत मउखिक हे। सुवा गीत म स्त्री मन बाँस के टुकनी म भरे धान के ऊपर म सुवा के प्रतिमा ल रख देथे।अउ एकर चारों डाहन गोल भाँवर होके नाचथे अउ गाथे। बाँस ले बने टुकनी ल जेन म धान अउ सुवा ल रखे रहिथे, ओला बोहइया ल सुग्गी केहे जाथे।
पारम्परिक सुवा गीत म अधिकतर मरार घर के कुँवा बाढ़ी के जिक्र होथे। पहिली के जमाना म सबो मरार घर के बखरी के सिंचई बर प्रमुख रूप से पारंपरिक साधन कूँवा अउ टेरा राहय। फेर आधुनिक्ता के जुग म ए साधन मन सल्लग नंदावत गिस हे। अभी स्थिति ए होगे हे कि ए पारम्परिक साधन मन ह संग्राहले म संग्रहित मात्र के वस्तु बनगे हावय। छत्तीसगढ़ी लोकगाइका कविता वाशनिक जी ह सुघ्घर अइसने सुवा गीत गाहे जेमा मरार घर के कुवां बाढ़ी के जिक्र हे।
तरी हरि नाना मोर तरी हरि नाना वो सजगे मरार कुंवा बाढ़ी । 
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।
सुवा गीत देवारी तिहार के बेरा म गाए वाला गीत हरय, अउ देवारी तिहार आते ही जुड़ मउसम चालू हो जाथे। अउ इही मउसम में ही मरार बाढ़ी ले रंग रंग के साग भाजी निकलथे। उही ल ए सुवा गीत म काहत हे- तरी हरि नाना मोर तरी हरि नाना वो सजगे मरार कुंवा बाढ़ी । 
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।
त का का साग ए मरार कुंवा बाढ़ी म निकलथे तेकर सुघ्घर वरनन ए सुघ्घर सुवा गीत के माध्यम ले लाईन वार जानबोन। 
कुंदरू साग अउ करेला- 
कुंदरू करेला नार बियार वाले साग हरय, त ए साग बर ढेखरा गढ़ियाय बर लागथे । कुंदरू करेला के सुघ्घर वरनन ए सुवा गीत म देखेंब मिलथे।
ढेखरा म झुलत कुंदरू ल देखय त करू करेला बिजरावय।

धनिया, बंगाला अउ मिर्चा -
ए सबो जिनिस ह साग मन के प्रमुख सहायक सब्जी आए एकर बिना साग रांधे के कल्पना हम छत्तीसगढ़ीया मन कर ही नई सकन। बंगाला ह अइसे फरे रहिथे भिंया म जईसे भुंईया म जठना जठाए हे। धनिया के सुगंध जबदस्ती सुघ्घर रहिथे अउ धुरीहा के एकर सुगंध आ जाथे।
मिर्चा ले तीरे तीर बपूरी बंगाला ह भुंईया म जाठना जठावय।
ममहावय वो दीदी मोर धुरिहा ले धनिया ह भारी।
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।।
गोभी, बंधी भाजी, गाजर, मुरई, पालक,चौलई, लालि भाजी , दोड़का, तोरई :-
ए सुवा गीत म सुघ्घर गोभि साग ल राजा के दर्जा दे हावय। दरबारी कस बंधि भाजी ल माने गे हावय। सेना कस मांदा म मुरई, अउ गाजर , पालक, चौलई, अउ लालि भाजी हावय जेन ह एकर सेना कस रक्छा करत हावय। अउ डोड़का तोरई ह तको झुल झुल के बाढ़ी के रखवारी करत ए सुघ्घर लोकगित म बताये गे हावय।
राजा बरोबर फूल गोभीं दिखय , अउ दरबारी कस बंधी भाजी।
सेना कस मांदा म गाजर मुरई खड़े ठाड़े, पालक, चौलाई लाली भाजी।।
झुल झुल झुलना करे दीदी डोड़का तोरई रखवारी।
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।।
कुम्हडा, रखिया, करोंदा, निमऊ, रमकलिया साग -
ए गीत म सुघ्घर बताये गे हावय कि कुम्हडा अउ रखिया के नार ल मुसवा मन ले बचाए बर छानही म चईघा दिये जाथे, इही ल इंहा दूनों ल आसन जमाए हे कहिके दरसाए हे। खट्टा वाले जिनिस निमऊ करोंदा अउ कुम्हडा के सुघ्घर संगवारी रमकलिया साग ल माने गे हावय।

कुम्हडा अउ रखिया मन छानही म बइठे हे सुघ्घर आसन जमाए।
अम्मठ करोंदा ल निमऊ ल देखे त मुछ मूछ बड़ मुस्काए।।
रमकलिया ह दीदी मोर बने इंकर संगवारी।
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।।
तरी हरि नाना मोर तरी हरि नाना वो सजगे मरार कुंवा बाढ़ी । 
कुंवा बाढ़ी म आगे दीदी किसम किसम के तरकारी।।
ग्राम पोटियाड़िह 
जिला धमतरी(छ ग).

साड़हा देव, मातर जगार अउ यादव

मदन मंडावी
 
        हमर छत्तीसगढ के गवईहाँ संसकिरती मा यदुवंशीय, यादव, ठेठवार, पहाटिया, अहिर, राऊत समुदाय के गाँव बेवस्था मा ऊँचहा इसथान हे। किसान, ठाकुर के दमदार, गऊ रक्छक साथी नम्बर वन राऊत होथे। जेन  सुभाव ले सिधवा, मिलनसार, गाँव बिधान के झंडा ल अपन हाथ मा थामके गाँव के संसकिरति ल बारो महीना आगु बढ़ाथे।
     गाँव बस्ती के गौठान म  बिराजे साड़हा देव ला किसान मन राऊत ल हरेली अउ देवारी (गोबरधन) के दिन सेवा अरजी करे बर पोगरी सऊँप देथें। गाँव के साड़हा देव भगवान के असली पुजारी राऊत मन होथे, जेन दूध - दही कंद- मूल, फर के भोग लगाथे।
  फेर अहू मा एकठन बिस्कुटक देखे जावत हे, अइसे काकर बुध ला मानके साड़हा देव ल तिरियाके दुसर देव ला खड़े करे जावत हे , बिचार करे के बात हे। एमन पहिली भटकगे रिहीन या अब भटकत हे..? एके जगा एके बिधान के दूठक देवता कइसे...?
मातर प्रथा, परम्परा_  मा = पालक, माता। तर = तरना, पार होना। अपन पालक के करजा ले मुकती पाना, सुखी होए के कामना करना। मातर परम्परा के अगुवा राऊत मन आय, किसान ए परम्परा के बिकास म भरपुर सहियोग करथें। समाज मा दू बिधान रइथे एक भितरौंधी, दुसर बाहिरी। जइसे घर भीतर कुल देव, पीढ़ी पूजा होथे अउ जंवारा जग जाहिर।  मातर देवारी के बादेच होथे। मातर के तइयारी राऊत, पहाटिया मन करथे। मातर संकल्पित होथे _हर साल, तीन सला, या जब जब कुल देवी देवता सताही तब। बिना राऊत ,पहाटिया के गाँव मा मातर नइ मनावय ।
      ए दिन चरवाहा समुदाय अपन कुल देवी - देवता मनके पूजा करथे। अपन देवी - देवता के आगू मा गोरइया चघथे। सब अपन देवता के आगू मा झुपथे _जवारा मा देवता चघथे। ईसर -गौरा मा डड़ईय्या, कोठा म गोरईया, राऊत कांसा चढ़के दोहा पारथे।
मातर परब_ एला मनाए के पहिली पहाटिया गाँव के ठाकुर मनला सूचित कर देय जाथे। 
      गौठान मा खैर रुख के "फुड़हर " देवता (लोकदेव, वनरक्षक) ला सुग्घर सजाके परतिक सवरूप रखथें। तिहाँ लइका- सियान मिलके सेवा, अरजी- बिनती करथें । पशुधन गाय - बइल के पूजा करथे। बिहिनिया ले रऊताईन मन गौठान पहुचके तइयारी करथें। बरदी के बीच कुम्हड़ा ल ढुलोके गाय के गोड़ मा फोरवाथे। तहाँ ले महिलामन इही ला सब्जी बनाथे। संगमा खीर,भात, साग तको बनाथें।  गाँव भरके सकलाये मनखें मनला इही ला बाद मा परसाद सवरुप बाँटथे।
       दरसक मनके बीच म पुरुषमन _रंगीन कपड़ा पहिरे, मोर पंख, कउड़ी पहिने, तेंदु लउठी धरके पारम्परिक दोहा पारके दफड़ा, गुदुम, टीमकी, मोहरी के धुन मा बिधुन होके नाँचथें। कुछ मन अजीब- अजीब अखाड़ा तको देखाथे।
     ये मातर तिहार मा गउ पालक यादव मनके कहीं ना कहीं गाँव व पशु सुरक्छा के संगे- संग घर परिवार, समाज उन्नति के मंगल कामना समाए हे। एमा सार बात कहे जाए ता समरसता, आपसी भाईचारा, लोक संसकिरती सामाजिक एकता के भाव झलकथे।


------  ढारा, डोंगरगढ़,राजनांदगांव

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

जहॉं होती है सबकी मनोकामना पूर्ण


सुरेश सर्वेद

 
या देवी सर्वेभूतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता:।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:॥
उपर मंदिर में विराजमान मॉ भवानी
       छत्तीसगढ़ के पावन धार्मिक स्थलों में एक  नाम आता है डोंगरगढ़  जी हां, मां बम्लेश्वरी की पावन धरती डोंगरगढ़ से मात्र 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ग्राम करेला। यहां स्थित डोंगरी को भवानी डोंगरी के नाम से जाना जाता है। बीट क्रमांक 321 जो कि 380 हेक्टेयर में फैला है। इस पहाड़ी पर प्राकृतिक  छटा के मध्य विराजमान है मां भवानी। यहां से लगा है ग्राम बन्दबोड़, यहां जंगल में स्थापित है बाबा बन्छोर देव। यहां स्थापित बन्छोर देव की प्रतिमाएं पन्द्रहवीं - सोलहवीं ईसा पूर्व की बताई जाती है।
नीचे मंदिर में विराजमान मॉ भवानी
बनबोड़ के जंगल में विराजमान बाबा बन्‍छोर देव
इन धार्मिक स्थलों की ओर जाने के पूर्व पहुंचना पड़ता है ढारा - मोहारा चौक , जो ठेलकाडीह से होते हुए जिला मुख्यालय राजनांदगांव से जोड़ता है। दक्षिण से आने वाले मार्ग में मां बम्लेश्वरी की पावन धरा डोंगरगढ़ को जोड़ता है। जबकि उत्तर से आने वाले मार्ग खैरागढ़ को जोड़ता है। मां दन्तेश्वरी चौक से ही देखने मिलती है पुरातातात्विक महत्व के पाषाण पर अंकित कलाकृतियॉ । जहां पूर्व की सड़क से निकलते वक्त एक विशालकाय पीपल वृक्ष के तले दाहिने ओर पुरातात्विक महत्व की कलाकृतियाँ मिलती है, वहीं दक्षिण की ओर निकलने पर दाहिने की ही ओर पुरातात्विक महत्व की कलाकृतियाँ मिलती हैं। यहां पर मां भवानी मंदिर पहुंच मार्ग को चिन्हाकिन्‍त करने बोर्ड लगाया गया है।
मां दंतेश्वरी चौक से उत्तर की ओर पक्की सड़क से आगे बढऩा पड़ता है। लगभग एक किलोमीटर का रास्ता तय करते ही पुन: मार्ग विभाजक मिलता है। यहां पर से ही पश्चिम की दिशा की ओर प्राकृतिक छटा दिखना शुरू हो जाता है। मार्ग विभाजक से जहां एक मार्ग उत्तर दिशा की ओर जाता है वहीं दूसरे मार्ग पूर्व दिशा की ओर जाता है। हालांकि दोनों मार्ग खैरागढ़ को जोड़ता है यहां से मां भवानी, बाबा बन्छोर देव एवं मां विन्धयवासिनी के दर्शनार्थ भक्तजनों को उत्तर दिशा की मार्ग पर चलना पड़ेगा। इस तिराहे से ही प्राकृतिक छटा दिखाई देने लगता है। इस मार्ग से गुजरते हुए पश्चिम दिशा की ओर पड़ी दिखाई देती है खेती की जमीन और आच्छादित वन। यहां की प्राकृतिक  छटा मन को लुभाने लगता है। जल्द से जल्द उस प्राकृतिक छटा के नजदीक पहुंचने की लालसा बढ़ जाती है। यह मार्ग भी पक्की ही है। इस डामरीकृत मार्ग से होते हुए लगभग दो किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद फिर एक तिराहे मिलेगा। इसे करेला चौक नाम से जाना जाता है। यहां पर दो करेला गांव है। पूर्व दिशा में स्थित गांव को नया करेला कहा जाता है जबकि पश्चिम दिशा में स्थित गांव को पुराना करेला के नाम से जाना जाता है। यानि मां भवानी का पावन तीर्थ स्थल। इस मार्ग में प्रवेश कच्ची मार्ग से करना  पड़ता है। आज भी इस क्षेत्र की महिलाएं जंगलों से लकडिय़ां बीन कर लाती है। उसकी आग से भोजन बनता है। इस मार्ग से सिर पर लकडिय़ों की गठ्ठर उठाए आती महिलाएं दिख ही जायेंगी। लगभग एक  फर्लांग बाद ही शुरू हो जाता है पुराना करेला। यहां एकाध मकान को छोड़ दे तो शेष मकान कच्ची और कवेलू के ही नजर आते हैं। मकानों के आंगन बांसों को घेरा से सुरक्षित दिखाई देगी। इन मकानों को पीछे छोड़ते ही दिखाई देने लगती है हरियाली से आच्छादित वन और दूर दूर तक खाली पड़ी जमीन। जैसे ही वन ही निचले भाग में पहुंचे कि नीचे स्थित मां भवानी मंदिर  के गगनचुंबी गुंबद और लहराते ध्वजा अपनी ओर खींचती है, मंदिर घंटी घंटी की गूंज से किसी  धार्मिक स्थल पर होने की अनुभूति होने लगती है।
       मां भवानी मंदिर के सामने बनाया गया है हवनकुण्ड। यहां क्वांर एवं चैत्रनवरात्रि पर्व पर ज्योति विर्सजन पूर्व किया जाता है हवन कार्यक्रम । नीचे स्थित मां भवानी के दर्शन बाद उत्तर दिशा में कुछ ही कदम की दूरी पर चलना पड़ता है फिर मुडऩा पड़ता है पश्चिम की ओर। जैसे ही ऊपर पहाड़ी पर विराजमान मां भवानी के दर्शनार्थ कदम बढ़ते हैं तो सामने मिलता है प्रवेश द्वार। इस प्रवेश द्वार को वृक्ष का रूप दिया गया है। थोड़ी दूर मिलती है समतल भूमि। जैसे ही सीढ़ी शुरू होती है इसके पहले दाहिने ओर मिलती है एक बोरिंग जहां प्यास बुझा भक्तगण बढ़ते चलते हैं आगे की ओर। अभी पहाड़ी वाली मां भवानी के प्रागंण तक पहुंचने के लिए सीढ़ी का निर्माण कार्य जारी है। कुछ सीढिय़ां लांघने के बाद शुरू हो जाता है पथरीला राह। वन की चढ़ाई और पथरीला राह को भक्तगण बिसर जाते हैं अपने आजू - बाजू के वनों की हरियाली को देखकर।
       पथरीला राहों को पीछे छोड़ते हुए भक्तगण पहुंच जाते हैं उस स्थल पर जहां की प्राकृतिक  छटा के दर्शन की ललक को वह संवार नहीं पाता। पहाड़ की इस समतल क्षेत्र पर खड़ा होकर निहारने से दूर - दूर तक दिखाई देने लगते हैं घने जंगल। इस अनुपत दृश्य को देखकर एक पल तो लगता है कि कहीं सतपुड़े के घने जंगल में तो नहीं पहुंच गये। इस स्थल पर खड़े होकर देखने से जहां पश्चिम की ओर दिखाई देता है ओडार बांध वहीं दक्षिण दिशा की ओर डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजमान मां बम्लेश्वरी की मंदिर। यहां से डंगोरा, खैरबना जलाशय एवं शिवपुरी तालाब को भी आसानी से देखा जा सकता है।
      भक्तगणों के कदम आगे बढ़ते हैं। थोड़ी सी ही चढ़ाई बाद पहुंच जाते हैं मां भवानी के दरबार में। जिस मंदिर में भवानी विराजमान है, उससे कुछ ही दूरी पर एक वृक्ष के नीचे चौड़ी पर मिट्टी का बनाया गया है नादिया बैल। यहां पर हाथी और हूम धूप का खप्पर रखा गया है। यहां पर बजरंगबली की मूर्ति स्थापित है जिसके बाद में एक गदा रखा गया है। उसके ठीक सामने तुलसी चौरा है। मां भवानी की  तस्वीर के सामने मां की सवारी है। मां भवानी मंदिर के भीतर दीप प्रज्जवलित की गई है जो अनवरत जलती रहती है। मां भवानी मंदिर के ठीक बाजू अर्थात् उत्तर दिशा में ज्योति कक्ष बनाया गया है। यहां प्रतिवर्ष भक्तों द्वारा क्वांर एवं चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर मनोकामना दीप प्रज्जवलित की जाती है। मंदिर की दक्षिण दिशा में मां की झूला है। इसके ठीक पीछे त्रिशूल, बाना, तराजू खंजर और माताजी के नील लगे चरण पादुका रखा गया है।
     मां भवानी के आगमन के संबंध में बताया जाता है कि आज से लगभग दो ढाई सौ वर्ष पूर्व स्वर्गीय श्री नारायण सिंह कंवर जो कि मालगुजार थे ओसारे में कुछ ग्रामीणों के साथ बैठे हुए  थे। जेठ - बैसाख का माह था। भरी दुपहरी में जलजलाती हुई सर्वांग में बड़ी माता लिए एक तरूण अवस्था की कन्या आयी। चेहरे तेज, उन्नत ललाट, श्वेत वस्त्र धारण किये उस कन्या ने मालगुजार स्व. श्री नारायण सिंह कंवर से अपने विश्राम के लिए जगह मांगी। श्री कंवर ने उससे अपने घर में ही रहने का आग्रह कर फिर से ग्रामीणों से बातचीत करने व्यस्त हो गये मगर जैसे ही उनका ध्यान ग्रामीणों से बंटा और ध्यान आया कि कोई कन्या आयी थी तथा ठहरने के लिए जगह मांगी थी वह दिखाई नहीं दे रही है। वे हड़बड़ा गये। तब तक वह कन्या वन का रास्ता पकड़ ली थी। स्वर्गीय नारायण सिंह कंवर उस कन्या के पीछे दौड़े साथ ही ग्रामीण भी। जब तक वे उस तक पहुंचते तब तक वह कन्या ऊपर पहाड़ी पर पहुंचकर बांस भीरा और एक चिरपोटी के नीचे छांव पर जा बैठी थी। श्री कंवर ने हाथ जोड़कर कहा कि माता मैंने तो आपको अपने घर में ठहरने कहा था, आप तो यहां आ गयी। चलिए मेरे निवास में... तब माता ने कहा - मेरे लिए यही जगह उपयुक्त है। मुझे यही रहना है। मां भवानी की बात सुनकर स्वर्गीय नारायण सिंह कंवर ने ग्रामीणों को वहां कुटिया बनाने कहा। ग्रामीण कुटिया बनाने लकड़ी की व्यवस्था कर ही रहे थे कि वह कन्या वहीं पर लुप्त हो गयी।
      बताया जाता है कि मां भवानी सर्वमंगलकारी है। उनकी कृपा से कई लोगों की दरिद्रता दूर हुई है। कष्टों से कई लोगों ने मुक्ति पाई है। नीचे मां भवानी मंदिर समतल भूमि में स्थित है। मां भवानी और बाबा बन्छोर देव की पावन धरा बन्दबोड़ के मध्य बना है एक जलाशय। इस जलाशय को भंडारपुर जलाशय के नाम से जाना जाता है। यहां की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। इस प्राकृतिक छटा को निहारते हुए भक्तगण पहुंचते है ग्राम बन्दबोड़ और फिर शुरू हो जाता है बाबा बन्छोर देव के दर्शनार्थ पहुंचने पथरीला रास्ता। यहां मोकइया वृक्ष के तले घोड़े पर बाबा बन्छोर देव सवार है। यहां दर्जनों की संख्या में पुरातात्विक महत्व की कलाकृतियाँ बाउण्ड्रीवाल की दीवार से संटा कर  रखी गई है।  किंवदंती है कि एक समय छैमासी रात पड़ी थी। इस छैमासी रात में बन्छोर देव घोड़े पर सवार होकर दल - बल समेत बरात जा रहे थे। संभवत: वह रात छैमासी की आखिरी रात थी। बाबा बन्छोर देव दल बल सहित बनबोड़ के वन से गुजर रहे थे कि सुबह हो गई और वे मूर्तिरूप में परिवर्तित हो गए।  यह भी कहा जाता है कि ग्राम बन्दबोड़ के लोग मूर्तिकला में पारंगत थे। वे खाली समय में मनोरंजन की दृष्टि से वन में जाकर पत्थरों में मूर्ति कुरेदा करते थे। आज भी बन्दबोड़ में कुंभकारों का एक पारा है। यहां के मूर्तिकारों की ख्याति न सिर्फ गांव तक सीमित है, अपितु इनके द्वारा बनाये मूर्तियों की मांग जिला मुख्यालय तक है, इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां आदिकाल से मूर्तिकला जीवित है। बन्छोर देव तक पहुंचने के पूर्व रावण भाठा पड़ता है, जहां प्रत्येक वर्ष दशहरा पर्व मनाया जाता है यहां संक्षिप्त रामलीला के बाद रावण वध क‍िया जाता है।

