इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .
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रविवार, 28 दिसंबर 2025

ईमानदारी के फर

गणेश्वर पटेल
 
 गाँव के गोठ आए। बिहान-बिहान दुकानदार अपन दुकान के शटर खोलत रिहिस। दुकान के आघू म एक झन विधवा माईलोगिन खड़े-खड़े दुकान खुले के अगोरा करत रिहिसे।
जइसे ही शटर खुलिस, ओ माईलोगिन दुकानदार के हाथ म दस रूपिया धरात कहिस—
“एदे, तोर उपहराहा पईसा। काली जुवार तुंहर दुकान ले समान खरीदे हंव, त मोला दस रूपिया जियादा दे देहे रहेस। एहा मोर हक के नो हे, राखे ल मोर मन नइ मानत हे।”
दुकानदार अचरज म पड़ गे। कहिस—
“काली त दू-तीन रूपिया बर लड़त रेहेंव, आज एतका सियानी कइसे?”
माईलोगिन धीमे स्वर म कहिस—
“मोर घरवाला जब तक मोर संग रिहिस, त वो हमेशा काहय— ‘जे अपन हक के नइ हे, ओला राखे ले भगवान नाराज होथे। अऊ ओ पाप लइका मन ऊपर आजाथे।’”
अतकिच कहिके, पईसा देके, ओ माईलोगिन ऊँहा ले चल दीस।
ओ बात दुकानदार के मन म घर कर गे। कुछ देर बाद ओ अपन दुकान बंद करिस अऊ बड़का दुकान म पहुँचगे—जिहाँ ले ओ समान लाथे।
बड़का दुकानदार के नाव चइतु रिहिस।
छोटा दुकानदार तीन सौ रूपिया धरात कहिस—
“भईया, बिल बनावत बेरा में तीन सौ रूपिया के झोल करे रहेवं।”
सेवकराम ह अचंभा म पड़ गे—
“अरे, एकर का जरूरत हे?”
छोटा दुकानदार कहिस—
“नइ भईया, ए हमर हक के नो हे। भगवान सब देखथे। ए पाप मोर लइका मन ऊपर नइ आ जाए।”
अतके कहिके ओ लहुट आइस।
अब ए घटना ह  (चइतु) के मन ल झनझना दीस।
ओला बार-बार एक ठोक जुन्ना बात याद आथे।
चार-पाँच बछर पहिली ओ अपन संगवारी प्रकाश ले तीन लाख रूपिया उधारी लेहे रिहिस। कुछ दिन बादे प्रकाश सरग सिधार लीन।
ए उधारी के बात बस चइतु अऊ प्रकाश जानत रिहिन। प्रकाश के देहावसान के बाद चइतु ए बात ल दबा दीस।
आज प्रकाश के घरवाली के हालत सही नइ हे।
घर-घर बर्तन माँज के, जेन पइसा मिलथे, उही ले घर चलावत हे। लइका मन ल पढ़ावत हे।
ए सब जानत-समझत घलो चइतु चुप रिहिस।
अब दू-तीन दिन ले ओला ढंग के नींद नइ परत रिहिस।
दूसर दिन चइतु बैंक चल दिसे।
दस लाख रूपिया निकालिस अऊ सीधा प्रकाश के घर पहुँचिस।
प्रकाश के घरवाली के हाथ म पईसा धरात कहिस—
“भाभी जी, चार-पाँच बछर पहिली मैं आपके पति ले तीन लाख उधारी लेहे रहेंव। आज ओ रकम ब्याज समेत आपके हवय। मोर गलती से आपके परिवार ल ए दिन देखे बर पड़िस—मोला माफ करहू।”
माईलोगिन कांपत स्वर म कहिस—
“एतका पईसा मैं कइसे रखहूं?”
चइतु कहिस—
“एहा आपमन के हक के पईसा आय। भगवान सब देखथे। अपन हक जेमा नइ हे, ओला राखे से पाप लागथे—अऊ मैं नइ चाहथंव कि ओ पाप मोर लइका मन ऊपर आए।”
ओ जेन विधवा माईलोगिन सुबह दुकान म आए रिहिस,
वो अउ कोई नइ—प्रकाश के धरमपत्नी रिहिस।
दुनिया सच म कतेक गोल हे।
आज जेन-जेन के हक के पईसा रिहिस,
ओ पईसा खुद-ब-खुद ओकर-ओकर हाथ म पहुँच गे।
एकरे सेती सियान मन कहिथें—
ईमानदारी के फर, कभू न कभू, जरूर मिलथे।

ग्राम पोटियाड़िह 
जिला धमतरी (छ ग

नवा बछर नवा घर

    विजय मिश्रा 'अमित' 
 
   गांव ल छोंड़ के कई बछर पहिली महानगर बम्बई म जा बसे अपन एक झिन धनवान मितान प्रदीप भोले के न्योता पा के राधेलाल हर नवां बछर के पहिली दिन बम्बई हबरे रहिस। उहां मितान के नवा बने जबड़ बंगला ल देख के राधे ल गरब होवत रहिस। बंगला म नौकर- चाकर गाड़ी- घोड़ा के भरमार रहिस।     
      बंगला भीतर कांच के बने बड़े-बड़े एक्वेरियम म महंगी- महंगी रंग रंग के मछरी तऊंरत रहिन। बड़े जनिक पिंजरा म धंधाए किसिम किसिम के चिरई मन चीं चीं करत रहिन। एती ओति बड़े बड़े भोकन्डा कुकुर,चेपटा मुंहू के कुकुर, सादा झबरा कुकुर के संग म गद्दीदार सोफासेट म सुतत करिया, सादा बिलई तको दिखिन।
         राधेलाल हर देखिस कि धनवान मितान भोले अउ ओखर घरगोंसाईन ह  मछरी,कुकुर,बिलई अउ चिरई मन ल मया देखावत कूद कूद के दाना पानी देवत हें।जेला देख के ओहर बोलिस - भोले भाई,तुंहर दयालुता अउ जीव जंतु मन बर मया ल देख देख के मोर मन ह गदगद होगे हे जी,फेर तुमन के लोग लइका कय झन हें? कहां कहां हावयं? एको झन दिखत नीएं? 
     राधेलाल के सवाल के जवाब भोले के घरगोंसाईन हर हांसत-हांसत दीस - अरे ! का बताबे राधे भइया, दू झिन लइका हावयं,फेर हमन ओमन खातिर थोरको समय नी निकाल पावन।ते पाए के दूनो लइका के देखरेख बर अलग-अलग दू झिन आयाबाई राखे हावन। उही मन ह लइका मन ल बगीचा म कोनो मेर खेलावत- खवावत होहीं।
   अइसन जवाब सुनके राधे हर भक्क खा गे। सन्न रही गे।तभे एक ठिन झबरा कुकुर ल अपन तीर म ओधत देख के राधे हर  ओला झटक दीस अउ दूररे दूररे चिल्लाइस।जेला देख के भोले ह खलखला के हांसत बोलिस- अरे,ओला चमका झन राधे भाई। हमर लइका बरोबर आए।काहिं नी करे ओहर।
    अतका कहत भोले ह ओ झबरा कुकुर ल अपन कोरा म बइठार के पुचकारत चूमे लागिस।तेन ल देखते साथ राधे के तन मन म आगी लग गे।अपन मन ल मड़ावत ओहर बोलिस -अच्छा.. अच्छा..। बने बात हे।फेर लइका अउ कुकुर एके थोरे हो जाहीं जी। भोले भाई ए तो बता बाबूजी कहां हे?ओहू हर दिखत नीए?
       राधे के ए सवाल ल सुन के भोले थोरिक सकपकागे।अउ कोरा म बइठारे कुकुर ल भुइयां म उतारत बोलिस -अरे यार, मां के मरे के पाछु बाबूजी ल अकेलापन हर दिन रात चाबय।भांय भांय करत घर म ओखर बेरा नी कटत रहिस। ते पाए के हमन बाबूजी ल ' वृद्ध आश्रम' म भेज देहे हन। उहां ओहर बढ़िया हावय।
        तभे भोले जी के घर के कमेलहिन ह चाय पानी ले के आइस।फेर भोले के घर के हालचाल,आचार बिचार ल देख सुन के राधे के मन ह भारी होगे रहिस। उहां थोरको देर रूके के मन नी होवत रहिस। ते पाए के बहाना बनावत राधे बोलिस- भोले भाई,आज मंगलवार के मोर तो निरजला उपास हावय। में कुछु खावंव पीववं नहीं। मोला अब बिदा दव।राधे के हाव-भाव ल देखत भोले अउ ओखर घरगोंसाईन ल अंदाजा लगगे कि घर के हाल चाल हर राधे ल पोसावत नीए।
        राधे हर वापिस जाए बर खड़े होगिस। त भोले ह बोलिस - ठीक हे भाई, अपन घर समझ के आवत जावत रहिबे।भोले के बात हर आगी म घीवं डारे कस काम करीस। राधे फट पड़ीस -भोले भाई, अब तोर घर हर घर कहां रही गे हे? अरे! तोर घर म तो लोग लइका,सियान सामरथ के रहे ठिकाना नीए। मोला तो अइसे लागत हे कि तोर घर हर घर नहीं चिड़ियाघर बनगे हावय।भोले भाई,जेन दिन घर अउ चिड़ियाघर म फरक ल समझ जाबे तेन दिन तोर घर म आहूं,खाहूं पीहूं। 
         राधे के गोठ अऊ दुत्कार ल सुन के भोले के आंखी खुलगे ।ओहर राधे ल पोटारत बोलिस- भाई मोर मति पलट गे रहिस। चेथी कोति गए मोर आंखी ल आघु म लान के खोल देहे हस।अभीचे बाबूजी ल बृद्ध आश्रम ले लानहूं।संग म तहूं हर चल। नवा बछर म नवा घर म बाबूजी के चरण हर पर जाही। 
         राधे अउ भोले दूनो झन बाबूजी ल लेहे बर चल दीन।तभे भोले के घरगोंसाईन हर तको घर के अंगना म चऊंक पूरत, दिया बारत नवा बछर के नवा रद्दा ल संवारे बर, ओमा रेंगे बर भीड़गे। 
एम 8 सेक्टर 2, अग्रोहा कॉलोनी, पोऑ- सुंदर नगर रायपुर (छग) 492013 मो. 9893123310

