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मंगलवार, 15 अगस्त 2023

समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त किन्नर संघर्ष

 

रामेश्वर महादेव वाढेकर
 
 समकालीन साहित्य का अध्ययन करने के पश्चात समझ आता है कि स्री विमर्श,दलित विमर्श,आदिवासी विमर्श,मुस्लिम विमर्श,अल्पसंख्याक विमर्श,वृद्ध विमर्श,किन्नर विमर्श आदि पर गंभीर चर्चा हुई  है।वर्तमान समाज में किन्नर को हिजड़ा, खुसरो,अली,छक्का आदि नाम से पुकारा या पहचाना जाता हैं। किन्नर के चार प्रकार है बचुरा, नीलिमा, मनसा,हंसा। बचुरा वर्ग के किन्नर वास्तविक हिजड़े होते हैं। वे जन्म से न स्री  होते हैं  ना पुरुष।  नीलिमा  वर्ग  में  वे हिजड़े आते  हैं, जो किसी परिस्थिति  वश या कारणवश स्वयं हिजड़े बन जाते हैं। मनसा वर्ग में वे हिजड़े आते हैं,जो मानसिक तौर पर स्वयं को हिजड़ा समझने लगते है।हंसा वर्ग में वे हिजड़े  आते  हैं, जो किसी  यौन अक्षमता  की वजह से  स्वयं  को  हिजड़ा  समझने लगते है। किन्नर समाज  विश्व  के हर  क्षेत्र में समाहित है।वे मनुष्य ही  हैं, सिर्फ़  उनमें  प्रजनन  क्षमता  न  होने से समाज हीन नजर  से  देखता  हैं। हिंदी साहित्य में शुरुआती दौर में पाण्डेय बेचन शर्मा,सुर्यकांत त्रिपाठी,शिवप्रसाद सिंह,वृंदावन लाल वर्मा आदि  ने  किन्नर  समाज  की  समस्या पर लिखा। किंतु  समस्या  का  हल वर्तमान में भी नहीं।
     हिंदी साहित्य में किन्नर समाज की समस्या  पर  अनेक  उपन्यास  लिखे  गए  और वर्तमान में भी लिखे जा रहे हैं। प्रमुख उपन्यास में ‘यमदीप’- नीरजा माधव, ‘मैं भी औरत हूं’- अनुसुइया त्यागी, ‘किन्नर कथा’, ‘मैं पायल...’ – महेंद्र भीष्म, ‘तीसरी ताली’-प्रदीप सौरभ, ‘गुलाम मंडी’- निर्मल भुराड़िया,‘प्रतिसंसार’- मनोज रूपड़ा, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’-चित्रा  मुद्दगल  आदि।उपरोक्त उपन्यासों का अध्ययन करने के पश्चात किन्नर  समाज  की त्रासदी, संघर्ष  समझ  आता  है। किन्नर समाज की प्रमुख समस्या में शैक्षिक समस्या, बहिष्कृत समस्या, पारिवारिक समस्या ,विस्थापन समस्या,आवास  समस्या, रोजगार समस्या, देहव्यापार समस्या,वेश्या समस्या,यौन हिंसा समस्या आदि है।इन समस्या के साथ किन्नर समाज वर्तमान में भी संघर्ष कर रहा है। वर्तमान में  किन्नर  समाज के  संदर्भ  में  कानून  है  किंतु अस्तित्व में कुछ नहीं। वे  आज भी खुद की पहचान समाज में निर्माण  नहीं कर सके।समाज ने मानसिकता बदलने  की  नितांत जरूरत है, तभी किन्नर समाज सम्मान के साथ जी सकता है। समकालीन उपन्यासों  में किन्नर समाज की विभिन्न कठिनाइयों एवं उनके संघर्ष को संवेदनात्मक  स्तर पर  प्रमुखता से उठाया गया है। इन्हीं संवेदना एवं संघर्ष को  सहजने  की कोशिश हम करेंगे।
 
शैक्षिक संघर्ष
     किन्नर के ज़िंदगी में जन्म से संघर्ष शुरू,मृत्यु तक जारी। मां-बाप  खुद के  बेटे को  स्वीकार करने के मानसिकता में  नहीं। ऐसा क्यों हो रहा है? यह वर्तमान का चिंतन का विषय है। बचपन में  शारीरिक  बदलाव  होने   के  कारण  अनेक परिवार  के  सदस्य  बच्चे  को अस्पताल  लेकर जाते है। बच्चा  किन्नर  है, पता चलने के पश्चात स्वीकारने  के  स्थिति  में  कोई  नहीं  रहता।उसे किन्नर बस्ती में छोड़ा जाता है या जान से मारने की  कोशिश।  किन्नर  बस्ती  में  बड़ा  तो  होता  है, किंतु शिक्षा से वंचित।उसने पढ़ाई  करने का ठान  भी  लिया  तो  समाज व्यवस्था पढ़ने नहीं देती । यह  वर्तमान  की  वास्तव  परिस्थिति  है। पढ़ाई  न  होने से  कहीं समस्या का शिकार वह बनता  जा  रहा  है। किन्नर  समाज  के  शैक्षिक संघर्ष  के  संदर्भ  में   नीरजा   माधव  ‘यमदीप’ उपन्यास में  कहती  है, “माता  किसी  स्कूल में आज तक किसी हिजड़े को पढ़ते, लिखते देखा है? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है? मास्टरी में, पुलिस में, कलेक्ट्री में-किसी में भी,अरे! इसकी दुनिया यही है, माताजी  कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों  को  पढ़ाओं, लिखाओं, नौकरी दो। जैसे  कुछ  जातियों  के  लिए  सरकार कर रही हैं।”1
     ‘नंदरानी’  के  माध्यम  से नीरजा माधव ने किन्नर  समाज  का  शैक्षिक  संघर्ष  बया  किया है।आज भी अनेक माताए किन्नर संतान होने के बावजूद पढ़ाना चाहती है,किन्तु  पुरुष सत्ता के सामने  कुछ‌  नहीं  कर  पाती। वर्तमान में  कई ‘नंदरानी’  शिक्षा  के  लिए  संघर्ष  कर  रही  हैं। तकरीबन 2014 तक किन्नर समाज  का  लिंग ही  निश्चित  नहीं था, शिक्षा तो  बहुत  दूर। कोई   सरकार  उनके  तरफ  ध्यान  नहीं  देती। जिस  तरह  स्री, पुरुष  को   पढ़ने   का  संवैधानिक अधिकार है,उसी प्रकार  किन्नर को । वर्तमान में  कानून है,सिर्फ अस्तित्व में नहीं। कुछ  गिने-चुने  किन्नर संघर्ष  करके पढ़े हैं,किन्तु उन्हें अच्छे पद पर  नियुक्ति नहीं मिलती। उनके साथ भेदभाव किया जाता  है। जब  तक  समाज  की सोच बदलेगी  नहीं,  तब   तक  किन्नर  समाज का संघर्षमय जीवन जारी रहेगा,कानून होकर भी!
 
बहिष्कृत प्रथा के विरुद्ध संघर्ष
      प्राचीन काल में किन्नर समाज को हीन वागणूक दी जाती थी,वर्तमान में उससे बुरी परिस्थिति। किन्नर  को  खुद  का  परिवार  नहीं स्वीकारता;समाज  तो  बहुत  दूर । संविधान  में सभी  लोगों  की  तरह   किन्नर  समाज  के  भी मूलभूत  अधिकार  है। किंतु  किन्नर  समाज के मूलभूत  अधिकार  का  हनन  होता  है। उन्होंने न्याय मांगने की कोशिश भी की तो  न्याय नहीं मिलता, अन्याय निरंतर होता है। वर्तमान में भी समाज  उन्हें  बहिष्कृत कर रहा  हैं। इज्जत से जीने नहीं देता। वे जीकर भी  मरे हुए हैं। चित्रा मुद्दगल ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203  नाला सोपारा’ उपन्यास में बहिष्कृत प्रथा के संघर्ष  संदर्भ  में कहती है, “कभी-कभी मैं अजीब सी अंधेरी बंद चमगादड़ों में अटी सुरंग में स्वयं को घूटता हुआ पाता हूं।बाहर निकलने को छटपटाता।मैं मनुष्य तो हु न! कुछ कमी है मुझमें,इसकी इतनी बड़ी सज़ा।”2                                                               ‘विनोद’ के माध्यम से बहिष्कृत संघर्ष चित्रा मुद्दगल ने साझा करने की कोशिश की है। वर्तमान में  किन्नर समाज त्रासदी में जी रहा है, सामाजिक मानसिकता के वजह से।वह किन्नर है उसका दोष नहीं,उसके मां-बाप है।वह मनुष्य ही है,स्री के कोख से पैदा हुआ। समाज ने उन्हें सम्मान देना चाहिए,बहिष्कृत करना नहीं।उनके साथ प्रेमसे,मिलजुलकर रहना होगा,तभी उसमें जीने की आस निर्माण होगी।
 
पारिवारिक संघर्ष
      किन्नर का संघर्ष समाज से नहीं, परिवार से शुरू होता है। वर्तमान में कई स्त्री को अनेक वर्ष  के  पश्चात  संतान हो रही है। संतान हो, इसलिए स्री  क्या-क्या  करती  है ,उसे  ही मालूम। संतान किन्नर हुई  तो  उसपर उपाय भी है। विश्व में चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है। किन्नर संतान  को परिवार से दूर करना,यह उसका उपाय नहीं। उसके भविष्य के संदर्भ  में सोचने   की  जरूरत  है। समाज  क्या  कहेगा रिश्तेदार क्या सोचेंगे? हमारी  इज्जत  का क्या होगा? आदि  प्रश्न  गौण है, खुद  के  संतान  के सामने। पारिवारिक संघर्ष के  संदर्भ  में  महेंद्र भीष्म  ‘किन्नर  कथा’  उपन्यास  में  कहते  है, “सामाजिक परिस्थितियों, खानदान की इज्जत- मर्यादा,झूठी शान के सामने अपने हिजड़े बच्चे से उसके जन्मदाता हर हाल में छूटकारा पा लेना चाहते है।”3
      लेखक ने ‘सोना’ नामक पात्र के  माध्यम  से  किन्नर  का संघर्ष दिखाने  की कोशिश की है। उपन्यास का  पात्र ‘जगत सिंह’ अपने  खुद  के बेटे ‘सोना’ को  जान  से  मारने की  कोशिश  करता है, क्योंकि  वह  किन्नर  है। वर्तमान में कई ‘सोना’ परिवार के प्रेम को तरस रहे हैं। किन्नर को  समाज ने  अपमानित  किया तो ज्यादा दुःख नहीं होता, किंतु  परिवार  ने मुंह फेर लिया, तो  बहुत दुःख  होता  है। वर्तमान में कई परिवार किन्नर संतान को परिवार का हिस्सा नहीं  मानते। किसी  में  अधिकार नहीं मिलता। पारिवारिक समारोह में इच्छा होकर भी जा नहीं  पाता। सिर्फ़ यादों में जीता है। उन्हें कोई सहारा नहीं देता। हर तरफ से मानसिक और शारीरिक शोषण होता है ।परिवार के सदस्य को मानसिकता बदलने  की  जरूरत  है। वे अपनी संतान की वेदना नहीं समझेंगे,तो कौन समझेगा? मनुष्य को ऐसे संवेदनशील विषय पर  चिंतन की जरूरत है।
 
विस्थापन संघर्ष
      वर्तमान किन्नर समाज की भीषण समस्या है विस्थापन। किन्नर खुद  घर  से  निकल जाते है,तो कभी उसे जबरन निकाला जाता है। दोनों अवस्था में संघर्ष ही है। बच्चा  किन्नर  है, समझ आने के पश्चात  उस  पर  का  प्रेम खत्म होता है परिवार  एवं  समाज  का। उसके साथ परिवार के सदस्य, रिश्तेदार बुरा बर्ताव करते है।हर दिन के मानसिक और शारीरिक त्रासदी  से परेशान होकर जान तक देता है। परिवार ने छोड़ने के पश्चात समाज ज्यादा वेदना  देता है। जीना मुश्किल करता है । मजबूरी में किन्नर समुदाय का डेरा खोजने की कोशिश करता है। वहां भी उसका  मुखिया  के  द्वारा शोषण ही होता रहता है। उसका  जीवन  लाश  बनकर  रहता  है।विस्थापन संघर्ष के संदर्भ में महेंद्र भीष्म ‘किन्नर कथा’  रचना   में  कहते  है, “प्रत्येक   हिजड़ा अभिशप्त हैं, अपने ही  परिवार  से बिछुड़ने  के दंश से। समाज  का पहला घात यही से उस पर शुरू होता  है। अपने  ही  परिवार से, अपने  ही लोगों द्वारा  उसे  अपनों  से  दूर कर दिया जाता है। परिवार से विस्थापन का दंश  सर्वप्रथम उन्हें ही भुगतना होता है।”4
      वर्तमान  में  भी किन्नर समाज का  विस्थापन संघर्ष  दिखाई  देता है।वे कई सुरक्षित दिखाई नहीं दे रहे।वे बेघर,बेवारस है मरते दम तक। उन्हें कोई  सहारा  नहीं  देता। मजबूरी का फायदा उठाते है, मनुष्य के रूप में रहनेवाले जानवर। समाज  उनके  लिए  भले ही कुछ न करें,चलेगा!  किंतु  उनके  ज़िंदगी  से न खेले। जिस  दिन  किन्नर  समाज   को  सही  में न्याय मिलेगा,तभी  लोकतंत्र अस्तित्व  में है,यह किन्नर को महसूस होगा।
 