सोमवार, 15 सितंबर 2025

मुक्तिबोध: काल उन्हें लील रहा था और उनका साहित्य कालजयी हो रहा था

अशोक वाजपेयी 

मुक्तिबोध की, 47 वर्ष की अल्पायु पूरा होने के पहले, दिल्ली में 11 सितंबर 1964 को मृत्यु हुई थी. उससे पहले वे महीनों अस्पताल में अचेत थे और सिर्फ़ अपनी मां को कभी-कभी पुकारते थे, अपनी तन्द्रा में एकाध सेकेंड की मुहलत मिलने पर. यह कहना भी मुश्किल है कि उन्हें अपने जीवन के समाप्त होने का कोई बोध, पल भर के लिए सही, हुआ होगा.
उनकी सभी कविताएं, एक तरह से, अपने विषय-वस्तु और उसकी असह्य जटिलता के कारण, उनके बीहड़ अदम्य शिल्प के कारण, अधूरी रहने को अभिशप्त थीं. उनका जीवन भी अधूरा ही रहा आया. पर इस अधूरेपन में भी कितना सारा जीवन, उसकी जटिलता, अपना समय और उसके विकराल विद्रूप को वे कविता में सहेज पाए, यह हिंदी साहित्य के स्थायी आश्चर्यों में से एक है.
यह बेहद दुखद संयोग की बात है कि उस समय मेरी आयु 23 बरस की थी और वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें मैंने, अपनी आंखों से, मरते हुए, अपने जीवन में देखा. उनके अवसान के कुछ मिनट पहले, उनके सिरहाने, कृष्णा सोबती द्वारा भेजे फूल, मैंने रखे थे. उनका शरीर धीरे-धीरे शांत हुआ. तब कौन जानता था कि उनकी कविता तभी, शायद तभी, अनश्वर जीवन में बेचैन और बीहड़, प्रश्नवाचक और उद्विग्न, उठ, जाग और सजीव हो रही थी. काल उन्हें लील रहा था और उनका साहित्य कालजयी हो रहा था.
भारतीय राजनीतिक थ्योरी
 पश्चिमी राजनीतिक थ्योरी की ऐसी व्याप्ति है कि अक्सर हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता कि अन्यत्र भी राजनीतिक थ्योरी, किसी न किसी रूप में, विन्यस्त और विकसित हुई है और किसी थ्योरी विशेष को सार्वभौम मानने की कोई बौद्धिक या नैतिक बाध्यता नहीं है. हरेक थ्योरी उस अंचल विशेष के अपने ऐतिहासिक और राजनीतिक अनुभवों, विशिष्ट परिस्थिति और स्थानीयता से विकसित हुई है और उनमें से हरेक में ऐसे तत्व, अवधारणाएं और विधियां हैं जो अन्यत्र भी लागू होते हैं और ऐसे भी जो वे अन्यत्र से लेकर उपयोगी पाती है.
ज्ञान की सार्वभौमिकता पर किसी अंचल का एकाधिकार नहीं होता, न होना चाहिए. दूसरी ओर, यह भी सही है कि पश्चिम ने अपने साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक वर्चस्व के चलते यह धारणा बहुत व्यापक कर दी कि पश्चिमी सिद्धांत और ज्ञान तो सार्वभौम है; बाक़ी सिद्धांत और ज्ञान, अगर वे संयोग से हैं, क्षेत्रीय या आंचलिक. इस निराधार धारणा का प्रश्नांकन और प्रत्याख्यान होना, सौभाग्य से, शुरू हुआ और ज्ञान और सिद्धांत की बहुलता का बौद्धिक और सांस्कृतिक एहतराम होना भी.
हाल ही में दिल्ली में एसोसिएशन फॉर क्रिएटिव थ्योरी द्वारा रज़ा फ़ाउण्डेशन और अन्य के सहयोग से आयोजित ‘भारतीय राजनीतिक थ्योरी: पॉसिबिलिटीज़ एंड चैलेन्जेज़’ इस सिलसिले में एक गंभीर सामयिक उद्यम के रूप में देखा जाना चाहिए.
यह दिलचस्प है कि अभी कुछ समय पहले तक साहित्य में आलोचनात्मक विमर्श में थ्योरी का अनूठा आतंक हो गया था. थ्योरी इतनी स्वतंत्र और स्वायत्त हो गई थी कि ठोस साहित्य के बारे में कम, अपने ही बारे में अधिक हो गई थी. उसकी उपस्थिति अब धूमिल हो गई है. हमारे समय को सत्यातीत समय, उत्तरोत्तर आधुनिक, उत्तर थ्योरी समय भी कहा गया है.
सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या ऐसे समय में हम उत्तर राजनीतिक थ्योरी के चरण में नहीं पहुंच गए हैं? कई बार लगता है कि आज सचाई इतनी विकराल और हिंस्र है कि उसने सारी थ्योरी को कुचल डाला, नष्ट कर दिया है.
अगर हम भारत की इस समय जो हालत है उसका विश्लेषण करें तो उसके ये पक्ष उभरते हैं: क्रूरता का मोहक सौंदर्य, हिंसा का आकर्षण और प्रेम, झूठों-झांसों का अपार घटाटोप, लिचिंग-बुलडोज़िंग का आनंददायी तमाशा, त्योहारों पर खून-ख़राबे के जश्नों में कायाकल्प, विस्मृति का संस्थानीकरण, बढ़ती शहराती अराजकता-अव्यवस्था, सार्वजनिक संवाद में बढ़ती अभद्रता, संवैधानिक और उदार मूल्यों पर लगातार आक्रमण, सहानुभूति और अंतःकरण का बढ़ता संकोच और विजड़ता, पराई पीर के प्रति असंवेदनशीलता, गणतंत्र का हर रोज़ तोड़ा-बिखेरा जाना, लोकतंत्र का बहुसंख्यकवाद में विघटन, शहरों में बर्बरों के आगमन और प्रवेश पर स्वागत द्वारों का निर्माण, विचारों से विदाई और नए विचारों की अनुपस्थिति, रचनात्मकता को साहित्य और कलाओं से विस्थापित कर टेक्नोलॉजी में अवस्थित करने की विशद चेष्टा, ज्ञान का अवमूल्यन और अज्ञान का महिमा-मंडन, न्याय की बढ़ती दुर्लभता.
इसके अलावा व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा का व्यवस्थित अवमूल्यन, समाज को निरे बाज़ार में बदलने का अभियान, मीडिया के बड़े संपन्न हिस्से की सत्ता-भक्ति, लोकतंत्र-विरोध, असहमति और विरोध का अपराधीकरण, बढ़ती सतही, अध्यात्मशून्य धार्मिकता, चुप्पी और कायरता की बिरादरी और घृणा के विशद व्यापार का उल्लेख भी करना चाहिए.
क्या ऐसी कोई थ्योरी, सैद्धांतिकी हो सकती है जो इस सबको हिसाब और ध्यान में ले, इनका ईमानदारी से निडर बखान और व्याख्या करे और इस बहुत दारूण दुर्दशा से बाहर निकल सकने का कोई रास्ता सुझा सके !
कठमुल्लेपन का बढ़ता भूगोल
‘विकसित भारत’ में अगर आर्थिक प्रगति हो रही है तो दौलत कुछ लोगों की बढ़ रही है और व्यापक समाज में अभूतपूर्व ढंग से बेकारी और बेरोज़गारी बढ़ रही है. झूठ-घृणा तेज़ी से फैल रहे हैं; सांप्रदायिक सद्भाव तेज़ी से नष्ट हो रहा है; सभी नागरिक या तो राज्य की निगरानी में हैं या कि एक-दूसरे पर जासूसी करने लगे हैं. धर्म आक्रामक और हिंसक हो रहे हैं और उनमें कठमुल्लापन विस्तार पा रहा है. इस विस्तार के दो प्रसंग हाल के हैं.
पहला है बंगाल का, जहां राज्य-पोषित उर्दू अकादमी ने प्रसिद्ध और लोकप्रिय उर्दू कवि, फ़िल्मी हस्ती जावेद अख़्तर की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम को इसलिए टाल दिया कि उस पर कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने यह दबाव डाला कि जावेद नास्तिक और इस्लाम-विरोधी हैं और उन्हें नहीं बुलाया जाना चाहिए.
दूसरा है बेंगलुरू का, जहां एक भाजपा राजनेता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में अर्जी लगाई कि अंततरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से विभूषित कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को राज्य सरकार द्वारा इस वर्ष के प्रख्यात मैसूर दशहरा समारोह का उद्घाटन करने के निमंत्रण पर रोक लगाई जाए क्योंकि जनरोष है, सांप्रदायिक सद्भाव खंडित होगा.
पहले में अकादमी ने कार्यक्रम स्थगित कर दिया है, दूसरे में मामला उच्च न्यायालय के सामने विचार के लिए है, जिसने इसे तत्काल सुनने से मना कर दिया. संयोगवश दोनों प्रसंगों में मुसलमान लेखकों को लेकर विवाद खड़ा किया गया है. पहले में कट्टर मुसलमानों की आस्था आहत हुई है, दूसरे में हिंदुओं की आस्था आहत होने का अंदेशा है. पहले में जावेद अख़्तर पर इस्लाम-विरोधी वक्तव्य देने का आरोप है, दूसरे में हिंदू-विरोधी वक्तव्य देने का.
यह दुहराना अनावश्यक होना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र असहमति और प्रश्नांकन को अपना मूल आधार बनाता है जैसा कि स्वयं 
भारतीय चिन्तन परंपरा ने भी सदियों तक बनाया. बौद्ध-जैन-सिख धर्म तो असहमति के ही धर्म हैं. हमारे भक्ति काव्य के कवियों ने धार्मिक सत्ताओं, धार्मिक अनुष्ठानों, पंडित और मौलवी पर तीख़े प्रश्न उठाये हैं और उनका काव्य आज तक सारे भारत में सबसे लोकप्रिय काव्य है जो लोकजीवन के अलावा संगीत-नृत्य और कलाओं में भी व्याप्त है.
उधर, उर्दू में ईश्वर या धर्म की स्तुति का काव्य बहुत कम है. उसके बड़े कवियों जैसे मीर और ग़ालिब ने धर्म, मौलवी आदि का तीख़ा प्रश्नांकन किया है. मीर ने तो कहा कि ‘कब का तर्क इस्लाम किया’. फिर, उर्दू किसी धर्म की भाषा नहीं है- इसी धर्म के अनुयायी बांग्ला, असमिया, तमिल, मलयालयम, पंजाबी आदि में लिखते आए हैं. खुद बानू मुश्ताक कन्नड़ में लिखती हैं. प्रेमचंद, फ़िराक, जैसे बड़े उर्दू अदीब हिंदू थे.
कठमुल्ले, किसी धर्म या जाति या ओहदे के क्यों न हों, अक्सर अज्ञानी होते हैं. हमारे समय में अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित करने, उसे लगभग अपराध बनाने का जो सुनियोजित अभियान चल रहा है उसमें ऐसी घटनाएं अप्रत्याशित नहीं हैं पर उनका सख़्त विरोध करना भारतीय लोकतंत्र और परंपरा के नाम पर बहुत ज़रूरी है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)

सोमवार, 18 अगस्त 2025

14 बिदिया अउ 64 कला



      मदन मंडावी  
 भारत के संसकिरति ह गियान अउ कला के अब्बड़ अकन भेद ला देखाथे। 14 बिदिया हा गियान के कहावत अउ बेवहार ल खोलथे ता 64" कला हर जीनगी के बड़अकन कला कौसल ल फोरियाथे। 64 कला पुरातन म सबो मनखे बर जरूरी माने जाथे। जेकर मेरन 64 कला होथे ओला पूरन मनखे माने जाथे। ये कला ला आदमी अपना के सफल हो सकत हे। 64 कला बेद- पुरान मनमा तको हे। ए कला के उपखन्ड घलोक हो सकत हे। एहा वात्स्यायन के कामसूत्र मा मिलथे। आवव बिद्या अउ कला काय आय तेला जानन _।
    14"बिदिया _
(1 ) बेद _ बेद ल पुराना सियानन मन लबेद काहय _सब लबेदा मा परे हन गा। बेद ल कोनो लिखे नइ गेहें, सकेला करे गेहे। घटना कुछ भी घटे जा सकथे। मानव के जीवन चरित्तर हर लबेद आय। जेमा बिग्यान, भूगोल, गणित, समाज अउ अर्थ समाय हे। बेद चार बताथें _ऋग्बेद, यजुर्बेद, सामबेद, अथर्वबेद। घटना ला पहिली ले नइ लिखे जा सके।
(2) बेदांग _ सिक्छा, कलपना, बियाकरन, ज्योतिस अउ छंद।(3) पुरान (पुरातन) _ जुन्ना इतिहास, कहनी -कंथली, धारमिक सिक्छा।
(4) नियाव _तरक सास्तर अउ नियाव सास्तर। (5) मीमांसा (परछाई) _बैदिक अनुस्ठान, कहावत के बखान। (6) धरम सास्तर _धारमिक अउ सामाजिक बुता करे के गियान। (7) आयुर्बेद _ असली ईलाज, जड़ी - बूटी। (8) धनुर्बेद _लड़े के बिदिया। (9) गन्धर्वबेद _संगीत, नाचे गाए के गियान। (10) अरथ सास्तर _राजनीति अउ रुपिया पईसा।(11) कामसास्तर _परेम अउ यौन संबंध के गियान।(12) वास्तुकला _घर दुवार बनाए के बिसय। (13) सिलपसास्तर _कारीगरी, हाथ के कला। (14) ज्योतिस _खगोल बिग्यान, भविस्य बताना। 
    64"कलाएं
( 1) गान बिद्या (2) वादन _किसम -किसम के बजाना।(3) नृत्य (4) नाटक (5) बेल बूटे (कढ़ाई) (6) चाउँर अउ फूल ले पूजा सजाना। (7) चित्रकारी (8) फूल के जठना बनना (9) दांत, कपड़ा, अंग रंगना (10) मनी के फर्स बनाना (11) बिसतर सजाना। (12) जल ला बाँधना (13) बिचित्र सबूत देखाना। (14) हार माला बनाना (15) कान अउ बेनी के गहना बनाना (16) कपड़ा अउ गहना बनाना (17) फूल के जेवर संवारना। (18) कान के पत्ता बनाना (19) सुगन्ध वाले तेल बनाना (20) इंद्रजाल, झाड़ फूँक।(21) हाथ के फूली के काम (22) मनचाहा भेस धरना ( 23) रंग- रंग के खाय के चीज बनाना (24) आनीबानी पीए के बनाना।(25) सूजी के काम ( 26) खिलउँना बनाना। (27) पहेली उलझाना। (28) मुरती बनाना (29) कूटनीति कला (30) गरंथ, लिखा,पढ़े के चलाकी (31) नाटक बनाना (32) समस्या पूरा करना (33) पट्टी, बेंट, बाण बनाना। (34) दरी, गलीचा बनाना।(35) बढ़ई के कारीगरी।(36) घर बनाए के कारीगरी (37) सोन चाँदी, हीरा ल परखना।(38) सोना चाँदी बनाना।(39) मनी के रंग ल पहिचानना। (40) खाय के ला पहिचानना।(41) पेड़ के ईलाज। (42) भेड़ा, कुकरा, बटेर लड़ाए के रीति।(43) चिरई -चिरगुन के बोली भाखा (44) भटकाय के बिधि। (45) चुंदी सफई के कला (46) मूठा के चीज या मनके बात बताना।(47) घटिया तरक, सुझाव (48) देस - बिदेस के भासा गियान। (49) सकुन,अपसकुन जानना, सवाल के जवाब देना।(50) नाना किसम के मातरा यंत्र बनाना।(51) रतन ल नाना परकार ले कांटना (52) संकेत भासा बनाना (53) मन मा कटक रचना करना (54) नवा- नवा बात निकालना (55) छल ले काम निकालना (56) सब कोस के गियान (57) सबो छंद के गियान (58) कपड़ा लुकाय, बदले के गियान (59) जुआ के खेल (60) दुरिहा के मनखे या चीज ला खींचना।(61) लईका मनके खेल  (62) मंतर के गियान (63) जिताए के गियान (64) बेताल ला बस म करे के गियान।
         एमा आजकल के बदलत जमाना के मुताबिक अउ कुछु (उपखंड)जोरे जा सकत हे। तेकरे सेती केहेे जाथे ओहो..किसम- किसम के कला हे गा।
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            ढारा, डोंगरगढ़, छत्तीसगढ़।।

सोमवार, 30 दिसंबर 2024

माता - पिता " की कभी मृत्यु नहीं होती...