रविवार, 14 दिसंबर 2025

बेटा के आशा

          डॉ पद्‌मा साहू पर्वणी
 
     साँझ के समय रहिस। नीता प्रसव के पीरा ले कहरावत रहिस। तीन दिन पहिली ले रुक-रुक के पीरा उठत रहिस फेर आज वोकर प्रसव पीरा हा बाढ़गे रहिस। नीता के हालत ला देख के श्याम गाँव के दाई ला बुला के लईस। सुनीता के हाथ-नाड़ी, पेट-मुड़ी ला देख के श्याम ला कहिस –
 “बेटा ये घर में नइ निभ सके। येला लघियाँत अस्पताल ले जाय बर पड़ही।”
दाई के बात ला सुनके श्याम तुरते 102 नंबर के गाड़ी ला फोन लगाइस। थोरिक समे बाद गाड़ी अइस। श्याम अउ दाई नीता ला गाड़ी मा बइठइन। गाड़ी झट ले तीर के शहर के अस्पताल मा पहुँचगे। डॉक्टर नीता के जाँच करिस अउ श्याम ला कहिस –
     “इसकी स्थिति नाजुक है। बच्चा और माँ दोनों को खतरा है सर्जरी करना पड़ेगा।”
श्याम कहिस – “देरी झन करौ मैडम। आप तुरते सर्जरी के तियारी करौ। आप ला महतारी अउ लइका दोनों ला बचाना हे।”
    श्याम ला एकठन फार्म मा दसखत कराके नर्स मन नीता ला स्ट्रेचर मा सोवा के ऑपरेशन थिएटर मा लेगिन। डॉक्टर ऑपरेशन शुरू करिस। नीता के सर्जरी होवत ले श्याम ऑपरेशन थिएटर के बहिरी मा बइठे-बइठे भगवान ले बिनती करत रहिस कि – “ हे भगवान मोर बाई अउ लइका ला बने-बने रखबे।” 
फेर वोकर मन मा एकठन बात घुमरत रहिस, वो घेरी-भेरी काहत रहिस– “हे भगवान ये बखत मोला बेटा दे देबे। में तोर नाम ले पूरा गाँव मा भंडारा कराहूँ।”
श्याम के मन मा एक बेटा के आशा रहिस। येकर बर वो कतको मन्नत, पूजा-पाठ के संकल्प करे रहिस। 
श्याम ला चिंता मा देखके दाई कहिस– “सब बने होही बेटा। भगवान ऊपर बिश्वास रख।” 
घंटा भर बीते के बाद डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर ले निकलिस। श्याम लपक के वोकर तीर मा गिस अउ कहिस– “डॉक्टर साहब, सब बने हे न।” 
डॉक्टर कहिस – “सब ठीक है। चिंता की कोई बात नहीं है।”
श्याम –  “अउ मोर लइका…..
डॉक्टर कहिस– “बधाई हो तुम्हारी बेटी हुई है।”
ये सुनके श्याम के चेहरा मा उदासी छागे। 
श्याम ला उदास देखके डॉक्टर कहिस– “ क्यों, बेटी होने पर खुशी नहीं हुई?”
श्याम –  “नइ डॉक्टर साहब, अइसन बात नइ हे।”
थोड़ी देर में जनरल वार्ड में शिफ्ट होगी। आप अपने बीवी और बच्चे को देख लेना। कहिके डॉक्टर साहब चल दिस।
दाई कहिस – “सब भगवान के मर्जी हे बेटा।”
श्याम– “हाँ दाई, सब भगवान के मर्जी हे। मोर तीन झन देवी जइसे बेटी भार्गवी, रमा, अन्नपूर्णा हें। मोर मन मा ये बखत आशा रहिस के जीवन के आखिरी बेरा मा काँधा दे बर भगवान एक झन बेटा दे देतीस। फेर  ईश्वर के इच्छा मोला मंजूर हे। ये चौथा बेटी घलो मोर बर देवी समान हे। 
 “बेटा भाग्य ले मिलथे अउ बेटी सौभाग्य ले। अपन सौभाग्य ला संहरा बेटा श्याम।”
श्याम – “हाँ दाई तें सिरतोंन काहत हस।”
येती नर्स मन स्ट्रेचर मा सुनीता ला धर के जनरल वार्ड मा शिफ्ट करिन। श्याम अउ दाई नीता के तीर मा गिन। जच्चा-बच्चा ला स्वस्थ्य देख के दूनों के मन मा उछाह भरगे। सुनीता बेसुध रहिस। रात गजब होगे रहिस। दाई, लइका अउ सुनीता के तीर मा सोगे। श्याम अपन सोय के दूसर जघा बेवस्था करिस।
      दूसर दिन बहनिया 8 बजे श्याम, दाई अउ सुनीता बर चाय बिस्कुट धर के अइस। दाई चाय पी के लइका के मालिश करे धर लिस। नीता, श्याम ला देखके अपन मुँह ला फेर लिस। 
श्याम, नीता के तीर मा बइठ के कहिस – “नीता तैं मोर ले काबर मुँह फेरत हस?”
 नीता– “आप जो चाहत रेहेव में वो नइ दे सकेंव। मोला छमा कर दौ।”
“धत् पगली, कइसे बोलत हस?”
“मैं जानत हँव जी, आप ये दरी अपन मन मा एक बेटा के आशा रखे रेहेव। अउ में वोला पूरा नइ कर सकेंव।” नीता कहिस श्याम ले।
श्याम – “भार्गवी के माँ, तें मोला 12 बछर मा अतके समझे। अरे पगली! मैं अपन बेटी मन ला बेटा बरोबर समझथों। बेटा-बेटी मा कोनो भेद नइ करौं। फेर महूँ तो इंसान हरौं न, मन मा बेटा के आशा जाग गे रहिस।”
नीता – “ हमन एक दूसर ला समझथन तभे तो हमर मनके जिनगी खुशी ले बीतत हे जी।” 
श्याम डॉक्टर साहब ला आवत देखके नीता ला इशारा ले चुप करावत कहिस– “नीता, वोती देख डॉक्टर साहब आवत हे राउंड मा।”
नर्स – “श्याम जी, चलो आप बहिरी निकल जाव। डॉक्टर साहब राउंड मा आवत हे।”
डॉक्टर साहब सबके चेकअप करके नीता कर जाके पूछथे – “नीता रात को नींद आई न।” ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा है। बच्ची रात में परेशान तो नहीं करी।”
नीता – “सब ठीक हे डॉक्टर साहब फेर बच्चा……
दाई लइका ला डॉक्टर ला देखाथे अउ कहिथे – “ये रात भर कुरुर-कुरुर करे हे डॉक्टर साहब। हमन ला रात भर सोवन नइ दे हे। अभी येकर मालिश करे हों। ये दे टुकुर-टुकुर देखत हे।”
डॉक्टर साहब (नन्ही बच्ची के गाल को छूते हुए)
–  “ठंड बहुत है न इसलिए रात को कुरुर-कुरुर कर रही थी। अब दिन में सोएगी। क्यों रे लक्ष्मी?”
लक्ष्मी नाम सुन के नीता डॉक्टर कोती अचरज ले देखथे देखिस अउ मुस्कइस।
 “क्यों नीता, सही नाम रखी हूँ न लक्ष्मी?” काहत डॉक्टर साहब चल दिस।
जउन नाम ला में सोचत रहेंव उही नाम ला डॉक्टर साहब कहिस कतका संयोग के बात आय। नीता मने मन सोचे लगिस।
दाई येकर दवई पानी ला बेरा-बेरा मा देबे। अब डॉक्टर रात को आही राउंड मा। अउ हाँ तुँहर दू दिन मा छुट्टी हो जही। नर्स कहिस अउ चल दिस। 
श्याम, डॉक्टर अउ नर्स के बात ला सुनत रहिस। अइस अउ नीता ला कहिस – “बस दू रात अउ पहाना हे इहाँ वोकर बाद अपन घर चल देबो।”
     गुरुवार के अस्पताल ले छुट्टी होय के बाद बिहनिया दस बजे श्याम मन अपन घर जाय बर गाड़ी मा निकलिन। फेर वोकर मन मा ये विचार घुमड़त रहिस कि–
 “मोर महतारी के मन मा का भाव होही। में फोन मा तो सब बात ला बता डरे हों फेर वोकरो मन मा ये दरी एक झन बेटा के आशा रहिस।” 
नीता श्याम कोती ला देखके वोकर मन के भाव ला समझ जथे। गाँव जादा दूरिहा नइ रहिस। थोरिक देर मा गाड़ी झट ले घर मा पहुँचगे।
गाड़ी ले उतरके दाई लइका ला धर के घर के डेहरी पार करइया रहिस वोतकेच बेर नीता के सास दसोदा दाई ला आवत देख के चिल्लईस – “उही कर रुक, आघू झन आ।” दाई अतका ला सुन के जिही कर रहिस उही च कर डर के मारे रूकगे। नीता अउ श्याम के पाँव घलो थमगे। दसोदा अपन बड़े पोती भार्गवी ला कहिस– “बेटी  भार्गवी आरती के थारी ल ला।” 
भार्गवी आरती के थारी ल लइस। संग मा भार्गवी के मनझली बहिनी रमा अउ छोटे अन्नपूर्णा अइन। 
दसोदा दाई ला कहिस – “आना दाई, काबर रुक गेस?  मोर पोती ल ला वोकर आरती करहूँ। मोर घर के लक्ष्मी हरे वो हर। श्याम अउ नीता तहूँ मन आव। तुमन काबर रुक गे हो गा ?”
 लइका संग श्याम अउ नीता के दसोदा आरती उतारिस, तिलक चंदन लगइस। सब झन भीतरी मा गिन। अपन छोटे बहिनी ला देख के भार्गवी, अन्नपूर्णा अउ रमा वोकर संग खेले मा मगन होगे। दाई चाय नाश्ता करके काली बिहनिया आहूँ दसोदा अब तोर पोती ला सम्हाल अउ सेंक चुपर में जावत हों कहिस।
       दसोदा, श्याम अउ नीता के उदास सकल ला देख के श्याम ला कहिस– “बेटा में एक औरत हरों अउ अपन बहू ला समझथों। महूँ पढ़े लिखे हों। का होइस नौकरी मा नइ हों? बेटी होइस ता येमा नीता के का दोस हे? अउ बेटा, अब जमाना बदलगे हे। बेटा-बेटी मा अब अंतर नइ हे। देख अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, मदर टेरेसा, प्रतिभा पाटिल, भारतीय वायु सेवा के विंग कमांडर व्योमिक सिंह जइसन कतकोन हें, यहू मन तो बेटी हरे। इनकर आज दुनिया मा नाम हे। अउ एक बात हे, जेकर बेटा हे ना वहू मन आज कतको झन मन रोवत हें घिरलत हें।” 
श्याम – “हाँ दाई, हमरो बेटी भार्गवी, रमा अउ अन्नपूर्णा ला इनकर मन जइसे बनाबो। हमरो बेटी मन तो बहुत गुनवती मिहनती हें। हमन वोमन ला अब्बड़ मया करथन। वोमन हमर मन बर बेटा ले कोनों कम नइ हें।”
यसोदा– “हाँ बेटा, आज नोनी मन समाज सेवा, अंतरिक्ष विज्ञान, शिक्षा, राजनीति, स्वास्थ्य, सुरक्षा जम्मों क्षेत्र मा मिशाल खड़ा करके अपन नाम कमावत हें। बेटा मन के बरोबरी करत हें अउ उनकर ले जादा घलो नाम कमावत हें। ये सब ला चिंतन करके में ये दरी मोर पोता आय रहितिस ये भाव ला अपन मन ले निकाल डरे हों श्याम। अब दुनिया के नजरिया बदलत हे बेटा।”
इही बीच गाँव के पटइल बहोरन अइस जेन इनकर बात ला सुन डरे रहिस वो कहिस– “श्याम, दुनिया कतको कहे रे फेर हमर समाज मा अभी घलो नोनी बाबू मा अंतर हे। ये अंतर कभू नइ मिट सके। जीवन के आखरी बेरा मा काँधा बेटाच हा देथे, बेटी हा नइ देवय। येला सुरता रखबे।” 
श्याम– “ का कका? बदलत समय के ये बेरा मा लोगन बेटी मन के प्रति नजरिया बदलत हे। अब तहूँ अपन बिचार ला बदल। अब बेटी मन घलो अपन दाई-ददा ला जीवन के आखरी यात्रा मा काँधा देवत हे। श्मशान मा आगी देवत हे। देखे हस ना हमर गाँव मा गोवर्धन भैया के पाँच बेटी हे। गोवर्धन घर के भउजी खतम होईस ता वोकर बेटी मन पूरा क्रियाकरम ला करिन हें। गुरुप्रसाद के सात झन बेटी हें। वोकर बेटी मन पूरा वोकर खेतीबाड़ी देख-रेख, ईलाज-पानी सबो करत हें। अब बेटी मन बेटा के बीड़ा उठाय बर सीखगे हें। अब समे अलग हे कका।”
बहोरन पटइल – “तभो ले रे बेटा मन नाम अउ बंश चलाथें।”
दसोदा – “देखत तो हावन तुँहर बेटा मन कतका तुँहर नाम अउ बंश चलावत हें। तीन झन तो तीन हाल हें। वोमन ला पहिली बेटी महतारी के सनमान करे बर सिखाव तुमन।”
बहोरन पटइल भड़क के – “का कहेस…?”
श्याम – “का कका?  तें अभी जा बाद में आबे। हमूँ मन नहाबो खाबो अस्पताल ले आय हन”
बहोरन पटइल– “जावत हों रे।”
बहोरन पटइल के जाय के बाद दसोदा मँझनिया के जेवन पानी तियार करिस। नीता के सेवा जतन करिस।
सोलह बछर के भार्गवी सबला खाना परोसिस। 
श्याम खावत-खावत अपन महतारी ला कहिस – “दाई नीता ला सम्हले मा महीना भर लगही। नामकरन ला बाद मा कराबो।”
दसोदा – “बन जही बेटा। तब तक हमन जोरा कर लेबो कार्यक्रम के।”
दसोदा नीता ला कहिस – “मैं अपन पोती मन ले बड़ खुश हों नीता। अब तो ये छोटे मोर सबले जादा मयारू बनही।”(अपन छोटे पोती ला देख के कहिस)
नीता– “हाँ माँ, तैं मोला समझथस अउ मैं तोला। तभे तो हमन ला सब सास-बहू नहीं महतारी-बेटी कहिथें।”
       महीना भर बीते के बाद नीता अउ लइका फ़ुन्नागे। अब नामकरन कार्यक्रम बर श्याम सब सगा सहोदर मन ला निमंत्रन दिस। सब सगा मन आइन। नामकरन कार्यक्रम मा पूजापाठ होइस। एक दूसर ले सब मेल मिलाप करिन। चार लोगन के चार गोठ होइस।
 श्याम के फूफा कहिस – “भगवान एक झन बेटा दे देतीस तोला ता का होतिस?”
श्याम के ममाससुर कहिस – “ बेटी मन ससुरार जाही तहान तुँहर डेहरी मा दीया बरइया कोनों नइ रही गा श्याम।”
श्याम कहिस – “फूफा सब भगवान के किरपा हरे। अउ ममा हमर बेटी मन हमर सौभाग्य हे गा। हमर डेहरी मा दीया इही मन बारही।”
“एक झन अउ नइ देख ले रहितिस नीता हा।” दसोदा के काकी सास दसोदा ले कहिस। दसोदा चुप रहिस।
अउ सब सगा मन ला कहिस– “चलो सब भोजन-पानी करौ। रामायन मंडली आगे हे। सब ला रामायन सुनना हे।”
अब चरबज्जी रामायन के तियारी होइस। रामायन शुरु होवैया रहिस वोतकीच बेर श्याम माइक ला धर के कहिस– “सुनव! सुनव! येती सुनव।”
श्याम के आवाज ला सुनके सब सगा सहोदर मन तीर मा आगे। श्याम के माँ, वोकर बाई अउ लइका मन घलो अइन। 
सब ला देखके श्याम– अब में एक ठन बात काहत हों तेला धियान धर के सुनव कहिस – “बेटा के आशा सबके मन मा रहिथे फेर बेटा भाग्य ले मिलथे अउ बेटी सौभाग्य ले। में अउ नीता बड़ सौभाग्यशाली हन कि हमन ला दुर्गा देवी जइसे बेटी भार्गवी जेन मिहनती गुणवती हे, अन्न के देवी जइसे सरल सहज बेटी अन्नपूर्णा, हमर सौभाग्य बढ़इया बेटी रमा अउ सुख-समृद्धि, धन के बरसा करइया बेटी लक्ष्मी मिले हे। इही मन हमर गुरुर, मान-सनमान आय। आज बेटा मन ले जादा मिहनती बेटी मन होवत हें। हर क्षेत्र मा अपन माँ-बाप के नाम रोशन करत हें। हमन ला अपन बेटी मन ऊपर गरब हे। हमर बेटा नइ हे ता कोनो बात नइ हे। हमर ये बेटी मन बेटा के बरोबर हें। बेटी कुल तारक हे।”
श्याम के बात ला सुनके नीता के आँखी ले झरझर-झरझर आंँसू बहे लगिस। छोटे बेटी ला धरे-धरे दसोदा रोय लगिस। भार्गवी, रमा, अन्नपूर्णा अपन पापा ला जाके पोटार लीन। चारो मुड़ा ले ताली बजे लगिस। सब ला देखके श्याम के आँखी भरगे।
श्याम के सास-ससुर कहिन – “धन्य हे मोर बेटी दमांद जेन ला सीता, मांडवी, उर्मिला, श्रुतकीर्ति जइसन बेटी मिलेहे। इनकरे ले मोर बेटी दमांद राजा जनक अउ सुनैना कस समाज मा नाम कमाही।”
रामायन मंडली वाले मन कहिन – “आज हमर समाज मा अइसने अच्छा सोच के होना जरूरी हे जेन बेटी मन ला मान दे। श्याम जी तुंँहर अँगना मा तुंँहर बेटी मन कोईली कस कुहकत रहे, भगवान ले इही बिनती हे।”
बहोरन कहिस– “ तै बड़ा किस्मत वाले हस श्याम। आज मोर वो भरम टूटगे कि बेटा मन बेटी ले जादा……”
श्याम– “सोंच बदलना जरूरी हे कका।”
अब रामायन शुरु होइस। सब रामायन ला आखरी तक सुनिन। सब मिलके सोहर गइन। अब टीकाकार मंडली श्याम अउ नीता के छोटे बेटी के नाम धरइन “कमला”। 
डॉक्टर तो वोकर पहिली ले नाम लक्ष्मी कही दे रहिस। वोला घर के मन लक्ष्मी कहें। 
      धीरे-धीरे पढ़े-लिखे श्याम अउ नीता कस वोकर बेटी मन पढ़-लिखके अपन परिवार के नाम ला रोशन करिन। सबों झन संस्कारी, रूपवती, गुनवती रहिन। बड़े बेटी भार्गवी शिक्षिका, मंझली बेटी रमा अकाउंटेंट, अन्नपूर्णा वेटनरी डॉक्टर बनगे। छोटे बेटी कमला कलेक्टर बने बर पढ़ई के तियारी मा लग गे। परिवार सुख समृद्धि के संग आगू बढ़त गिस। श्याम अउ नीता के परिवार पढ़े-लिखे,  संपन्न रहिस। श्याम अउ नीता गाँव बर उदाहरन बनगे। वोमन सब ला कहे– “हमर बेटी मन हमर बेटा आय।”