आवास संघर्ष
      किन्नर  बेघर है वर्तमान में भी ! उन्हें रहने के लिए भी कोई किराए पर घर नहीं देता। क्योंकि वे किन्नर हैं। किन्नर  के  रूप में जन्म लेना कोई गुनाह  नहीं  है। किन्हें  लगता  है मैं किन्नर बनूं? वह नैसर्गिक प्रकिया है। वर्तमान  में किन्नर  को विवाह  करने  का  कानूनन  अधिकार  है, किंतु समाज मान्य नहीं करता।किसी व्यक्ति ने किन्नर से  विवाह  करने  की  हिम्मत की, तो उसे जीने नहीं देते । यह  आज  की वास्तव परिस्थिति है, इन्हें नकारा नहीं जा सकता।
      वर्तमान में भी  किन्नर को शिक्षित कॉलनी में  रहने घर नहीं मिलता। मजबुरन उन्हें गंदी  समझी जानेवाली बस्ती में रहना पड़ता है। कुछ  गलती  न   होने  के  बावजूद  भी  पुलिस प्रशासन  द्वारा  उन  पर  आरोप लगाए जाते हैं। अपमानित किया जाता है। वहां  से भी बेदखल किया  जाता  है । प्रशासन  उनकी  मदत  नहीं करती। संघर्ष ही उनके जीवन  में  निरंतर रहता है। वर्तमान  समाज  ने  मानसिकता बदलने की सक्त  जरूरत है, तभी  वे  इन्सान  बनकर जी सकते हैं। आवास  संघर्ष के बारे में प्रमोद मीणा कहते है, “कुछ  हिजड़ा  परिवार की तरह समूह  में भी रहते हैं,लेकिन रहने के लिए एक सुरक्षित घर खोजना हिजड़ों के लिए हमेशा एक चुनौती बनी रहती है। ज्यादा तर मकान मालिक हिजड़ों को   मकान  किराए  पर  देते नहीं   हैं । मकान मालिकों  की  बेरूखी  से  तंग  आकर  बहुत से हिजड़ों  को  गंदी, कच्ची  बस्तियों  में  रहने  पर मजबुर होना  पड़ता  है। और  वहां  से भी उन्हें पुलिस  प्रशासन  द्वारा  बेदखल  किया  जाता रहता है।”5
      इक्कीसवीं सदी में भी अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति को अनेक शहर के प्रतिष्ठित समझे जानेवाले  क्षेत्र  में  मकान  नहीं  मिलता। पैसों  के  कारण नहीं, जाति, धर्म  के कारण । फिर वर्तमान  में  किन्नर  समाज  की  क्या हालत होगी,यह  समाज में झांककर देखने से  समझ आता है। किन्नर संघर्ष कानून बनाने से खत्म  नहीं  होनेवाला, हीन  मानसिकता  नष्ट करनी  होगी, तब  उनका  अस्तित्व  समाज  में निर्माण हो सकता है। यही समय की मांग है।
 
रोजगार संघर्ष
      वर्तमान की ज्वलंत समस्या है रोजगार। उच्च शिक्षित होकर भी  युवाओं  के  हाथ  काम नहीं हैं। किन्नर समाज को व्यवस्था ने पढ़ने नहीं  दिया। कुछ किन्नर पढ़े-लिखे हैं,वे भी बेरोजगार हैं। शिक्षित व्यक्ति  कुछ  ना  कुछ  काम करके जीवन  जीता  है किंतु   किन्नर  को  शिक्षित होकर भी कोई काम नहीं मिलता। मजबूरी में वे रेलगाड़ी,सींगनल,बाजार,बच्चे के जन्म, विवाह आदि स्थान पर  जा  रहे  हैं। वहां  उन्हें  कोई  प्रेमभाव  से  नहीं  बोलता। निरंतर  अपमानित किया जाता है।
      संघर्ष करके पढ़े-लिखे किन्नर उच्च पद  पर  कार्यरत  होना  चाहता  है, समाज  में बदलाव  लाने। उनमें उच्च पद पर  नियुक्त  होने की पात्रता भी है, किंतु किन्नर होने से  वहां तक वे नहीं पहुंच पाते। मजबूरी  में  अपनी  पहचान छिपाकर  पद  हासिल  करते  हैं। कुछ  दिनों के पश्चात उसके चाल-ढलन  से वहां  के अधिकारी को  उसकी असली पहचान पता  चलती  है। कुछ  भी  कारण  बताकर  उसे  वहां  का मुख्य अधिकारी  नौकरी  से  निकाल  देता  है। किन्नर की न्याय मांगते- मांगते  ज़िंदगी गुजर जाती है, किंतु  न्याय  नहीं  मिलता।  किन्नर  समाज  के रोजगार संघर्ष  के  संदर्भ  में प्रमोद मीणा कहते है,  “अपनी  पहचान  छिपाकर  ये यदि कहीं रोजगार  पा  भी  लेते  हैं तो इनका हिजड़ा होने का खुलासा  होने  पर  नियोक्ता  इन्हें नौकरी से निकाल देता है।कार्यस्थल पर साथी,सहकर्मियों और  मालिक आदि  द्वारा  इनके साथ मौखिक, दैहिक  और  यौनिक  दुर्व्यवहार आम  है और जिसके लिए  इन्हें  कहीं  से न्याय भी नहीं मिल पाता।  इनके  चाल-चलन  को  कार्यस्थल  की शुचिता  के  लिए खतरा मानकर इन्हें ही नौकरी से निकाल  दिया  जाता है।”6
      वर्तमान  में  कुछ लोग  दूसरे  के  नाम  नौकरी  कर रहे हैं, बल्कि किन्नर  का  सब  सही  होने  के  बावजूद  उन्हें नौकरी  नहीं  मिलती।  संविधान  में  सभी  को समान अधिकार है,फिर भी उनके साथ अन्याय क्यों?  यह  चिंतन  का  विषय  है। सिर्फ़ किन्नर समस्या पर  लिखा  साहित्य पढ़कर  कुछ  नहीं होगा, समस्या को समझकर खुद से कार्य करने की  जरूरत  है। कालांतर  से  समाज  में  भी बदलाव जरूर आएगा।
 
वेश्या वृत्ति एवं यौन हिंसा के विरुद्ध संघर्ष
      किन्नर का जीवन वेश्या स्री से कहीं ज्यादा बत्तर है। वे  कही भी  सुरक्षित नहीं। उनके साथ प्रेम भाव से कोई  वार्तालाप नहीं करता। शिक्षा का अभाव, रोजगार की  समस्या  आदि  का फायदा  उठाकर  उन्हें  वेश्या  व्यवस्था में खींचा जा रहा  है। वर्तमान  में अनेक डाक्टर  पैसों के खातिर लिंग  परिवर्तन  करके दे  रहे  हैं। उनके शरीर  के  साथ  पुलिस, वकिल, बिजनेस  मॅन, ड्राइवर, डाक्टर  आदि  क्षेत्र  के  लोग खेलते है। शरीर,मन  को  नोचते है। किन्नर अनेक  बिमारी का शिकार बन रहे हैं। इन समस्या से  वे निरंतर संघर्ष करते आए हैं। वर्तमान में भी कर रहे हैं।
      वर्तमान में किन्नर के समक्ष यौन हिंसा भीषण  समस्या  के  रूप  में खड़ी है। कारण है   सामाजिक  असुरक्षा  और   नीच  मानसिकता। किन्नर कहीं  सुरक्षित  नहीं है। करीबी  रिश्तेदार भी  जबरदस्ती करता है। उन्होंने चिल्लाकर भी बताया तो कोई विश्वास नहीं  रखता। किन्नर को दोषी  ठहराया  जाता  है। अनेक व्यक्ति उनका शरीर नोचना  चाहते हैं, नोचते  भी है, शारीरिक भूख  भगाने के  लिए। दोषी व्यक्ति के  खिलाफ गुनाह दाखिल करने किन्नर जाते हैं,उनकी कोई दखल नहीं लेता।वे हर दिन की पीड़ा से परेशान  होकर नशा  करने  लगे है। उन्हें खुद की ज़िंदगी से नफ़रत होनी लगी है। यौन संघर्ष के संदर्भ में चित्रा  मुद्दगल  ‘पोस्ट  बॉक्स  नंबर  203 नाला सोपारा’ उपन्यास में कहती है, “किवाड़ ठीक से बंद नहीं किया उसने या उसके सिटकनी चढ़ाने से पहले  ही  अपने चार दोस्तों  के साथ  बिल्लू किवाड़ खोल के कमरे में घुस आए।पूनम जोशी ने आपत्ति प्रकट की, कपड़े  बदलने है,वे कमरे से बाहर जाएं। भतीजे ने पूनम जोशी को दबोच लिया। कहते हुए,वे डरे नहीं, कपड़े वे बदल देंगे उसके। बस वे  उनकी  ख्वाहिश पूरी  कर दे।”7
     विधायक का भतीजा ‘बिल्लू’ किस तरह ‘पूनम जोशी’ से बर्ताव करता है,यह चित्रण लिखिका ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में कई ‘पूनम जोशी’ हवस  की  शिकार बन रही  है।  मजबूरी  का फायदा उठाया जा रहा है। किन्नर पर अत्याचार होने के पश्चात भी उसे ही दोषी ठहराया जा रहा है।उसे न्याय नहीं मिलता समाज,न्याय व्यवस्था से।न्याय के लिए वर्तमान में भी वे संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें  इन्सान  के  रूप स्वीकार करना,उनके लिए सबसे बड़ा न्याय होगा।
निष्कर्ष
     वर्तमान में किन्नर समाज की समस्या पर चर्चा हो रही है।  किन्नर के  अधिकार  को लेकर वैश्विक स्तर पर  भी  प्रयास  हो रहे हैं।भारत में भी  उन्हें  तृतीय  लिंग के रूप में मान्यता दी है। भारत  में  किन्नर  समाज  की आबादी  लगभग पचास लाख है,तब भी वे हशिए पर रखे गए हैं। उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है । उनके अधिकार  समाज  उन्हें  नहीं देता। वे अंदर से  तुट  रहे हैं। किन्नर समाज पर वर्तमान में भी साहित्य लिखना जारी है,लोग पढ़ भी रहे हैं। सिर्फ़ आचरण में नहीं ला रहे। जब वे विचार आचरण  में  लाएंगे  तब किन्नर समाज सामान्य लोगों की तरह जीवन ज्ञापित करेगा।
      किन्नर समाज की समस्या के तरफ सरकार  को ध्यान  देने की नितांत आवश्यकता है।साथ ही गैर-सरकारी संगठन को भी!विभिन्न माध्यम द्वारा समाज की   मानसिकता, सोच बदलने की जरूरत है। तभी  किन्नर  समाज का विकास होगा। किन्नर समाज को  सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रशासन में आना जरूरी है।उनका प्रतिनिधित्व ही  उनके विकास  की शुरुआत है।जिस दिन किन्नर समाज को समाज के हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व मिलेगा,तभी  किन्नर  समाज पर लिखित साहित्य का उद्देश्य सफल होगा।
 
संदर्भ संकेत
1) नीरजा माधव- यमदीप,सुनिल साहित्य सदन प्रकाशन,दिल्ली-110002,प्रथम संस्करण-2009,पृ.13
2) चित्रा मुद्दगल- पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली-110001,प्रथम संस्करण-2016,पृ.30
3) महेंद्र भीष्म- किन्नर कथा,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली-110001,प्रथम संस्करण-2016,पृ.45
4) महेंद्र भीष्म- किन्नर कथा,सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली-110001,प्रथम संस्करण-2016,पृ.42
5) डॉ.एम.फिरोज खान(संपादक)- थर्ड जेंडर:कथा आलोचना, अनुसंधान पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रकाशन,कानपुर-208001,पृ.33
6) डॉ.एम.फिरोज खान(संपादक)- थर्ड जेंडर:कथा आलोचना, अनुसंधान पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रकाशन, कानपुर-208001,पृ.50
7) चित्रा मुद्दगल- पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली-110001,प्रथम संस्करण-2016,पृ.110
 
संक्षिप्त परिचय
जन्म:- 20 मई,1991
जन्मस्थान:-ग्राम-सादोळा,तहसील-माजलगांव, जिला-बीड,
महाराष्ट्र
शिक्षा:-एम.ए.,(हिंदी)एम.फिल्.,सेट,(कर्नाटक) सेट,नेट,अनुवाद पदविका,पी-एच.डी.(कार्यरत) आदि।
लेखन:- चरित्रहीन,दलाल,सी.एच.बी.इंटरव्यू,लड़का ही क्यों?, अकेलापन, षड़यंत्र, शहीद, अग्निदाह,चौख़ट आदि कहानियां विभिन्न पत्रिका में प्रकाशित।भाषा, विवरण, शोध दिशा, अक्षरवार्ता, गगनांचल,युवा हिन्दुस्तानी ज़बान, साहित्य यात्रा, विचार वीथी, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस आदि पत्रिकाओं में लेख तथा संगोष्ठियों में प्रपत्र प्रस्तुति।
संप्रति:- सहायक प्राध्यापक
चलभाष् :-9022561824
ईमेल:-rvadhekar@gmail.com
पत्राचार पता:- रामेश्वर महादेव वाढेकर, सहायक प्राध्यापक हिंदी विभाग,श्री आसारामजी भांडवलदार कला,वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय,देवगांव(रंगारी), तहसील-कन्नड,जिला-औरंगाबाद, (महाराष्ट्र),पिन-431115, चलभाष् -9022561824

शुक्रवार, 26 मई 2023

हिंदी दलित नाटक और रंगमंच


 