 आज सुबह से ही मैं विचारधारा की अलग दुनिया में गोते लगा रहा हूं । इस बात को समझ रहा हूं कि जीवन , जन्म और मृत्यु का चक्र है । इस शाश्वत चक्र के बीच के समय में ही हम वह जीते हैं , जिसे जीवन कहा जाता है । यह अकाट्य सत्य है कि इस दुनिया में आने वाले को एक दिन जाना ही है । इसी जीवन की कड़ी में सबसे मजबूत रिश्ते की पहचान माता-पिता के रूप में हम सबके सामने आती रही है ।इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है की माता-पिता हमेशा हमारे साथ नहीं रहेंगे । यह विचार मेरे मन में आते ही मैं एक अज्ञात भय से कांप उठता हूं । दुःखी मन के साथ सोचने लगता हूं कि जब माता-पिता साथ न होंगे तब उनकी स्मृति , यादें ही साथ रहेंगी । उनके दिए संस्कार , जीवन जीने के तरीके ही सीढ़ियों के पक्के पायदान होंगे ,जो मुझे कामयाबी की ऊंचाई चढ़ने में मदद करेंगे । अब कुछ - कुछ ताकत का एहसास होने लगा है । वह संकल्प ठोस रूप लेता जा रहा है ,जो मुझे बार-बार यह कह रहा है कि आपके माता-पिता ने जो कुछ भी विरासत में दिया है उसे अंगीकार कर उनका नाम रोशन करने कोई कसर न छोड़ें । मैंने अपने पिता को 17 वर्ष पूर्व खो दिया । वहीं माताजी ने भी हम भाई- बहनों को लगभग तीन माह पूर्व छोड़ दिया । इस सच्चाई को स्वीकार करना बहुत ही कठिन है , किंतु मेरे माता-पिता की यादें इस कदर मेरे अंदर रच - बस चुके हैं कि मुझे ऐसा लगता ही नहीं कि वे मेरे साथ नहीं है ।

इस मृत्यु लोक में रहने वाला हर मनुष्य माता-पिता को खोने के बाद यही कहता है कि... उनकी मृत्यु हो गई है ! अथवा वे मौत की आगोश में समा गए हैं ! उनके जाने के बाद घर खाली-खाली दिखने लगता है । ऐसा लगता है मानों दुनिया समाप्त हो गई हो । मैं ऐसा नहीं मानता । कारण यह कि मुझे लगता है की माता-पिता कभी नहीं मरते । वे हमेशा जीवित रहते हैं । हमारे साथ ही रहते हैं । वह तो हम ही हैं जो उन्हें भूल जाते हैं ! यदि मैं अधिक भावुकता में न बहुँ तो तथ्यात्मक रूप में एक भाई के पास हमारे पिता की आंखें हुआ करती हैं । बहन का सुंदर रूप मां का प्रतिबिंब हुआ करता है । मां का स्नेह और दयालुता बहन के रूप में छलकता दिखाई पड़ता है । बड़ा भाई पिता की तरह मुस्कुराता है , तो बहन मां की तरह स्वादिष्ट भोजन बनाकर परोसती है । माता-पिता मरते नहीं । वे हमें कभी नहीं छोड़ते । वह हमारे बीच रहते हुए हमारे अंदर बसा करते हैं । हम बच्चे माता-पिता के प्रतिबिंब होते हैं । हमारे माता-पिता अपनी शारीरिक अनुपस्थिति के बावजूद हममें जीवित रहते हैं । जब कभी माता-पिता के न होने की कमी सताने लगे , तो हमें अपने भाई - बहनों को अपने पास इकट्ठा कर लेना चाहिए ।इससे हम अपने माता-पिता की मंत्र मुग्ध कर देने वाली मुस्कान , मधुर आवाज को अपने करीब महसूस कर सकेंगे ।
प्यार की वह बगिया जिस हमारे माता-पिता ने जन्म के समय से ही खून पसीने और आंसुओं से सींचा और विकसित किया है वह विपरीत मौसम के चक्र से प्रभावित हुए बिना खिलखिलाती रहेगी । कारण यह की भौतिक रूप में हमारे बीच न रहने वाले हमारे माता-पिता एक अदृश्य शक्ति के रूप में सदैव हम पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं । जरूरी यह है कि हम अपनी व्यस्त जिंदगी में से अपने माता-पिता को याद करने कुछ क्षण जरूर निकालें । सुबह की पूजा - अर्चना के उपरांत अथवा बीच में माता-पिता को इस तरह प्रार्थना में शामिल करें जिस तरह ईश्वर को करते हैं । हमारे धर्म शास्त्रों में मनुस्मृति का स्थान सर्वोपरि है राजश्री मनु के विचार भारतीय मनीषा में सर्वमान्य है ।माता-पिता , गुरुजनों एवं श्रेष्ठ जनों को सदैव प्रणाम , सम्मान और सेवा के संदर्भ में मनुस्मृति का यह श्लोक अनुकरणीय है:-
 " अभिवादनशीलस्य नित्यम वृद्धोपसेविंनः।
    चत्वारि तस्य वर्धते आयुर्विध्या यशोबलम ।। "
अर्थात वृद्ध जनों यथा माता-पिता , गुरुजनों एवं श्रेष्ठ जनों का सर्वदा अभिवादन करने से आयु , विद्या , यश और बल की वृद्धि होती है । हमारे इसी धर्मशास्त्र मनुस्मृति में एक अन्य शोक में माता-पिता और आचार्य को अति महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हुए कहा गया है । दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य होता है । सौ आचार्य से बढ़कर एक पिता होता है , और पिता से हजार गुना बढ़कर माता गौरवमयी होती है । हमारे शास्त्र कहते हैं की माता-पिता अपनी संतान के लिए जो कष्ट सहन करते हैं उसके बदले पुत्र यदि सौ वर्ष तक माता-पिता की सेवा करें , तब भी वह उनका ऋण नहीं चुका सकता है । माता-पिता की आराधना से हमारे धर्म ग्रंथ भरे पड़े हैं । फिर चाहे वह महाभारत हो , रामायण हो , गीता हो या फिर चारों मुख्य वेद ही क्यों न हों । माता-पिता के स्थान को उद्धृत करता यह श्लोक सभी को जानना चाहिए :- 
    " सर्वतीर्थमयी माता , सर्वदेवमयः पिता ।
  मातरम- पितरम तस्मात् सर्वयत्नेन पुजयेत।। "
अर्थात माता सर्व तीर्थ मयी और पिता संपूर्ण देवताओं का स्वरूप है । इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए । जो माता-पिता का पूजन करता है ,उसके द्वारा सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी की परिक्रमा पूरी हो जाती है ।
माता-पिता हमारे जीवन से भले ही विदा हो जाएं , किंतु उनकी कृपा हम पर सदैव बनी रहती है। इसलिए यह कहा गया है कि - यथार्थ रूप में साथ न रहने के उपरांत अदृश्य होकर भी माता-पिता हमारे जीवन से दूर नहीं होते हैं   शाश्वत मृत्यु भी इस बात से इनकार नहीं कर सकती है कि माता-पिता की मौत कभी नहीं होती । हर पिता अपने बच्चों का जीवन दर्शन होता है ,जबकि मां जीवन का सार होती है । सागर की तरह शांत पिता , गंगा की धार की तरह प्रवाहित होने वाली मां को जीवन में उसी तरह सम्हाला करता है जैसे सागर नदी के मिलन को ! मां अगर हमें भटकन की स्थिति में राह दिखाती है , तो पिता अंधेरे मार्गों का उजाला बनाकर सहायक की तरह हमारे साथ चलता रहता है । कांटों के बीच खीलखिलाते गुलाब की तरह पिता अपने बच्चों को सुख प्रदान कर रहा होता है , तो माता उस फूल के अंदर बसी खुशबू को फैलाकर बच्चों का जीवन खुशगवार कर देती है ! इन सारी विशेषताओं से परिपूर्ण माता-पिता के साए को उनकी मौत की संज्ञा देना हमारी भूल हो सकती है । हमें यह याद रखना चाहिए कि माता-पिता की मृत्यु कभी नहीं होती ...केवल दूरियां बन जाती हैं ।
                          डॉ सूर्यकांत मिश्रा
                          राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                           9425559291

उत्तर आधुनिक लोग

डॉ मृदुल शर्मा


      पिपरगांव के ग्राम प्रधान चौधरी शिव बरन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती रमा सिंह को जब इस बात की जानकारी हुई कि उनकी पुत्रवधू गर्भवती है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। चौधरी शिव बरन सिंह अपने पैतृक मकान की साफ-सफाई कराने में जुट गये। वह रात को लेटते तो मन ही मन
     बच्चे का जन्म होने पर भोज देने की योजना बनाते। कौन कौन से गांव के किस किस को निमंत्रण देना है, कुल कितने लोग हो जायेंगे, खाने का मीनू क्या होगा आदि विषयों पर वह विचार करते। उनकी इस भोज व्यवस्था में व्यस्तता देख कर निद्रा देवी उड़न छू हो जातीं और चौधरी साहब रात रात भर करवटें बदलते रह जाते। उधर उनकी पत्नी रमा देवी ने पौत्र प्राप्ति की कामना से प्रत्येक सोमवार को व्रत रहना प्रारंभ कर दिया। चौधरी साहब को जब पता लगा कि उनकी पत्नी पौत्र की कामना से भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखती है तो वह बहुत प्रसन्न हुए। मगर चौधरी साहब ने यह खुशी अपनी पत्नी पर प्रकट नहीं होने दी। बल्कि हंस कर उनसे बोले -" तू तौ बावली हो गई है त्रिभुवन की मां। तेरे पुत्र की पहली संतान जन्म लेगी तो पुत्र हो या कन्या, क्या फर्क पड़ता है। अगर कन्या ही हो गई तो अगली बार भगवान पुत्र दे देंगे। कौन तुम्हारे इकलौते पुत्र के चार-चार कन्या हो चुकी हैं जो पुत्र के लिए परेशान हो रही है।"
      शुभ शुभ बोलो चौधरी सा' । जिंदगी को कोई ठिकानो है? पके फल की का बिसात, कब हवा को लकूरा आवै और फल चू परै। पोता खिलाय लें तौ म्हारी आखिरी तमन्ना पूरी हो जाये।"- श्रीमती रमा सिंह ने गदगद स्वर में उत्तर दिया।
       दीपावली के अवसर पर जब चौधरी साहब का इकलौता पुत्र अपने माता-पिता के पास त्योहार मनाने आया तो उसकी मां ने उसे डांटते हुए कहा -" बहू को लेकर क्यों नहीं आया?"
" अम्मा उसने कुछ दिन अपनी मां के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की थी तो मैं उसे उसके मायके छोड़ता हुआ यहां चला आया।
-त्रिभुवन ने सफाई पेश की।
" ठीक है। जल्दी ही बहू को यहां पहुंचा जाना। ऐन टेम पर गर्भवती महिला को यात्रा नहीं करनी चाहिए।"- मां ने बेटे को समझाया और फिर बच्चे के जन्म से संबंधित सारी तैयारी और योजनाओं की जानकारी त्रिभुवन को दी। त्रिभुवन यों तो किसी मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत बड़ा अधिकारी था, मगर अपनी मां रमा सिंह के सामने वह उनका भोलाभाला 'लला' ही था सो वह बेचारा शर्म से सिर झुकाए अपनी मां की बातें सुनता रहा।
      त्रिभुवन जब पिपरगांव से वापस बैंगलौर लौटा तो बड़ी द्विविधा में था। वह जानता था कि उसकी पत्नी सांभवी बच्चे के जन्म के समय पिपरगांव में रहने हेतु किसी भी दशा में राजी नहीं होगी और पिपरगांव में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के घोर अभाव को देखते हुए यह उचित भी है। मगर अम्मा बाबू की बच्चे के जन्म को लेकर की जा रही तैयारियां और योजनाओं को देखते हुए वह यह भी सोच रहा था कि जब सांभवी कोपिपरगांव भेजने से मना करेंगे तो उन्हें बहुत दुख होगा।
       एक सप्ताह बाद जब सांभवी अपने भाई के साथ मायके से बैंगलोर वापस लौटी तो एक दिन त्रिभुवन ने अपनी उलझन सांभवी को बताई। उसकी बात सुनकर सांभवी बोली -"पिपरगांव में डिलीवरी? पागल हो गए हो क्या?" डिलीवरी के समय तुम मुझे गाजियाबाद भेज देना। वहां पर मम्मी -पापा सुरक्षित डिलीवरी हेतु सारी व्यवस्था कर लेंगे।"
      निर्णायक स्वर में सांभवी द्वारा कही गई बात को सुनकर उस समय तो त्रिभुवन चुप हो गया। मगर धीरे धीरे उसने सांभवी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि डिलीवरी बैंगलोर में होगी और उन दिनों त्रिभुवन अपने माता-पिता को बैंगलोर बुला लेगा तथा सांभवी और नवजात शिशु की उचित देखभाल की व्यवस्था हेतु वह एक सप्ताह तक अवकाश पर रहेगा।
      गर्भस्थ शिशु के जन्म के कुछ दिन पूर्व त्रिभुवन ने फोन पर अपने माता-पिता को बताया कि सांभवी के शरीर में खून की कमी है। डाक्टरों ने अस्पताल में ही डिलीवरी कराने की सलाह दी है। अतः वह दो दिन बाद उन लोगों को बैंगलोर ले जाने के लिए पिपरगांव आयेगा।
      बहू की बीमारी के विषय में जानकारी मिलने पर उसके माता-पिता चिन्तित हो गये। उन्होंने अपने पड़ोसी सुरेश को  बुलाकर कहा-" सुरेश, हम लोग दो-चार दिन में बैंगलोर जा रहे हैं। तुम घर का तथा हमारे जानवरों का ख्याल रखना। भैंस दूध दे रही है। उसके खाने के लिए दाना और चोकर भी भूसे वाली कोठरी में है। उसकी सेवा के साथ ही दूसरे जानवरों के खाने पीने का भी पूरा ख्याल रखना। भैंस दोनों टाइम दो-दो लीटर दूध देती है। खूब छक कर तुम लोग दूध पीना और घर की अच्छे से रखवाली करना।"
       सुरेश सिर झुका कर बोला -" आप निश्चिंत होकर जाओ चौधरी सा'। हम शिकायत का मौका नहीं देंगे।"
‌      चौधरी साहब और उनकी पत्नी त्रिभुवन के साथ बैंगलोर आ गये। बैंगलोर के पाश एरिया में कंचन जंघा हाइट्स में उसने टावर नंबर आठ में फ्लैट नंबर 1204 किराए पर ले रखा था।
     चौधरी शिव बरन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती रमा सिंह बेटे का घर देख कर खूब हंसे। श्रीमती रमा सिंह बोलीं -" भइया
      यह घर है या पिंजरा। न औरतों के लिए आंगन, न मर्दों के लिए चबूतरा। अगर ढोर-डांगर रखने का शौक हो तो कहां रखे? पंछी के नाम पर सिर्फ कबूतर ही दिखाई देते हैं।"
       वहां रहते हुए ग्रामीण दम्पति ने देखा कि यहां तो कोई किसी से बोलता ही नहीं है। चौधरी साहब ने बातचीत शुरू करने के उद्देश्य से सामने पड़ने पर कई लोगों को 'राम राम' बोला मगर कोई दूसरी ओर देखने लगा और किसी ने प्रत्युत्तर में धीरे से सिर हिला दिया।
       सर्दियों के दिन थे।उन्होंने देखा कि कालोनी में रहने वाले पुरुष और स्त्रियां सुबह-शाम कालोनी के किनारे और पार्क के चारों ओर बनी सड़कों पर टहलते हैं। स्त्रियां भी पुरुषों के जैसे ही जीन्स और जैकेट पहनती हैं। बहुत सवेरे ही अनेक लड़कियां और औरतें काम करने के लिए बाहर से कालोनी में आती हैं। वे सब दोपहर में बारह बजे से दो बजे के बीच कालोनी में स्थित पार्क में धूप में बैठ कर भोजन करती हैं।
       दोपहर में त्रिभुवन के माता-पिता भी पार्क में जाकर टहलते थे। धीरे-धीरे इन लोगों की उन कामवाली स्त्रियों से बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कि यहां हर घर में झाड़ू -पोछा करने, बर्तन धोने, कपड़े धोने और खाना बनाने के लिए के लिए, छोटे बच्चों को संभालने के लिए बाहर से काम वाली आती हैं।
"फिर यहां रहने वाली औरतें दिन भर क्या करती हैं"- रमा सिंह ने आश्चर्य से पूछा।
"वे सब कार से मार्केट जाती हैं, बच्चों को स्कूल से लातीं हैं, टी.वी. देखती हैं।"- एक महिला ने उत्तर दिया।
फिर कुछ रुककर बोली -" जिस दिन खाना बनाने वाली नहीं आती है, उस दिन जोमैटो को खाना लाने का आर्डर दे दिया जाता है, या रेस्टोरेंट में जाकर वे लोग खाना खा आते हैं।"
       चौधरी साहब ने वार्ता में सम्मिलित होते हुए कहा -" यहां तो कोई किसी से बोलता ही नहीं। ये पड़ोसियों के सुख दुख में भी क्या शामिल होते होंगे।"
उनकी बात सुनकर एक बूढ़ी स्त्री बोली -" अब तो लाश उठाने के लिए भी मजदूर मिलते हैं। वही मुर्दे को श्मशान पहुंचाते हैं।"
"हे भगवान, कैसे हो गए हैं शहर के पढ़े-लिखे, धनी-मानी लोग।"- चौधरी साहब ने हंस कर कहा।
"सबमें अहंकार की गैस भरी है, वही झुकने नहीं देती है।" - रमा सिंह ने मुंह बिचकाकर कहा।
      धीरे-धीरे त्रिभुवन के माता-पिता से उन कामवाली स्त्रियों से नेह-नाता जुड़ गया। उन्होंने इन स्त्रियों से रोज ही बातें करते देख एक दिन सांभवी ने कहा -" हम लोग इन छोटे लोगों को ज्यादा मुंह नहीं लगाते हैं।"
       इतना सुनते ही चौधराइन भड़क गईं -" यह क्या बात हुई बहू? यही तो समाज की सुंदरता है। छोटे -बड़े सभी अपनी सीमा के अनुसार एक -दूसरे की सहायता हेतु तत्पर रहें, तभी साथ-साथ रहने -बसने का कोई लाभ है। हमारे गांव में देखो, जो गरीब है वह हाथ-पै रसे सेवा-सहयोग हेतु तत्पर रहता है और जो धनी है, वह उदारता पूर्वक उसकी आर्थिक सहायता करता है। दोनों की जरूरतें एक-दूसरे से पूरी हो जाती हैं।"
      इसके बाद सांभवी का साहस नहीं हुआ कि वह अपनी सास से इस संबंध में बहस करे।
      त्रिभुवन के पुत्र का जन्म अस्पताल में हुआ। इस उपलक्ष्य में उसे फोन पर बधाइयां मिलीं, कई बुके भी डिलीवरी ब्वाय दे गए। मगर सशरीर बधाई देने हेतु कोई उपस्थित नहीं हुआ।
      एक माह बाद त्रिभुवन के माता-पिता को वापस पिपरगांवजाना था। उन्होंने बातचीत के दौरान अपने जाने की तिथि और समय इन कामवालियों को बता दिया।
      जिस दिन त्रिभुवन अपने माता-पिता को पिपरगांव पहुंचाने जा रहा था, नीचे लिफ्ट के पास अनेक कामवाली स्त्रियां, ड्राइवर और सिक्योरिटी गार्ड उन्हें विदा करने के लिए खड़े थे। ड्राइवर और गार्डों ने चौधरी साहब को पैर छूकर विदा किया तो महिलाओं ने सिसकते हुए त्रिभुवन की मां के पैर छूकर उन्हें विदा किया। जब एक लड़की त्रिभुवन की मां के पैर छूने के लिए झुकी तो वह उसे गले लगा कर बोलीं -"कुंवारी कन्या देवी सरूप होत हैं, उनसे पांव नाय छुआए जात।"
      उन्होंने उन सभी महिलाओं को बीस बीस रुपए दिए।जब एक महिला ने रुपए लेने से मना किया तो वह बोलीं -" बड़े -बुजुर्गों के आशीर्वाद को लेने से मना नहीं करते।"
      यह सुनकर उस महिला को बीस रुपए का नोट लेना ही पड़ा।
     कालोनी के लोग भीड़ को देखकर अपने अपने फ्लैट की बालकनी में आकर आश्चर्य से यह विदाई का दृश्य देखने लगे।
     उनमें से कुछ ने बुदबुदाते हुए कहा -"कैसे कैसे लोग हैं दुनिया में।"
इधर कालोनी के वासिन्दों के विषय में सोचते हुए पिपरगांव के चौधरी और चौधराइन भी यही वाक्य मन ही मन दोहरा रहे थे।