              खैरागढ़

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

लाला के देवारी

  धर्मेन्द्र निर्मल 
 
   मोटर हँ दमदमावत आके सड़क के पाई म खड़ा होगे। चकरा सेठ अपन दूकान ले बइठे- बइठे देखत हे। खचाखच सवारी भरे हे। उतरे बर अपन- अपन ले कोलो -कोलो करत हे। 
     चौमासा पानी के बरसत ले नरवा- झोरी जइसे उबुक- चुबुक होवत खलबल -खलबल बोहाथे। बरसा थमिस ताहेन भईगे, सुक्खा के सुक्खा। सुक्खा नरवा खल बहुराई। आए के बेरा जम्मो हाँसत गोठियावत आइन। उतर के तैं कोन, मैं कोन। मोटर ठकठक ले खलिया गे।
सवारी मन ल उतरत देखके पसरा वाले, ठेला वाले दुकानदार सबो जोसियागे। कोनो फटाफट माखुर ल मारके दबाइन अउ समान मन सोझियाए जमाए लगिन। कोनो पीयत बीड़ी ल फेंक के नरेटी भर- भर के चिल्लाए लगिन। झुनझुना, पोंगरी वाले मन बजा- बजा के लइका मन ल मोहाए म लगगे। दुकानदार मन दूकान के आगू म निकलके कहत हे - 
‘आ भाई, का लेबे ? का देववँ दीदी, बड़ सस्ता हे वो। ले ले।’ 
चकरा सेठ जस के तस फसकराय दूकान म बइठे हे। अइसन - वइसन धंधा नई करय चकरा सेठ हँ। घर बइठे बारा घाट के पानी पीये हे। ग्राहक के नारी ल रेंगती टमर डारथे। 
जम्मो सवारी बजार म समागे।
वो मोटर ले उतर के अकर- जकर ल देखत हे। चकचकाए सोचत हे - ‘कती जाना चाही ?’ 
मन के बात गड़रिया जानय। चकरा सेठ के नजर ओकर हाव भाव ऊपर हे। उदुप ले ओकर नजर चकरा सेठ ऊपर परिस। चकरा सेठ बड़ प्यार से मुचमुचावत पुचकारे असन हाथ के इशारा म ओला बलाइस। वोह दूकान म घुसरे बर कनुवावत सकुचावत रिहिस हे। चप्पल ल दुवार म निकालते रिहिसे, सेठ टोकत बरजत कहिथे- ‘आजा, अइसने आजा, नई लागय गा चप्पल -उप्पल उतारे बर।’
’भारी भीड़ हे गा’ - सेठ बाते म ओकर पीठ ल सहिलाइस।  
’काला कहिबे तिहरहा ताय सब’- ओह हाथ ल हलावत लमावत कहिस।
ओकर मुँह का उलिस, सेठ ल पाँव राखे बर ठऊर मिलगे। का पूछथस ताहने। बइठन दे त पीसन दे। सुर धरके मुड़ ल हलावत सेठ लमाईस -
’हौ भई, छिन म पूरा मोटर खाली होगे गा।’ 
ओला हाँ म हाँ मिलावत देखके सेठ तुरते फेर पासा फेंकिस - ’आ बइठ। पानी पियाववँ।’
सींका के टूटती बिलई के झपटती होगे। ओकरो मन कोंवरागे।
‘जम्मो तुँहरे गाँव के सवारी आय’- लकड़ी के बेंत लगे कपड़ा के झारा म ‘फट -फट’ कपड़ा मन के धूर्रा ल झर्रावत सेठ कहिस । 
‘वा ....! जम्मो खपरी के ये ............. अऊ देखबे, जाए के बेरा इहाँ ले ‘कोचकिच-ले’ भरा के जाही, उहाँ ‘बरबर-ले’ खाली। कहाँ गए कहूँ नहीं, का लाने कुछु नही’ - वोह हँ एके साँस म सबो बात ल झर्रा डारिस। 
चकरा सेठ ल चकराए बर जगा मिलगे - ‘अरे तोर बरेठ खपरी के चारो मुड़ा शोर उड़े हे भाई, दुरूग ले बइठ, चाहे रइपुर ले, खपरी कहे ते फट्टे टिकिस कटा जथे।’ 
‘हहो सिरतोन काहत हस।’
‘मार्का टेशन होगे हे गा, तुँहर गाँव हँ।’ -सेठ गोटारन कस बड़े -बड़े आँखी ल नटेरत कहिथे।
‘कंडेक्टर-ड्राइवर मन तको हमर गाँव के जम्मो मनखे मन ल चीन्ह डारे हे।’- वोह हँ हाथ ल लमा -लमा के थूक छीटकारत-गिजगिजावत कहिस।
‘झन कहा, चीन्हत होही।’ सेठ अब धीर लगाके गेयर बदलिस- ‘तैं जादा बजार -उजार नई आवस का ?’  
‘मैं गाँवे म नई राहवँ न।’
‘अच्छा - अच्छा- अच्छा। तभे तो सोंचत रेहेंव, जादा दीखस नहीं कहिके।’ 
सेठ के गोठ खतम नई होए पाए रिहिस हे। 
वोहँ चार आँगुर आगू ले लमा दिस - ‘मैं नागपुर म रहिथौं, गजब दिन होगे। भइगे तिहार -बार म आथवँ -जाथवँ। 
सेठ के मुड़ ल हुँकारू संग डोलावत देख, एकर मुँह उले के उले रहिगे। टेटका कस मुड़ ल हलावत कहे लगिस - ‘हमी भर मन दुई के दुआ रोजी मजूरी करथन उहाँ। लोग लइका मन गाँवे म रहिथे दाई -ददा तीरन।’ 
जगहा मिलते साथ सेठ हँ मछरी बर मुँह मारत कोकड़ा कस टप ले जमाइस - ‘तुँहर इहाँ सियनहा के का नाम हे ?......... देख भुलावत हौं, मुँहेच ऊपर हे .......’ .अउ देखौटी अंगरी म अपन माथा ल ‘टुक-टुक’ मारत, जुवाब के अगोरा म ओकर मुँह ल देखे लगिस।
वोहँ तो मोहागे राहय। सेठ ल थोरको अगोरे बर नइ लागिस। बाँचा माने सुआ कस फट्ट ले अपन सियनहा के नाम ल बता दिस - 
‘अलेनी।’ 
हाँ, हाँ !! ठउँका कहे।’- सेठ अब मुड़हेरी साँप कस वोला लपेटा म ले डारिस - ‘मैं तोर चेहरा- मुँहरन ल देख के जान डारे रहेवँ। ओकरेच लइका आवस कहिके।’ 
वोह अब रतियाके बइठगे। 
सेठ अब टाप गेयर म आगे -‘तोर का नाम हे ?’
वोहँ अपन नाम ‘लाला’ बताइस। अब सेठ के मन के मनसूभा अंटियावत खड़ा होगे। दूनो हथेली ल रगड़त पूछथे - ‘ले का देखाववँ लाला ! पहिली लइका मन बर, के सियान मन बर ?’ 
पाके बीही के लाल -लाल गुदा कस मसूड़ा ल उघार के हाँसत लाला कहिस - ‘लइके मन बर पहिली देखा न भई, उंकरेच मन के तो तिहार ये।’ 
सेठ के मन अब गोठबात ले उचट गे । ओकर धियान धंधा म धँसगे हे। एके भाखा कहिस - ‘हौ।’ अउ ओसरी-पारी कपड़ा देखाए म लगगे।
लाला देख परख के परिवार के जम्मो झिन बर कपड़ा -लत्ता छाँट डारिस। कपड़ा देखाए के बेरा सेठ कीमत ल नई बतावय। लाला एक दू घाँव पूछिस-‘एकर का भाव हे सेठ !’ 
सेठ कहि देवय - ‘ले न ते काबर फिकर करथस, तोर ले जादा थोरे ले लेहूँ।‘
‘तभो’ ।
‘घर के लइका होके तहूँ कइसे गोठियाथस लाला !’
मया के भूखाय अऊ मया म मराय मनखे के एके गत होथे।
लाला के मुँह बँधागे। वोला अकबकासी लगे लगिस। अइसे तो वोह कपड़ा के रंग ढंग ल देख के मने मन म कीमत के आकब कर डारे रहय। 
‘भइगे सेठ अब अतके ले जाना हे।’ - लाला कहिस। 
सेठ जानबूझ के ओकर गोठ ल अनसुना कर दीस। चुकचुक ले चमकदार लाल कमीज ल फरिहावत दाँव मारिस - ‘वा, सब झन नवा कपड़ा पहिरही अऊ तैं जुन्ने ल पहिरबे गा ? बारा महीना म एक पइत आए बर, जीयत रहिथे तेकर तिहार।’ 
‘नहीं, नहीं मैं पाछू लेहूँ। अभी तो नवा -नवा सिलवाए हववँ, महीना भर नई होय हे।’ -अपन आगू म रखाए कपड़ा मन ल सेठ कोति सरकाइस - ‘ले बता, येमन कतेक के होइस ?’ 
सेठ अब कापी कलम उठालिस। जोड़ घटा के बताइस - ‘एक्कइस सौ तीन रूपिया।’  
लाला धरम संकट म परगे। कुल एक्कइस सौ रूपिया तो खुदे धरके आए रिहिस हे। डेढ़ दू हजार कपड़ा - लत्ता, फौज-फटका अउ सौ रूपिया, मोटर -गाड़ी, साग-भाजी, बजरहा खरचा हिसाब के। 
सियनहा के कपड़ा ल अलगियावत कहिथे - ‘एला राहन दे, आन दिन ले जाहूँ।’ 
सेठ जान डारिस। सोचिस -‘लेवना हँ ससलत बगरत हे। सकेल के एकथई करे बर परही।’ 
बेचाय माल हँ वापस झन होए पावय, येहँ चकरा सेठ के गुपचुप, भीतरौंधा अउ अनकहा, अनछपा शर्त आवय। 
‘कतेक असन कम परत हे ?’ - सेठ ओकर आँखी म आँखी डारके तिखारिस। 
सब बात ल फोर -फरिहा के बता दिस लाला हँ। 
लाला के पीठ ल सहिलावत सेठ भुलवारथे - ‘बस ! अतके बात हे ?’
अब सेठ मालिस -पालिस वाले जात म उतर गे -‘अइसन लजाए- सकुचाए वाले काम झन करे कर भई ! मोला अच्छा नई लागत हे।’ - कहिते काहत कपड़ा ल झिल्ली म भर डारिस। लाला लजाए असन मुड़ी नवाए खड़ेच हे । सेठ ओला झोला ल बरपेली धरावत कहिस - ‘ले धर ! अभी दूए हजार ल दे दे, बाकी ल पाछू दे देबे, बस ! कहूँ भागे जावत हस गा ?’
सौ रूपट्टी के करजा हँ लाला के आखा- बाखा ल हुदरत -कोचकत रात भर खटिया तीर म खडे रहिगे। वोहँ अलथी -कलथी मार -मार के रात ल आँखी म पहाइस हे। होवत बिहनिया पहिली गाड़ी म फेर खम्हरिया पहुँचगे। 
सेठ बलाइस -‘आ लाला आ।’ 
लाला ल उरमाल के अंटी ले पइसा निकालत देख सेठ के बाँछा खिलगे। घर कोति चाहा बर हूत कराइस। 
लाला मना करिस - ‘अहाँ.. अहाँ ! मैं चाहा -वाहा नइ पीयवँ।’
अभी तो लाला म अउ रसा बाँचें हे। सेठ के पियास तको नइ बुझाए हे। सेठ साहूकार मन तो अइसन माटी के बने होथे जिंकर मन म सरी दिन लालच के दर्रा फाटे रहिथे।
पूछिस--‘त का मँगाववँ ?’
‘कुच्छु नई लागय कहि देवँ।’ 
सेठ कहिस - ‘तोर बर कमीज देखाववँ।’ 
लाला टोक दिस - ‘कमीज-उमीज ल मार गोली ददा ! ए तोर बाँचत पइसा ल धर अउ मोर हिसाब ल नक्की कर। करजा बोहई नई पोसावय, भारी बियापथे। न उधो के लेना, न माधो के देना बने लगथे मोला।’ अउ एक सौ दस रूपिया ल सेठ के हाथ म धरा दिस। 
बनिया बेटा जब हिसाब करे बर बइठथे त ओकर आँखी म रिश्ता -नता, सगा -संबंधी, चीन्ह-पहिचान नई दीखय, सिरिफ पइसा नजर आथे। 
‘अऊ गाँव -घर म सब बने बने लाला !’- हिसाब के बाँचे सात रूपिया म पाँचे रूपिया ल लहुटावत सेठ पूछथे। 
लाला जुवाब दिस - ‘सब बढ़िया हे सेठ ! अपन अपन करम किस्मत के हिसाब से सबो कमावत खावत हे।’ 
सेठ के तिकड़मी दिमाग ले छीनी हथौड़ी निकल के मुँह म आ गे । 
‘तुँहर गाँव म तुहीं भर मन ल देखथवँ लाला, सोला आना ईमानदार !’ 
लाला के छाती हँ बीता भर ले फूलके डेढ़ हाथ होगे। अपन बड़ई कोन ल बने नइ लागय। जना मना कुछु उपलक्ष्य म ओला मानद उपाधि मिलगे। ले दे के उपाधि ल संभालत अहम के हाँसी ल मुसकान म बदल लिस। मुँह ले एक भाखा नइ उलिस।
‘बाकी मन नइहे, सब के सब बइमान हे।’-सेठ आगू कहिस।
लाला दूनो हाथ ल झर्रावत कहिथे - ‘तुमन जानहू सेठ, लेन देन के गोठ बात ल। हम का जानिन।’ 
सेठ, लाला के मुँह ल पढ़ डरिस। हाथ ल हलावत आगू कहिथे - ‘तुँहर गाँव वाले मन अइसे हे ! खाये बर चूना माखुर के डबिया दे देबे, त खाथे कम ओिंंटयाथे जादा। जइसे बफर सिस्टम के खाना म जीछुट्टामन प्लेट के गँवावत ले भर डारथे।’
लाला मुँह बाँधे चुप रहिगे। सेठ नराज झन हो जावय। जे मन ले बँधुवा हो जथे ओला तन ले बँधुआ होवत देरी नइ लागय। बाहिर जाके इही तो सीखिस हे छत्तिसगढ़िया मन। हुसियार मनखे मंघार ल नई मारके मगज ल मारथे। मगज मरे मनखे घुरवा के कचरा बरोबर होथे। 
मुड़ ल हला भर दिस लाला हँ। दूकान ले निकल के बजार कोति रेंग दिस। ओकर कान म सेठ के गोठ गूँजे लगिस। लाला के नजर ले गाँव वाले मन गिरे -बिछले परत हे। अपन जनमें, खेले -खाए भूइँया ऊपर लाला के मन म घिन समागे।
बजार म किंजरत एक जगा ओकर पाँव ठिठक गे। 
‘अई हाय ! गजब दिन म दीखेस परलोखिया नइतो !’ 
लाला झकनका के देखथे - ‘पसरा म बइठे रमौतिन काकी भाजी बेचत हे। लाला ओकर तीर चल दिस। रमौतीन पाँव परत पूछथे - ‘सब बने बने बाबू ?’ 
‘हहो ! का करबे काकी, पेट बिकाली म कुछु न कुछू उदीम करबे तभे तो बनथे।’
रमौतीन हूँकारू भरिस। 
खपरी तीर करमू गाँव हे। जिहाँ के रहइया ये रमौतीन मरारीन। रमौतीन बड़े बिहिनिया मुड़ म डलिया बोहे भाजी तरकारी बेचे बर खपरी पहुँच जावय । वोहँ भाजी बेचत तीर -तखार के सबो गाँव म मुँहाचाही नता जोर डारे रहय। ओकरे भर बात नइहे, जम्मो मनखे एक- दूसर ले अइसेनेहे नता म जुरे रहिथे। गाँव-आन गाँव वाले सबो संग हिल मिल के जिनगी पहाथे। 
मन मिले मनखे जिहाँ मिलथे उहाँ कतको बड़े दुख के बेरा घलो बिलम जथे। गोठ बात म घंटा भर कइसे बुलक गे, पतेच नइ चलिस। 
एमन गोठ बात म भूलाएच हे। ओतके बेरा दूनो के कान म भकरस ले भाखा सुनइस  - 
‘बजार होगे लाला !’ 
चकरा सेठ नारा वाले बड़े जनिक झोला ल हलावत आगू म खड़े हे। रमौतीन हड़बडा गे। काला खाववँ, काला बचाववँ कस किस्सा हो गे। चकरा सेठ के नजर हरियर -हरियर पाला अउ चौंलई म हे। रमौतिन मने मन गारी दे लगिस - ‘ए भड़ुवा कीच्चक कहाँ ले आगे। चाल म कीरा परे हे। हाथ ले पइसा छूटय नही सेठ कहावत हे रोगहा हँ।’ 
सेठ मुसकियावत बइठत पूछिस - ‘का भाव हे भाजी .........?’ 
रमौतीन बीचे म फट्ट ले बात ल काट दिस- ‘बेचागे हे ! जम्मो भाजी बेचागे हे।’ रमौतीन हड़बड़ाए लगिस। फेर का सोचिस- ‘ले न गा तहूँ हँ मोल भाव करके भाजी ल खुल्ला मड़ा दे हवस, बजरहा मन ल भोरहा हो जथे ’-काहत जम्मो भाजी ल सकेलत लाला के झोला म भरे लगिस । लाला ना -नुकुर करे बर धरते रिहिस हे, के रमौतीन मिलखिया दिस। 
लाला कुछू समझतिस तेकर पहिली सेठ कहिथे - ‘लाला हँ सबो भाजी ल थोरे लेही, खाएच के पूरति ल तो लेही, कइसे लाला ?’
लाला के मुँह न लीलत बनय न उलगत तइसे होगे। रमौतीन कउव्वा के कहिस - ‘पाँच रूपिया के दूए जूरी हे, ले बर हे ते ले।’ 
‘वा..हा...! सब जगा चार -चार जूरी देवत हे तेन हँ’ -काहत सेठ हँ चार जूरी भाजी ल झोला म डार लिस। 
‘जेन देवत हे तेकर तीरन जा के ले ले, मोला नइ पोसावय माने नइ पोसावय’ - रमौतीन हटकार दिस। 
लाला नान्हेपन के देखत आवत हे रमौतिन ल। मने मन मुसकाइस -‘ये रोगही ! काकी हँ अब ले जस के तस हे।’ सोचे लगिस -‘ पहिली तको अइसनेच काहय अउ मूठा भर भाजी ल झर्रावत बगरा देवय। नइ पूरावय, नइ पोसावय कहिते राहय, अउ सूपा ल भर देवय।’
तभे तो गाँव म कोनो रमौतीन मरारीन के छोड़ काकरो तीरन भाजी तरकारी नइ लेवय । ओमेर के चार ठन गाँव एकरे गॅँवई रिहिस हे । समे ढरक गे। गाँव -गाँव म बजार लगे लगिस। गाँव वाले मन खम्हरिया के बजार करे लगिन । जब मन होइस मोटर म चढ़के ‘भूर्र ले’ आ जथे अउ ‘फुर्र ले’ लहुट जथे। रमौतिन के गँवई खियागे। गँवई का खियातीस उमर के खसले ले सबो खिया जथे। अब काकी बइठाँगुर हो गे। दस बज्जी गाड़ी म आथे अउ संझौती बेच भाँज के बजार करत गाँव लहुट जथे। 
सेठ हँ पाँचे रूपट्टी ल धरावत राहय। रमौतीन बगियागे - ‘दस रूपिया होही ।’
सेठ कुटुर मुटुर करे लगिस। वो हँ अभीन अभी सरीफी अउ ईमानदारी के तमगा जेन ल पहिराए रहय उही लाला आगू म बइठे हे। हाथ म गुमेटे धरे पइसा ल फरियाइस। दू घाँव अँगरी म सरका- टरका, टमर -मरोर के देख- परख लिस तेकर पीछू दस के नोट ल दिस। पइसा ल देके - ‘ले अब एक जूरी तो उपरहा देबे’ काहत रखाए भाजी ल धरे लगिस। 
रमौतीन टप ले सेठ के मुरूवा ल धर लिस - ‘जब देख तब अइसनेच करथस। तोर पइसा कमई के पइसा ये, हमर मिहनत फोकट के आए हे.. नहीं।’ सेठ अकबका गे। 
रमौतीन आगू कहिस- ‘ले तो मैं तोला काहत हौं, एक रूपिया उपरहा दे। तैं देबे का ?’ 
ओतका म लाला कहिथे- ‘बने तो काहत हे सेठ ! बपुरी अतेक घाम पियास म तन के लहू ल अँऊटावत- चुरोवत बइठे हे । 
लाला के पलौंदी पा रमौतीन के बल बाढ़गे-‘घर -दुवार, लोग- लइका ल छोड़ के चार पइसा कमाए बर चार कोस ले रेंग के आए हवन, फोकट हो जही का ? तुमन तो एकक ठन पइसा के हिसाब करथौ । ले न हमार मिहनत अउ पसीना के हिसाब लगा ।’ 
सेठ के आँखी चिपचिपागे । मुँह पचपचाए लगिस। ओकर हाथ ले भाजी छूटके ‘भद्द ले’ गिर गे। आज घमण्ड के मुड़ी ल लज्झ ले ओरम गे। ‘ले भई’ काहत सेठ उठिस अउ पीछु कोति ल
 झर्रावत सुटुर- सुटुर रेंगते बनिस।
रमौतीन पसरा सकेले लगिस। सरीफी अउ ईमानदारी के मुकुट ल पहिरे शान से लाला हँ मुर्दा सेठ ल रेंगत जावत देखत हे। 
लाला अब काली ससन भर तिहार मनाही। आज वोहँ दानव ल मारके अयोध्या प्रवेश करइया हे। 
सुरूज अब तब करिया खुमरी ओढ़ ढलगइया हे। साँझ के पाहरा लग गे हे । गाँव म सुरहुत्ती के दीया जगमगाय बर धर लेहे । काली देवारी तिहार हे। 
लाला अउ रमौतीन मोटर चढ़े बर स्टेशन कोति जावत हे।
9406096346