                                                प्रो. डॉ. संजय राठोड

श्री. विकास वाघमारे
 
हिंदी दलित साहित्य की अवधारणा में नाटक या रंगमंच को देखे तो भारतीय समाज में जातियों के परस्पर टकराव झेलती जातियों का संघर्ष नजर आता है। यहाँ दर्द भी है और अधिकार की माँग भी। इसी चाह, आंदोलन और वैमनस्य तथा आक्रोश के गर्भ से दलित नाटक तथा रंगमंच का निर्माण हुआ। दलित नाटककार एवं रंगकर्मियों ने अपनी अस्मिता तथा संस्कृति को पहचाना और हिंदी हिंदू रंगमंच के समान अपनी मौजूदगी दर्ज की। जब हम दलित नाटक या दलित रंगमंच की ओर देखते हैं तो कुछ बातें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अत्याचार सहते हमारी जातीय बंधु, सवर्ण पुरूषों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हमारी माँ, बहने, बेटियाँ तथा देवदासी प्रथा के अंतर्गत हिंदू देवताओं के प्रतिनिधियों के हवस की शिकार धर्म भीरू महिलाएँ, मंदिरों में अपनी इज्जत बचाने के लिए चिल्लाती तथा अंधविश्वास की शिकार महिलाएँ यह सब जो होता है वह भारत में स्थापित सवर्णवादी व्यवस्था के कारण । सवर्णवादी व्यवस्था के उत्पीड़न की प्रतिक्रिया स्वरूप दलित साहित्य की एक मजबूत विधा के रूप में नाटक की उत्पत्ति हुई । सबसे पहले दलित समाज में इस व्यवस्था के प्रति आक्रोश निर्माण हुआ और इसी आक्रोश ने आंदोलन का रूप ले लिया । इसी आंदोलन के गर्भ से नाटक का जन्म हुआ । स्वयं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ''मेरे दस भाषणों से कई अधिक एक नाटक की प्रस्तुति लोगों पर असर डालती है।''1 मानवीय मूल्यों की स्थापना करना दलित नाटक तथा रंगमंच का मुख्य उद्देश्य रहा है। इसका निर्माता संवेदनशील होने के कारण अपनी वेदना, अपने उपर होने वाले अत्याचार, अपने अधिकारों का होता हनन, छटपटाहट को नाटक द्वारा व्यक्त कर समाज में चेतना निर्माण करने का कार्य करता है।
उपर हमने कहाँ है कि दलित नाटक की उत्पत्ति बहुत मजबूत रूप से हुई है। किंतु इसके बावजूद भी यह विधा अचर्चित दिखाई देती है। इसके कई कारण हमें दिखाई देते हैं। यह नाटक जब-जब कहीं खेले जाते हैं या इसका मंचन होता है तब इसका काफी विरोध होता रहा है। व्यावसायिक नाटकों से इसका संघर्ष, रंगमंच की प्रतिकुलता, लेखकों की आर्थिक उदारता, प्रकाशक वर्ग द्वारा इनकी होती उपेक्षा आदि अनेक कारण इसके अचर्चा के रहे हैं ।
मूलत: नाटक यह विधा दलितों की ही देन है। शुरू से ही दलित समाज उत्पादक और श्रमजीवी रहा है। यह लोग दिन भर मजदूरी करके जब रात को वापिस आते हैं तो मनोरंजन के लिए अनेक कलाएँ प्रस्तुत करते थे । बिमारियों से मुक्ति, अकाल, अनावृष्टि से बचने के लिए यह लोग मुखौटा, जानवरों की खाल लगाकर नृत्य करते थे। नाटक का प्राथमिक रूप यही रहा है। मोहनदास नैमिशराय ने दलित नाट्य परंपरा को लोकनाट्य परंपरा से जोड़ते हुए लिखा है, ''मैं अगर कहूँ कि हर रंगकर्मी के भीतर उसकी स्मृतियों का दबाव होता है तो गलत नहीं होगा । थिएटर और लेखन के प्रति मेरे अनुराग का कारण भी वहीं रहा है। उसे विकसित किया सांग, ढोला तथा नौटंकी ने हमारे पड़ोसी लगभग अल्हा-उदल की कथा सुनते थे । बाद में मुझे पता चला वे हमारे पुरखे थे । उनकी बहादूरी के किस्से हमें रोमांचित करते थे। बिहार में 'राजा सल्हेस' का किस्सा लगभग इसी तरह का है। उस किस्से में अस्मिता का भाव है। साथ हमलावर को जवाब देने की प्रवृत्ति भी, दलितों के लिए नाटक से जुड़ना व्यक्तिगत रूची की बात कम और सामूहिक अधिक है।''2
मनोरंजन की जो तमाम विधाएँ है वह दलितों से ही विकसित होती नजर आती है। जैसे - नट, नृत्य, गायन इत्यादी । गाँव में नट-नटी के करतब दिखाने के लिए भाड़े-भड़ौती करना, विदूषक, मसखरा, बहरूपिया बनना, किसी के गुणों-अवगुणों का गा-गाकर प्रचार करना दलित लोग ही करते थे। इसी कलाओं को आगे चलकर नाटक का स्वरूप प्राप्त हुआ । कोई भी लोककला क्यों न हो, जैसे - जलसा, लावणी या नाटक उसमें काम करनेवाले ज्यादातर लोग दलित समाज के ही होते हैं । इससे पता चलता है कि नाटक दलितों के द्वारा ही खेला जाता है ।
वस्तुत: नाटकों का विवेचन दो रूपों में हम कर सकते है। वर्तमान में नाटक के दो रूप हमें दिखाई देते हैं। एक वह नाटक जो रंगमंच के अधिन है। जिसका निर्माण ही रंगमंच को आधार बनाकर किया जाता है । जिसे आज हम मूल प्रवाह का नाटक कहते हैं । जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन तथा अर्थ प्राप्ती ही होता है। लेकिन दलित नाटक इससे अलग है। यह दलितों द्वारा ही लिखा जाता है । यह अलग बात है कि आज गैर दलित लेखक भी दलितों के उपर लिख रहे हैं। लेकिन यह लेखन सहानुभूतिपरक होता है। परंतु आज दलितों को सहानुभूति नहीं चाहिए । क्योंकि सहानुभूति से कोई प्रश्न हल नहीं हो सकत हैं ।
एक तरफ वह नाटक है जिसके पास पूरी तरह से रंगमंच होता है और एक ओर वह नाटक है जिसके पास कोई विशेष रंगमंच ही नहीं है । इसे हम दलित नाटक कहते हैं । इसके पास न कोई रंगमंच है न रंगमंच की कोई साधन सामग्री। सही बात तो यह है कि दलित नाटकों को इन साधनों की कोई जरूरत ही नहीं होती । इसकी थीम ही इतनी सशकत होती है कि बिना किसी साधन-सामग्री तथा रंगमंच के बीना ही यह दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है । यह नाटक जिसने भोगा है, उसके द्वारा लिखने के कारण उसमें अभिव्यक्ति सामर्थ्य इतना होता है कि उसे संगीत, प्रकाश, वस्त्रसज्जा आदि साधनों की कोई जरूरत नहीं होती । इसीलिए इसे मुक्त नाटक भी कहा जाता है।
मूलत: हिंदी में दलित रंगमंच का जो प्रारूप है वह लोकरंगमंच है। लोकमंच पर काम करनेवाले लोग दलित ही रहे हैं । उसमें काम करने वाला वर्ग दलित ही रहा है। जो लोककलाएँ थी, उन्होंने ही आगे चलकर नाटक का रूप धारण किया । इस संदर्भ में दशरथ ओझा का मानना है कि, ''हिंदी नाटक की परंपरा का मूल स्रोत यह जन-नाटक ही है, जो स्वांग आदि नाम से अपने प्राचीन रूप से अब तक विद्यमान है। क्रमश: इन जन-नाटकों की एक शाखा ने विकसित होकर साहित्यिक रूप धारण किया।''3
आज दलित साहित्य के अंतर्गत नाटक विधा प्रमुखता के साथ हमारे सामने आती है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के प्रेरणा से आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी आगे बढ़ रही है। इतिहास में घटित अनेक प्रसंग एवं घटनाओं ने दलित नाटककारों को लिखने के लिए प्रेरित किया है। इतिहास में ऐसे कई पात्र है जिनके मानवी हक को नकार कर उन्हें केवल जैविक रूप में देखा गया है । ऐसे पात्रों की वकालत करने का काम इस रंगभूमी ने किया है। वरिष्ठ आत्मकथाकार कौशल्या बैसंत्री के अनुसार, ''निश्चित ही नकारे हुए मानवीय हक को प्राप्त करने के लिए दलित रंगभूमी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।''4
20 वीं सदी में सबसे पहले स्वामी अछूतानंद ने हिंदी दलित नाट्य लेखन को लेकर पहल की । इनके चार नाटक दृष्टिगोचर होते हैं । इनका पहला नाटक 'रामराज्य न्याय' में रामायण के उपेक्षित तथा जुल्म का शिकार पात्र शंबूक की हत्या का चित्रण है । उनके अन्य नाटक, 'मायानन्द बलिदान', 'पारख-पद', 'बली छलन', यह हिंदू शास्त्रों और वाङ्मय के ऐसे पात्रों पर लिखे गए हैं, जिनके उत्पीड़न को सवर्ण साहित्यकारों और समाज ने त्यागा या बलिदान की संज्ञा देकर सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण तथा सवर्ण पात्रों के छल को महिमामंडित करने का षड़यंत्र रचा था । अछूतानंद ने अपने नाटकों में ऐसे मर्म को छूनेवाले संवादों को रखा है जिससे दर्शक तथा पाठक को राम के प्रति अपनी मानसिकता बदलने को प्रेरित करते हैं और राम के वर्चस्ववाद को प्रस्तुत करते हैं ।
हिंदी दलित नाटक की इसी परंपरा में महत्त्वपूर्ण रूप से शिवप्रसन्नदास का 'हरिजन', माता प्रसाद का 'अछूत का बेटा', 'धर्म के नाम पर धोखा', 'प्रतिशोध', मोहनदास नेमिशराय का 'अदालतनामा', 'हैलो कामरेड', डॉ. एन.सिंह का 'कठौती में गंगा', एन.आर. सागर का 'मार्ग का काटा', 'अन्तिम अवरोध', सुनील कुमार सुमन द्वारा लिखित 'एक बार फिर', एल.एम. धर्मरत कृत 'अछूत का प्यार', कर्मशील भारती द्वारा लिखित 'मान सम्मान', 'फांसी', रूपनारायण सोनकर द्वारा लिखित 'विषधर', 'एक दलित डिप्टी कलेक्टर', 'महानायक', रत्नकुमार सांभरिया द्वारा लिखित 'वीमा', सुशीला टाकभौरे का 'नंगा सत्य', आदि प्रमुख नाटक है।
दलित नाटक और रंगमंच की दृष्टि से कर्मशील भारती और धर्मवीर ने दिल्ली में दलित न्याय मंच स्थापित किया था। जिसके द्वारा अनेक दलित नाटकों का मंचन हुआ । कर्मशील भारती के अनेक नाटकों का यहाँ सफलतापूर्वक मंचन भी हुआ है। जिसमें - 'मेरा वजूद', 'फाँसी', 'संवादों के पीछे', आदि प्रमुखता से देखे जा सकते हैं । उन्होंने 10 अक्टूबर, 1989 को विजयादशमी के दिन मुनीरका गाँव में 'मेरा वजूद', नाटक का मंचन किया था। उन्होंने 'मान-सन्मान', 'श्रेष्ठ-कौन', 'झुठा अहंकार', 'आजादी किसकी', आदि नाटकों का भी मंचन किया है। साथ ही वरिष्ठ दलित कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित 'दो चेहरे' नाटक भी कई नाट्य संस्थाओं द्वारा मंचित हुआ है।
60 के दशक में प्रसिद्ध रंगकर्मी रमेश मेहता ने एक नाटक लिखा था, जिसका नाम था - 'रोटी और बेटी'। नाटक के माध्यम से उन्होंने जातीय आधार पर लोगों को उद्वेलित और उत्तेजित करती आ रही ज्वलंत समस्या को उजागर किया है। इसी परंपरा में आगे 1977 में मनोहर लाल मानव ने 'चावली' नामक नाटक की निर्मिती की। इसकी मूल थीम दलित समाज के पढ़े-लिखे तबके में मध्यवर्गीय मूल्यों के प्रति रूझान और समाज का झकझोर कर उन्हें शिक्षित समाज के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देना है। इस नाटक का निर्देशन आनन्द कुमार ने किया था।  यह नाटक अनेक सार्वजनिक सभाओं में और दलित बस्तियों में मंचित हुआ था । 1980 मे मनोहरलाल और डालचंद के संयुक्त प्रयास से एल.के. रैना के द्वारा 'कबिरा खड़ा बाजार में', विशेष रूप से दलित लोगों के लिए मंचित किया ।
जहाँ तक दलित समाज के शौकिया, नाटककारों की बात है, उसमें उत्तर प्रदेश के ही नाटककारों ने कई प्रस्तुतियाँ की । एकलव्य के जीवन पर वर्तमान के संदर्भ को लेकर भीमसेन संतोष द्वारा 'शोषित के नाम संतोष का पैगाम' नाटक लिखा, जो शोषित साहित्य प्रकाशन, दिल्ली की ओर से 1983 में प्रकाशित हुआ। इस नाटक में उन्होंने दलितों के भीतर की पीड़ा को बाहर लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार दलित नाटकों का लेखन और मंचन आज भी होता हुआ दिखाई देता है।
वर्तमान समय में दलित नाटककार सिनेमा और सिरियल के चकाचौंध से प्रभावित तो हुए हैं, किंतु वह अपने मूल उद्देश्य से दूर नहीं गये । वह आंबेडकरी विचारों से हटे नहीं है। वह सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं । भले ही आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी के सामने अनेक समस्याएँ है किंतु बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणा से दलित नाटककार, दलित नाटक, दलित रंगभूमी और दलित कलाकार आज आगे बढ़ रहा है।
संदर्भ :
1) मोहनदास नेमिशराय, दलित साहित्य अवधारणा में रंगमंच, पृ. 54
2) संपा. मनोहर भंडारी, दलित साहित्य समग्र परिदृश्य, पृ. 149
3) दशरथ ओझा, हिंदी नाटक का उद्भव और विकास, पृ. 53
4) संपा. डॉ. उमाकांत बिरादार, डॉ. विजकुमार रोडे, दलित विमर्श : नाटक तथा रंगमंच, पृ. 138