डॉ मृदुल शर्मा
569क/108/2, स्नेह नगर
आलमबाग, लखनऊ -226005

छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य: सुवा


गणेश्वर पटेल
 
सुवा गीत ह हमर राज्य के गोंड जाति के माईलोगन मन के नृत्य आए। आज सबो जाति के कन्या मन अउ महिला मन ए नृत्य ल करथे। एहा देवारी के परब म माईलोगन मन के द्वारा गाए जाने वाला गीत है।
का हरे सुवा आवव जानन:-
एमा सुवा मिट्ठू ल कहिथे।मिट्ठू ह चिरई मन के एकठन प्रजाती हरे जेन ह हरियर रंग के रहिथे, अउ ओकर चोंच ह लाल रंग के रहिथे। सुवा चिरई के एकठन खास विशेषता ए हे कि ऐला जोन भी गोठ रटवाथे ओला ओहा हूबहू बोलथे, दोजराथे।
सुवा नृत्य:-
ए लोकगीत म माईलोगन के जात मन ह मिट्ठू के माध्यम ले अपन संदेस देवत ए गीत ल गाथे।ए गीत के जरीये स्त्री मन ह अपन अंतस मन के गोठ ल गोठियाथे ,ए विस्वास के संग कि ए सुवा ह मोर व्यथा ल प्रिय तक पहुँचाही कहिके।एकरे बर ए लोकगीत ल कभू कभू वियोग के गीत तको केहे जाथे।
सुवा गीत म हमनला हमर लोक कथा ल सुने बर तको मिलथे:-
सुवा गीत म हमनला लोक कथा ल सुनेब तको मिलथे, सुवा गवइया मन ए लोक कथा ल सुवा गीत म अइसन पिरोय रहिथे, जेन ल सुनेमा अड़बड़ सुघ्घर अउ गुरतुर जनाथे, संग म हमनला शिक्छा तको मिलथे। जईसे:-
बेटा होवय त श्रवन जईसे, जुग जुग अमर होई जाए।
अंधरी अंधरा दाई ददा ल कांवर म तिरथ घुमाए, सुवा बोलत हे।
भाई होवय त लछमन जईसे राज पाठ ल ठुकराय, रघुराई संग वन चले बनवासी के जीवन ल बीताय, सुवा बोलत हे रे।
नारी होवय त सती सावित्री जईसे पतिव्रता कहिलाय, सत्तवान के रक्छा करेबर यमराज ल हराय , सुवा बोलत हे।
कईसे नाचथें सुवा नृत्य ल आवव जानन:-
धान लुवई के बेरा म ए लोकगीत ल अड़बड़ उत्साह के संग म गाए जाथे। एमा शि्व पार्वती के(गउरा गउरी) के बिहाव तको मनाये जाथे। माटी के गउरा गऊरि बनाके एकर चारों मुड़ा म घुमके सुवा गीत गाके नाचे के परम्परा हे।कुछ कुछ जगा म माटी के सुवा बनाके ए गीत ल गाए जाथे।
कब चालू होथे ए गीत ह आवव जानन:-
सुवा गीत ह देवारी के कुछ दिन पहिली चालू होथे अऊ देवारी के दिन ईसर गउरी गऊरा के बिहाव के संगे संग समाप्त हो जाथे। पुराना जमाना ले गाए जाने वाला ए गीत मउखिक हे। सुवा गीत म स्त्री मन बाँस के टुकनी म भरे धान के ऊपर म सुवा के प्रतिमा ल रख देथे।अउ एकर चारों डाहन गोल भाँवर होके नाचथे अउ गाथे। बाँस ले बने टुकनी ल जेन म धान अउ सुवा ल रखे रहिथे, ओला बोहइया ल सुग्गी केहे जाथे।
सुवा गीत ह हमेसा एक ही बोल ले शुरू होथे। अउ ओ बोल हरे :-
तरी हरी नहाना मोर नहाना सुवा रे मोर ले जाना मोरो संदेश।
अइसे टाईप ले गाथे अउ नाचथे। अब दुर्भाग्य के बात ऐ आए कि ए गीत ह सल्लग नंदावत जात हे। अब के नोनी मन ए नृत्य ल करेबर लजाथे, शरम मरथे। आज हमनला ए लोकगीत मन ल बचाय रखना हे। एहा पुरखा मन के देवल अनमोल उपहार हरे। एला हमनला संजोके राखेब ल लागही।
ग्राम पोटियाडिह
जिला धमतरी(छ ग).

सुरहुती तिहार

मदन मंडावी
 
गौरी - गउरा या ईसर (शंभु)- गउरा। आदि परब " ईसर-गउरा जगार । अब बारा आना मिलावट अउ चार आना निमगा रहिगेहे। बिस्कुटक (विज्ञापन) के जमाना हर बड़ फरत फूलत हे । लोगन पसंद घलोक करत हे आज शंभु (ईसर) - गउरा परब गौरी -गौरा बनके रहिगे हे , जबकि गौरा -गौरी एकेच आय।
सुरहुत्ती के तको मायने हे वो दिन ले काय -काय जिनिस के सुरुवात होथे समझेल परही। प्रायः गांव म मूल संसकिरति ले जूरे किसान, मजदूर मन हर जादा रहिथे जेन मन मूल संसकिरति के ऊंचहा झंडा फहरइया माटी ले जूरे मनखे आय। माटी के काया, माटी म हे मिल जाना।" सिरिष्टि के अंग _धरती, पानी, पवन, आगी, अकास संग जीव जंतु, पशु - पंछी जनावर ला जय जोहार करे के परब आय सुरहुत्ती। फेर अब काहे- घर मा नाग देव भिंभोरा पूजे ला जाए जइसन होगे हे।"
सुरहुत्ती तिहार मा बिहाव संसकार अउ जिनगी के सुग्घर गायन हे। हमर गंवई गांव के देवी - देवतन ल लोक गीत के माध्यम ले जय जोहार करे जाथे। ये पुरातन संसकीरिति ला छेत्र के गोंड जनजाति समुदाय म विशेष रूप ले देखे जा सकत हे। एमा घर परिवार माई -पिल्ला के जिनगी के समृद्धि के सुग्घ्घर वरनन अउ बरनन हे। एक परकार के एमा सामाजिक परिवेश बिहाव "लोक गाथा" के सामरिक अनुखा नजारा देखे ला मिलथे।
ईसर- गउरा ल माटी ले गढ़ के बनाय के नेग -दस्तुर हे, आजकल लोगनमन रेडिमेंट ला खरीद के तको ले आथे।(ईसर देव मरकाम टोटम -बईला, गवरा दाई नेताम टोटम -केछवा)
*आवव ये परब के महिमा ला जानन_* कातिक महीना के अमावस्या तिथि के सात -पांच दिन पहिली "गउरा चौंरा" मा फूल कुचरे के नियम हे जेला गांव के महिला बेटी - माई मन करथे। सुरहुत्ती के दिन सबले पहिली एक निश्चित ठीहा ले माटी लाय जाथें जेन बेरा महिलामन लोक गीत गाथें -
(1) ढेला ढेलवानी, मोर जऊंहर खेती, ढेला ला मारे कुदार....।*
ये चुलमाटी गीत आय" गीत मा किसान ल समझाए गेहें कि किसानी कोनो सहज काम - बुता नोहे। माटी ल कोड़के उपजाऊ बनाय ला परथे तभे पईदावार बने हो सकत हे। माने खेती किसानी करना जऊंहर बुता आय।
*(2) जोहार -2 मोर ठाकुर देवता, सेवर लागंव मय तोर....*
हंसा चुगथे मूंगा मोती फूले वो चना के दार...।
- ये गीत मा ईसर -गउरा ला माध्यम बनाके सरधा - भकती भाव ले गांव के परमुख देवी - देवता जइसे ठाकुर देव, शीतला, साड़हा देव, भूमियार, गढ़माता, भैंसासुर, अउ बईगा- बइगिनमन ला जोहारत नेवता पठोय के भाव परगट करे गेहे। देवता के संगे - संग,गांव शहर ला जगाए के उदिम करे जावत हे। इहां एक पंछी हँस जेकर खान - पान के वरनन मिलत हे। गीत मा देवतन के संग चिरई -चिरगुन ला जोरे गेहे।
*(3) एक पतरी रैनी -भैंनी राय रतन वो..।*
गउरा देवी तोरे सीतल छाय , चऊंक ,चंदन, पिरोढ़ी,....
*_* ये गीत मा हर शब्द के महत्ता परगट होय हे । इहाँ महिलामन के गउरा दाई के परती परेम देखव अउ गीत के अरथ समझव आत्मवंदित संसकारित गीत रैनी -भैंनी माई के सखी- सहेली हे जो रतन (नवरत्न)के समान हे ये बिहाव मा गौरा महारानी के समान हे, जेन चऊंकी, चंदन,पीढ़ा संग सनमानित हे। पतरी (गोल पात्र) जेन समाज के परमुख अंग आय। जइसे - रोटी,बेटी, गोंटी, लेटा ,बेटा, फेंटा। ये गीत म नारी सनमान के भाव जगे हे नारी समाज मा सबले बड़े धन लछमी के समान हे।
*(4) ईसर राजा के रचे हों बिहाव,,,, गौरा बिहाय चले जाए..।*
-ये गीत के माध्यम ले झलकत हे कि बर - बिहाव के रचना होगे हे ,ईसर राजा सज -संवर के अपन गउरा रानी संग बिहाव करे बर जावत हे। संग मा संगी- साथीमन तको गगन - मंगन होके गमकत बरतिया बनके जावत हे।
*(5) ओगरी - ओगरी नव से ओगरी..*। जहां डरइया डांरे...।।
ये गीत ह संदेश देवत भाव परगट करत हे कि गांव मा बरतिया ओरी - पारी करके आगेहे। हर गांव के अपन बेवसथा होथे बाहिर ले आय उपद्रवी, बेड़जत्ता मनला डारना(दण्ड)। ये काम सियान मन करथे। जब ईसर -गउरा के आगु मा काँसा, डड़इयां चघथे त पेरा डोरी ले सांटा मारे जाथे। हाथ- पाँव मा तेल बाती ले सुमतेला देय जाथे, आखिर म हुम - धूप देवाके शांत करे जाथें।
*(6) लाले -2 परसा लाले हे खम्हार,,,। लाले हे ईसर राजा घोड़वा सवार...।।*
ये गीत मा ईसर राजा के बिरता रूपी सिंगार के बखान करे गेहे। जइसे परसा,खम्हार के फूल लाल रइथे वइसने ईसर देव लाल वेशभूषा बनाले हे बईला ला छोड़के घोड़ा मा सवार होगे हे। संग मा भरे पुरे सम्पत्ति के बखान गीत के माध्यम ले झलकत हे।
*(7) देतो दाई -2 दही अउ बासी,,,। अखरा खेलन बर जाहूँ वो दीदी...।।*
- येहर मउर सोपनी के बेरा गाय के गीत आय जेमा अपन सब्बो रिसतेदार मनला ओरिया - ओरिया के आसीरबाद मांगत हे। दही बासी गांव के लोकपिरिय भोजन आय जेकर ले सरीर पुष्ट , फुन्नांक होथे। अखरा पाली (अखाड़ा) ताकत आजमाए के ठीहा आय। ये एक परकार के फौजी बनेके तइयारी गीत आय।
*( 8) एक पतरी चढ़ाएन गउरा बेलवा वो बेलवाती,*
*आमच आमा फूले गउरा*
*मांझम वो चौंरासी*
*रोनिया के भोंनिया.......।।*
- ये गीत मा परकिरती संग मानुष के सुघ्घर मिलाप करे गेहे। गोल पतरी, तीन पाना वाला बेल के, आमा के डंगाली म जोत्था -जोत्था फूलना, सुख समृद्धि पाय के कामना उपमा सवरूप करे गेहे। मांझा - ऊंचहा सुभित्ता जगा। चौंरासी गढ़ म जनम धरना या 84 देवी- देवता के आसिरवाद पाना, चौरसिया होगेस रे...(एक कहावत) रोनियां- सीत" ठंड के मउसम ला इंगित करत हे। ये ढंग ले एमा भूत,भविष्य, वर्तमान लोक गायन म समाहित होगे हे।
*(9) काकर करसा रिगबिग -सिगबिग...।*
ईसर के करसा सिंहासन रे बाबू...। भाई वाले.... बिन भाई वाले.......।।
- करसा समृद्धि के परतिक आय, करसा बड़े होथे अउ कलश छोटे। एमा ईसर गउरा ला केंद्रीत करत भाई - बहिनी के परेम सुख- दुख के बात बताए गेहे। भाई वाले अउ बिना भाई वाले बहिनीमन कइसे करसा बोहथे। निराश बहिनी ल बार - बार ईसर -गउरा कोती ईसारा करत (बिस्वास)ढांढस बंधाए गेहे।
*(10) उठो उठो बड़े डरइया हो.. अंगना बटोरो..।।*
ईसर राजा अब बिहाव के बाद बड़े डरइया (दण्ड देने वाला) बनगेहे जेला बिहिनिया गउरा दाई उठावत हे। घर अंगना बटोरत अपन सास ल काहत हे, पियास लगही त करसा के पानी ल पी लेबे ,ठंडा लगही त पिसोरी पाठ कथरी ल ओढ़ लेबे, कोनो गरमी लगही त धुकनी (पंखा) मा धुक लेबे परिवारिक जीवन के भाव ये गीत मा समाय हे।
ये ढंग ले सुरहोत्ती मा लइका-सियान, बुढ़वा -जवान, माई -पिल्ला के सुख - दुख के गाथा संघर गेहे।
अइसने ईसर- गउरा ले संबंधित 20-25 सों गाना मिल जाहि जेमा जिनगी के सार तत्व छुपे हे। निश्चित रूप ले सुरहुत्ती मानवीय घरेलू जीवन, पराकिरतिक ग्रामीण सांसकिरतिक परिवेश के सुघरई के सुग्घर खजाना हे।