सोहाई

                                    चन्‍द्रहास साहू
                                  मो 8120578897
 
बिहनिया ले उठगे आज ओ नोनी हा। काबर नइ उठही ? आज दुसरइया दिन आवय। जम्मो जीव-जिनावर भक्तिभाव मा बुड़े रहिथे। पहिली दिन जोरा-जारी, हियाव-नियाव, स्वागत-सत्कार मा निकल जाथे। बच्छर मा एक बेरा आथे कुवार नवराति हा।.. अउ संग मा आथे सौहत देबी हा…। जोत-जेवारा, डांग- डोरी धजा -पताका .. ।
रिकम-रिकम के बरन-बईगा- गुनिया, चेला-चंगुरी, डीही-डोंगर, देवी-देवता के, दरसन-परसन, सेवा-सटका करे बर। ओला तो आने गाॅंव जाना हावय आज। अपन कला देखाय बर , आदिवासी लोक नृत्य देखाये बर। ओखर दल बेरा परब मा नाचके, झुमके जम्मो दुख पीरा अउ जिनगी के थकासी ला बिसरा लेथे अपन गाॅंव मा। फेर आने गाॅंव के नेवता मा कला देखाये बर घला चल देथे।
             जम्मो लोकनृत्य मा भगवान आराध्य, इष्टदेव के महिमा, ओखर जस अउ ओला उछाह करे के गोठ रहिथे । चाहे करमा, सरहुल, गौरानृत्य, मांदरी, डंडा, रहस, पंथी, गेड़ी, राउत नृत्य होवय। लोकनृत्य घला भक्ति के माध्यम आवय । शहर के ओन्हा ओढ़ईया कस्बा अउ बड़का शहर मा ये गाॅंव महुआटोला के नाव के सोर अब्बड़ हावय ।
            मन मंजूर अउ गोड़ मिरगा के होगे हे आज ओखर । भिनसरहा भईसा मुॅंधियार रिहिस तभो ले कतका बुता कर डारिस। गाय बछरू के जतन पानी । गोबर-कचरा, बरतन-बासा .. जम्मो बुता । बम्बर बारके परछी ला करिया मा, अउ लाल घेरू माटी मा कोठ ला खुंटिया डारिस । उपका डारिस काली के बाचे खोचे ला ..। माटी के घर खपरा वाला अउ छानी के टिप मा बइठे सोनचिरई ..। सिरतोन कुम्हार हा अभिन लान के मड़हा देय हावय अइसे लागत हावय। बढ़ई अभिन घर ला बनाये होही। सरई अउ बीजा लकड़ी के काड़-कगड़ी, खिड़की-कपाट, खइरपा तक हा सुघ्घर उज्जर नवा -नवा दिखत हाबे। सुरुज नरायेन सोनहा अंजोर बगरावत हे ..। सीत बरसे ले सुघ्घर लागत हे। ससन भर देखिस अपन घर ला मुचकावत । सुरहीन गाय के गोबर ले लिपाये अंगना ला, झूलत खीरा कुंदरू के  बारी ला। धोवाये बरतन के मइलाहा पानी ला आरमपपई म रिकोइस। कोंवर-कोंवर आमा पाना के ममहासी ला सूंघीस । कुम्हड़ा नार ला कोठा के छानी मा चड़ाइस। नहा के छाती बाॅंधे – बाॅंधे दरपन के आगू मा ठाड़े होइस तब सिरतोन उही लजागे, अपन बरन ला देख के। सांवर गोरी झक्क दमकत चेहरा । खीरा बीजा कस दाॅंत । उल्हा-उल्हा कोंवर सरई पत्ता कस होठ-गुलाबी । डोमी कस सुघ्घर बाल अउ कजरारी आँखी हा …।
         जादा तारीफ झन कर फुलगजरा अपने आप के । मनेमन ओहा फुसफुसाइस । चेथी मा चपत मारिस अउ महुआ झरे कस खनखनावत हाॅंसे लागिस।
        अब जान डारे होहु रूपषोडसी मोटियारी ला । महानदी के निरमल पानी ला कछोरा भिरके तौरे हे। परसा फूल के आगी मा तन ला सेके हे । झरत महुआ ला ओली मा झोंके हे । सरई-सइगोना, बर-पीपर के कोरा मा डंडा पचरेंगा खेलइया ये नोनी आय – फुलगजरा । रुप षोडसी मोटियारी फुलगजरा । चातर राज, बस्तर राज अउ उड़िया राज जिला धमतरी, जिला कांकेर कोंडागांव अउ जिला नवरंगपुर के लोक परब अउ संस्कृति के मिंझरा सियार आय ये गाॅंव – महुआटोला हा। जगन्नाथ भगवान ला पाॅंव परके गजामूॅंग खा लेथे । पचहत्तर दिन के दसेरा मनावत सल्फी लांदा ला चुहक लेथे। तब गौ लछमी ला गोबरधन खुन्दाके, सोहाई पहिराके, खिचरी खवाथे । नगरी सिहावा के कर्णेश्वर मड़ई मा डांग-डोरी ला गिदबिद-गिदबिद नचा घला लेथे। अउ भाखा ग्यान …उड़िया छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, हल्बी, भतरी सब गोठिया लेथे अपन पीरा ला बताये बर। जइसन भेष तइसन भाखा ।
” तुई तो तियार होऊन गेली से रे फुलगजरा ? पूजा पाठ करतोर काजे शीतला दाई बले जावतोर आसे।''  (तेहा तियार होगेस का फुलगजरा ? शीतलामाता मा पूजा करे बर घला जाये के हे ।)
” हॅंव री होऊन गेली ।'' (हॅंव , बस हो गेंव।)
हिरौदी, मानकुंवर, सुकारो, सुकधनिया, दुलारी आयतिन , रमौतीन, नीलम, रेखा अउ मधु जम्मो कोई आगे दोरदिर ले। जहुंरिया मन के गोठ ला सुनके किहिस। माड़ी ले लाल लुगरा, फुग्गा पोलखा, रूपियामाला, सुता ,नागमोरी करधन, अइठी, बाहा भर चुरी , माथ मा कौड़ी के मथौड़ी, मोरपंखी खोपा …गजब सुघ्घर बरन। संगी मन देखते रहिगे।
दुलारी इतरावत किहिस
“आजी तो तुई हुॅंचो जीव च नेऊन जहुआस कसन आले!''  (तेहा तो मार डारबे आज !)
“को चो ? ” (कोन ला ?)
” हुनि ” (उही)।
“को हुनि ”(कोन उही)।
“अऊर को मोके चलासित, गहिरा लेका के ।” (अउ कोन , मोला चलाथस । गहिरा टूरा ला कहत हँव।)
फुलगजरा अब लजागे । बातिक बाता नइ कर सकिस।
हा… हा …खी.. खी.. के आरो आइस। शीतला दाई के अंगना घला गमकत हावय अब।
           फुलगजरा अपन टोली के मुखिया डांसर आवय। गहिरा टूरा बलराम हा मांदर बजाथे तब सब मात जाथे । आज टेक्टर मा जोरा के मांदरी नृत्य देखाये ला जावत हे गरियाबंद।
” सेठ पिला के फोन आये रिहिस। रायपुर बलात हावय। एलबम मा बुता दुहूॅं कहिथे । जतका पइसा कबे ओतका दुहूॅं कहत रिहिस। मेंहा तो जाहू मोला हीरोइन बनना हे। तहुं चल फुलगजरा ।”
मानकुंवर किहिस मुचकावत।
“ओ चतुरा मन के बुध मा झन आ बहिनी । न घर के रहिबे, न घाट के । सेठ-साहूकार आदिवासी, छत्तीसगढ़िया के भला करे हे…. ? हुसियार फुलगजरा समझाइस। ओखर आँखी अगियावत रिहिस।
          आज बलराम हा दुकान ले बिसाके लाये मोरपांख ला ओरियावत रिहिस। बबा ढेरा मा परसा डोरी ला आटत हावय। अउ बाबू हा, सोहाई के छोटकुन बंडल बनात हावय। 
“बलराम तेहां का करत हस ? प्रैक्टिकल कापी देना तोर ?”
बलराम देखते रहिगे फुलगजरा ला आज  अपन घर मा।
“बइहा देखते रहिबे कि कुछू बताबे।”
“सोहाई बनाथन फुलगजरा ! (सोहाई पशुधन के नरी मा बांधे जाथे जौन हा मोर पांख, परसा के डोरी ,छोटकुन रिकम-रिकम के कपड़ा ला सुघ्घर सजाके बनाथे । येहा मनमोहनी हार आय।) ये परसा के जड़ ला लान के कुचरथन। छालटी निकाल के एक-एक रेशा ला हेर के ढे़रा मा आटथन। ये सादा डोरी ला हर्रा अउ चिखला माटी मा चिभोर के करिया करथन। सादा करिया डोरी मोरपांख अउ नान-नान कुटका चिकमिकी ओन्हा बाॅंधके बना लेथन सोहाई।”
बलराम बताइस फुलगजरा मुचकावत रिहिस ।
“हाॅं, सुघ्घर बनाये हॅंव रिकम-रिकम के।”
“हॅंव ! येहा दुहर सोहाई आय । झक्क सादा । येला देबी-देवता, गोर्रैया, ठाकुर देव अउ नन्दी महराज मा, डीही-डोंगर अउ दुधारू गाय में बाॅंधथे। पचेड़ी सोहाई आय पचरंगा । गाय भईस मा बाँधथन। ये करेलिया सोहाई पाॅंच लर के। ये गोल्लर अउ बड़का गर वाला गौलछमी मा बँधाथे। मंजुरहा सोहाई मा जोरदरहा मोरपंखी डारके बनाथन दुधारू गाय बर। सुघ्घर मंजूरपंखी के चांदा ला देखत रिहिस फुलगजरा हा। 
गोल सादा सोहाई येला गईठा कहिथे येला बईला भईसा बछरू ला बाँधथे ।”
बलराम के ददा देखाये लागिस ओरी-पारी ।
“अभी ले बनाबो बेटी ! तब देवारी बर पुर सकबो ओ ! गाॅंव भर के गौलछमी बर।”
“येला सोहाई काबर कहिथे बबा ? ”
फुलगजरा किहिस
“सोहाई माने शोभा बढ़ानेवाला । पशुधन के शोभा मुकुट पहिरे राजा कस बाढ़ जाथे। पसीना ओगरा के हमर किसानी कारज मा पंदोली देवइया गौलछमी अउ प्रकृति ला मान देथन। सोहाई के मंजूर पांख भगवान किशन अउ सादा डोरी ला राधारानी घला कहिथे।”
बलराम बतावत रिहिस ।
फुलगजरा देखत रिहिस ओखर सांवर बरन ,फडकत भुजा, चाकर छाती, नरी मा करिया रेशम ला …।
“मोरो घर के शोभा बढ़ाबे का मोर जिनगी मा आके ? सोहाई कस सतरंगी कर देबे का ? मोर रानी ..! मोर सोहाई…।”
बलराम के आँखी गोठियाये लागिस । फुलगजरा घला हुंकारु दिस पलक झपक के। सब बिसरागे रिहिस जात धरम, रीति रिवाज, चाल चलागन , गाॅंव समाज ला । चन्दा-सुरुज, नरवा -डोड़गा , ताल-तरिया, सरई, महुआ रुख तक भेद नइ करिस। तब मया मा का के भेद….?
मोर राजा.. मोर बलराम !
मोर रानी .. मोर सोहाई..!
आँखी गोठियावत रिहिस । मुक्का भाखा, मूक सम्प्रेषण फेर सब गोठिया डारिस दुनो कोई प्रेक्टिकल कापी के बहाना। दुनो कालेज मा हावय।