संप्रति :
1)    प्रोफेसर डॉ. संजय राठोड
हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004
चलभाष् - 9421686342
ई-मेल - drsanjayrathod5@gmail.com

                 तथा

2) विकास सूर्यकांत वाघमारे
शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), सेट, एम.फिल.,                 पी.जी. डिप्लोमा, पी-एच.डी. (कार्यरत) आदि ।
चलभाष् : 9518325363, 9075181603
ई-मेल :waghamarev12@gmail.com

पत्राचार का पता : शोधार्थी, हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004

रविवार, 5 मार्च 2023

हिंदी दलित नाटक और रंगमंच

प्रो. डॉ. संजय राठोड    
श्री. विकास वाघमारे
 
        हिंदी दलित साहित्य की अवधारणा में नाटक या रंगमंच को देखे तो भारतीय समाज में जातियों के परस्पर टकराव झेलती जातियों का संघर्ष नजर आता है। यहाँ दर्द भी है और अधिकार की माँग भी। इसी चाह, आंदोलन और वैमनस्य तथा आक्रोश के गर्भ से दलित नाटक तथा रंगमंच का निर्माण हुआ। दलित नाटककार एवं रंगकर्मियों ने अपनी अस्मिता तथा संस्कृति को पहचाना और हिंदी हिंदू रंगमंच के समान अपनी मौजूदगी दर्ज की। जब हम दलित नाटक या दलित रंगमंच की ओर देखते हैं तो कुछ बातें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अत्याचार सहते हमारी जातीय बंधु, सवर्ण पुरूषों द्वारा बलात्कार का शिकार होती हमारी माँ, बहने, बेटियाँ तथा देवदासी प्रथा के अंतर्गत हिंदू देवताओं के प्रतिनिधियों के हवस की शिकार धर्म भीरू महिलाएँ, मंदिरों में अपनी इज्जत बचाने के लिए चिल्लाती तथा अंधविश्वास की शिकार महिलाएँ यह सब जो होता है वह भारत में स्थापित सवर्णवादी व्यवस्था के कारण । सवर्णवादी व्यवस्था के उत्पीड़न की प्रतिक्रिया स्वरूप दलित साहित्य की एक मजबूत विधा के रूप में नाटक की उत्पत्ति हुई । सबसे पहले दलित समाज में इस व्यवस्था के प्रति आक्रोश निर्माण हुआ और इसी आक्रोश ने आंदोलन का रूप ले लिया । इसी आंदोलन के गर्भ से नाटक का जन्म हुआ । स्वयं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, ''मेरे दस भाषणों से कई अधिक एक नाटक की प्रस्तुति लोगों पर असर डालती है।''1 मानवीय मूल्यों की स्थापना करना दलित नाटक तथा रंगमंच का मुख्य उद्देश्य रहा है। इसका निर्माता संवेदनशील होने के कारण अपनी वेदना, अपने उपर होने वाले अत्याचार, अपने अधिकारों का होता हनन, छटपटाहट को नाटक द्वारा व्यक्त कर समाज में चेतना निर्माण करने का कार्य करता है।
         उपर हमने कहाँ है कि दलित नाटक की उत्पत्ति बहुत मजबूत रूप से हुई है। किंतु इसके बावजूद भी यह विधा अचर्चित दिखाई देती है। इसके कई कारण हमें दिखाई देते हैं। यह नाटक जब-जब कहीं खेले जाते हैं या इसका मंचन होता है तब इसका काफी विरोध होता रहा है। व्यावसायिक नाटकों से इसका संघर्ष, रंगमंच की प्रतिकुलता, लेखकों की आर्थिक उदारता, प्रकाशक वर्ग द्वारा इनकी होती उपेक्षा आदि अनेक कारण इसके अचर्चा के रहे हैं ।
          मूलत: नाटक यह विधा दलितों की ही देन है। शुरू से ही दलित समाज उत्पादक और श्रमजीवी रहा है। यह लोग दिन भर मजदूरी करके जब रात को वापिस आते हैं तो मनोरंजन के लिए अनेक कलाएँ प्रस्तुत करते थे । बिमारियों से मुक्ति, अकाल, अनावृष्टि से बचने के लिए यह लोग मुखौटा, जानवरों की खाल लगाकर नृत्य करते थे। नाटक का प्राथमिक रूप यही रहा है। मोहनदास नैमिशराय ने दलित नाट्य परंपरा को लोकनाट्य परंपरा से जोड़ते हुए लिखा है, ''मैं अगर कहूँ कि हर रंगकर्मी के भीतर उसकी स्मृतियों का दबाव होता है तो गलत नहीं होगा । थिएटर और लेखन के प्रति मेरे अनुराग का कारण भी वहीं रहा है। उसे विकसित किया सांग, ढोला तथा नौटंकी ने हमारे पड़ोसी लगभग अल्हा-उदल की कथा सुनते थे । बाद में मुझे पता चला वे हमारे पुरखे थे । उनकी बहादूरी के किस्से हमें रोमांचित करते थे। बिहार में 'राजा सल्हेस' का किस्सा लगभग इसी तरह का है। उस किस्से में अस्मिता का भाव है। साथ हमलावर को जवाब देने की प्रवृत्ति भी, दलितों के लिए नाटक से जुड़ना व्यक्तिगत रूची की बात कम और सामूहिक अधिक है।''2
           मनोरंजन की जो तमाम विधाएँ है वह दलितों से ही विकसित होती नजर आती है। जैसे - नट, नृत्य, गायन इत्यादी । गाँव में नट-नटी के करतब दिखाने के लिए भाड़े-भड़ौती करना, विदूषक, मसखरा, बहरूपिया बनना, किसी के गुणों-अवगुणों का गा-गाकर प्रचार करना दलित लोग ही करते थे। इसी कलाओं को आगे चलकर नाटक का स्वरूप प्राप्त हुआ । कोई भी लोककला क्यों न हो, जैसे - जलसा, लावणी या नाटक उसमें काम करनेवाले ज्यादातर लोग दलित समाज के ही होते हैं । इससे पता चलता है कि नाटक दलितों के द्वारा ही खेला जाता है ।
           वस्तुत: नाटकों का विवेचन दो रूपों में हम कर सकते है। वर्तमान में नाटक के दो रूप हमें दिखाई देते हैं। एक वह नाटक जो रंगमंच के अधिन है। जिसका निर्माण ही रंगमंच को आधार बनाकर किया जाता है । जिसे आज हम मूल प्रवाह का नाटक कहते हैं । जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन तथा अर्थ प्राप्ती ही होता है। लेकिन दलित नाटक इससे अलग है। यह दलितों द्वारा ही लिखा जाता है । यह अलग बात है कि आज गैर दलित लेखक भी दलितों के उपर लिख रहे हैं। लेकिन यह लेखन सहानुभूतिपरक होता है। परंतु आज दलितों को सहानुभूति नहीं चाहिए । क्योंकि सहानुभूति से कोई प्रश्न हल नहीं हो सकत हैं ।
          एक तरफ वह नाटक है जिसके पास पूरी तरह से रंगमंच होता है और एक ओर वह नाटक है जिसके पास कोई विशेष रंगमंच ही नहीं है । इसे हम दलित नाटक कहते हैं । इसके पास न कोई रंगमंच है न रंगमंच की कोई साधन सामग्री। सही बात तो यह है कि दलित नाटकों को इन साधनों की कोई जरूरत ही नहीं होती । इसकी थीम ही इतनी सशकत होती है कि बिना किसी साधन-सामग्री तथा रंगमंच के बीना ही यह दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ जाती है । यह नाटक जिसने भोगा है, उसके द्वारा लिखने के कारण उसमें अभिव्यक्ति सामर्थ्य इतना होता है कि उसे संगीत, प्रकाश, वस्त्रसज्जा आदि साधनों की कोई जरूरत नहीं होती । इसीलिए इसे मुक्त नाटक भी कहा जाता है।
          मूलत: हिंदी में दलित रंगमंच का जो प्रारूप है वह लोकरंगमंच है। लोकमंच पर काम करनेवाले लोग दलित ही रहे हैं । उसमें काम करने वाला वर्ग दलित ही रहा है। जो लोककलाएँ थी, उन्होंने ही आगे चलकर नाटक का रूप धारण किया । इस संदर्भ में दशरथ ओझा का मानना है कि, ''हिंदी नाटक की परंपरा का मूल स्रोत यह जन-नाटक ही है, जो स्वांग आदि नाम से अपने प्राचीन रूप से अब तक विद्यमान है। क्रमश: इन जन-नाटकों की एक शाखा ने विकसित होकर साहित्यिक रूप धारण किया।''3
           आज दलित साहित्य के अंतर्गत नाटक विधा प्रमुखता के साथ हमारे सामने आती है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के प्रेरणा से आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी आगे बढ़ रही है। इतिहास में घटित अनेक प्रसंग एवं घटनाओं ने दलित नाटककारों को लिखने के लिए प्रेरित किया है। इतिहास में ऐसे कई पात्र है जिनके मानवी हक को नकार कर उन्हें केवल जैविक रूप में देखा गया है । ऐसे पात्रों की वकालत करने का काम इस रंगभूमी ने किया है। वरिष्ठ आत्मकथाकार कौशल्या बैसंत्री के अनुसार, ''निश्चित ही नकारे हुए मानवीय हक को प्राप्त करने के लिए दलित रंगभूमी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।''4
         20 वीं सदी में सबसे पहले स्वामी अछूतानंद ने हिंदी दलित नाट्य लेखन को लेकर पहल की । इनके चार नाटक दृष्टिगोचर होते हैं । इनका पहला नाटक 'रामराज्य न्याय' में रामायण के उपेक्षित तथा जुल्म का शिकार पात्र शंबूक की हत्या का चित्रण है । उनके अन्य नाटक, 'मायानन्द बलिदान', 'पारख-पद', 'बली छलन', यह हिंदू शास्त्रों और वाङ्मय के ऐसे पात्रों पर लिखे गए हैं, जिनके उत्पीड़न को सवर्ण साहित्यकारों और समाज ने त्यागा या बलिदान की संज्ञा देकर सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण तथा सवर्ण पात्रों के छल को महिमामंडित करने का षड़यंत्र रचा था । अछूतानंद ने अपने नाटकों में ऐसे मर्म को छूनेवाले संवादों को रखा है जिससे दर्शक तथा पाठक को राम के प्रति अपनी मानसिकता बदलने को प्रेरित करते हैं और राम के वर्चस्ववाद को प्रस्तुत करते हैं ।
हिंदी दलित नाटक की इसी परंपरा में महत्त्वपूर्ण रूप से शिवप्रसन्नदास का 'हरिजन', माता प्रसाद का 'अछूत का बेटा', 'धर्म के नाम पर धोखा', 'प्रतिशोध', मोहनदास नेमिशराय का 'अदालतनामा', 'हैलो कामरेड', डॉ. एन.सिंह का 'कठौती में गंगा', एन.आर. सागर का 'मार्ग का काटा', 'अन्तिम अवरोध', सुनील कुमार सुमन द्वारा लिखित 'एक बार फिर', एल.एम. धर्मरत कृत 'अछूत का प्यार', कर्मशील भारती द्वारा लिखित 'मान सम्मान', 'फांसी', रूपनारायण सोनकर द्वारा लिखित 'विषधर', 'एक दलित डिप्टी कलेक्टर', 'महानायक', रत्नकुमार सांभरिया द्वारा लिखित 'वीमा', सुशीला टाकभौरे का 'नंगा सत्य', आदि प्रमुख नाटक है।
           दलित नाटक और रंगमंच की दृष्टि से कर्मशील भारती और धर्मवीर ने दिल्ली में दलित न्याय मंच स्थापित किया था। जिसके द्वारा अनेक दलित नाटकों का मंचन हुआ । कर्मशील भारती के अनेक नाटकों का यहाँ सफलतापूर्वक मंचन भी हुआ है। जिसमें - 'मेरा वजूद', 'फाँसी', 'संवादों के पीछे', आदि प्रमुखता से देखे जा सकते हैं । उन्होंने 10 अक्टूबर, 1989 को विजयादशमी के दिन मुनीरका गाँव में 'मेरा वजूद', नाटक का मंचन किया था। उन्होंने 'मान-सन्मान', 'श्रेष्ठ-कौन', 'झुठा अहंकार', 'आजादी किसकी', आदि नाटकों का भी मंचन किया है। साथ ही वरिष्ठ दलित कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित 'दो चेहरे' नाटक भी कई नाट्य संस्थाओं द्वारा मंचित हुआ है।
          60 के दशक में प्रसिद्ध रंगकर्मी रमेश मेहता ने एक नाटक लिखा था, जिसका नाम था - 'रोटी और बेटी'। नाटक के माध्यम से उन्होंने जातीय आधार पर लोगों को उद्वेलित और उत्तेजित करती आ रही ज्वलंत समस्या को उजागर किया है। इसी परंपरा में आगे 1977 में मनोहर लाल मानव ने 'चावली' नामक नाटक की निर्मिती की। इसकी मूल थीम दलित समाज के पढ़े-लिखे तबके में मध्यवर्गीय मूल्यों के प्रति रूझान और समाज का झकझोर कर उन्हें शिक्षित समाज के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देना है। इस नाटक का निर्देशन आनन्द कुमार ने किया था।  यह नाटक अनेक सार्वजनिक सभाओं में और दलित बस्तियों में मंचित हुआ था । 1980 मे मनोहरलाल और डालचंद के संयुक्त प्रयास से एल.के. रैना के द्वारा 'कबिरा खड़ा बाजार में', विशेष रूप से दलित लोगों के लिए मंचित किया ।
          जहाँ तक दलित समाज के शौकिया, नाटककारों की बात है, उसमें उत्तर प्रदेश के ही नाटककारों ने कई प्रस्तुतियाँ की । एकलव्य के जीवन पर वर्तमान के संदर्भ को लेकर भीमसेन संतोष द्वारा 'शोषित के नाम संतोष का पैगाम' नाटक लिखा, जो शोषित साहित्य प्रकाशन, दिल्ली की ओर से 1983 में प्रकाशित हुआ। इस नाटक में उन्होंने दलितों के भीतर की पीड़ा को बाहर लाने का प्रयास किया है। इस प्रकार दलित नाटकों का लेखन और मंचन आज भी होता हुआ दिखाई देता है।
वर्तमान समय में दलित नाटककार सिनेमा और सिरियल के चकाचौंध से प्रभावित तो हुए हैं, किंतु वह अपने मूल उद्देश्य से दूर नहीं गये । वह आंबेडकरी विचारों से हटे नहीं है। वह सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं । भले ही आज दलित नाटक एवं दलित रंगभूमी के सामने अनेक समस्याएँ है किंतु बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणा से दलित नाटककार, दलित नाटक, दलित रंगभूमी और दलित कलाकार आज आगे बढ़ रहा है।
संदर्भ :
1) मोहनदास नेमिशराय, दलित साहित्य अवधारणा में रंगमंच, पृ. 54
2) संपा. मनोहर भंडारी, दलित साहित्य समग्र परिदृश्य, पृ. 149
3) दशरथ ओझा, हिंदी नाटक का उद्भव और विकास, पृ. 53
4) संपा. डॉ. उमाकांत बिरादार, डॉ. विजकुमार रोडे, दलित विमर्श : नाटक तथा रंगमंच, पृ. 138