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ढारा, डोंगरगढ़, छत्तीसगढ़

गाय अब गरू होगे

अमृत दास साहू 
 
 तइहा के बेरा मा पशु धन के बड़ मान सम्मान होवय अउ वइसने इंकर महत्व भी रिहिस भइ ...गाय ला लक्ष्मी के रूप मानंय अउ सब पूजा भी करंय,घरो घर गाय गरू पालय पोंसंय,एकाध घर नइ राहय तहु हा देवारी के दिन पूजा करबो ,कोठा सुन्ना झन परे कहिके... अउ नहिते...नानकुन बछिया ला तहु बिसा के लावय... तहां ले धीरे-धीरे लंजार बाढ़ जाही कहिके...।
अउ कोनो बछवा पिला आ जाय ता बड़े होय तहां ले किसानी बुता जैसे नांगर‌ ,बक्खर ,दंवरी,गाड़ा,खांसर ,बेलन मा ओकर सहयोग लेवंय...उपयोग करयं।
अउ जबले मशीनी जुग के आगमन होहे..तब ले धीरे-धीरे मनखे मन के झुकाव मशीन डहर होय ला धर लिस अउ इही मेर ले पशु धन मन के पुछन्ता लगभग कम होय ला धर लिस।
नइते.. बड़े किसान के परसार/कोठा मा दू चार जोंड़ी बइला बंधायच रहितिस अउ एक जोंड़ी बइला तो गइंज अकन घर रहिबेच करय..।
एक ठन समस्या यहु हे के.. आजकाल सबे घर पढ़े लिखे बहु आवत जात हे..ता वहु मन अब गोबर कचरा करे बर हिचकथें ..अउ यहु पाय के कतकोन मन गाय गरू ला बेंचत अउ बरोवत हें...फेर इही मेर आज घलो कइ झन पढ़े लिखे बेटी बहु मन पशु धन के सेवा जतन भी करत हें भइ...यहु ला माने ला परही।
एक ठन बात यहु के आर्थिक रूप ले कमजोर कइ ठन परिवार पलायन घलो कर जथें...वहु मन काकर भरोसा मा इनला छोंड़बो कहिके पालत पोंसत नइ हावयं।
...एक अउ बात.... आजकाल गोबरहिन घलो नइ मिलय...यहु एक ठन समस्या हे....।
.....
अब तो अइसे होगे हे के....पशु धन ला मनखे मन गरू घलो समझे ला धर लेहें लगथे तभे तो पाले पोंसे के बजाय धीरे-धीरे बरोय ला धर लेहें अउ इही कारण हे के आज के स्थिति मा पशु धन के बहुत दुर्गति होवत हे अउ इंकर स्थिति धीरे-धीरे बड़ चिंताजनक होवत जावत हे... जेती जाबे तेती गाय गरू मन लवारिस असन सड़क तीर ता अउ आने जघा मा खड़े अउ बइठे दिखिच जथे।
आजकाल...इही चक्कर मा कइ ठन दुर्घटना घलो घट जावत हें..।
पशु धन मन उप्पर सबले बड़का खतरा एक ठन अउ मंडरावत हे...वो हरय....इंकर तस्करी ,हां आजकाल इंकर तस्करी घलो शुरू हो गे हावय भइ... तभे तो आए दिन समाचार पत्र मा पढ़े ला मिलथे कि अमुक गांव या शहर म गाय गरू ले भरे वाहन पकड़ाइस......आने...आने...।।
पहिली के मनखे मन पशु धन के सहयोग ऊंकर बुढ़ात ले लेवयं अउ काम बुता के लइक नइ रहय तभो नइ बेंचय भल्कुन ओकर जियत ले सेवा जतन करंय ।
जइसने गाय गरू पालय वइसने ओ जमाना मा......दूध,दही,मही अउ घींव घलो गहगट होवय भइ... ओ समे के मनखे मन के एक खासियत अउ राहय कतको दूध दही होतिस आस पड़ोस मा मिल बांट के खावय...फेर बेंचय कभू नहीं..!
अब तो भले पाकिट वाला दुध ले लिही... नहिते चंडी बंधा लिहीं फेर गाय गरू नइ पालय पोंसय ...उपराहा मा भले कुकुर पोंस लिहीं, फेर गाय गरू नइ पोसंय ...पहिली अंगना- दुवारी,कोठार-बियारा ला गोबर ले लिपंय अब तो भइगे वहु मन सीमेंटेड हो गे हावय...कुछु नेंग जोग बर गोबर के जरूरत रही ता मांगे जोगे ला पर जथे...अइसन हाल तो हो गे हाबे।
बीच मा गाय गरू मन ला सुरक्षा परदान करे खातिर शासन हा कुछ दिन एक ठन योजना घलो चलाय रिहिस जेकर अंतर्गत गोसंइया के आधार नम्बर ला सिदहा पशु के आई डी ले जोंड़ दे रिहिस अउ बिल्ला बनाके उंकर कान मा पहिरा दे रिहिस,जेकर माध्यम ले लवारिस घुमत हे,ते काकर गाय गरू हरे पता चल जावय अउ इही माध्यम ले लापरवाह गोसइयां मन उपर कार्यवाही घलो हो जात रहिस....अउ इही बहाना गोसंइया मन सावचेत घलो रहयं,...।फेर यहु नियम कानून चरदिनिया अउ फिसड्डी साबित होगे...।
पहिली के गोसंइया मन तो बरदी आय के बेरा गाय गरू ओइलाए ला लगही कहिके...कहुंचो गांव गंवतरी जाय रहितिस ता.....गाय गरू ओइलाना हे कहिके..एक झन सदस्य जरूर गोधुलि बेला मा वापिस घर आ जावय अउ गाय गरू मन ओइले हे ते नहीं देखय अउ नइ ओइले राहय ता पहटिया ल पुछ परख करयं के बरदी ला कते खार मा चराय बर लेगे रेहेस अउ कोई जघा गिर, हपट या बइठ तो नइ गे रिहिस ना? कहिके खोज खभर लेवयं अउ आज तो भइगे...।, ... आजकाल तो कइ झन गोसंइया मन, उंकर गाय गरू ला कोनो कांदीभूंस मा ओइला दे रहि ते ओला छोंड़ाय तक ला नइ जावय..।
पहिली गोसंइया मन गाय गरू ला घर ले गौठान छोंड़े बर जावय ता गाय गरू के नरी मा बंधाय घंटी,घुंघरू अउ खड़पड़ी के आवाज हा पुरा गांव भर गुंज जावय अउ इही घंटी अउ घुंघरू मन के आवाज सुन के बरदी ओइले के बेरा के आभास घलो गोसंइया मन ला हो जावय
.....गांव गांव मा अभी एक ठन समस्या घलो चलत हे...तेकर सेती घलो कतकोन गोसंइया मन अपन गाय गरू ला बेंचत अउ बरोवत हें.....
वो समस्या हरय... कतकोन गांव मा अब इंकर चरइया चरवहा घलो नइ मिलत हे...?काबर ए ते कोनजनी? हो सकत हे गोसंइया मन जेन जेवर देथें तेमा उंकर परिवार के भरन पोसन नइ हो पावत होही या उंकर गांव मा इनला चराय बर चरी नइ होही अउ कुछु आने कारन भी हो सकत हे..?
अब तो....कतकोन गांव मा गांव भर के गाय गरू के गोंसंइया मन के आरी पारी चराय वाले सिस्टम घलो चलत हे।
इंकर विषय मा एक ठन चिंतनीय अउ विडम्बना के विषय यहु घलो हे के एक छोर ले हमन सरकार ले गाय ला राष्ट्रीय पशु घोषित करे के मांग करत हन अउ दूसर छोर ले हमन गाय गरू ले दुरिहावत घलो जावत हन......लगथे!
अमृत दास साहू
ग्राम -कलकसा, डोंगरगढ़
जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)
मो.नं.- 9399725588

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

नाचा: मनोरंजन अउ जन जागरण के सशक्त माध्यम

 ओमप्रकाश साहू” अंकुर “
     धान के कटोरा छत्तीसगढ़ के लोक कला अउ संस्कृति के अलग पहचान हावय । हमर प्रदेश के लोकनाट्य नाचा, पंथी नृत्य, पण्डवानी, भरथरी, चन्देनी के संगे संग आदिवासी नृत्य के सोर हमर देश के साथ विश्व मा घलो अलगे छाप छोड़िस हे। पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे ,पण्डवानी गायक झाड़ू राम देवांगन, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे जइसन कला साधक मन हा छत्तीसगढ़ अउ भारत के नाम ला दुनिया भर मा बगराइस हवय. रंगकर्मी हबीब तनवीर के माध्यम ले जिहां छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार लालू राम (बिसाहू साहू),भुलवा राम, मदन निषाद, गोविन्द राम निर्मलकर, फिदाद बाई  मरकाम, माला बाई मरकाम हा अपन अभिनय क्षमता के लोहा मनवाइस. ये नाचा के नामी कलाकार मन हा एक समय नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के अगुवाई मा काम करे रिहिन हे ।मंदराजी दाऊ हा नाचा के पितृ पुरुष हरय. वो हा एक अइसन तपस्वी कलाकार रिहिस जउन हा नाचा के खातिर अपन संपत्ति ला सरबस दांव मा लगा दिस ।
नाचा अउ मंदराजी दाऊ
    नाचा के सियान मंदराजी दाऊ के जनम  1 अप्रैल 1911‌ मा संस्कारधानी शहर राजनांदगांव ले 5  किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव मा  एक माल गुजार परिवार मा होय रिहिस हे ।मंदरा जी के पूरा नांव दुलार सिंह साव रिहिस । 1922 मा ओकर प्राथमिक शिक्षा हा पूरा होइस।दुलार सिंह के मन पढ़ई लिखई मा नई लगत रिहिस । ओकर धियान नाचा पेखा डहर जादा राहय । रवेली अउ आस पास गांव मा जब नाचा होवय तब बालक दुलार सिंह हा रात रात भर जाग के नाचा देखय ।एकर ले
ओकर मन मा घलो चिकारा, तबला बजाय के धुन सवार होगे. वो समय रवेली गांव मा थोरकिन लोक कला के जानकार कलाकार रिहिस । ऊंकर मन ले मंदराजी हा
चिकारा, तबला बजाय के संग गाना गाय ला घलो सीख गे । अब मंदरा जी हा ये काम मा पूरा रमगे ।वो समय नाचा के कोई बढ़िया से संगठित पार्टी नइ रिहिस । नाचा के प्रस्तुति मा घलो मनोरंजन के नाम मा द्विअर्थी संवाद बोले जाय ।येकर ले बालक दुलार के मन ला गजब ठेस पहुंचे ।
 1928-29 मा रवेली नाचा दल के गठन
     मंदराजी दाऊ हा अपन गांव अउ आस -पास के लोक कलाकार मन ला लेके 1928-29 मा रवेली नाचा पार्टी के गठन करिस ।ये दल हा छत्तीसगढ़ मा नाचा के पहिली संगठित दल रिहिस ।वो समय खड़े साज चलय । कलाकार मन अपन साज बाज ला कनिहा मा बांधके अउ नरी मा लटका के नाचा ला करय ।
 मंदराजी के नाचा डहर नशा ला देखके वोकर पिता जी हा अब्बड़ डांट फटकार करय ।अउ चिन्ता करे लगगे कि दुलार हा अइसने करत रहि ता ओकर जिनगी के गाड़ी कइसे चल पाही । अउ एकर सेती ओकर बिहाव 14 बरस के उमर मा दुर्ग जिले के भोथली गांव (तिरगा) के राम्हिन बाई के साथ कर दिस ।बिहाव होय के बाद घलो नाचा के प्रति ओकर रुचि मा कोनो कमी नइ आइस ।शुरु मा ओकर गोसइन हा घलो एकर विरोध करिस कि सिरिफ नाचा ले जिनगी कइसे चलही पर बाद मा
वोकर साधना मा बाधा पड़ना ठीक नइ समझिस ।अब वोकर गोसइन हा घलो वोकर काम मा सहयोग करे लगिन अउ उंकर घर अवइया कलाकार मन के खाना बेवस्था मा सहयोग करे लगिन ।
खड़े साज के जगह बइठे साज शुरू
      सन् 1932 के बात हरय ।वो समय नाचा के गम्मत कलाकार सुकलू ठाकुर (लोहारा -भर्रीटोला) अउ नोहर दास मानिकपुरी (अछोली, खेरथा) रिहिन हे ।कन्हारपुरी के माल गुजार हा सुकलू ठाकुर अउ नोहर मानिकपुरी के कार्यक्रम अपन गांव मा रखिस ।ये कार्यक्रम मा मंदरा जी दाऊ जी हा चिकारा बजाइस ।ये कार्यक्रम ले खुश होके दाऊ जी हा सुकलू अउ नोहर मानिकपुरी ला शामिल करके रवेली नाचा पार्टी के ऐतिहासिक गठन करिस ।अब खड़े साज के जगह सबो वादक कलाकार बइठ के बाजा बजाय लागिस ।
चिकारा के जगह हारमोनियम  के चलन शुरू
     सन् 1933-34 मा मंदराजी दाऊ अपन मौसा टीकमनाथ साव ( लोक संगीतकार स्व. खुमाम साव के पिताजी )अउ अपन मामा नीलकंठ साहू के संग हारमोनियम खरीदे बर कलकत्ता गिस ।ये समय वोमन 8 दिन टाटानगर मा  घलो रुके रिहिस ।इही 8 दिन मा ये तीनों टाटानगर के एक हारमोनियम वादक ले हारमोनियम बजाय ला सिखिस ।बाद मा अपन मिहनत ले दाऊजी हा हारमोनियम बजाय मा बने पारंगत होगे । अब नाचा मा चिकारा के जगह हारमोनियम बजे ला लगिस ।सन् 1939-40 तक रवेली नाचा दल हमर छत्तीसगढ़ के सबले प्रसिद्ध दल बन गे रिहिस ।
1943-44 मा बड़का कलाकार मन ले सजगे रवेली नाचा दल
      सन् 1941-42 तक कुरुद (राजिम) मा एक बढ़िया नाचा दल गठित होगे रिहिस ।ये मंडली मा बिसाहू राम (लालू राम) साहू जइसे गजब के परी नर्तक रिहिन हे । 1943-44 मा लालू राम साहू हा कुरुद पार्टी ला छोड़के रवेली नाचा पार्टी मा शामिल होगे ।इही साल हारमोनियम वादक अउ लोक संगीतकार खुमान साव जी 14 बरस के उमर मा मंदराजी दाऊ के नाचा दल ले जुड़गे ।खुमान जी हा वोकर मौसी के बेटा रिहिस ।इही साल गजब के गम्तिहा कलाकार मदन निषाद (गुंगेरी नवागांव) पुसूराम यादव अउ जगन्नाथ निर्मलकर मन घलो दाऊजी के दल मा आगे ।अब ये प्रकार ले अब रवेली नाचा दल हा लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, खुमान लाल साव, नोहर दास मानिकपुरी, पंचराम देवदास, जगन्नाथ निर्मलकर, गोविन्द निर्मलकर, रुप राम साहू, गुलाब चन्द जैन, श्रीमती फिदा मरकाम, श्रीमती माला मरकाम जइसे नाचा के बड़का कलाकार मन ले सजगे ।
जन जागृति ले अंग्रेज सरकार बौखलाइस  
     नाचा के माध्यम ले दाऊ मंदराजी हा समाज मा फइले बुराई छुआछूत, अज्ञानता,दिखावा,बाल बिहाव के विरुद्ध लड़ाई लड़िस अउ लोगन मन ला जागरुक करे के काम करिस ।नाचा प्रदर्शन के समय कलाकार मन हा जोश मा आके अंग्रेज सरकार के विरोध मा संवाद घलो बोलके देश प्रेम के परिचय देवय ।अइसने आमदी (दुर्ग) मा मंदराजी के नाचा कार्यक्रम ला रोके बर अंग्रेज सरकार के पुलिस पहुंच गे रिहिस । वोहर मेहतरीन, पोंगा पंडित गम्मत के माध्यम ले छुआछूत दूर करे के उदिम, ईरानी गम्मत मा हिन्दू मुसलमान मा एकता स्थापित करे के प्रयास, बुढ़वा बिहाव के माध्यम ले बाल बिहाव अउ बेमेल बिहाव ला रोकना, अउ मरानिन गम्मत के माध्यम ले देवर अउ भौजी के पवित्र रिश्ता के रुप मा सामने लाके समाज मा जन जागृति फैलाय के काम करिस ।
1940 से 1952 तक तक रवेली नाचा दल के भारी धूम रिहिस ।
दाऊ रामचंद्र देशमुख हा देहाती कला विकास मंडल के  गठन करिन
रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के विलय होगे
      सन् 1952 मा फरवरी मा मंड़ई के अवसर मा पिनकापार (बालोद )वाले दाऊ रामचंद्र देशमुख हा रवेली अउ रिंगनी नाचा दल के प्रमुख कलाकार मन ला नाचा कार्यक्रम बर नेवता दिस । पर येमा दूनो दल के संचालक सामिल नइ रिहिन हे । अइसने 1953 मा घलो होइस ।ये सब परिस्थिति मा रवेली अउ रिंगनी (भिलाई) हा एके मा शामिल (विलय) होगे ।एकर संचालक लालू राम साहू ला बनाय गिस ।मंदराजी दाऊ येमा सिरिफ वादक कलाकार के रुप मा शामिल करे गिस । अउ इन्चे ले रवेली अउ रिंगनी दल के किस्मत खराब होय लगिस ।रवेली अउ रिंगनी के सब बने बने कलाकार दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा संचालित छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल मा शामिल होगे ।
  नाचा कलाकार मन उपर रंगकर्मी तनवीर के नजर
     जब छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल के कार्यक्रम सप्रे स्कूल रायपुर मा होइस ।ये कार्यक्रम हा गजब सफल होइस ।ये कार्यक्रम ला देखे बर प्रसिद्ध रंगककर्मी हबीब तनवीर हा आय रिहिस ।वोहर उदिम करके रिंगनी रवेली के कलाकार लालू राम साहू, मदन लाल निषाद, ठाकुर राम, बापू दास, भुलऊ राम, शिवदयाल मन ला नया थियेटर दिल्ली मा शामिल कर लिस ।ये कलाकार मन हा दुनिया भर मा अपन अभिनय ले नाम घलो कमाइस अउ छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के सोर बगराइस । पर इंकर मन के जमगरहा नेंव रवेली अउ रिंगनी दल मा बने रिहिस ।
नाचा के सउक मा जमीन - जायदाद बेचागे
       एती मंदरा जी दाऊ के घर भाई बंटवारा होगे ।वोहर अब्बड़ संपन्न रिहिन हे।वोहर अपन संपत्ति ला नाचा अउ नाचा के कलाकार मन के आव -भगत मा सिरा दिस ।दाऊ जी हा अपन कलाकारी के सउक ला पूरा करे के संग छोटे -छोटे नाचा पार्टी मा जाय के शुरु कर दिस । धन- दउलत कम होय के बाद संगी साथी मन घलो छूटत गिस । वोकर दूसर गांव बागनदी के जमींदारी हा घलो छिनागे ।स्वाभिमानी मंदरा जी कोनो ले कुछ नइ काहय ।
मंदराजी दाऊ ला नाचा मा वोकर अमूल्य योगदान खातिर  जीवन के आखिरी समय मा भिलाई स्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा मई 1984 मा सम्मानित करिस । अंदर ले टूट चुके दाऊ जी सम्मान पाके भाव विभोर होगे ।
 सम्मानित होय के बाद सितंबर 1984 मा अपन दूसर गांव बागनदी के नवापारा (नवाटोला)मा पंडवानी कार्यक्रम मा गिस । इहां वोकर तबियत खराब होगे ।वोला रवेली लाय गिस । 24 सितंबर 1984 मा नाचा के ये पुजारी हा अपन नश्वर शरीर ला छोड़के सरग चल दिस ।
स्व. मंदरा जी दाऊ हा एक गीत गावय – “
      दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है “.दाऊ जी हा अपन दउलत गंवा के नांव कमाइस ।
 मंदराजी के जन्म दिवस 1 अप्रैल के दिन हर साल 1993 से लगातार मंदरा जी महोत्सव आयोजित करे जाथे ।1992 मा ये कार्यक्रम हा कन्हारपुरी मा होय रिहिस ।जन्मभूमि रवेली के संगे -संग कन्हारपुरी मा घलो मंदराजी दाऊ के मूर्ति स्थापित करे गेहे ।वोकर सम्मान मा छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक कला के क्षेत्र मा उल्लेखीन काम करइया लोक कलाकार ला हर साल राज्योत्सव मा मंदराजी सम्मान ले सम्मानित करे जाथे ।
 नाचा मा मटेवा (अर्जुन्दा, बालोद) के पार्टी के गजब सोर चलिस. येमा झुमुक दास बघेल अउ निहाईक दास मानिकपुरी जइसे अद्भुत कलाकार रीहिन हे. हमर छत्तीसगढ मा नाचा के कतको नामी नाचा दल हे.