चिरई-चिरगुन नानकुन रहिथे घर के शोभा बढ़ाथे । अउ उड़ियाये लागथे तब डर समा जाथे । कोनो शिकारी झपट्टा झन मारे अइसे । फुलगजरा के दाई ददा ला संसो होये लागिस। मया तो गोरसी के आगी आय उप्पर ले बुताये कस अउ तरी-तरी धधकत रहिथे। मया तो स्प्रिंग घला आय जतका दबाबे ओतकी उछलथे। ….अउ कोनो उछलथे तब दुरिहा के शिकारी कइसे फाॅंसथे, फॅंसइया ला आरो नइ होवय। 
                येहाॅं जंगलिहा गाॅंव गवई आय जतका सुघ्घर हावय ओतकी भयानक घला। मीठ चार तेंदू के रुखवा मा कोन कोलिहा बईठे हावय..? महुआ मा कोन परेत हावय…? आमा अमली के बौर मा कोन राच्छत लुकाये हे ..? मूसली सतावर सर्पगंधा मा कोन सांप लपेटाये हे..? कोंन गली ले रायफल पिस्तौल लेके निकलही ..? कोन पैडग़री मा टिफिन बम होही .? कोन सड़क उखड़ जाही..? कोन रेलवाही छिही बिही हो जाही….? कोनो नइ जाने।
फुलगजरा अउ बलराम पढ़ई मा हुशियार रिहिस । अउ गोठ बात मा सब मोहा जाही..। फेर आज तो उही मन मोहागे हावय । जल जंगल जमीन आदिवासी के हित गोठियइया मीठ लबरा मन मा। अधरतिया के वर्दी पहिन के मइलाहा सोच के दल मा वहु मिंझर गेहे। लाल सलाम के झंडा बुलंद करत हावय।
मुरलीवाला किसन कन्हैया की ….जय !
राऊत भाई मन जयकारा बोलाइस।
अरा ररा रे…….
घर घर दीया जलाओ संगी, आगे देवारी तिहार रे।
मोर सांहाड़ा देव बर राखे हॅंव, नरियर फुलगजरा हार रे।।
डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……।
दफड़ा बाजा तान मारिस
राउत भाई मन दोहा पारिस अउ बजनिया मन लहस-लहस के बाजा बजाइस। टिमकी मोहरी सिंगबाजा दफड़ा गुदुम झांझ मंजीरा झुमका ।
      सुघ्घर सवांगा राउत मन के । माड़ी ले पीयर धोती, लाल छिटही सलूखा , मोरपंखी के कमर बाजूबंद , मुड़ी मा खुमरी, खुमरी मा खोसाये चंदैनी गोंदा । बंगला पान के लाली ले मुॅॅंहू रंगे। अब्बड़ सुघ्घर बरन हावय गहिरा टोली के। ठोमहा भर तेल पियाईया तेन्दुसार के चिकचिकावत लउठी अउ आनी बानी के रेशम सुत चिकमिकी मा सजाये लउठी ला उप्पर उठा-उठा के नाचत हावय। गाॅंव के गौटिया पारा जावत हावय सोहाई बाॅंधे बर। पहिली गौटिया बेड़ा-बड़का मंझला, नान्हे गौटिया घर के गौलछमी ला सोहाई बाँधही ।
अरे हा… ,
नेवरिया घर घला बाँधही सोहाई ला। नेवरिया-नवा-नवा आये हे ये गाॅंव मा। चार पाॅंच बच्छर होवत हे फेर अतका धाक हावय गाॅंव मा …कि अब ये गाॅंव मा नेरवा गड़े सियान दाऊ के घला कुछु नइ चले । कोन जन का मोहनी मंतर जानथे ते …. लइका सियान जम्मो मोहा जाथे । जवनहा मन तो अपन दाई ददा के पाॅंव भलुक नइ परे अउ ओखर आगू मा डंडा सरन हो जाथे। अइसे हावय नेवरिया हा। अड़गड़ा पल्ली बड़गड़ा … टार अइन्ते तइन्ते हो जाही । बिचित्तर नाव हे। महुं ल लेये ला नइ आवय ओखर नाव ला। ओखरे सेती नेवरिया कहिथो सोझहा।
राउत नाचा अउ गौरी गौरा के बाजा बजनिया के पइसा नेवरिया कोती ले रहिथे। गाॅंव समाज वाला मन ऐखरे सेती तो मिलाय हावय अपन गाॅंव समाज मा। अउ सोहाई …? पइसा वाला के पाॅंव कोन नइ परे..?
देवारी के दिन दाऊ बेड़ा मा । जेठाऊनी के दिन बीच पारा के किसान मन घर अउ पुन्नी के दिन आबादी पारा के नान्हे किसान मजदूर के गौलछमी मा सोहाई बाँधथे। 
"अभी सोहाई बाॅंधे के पाछू काछन निकलही जल्दी करो गहिरा भाई मन ।"
गाॅंव के सियान मन किहिस।
डुम डुम ड डंग ड डंग ड डंग ……डंग। दफड़ा बाजा ताल दिस।
अरा ररा रे…….
जय महामाई रतनपुर के, अखरा के गुरु बैताल हो...।
चौसठ जोगनी पुरखा के, बइहा मा होबे सहाय हो..।।
बड़े दाऊ घर गिस सोहाई बाॅंधे बर सुमिरन करत राउत टोली हा। गाॅंववाला मन उछाह मा रिहिस अउ गौलछमी.. वहू मन अब्बड़ गमकत हावय।
अरा ररा रे…….!
मन मैला तन उजला , बगुले जैसा भेष हो।
इन सब ले कागा भला, भीतर बाहर एक हो।।
गहिरा मन दोहा पारिस नाचत कूदत । अउ गाॅंव के निकलती मसान घाट जाए के रस्दा, जंगल ले लगे झुंझकुरहा खेत मा बसे नेवरिया घर कोती रेंगे लागिस।
चार आँखी सब ला देखत रिहिस । जॅंगल मा हुआ-हुआ करइया आज गाॅंव आये हे। करिया बरन ला हेर के उज्जर बरन धर के। राउत मन तो जइसे कौआ अउ बगुला बर नही ..ऐखरे बर दोहा पारिस। आज दुनो एक दुसर के हाथ ला धरके मसकत रिहिस। आदिवासी के हित के गोठ करइया मन, जल जॅंगल जमीन बर न्याय के गोठ करइया मीठलबरा मन के कथनी अउ करनी ला जान डारे रिहिस। सड़क पुल पुलिया बिजली स्कूल कालेज बर बाधा बनइया ला जान डारिस।….असल गोठ ला जान डारिस।
           हमर संगठन हा पातर होवत हावय । अपन संगी संगवारी मन ला दल में जोर। पुलिस प्रशासन हमर कुनबा ला नाश करत हावय। घर लहुटे अभियान लोन वर्राटू हा कनिहा ला मुरकेट डारे हावय। लोगन मन घला अब नइ डर्रावय। नाच गान दल ले प्रमोशन होगे तुंहर । परीक्षा के घड़ी आवय । अब गाॅंववाला मन के बीच एसो के देवारी मा अइसे फटाका फोड़ कि रायपुर भोपाल दिल्ली अउ देश के कोना कोना तक आरो जाना चाही। इही तुंहर परीक्षा आवय । इही तुंहर  टास्क आवय।
              अइसना तो केहे रिहिन ओखर आंका हा। ओखरे सेती अइसे बम धरे हावय लुका के, कि काछन देखइया , गोबर्धन खुन्दवइया गाॅंव भर दहल जाही। हाहाकार मच जाही। ये चार आँखी बलराम अउ फुलगजरा के आय।
               सिरिफ बलराम अउ फुलगजरा भर नइ आये हे आज । ओखर संग आये हे सोमारू, आयतु, मड़का, श्रीनिवास, वेंकटेश, कुमारलू देवारी मनाये बर। लाखो करोड़ो इनाम हे ऐखर मन उप्पर प्रशासन डाहर ले। नेवरिया आय न नेवता देये हे, देवारी के कांदा कोचई खाये बर। देवारीच देखे बर नइ आये हे ऐमन। बम के धमाका सुने बर घला आये हावय। राउत मन नाचत हे फेर उछाह सब के चेहरा मा हावय। बुढ़वा-जवान, लइका-पिचका, जीव-जिनावर सब मगन हावय। सब गमकत हावय। फटाका बर बिटोवत लइका। मंद महुआ पीके भकवाय कका, खोड़खोड़ी खेलइया टुरा मन, ठेठरी खुरमी बनावत दीदी मन । हाथा देवइया राउताईन मन ,पान खा के इतरावत नाती बबा…..।
सब मर जाही … ? सिरतोन सब मर जाही…? सब जुच्छा हो जाही …? सब सुन हो जाही… ? सब मरे ले आदिवासी ला अधिकार अउ न्याय मिल जाही..? ये गाॅंव के सिधवा मन के का कसूर …? फूल कस लइका काही नइ जाने…ओखर का होही….?
फुलगजरा अउ बलराम ला ओखर नान्हेंपन सुरता आगे । जम्मो कोई नत्ता गोत्ता लरा जरा लागत हावय कका काकी दाई महतारी दीदी बहिनी …। …गुने लागिस । ….जी काॅंप गे। रुआँ ठाड़े होगे।
बाजा बाजत रिहिस। राउत मन नेवरिया घर तीर अमरगे।
“फोड़ो रे फटाका मोर बैरी बड़का दाऊ के कान फूटना चाहिये। बीच बस्ती ला घला जानबा होना चाही नेवरिया घर के सोहाई बँधागे अइसे।”
नेवरिया आय। अपन अंगना मा राउत मन ला नचवाये लागिस। सौ सौ के गड्डी ल फेकिस अउ कोठार के कुंदरा कोती चल दिस । सोमारू आयतु मड़का श्री….. जम्मो के उहिन्चे डेरा रिहिस। बलराम अउ फुलगजरा घला गिस टिफिन ला धरके । दुनो के हाथ मा रिहिस टिफिन, अउ टिफिन मा रिहिस देवारी के कलेवा काॅंदा कोचई बरा सोहारी सलगा बरा ठेठरी खुरमी ……।
राउत मन बिधुन होके नाचत हे अउ दोहा घला पारत हावय ।
अरा ररा रे…….
सोहाई बनायेव अचरी पचरी, गाॅंठ दियो हर्रेइया रे..।
जउन सोहाई ला छाटही, ओला लपेट लागे गोर्रैइया रे.. ।।
बलराम आय दोहा परइया। वहू तो आय गहिरा टूरा। सुकधनिया (सूपा मा धान दीया अउ सोहाई मड़ाये रहिथे ।)मा माड़े धान मा गोबर के लोई ला लोटाइस अउ कोठी मा सुघ्घर छपाये हाथा के बीच मा थोपिस। सोहाई ला निकाल के करिया गाय ला सोहाई बाँधत पारिस दोहा।
फट फट फट फट …..धड़ाम…। नेवरिया के दुवारी मा फटाका फूटत रिहिस फेर…. सब कोई देखे लागिस कुंदरा कोती ला। जतका फटाका फूटत रिहिस ओखर ले लाख गुना जादा आरो ले कोठार के कुंदरा मा फुटिस …फटाका… बमफटाका। चीख चित्कार करलई के आरो आइस सोमारू आयतु श्री …….सब्बो कोई के ।
ये बड़का फटाका सही जगह मा फूटे हावय आज । 
फुलगजरा मुचकावत रिहिस। ओखर चेहरा मा गरब रिहिस कर्तव्य के परीक्षा मा पास होये के। चाक्कर छाती मा गुमान रिहिस बलराम ला गाॅंव लहुटे के।
दुनो के नजर अटकगे करिया गाय मा। कतका सुघ्घर लागत हावय …चपर-चपर दूध पियत बछरू …। पीठ ला चटर-चटर चाटत गाय …अउ गाय के गर मा बॅंधाये सुघ्घर दिखत सोहाई….। सोहाई मा साजे चाक्कर मोर पंखी…अउ मोर पंखी मा सतरंगी ….चाॅंदा । अउ चाॅंदा मा दुनो के …..गमकत सोहाई कस सपना। अउ सपना मा….!