संप्रति :
1)    प्रोफेसर डॉ. संजय राठोड
हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004
चलभाष् - 9421686342
ई-मेल - drsanjayrathod5@gmail.com
                 तथा
2) विकास सूर्यकांत वाघमारे
शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), सेट, एम.फिल.,  पी.जी. डिप्लोमा, पी-एच.डी. (कार्यरत) आदि ।
चलभाष् : 9518325363, 9075181603
ई-मेल :waghamarev12@gmail.com

पत्राचार का पता : शोधार्थी, हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, पिन-431004

शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

महाराष्ट्र के वैचारिक परंपरा में राजर्षि शाहू महाराज का योगदान

 वाढेकर रामेश्वर महादेव
 
            महाराष्ट्र का इतिहास प्राचीन है। अनेक घरानों  की  सत्ता   महाराष्ट्र   पर  थी, जिनमें से सर्व  प्रथम  'मौर्य' घरानों की  सत्ता  थी । इसके  पश्चात सातवाहन,वाकाटक ,चालुक्य , राष्ट्रकूट , यादव,तुघलक,आदिलशाही,निजामशाही,
वरिदशाही,  कुतुबशाही,  इमामशाही   आदि   प्रमुख घरानों की सत्ता आयी। इनमें  से कई  शासन में आम लोगों का शोषण होता था। धर्म, जाति  के नाम झगड़े होते थे। सत्रहवीं  सदी  परिवर्तन  के रूप में सामने आयी। छत्रपति शिवाजी महाराज ने तत्कालीन समय सभी जाति,धर्म को एकत्रित किया।समाज की गलत रूढ़ि का विरोध किया। स्वराज्य की स्थापना की।जुल्मी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष  करते   रहे।  कालांतर  से  परिवर्तन  की शुरुआत  हुई।  वैचारिक  विचारों  की  पृष्ठभूमि निर्माण होने लगी।
                   वारकरी संप्रदाय महाराष्ट्र के लिए वरदान साबित हुआ।उन्होंने प्रबोधन के  माध्यम  से  समाज  जागृति  की।  सभी जाति, धर्म  को समान माना। जाति भेद, अस्पृश्यता नष्ट   करने की कोशिश  की।  समानता  निर्माण  करने  का प्रयास किया।संत से प्रेरणा लेकर कई व्यक्तियों ने तत्कालीन समय कार्य किया। वर्तमान में  भी कर  रहे  हैं ।  परिणाम   समाज  में  सामाजिक क्रांति हुई।
         क्रांति के दृष्टि से उन्नसवीं सदी महत्वपूर्ण रही। क्योंकि  कई समाज  सुधारक, सामाजिक संस्था  का  निर्माण  हुआ।  समाज  में  प्रचलित रूढ़ि, परंपरा, जातिभेद,  अस्पृश्यता,  वर्णभेद, अंधश्रद्धा  आदि  का  विरोध  किया। आधुनिक  क्रांति शुरू हुई। सिर्फ  विरोध नहीं  किया, कार्य निरंतर करते  रहे। इन्हीं  कारणवश  वर्तमान  में महाराष्ट्र को पुरोगामी विचार  से  पहचाना जाता है । महाराष्ट्र  की  वैचारिक  परंपरा   प्राचीन  है, तथागत  गौतम  बुद्ध  के विचार  से  शुरू  होती  है।  आधुनिक  काल  में  जगन्नाथ  शंकर   शेट, बाळशास्री  जांभेकर, दादोबा  पांडुरंग , गोपाळ हरि  देशमुख , भाऊ   दाजी  लाड, विष्णु  बुआ ब्रह्मचारी, महात्मा ज्योतिबा फुले, विष्णु शास्त्री, सावित्रीबाई  फुले, रा. गो. भांडारकर, न्यायमूर्ति गोविंद  रानाडे, गोपाळ  गणेश  आगरकर,धोंडो केशव  कर्वे, रमाबाई   रानाडे, पंडिता  रमाबाई, गोपाळ  कृष्ण   गोखले,  विठ्ठल   रामजी  शिंदे, कर्मवीर   भाऊराव   पाटिल ,  डाॅ.  बाबासाहेब आंबेडकर,राजर्षि शाहू महाराज,लहूजी साळवे, ताराबाई बापुजी शिंदे,भास्कर राव जाधव,बाबा पदमजी,भाऊ महाजन,मुक्ता साळवे, कृष्ण राव भालेकर, नारायण लोखंडे, लक्ष्मी बाई  टिळक, काशीबाई कानिटकर,रखमाबाई राऊत, आनंदी बाई   जोशी , विष्णु   शास्त्री  पंडित  आदि  का योगदान रहा। वर्तमान में भी उनसे प्रेरणा लेकर कई व्यक्ति कार्य  कर रहे हैं। विचार  आगे  बढ़ा रहे है। महाराष्ट्र की वैचारिक परंपरा में  जिन्होंने योगदान  दिया, उनमें   से  प्रमुख  व्यक्तियों   के विचार पर प्रकाश डालेंगे।