          
                      ओमप्रकाश साहू” अंकुर “
ग्राम + पोष्ट – सुरगी (हाई स्कूल के पास)
तहसील + जिला – राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

साहित्य के मुकुट हावै मुकुटधर

 "साहित्य के मुकुट हावै मुकुटधर"

    
        30 सितंबर 1895 के महान साहित्यकार मुकुटधर पांडे के अवतरन होए रहिस। आचार्य रामचंद्र शुक्लजी अपन किताब हिन्दी साहित्य के इतिहास म लिखिन कि हिन्दी साहित्य के 'छायावाद' के नामकरता  कवि 'मुकुटधर' रहिन। दादा सालिगराम के अँगना म महतारी देवहुति देवी के आठ सपूत होइन। जेमा सबले नानकुन रहय हमर मुकुटधर जी। बिद्वान पिता पंडित चिंतामणि पांडे अऊ भई पंडित लोचन प्रसाद पांडे ले ओकर जीवन अब्बड़ परभावित रहीस। मुकुटधर जी द्विवेदी युग अउ छायावादी युग के संक्रमन कबि रहीन । महानदी तीर म बसे ओकर गांव जगन्नाथ पूरी जवईय्या साधु संत मनके रद्दा राहेय। ओकर पूरा असर बालक मुकुरधर म आईस। प्रकृति, प्रेम अउ भक्ति के त्रिवेणी हावै ओकर कविता। परमात्मा के छवि ला कण-कण में अनुभव कराथे ओकर कविता। छायावाद के कविता म जादुई एहसास रईथे। पांडे जी प्रकृति, भक्ति अउ प्रेम ला अइसे घुला मिला दिन हे कि ओला अलग करना संभव नईए।

    "जीवन जल बुद बुद सा भंगुर जान ।
    तन मन धन से कर लो जन कल्याण।"

      कविता के बहुत सुंदर व्याख्या पांडे जी करिन हे। पांडेजी कविता ल सरसती दाई के परसाद मानथें। कविता अंतस के पुकार आए, दूधमुहा लईका के छलरहित हांसी म कविता रईथे।कविता अमरित भरे घटा आए। रामभक्ति म कवि पांडेजी सराबोर रईथें। कवि के देशप्रेम ले लबालब गीत मन प्रेरणा देथें। जागरण के संदेश देवत ओकर कविता - भारत मां , प्रभाती चेतना, प्रार्थना पंचक, उठो चेतो, कुंडलिया, गांधी के प्रति म देश भक्ति के राग हावै। धरती महतारी के बीर सपूत किसान ऊपर पांडे जी के भारी मया रहय। लिखथें-
    
   "सरल स्वभाव कृषक के हल में
    पतिव्रता रमणी के बल में
    श्रम सीकर से सिंचित धन में
    संशय रहित भिक्षु के मन में
    कवि के चिंता पूर्ण वचन में
    तेरा मिला प्रमाण। "
 
    रितु बरनन के कविता घलो पांडे जी के लेखनी के बिशेषता रहे हे। भोंभरा तिपत गरमी करलई मचावत हे, लिखथें -

  " पर गरीब, निर्धन सकल
    सहते रवि का ताप
    कोस रहे हैं कर्म को
    करते पश्चाताप ।।
    लगी आग पुर ग्राम में
    चिंता बढ़ी अपार
    नर नारी व्याकुल बसे
    भय सदैव उर धार।।"

सिसिर रितु मा कविता लिखथें-

   "धनिकों को है मौज रात दिन
    हैं उनके पौ बारे ,
    दीन दरिद्र के मत्थे ही पड़े
    शिशिर दु:ख सारे।।"

       साहित्य अउ पुरातत्व के बिद्वान बड़का भईदा लोचन प्रसाद पांडे के प्रेरना लेके भाववादी कविता के रद्दा म आगू बढ़ीन। मुकुटधर जी गीतांजलि के पीरा, बाबू भारतेन्दू के हाड़तोड़ मेहनत ल परनाम घलो करथे।कविता के नवा धारा म नवा नवा प्रयोग करईया कवि मन के आगू डांड़ म रहीन मुकुटधर जी।
        पांडेजी के प्रसिद्ध चार कविताएँ "कुररी के प्रति" छायावाद के अधार बनाईस। आधा रात के बिदेशी चिरई कुररी ल रोवत सुनके ओकर हिरदे ले करूना के अईसने धार फूटे लागिस कि महानदी के तट ले हिन्दी म नवा वाद के धारा बोहागे। डॉ. बलदेव बिरह ले व्याकुल कुररी चिरई ल परमात्मा के मिलन बर व्याकुल आत्मा के प्रतीक मानथे। जईसनफूओकर लौकिक मया हर अलौकिक बन जाथे। कोनों मयारूक रमणी हर ओकर हिरदे ल कचोट के छायावाद ल आकार देथे। अउ रहस ले भरे पड़े हें मुकुटधर के कविता।

   "अंधकार में दीप जलाकर
    किसकी खोज किया करते हो
    तुम खाद्योत क्षुद्र हो तब फिर
    क्यों ऐसा दंभ भरा करते हो?"

      छत्तीसगढ़ी बर घलो ओकर मन म पूरा सम्मान रहीस। महानदी बर लिखे ओकर कविता  अब्बड़ प्रसिद्ध आए। "कुररी के प्रति" मील के पथरा कस आए, ऐमा लिखथें-
 
  " विहग विदेशी मिला आज तू
    बहुत दिनों के बाद
    तूझे देखकर फिर अतीत की
    आई मुझको याद।।"

      "कुररी के प्रति" के तीन कविता हमर अनमोल धरोहर आए। डाॅ.बलदेव साव बताथें कि एकर एक ठ अउ भाग चार हावै जेखर नाम "अगहन में" हावै। एहर पांडे जी के अप्रकाशित रचना आए। "कुररी के प्रति" साहित्य जगत म अमर रचना बनगे। अइसने पांडे जी के छायावाद के चार निबंध घलो हिंदी साहित्य के इतिहास म अपन अलगेच महत्व रखथे।
         हमर छत्तीसगढिया मनखे मन सादा जीवन ल महत्व देथें। गांव के हरियाली ओला सुहाथे। सुख दुख ल साझा करत, हांसत गोठिआवत, परोसी के चारी करईया घलो ओकर दुख म आघू आ जाथे, अईसन हमर छत्तीसगढ़िया गांव के कतका सुघ्घर चित्र गढे़ हे पांडेजी-
   "गोधन चरते कैसे सुंदर, गलघंटी बजती सुख मूल,
    चरवाहे फिरते हैं सुख से, देखो ये तटनी के कूल।
    ग्राम्य जनों को लभ्य सदा, सब प्रकार सुख शांति अपार
    झंझट हीन बिताते जीवन, करते दान धर्म सुखसार।"

      कविता, कवि, अउ ओकर चरित, भाषा, कविता म रसवाद, हिन्दी में छायावाद, रितु बरनन, भविष्य म हिन्दी के रूप जईसन कतको बात ल रखिन। हिन्दी के संगो-संग छत्तीसगढी के मान बढ़ाईन। कविता ल नियम कानून म बांधके रखना ठीक नईए। मौलिकता तो कबिता के स्वतंत्रता म आए। पांडेजी कविता म भाव ल महत्व देथें। साधारन दिखत वस्तु घलो अपन आप म असाधारन होथे। पांडेजी आध्यात्म ल छायावाद ले बखूबी जोड़े हावै। छत्तीसगढ़ के संस्कारधानी, कला और संस्कृति के नगरी रायगढ़ ले ओखर संबंध रहिस। जीवन के माझा बसंत मन मा लेखनी कछु कारन से रूक गिस। कतका सरम के बात आए कि कन्हू कन्हू साहित्यकार मन ओला जीयते जीयत स्वर्गीय मान ले रिहिन। पाछू सन् 1976 म भारत सरकार पद्मश्री देके अब्बड़ सम्मान दिन। ओ समय ओखर लेख, कबिता सब्बो अंते तंते हो गए रहैं । पांडेजी रायगढ़ म अपन जीवन के आखिरी पड़ाव म रहीन। बडभागी जांजगीर के नरियरा म जनमें डाॅ. बलदेव तभे रायगढ़ म ओखर परोसी रहें। आगू आईन अउ देशभर म बगरे प्रकासित- अप्रकासित पांडे जी के रचना मन ल अपन खर्चा ले संजोईन। बलदेव जी सन् 1983-84 म "विश्वबोध" अउ "छायावाद और श्रेष्ठ निबंध" के संपादन करके पुन्य के भागी बनिन। खाली किताब के संपादन नई बल्कि ओखर समीक्छा घलो करके फिरसे जीवन दे दिन। आज पांडेजी अऊ बलदेवजी दूनों संसार म नईए, लेकिन ओमन जे काम साहित्य म करिनहे, तेकर सेती हमन सुरता करथन। आदमी अपन काम से जाने जाथे। एक साहित्यकार के आत्मा ओखर रचना म बसथे।
            30 सितम्बर मुकुटधर पांडे जी के जनमदिन आए। 6 नवंबर 1989 के दिन महाकाल म समागईन। पं० रविशंकर विश्‍वविद्यालय घलौ मुकुटधर जी ल मानद् डी०लिट की उपाधि प्रदान करिन। ए लेख ओखर सुरता म लिखे हव। ओखर जईसने लेखनी के साधक दूरलभ रईथे। कम लिखव फेर अच्छा लिखव जेहर अमर हो जाए,अइसन संदेश ह
म सबला मिलथे। जय जोहार।

   - डाॅ. वंदना जायसवाल
     व्याख्याता हिन्दी
शा.उच्च मा.शा.मंद्रागोढ़ी,
तह.-मालखरौदा,जिला-सक्ति (छ.ग.)
क्रम से -डाॅ. बलदेव एवं पं.मुकुटधर पाण्डेय👆🏻

पितर के महत्व

रतिया के जेवन करत गोलू के डोकरी दाई कइथे बहू काली थोकिन बने दार ला फिलोबे तोर ससुर ल उरीद दार के बरा भारी सुहाये अउ गोलू तँय काली बिहनिया ले उठ के इसकूल कोती के बखरी ले तोरई पाना अउ एकात दु ठन तोरई टोर के लान लेबे। हँव दाई फेर बरा अउ तोरई पान कही तिहार हे का वो काली। हँव बेटा काली तोर बबा आही रे। बबा आही फेर बबा तो भगवान घर चल देहे का वो, वो कइसे आही। आथे बेटा येदे साल मा गनेस पक्ष के बुलकती 15 दिन पितर पाख अइसे समय रइथे जेमा दुनिया के जम्मो मनखे जेन मर के देवता होगे रइथे ओमन इही 15 दिन म एक न एक दिन आथे अउ परसाद पाथे। बने बता न वो डोकरी दाई।

बेटा पितर पाख कुँवार महीना के अंधयारी मा आथे। जेन 15 दिन ले रइथे इही 15 दिन यमराज के द्वार खुल्ला रइथे। ये महीना म मरथे तेन मन सीधा सरग म जाथे कइथे फेर चाहे वो कतको पापी अधर्मी भले रहय। पहिली दिन बाबू जात मन आथे बेटा जेन पूरा जिनगी जिये के बाद या आपातकाल म मरे रइथे, अपन हाथ म गलती करे रइथे ओमन तेरस अउ चौदस तक आथे अउ कोनो बाचे खोचे मन पंचमी, छठ, साते आठे कोनो दिन आ जाथे नवमी बस ल छोड़ के। काबर नवमी के महतारी जात मन आथे फेर ओ कइसनो मरे रहय। पन्द्रवा दिन हा पितर खेदा रइथे, ये दिन सब पुरखा मन अपन अपन धाम वापिस चल देथे। गोलू हमर कका जहर पीके मरे रिहिस दाई , वोहा तेरस के आही वो नेत म। हँव तोर कका तेरस के अउ तोर बबा पहिली दिन आही। वो तो ठीक हे दाई फेर बरा भात ल कइसे खाही वो??! हमर परंपरा हे बेटा बिहनिया ले मुहाटी ल लिप बहार के पीढ़हा ऊपर एक लोटा पानी अउ मुखारी ल रख देथन नेवता देवत तरिया नहाये ल जाथन त फिलोये दार ल धोके संग म पांच पसर पानी देथन पुरखा के नाँव ले अउ घर म आके बरा सोहारी भात के हूम जग देके घर के बाहिर तोरई पान म हूम दे वाला भात रख देथन ओला चिरई चुरगुन कुकुर मन खाथे त ये मान के चल की हमर पुरखा मन परसाद पागे अउ संग म उहि मे के थोक-थोक परसाद हमू मन पाथन त समझ हमू मन ल हमर पुरखा के आशीष मिलगे। इही हमर छत्तीसगढ़ी परंपरा आये बेटा। जा बेटा सूत जा काली बिहनिया ले सुरता करके में केहेंव ओला लानबे अउ अपन बबा ल बने सुमर के बलाबे काबर तिहि ओकर अंश आस।

कुँवार महीना अंधयारी, पितर  पाख ह  आथे।
लिपा पोता  के  अँगना, रंगोली  चउक  पुराथे।
एक  लोटा  पानी  संग, पानफूल  अउ मुखारी।
नेंगहा जोरत पुरखा के, घर-घर  सुरता  धराथे।

पितर म पहली  दिन, हमर बाबू बबा मन आहि।
रंग-रंग के रोटी पीठा, बरा सोहारी परसाद पाहि।
नवमी के दाई महतारी मन ल जल तरपन करथे।
पुरखा मनके नाव होही,नंगत के रोटी पीठा छरथे।

जियत म कदर नइये, दाई बाबू बर करथे  दंगा।
पितर म तारले पुरखा ल, पाप धोले जाके गंगा।
बर मान्यता हे परब के, सरग के दुवार खुले रइथे।
कुंवार महीना के अंधयारी म पितर पाख ह रइथे।
✍️राज साहू✍️
 नगर पंचायत समोदा
6263232143

शंकर शाह, रघुनाथ शाह

  
        1857 के करांति मा अपन परान तियाग करइया बीर राजा शंकर शाह अउ ओकर बेटा रघुनाथ शाह, गढ़ा मंडला(मध्यप्रदेश) अउ गोंड राजवंश के परतापी राजाम्बत शाह के वंशज रिहीस। इहां के राजवंश के सिलालेख मा देश अउ अपन आत्मसनमान के खातिर परान गंवईया ला देखे जा सकत हे। राजाम्बत शाह (1488-1543) के बड़े बेटा दलपत शाह के पत्नी रानी दुर्गावती अउ बेटा वीरनारायण अपन धरती के सनमान बर रक्छा करत अकबर सेना ले जुझत जुद्द मा बलिदान दे दिस।
शंकर शाह के बबा गोंड राजवंश के आखरी परसिद्ध सासक राजा निजाम शाह अउ ददा राजा सुमेंद शाह (1715) रिहिस।(पाछू पेसावा मुगल काल)
राजा शंकर शाह अउ कुंवर रघुनाथ शाह दुनो गजब बीर, संत, अउ बढ़िया कवि रिहिस। कविता के माध्यम ले लोगन मन मा देश परेम के भाव जगा के देश रक्छा के परचार करे। अंगरेजन के खिलाफ लिखे कविता -
खुद गौड़ दुष्टन को शत्रु संहारिका,
मार अंग्रेज रेज का देह मात चण्डी,
बचे नहीं बैरी बाल बच्चे संहारिका।
शंकर की रक्षा कर दास प्रतिपालका,
दिन की सुन आये मीत कालका
मच्छन कर तत्छन धौर मात कालका।
ये कविता के सार ए रिहीस कि अंग्रेजन ला समूल नास कर देवव।
वो बेखत अंगरेजी लेफ्टिनेंट जनरल - क्लार्क मण्डला सेत्र मा बहुते अतियाचार, लूटपाट, हहाकार मचावत रिहिस। (अंगरेजन _मंडला, झांसी, नागपुर, अवध रामगढ़ कानपुर ला अपन संग संघेरना चाहत रिहीन) राजा शंकर शाह जनता अउ जमींदार मन ला साथ लेके अंगरेज ले भिड़े बर एलान कर दिस।
    वोती क्लार्क हर अपन जासूस ला साधु भेस मा शंकर शाह के तइयारी खबर लेय बर गढ़पुरबा महल मा भेज दिस। राजा धरम परेमी रिहिस बहिरूपिया साधु मनके आदर सतकार करेके के संगे - संग अजादी मा सहियोग करे बर निवेदन करिस। राजा जुद्ध के योजना ला जनता संग साधु मनकरा फोरियाके गोठियादिस। फेर उही साधु मन 52वी रेजिमेंट के क्लार्क ला जाके बता देइस।
अंगरेज तुरते 14 सितम्बर1857 के रात गढ़पुरबा महल ला चारोमुड़ा ले घेर लेइन, शंकर शाह,अउ बेटा रघुनाथ शाह ल धरबाँध के लेगइन। सैनिक महल के तलासी करिस त चिट्ठी -परची मिलीस जेमा एक परची मा शंकर शाह अपन कुल देबी, मालादेबी ला बंदन करत अंगरेज के नास करे के बात लिखे रिहीस।
 लेफ्टिनेंट जनरल क्लार्क हर बाप - बेटा ला जेल मा बंद करदिस,देशद्रोही, सड़यंत्र रचे के आरोप मा मउत के सजा सुना दिस। अंगरेज दुनो झन ला फाँसी देना चाहत रिहिस, शंकर शाह, रघुनाथ शाह बुधियार रहिस ओमन कहिन - हमन कोनो, चोर, डाकू, लुटेरा थोरे हरन, हमला फाँसी नहीं जनता के बीच तोप मा बाँधके उड़ाए जाय।
   18 सितंबर 1857 के दिन बाप - बेटा के कहे मुताबिक  एजेंसी हाऊस के आगू मा लाने गिस। आसपास के देखइया मनके के भारी भीड़ लग गे।
राजा अउ राजकुमार के खिले चेहरा,सांत,तेज मजबूत, गौरव के भाव। तोप के आगू मा साती तानके खड़े होगे। सरीर के अंग - अंग,चिथड़ा - चिथड़ा 50 फिट दुरिहा -दुरिहा फेंकागे ।
  बाद मा शंकर शाह के पत्नी फुलकुंवर अउ बहु मानकुंवर चिथड़ा मास ला उठाके अंतिम किरिया करम करके अंग्रेजन ले बदला लेय के कसम खाइन। दूनो राजा के बलिदान होय के बाद महाकौसल सेत्र के जनता मा जब्बर बिद्रोह भड़कगे। बाद मा इही मंडला,जबलपुर के खैरी के लड़ई मा रानी अवंती बाई लोधी(1831- 1858)हर ब्रिटिश सासन ले जनतामन ला छोड़ाइस। ये सेत्र के जम्मो करांती मा राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह, रानी अवंती बाई लोधी जइसन बीर बिरांगना मन अपन बलिदान देइस।
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      मदन शाह मंडावी
ढारा, डोंगरगढ़ राजनांदगांव