(द्वारा श्री राजेश चौरसिया)
आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी
जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़
मो. क्र. 8120578897

सोमवार, 18 अगस्त 2025

सरपंच के झटका

श्रवण कुमार साहू, "प्रखर"
 
  एक दिन के गोठ आय कका ह घर म बैठे-बैठे लाल चाहा पियत रहय,उहि बेरा म वोकर छोटे भतीजा ह आके कहीथे कका मेहा ये बच्छर चुनाव लड़े के बारे म सोचत हों अऊ तोर आशीर्वाद लेय के खातिर आए हों,अतका गोठ ल सुनके कका ह बात काटत बोलिस,अरे बेटा तेहा चुनाव उनाव के चक्कर म काबर पड़त हस,कलेचुप कमा अऊ खा|भतीजा ह कथे कका ये बच्छर सहिच म चुनाव लड़हूं चाहे जो भी हो जाय|
          भतीजा के नशा ल देख के कका ह कहीथे कस रे दस बीस लाख रुपया  रखे हस? जेन चुनाव लड़े के हिम्मत करत हस, कहाँ ले वोतका पैसा पाबे बेटा? भतीजा कहीथे कका काँहचो के उधार बाढ़ी करहूं,या नहीं ते मोर हिस्सा के एक दु एकड़ खेत ल बेचहूँ,फेर सरपंच के चुनाव जरूर लड़हूँ|
           लइका के जोश ल देख सुन के कका ह कहीथे अरे बेटा खेत खार ल बेच के या करजा करके चुनाव लड़े के अक्कल ते कहाँ ले पाएस? देख बेटा बड़े-बड़े राजा ह फकीर होगे रे ये बुता म जी,त तोला कोन पुछही? अऊ अतेक करजा करके चुनाव जीत डरबे त का कर डरबे? अऊ फेर करजा ल कईसे छुटबे? अऊ सबले बड़े गोठ ये हरे कि तेहा अंचइत पंचइत के बुता कईसे करके करबे? 
       भतीजा ह कका के गोठ ल सुन के हाँसत-2 कहीथे,तेहा नइ जानस कका आजकल के सरपंची ल, आज कोनो ह नेता पर हितवा करे बर नी बने गो, सब अपन के देखईया हे | महू ह एक दांव सरपंच बन जहूं न त जम्मो करजा ह ऐसने छुटा जाहि|
         बबा कथे कि, के रूपया तनखा हावय रे सरपंच के? जेन तेहा महल बना डरबे,भतीजा कथे ये कका,तै निचट भोला हस गो,अजी एक दांव सरपंच बनना याने कि कोनो कुबेर के लाॅटरी लगे के बरोबर होथे,कका कहीथे का लाॅटरी रे,, भतीजा कहे,झटका कका झटका, तै नी जानस गो,नदिया के रेती म झटका,दारू अऊ खदान के ठेका म झटका,नाली नरवा के पाछु म झटका,करोड़ो के  विकास कार्य के बजट म लाखों के सरकारी झटका,रोजगार गारंटी म झटका,गाँव के तरिया नरवा के मछरी अऊ रुख राई म झटका,का बताबे बबा भाषण से राशन,अऊ आवास से ले के आखिरी सांस म झटका, अब का बतांव कका,गरीबी रेखा अऊ कोला बारी तक म झटका हावय गो,, तभे तो ते नि जानस का आज जेन देखबे तेन मटमटाय हावय चुनाव लड़े खातिर|तभे तो जेकर औकात नी राहे वहू मनखे ह पाँच बच्छर म बड़े बड़े मोटर कार अऊ बंगला बना डरथे जी|वोकर संगे -संग गांव म दिखावटी शान अलग मिलथे|
                अतेक जबर झटका ल का सुनिस कका के अंतस ल जोर के झटका लागिस,कका कथे बेटा ये तो पाप हरे न अपन गाँव घर अऊ धरती दाई के संग म गद्दारी करना ह, कहाँ  के धरम आय,बेटा वो पंच परमेश्वर के गोठ कहाँ गे, जिन्हा मनखे के ईमान ल सबले बड़े धरम माने जाय,कका ह समझाय बेटा मेहनत के कमई ह सबले बड़ा पुण्य होथे रे,चल कुदारी ल धर अऊ धरती दाई के सेवा कर, बड़ पुण्य मिलही रे???
                कुछ सोचत कका ह कहीथे,अरे हाँ कोनो चुनाव हार गेस त का होहि रे? ,भतीजा ह जानू मानु  मजाक करत कहीथे  अऊ का होहि,कका 
" फोकट के चाउर मिले,फोकट म नून,
में गावत हो ददरिया तै कान दे के सुन|
राशन कार्ड म चाऊर मिलही,
श्रम कार्ड म मिलही बुता|
मुड़ कान पिराय त,पी खा के सुता||
तबियत खराब होहि त,
आयुष्मान ह माढ़े हे,
करजा दे बर,बैंक के लोन ह ठाढ़े हे||
     अइसन दिल्लगी करत मैं जावत हों बबा पर्चा भरे बर कहिके  हाँसत-2 भाग गिस,,,, बबा मुड़ धर के सोच म पड़गे,,, का सच म आज चुनाव सिरिफ झटका के खातिर होथे---
श्रवण कुमार साहू, "प्रखर"
राजिम गरियाबंद,( छ. ग.

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

गोठकारिन

  डॉ. शैल चन्द्रा

           सुरजा बाई बिहनिया ले सूत उठ के जम्मो गाँव के चक्कर लगा डारथे।काखरो घर  दौतून मांगे बर पहुँच जाथे त काखरो घर चहा पिये बर बईठ जाथे। काखरो बारी म पताल मिरचा तोर के धर लेथे। फेर एक ठि सबले बड़े गोठ ये आये कि जेखर घर जाथे ओखर घर घंटा भर  गोठ बात करथे।ओखर किसिम -किसिम  के गोठ ल सुन के लोगन मन असकटा जाथे। ओहा गाँव भर के खबर सुना देथे। एखरे कारन  गांव भर के मन सुरजा बाई ल गोठकारिन कहिथे।
           आज गांव म  एक ठि अलहन होगे। गांव के नोनी चंदा ह पढ़े बर सहर गे रहिस त उहाँ के गुंडा टुरा मन ओला अकेल्ला जान के घेर लिन। ओखर इज्जत लूट के ओला मार के फेंक दिन।
       अइसन  घटना ल  सुनके जम्मो गांव म सन्नाटा परगे। जम्मो गांव के मन रोवत रहय। गोठकारिन सुनिस  त हंसिया धर के गांव के मन ल गोहार पार के  कहेल लागिस-"सुनव गांव के मनखे मन ,हमर बहु -बेटी मन  के लाज बचाना हे।हमन अइसन अत्याचार नी  सहबो। हमर चंदा बेटी के इज्जत उतर  गे ।ओखर गुंडा मन जान ले लिन। ओखर  हत्यारा मन  ल फांसी चढ़ाबो ।" गोठकारिन पगली कस बोलत रहय।
        सरपंच ह ओखर गोठ ल सुनिस त कहिस-"अऔ, तोर गोठ ल कोन सुनथे। ते हा सब दिन सही बात कहे फेर आज सही सुनइय्या कोन हे?"
          तभे सरपंच ह का देखथे ।जम्मो गांव के  लइका, सियान, माई लोगन मन डंडा धरे  सकला लेगे। जम्मो झन सहर जाये बर तियार हे। फेर का हे जम्मो गांव के मन सहर चल दिन अउ कलेक्टर  बंगला मेर आंदोलन  सुरु कर दिन।
        आखिर कई दिन के प्रयास ले चंदा के हत्यारा मन पकड़ा गिन।
         अब  गोठकारिन  के गांव म मान -सम्मान बाढ़गे। गोठकारिन ह गांव के माई लोगन मन ल सकेल के 'नोनी सुरक्षा' दल के गठन कर डारिस। नोनी मन हमर गरब हे ।हमर  मान हे । इही सोच ल लेके गोठकारिन के नोनी सुरक्षा दल ह् नोनी मन के सहायता करेल लागिस। नोनी मन  के शिक्षा, नोनी मन ल सब्बो प्रकार के सहायता बर अब गोठकारिन ह् अपन जीवन ल समर्पित कर दिस।
                  रावण भाठा, नगरी
           जिला- धमतरी
           छत्तीसगढ़
        .9977834645


मंगलवार, 15 अगस्त 2023

पसहर चाउर

-चन्द्रहास साहू

“दोना ले लो ओ …!”
“पतरी मुखारी ले ले ओ..!”
“लाई ले ले ओ…. !”
दुनो मोटियारी ओरी-पारी आरो करत हावय। आज झटकुन उठ गे हावय दुनो कोई। मुड़ी मा गुड़री , गुड़री मा पर्रा , पर्रा मा टुकनी , टुकनी मा लाई दोना पतरी दतोन मुखारी । छोटे दाऊ पारा ला चिचिया डारिस। थोकिन बेच घला डारिस। अब तेली पारा जावत हावय। जम्मो बच्छर बेचथे जम्मो नेग – जोग के जिनिस ला अपन गाँव अउ आने दू चार गाँव मे। दोना पतरी वाली नवइन रेवती अउ केंवटिन हा लाई ला बेचत हावय । फेर आज तो रेवती के अन्तस मा जइसे कोनो पथरा लदकाय हावय।
“का होगे दीदी ! आज तबियत बने हावय न ?”
“हव बहिनी ! बने हावंव।”
रेवती हुकारु दिस फेर मन मा अब्बड़ बादर गरजत रिहिस। गौरा चौरा करा अब थिरागे दुनो कोई। पारा के आने माईलोगिन मन सकेलागे रिहिस। पर्रा के दोना पतरी ला निमारे लागिस।
” मेंहा देवत हंव बहिनी तुमन झन छांटो। आ बहिनी रमेसरी नेग जोग के जिनिस ला बिसा ले।”
रेवती अउ केंवटिन दुनो कोई किहिस।
रमेसरी दुवार लिपत रिहिस। खबल – खबल हाथ धो डारिस। भीरे कछोरा मा आइस महुआ झरे कस हाँसत।
“का होगे या ..?”
अब्बड़ खुलखुल हाँसत हस बाई । केवटिन के आरो ला सुनके किहिस।
“अई तुमन मोर घर मा आये हव तब हाँसहु नही, तब रोहू या…। अब्बड़ धुर्रा होगे रिहिस बहिनी तेखर सेती दुवार लिपत हव। फेर ..।”
“फेर..का ?”
समारिन किहिस।।
“फेर अउ का  ? पानी गिरत हावय नइ देखत हस ?”
अब छे सात झन उपासिन मन सकेलागे रिहिस। जम्मो कोई हाँसे लागिस रमेसरी के गोठ ला सुनके। पारा भर गमकत हावय अब।
” सिरतोन काहत हस दीदी ! ये अखफुट्टा इंदर देव हा अइन्ते – तइन्ते बुता करथे । चौमासा मा घाम टड़ेरथे अउ गरमी मा पूरा बोहाथे। तेखर सेती राच्छस मन नंगतेहे कूटथे ओला ओ..।”
बिसाहिन किहिस अउ फेर खुलखुल हाँसीस।
“ओ रोगहा इंदर भगवान के गोठ तो झन कर दीदी ! पर के गोसाइन बर नियत डोला दिस। कुकरा बन के पर घर खुसरगे। भगवान मन अइसने नियत खोंटा करही तब मइनखे मन के का होही ..?”
धरमिन आय। ओखरो गोठ अब मिंझरगे रिहिस। गघरा भर पानी मुड़ी मा बोहो के आवत रिहिस। छलकत पानी अउ पानी मा मिंझरे मांग के लाली कुहकू जतका खाल्हे उतरत हावे ओतकी रंग कमतियावत हावय अउ मन मा उछाह के रंग चढ़े लागिस। माथ ले नाक , नाक ले नरी अउ नरी ले उतरके छाती मा हमागे कुहंकू ले रंगे पानी हा।
“पसहर चाउर बिसाहू बहिनी…?”
“वहु तो अब सोना होगे हावय वो ।”
“धरमिन अउ रमेसरी गोठियावत रिहिस।
कामे तौलही रेवती दीदी हा। तोला मे.., किलो में.., कि पैली मे.. ?”
जम्मो कोई फेर हाँसे लागिस।
” पबित्तर जिनिस हा मँहगा तो रहिबे करही दीदी !” केवटिन किहिस।
” लइका लोग सब बने- बने हावय न बेटी रेवती !”
महतारी कस मंडलीन डोकरी के गोठ सुनके रेवती अब दंदरे लागिस। आँसू के बांध अब रोहो – पोहो होगे। पीरा छलकगे। घो..घो..हि.. हि… हिचकी मार के .. अउ अब गोहार पार के रो डारिस। रेवती के बेटी रितु हा काली मंझनिया ले बिन बताये कही चल देहे। कुछु बताये के उदिम करिस रेवती हा फेर मुँहू ले बक्का नइ फूटे।
“ओ काला बताही ओ ! रेवती के टूरी हा अनजतिया टूरा संग उड़हरिया भगा गे हे तेला।”
कोतवाल आवय। ओखर बीख गोठ ला सुनके झिमझिमासी लागिस रेवती ला।
“कलेचुप रहा कका ! सरकारी दस एकड़ खेत ला पोटारे हस तेखर सेती आनी-बानी के उछरत हावस। माईलोगन के मरजाद ला नइ जानस। गरीबीन ला ठोसरा मारे के टकराहा हस ।”
” कुकुर के पूछी कहा ले सोझियाही।”
रमेसरी अउ धरमिन आवय झंझेटत रिहिन।
                        रेवती भलुक गरीबीन रिहिस फेर अब्बड़ दुलार अउ मया पाये रिहिस माइके मा। कोनो महल अटारी के नही भलुक कुंदरा के राजकुमारी रिहिस रेवती हा। राजकुमार मिलिस तब तो सिरतोन के राजकुमार बनगे रेवती बर। ....फेर गरीबीन के भाग मा उछाह नइ लिखाये राहय । मंद महुआ पियईया राजकुमार हा टूरी के छट्ठी के पार्टी बच्छर भर ले मनावत रिहिस। पार्टी नइ सिराइस फेर राजकुमार सिरागे।
आँसू के एक- एक बूँद ला सकेलतीस ते समुन्दर ले आगर हो जाही..। कतका दुख के पहार ला छाती मा लदके हावय कि हिमालय कमती हो जाही। कतका ठोसरा अउ अपमान सहे हे …कोनो नइ जाने। बेटी के कल्थी मारत ले बइठत तक। बइठत ले मड़ियावत तक । मड़ियावत ले रेंगत तक। ......अउ  रेंगत ले उड़ाहावत तक। …अउ उड़हाये लागिस तब तो झन पुछ ..! काखर आँखी मा नइ गड़े लइका हा..। पांख ले थोड़े उड़ाथे बेटी मन ..? अपन मिहनत मा सब ला जानबा करा देथे। गोड़ तिरइया मन उही मेर भसरंग ले मुड़भसरा गिर जाथे।
बेटी बारवी किलास मा पूरा राज मा पहेला आये हावय। पेपर छपिस जयकारा होइस।
“बेटी! तिही मोर जैजात आवस। न गांव मा दू कुरिया के घर बिसा सकत हंव, न खार मा खेत । .. अउ घर, खेत रहे ले मइनखे पोठ हो जाथे का ? जैजात आवस बेटी ! तोला देख के मालगुजार कस महुं हा छाती फुलोथो। ...अउ अइसना फुलत रहूँ सबरदिन।
फेर आज फुग्गा फुटगे। गुमान टुटगे। हवा निकल गे ।
“भागना रिहिस ते हमर जात सगा के का दुकाल रिहिस ओ ? पठान टूरा संग…छी छी…।”
कोतवाल फेर बीख बान छोड़त रेंग दिस।
रेवती के मन गवाही नइ दिस फेर गाँव के पटवारी कका बताइस तब कइसे नइ पतियाही ? उही तो आय पुरखा घर के एक खोली ला अतिक्रमण हाबे कहिके टोरवाये रिहिस।
“मेहाँ देखे हंव रेवती बेटी ! बड़का अरोना बेग ला पीठ मा लाद के ओ टूरा संग भुर्र होगे तेला।”
पटवारी फेर किहिस।
धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।
“इंजीनियरिंग कालेज के तीर मा मोटियारी टूरी के लाश मिलिस दू चार दिन पाछू। बदन के जीन्स टी शर्ट जम्मो चिरागे रिहिस। पुलिस केस मा पता चलिस – कबाड़ी वाला के बेटा आवय सलमान । टूरी ला अपन मया मा फँसाये के उदिम करिस अउ नइ फँसिस तब चारो कोई ओरी पारी.... ... छि... छी.....।”
पटइल कका आवय। रेवती के जी कलप गे। मुँहु चपियागे टोटा सुखागे फेर पानी के एक बूँद नइ पियिस।
“आजकल नवा चरित्तर उवे हे भइया ! लव जिहाद कहिथे। आने जात के मन मया मा फँसा लेथे। टूरी ला मुनगा चुचरे सही चुचर लेथे। खेत जोतके बीजा डार देथे अउ छोड़ देथे ..खुरचे बर। ये जम्मो डंफायेन हा बड़का शहर मा चले । अब हमर गाँव देहात मा घला आ गेहे। धन हे श्री राम जी..! तिही बता भगवा रंग ला कइसे अइसन खतरा ले उबारबो तेला।
?”
पुजारी आय मंदिर ला माथ नवावत किहिस।
रेवती काला जानही घरखुसरी हा, लव जिहाद – फव जिहाद ला। अपन बुता ले बुता राखथे। उही पुजारी आवय जौन हा डांग-डोरी, देवी-देवता, देव- आंगा देव ला नचा लेथे।
रेवती बम्फाड़ के रो डारिस।
धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय।
अभिन बारवी पढ़ के निकले हावय कइसे मया के मेकरा जाला मा अरहज जाही ? अरहज सकथे न!,नेवरिया घर बारवी पास नइ होवन पाइस अउ बिहाव कर दिस।.. अउ ओ खोरवा मंडल के दसवीं पढ़इया नतनीन.. अब्बड़ आनी-बानी के गोठ सुनथो। ओमन अइसन करत हावय तब मोर बेटी…? अब्बड़ गुनत-गुनत अंगरी मा गिन डारिस। लइका हा छे बच्छर मा बड़े स्कूल मा भरती होइस। बारा बच्छर ले पढ़ीस । बारा छे अट्ठारा..।
“अई”
रेवती के मुँहु उघर गे। लइका संग्यान होगे। इही उम्मर मा ओखर खुद के बिहाव होये रिहिस।
रेवती के आँसू भलुक सुक्खागे रिहिस फेर आँखी उसवागे रिहिस।
“कोन पठान टूरा आवय रे ..? हमर गाँव के बहु बेटी ला बिगाड़त हे। अभिन थाना मा फोन करथव । भगवा रंग वाला मन ला घला सोरियावत हंव । ओ पठान टूरा के बुकनी झर्रा दिही ओमन।”
सरपंच आवय रखमखा के आइस तमकत हे।
” महूँ देखे हंव ओ रितु नोनी ला । कोन आय तेला नइ चिन्हे हंव फेर टूरा हा सादा कुरता पैजामा अउ मुड़ी मा हरियर टोपी पहिरके तहसील ऑफिस कोती जावत रिहिस।”
गाँव के डॉक्टर आय।
” मोला तो कोर्ट मैरिज करे बर जावत रिहिस अइसे लागथे।”
सरपंच फेर किहिस।
धिरलगहा पतियाये लागिस रेवती हा.. फेर मन नइ पतियावत हावय अभिन घला।