महाराष्ट्र की वैचारिक परंपरा
                 धर्म के नाम पर बहुजन समाज का शोषण कल भी होता था, आज भी होता है और शायद आने वाले समय में भी होगा। हर धर्म  में  कोई बुरी परंपरा रहती है। इससे आम लोगों का मानसिक, शारीरिक  शोषण   होता  है । शोषण  विरुद्ध   महात्मा  ज्योतिबा  फुले  ने  तत्कालीन समय  आवाज  उठाई। उन्होंने  किसी  धर्म  का विरोध नहीं किया, धर्म में प्रचलित रूढ़ि, परंपरा का विरोध किया। वे  धर्म को दोष नहीं देते, धर्म के अनुयाई  को  दोष देते  हैं। हर  धर्म में भेद है चाहे   ख्रिश्चन  हो,  मुस्लिम  हो, जैन  हो,  बौद्ध हो,हिंदू हो। जहा भेद वहां उच-नीचता आती है। वे भेदभाव का निरंतर विरोध करते रहे।
                सनातनी ब्राह्मण बहुजन समाज का निरंतर शोषण करते रहे ,वर्तमान में भी कर  रहे   है  किंतु कम मात्रा में।लोगों में भेदभाव  निर्माण  किया, खुद  के  स्वार्थ के लिए। बहुजन  समाज को धार्मिक  विचार  में  बांध  रखा। पाप- पुण्य, स्वर्ग- नरक आदि काल्पनिक घटनाओं में लोगों को  व्यस्त रखा। यात्रा, गृह प्रवेश, जन्म,विवाह, मृत्यु , उत्सव  आदि   से   बहुजन   समाज  का आर्थिक शोषण करते रहे। धार्मिकता के  गुलाम बनाते रहे। सनातनी  ब्राह्मण के  विचार  गुलामी से   मुक्ति  मिले,  इसलिए   सत्यशोधक  विवाह पद्धति  शुरू  की। पद्धति  में  मंगलाष्टक  कहने ब्राह्मण की  जरूरत  नहीं  थी । वर, वधू  दो ,दो मंगलाष्टक और पाॅंचवी  समारोह  में आया  एक व्यक्ति कहता था।सनातनी ब्राह्मण की मक्तेदारी खत्म होना शुरू हुआ। बहुजन समाज मुक्त होने लगा।  सनातनी  ब्राह्मण  के  धार्मिक विचार के संदर्भ  में   महात्मा  ज्योतिबा  फुले  कहते  है , " ब्राह्मणों ने  बच्चों के जन्म, विवाह, ग्रह  प्रवेश मृत्यु, नए  वर्ष, विभिन्न  त्योहारों,हर  जगह  की वार्षिक, अर्धवार्षिक या मासिक यात्रा  इस तरह की  घटनाऍं  यानी  सामान्य  मनुष्य  को निरंतर लूट के प्रसंग बना दिए।"1  वर्तमान  में  धार्मिक रूढ़ि, परंपरा का बोलबाला  दिखाई  दे  रहा है, इसके परिणाम गंभीर हो रहे हैं। इनमें  परिवर्तन होना जरूरी है, इसलिए महात्मा ज्योतिबा  फुले के विचार को आत्मसात करना समय  की  माॅंग है।
      धोंडो केशव कर्वे ने स्री शिक्षा,स्री पुनर्विवाह के  लिए  निरंतर कार्य किया। स्री  की  सुधारना उनके जीवन का  उद्देश्य  था। तत्कालीन  समय बाल  विवाह  होते थे। परिणाम स्री जल्द विधवा होती  थी । विवाह  क्या  होता  है?यह  भी  उसे अच्छी तरह समझ  नहीं आता  था। उसका कई माध्यम  से  शोषण  होता  था। इन  समस्या की तरफ धोंडो  केशव  कर्वे   ने ध्यान  दिया।  बाल विवाह प्रथा पर पाबंदी  हो, यह अंग्रेज  सरकार को  बताने  की  कोशिश  की। 1856 में विधवा पुनर्विवाह कानून बना, किंतु विधवा विवाह नहीं हो रहे थे। विधवा विवाह हो, इसलिए मानव धर्म सभा,परमहंस सभा,प्रार्थना समाज,सत्यशोधक समाज, आर्य   समाज  आदि  ने   निरंतर  कार्य किया।संस्था के कार्य का आदर्श सामने रखकर धोंडो  केशव   कर्वे  ने   सामाजिक  कार्य  शुरू किया। कालांतर  से  महाराष्ट्र  में  विधवा विवाह होने लगे।
                विधवा विवाह को ज्यादातर  विरोध ब्राह्मण  जाति से  था।  विधवा  की  पीड़ा  धोंडो केशव  कर्वे  ने  नजदीक  से  देखी  थी । उन्होंने उद्धार करने  का ठान  लिया  था। उनका विवाह भी बाल विवाह था। विवाह के समय उनकी उम्र पंद्रह  वर्ष  और पत्नी  राधाबाई  की उम्र नौ वर्ष थी।पत्नी राधाबाई का देहांत जल्द यानी 1891 में हुआ, तब धोंडो केशव कर्वे पैंतीस वर्ष के थे। विधवा की  समस्या जान  चुके  थे। उन्होंने  तय किया  कि  मैं विवाह करूंगा तो विधवा स्त्री से। वह  भी  प्रौढ़  स्री  से।  परिवार  के  सदस्य  को समझा कर विधवा स्त्री से विवाह किया। विधवा विवाह  के  संदर्भ में धोंडो केशव कर्वे के विचार है," 11मार्च,1893 को कुंवारी लड़की से शादी न  करके  मुंबई  में  पंडिता  रमाबाई  के  शारदा आश्रम  में चार  साल  रहने वाली  गोदुबाई नाम की  अटठाईस  वर्षीय  विधवा  स्री से पुनर्विवाह करके समाज के सामने आदर्श निर्माण किया।" 2  वे  सिर्फ  बोलते  नहीं  थे, खुद  कार्य  करते थे,बाद  में दूसरों  को  बताते थे। इसी से उनकी कथनी और  करनी  में  कोई अंतर नहीं था, यह समझ आता है।
             तत्कालीन  व्यवस्था में धर्म का वर्चस्व था। धर्म  के  नाम  पर स्री का शोषण होता था। स्री जीवन  शाप  बन  चुका  था। देवदासी प्रथा, मुरळी  प्रथा,  बाल  विवाह, विधवा  पन, जरठ विवाह आदि प्रमुख समस्या प्रचलित थी। गलत परंपरा  का  कई  समाज   सुधारक   ने  विरोध किया, जिसमें  प्रमुख  नाम  था  विठ्ठल  रामजी  शिंदे।  समस्या  पर  हल  निकालने  की  उन्होंने निरंतर  कोशिश  की।  स्री को  नई ज़िंदगी  दी। विठ्ठल रामजी  शिंदे  प्रार्थना समाज के अनुयाई थे। उन्होंने  समाज में जागृति  की।  धर्म  शिक्षा के लिए  इंग्लैंड  गए। वहाॅं  दो  वर्ष रहे। जाने के लिए पैसे नहीं थे, तब सयाजीराव  गायकवाड ने  आर्थिक सहायता की।  इंग्लैंड  में विठ्ठल रामजी शिंदे  ने  कई   धर्म   का   तुलनात्मक  अध्ययन किया। वहाॅं के विचारवंत से  चर्चा  की। अलग- अलग विषय के  व्याख्यान सुने। कई  मंदिर  में गए, वहां  की  परंपरा देखी। ॲनी बेझंट, रिसडे व्हिड आदि के ग्रंथ पढ़े। कालांतर से स्कॉटलैंड, फ्रान्स,जर्मनी,होलैंड, स्विजरलैंड, इटली  आदि देश की यात्रा की। वहा भी धर्म का ज्ञान हासिल किया। वे होलैंड के ॲमस्टरडॅम में आंतर राष्ट्रीय उदार धर्म  परिषद  को गए। भारतीय  प्रतिनिधि के रूप में वहां 'भारत के उदार धर्म'  विषय  पर व्याख्यान दिया। बुरी परंपरा के  खिलाफ  कार्य करने वाली संस्थाओं  की  जानकारी दी। इंग्लैंड से भारत आने के पश्चात धर्म  सुधार  में तेजी से लगे। धर्म  की  मीमांसा भी की। धार्मिक  विचार के संदर्भ में विठ्ठल  रामजी शिंदे  कहते है, "एक दस  वर्षीय  लड़की  को  जमखेड़ी  गाॅंव में एक अछूत ने  मुरळी  के रूप में छोड़ दिया था। उसे अपने घर  बुलाया  और  उसके  माता-पिता  से मुरळी प्रथा रोकने का आग्रह किया। उन्हें  कहा कि लड़की को पढ़ाना चाहिए। मुरळी  प्रथा नहीं चलानी चाहिऍं।"3  वर्तमान  में  धर्म के नाम पर परंपरा शुरू है किंतु  कम। आज  भी  देवदासी, मुरळी  जैसी  प्रथा  प्रचलित  है।  इन  वजह  से समाज  में, परिवार   में   स्री  को   सम्मान  नहीं मिलता।  संविधान  होकर  भी  भारत  की  यह अवस्था है,इसे नकारा नहीं जा सकता।  प्रथा से स्री को मुक्त करना है तो  पुरुष को  मानसिकता बदलनी  होगी ।  धर्म  का  अंधविश्वास  छोड़ना  होगा।
                समाज में धार्मिक प्रथा प्रचलित थी, वर्तमान में भी है सिर्फ स्वरूप बदला है। परंपरा को  विज्ञान  का आधार  नहीं  था काल्पनिकता  था। इन  विचार  से समाज अंधकार में था। धर्म के कई  नियम थे। पालन नहीं  किया तो धर्म से बहिष्कृत किया जाता था। समाज  में  हर  धर्म की अलग-अलग परंपरा थी,समाज के लिए वह कलंक थी। बुरी  प्रथा  के  माध्यम  से  सनातनी विचार के लोग बहुजन समाज का शोषण करते थे। कोई भी धर्म के विचार बुरे नहीं होते, विचार का प्रसार करने वाले व्यक्ति बुरे होते हैं। खुद के स्वार्थ के लिए गलत विचार का  प्रसार वे  करते हैं।  यह  धर्म   विषयक  कर्मवीर  भाऊराव  की धारणा  थी। वे  रूढ़ि, परंपरा  के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करते रहे।
                  कर्मवीर भाऊराव पाटिल पढ़ाई के लिए करवीर के जैन छात्रावास में थे। तत्कालीन समय  छात्रावास  में   धर्म  के  कई  नियम  थे।  नियम  का  पालन  भाऊराव ने नहीं  किया ।  वे बंडोखोर व्यक्ति थे। उन्होंने  धर्म के सभी नियम को  तोड़ा। इन  कारणवश   छात्रावास  से  उन्हें अन्नासाहेब लठ्ठे ने निकाल  दिया। छात्रावास  से बाहर  जाना  पसंद  किया, लेकिन  किसी   की  माफी  नहीं   माॅंगी।  क्योंकि   वे  विज्ञान   वादी विचार पर विश्वास रखते थे। सभी जाति धर्म के व्यक्ति  के  साथ  भोजन  करते  थे। अस्पृश्यता पालन  कभी  नहीं  किया। उन्होंने सनातनी वर्ग का त्रास सहा, किंतु धार्मिक परिवर्तन कार्य अंत तक नहीं छोड़ा। धार्मिकता के संदर्भ में कर्मवीर भाऊराव  पाटिल  कहते  है, "हर  एक लड़के ने खाना सोवळे  परिधान  करके ही खाना चाहिए, और खाने से पहले हर  एक लड़के ने  दाढ़ी  या हजामत  करना  चाहिऍं।"4  समाज  ने  विज्ञान वादी विचार पर विश्वास रखना चाहिए, यह बात उन्होंने कहीं। वर्तमान में महापुरुष के विचार पर चिंतन होना जरूरी है,तब  मानसिक  गुलामी से बहुजन समाज मुक्त हो सकता है।
                जाति, धर्म के नाम पर प्राचीन काल से समाज में विषमता थी और वर्तमान में भी है। विषमता नष्ट करने का प्रयास तत्कालीन  समय भीमराव   रामजी  आंबेडकर  ने  किया।  उनके पिताजी रामजी पुरोगामी विचार के थे।  उन्होंने कबीर  पंथ   की   दीक्षा   ली  थी।  परिवार  को वैचारिक विचार का वारसा  था। बचपन में धर्म, जाति  के  नाम  भीमराव  आंबेडकर   को  नीच ठहराया  गया। उन्होंने  कालांतर  से  धार्मिकता पर  चिंतन,  मनन   किया ।  समाज  कार्य   की शुरुआत   की ।  जाति  के   नाम  पर  अस्पृश्य समाज   के   अधिकार   छीन  लिए  थे।  उनके अधिकार  के  लिए  संघर्ष  जारी   रखा।  महाड सत्याग्रह,कालाराम मंदिर  प्रवेश  यह धार्मिकता प्रतिकार है। वे  सभी  को  समान  अधिकार की माॅंग  करते   रहे । सनातनी   लोगों   से  निरंतर झगड़ते   रहे । हिंदू   होकर  अस्पृश्य  को   हीन वागणूक   क्यों?   यह   सवाल   उच्च   वर्गों  से भीमराव आंबेडकर पूछते रहे।
                   अस्पृश्य समाज पर उच्च वर्ग का अत्याचार बढ़ रहा था। बहुजन समाज सनातनी विचार   का   मानसिक   गुलाम   बन  रहा  था। कर्मकांड  में  व्यस्त   रहता   था।  पैसे  धार्मिक कर्मकांड  में  उड़ाने लगा। ईश्वर पर अंधविश्वास रखने लगा। ईश्वर  के नाम   पशु  की  बलि देता रहा।  इसके  पीछे का  कारण सिर्फ अज्ञान था। इन  समस्या  से  भीमराव आंबेडकर ने अस्पृश्य समाज  को  बाहर निकालने  की  कोशिश  की। धार्मिक  कर्मकांड  के  संदर्भ  में  वे  कहते है, " जन्म, मृत्यु  के  समय  धर्म के नाम  पर विभिन्न क्रियाकलाप  करने   में   वे  अपनी  मेहनत  की कमाई  खर्च   करने  में  नहीं  हिचकिचाते।  हम उनसे  विनती  करते  हैं  कि  वे  अपने  कर्म  के परिणामों  को  अधिक  बारीकी   से  देखें।  तब समझ  जाएंगे  कि इस  कारण  पैसे की बर्बादी होती है, सच्चे  धर्म  की रक्षा भी नहीं होती और अयोग्य दान करने से पुण्य  भी नहीं मिलता।"5 वर्तमान  में   कई   व्यक्ति  धार्मिक   परंपरा  पर व्याख्यान देते हैं, वही  दिन- रात ईश्वर की पूजा में   व्यस्त   रहते   हैं।  भीमराव  आंबेडकर   के धार्मिक  विचार  पर  बातचीत  करते  हैं लेकिन उनके   गुण , विचार  आचरण  में   नहीं   लाते। परिणाम  बहुजन  समाज  धार्मिक   पाखंड  में पिस्ता जा रहा है। परिस्थिति  में परिवर्तन करना है  तो भीमराव  आंबेडकर  के विचार पर चिंतन करने की सख्त जरूरत है। उसका अमल भी!
                   प्राचीन समय समाज में अंधश्रद्धा का बोलबाला था। बहुजन  समाज  में  शिक्षा न के  बराबर थी। भूत, प्रेत  के  नाम  पर  बहुजन समाज   का   शोषण   होता   रहा।  समाज   में विषमता थी। इसे  प्रबोधन  के  माध्यम  से   दूर करने का प्रयास राजर्षि शाहू महाराज ने किया। रूढ़ि, परंपरा   के  माध्यम  से   बहुजन  समाज पर अत्याचार होते थे। हीन नजर  से देखा जाता था। इसे खत्म करने का प्रयास वे निरंतर  करते रहे। वर्ण  व्यवस्था  का  विरोध किया। कालांतर से  समाज  में  बदलाव  संभव  हुआ। जाति  के आधार पर व्यवसाय तय थे, यह प्रथा नष्ट करने की  कोशिश  की। कोई  भी  व्यक्ति  किसी  भी व्यवसाय में जा सकता है, व्यवसाय कर सकता है, यह  अहसास  करके दिया। परिणाम समाज में समता, स्वतंत्रता,बंधुता  निर्माण हुई।  राजर्षि शाहू महाराज श्रद्धा रखते थे, अंधश्रद्धा नहीं। वे भगवान को मानते थे, किंतु इंसान के रूप में..!
            समाज में कोई भी कार्य करने से पहले मुहूर्त देखा जाता था, आज  भी  देखा जाता है। प्राणियों की बलि दी जाती थी। अभिषेक किया जाता था। इन प्रथा में कई  पैसा खर्च होता था। ऐसी  प्रथा  का  वे   विरोध  करते   रहे।  समाज जागृति की। अंधश्रद्धा  के संदर्भ में राजर्षि शाहू महाराज   के    विचार  है, "हिंदुस्तान  के  सभी भगवान  जमीन  में  दफनाएं  बिना खेती अच्छी तरह से उत्पाद नहीं देगी, ऐसी  मेरी  धारणा  है। खेती को  लगने  वाला पैसा किसान देव, धर्म में व्यर्थ  खर्च  करता  है। किसान  के  कृतित्व एवं खेती  में  उत्पाद  के लिए देव, धर्म  सबसे  बड़ी दिक्कत है।  देहाती  लोग  सप्ताह, भगवान को अभिषेक  करके   बहुत   पैसा  खर्च  करते  हैं। हिंदुस्तान  की  आर्थिक एवं नैतिक प्रगति करनी है तो सभी  भगवान  को  जमीन में दफनाना ही होगा।"6  इसी  से  उनके   विज्ञान वादी  विचार समझ आते हैं।  राजर्षि शाहू महाराज के विचार महाराष्ट्र   के   लिए   वैचारिक   रहे  ।  उन्होंने  सामाजिक,   शैक्षिक,   राजनीतिक,   धार्मिक, सांस्कृतिक  आदि  कार्य  से समाज में परिवर्तन किया।  महात्मा  फुले  और भीमराव आंबेडकर के  बीच  की  कड़ी  के  रूप में कार्य करते रहे। बहुजन  समाज  का  उद्धार किया। गौतम बुद्ध, महात्मा फुले के विचार को आगे बढ़ाया। उनके विचार से प्रेरणा लेकर वर्तमान  में भी कई  लोग कार्य कर रहे हैं, विचार आगे  बढ़ा  रहे हैं। शाहू विचार    का   महाराष्ट्र   को   आगे   बढ़ाने   में   महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसे  इतिहास  साक्षी है, यह कोई भूल नहीं सकता।
               निष्कर्ष के रूप में इतना ही कहा जा सकता  है  कि  महापुरुष  के विचार  समाज के लिए मायने रखते हैं। विचार को आगे बढ़ाने का कार्य हमारा है। किसी  भी महापुरुष को  जाति, धर्म के  अंदर  कैद नहीं  करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने  किसी  एक  जाति  के  लिए  कार्य नहीं किया, तो  समाज  के लिए  कार्य किया। भारत के एकता  के लिए  कार्य  किया। उनके  विचार को लेकर आगे बढ़ना है, उनका सपना  साकार करना है, तभी उनका कार्य सार्थक होगा। शोध आलेख का उद्देश्य भी!