बुधवार, 14 अगस्त 2024

ममता, दया और करूणा की प्रतिमूर्ति मिनीमाता

 

प्रो. अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ में अनेक महान लोगों ने जन्म लेकर ऐसे सद्कार्य किया जिसके कारण आज भी उन्हें श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। पंडित सुंदरलाल शर्मा, डॉ. खूबचंद बघेल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह और क्रांतिकुमार भारती जैसे महान क्रांतिकारी, पंडित रविशंकर शुक्ल, बैरिस्टर छेदीलाल जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और छत्तीसगढ़ के हित साधक ममतामयी, सहृदय, दया और करूणामयी मिनीमाता भी एक थी। मिनीमाता का जन्म असम के नुवागांव जिले के जमुनामुख में 15.03.1916 को ऐसे समय में हुआ जब छत्तीसगढ़ में भीषण अकाल के कारण ऐसे अनेक परिवार जीविका की तलाश में मजदूरी करने असम गये और अनेक प्रकार के कष्टों के बीच मजदूरी करते जीवनयापन कर रहे थे। उनकी माता का नाम देवमती और पिता का नाम बुधारी महंत था। वास्तव में उनका परिवार मूलतः अविभाजित बिलासपुर जिले (अब कबीरधाम जिला) के पंडरिया जमींदारी के अंतर्गत सगोना का निवासी था। सन् 1901 से 1910 के बीच जब छत्तीसगढ़ में भीषण आकाल पड़ा जिससे बहुत से गरीब परिवार जीविका की तलाश में छत्तीसगढ़ छोड़कर असम के चाय बगानों में काम करने चले गये।

मिनीमाता के नाना का परिवार छत्तीसगढ़ में अकाल के दौरान असम के चाय बगान कैसे पहुंचा इसका मार्मिक चित्रण लोकप्रिय साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने किया है। उनके अनुसार सगोना का मालगुजार परिवार इस अकाल से त्रस्त होकर जीविका के लिए अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ असम के चाय बगानों में काम की तलाश के लिए बिलासपुर आ गया। यहां के रेल्वे स्टेशन में सरकारी किचन से उन्हें खाना मिला। खाना खाकर वे वहीं सुस्ता रहे थे कि मजदूर ले जाने वाले ठेकेदार ने उन्हें मजदूरों के साथ असम ले जाने के लिए साथ में ले लिया। ट्रेन कलकत्ता भी नहीं पहुंची थी कि उनकी एक बेटी की मृत्यु हो गई। अकाल से पीड़ित परिवार में पति पत्नी के अलावा ये तीन बेटियां ही थी जिनमें से एक बेटी ने मृत्यु का वरण कर लिया था। उन्हें ढाढस बंधाने वाला भी कोई नहीं था। मां-बाप ने तय किया कि सामने वाली गंगामाई को चलती ट्रेन से प्रणाम कर माटी के चोला को सौंप देंगे। गंगा नदी का चौड़ा पाट देर से दिखा। थरथराते हाथों से बच्ची के शव को पिता ने विलाप करते हुए चलती ट्रेन से गंगा को सौंप दिया ... ‘मिला लेबे महतारी।‘ गुरू घासीदास का संदेश- ‘माटी के चोला, माटी के काया, के दिन रहिबे, बता दे मोला ...।‘ रेल के डिब्बे में बैठे लोग भी इस दृश्य को देखकर हिल गये थे। बच्ची की मां बेसुध होकर पड़ी थी। लेकिन सब कुछ सामान्य था। कलकत्ता पहुंचकर सबने ट्रेन बदली और चल पड़े असम की ओर...। पद्मा नदी पास आ रही थी और पहली बेटी की तरह दूसरी बेटी ने भी साथ छोड़ दिया ... और पहली बेटी की तरह पिता ने उन्हें भी कांपते हाथों से रोत बिलखते पद्मा नदी को सौंप दिया। कबीर की वह व्यवस्था भी नहीं बन सकी जो आखरी बिदाई के संदर्भ में प्रचलित है -
‘चार हाथ चरगज्जी मंगाये,
चढ़े काठ के घोड़ा, अऊ घोड़ा जी,
चार संत तोहे बोहिके लेंगे .......।‘
ऐसा कुछ भी नहीं हुआ दोनों बेटी के लिए, न चरगज्जी मंगाई जा सकी, न काठ के घोड़े में बिटिया को चढ़ाया जा सका और न ही चार संत मिले जो उन्हें कंधे में लेकर श्मशाम तक जाते। डॉ. वर्मा जी आगे लिखते हैं, सत्य मार्ग के पथिक पिता ने गुरूजी से संबल मांगा-
‘सत्य में हे धरती, सत्य में अकास हो,
सत्य में हे चंदा, सत्य में परकास हो।
सत्य में तर जाही संसार,
अमरित धार बोहाई दे,
होई जाही बेड़ा पार,
सतगुरू महिमा दिखाई दे....।‘
अब उनकी गोद में केवल एक बेटी, छै वर्षीया बेटी ‘देवमती‘। संयोग देखिये कि असाम पहुंचकर देवमती के माता पिता भी ज्यादा दिन जीवित नहीं रहे और परलोक सिधार गये। भरे पूरे संसार में तब देवमती को एक नये परिवार का साथ मिला। चाय के बगान में काम करते देवमती ने एक साथी मजदूर बुधारी को जीवन साथी बनाया और उन्हीं की बिटिया थी मिनीमाता। होलिका दहन के दिन 15 मार्च 1916 को एक बच्ची ने जन्म लिया जिन्हें सबने छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान के लिए जीवन समर्पित करने वाली मिनीमाता के रूप में जाना। उनका वास्तविक नाम ‘मीनाक्षी‘ था। जमुनामुख में ही मीनाक्षी ने शिक्षा में प्राप्त की। एक दिन सतनाम पंथ के गुरू अगमदास उनके घर पहुंचे। पूरा परिवार गुरू के आगमन से खुश हो उठा-
‘मोरे फूटे करम आज जागे हो साहेब।
मेरे अंगना म आइके बिराजे हो साहेब।।‘
गुरूजी के साथ राजमहंत, सेवादार सिपाही भी थे। गुरूजी का कोई पुत्र नहीं था। गद्दी के अधिकारी की चिंता गुरूजी को थी। उन्होंने अपनी चिंता मीनाक्षी की मां को बताया। गुरूजी के संकेत के महत्व को समझते हुए मां ने स्वीकृति दे दी। यह एक विलक्षण और इतिहास रचने वाला क्षण था। छत्तीसगढ़ के भाग्य को संवारने के लिए एक मां ने अपनी बेटी की यात्रा सही कदशा में मोड़ रही थी। ये वही मां थी जो अपने पिता के साथ छत्तीसगढ़ छोड़कर क्या आई कि सब कुछ छूट सा गया मगर गुरूजी के आदेश से फिर उसी धरती की ओर उनकी यात्रा मुड़ गई थी। परिवार सहित मीनाक्षी देवी छत्तीसगढ़ आ गई मिनीमाता के रूप में गुरूमाता बनकर। उनका छत्तीसगढ़ आगमन ऐसे दौर में हुआ जब पूरा देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था। गुरूजी अगमदास का घर स्वतंत्रता सेनानियों से भरा रहता था। रायपुर का वह घर स्वतंत्रता का अलख जगाने वाले सेनानियों का ऐसा किला था जहां रसद और अन्य सुविधा पर्याप्त मात्रा में थी। उनके बीच मीनाक्षी को ऐसा संस्कार मिला कि उन्होंने आजीवन खादी पहनने का व्रत ले लिया और उनके साथ इस आंदोलन में कूद पड़ी। गुरू परिवार की उदार परम्परा के अनुरूप निराश्रित और जरूरतमंदों को निरंतर संरक्षण देती रही। यहां के हर गांव को गुरू अगमदास अपना गांव मानते थे। मिनीमाता ने छत्तीसगढ़ में आकर उनकी सहृदयता, सरलता, निष्कपटता और समर्पण भावना को गहराई से समझा। सन् 1951 में गुरू अगमदास परलोक सिधार गये। उस समय वे सांसद थे। गुरू गद्दी और अवयस्क पुत्र विजयकुमार गुरू के साथ ही मिनीमाता को छत्तीसगढ़ की चिंता व्यथित कर रही थी। बहुत सी चुनौतियों को झेलते हुए गुरूजी के कामों को आगे बढ़ाने का निश्चिय किया। उन्हें असमिया, बांगला, अंग्रेजी, हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान था। उन्होंने न केवल सतनामी समाज का परिपोषण और संरक्षण नहीं किया बल्कि अन्य लोगों, श्रीकांत वर्मा जैसे साहित्यकार, कामरेड मुस्ताक, कवि मैथ्यू जहानी जर्जर, भंवरसिंह पोर्ते जैसे राजनेता और चंदूलाल चंद्राकर जैसे पत्रकार पर समान स्नेह रखती थी। उनकी ममता, दया और स्नेह जग जाहिर था। उनका द्वार सबके लिए खुला था। वे छत्तीसगढ़ की उदार और दिव्य मातृ परंपरा की पूंजी लेकर राजनीति में आई और सबकी लाडली बन गई।
सन् 1952 में वे सांसद बनकर दिल्ली पहुंची। वे 1952 से 1972 तक सारंगढ़, जांजगीर और महासमुंद लोकसभा क्षेत्र की सांसद रहीं। पंडित रविशंकर शुक्ल, महंत लक्ष्मीनारायण दास आदि प्रदेश के प्रथम पंक्ति के नेताओं के साथ काम किया। मिनीमाता ने बाबा साहेब अम्बेडकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा दी गई जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। छुआछूत मिटाने तथा अधिकार विहीन दलितों-पिछड़ों के हितों के लिए मिनीमाता ने एक ऐसा आंदोलन छेड़ा कि वे देश और प्रदेश में पूजनीय हो गई। देशी-विदेशी, स्वजातीय, ऊंच-नीच, धनी-गरीब सब पर एक समान व्यवहार करने वाली मिनीमाता के चमत्कारिक व्यक्तित्व से इंदिरा जी बेहद प्रभावित हुई। उनकी तेजस्विता तब सामने आई जब मुंगेली क्षेत्र के निरपराध सतनामियों की हत्या हो गई। करूणा और दया की प्रतिमूर्ति मिनीमाता उस दौर में ऐसा सिंहनाद किया कि दरिंदे भी कांप उठे। इस घटना के बाद उनकी सक्रियता और बढ़ गई। हर सताया हुआ समाज, दबा हुआ व्यक्ति और शोषित समुदाय मिनीमाता के आंचल की छांव चाहने लगा था। प्रसिद्ध पत्रकार राजनारायण मिश्र, राजनेता और साहित्यकार केयूर भूषण और पंथी कलाकार देवदास बंजारे मिनीमाता की सहृदयता, दूर दृष्टि और सहयोग की तारीफ करते थकते नहीं थे।
वास्तव में मिनीमाता समाज की गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ापन दूर करने में पूरा जीवन समर्पित कर दिया। मजदूर हितों और नारी शिक्षा के प्रति हमेशा जागरूक रहीं। बाल विवाह और दहेज प्रथा दूर करने के लिए समाज से संसद तक आवाज बुलंद किया। छत्तीसगढ़ में कृषि तथा सिंचाई के लिए हसदेव बांगों परियोजना उनकी दूर दृष्टि का परिचायक है। शासन उनके नाम पर इस परियोजना को ‘मिनीमाता हसदेव बांगों परियोजना‘ शुरू किया। उन्होंने भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए भरपूर प्रयास किया। यही नहीं बल्कि एक बार अपने रायपुर स्थित निवास में मजदूरों से पथराव कराकर शासन को स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए बाध्य किया था। उनकी सक्रियता और समझाइश से धर्मान्तरण पर भी प्रभाव पड़ा। अपने जीवन काल में उन्होंने हजारों लड़कियों को साहस के साथ अपना जीवन गढ़ने का मंत्र दिया। 11 अगस्त 1972 को एक हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उनके निधन से बेसहारा लोगों ने अपना मसीहा और प्रदेश ने एक सजग प्रहरी खो दिया। छत्तीसगढ़ शासन उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए कोरबा में शासकीय मिनीमाता कन्या महाविद्यालय, बलौदाबाजार में शासकीय मिनीमाता कन्या महाविद्यालय, राजनांदगांव में मिनीमाता शासकीय कन्या पालिटेकनिक महाविद्यालय, लोरमी में ममतामयी मिनीमाता कला एवं विज्ञान महाविद्यालय और बाल्को के कन्या स्कूल का नामकरण भी उनके नाम पर किया गया है। जांजगीर-बिलासपुर मार्ग में अकलतरा मोड़ में मिनीमाता की मूर्ति स्थापित कर मिनीमाता चौंक नाम रखा गया है। यही नहीं बल्कि महिला उत्थान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए मिनीमाता सम्मान छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा दिया जाता है। रामधारी सिंह दिनकर ने ठीक ही कहा है :-
‘तुमने दिया राष्ट्र को जीवन,
देश तुम्हें क्या देगा।
अपनी आग तेज रखने को,
तुम्हारा नाम लेगा।‘

‘‘राघव‘‘, डागा कालोनी चाम्पा (छ.ग.)

रामायण में काण्ड का नाम सुन्दर काण्ड क्यों?

 