                      रेवती घर अमरगे रिहिस। अउ घर ले दोना पतरी ला उपासिन मन ला बेचत हाबे। फेर मोटियारी बेटी के संसो मा काला धीरज धरही ? कभु डॉक्टर करा जातिस कभु वकील करा, कभु बइगिन करा तब पहटनीन करा । कतको बेरा फोन घला लगाइस फेर स्विच ऑफ आइस।
            जेखर संग मया कर तेखर संग बिहाव घला करना चाही । नही ते..? मया ही झन कर। महाभारत मा रूखमणी हा भाग नइ सकिस तभे भगवान किसन ला भगाये बर किहिस । अउ रूखमणी ला हरन करके लेगगे किसन जी हा। रितु हा महाभारत देखत- देखत केहे रिहिस अउ रेवती बरजे रिहिस । नानचुन टूरी अउ आनी – बानी के गोठ करथस। जइसे पढाई मा हुशियार हावय वइसने खेलकूद लड़ई झगड़ा सब मा अगवाये हाबे…अउ मया मा भागे बर…?

धिरलगहा पतियावत- पतियावत अब सिरतोन पतियाये लागिस रेवती हा.. ।
बेरा चढ़गे अब। महुआ पत्ता के दोना पतरी ला कतको झन ला बेचिस अउ कतको झन ला फोकट मा घला दिस। कतको झन ला छे किसम के अन्न राहर जौ तिवरा चना बटरा अउ लाई दिस। छे किसम के खेलउना बनाइस बाटी भौरा गिल्ली डंडा धनुष बाण गेड़ी। पसहर चाउर ( लाल रंग के धान जौन पानी के स्रोत मा अपने आप जाग जाथे। सुंघा/कांटा रहिथे। बाली ला सुल्हर लेथे दीदी मन अउ रमंज के चाउर निकालथे । इही लाल रंग के चाउर  ला पसहर चाउर कहिथे ) ला रांधिस बिन जोताये खेत ले छे किसम के भाजी सकेल डारिस अमारी मुनगा कुम्हड़ा लाल पालक बथवा भाजी। गाँव के डेयरी ले दूध मही घीव ले आनिस। अउ अब जम्मो तियारी करके गौरी – गौरा चौक मा रेंग दिस।
                मंडप साजे हे। सगरी बने हावय सुघ्घर अउ पार मा खोचाये हे चिरइया फूल कनेर कांसी दूबी अब्बड़ सुघ्घर। दाई माई बहिनी मन घला अपन जम्मो सवांगा पहिरे- ओढ़े । मेहंदी मा रंगे हाथ अउ आलता माहुर मा गोड़। चुरी वाली अउ  बिन चुरी वाली सब बइठे हावय संघरा। लइका के उज्जर भविस बर असीस मांगत हावय जम्मो उपासिन मन कमरछठ महारानी ले।
“अब तोरे आसरा हावय ओ कमरछठ दाई !”
रेवती के ऑंसू बोहागे महराज के पैलगी करत। दिन भर के निर्जला उपास । जम्मो कोती अँधियार लागिस। लटपट घर अमरिस अउ सुन्ना घर मा समावत पारबती भोले नाथ के फोटू ला पोटार लिस। बेसुध होगे।

उदुप ले मोहाटी के कपाट बाजिस अउ नोनी हा खुसरिस भीतरी कोती। बटन ला मसक के लट्टू बारिस।

“दाई ! ”
ये आखर रेवती बर संजीवनी बूटी रिहिस। झकनका के उठिस अउ  लइका ला पोटार लिस। नोनी रितु के नरी मा झूल गे।
“गाँव भर नाच नचा डारे। पदनी पाद पदो डारे । जिहाँ जाना हे, बता के जाना रिहिस तोला कब बरजे हव बेटी ! झन जा कहि के । ”
रेवती अगियावत रिहिस अउ रोवत किहिस।  रितु के गाल घला झन्नागे दाई के चटकन ले।
“दाई रायपुर गे रेहेंव। अब तोर बेटी हा मेडिकल कालेज मा पढ़ही ओ !”
मुचकावत रिहिस रितु हा।
“अउ पइसा ? ”
“लोन लेये हंव, शिक्षा लोन। फरहान भइया जम्मो बेरा पंदोली दिस फारम भरे अउ लोन निकाले बर। मोर संगी रुखसाना के भाई आय ओ ! फरहान हा। रायपुर दुरिहा हे तेखरे सेती अगुवाके काली गे रेहेंव मेहां, रुखसाना अउ फरहान भइया तीनो कोई। आजे आखरी दिन रिहिस काउंसिलिंग के । मोबाइल घला मरगिस तब का करहु। जाथो कहिके पटेलीन डोकरी ला घला बताये रेहेंव । भैरी सुरुजभूलहिन नइ बताइस ? नानचुन गोठ बर झन संसो करे कर। रितु मुचकावत रिहिस अउ रेवती के ऑंसू पोंछत रिहिस।
टूरा के जेवनी कोती अउ टूरी के डेरी कोती पोता मारे के विधान हाबे। नानकुन कपड़ा ला पिवरी छुही मा बोर के रितु के डेरी कोती पोता मारे लागिस रेवती हा। छे बार पोता मारके आसीस दिस खुलखुल हाँसत रेवती हा अब।
बिन जोताये खेत मा उपजे चाउर कस पाबित्तर लागत रिहिस अब रितु हा। अउ  गाल मा उछाह के रंग दिखत रिहिस सिरतोन पसहर चाउर कस  लाल-लाल।
द्वारा श्री राजेश चौरसिया
आमातालाब के पास
श्रध्दा नगर धमतरी छत्तीसगढ़
493773

 