संदर्भ सूची
1) रामकृष्ण कांबळे- महात्मा फुले आणि आधुनिक महाराष्ट्र, कैलाश पब्लिकेशन,
औरंगपुरा, औरंगाबाद-431004, प्रथम संस्करण-2009,पृ.78
2)अनिल कटारे- आधुनिक महाराष्ट्राचा इतिहास, विद्या बुक्स प्रकाशन, औरंगपुरा, औरंगाबाद-431004, प्रथम संस्करण- 2016,पृ.185
3)सुहास कुलकर्णी- महर्षी विठ्ठल रामजी शिंदे,श्री गंधर्व वेद प्रकाशन,सदाशिव पेठ,पुणे- 411030, प्रथम संस्करण-2010,पृ.46
4)रमेश जाधव- कर्मवीर भाऊराव पाटील,श्री गंधर्व वेद प्रकाशन सदाशिव पेठ, पुणे- 411030, प्रथम संस्करण-2010,पृ.38
5)किशोर गायकवाड- घटनेचे शिल्पकार बाबा साहेब आंबेडकर,श्री गंधर्व वेद प्रकाशन सदाशिव पेठ, पुणे-411030,प्रथम संस्करण-2010,पृ.38
6)उत्तमराव मोहिते- वैज्ञानिक संस्कृतिचा दार्शनिक राजर्षी शाहू छत्रपती,जिजाई प्रकाशन,584, नारायण पेठ,कन्याशाळा बसस्टाॅप,जिजापुर,पुणे-411030,
पृ.41

संक्षिप्त परिचय
जन्म:- 20 मई,1991
जन्मस्थान:-ग्राम-सादोळा,तहसील-
माजलगाॅंव,  जिला-बीड, महाराष्ट्र
शिक्षा:-बी.ए.,एम.ए.(हिंदी),एम.
फिल.,सेट,नेट,   पी.जी.डिप्लोमा,पी-एच.डी.(कार्यरत) आदि।
लेखन:- चरित्रहीन,दलाल,सी.एच.बी.इंटरव्
यू,
लड़का  ही  क्यों?,  अकेलापन,  षड़यंत्र, शहीद...! आदि कहानियाॅं विभिन्न पत्रिका में प्रकाशित।भाषा, विवरण,शोध दिशा, अक्षरवार्ता, गगनांचल,युवा हिन्दुस्तानी ज़बान, साहित्य यात्रा, विचार वीथी आदि पत्रिकाओं में लेख तथा संगोष्ठियों में प्रपत्र प्रस्तुति।
संप्रति:- शोध कार्य में अध्ययनरत।
चलभाष् :-9022561824
ईमेल:-rvadhekar@gmail.com
पत्राचार पता:-हिंदी विभाग,डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय,औरंगाबाद - महाराष्ट्र, पिन -431004

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

जयप्रकाश कर्दम कृत्य 'छप्पर' उपन्यास में दलित चेतना

 विकास सूर्यकांत वाघमारे
 
       वर्तमान समय में साहित्य के क्षेत्र में अनेक चर्चाएँ हो रही है। जिसमें दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, नारी विमर्श, किन्नर विमर्श आदि प्रमुख है। वैसे देखा जाए तो दलित साहित्य यह धारा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1960 से अधिक प्रखरता के साथ सामने आयी। इस समय भारत स्वतंत्र हो चुका था। भारतीय समाज और लोगों के मन में ऐसी आशाएँ पल्लवित हो गई थी कि हमारे सभी प्रश्न हल हो जाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। समय के साथ अनेक समस्याएं बढ़ती गई। बेकारी, निर्धनता, बढ़ती आबादी, जातिगत झगड़े, भ्रष्टाचार, जातिवादी राजनीति आदि परिस्थिति के कारण लोगों  का स्वतंत्रता से विश्वास उठ गया और शुरू हुआ अपने अधिकारों एंव प्रश्नो के लिए जन आंदोलन।
   इस समय शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हो गया था। शिक्षा का महत्व समाज के हर वर्ग तक जा चुका था। शिक्षा के कारण गांव से बाहर रहने वाले दलित तथा आदिवासी वर्ग के लोग भी जागृत हो चुके थे। अपने हक एवं अधिकारों को वह भली-भाँति समझ गए थे। एक मनुष्य एक मूल्य यह विचार सर्वत्र फैल चुका था, पर सामाजिक परिस्थिति नहीं बदली थी। समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन तो हुआ लेकिन विषम व्यवस्था और उसके विरुद्ध असंतोष के कारण लोगों के मन में दुख और विद्रोह भी सुलग उठा। समाज की इसी स्थिति का चित्रण इस समय के कवियों तथा लेखकों ने अपने साहित्य के माध्यम से किया। इस समय समाज के विविध वर्गो में नए नए लेखकों का उदय हुआ। इन लेखकों ने अपनी समस्याएं, अपने प्रश्न, अपनी अपेक्षाएं अपने साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त की। जिसमें जयप्रकाश कर्दम ऐसा ही एक नाम है। इन्होंने अपने साहित्य के केंद्र में आम आदमी को रखा है। वह खुद दलित परिवार के होने के कारण उन्हें खुद वर्णवादी व्यवस्था का शिकार होना पड़ा है। उन्होंने जो भोगा वही अपने रचनाओं में चित्रित किया। उनका साहित्य सिर्फ दलित जीवन को ही अभिव्यक्त नहीं करता तो लोगों में चेतना निर्माण करने का काम भी करता है। दलित चेतना को समझने से पहले हमें दलित शब्द को समझना जरूरी है। दलित शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के 'दल' धातु से हुई है। जिसका अर्थ खंडित होना, द्विधा होना होता है। भारतीय प्राचीन साहित्य में शुद्र, दास, चांड़ाल, अस्पृश्य शब्दों का प्रयोग मिलता है जो दलित शब्द का प्राचीन रूप है। अतः दलित शब्द का शब्दगत अर्थ है- रौंदा हुआ, दबाया हुआ, कुचला हुआ आदि। अंततः यह कहा जा सकता है कि दलित साहित्य उस समाज या वर्ग का साहित्य है जो हमेशा से कुचला गया है, दबाया गया है।वर्तमान समय में दलित शब्द को लेकर अनेक वाद विवाद है। लेकिन हमें यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह शब्द किसी जाति या उपजाति से संबंध में न होकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु अंबेडकरवादी एवं अन्य परिवर्तनकामी  विचारधारात्मक वर्गों के संघर्ष का प्रतीक है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में अगर कहना हो तो- "दलित शब्द हमारे लिए एक बहुत ही प्रेरणादायक शब्द है। हम इसे दल के साथ जोड़ते हैं, जो सामूहिक तौर पर कार्य करता है जीवन को सामाजिक तरीके से जीता है और समाज से अलगाव दूर करता है। इसी के आधार पर हमने दलित शब्द को स्वीकार किया है और दलित शब्द एक आंदोलन का प्रतीक है हमारे लिए और ऐसा पहली बार हुआ है इतिहास  में कि दलितों ने अपने लिए एक अपना शब्द चुना है। अभी तक वे अपने लिए दूसरे के दिए शब्दों को स्वीकार किया है यहां तक कि अपने बच्चों के नाम भी दूसरे रखते थे अपने नाम रखने के लिए भी वह स्वतंत्र नहीं थे। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि उन्होंने अपने लिए एक शब्द चुना है जो उनके लिए एक संघर्ष का प्रतीक है।"1
   दलित चेतना का संबंध दलितो कि जागरूकता से है। इसके केंद्र में आत्मसम्मान, गरिमा, अपने मौलिक अधिकारों एवं हक की प्राप्ति है जो ज्योतिबा फुले और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों पर आधारित है। हमारे समाज में विषमता, जातीयता, अन्याय एवं अत्याचार जैसे शोषण के अनेक प्रकारों को नष्ट कर समाज में समता, बंधुता और स्वतंत्रता की स्थापना करना दलित चेतना का मूल उद्देश्य है। इसी उद्देश्य को लेकर जयप्रकाश कर्दम ने अपना साहित्य लिखा।
   कर्दम द्वारा लिखित 'छप्पर' उपन्यास दलित चेतना के संदर्भ में लिखी गई एक सशक्त कृति है। उपन्यास का जो शीर्षक है वह बहुत महत्वपूर्ण है। कई संकेत हमें यह दे जाता है। मिट्टी के घर के ऊपर बाँस, लकड़ी, फूस आदि घर पर डालकर छप्पर बनाया जाता है जो घर में रहने वालों की नैसर्गिक आपदाओ सें सुरक्षा करता है। लेकिन 'छप्पर' शीर्षक उन लोगों की व्यथा को संबोधित करता है जो अपने अधिकार खो बैठे हैं। जो अपने घर से बेघर है। जो शोषण का शिकार है। लेखक इस प्रकार का छप्पर बनाना चाहते हैं जो शोषित और पीड़ित लोगों को अन्याय एवं अत्याचारो से बचाकर उन्हें उनके अधिकार प्रदान करें। समाज में समता प्रस्तापित करें।
   उपन्यास में उत्तर प्रदेश के मातापुर इस छोटे से गांव का चित्रण है। यह गांव केवल उत्तर प्रदेश का ही गांव नहीं है तो भारतीय गावों का प्रतिनिधित्व करता गांव है। भारत देहातों में बटा हुआ देश है। भारत स्वतंत्र होकर आज कई साल बीत गए लेकिन आज गांव की समाज रचना में परिवर्तन नहीं हुआ। वहां की समस्याएं आज भी ज्यों की त्यों दिखाई देती है। शहरों में कहीं अधिक परिवर्तन अवश्य हुआ है। गांवों में अपेक्षाकृत बहुत कम परिवर्तन दिखाई देता है।  जयप्रकाश कर्दम के साहित्य में प्रमुख रूप से दलित समाज रहा है। उन्होंने सहानुभूति नहीं तो स्वानुभूति के आधार पर साहित्य निर्माण करके लोगों में चेतना निर्माण करने का काम किया है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने दलित समाज की सभी संवेदनाओं को छुआ है।
   आज भी गावों में दलित समाज में अनेक समस्याएं निर्माण है। फिर चाहे वह शिक्षा संबंधी हो, अंधविश्वास संबंधी हो, भेदभाव या स्त्री अत्याचार संबंधी। इन सभी समस्याओं को लेखक ने उपन्यास में चित्रित किया है।
   चंदन उपन्यास का प्रमुख पात्र है जो गांव में रहता है। चंदन के माध्यम से लेखक ने दलित समाज का यथार्थ चित्रण किया है। उपन्यास की घटनाएं हमें कहीं पर भी काल्पनिक नहीं दिखाई देती। बल्कि वह मन को सोचने के लिए मजबूर कर देती है। वर्तमान समय में अगर हम गांव में जाकर देखें तो दिखाई देता है कि कितने दलित परिवार के बच्चे पढ़-लिख रहे हैं। गांव में अगर दस घर हो तो एकाध घर का बच्चा ही उच्च शिक्षा में आता है। ऐसा क्यों...?  इसका कारण है उन परिवारों की आर्थिक स्थिति। इन परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं होती कि वह अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दे सके। दलित परिवार के मां-बाप भी कहते हैं अब बेटा बड़ा हो गया है। कुछ कमा सकता है। कमाएगा तो घर में कुछ ना कुछ आर्थिक मदद हो जाएगी। उसे किसी काम पर लगा दिया जाता है। लेखक इन सब बातों का विरोध करते हैं। जो मां-बाप अपनी परिस्थिति के कारण अपने बच्चों को पढ़ाते नहीं है। अगर इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी किया जा सकता है। इस रूप में लेखक ने सुखा को चित्रित किया है। सूखा चमार जाति से है। वह आर्थिक रूप से बहुत कमजोर है। लेकिन वह बाबासाहब को जानता है। शिक्षा के महत्व को उसने पहचाना है। वह खुद भुखा रहकर अपने बेटे चंदन को पढ़ाता है। उसका ब्राह्मणों द्वारा विरोधी होता है। लेकिन सुखा हार नहीं मानता। वह रमिया से कहता है- चुप रह पगली, कोई पेट से बड़ा बनकर आता है। पढ़ लिखकर बड़े बनते हैं सब क्या पता हमारा चंदन भी कल को कलेक्टर या दरोगा बन जाए। अपनी चिंता छोड़ हमें थोड़े दुख उठाने पड़ रहे हैं- तो क्या, दुख के बाद सुख आता है। हमारे दिन भी बहूरेगें कभी न कभी।"2 गांव के ब्राह्मण काला पंडित और ठाकुर हरनाम दोनों सूखा का काफी विरोध करते हैं। पर वह डरता नहीं। चंदन को पढ़ने के लिए शहर भेजता है। इतना विरोध होने के बावजूद अगर कोई व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है और उसका उपयोग अपने समाज के लिए करता है तो वह एक चेतना ही है। यह चेतना लेखक वर्तमान में दलित समाज में निर्माण करना चाहते हैं।
   वर्तमान समय में अपने अधिकार पाने हेतु कई प्रकार के आंदोलन लोग निकाल रहे हैं। आज यह आंदोलन उग्र रूप धारण कर रहे हैं। जिसमें मारपीट अधिक होती दिखाई दे रही है। ऐसे आंदोलनों का लेखक विरोध करते हैं। चंदन ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है जिस कारण वह बाबासाहेब के विचारों तथा कार्य को समझता है। बाबासाहेब के जीवन से वह काफी प्रभावित है। समाज की व्यथा को वह बदलना चाहता है। जिसके लिए वह अपने आपको समाजकार्य में समर्पित करता है। वह बाबासाहेब को अपनी प्रेरणा मानता है। यही कारण है कि वह हिंसा के माध्यम से समाज परिवर्तन नहीं करना चाहता। इस संदर्भ में वह लोगों को इकट्ठा करके समझाता है- "समाज हमें समानता का दर्जा नहीं देता, वह हमें हमारे मनुष्यत्व के साथ स्वीकार नहीं करता, यह समाज का दोष है। समाज धर्म द्वारा प्रेरित और संचालित है। हमारी सामाजिक स्थिति धार्मिक आदेशों का ही परिणाम है। धर्म ग्रंथ ही हमारे शोषण और अत्याचार की जड़े हैं। इन जड़ों को उखाड़ फेंकने की जरूरत है।"3
   हमारे देश में अनेक धर्म दिखाई देते हैं। यहां लोगों पर धर्म का बोलबाला अधिक दिखाई देता है। धर्म के ठेकेदार यहाँ धर्म के आड़ में कई प्रकार से लोगों का शोषण करते दिखाई देते हैं। आज भी यह लोग ईश्वर का भय दिखाकर आम जनता का आर्थिक रूप से शोषण करते हैं। समाज में ऐसी कई धार्मिक विधियाँ है जिससे लोगों को आर्थिक रूप से लूटा जाता है। जैसे- ईश्वर के नाम पर चंदा माँगना। इन बातों का विरोध लेखक ने प्रस्तुत कृति में किया है।
   उपन्यास में धर्म-ग्रंथ का पालन करने वाले उच्च वर्गीय लोग हैं उनका चंदन विरोध करता है। संतनगर और जे-जे कॉलोनी में सुखा गिरने के कारण यज्ञ का आयोजन करने का निर्णय लिया जाता है। लेकिन चंदन को पता है यज्ञ करने से बारिश नहीं होती। वह यज्ञ का विरोध करता है। इस संदर्भ में चंदन कहता है यदि ईश्वर या भगवान की सत्ता को मानना है आस्तिक और नास्तिक होने का आधार
तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक हूं। मैं आत्मा, परमात्मा, ईश्वर या भगवान की सत्ता को स्वीकार नहीं करता। यहां लेखक ने धार्मिक रूढी, परंपरा, अंधश्रद्धाओं का विरोध कर लोगों के मन में जागृति लाने का काम किया है।
   उपन्यास में नारीे शोषण का भी चित्रण हुवा है। ऐसी नारी को यहाँ लेखक ने चित्रित किया है जो हारती नहीं बल्कि संघर्ष करती है। यह रोती नहीं तो आज के नारी को लड़ने के लिए प्रेरित करती है। वह मेहनत मजदूरी करके अपने बेटे को पढ़ाना चाहती है। उपन्यास में कमला नाम की एक स्त्रि पात्र है जिस पर सामूहिक रूप से बलात्कार किया जाता है। लेकिन कमला इतना सब कुछ होकर भी जीती है। वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का बदला लेना चाहती है। इसलिए वह अपने बेटे को पढ़ाना चाहती है। इस बात को लेकर उसके सामने कई प्रकार की रुकावटें आती है। बाप का नाम न होने के कारण वह अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाती। इस परिस्थिति को देखकर चंदन कमला से कहता है- "चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है आपको। नाम तो पहचान का एक साधन है बस। यदि मां से ही बच्चे की पहचान हो, तो पिता की जगह मां का नाम लिखा जा सकता है।"4 ऐसी व्यवस्था का लेखकने यहाँ  विरोध किया हैं जो व्यवस्था दायित्वहीनता में पुरुषों को छूट देती है और स्त्रियों के चरित्रों को लेकर कई प्रश्न खड़े कर देती है।
   लेखक ने उपन्यास में सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से समतामूलक समाज की स्थापना की है। उपन्यास में 'रजनी' नाम की एक पात्र है जो उच्च वर्ग से है। पर वह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रभावित है। साथ ही चंदन के आंदोलन से उसमें चेतना जागृत होती है और आखिर में वह चंदन के आंदोलन में सम्मिलित होती है।
   डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जो त्रिसूत्री बताई है- 'शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो।' इन त्रिसूत्री के आधार पर कर्दम ने चंदन के माध्यम से दलित चेतना का बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया है। चंदन अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बस्ती में स्कूल भी चलाता है। वह लोगों में स्वाभिमान और जागृति पैदा करता है। उन्हें संगठित कर संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। चंदन का यह जन-आंदोलन सर्वत्र गूंज उठता है। आखिर में दलितों पर अत्याचार करने वाले ठाकुर हरनाम भी बदल जाते हैं। वह भी पश्चाताप की अग्नि में जलकर दलितों के साथ अपनत्व का रिश्ता तैयार करते हैं। इतना जो परिवर्तन आया है वह सिर्फ सुखा और चंदन में निर्माण हुई चेतना के कारण।