आत्माराम यादव पीव 
 
महर्षि वाल्मीक रचित रामायण हो या गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित्र मानस, दोनों में बालकाण्ड,अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकाण्ड, उत्तरकाण्ड नामकरण कर रामकथा के प्रसंगों को इन काण्डों में समाहित किया है जिसमें सुंदरकाण्ड नामकरण किए जाने की विशेषताओं का रहस्य विरले ही समझ पाते है विशेषकर वे लोग जो नित्य प्रतिदिन सुंदरकाण्ड का पाठ करते है वे इससे भलीभाँति भिज्ञ है। “ रामायण जनमनोहरमादिकाव्यम”” रामायण जन जन को प्रिय है यह आदिकाव्य है जिसके सभी पात्र ओर उनकी कथायेँ सुंदर है इसलिए काण्ड का नाम सुंदरकाण्ड रखा गया। रामायण सबके मन में बसी होने से मनोहर है ओर सुंदरकाण्ड अत्यंत मनोहर ओर सर्वश्रेष्ठ है। सर्वश्रेष्ठ बतलाते हुये कहा है – “”सुंदरे सुंदरों राम: सुंदरे सुंदरी कथा। सुंदरे सुंदरी सीता सुंदरे किन्न सुंदरम। “” सुंदरकाण्ड में राम सुंदर है, सुंदर की कथाएँ सुंदर हैं, सुंदर में सीता सुंदरी है , सुंदर में क्या सुंदर नहीं है?  सुंदर में राम की कथा नहीं है, भक्त हनुमान की कथा ओर सीता की व्यथा हृदय को द्रवित कर देती है, यही सुंदरतम है, प्रश्न उठता है फिर सुंदरे सुंदरों राम: क्यो कहा गया है? सुंदर काण्ड के दो प्रमुख ओर प्रधान चरित्र है सीता ओर हनुमान। हनुमान तो भक्त है ओर सीता शक्ति है ओर राम शक्तिमान। श्रीराम सीता अभिन्न है उन्हे प्रथक करके नही देखा गया है, क्योंकि सीता के हृदय में राम बसे हैं ओर ऐसा कोई पल नहीं आया जब सीता ने राम को विस्मृत किया हो तथा हनुमान ने भी जो भी पराक्रम दिखाये, कही आभास नही होने दिया की वे उनके द्वारा किए गए है, अहंकाररहित हनुमान ने जो भी दुर्गम, दुर्जेय वीरोचित कार्य किए उस सभी कार्य का श्रेय उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को दिया है, यही सुंदर कथा है, जो सुंदरकाण्ड की शोभा बढ़ाती है।  
       रामायण के प्रत्येक काण्डों का नामकरण करते समय व्यक्तित्व, चरित्र, जीवन ओर स्थान विशेष प्रासंगिक रखे गए है जहां हरेक व्यक्तित्व के चरित्र व गुणों के प्रगट होते ही उनके गुणों की सर्वोत्तमता शिखर पर देखने को मिलती है। बालकाण्ड में राम के बचपन के बाल स्वरूप से ताड़का-सुबाहु वध, अहिल्या उद्धार, धनुष भंग कर सीता स्वंवर का चित्रण है तो उत्तरकाण्ड में रावण वध का चरित्र के पश्चात को विस्तार रूप दिया गया है।  अयोध्या काण्ड, अरण्यकाण्ड ओर किष्किंधा काण्ड में अयोध्या का उल्लेख, वन प्रदेशों का उल्लेख के आलवा किष्किंधा का उल्लेख है। राम ओर रावण के युद्ध को लंका काण्ड नाम दिया गया जबकि सुंदरकाण्ड इन सारे पहलुओ से प्रथक है ओर यह नाम सर्वथा उच्चासन पर होने से अन्य किसी कथा या प्रसंग सुंदरकाण्ड के आसन पर आसीन नही हो सका है। सुंदरकाण्ड में सभी के चरित्र है विशेषकर इसमें सीता ओर हनुमान की कथा सुंदर है। सीता शक्ति है ओर राम शक्तिमान है।  शक्ति ओर शक्तिमान के अनन्य भक्त हनुमान है। शक्तिस्वरूप सीता का हृदय श्रीराम को नहीं छोड़ सकता है। राम के सौंदर्य को लेकर सीता त्रेलोक्य सुंदरी है अतएव राम ही सीता बनकर सुंदर हो रहे है।  रामतापनीय उपनिषद में कहा गया है – यो वै श्रीरामचन्द्र:स भगवान, या जानकी भुभूर्व:। स्वस्तस्ये वै नमो नम:।“ श्रीराम साक्षात भगवान है ओर देवी जानकी रमा है। राम ही जानकी है, इसीलिए राम के सौंदर्य में ही राम मानस- सरो-भरालिका सौंदर्य है। सुदरकाण्ड में जिस कुंतलाकुल कपोलसुंदरी सीता के रूप गुण का विकास है, वह क्या जाग्रत क्या स्वप्न, सर्वदा श्रीराम के चरण कमलों में सब कुछ समर्पित है इसलिए कहा गया है “”सुंदरे सुंदरों राम:।“” वाल्मीक जी रचित सुंदरकाण्ड में उन्होने हनुमान के चरित्र को प्रधानता देते हुये उच्च शिखर पर रखा ओर हनुमान के समक्ष रावण की तुलना करते हुये हनुमान के सामने रावण को अति तुक्ष्य मानकर कहा है – “”न मे समा रावणकोटयोधमा: रामस्य दासोंहमपारविक्रम:। “” रावण जैसे करोड़ों अधम मेरी समता नहीं कर सकते। मैं श्रीराम का दास हूँ। अत: मेरे पराक्रम का कोई थाह नहीं पा सकता है। राम का दास होने के कारण मुझमे अपार विक्रम है।“ दास होने से जहां इतना शौर्य –वीर्य प्रस्फुटित हो उठता है ,वहाँ भक्त का सौंदर्य भगवान का ही है। इसी से “सुंदरे सुंदरों राम:”  कहा गया है। “”सुंदरे सुंदरों राम:”” का अर्थ तो यहा प्रगट हो गया किन्तु सुंदर में सभी सुंदर है इसका अभिप्राय समझने के लिए कथा के मूल में हनुमान ओर सीता के समस्त गुण विकास को समझना होगा तभी सुंदरकाण्ड के सुंदर होने का रस्वास्वादन प्राप्त हो सकेगा।
       गोस्वामी तुलसीदास ने सुंदर काण्ड की पहली ही चौपाई की शुरुआत सुंदर वचनों से की है कि - “”जामवंत के वचन सुहाए, सुनि हुनुमंत हृदय अति भाए।“” वे हनुमान को अपने विस्मृत हो चुके पराक्रम की याद कराने के बाद उन्हे अपने बल का बखान करते हैं जो एक ऋषि के श्राप से वे भूल चुके थे। हनुमान जी को स्मरण आता है तो उसकी परीक्षा के लिए वहाँ एक पर्वत का प्रसंग गोस्वामी जी रखते है कि - “” सिंधु तीर एक भूधर सुंदर “”  में सुंदर शब्द का पहली बार उल्लेख किया ओर हनुमान जी जैसे ही उस पर्वत पर पाँव रखकर कूदते है तो वह पर्वत पाताल में धस जाता है। सुंदरकाण्ड में सुदर क्या है हनुमान का स्वरूप जो भीमाकर कर लिया है जो अगाध गगनाकार सागर को लांघने के लिए है। शत योजन सागर को पार करते समय देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने सुरसा को विघ्न बनाकर प्रस्तुत किया जो उन्होने अपने बुद्धिबल  से सुरसा की परीक्षा पास करने के लिए सुरसा के शरीर के आकार से दुगुना चौगुना रूप धरने के बाद उनके मुख से वापिस आकार विदा मांगी। मैनाक पर्वत समुद्र से आ जाना ओर हनुमान से कहना की थक गए होंगे विश्राम कर ले ओर कुछ भोजन ग्रहण कर ले तब हनुमान द्वारा कहना की “राम काज किन्हे बिना मोहि कहा विश्राम।“” मैं राम के काम से जा रहा हूँ इस समय मुझे भोजन ओर विश्राम के लिए समय नहीं है मुझे शीघ्र जाना है, हनुमान की बात सुनकर मैनाक पर्वत सागर में लौट जाता है। हनुमान सागर लांघते आगे बढ़ते है तभी एक निशाचर जो आकाश में उड़ने वाले पक्षियों जीव जन्तुओ की परछाई सागर के जल में पड़ते ही उनकी परछाई पकड़ उन्हे खा जाती है वह राक्षसी हनुमान की परछाई पकड़ लेती है हनुमान जी तुरंत उसे मारकर समुद्र पार कर लंका पहुचते हैं। जिसपर तुलसीदास जी सुंदर शब्द का दूसरी बार प्रयोग कर लिखते है कि – “”कनककोट विचित्रा मनि कृत सुन्दरायतना घना””  अर्थात लंका का वह सोने का परकोटा रंग विरंगी मणियों से जड़ा है जिसके अतिसुंदर घर है।  लंका पहुचकर हनुमान जी द्वारा दक्षिण किनारे से त्रिकुट शिखर पर चढ़कर लंकापूरी को देखना, संध्याकाल मसक/मच्छर के समान सूक्ष्म शरीर धारण कर लंका में प्रवेश करते समय राक्षसीवेश धारण करने वाली लंकिनी को घूंसा मारकर रक्तरंजित करनातथा लंकिनी द्वारा हनुमान को लंका के विनाश के प्रसंग सुनकर शुभ संकेत देना सुंदर ही तो है जिसका विस्तार से पढ़ने के बाद सुंदरकाण्ड के अन्य प्रसंगो का सुंदरतम वर्णन से सभी आभिभूत होते हैं ओर हनुमान के द्वारा उनके मार्ग में बाधक बनी तीन स्त्रियों के साथ अपनाए गए व्यवहार उनकी बुद्धि का प्रमाण है जहां वे पहली स्त्री सुरसा के सामने विनय करते है, दूसरी स्त्री सिहिंका को यमलोक पहुंचाते हैं ओर लंका को एक मुसठिका मारकर ठीक करते हैं।
       सुंदरकाण्ड के कथा वर्णनों में माता सीता की खोज में हनुमान लंका के हर महल ओर घरों का अन्वेषण करते हैं। गोस्वामी जी लिखते हैं “ मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा, देखे जंह तंह अगनित जोधा। गयउ दसानन मंदिर माहीं, अति विचित्र कहि जात सो नाही। “” हनुमान ने हर घर जिन्हें मंदिर कहा गया है में सीता की तलाश की परंतु उन्हें असंख्य योद्धा दिखे । रावण के महल में भी देखा जो विचित्र बना हुआ था जहा भी सीता नही दिखी।  तब हनुमान को एक सुंदर घर दिखा जिसमें रामनाम अंकित था तुलसी की पुजा होती थी तब उन्होंने सोचा यहा निश्चरों के बीच कौन सज्जन पुरुष है “” लंका निसिचर निकर निवासा, इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।  मन महु तरक करें कपि लागा, तेही समय विभिसनु जागा। “” हनुमानजी ने ब्रम्हण का वेश धर कर विभीषण से मिले जहा से उन्हे सीता माता के अशोक वाटिका में होने कि जानकारी मिली ओर वे सीतामाता से मिलने के लिए अशोकवाटिका कि ओर चल दिये। “एकवेन्णी कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणिम । भूमौ शयानां शौचंती रामरामेति भाषिनिम॥ “ हनुमान जी ने अशोकवाटिका में अशोक वृक्ष के नीचे पृथ्वी पर माता जानकी को देखा,मानो कोई देवांगना एक वेणी धारणकिए हुये है ओर उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो, आकृति दीन थी, वस्त्र मलिन थे ओर चिंतन कि मुद्रा में राम राम कि रट लगाए हुये थी। हनुमान जी ने जनकनंदिनी के दर्शन रात में किए तब बीस भुजा वाले नीलांजन राशि के समान रावण का सीता के पास आना ओर सीता के दर्शन कर अपनी कठोर ओर कटु वाणी बोलना ओर सीता का उत्तर प्रतिउत्तर सुनकर जानकी के वध के लिए रावण का खड़ग उठाना ओर मन्दोदरी  द्वारा उसे रोका जाना, रावण का सीता को दो माह का समय देना तथा राक्षसीगण को सीता को भयभीत करने के आदेश के उपक्रम में सीता को उत्पीड़न करना ओर धमकी देना कि “”मास दिवस महूँ कहा न माना तो मैं मारिब काढ़ि कृपाना।“” त्रिज़टा का स्वप्नवृतांत सुनाकर राक्षसीवृंद को भयभीत ओर निंदित करना , सीता का रुदन करना ओर प्राणत्याग कि चेष्टा का भाव लाने पर हनुमान द्वारा अवसर जानकार सीता को रामवृतांत सुनाना ओर फिर राम द्वारा दी गई मुद्रिका/अंगूठी सीता को प्रदान कर उनका विश्वास अर्जित करने के लिए अंगूठी सीता जी से सामने डाल दी।  “तब देखि मुद्रिका मनोहर, राम नाम अंकित अति सुंदर। “  सीताजी अंगूठी पहचान कर हर्ष ओर दुख के साथ व्याकुल हो गई तब हनुमान से वानरराज सुग्रीव से मित्रता कि बात बताकर वानरों के बल बुद्धि का बखान कर कर उनकी ताकत का भरोसा दिलाया जिसपर पर संतुष्ट होकर सीता ने उन्हें आशीर्वाद दिया – “आशीष दीन्ही रामप्रिय जाना होहु तात बल सील निधाना । अजर अमर गुन निधि सुत होहु। करहु बहुत रघुनायक छोहु।“  सीता जी से अजय अमर होने का आशीर्वाद प्राप्त कर हनुमान जी ने उनसे कहा माँ मुझे भूख लगी है अगर आप कहे तो मैं अशोकवाटिका से कुछ पल खा लूँ –“लागि देखि सुंदर फल रूखा।“  इसके बाद आज्ञा पाकर अशोकवाटिका में सुंदर फलों का आहार कर वाटिका उजाड़ना, रावण के सेना ओर उसके बेटे अक्षयकुमार को मारना फिर मेघनाथ द्वारा हारने कि स्थिति में हनुमान पर ब्रम्हपाश छोडना ओर हनुमान का उसमे बंधाना, रावण की सभा में जाना, रावण को उपदेश देना, रावण का क्रोधित होना, पूंछ में आग लगाना ओर उस आग से हनुमान द्वारा पूरी लंका का दहन करना,सागर में पूंछ बुझाकर वापिस सीता के पास अशोकवाटिका में आना उनसे चुड़ामणि लेकर सागर के पार आना, वानर साथियों के साथ मिलना। मधुबन के फल खाना ओर उसे उजाड़ना, राम जी के पास सीता का संदेश सुनाना, राम द्वारा हनुमान को गले लगाना सुदरकाण्ड की ये सारी कथाएँ बड़ी ही सुंदरतम है।
हनुमानजी का सबसे बड़ा गुण ओर उनकी शक्ति अनेक स्थानों पर वर्णन गई है। वे दुरदर्शी थे कि सन्यासी का रूप रखकर निशाचर लोग छलते है,रावण के द्वारा सन्यासी के रूप में सीता का हरण जगजाहिर हो गया था । कालनेमि ने भी सन्यासी का रूप रखकर हनुमान को संजीवनी लाने से रोका था। दुरदर्शी हनुमान ने संभवतया ब्राम्हण रूप को उपयुक्त माना जो सत्य संभाषण ओर वेद पुराण ओर धर्म के आचार्य भी रहे इसलिए उन्होने ब्राम्हण का रूप रखा जिसका पहला प्रयोग हनुमानजी जी ने तब किया जब सुग्रीव को भय हुआ कि कोई मुनिकुमार उसके भाई बालि के भेजे उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं तब हनुमान ब्राम्हण वेष बनाकर रामलक्ष्मण के पास जाते हैं और सुग्रीव राम की मित्राता कराके दोनों का हित साधते हैं । विभीषण के पास भी वे रात्रि के अंत में ब्राम्हण बनकर जाते हैं और उनसे सीता अशोक वाटिका में बन्दिनी है, यह जानकारी प्राप्त करते है। आकार वे विचार करते हैं कि कैसे मैं जनकनंदिनी से बातें करूं कि सीता जी का विश्वास अर्जित कर लूं। यदि संस्कृत में वार्तालाप करूंगा तो कहीं वैदेही मुझे रावण समझ बैठे। अतः मैं जनभाषा में बातें करूंगा, यह विचार करने के बाद वे माता सीता के सामने अपने असली रूप वानर के रूप में परिचय देते हैं। या कहे जगजननी के  सामने भक्त जैसा है वैसे ही समर्पित होता है उनके सामने भक्त की माया का क्या मूल्य, वास्तविक रूप को माता स्वीकारती भी है। जब लक्ष्मण को शक्ति लगी तब वे संजीविनी बूटी लेने गये तो वे हक्काबक्का हो गये। वैद्यराज सुषेण ने बताया था कि संजीवनी का वृक्ष प्रकाशित रहता है। रात्रि में हनुमानजी ने पचासों पेड़ों को प्रकाशमय पाया। कोई दूसरा होता तो सोचता मैं क्या करूं चलो बता दूंगा वहां संजीवनी वृक्ष नहीं था, सारे वृक्ष प्रकाशमय थे, मैं किसे लाता? बुद्धि सागर हनुमान जी ने यह पर्वत खंड ही उखाड़ लिया जिस पर वे समस्त वृक्ष खड़े थे और प्रकाश दे रहे थे।
‘सुंदरे सुंदरी सीता “” के विषय में सुंदरकाण्ड, सीता के प्रधान चरित्र को प्रगट करता है यह अलग बात है कि हम अब तक हम भक्त हनुमान ओर अन्य प्रसंगो के चिंतन में खोये रहे। सम्पूर्ण नारी जगत को गौरवान्वित करने वाली सीता अपने नाम, रूप, गुण ओर चरित्र में सती के सतीत्व का तेज लिए हुये सर्वव्यपिनी चैतन्यस्वरूप त्याग की मूर्ति है। श्रीराम के निकट रहने के कारण वे जगदानन्दकारिणी है जो कुछ  देहविशिष्ट है सबकी उत्पत्ति,स्थिति ओर संहारणी सीतादेवी ही कही गई है इसलिए कहा गया है कि सीता ही प्रणय होने के कारण प्रकृति है। अध्यात्म रामायण में उल्लेख किया गया है कि “एको विभासि त्वं माया बहुरुपया। तथा- योगमायापि सीतेति।“” लोकविमोहिनी हरिनेत्रकृतालया श्रीसीताजी ने श्रीरामचन्द्र जी के अभिप्रायानुसार श्रीसीता जी राम के एक सर्वश्रेष्ठ भक्त को ज्ञान का पात्र जानकार एक वार तत्वज्ञान प्रदान किया था। श्रीसीता जी कहती है कि रामको परब्रम्ह सच्चिदानंद ही जानना चाहिए। एकमात्र सत्यवस्तु श्रीराम ही बहुरूपिणी माया को स्वीकार कर विश्वरूप में भासित हो रहे है ओर सीता ही योगमाया है। “” मूलप्रकृतिस्वरूप होने से सीता सत्वरजस्तमोगुणात्मिका प्रकृति है जिन्हे त्रिवर्णात्मा साक्षात माया कहा है जो प्रपंच बीज, मायामयी कही गई है तथा वे अविद्यास्वरूपणी भी है ओर विघास्वरूपणी भी है। रामायण में जो कुछ होता है सीता उसकी कर्ता है,विश्व का सारा कार्य शक्तिरूप ही करती है। सीता हरण, रावण मरण सारे कर्म के मूल में कर्ता सीता कही गई है, वास्तव में निर्विकार एवं अखिल विश्व कि आत्मा सीता ही है। राम कुछ नहीं करते,जो कुछ होता है माया के गुणों के अनुग्रह से होता है।
 सकलकुशलदात्री,भक्तिमुक्तिप्रदात्री। त्रिभुवनजनयित्री दुष्टधीनाशयित्रिम॥
       जनकधरणीपुत्री दर्पिदर्पप्रहत्री। हरिहरविधिकत्री नौमि सदभक्तभत्रिम ॥
       भगवती सीता जी कि अपार महिमा है। वेद शास्त्र पुराण इतिहास तथा धर्म ग्रंथो में इनकी अनंत लीलाओ का शुभ वर्णन किया गया है। ये भगवान श्रीराम कि प्राणप्रिया आघ्याशक्ति है। इन्ही के भृकुटी विलास मात्र से उत्पत्ति  -स्थिति –संहारादि कार्य हुआ करते है।  श्रुति का वाक्य है –उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम। सा सीता भगवती ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता ॥ (श्रीरामतापनीय-उत्तराध्र्द) समस्त देह धारियों की उत्पत्ति,पालन तथा संहार करने वाली आघ्याशक्ति मूल प्रकृति संगयक श्री सीता जी ही है। अत: सुंदरकाण्ड में हनुमान ओर सीता का प्रसंग सुंदर है इसलिए  ‘सुंदरे सुंदरी सीता “” जैसे मांगलिक भाव का रसास्वादन लेने के लिए ही रामायण में काण्ड का नाम सुंदरकाण्ड रखा गया है जो उत्तम है।