संदर्भ-
1. ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, पृ. 3
2. डॉ. जयप्रकाश कर्दम, छप्पर, पृ.11
3. वही, पृ. 45
4. वही, पृ. 57



संक्षिप्त परिचय
waghamarev12@gmail.com
पता- हिंदी विभाग, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद
महाराष्ट्र- 431004
लेखन- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शोध आलेख  तथा कहानियाँ प्रकाशित
संप्रति- शोधकार्य में अध्ययनरत
चलभाष- 9518325363, 9075181603

सोमवार, 29 अगस्त 2022

साहित्य में पर्यावरण चेतना

 मोरे औदुंबर बबनराव
 
     पर्यावरण यह प्रत्येक जीव के साथ जुड़ा हुआ है । यह हमारे चारों तरफ व्याप्त होता है।पर्यावरण हमारे जीवन का मूल आधार है। यह हमें सास लेने के लिए हवा, पीने के लिए जल, रहने के लिए भूमि प्रदान करता है। लेकिन मानव प्राकृतिक पर्यावरण में अपने स्वार्थ के लिए परिवर्तन करता है। उसमें मानवीय पर्यावरण का निर्माण किया है। इसका परिणाम जल,वायु और मृदा की स्वच्छता में गिरावट दर्ज की जा रही है।बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग से संपूर्ण मानव जाति खतरे में दिखाई दे रही है।
     भूमंडलीकरण, उदारीकरण के चलते पर्यावरणीय असंतुलन सबसे ज्यादा बढ़ गया है इस संदर्भ में वी.एन. जन्मेजय लिखते हैं कि "आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति और सभ्यता के विकास ने देश की संपदा में वृद्धि की है। औद्योगिकरण, नगरीकरण, यांत्रिकी प्रगति के साथ विशालकाय मिल,फैक्ट्री, कारखाने स्थापित किए हैं। कृषि में विज्ञान का प्रवेश हुआ वैज्ञानिक खेती करने के कार्य में वृद्धि हुई इन सब ने मिलकर प्रकृति के पर्यावरण को नष्ट कर दिया।" इसमें संदेह नहीं है कि मनुष्य की बढती भोगवादी  प्रवृत्ति ने ही विश्र्व को‌ इस संकट के करीब लाकर खड़ा कर दिया है।
     बढ़ती वैज्ञानिक प्रगति से मानव सुख-सुविधा के इतने आदी होते जा रहे हैं कि उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि इससे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पढ़ रहा है। सड़कों के लिए न जाने कितने पेड़ काट दिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं एयरकंडीशनरों, फ्रिज और गाड़ियों के धुओं निकलने वाली गैसौं से न केवल वायुमंडल दूषित हो रहा है बल्कि ओजोन परत पर भी इसका असर पड़ रहा है। इस संदर्भ में विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी कहते है कि "प्रगति की भी एक सीमा होती है महोदय प्रगति के साथ-साथ विवेक भी उतना ही आवश्यक होता है।" बढ़ती औद्योगिक प्रगति के साथ ही मानव जीवन में विज्ञान की भूमिका बढ़ गई है वर्तमान जीवन पर इसकी छाप अंकित है। यह भी सत्य है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी चलते मानव की क्रियाकलाप, व्यवहार और आपसी संबंध में परिवर्तन दिखाई देते हैं इसी परिवर्तन की देन है विज्ञानकथा इस के संदर्भ में देवेंद्र मेवाड़ी का कहना है कि "विज्ञानकथा साहित्य की वह विधा है जिसके माध्यम से लेखक मानव जीवन पर वैज्ञानिक खोजों, तकनीकी प्रगति,भावी घटनाओं और सामाजिक परिवर्तन के संभावित प्रभाव को दर्शाता है। यह भविष्य में झाकता है और अपनी लेखनी से भविष्य की तस्वीर खींचता है। अपनी कल्पना और वैज्ञानिक तत्वों के ताने- बाने से संभावनाओं का संसार बोलता है कैसी होगी कल की दुनिया?मानव का भविष्य क्या है? विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास कल मनुष्य को क्या देगा? क्या मानव सुदूर अंतरिक्ष के ग्रह नक्षत्र में जा बसेगा? या जनसंख्या विस्फोट से वह आकाल और भुखमरी में निरीह होकर अपना ही सर्वनाश होते देखेगा?क्या वह मशीनों रोबोटों और कंप्यूटरों के हाथों खेलूंगा? या धरती के गर्भ अथवा सागरों के पेंदी में रहने लगेंगा? या अपने ही आविष्कारों से विध्वस‌ करके अपने ही सभ्यता को नेस्तनाबूद कर इसके अवशेषों पर अपनी नई दुनिया बसाएगा? क्या मादा भ्रूण को नष्ट करते-करते कल केवल पुरुषों का समाज रह जाएगा? कैसी होंगी कल की दुनिया?" भूमंडलीकरण के कुचक्र में फंसकर विकसित एवं विकसनशील देश अपने यहां के प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करना शुरू किया जिस के  परिणाम स्वरुप इन देशों के सामने पारिस्थितिकी संकट की गंभीर समस्या निर्माण हो गए हैं। विज्ञानकथा साहित्य में पर्यावरणीय संकट को इस समय सबके सामने लाने की कोशिश की जा रही है। स्वच्छ हवा, साफ पानी मानव की बुनियादी जरूरत है,लेकिन यह आम आदमी को यह भी नसीब नहीं हो रही है। जल समस्या इतनी बिकट होती जा रही है कि आंकड़ों के अनुसार 40% जनसंख्या के पास कम से कम स्वच्छता वाला पर्याप्त पेयजल उपलब्ध नहीं है। जल संकट की प्रमुख वजह जंगलों का निरंतर कटते चले जाना परिणाम स्वरूप पेड़ पौधों में भी कमी आई है। इस संदर्भ में देवेंद्र मेवाड़ी की विज्ञान कथा'दिल्ली मेंरी दिल्ली' इस समस्या को केंद्र रखती है। "लेकिन अब ना हैंडपंप है और न मोटरपंप क्योंकि जमीन के भीतर पानी इतना नीचे पहुंच चुका है कि उसे पंपो से निकालना संभव ही नहीं रहा। इसीलिए अब ना कहीं सुर्ख पलाश दहकते हैं, ना गुलमोहर फुलते हैं,न नीम और पीपल की पत्तियां सरसराती है।"जिस तरह हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे उसे देखकर लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब समस्त मानवता असमय ही इतिहास बन जाएंगी। इस विकास के मोह में हम इतने अंधे हो जा रहे हैं कि हम हमारे आने वाली पीढ़ी की हमें कोई चिंता ही नहीं है। जिस प्रगति से हम जंगल साफ कर रहे उसी प्रगती से पर्यावरण और हमारा आने वाला भविष्य हम खतरे में डाल रहे हैं।पृथ्वी पर घटते जा रहे जंगलों के कारण विश्व भर में जलवायु समस्या का उग्र रूप हमारे सामने आ रहा है। बढ़ती जलवायु समस्या से निर्मित ग्रीनहाउस गैस, भूमि के उपयोग में परिवर्तन, वर्षा के मौसम में बदलाव, समुद्र जल में वृद्धि, वन्यजीव प्रजाति का नुकसान, रोगों का प्रसार और आर्थिक नुकसान ,जंगलों में आग ऐसी बहुत सारी समस्या मानव समाज के सामने दिखाई दे रही है।वह दिन दूर नहीं जब सब लोग इतिहास बन जाएंगे इस  इसके बारे में 'अतीत में  एकदिन' इस विज्ञान कथा में हमारी आंखें खोल देने वाला सच सामने आता है।" सब इतिहास बन गया है प्रोफेसर पिछले पांच सौ वर्षों से ना जाने कितने नासमझ लोगों ने कितने पेड़ पौधों को काट डाला। एक- एक पेड़ के साथ उसकी आगे आने वाली पीढ़ियां  खत्म हो गई। परिणाम आपके सामने हैं प्रोफ़ेसर हमें यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि एक पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होता वह भविष्य का एक पूरा जंगल होता है"आज हम इसी भविष्य को खत्म करते जा रहे है। मानवीय जीवन प्रकृति के अस्तित्व पर टिका हुआ है।प्रकृति का संरक्षण मानवीय प्रयासों पर टिका हुआ है। वैज्ञानिकों ने प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को समझने के लिए अनेक अनुसंधान किये है। जब तक मानवीय गतिविधियां प्रकृति साथ संतुलन बनाए रखेंगी, मानवीय जीवन उतना ही सुरक्षित रहेगा। इनी पर्यावरणीय मुद्दों को विज्ञानकथा साहित्य की माध्यम से समाज के सामने लाया गया है।साथ ही विकास के अन्य मॉडलों की खोज करनी होगी तभी मानव का अस्तित्व कायम रह सकेगा।
संदर्भ:
१. सुभाष शर्मा-पर्यावरण और विकास,सूचना और प्रसारण मंत्रालय ,नई दिल्ली-
११००२,प्रथम संस्करण २०१७. पृ.सं.४५.
२. देवेंद्र मेवाड़ी- सभ्यता की खोज   -भविष्य विज्ञानकथा संग्रह,नॅशनल पब्लिकेशन हाऊस ,नई दिल्ली -११००२,प्रथम संस्करण -१९९६ पृ.सं.३३.
३. देवेंद्र मेवाड़ी-कोख- नॅशनल पब्लिकेशन   हाउस, अंसारी रोड, दरियागंज,
नईदिल्ली-११००२,प्रथम संस्करण,१९९८.पृ.स.४.
४. देवेंद्र मेवाड़ी-् दिल्ली मेरी दिल्ली,भविष्य विज्ञानकथा संग्रह, नॅशनल पब्लिकेशन हाउस अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११००२ प्रथम संस्करण  १९९८ पृ.सं३९.
५. देवेंद्र मेवाड़ी-अतीत में एक दिन पृ.सं.७१.वही.

संक्षिप्त परिचय:
मोरे औदुंबर बबनराव
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मो: ९७६३०६४३७७.