बुधवार, 26 अप्रैल 2023

मंथरा

चन्द्रहास साहू
मो 8120578897

        आज मोर चेहरा अब्बड़ दमकत हावय भलुक आंखी ले दू टीपका आंसू निकलगे तभो ले मन गमकत हावय। सिरतोन आंसू घला  सुघ्घर लागथे,...उछाह के आंसू। काखरो जिनगी सिरजाये ले बड़का उछाह का होही...?
           गोरी सांवरी बरन,घुंघरालू चुन्दी, सरई के कोंवर पाना कस होंठ, खीरा बीजा कस दांत। नाक मा चमकत रवाही फूली, कान मा झूलत झुमका, बाहां भर चुरी,गोड़ मा बिछिया आलता अउ संग मा दमकत लाल कुहकू। शिफॉन के लुगरा सिंपल सोबर पोलखा ओखर उप्पर सादा डॉक्टरी कोट....! साज-संवर के अपन चेहरा ला देखेव दरपन मा। सुघ्घर... अब्बड़ सुघ्घर लागत रहेंव।
"काखरो नजर डीठ झन धरे......!''
 कजरारी आंखी ला मटकावत केहेंव अउ काजर के दू टीपका ला कान के पाछू लगायेंव। कोन जन ये बिसवास आवय कि अंधविश्वास..।फेर दाई के मया दुलार हाबे अइसे लागथे।
जादा उछाह मा झन नाच लता कोनो नइ हे देखइया। बाल मन हुक मारें लागिस मोर। फुसफुसावत हावव अउ अपन वैक्सीन बेग ला सावचेती होके जोरे लागेंव। अपन पर्स मा पइसा डारेंव अउ टिफिन मा इडहर के साग.. । चट्ट चट... चटकारा लेयेंव। पहिली बेरा बनाये रेहेंव...
कोंवर-कोंवर कोचई पान ला मास्टर घर ले आनेंव उरिद दार के पीठी बनायेंव। दूनो ला मिंझारके थारी मा राखेंव अउ ओ थारी ला कड़ाही मा मड़ाके भांप मा उसनेंव। ...अब नान-नान कुटका कांट के डबकत अम्मट मा ओइर के बनायेंव। अब बनगे इडहर साग हा पियर-पियर .. फोरन के मिठ्ठी लीम पाना अउ सरसो-राई के दाना उफले ....अब्बड़ ममहावत इड़हर साग।
मास्टर कका ला तो  देयेंव घला। ओखर कटोरी घला सकेलागे रिहिस।
"वाह.. अब्बड़ सुघ्घर,स्वादिष्ट, गुरतुर । तोर हाथ के जादू ... अहा..ह..अब्बड़ मिठाथे ओ लता तोर बनाये साग हा।''
कका अघागे।
कंघी करके एक बेरा दरपन के आगू मा अउ ठाड़े होयेंव। मुँहू के मुंहुरंगी लागयेंव अउ ड्रेसिंग के दरपन मा होंठ के गोल-गोल चिन्हा बनायेंव लिपिस्टिक मा। चुन्दी मा फूल खोसेंव। मुच ले मुचका के नानकुन कागज लिखेंव।
मोर मयारुक !
पैलगी
           ये कुरिया मा तोर स्वागत हाबे मोर देवता !  भलुक तेंहा आबे तब मेंहा अपन ड्यूटी कोती रहू फेर ये घर तोला सुन्ना नइ लागे।    भीतरी मा आबे  ..अउ लम्बा सांस लेबे तब,..मोर ममहासी ला महसूस करबे। खिड़की खोलबे तब, खिलखिलावत हवा के झोंका बनके गुदगुदाहू। दरपन ला देखबे तब मुचकावत रहू। अउ गद्देदार सोफा मा बइठबे तब,.. तोला बइहा बनाहु ही..ही...।
दूध वाला आरो करही ते कसेली मा दूध झोंका लेबे। मेंहा झटकुन आहूं मोर राजा !
                                  तोर गोसाइन  लता कागज मा नानकुन स्माइली बनायेंव अउ टी टेबल मा मड़ा देंव चंदैनी गोंदा के गुलदस्ता मा दबाके। तारा कूची लगा के जिला अस्पताल अमरगेंव।
गोसाइया आवत हावय आज। पहिली हफ्ता-पन्दरा दिन मा आवय फेर ये पारी पूरा-पूरा तिरसठ दिन मा आवत हाबे। ओखर बिना कतका तड़पेंव.. कतका रोयेंव ..परेशान होयेंव.. मेंहा जानहु, मोर आँसू जानही अउ मोर अकेल्लापन जानही..।
            दू महीना के ट्रेनिंग मा गेये रिहिस रायपुर। मास्टर नोकरी लगगे हावय ट्रेनिग होही ओखर पाछू स्कूल मा पोस्टिंग। हे महामाई एके ठौर बर आदेश निकलवाबे दाई ! हमर दुनो के.. हमर शहर बर।         
                      आज मोर बर अब्बड़ उछाह रिहिस। गोसाइया आवत हे। मोर ससुर बेटी के नर्सिंग पढ़ाई मा नाव आये हाबे अउ बहिन बेटी के बिहाव तय होगे।....सब्ब एक संघरा अब्बड़ अकन खुशखबरी। भलुक मोर जेठ-जेठानी के बेटी आवय फेर पइसा के कमती नइ होवन देवव पढ़े बर। जिनगी सिरजाये बर।
                     मोर बाबू मन दू भाई अउ दू बहिनी होथे। मोर बाबू बड़का आवय जम्मो झन ले, अउ कका हा जम्मो झन ले नान्हे। हमर खानदान मा पहिली बेटी आवव मेंहा, जम्मो के दुलारी। सबके लाड़ली रेहेंव फेर कका बर जादा। कका के परी आवव न ..। कही जातिस कका के साइकिल के आगू कोती डंडिल मा बइठव। ....अउ डंडिल ले अब केरियल मा। जम्मो  गाँव भर किंजर डारो मेंहा।
कका के  बिहाव के बरात निकलिस तब फूफू के बेटी संग मोहाटी के दोनों कोती  शुभ कलश ला बोहो के ठाड़े रेहेंव । कका हा ओला दस के कड़कड़ाती नोट दिस अउ मोला मइलाहा दस के नोट।  अतकी मा अब्बड़ रोयेंव मेंहा अउ जम्मो देखइया मन अब्बड़ हाँसिस। लइका पन के रूठना मनाना..। कका जानथे। पचास के कड़कड़ाती नोट दिस अपन दुल्हा माला ले निकाल के।
'मोर कंकालिन दाई ला कइसे मनाना हे जानथो मेंहा।''
कका किहिस अउ टुप-टुप पांव परिस। कोन जन काबर पांव परिस ते आज ले समझ नइ आइस।
मोर कका के कोरा मा बइठके बरतिया गेयेंव। अउ लहुटेंव तब तो कका काकी दुनो के कोरा ला पीरा कर डारेंव जागत भर ले ।....अउ अब बिहनिया उठेंव तब फूफू दीदी के तीर मा सुते रेहेंव। कका के परी,कंकालिन दाई फेर बिगड़गे रिहिस। कोंन जन फूफू का तेल लगाथे ते अब्बड़ बस्साइस। मइलाहा लागथे मोला,ये फूफू हा साफ-सफा मा धियान नइ देवय न। बफल-बफल के अब्बड़ रोयेंव। कका-काकी मनाइस अब, फेर शर्त रिहिस मोर।
"रातकुन दुनो के संग सुतहु कका !''
जम्मो कोई फेर हाँसिस ।
"हांव मोर बेटी ! सूत जाबे ।''
काकी किहिस। ओ दिन अब्बड़ रोये रेहेंव घोलन-घोलन के अउ कका हा पेमखजूर खवाके मनाये रिहिस।
कोन जन सिरतोन मा सुतेंव कि नही  भगवान जाने फेर कतको महीना ले मोर नींद हा कका-काकी के पलंग मा परे अउ दाई ददा के पलंग ले बिहनियां उठो । ननपन के जम्मो गोठ ला सुरता करत मोर मन गमकत हे।
          मोर दाई ददा अब्बड़ बुता करथे उवत के बुढ़त ले। रोपा लगाई अउ मिंजाई बर तो कोन जन ...? घुघवा के आंखी ला उधार मांग के खार ले घर आथे। ठुकुर-ठुकुर रेंगत ददा आगू-आगू, दाई पाछू-पाछू अउ ओखर पाछू मा कमइया बनिहार मन के रेला अंधियारी रात मा।
"कइसे दाई अब्बड़ बेरा होगे घर लहुटे बर।''
"का करबो बेटी ! उवत ले बुड़त कमाबो तब तो दू पइसा बाचही ओ।
महतारी बेटी गोठियावत हावन अउ अब काकी के गोठ मिंझरगे।
"तोर पढ़ाई लिखाई मा अब्बड़ खरच आवत हे नोनी । तोर बिहाव बर घला सकेले ला लागही का   ? उवत के बुड़त कमाही तब तो तोर दाहिज-डोल बर पइसा सकेलाही, न बड़की दीदी !''
काकी चटाक ले किहिस अउ दाई हा बुताये बरोबर हुकारु दिस।
"हांव ।''
आज सोज्झे अपन कुरिया मा खुसरगे दाई हा। नही ते आने दिन..कभू जुआ देखे ला काहय कंघी ला धर लेवय अउ कभू डोकरी दाई बबा बर गोरसी सपचा देवय कभू सुआ ददरिया सुना देवय। ...फेर आज हाथ गोड़ धोइस अउ कुरिया मा खुसरगे।
"दाई चाहा पी ले।''
अब्बड़ गेलोली करेव तब पीयिस चाहा। कमइया मन संग अब्बड़ हाँसत गोठियावत आयेस दाई ! अउ काकी के गोठ सुनके का होगे.......?
दाई मोला पोटार लिस अउ अपन छाती मा सूता लिस । अब रोये लागिस। बारवी पढ़त हव फेर दाई के रोवई ला नइ जान सकेंव। दसवीं पढ़इया भाई संग अब्बड़ गुनेंव फेर कुछु नइ सूझिस।
                    कका सोसायटी मा सेल्समैन हाबे। काकी हा तो बड़का घर के गुनवंती बेटी आवय। तभे तो कहिथे-
"पइसा सकेल के राख, हमरो तीन झन बेटी हावय। टूरा के अगोरा मा पुरोनी घला टुरी होगे।पाले-पोसे मा अब्बड़ खरच आही। बड़की के  बेटी लता उप्पर जम्मो ला झन लुटा...। जम्मो कोई बर कपड़ा लेथस.. खई-खजाना बिसाथस.... फीस भर देथस ..।''
 कोन जन काकी ला का होगे ते   ? ओखर ले अब्बड़ दुलार पाये रेहेंव फेर अब ..... बिखहर सांप बरोबर बीख उगलत हावय।
                   गाँव मा कथा-भागवत माढ़े रिहिस। घर-घर सगा पहुना आये रिहिस। हमरो घर सगा आये रिहिस। कतको  सगा झर गे अउ कतको सगा रुकिस। काकी के फूफू दीदी घला आये रिहिस। हफ्ता दिन ले रिहिस।
"दमाद बाबू ! तोर लइका मन बर का सकेले हस   ? अब लइका मन संग्यान होवत हे। बड़का स्कूल मा पढ़ावत हस ते सुघ्घर आवय फेर बर बिहाब बर घला कुछु गुन। आगी लगत ले महँगाई बाढ़ गेहे ,...जानथस ? हमन बड़का नौकरी वाला मन दू तोला सोना नइ बिसा सकत हावन ते तोर का होही...? नानकुन नौकरी वाला के। तीन झन टूरी तीनो के दाइज-डोल, बर-बिहाव, पढ़ाई-लिखाई जम्मो मा लगही ...। करजा करबे ..? वहु ला छूटे ला परही...?''
काकी के फूफू हा कका ला अब समझावत हे। अब तो फूफू सास कमती अउ मंथरा जादा लागत हाबे। कका सुनत हे।
"देख दामाद बाबू दुलरू ! अभिन एके मा हावव तब बड़की के नोनी बाबू के पढ़ाई -लिखाई के खरचा , समिलहा होवत हाबे। काली बिहाव होही दुनो लइका के। खेत बेचहु तब, ...अउ खेत नइ बेचहु तब करजा कइसे छुटाही ..? बिहाब होवत ले ...करजा करत ले तोर संग मा रही तोर चतरा भाई हा। ताहन बाँटा-खोंटा माँगही। तोला देये ला परही..। ओहा गंगा नहा डारही अउ तेहाँ फदक जाबे।''
"कइसे फूफू..,कइसे फदक जाहू..?''
कका पुछिस  फूफू सांस के गोठ सुनके। अब थोक-थोक समझे लागिस कका हा फूफू सास के गोठ ला।
"भोकवा नही तो ...! जम्मो सकेले रहिबो तेला बड़की के नोनी बाबू मा लगा देबो तब हमर लइका बर का बाँचही ..? अउ तोर भतीजी हा नर्सिंग कॉलेज मा पढ़े बर रुंगरूँगाये हाबे। जानथस कतका पइसा लागही ...? चार बच्छर के कोर्स, दस लाख लागही...दस लाख। सब उही सिरागे तब हमर लइका हा कटोरा धर के भीख माँगही । अप्पड़ रही .., गुन कुछु , बइला झन बन।''
काकी अगियावत रिहिस। अब कका जान डारिस। दूसरा दिन ले कका हा मोर बाबू करा अड़गे बाँटा मांगे बर। आज अउ अब्बड़ रोयेंव मेहां। जम्मो बेरा मोर कका मनावत रिहिस फेर आज....? आज तो ओखरे सेती रोवत हावव।
"कका मोला नर्सिंग कॉलेज मा पढ़ा दे।''
कका मुँहू मुरकेटत रेंग दिस। आज के मंथरा के नजर हमर घर मा परगे रिहिस। भगवान राम ओखर ले नइ बाचीस तब मोर ददा का बाचही।  साधारण मइनखे हा।
        भागवत मा कतका सुघ्घर बताइस महराज जी हा। आज कलजुग मा खुरसी  मा बइठे बर भाई-भाई गला कांट झगरा होथे। अउ  श्री रामजी अउ भरत जी घला झगरा होइस फेर उँखर भाव आने रिहिस।
छोटे भाई ते बइठ ! बड़का भइया ते बइठ गद्दी मा अइसे। जम्मो सुनइया हो ! राम ला जानना हे तब आचरण मा उतारहु। हजारों के भीड़ सकेल के बड़का आयोजन करवाये मा भगवान के आसीस नइ बरसे भलुक चरित्र  बनाये ले आसीस होही...।
 कका ददा अउ जम्मो कोई  प्रसंग मा ताली बजा-बजा के नाचिस,गाइस  भजन सुनिस अउ ..... घर लहुट के बाँटा होइस।
                 गरीब मन बर सरकार के योजना संजीवनी आवय। बैंक ले लोन लेयेंव - शिक्षा लोन अउ नर्सिंग कॉलेज मा पढ़े बर भर्ती होयेंव। सिरतोन अगास मोर रिहिस अउ पांख घला मोर। तब बेटी ला उड़ियाये ले कोन रोकही..? पढ़ डारेंव अउ बनगेव नर्स दीदी।
             सरकारी अस्पताल के वेक्सीनेशन सेक्शन मा ड्यूटी हाबे मोर। अब्बड़ जिम्मेदारी ले ड्यूटी करत हँव। कतको झन ला पढ़े बर प्रोत्साहित करत हँव अउ कतको झन  दीदी मन ला प्राथमिक उपचार करे बर सीखोवत हँव। लइका के जतन टीका के खुराक .. जम्मो ला बताथो।
         ड्यूटी ले घर अमरेंव। गोसाइया आगे रिहिस। मुचकावत मोर स्वागत करिस।
"मोला पचास हजार रुपिया के जरूरत हाबे लता !''
"काबर  ?''
"भतीजी के नर्सिंग कॉलेज मा एडमिशन करवाये  बर पइसा कमती परत हाबे।''
"हांव ''
एटीएम कार्ड ला देयेंव अउ पासवर्ड ला घला बतायेंव।
"मोर गरीबहा कका के लइका मन ला घला पढ़े लिखे मा अब्बड़ दिक्कत होवत हे । उपराहा पइसा निकाल देबे। ओमन नइ मांगे तभो ले काखरो जिनगी सिरजाये बर  पंदोली  देबो ते  अब्बड़ उछाह मनाही। ...अउ नत्ता गुरतुर हो जाही। काखरो बर मंथरा बने मा उछाह नइ हे भलुक शबरी बनके जूठा बोइर के पुरती मया दे देबो ।
"सिरतोन काहत हस लता ! मोला तोर उप्पर गरब हाबे।''
गोसाइया किहिस छाती फुलोवत अउ एटीएम के रस्दा चल दिस। मेंहा अब साँझकुंन के दीया-बाती के तियारी करत हँव, मुचकावत, गमकत ।
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चन्द्रहास साहू द्वारा श्री राजेश चौरसिया
आमातालाब रोड श्रध्दानगर धमतरी
जिला-धमतरी,छत्तीसगढ़
पिन 493773
मो. क्र. 8120578897
Email ID csahu812@gmail.com

बछरू ढिलागे

                महेंद्र बघेल

     बड़े बिहनिया ले चिरई के चींव-चींव अउ पवन पुरवाही के बेरा म कपाट के सखरी ल कोन तो खट-खट बजावत हूॅंत करईस। मॅंय कपाट ल खोलके देखेंव त बहिरी म मितान गोबरधन ह ठाढ़े रहय। कुछु अनहोनी के डर म पूछेव - "सब बने -बने न मितान।" मितान ह सब बने बने कहिस त महू ल बने लगिस। तब मॅंय कहेंव - " सब कुछ चंगा हे त आपके बिहनिया ले इहाॅं पधारे के का राज हे..,धन्य हमर भाग जो आपके चरण कमल के धुर्रा ह हमर परछी के टाईल्स म परिस ,येहा पहिली मरझुरहा दिखत रहिस अब दर्पण कस चमकही।" अतिक म बेलबेलहा मितान ह अपन जवाबी हमला ल मोर उपर भवाॅंके फेकिस -" का करबे मितान रातकुन बछरू ह ढिलागे रहिस तब ले मोर मूड़ी ह पिरावत हे। घर म गोसइन ह मोर बर भड़कतिस ओकर पहिली घर ले टसको-टसको करत हॅंव।"
      बात समझ म आवत गिस कुछ तो गड़बड़ हे।मॅंय मितान ल स-सम्मान कुरसी म सउॅंहत माधो कस बइठारके अपन गोसइन ल चहा-पानी बर इशारा करेंव। तुरते-ताही कप म भाप निकलत गरम-गरम चहा ह मितान के शान म प्रस्तुत होगे फेर चुहकत -चुहकत गाय-बछरू के विषय म तत्कालिक गोष्ठी के बोहनी घलव होगे। जिहाॅं मॅंय अउ मितान बस दूनो, नइ तीसर कोनो। एक तो मितान ह बिन बुलाय अतिथि रहिस फेर मुख्य अतिथि के रोब झाड़त बिना मूड़ी-पूछी के शुरू होगे..,मॅंय कार्यक्रम के अध्यक्ष असन मुटुर-मुटुर देखत ओकर वक्तव्य ल सुनत-सुनत अपन बारी के अगोरा म तुकते रहिगेंव।
           मौका देखके मॅंय बोलेव -  "कस मितान तॅंय अपन गोसइन ल अतिक कार डर्राथस ,बछरूच ह तो ढिलाय हे न , महानदी के मेन गेट ह थोरे ढिलाय हे जेमा सुरक्षित जगा खोजत हस।"
  गोवरधन ह गेनेन-मेनेन करत लटपट म जबान ल खोलिस- " मत पूछ छोटे घर म सबे झन ला गाय के बिना जतन के पीये बर दूध-दही चाही।गोसइन ह कहिथे गोबर-कचरा के कंझट ल टार ,सबला बेच-भाॅंज दे..।फेर इहाॅं फोकट म का कहिबे एकेक गाय के पाछू  पाॅंच-पाॅंच सौ रूपया देय बर तैयार हॅंव फेर कोनो अपन घर लेगे बर राजी नइहें।काम के नाम म..,न बेटा, न बहू,न बाई , आखिर म गोबर-कचरा करे के जिम्मादारी मोर...।अइसने परेशानी के सेती बड़े भैया गोकुल ह सबो गाय ल एती-ओती ढिल दिस। अब महूॅं ह विचार करत हॅंव.., न गाय रही न बछरू ढिलाही...।"
              ये अंदर के बात आय कि मितान के घर जब-जब बछरू ढिलाथे तब-तब हमर घर म बिहने ले गोष्ठी के आयोजन होना तय रहिथे। बछरू ढिलाय के एक अपन अलगे सांस्कृतिक महत्व हे।येकर ले दू परिवार के बीच मुॅंहुॅं-कान धोय के बेरा म दूधरू संवाद घलव स्थापित होथे। हम यहू कहि सकथन कि जब-जब मितान ल फोकट म स्पेशल चहा पीये के मन होथे तब-तब उॅंकर बछरू ढिला जथे। बछरू के गरदेंवा ल खूॅंटा म बाॅंधे के जगा अरझाय के पाछू इही कहानी हे। गरदेंवा ल अरझाव अउ परोसी घर चुहकी लगाव..। येती बछरू के ढिलाय ले गाय ह बड़ खुशी मनाथे काबर इही दिन ओकर चिराग ह अघावत ले गोरस पी पाथे।
            गोष्ठी म क्षेपक ल जोड़त गोबरधन ह अपन बहू के बहुआयामी चरित्र के बखान करत बताइस कि -- "बहू ह गाय-गरू ल पैरा-भूसा खवाय बर नइ जाने, गोबर-कचरा के जैविक महत्व ल एकोकन नइ माने। गोबर के नाम ल सुनतेच नाक-भौंह कोचर जथे, मुॅंहुॅं-कान ओथर जथे। फेर दूध ल मुनुबिलई कस सपासप पीये बर सबले आगू उही ह रहिथे। दूध ल पीयत-पीयत अपन झाॅंपी के जोरन ल निकाल के एके डायलाग मारथे गाय हमारी माता है,गोबर माटी हमको नहीं सुहाता है।"
        गोबरधन के बहू गायत्री ह गाय के सेवा-जतन ल ननपनेच ले थोरको नइ जानिस। बाप-महतारी मन ओकर दिमाग के कोरा भुइयाॅं म सिरिफ डाॅक्टर अउ इंजिनियर बने के सपना बोईन फेर माल-मवेशी के सेवा जतन अउ घरेलू काम -काज के बीजा नइ छीच सकिन।जब मां-बाप मन खुदे अपन बेटा-बेटी ल गाय-गरू के सेवा-जतन बर नइ सिखोहीं त कोई अपने-अपन थोरे सीख जाही। अइसन म बेटा-बहू अउ बेटी मन का पथरा ल ककरो सेवा जतन  कर पहीं.., बस बाते-बात म सिरिफ गोबरे कचरा करहीं.., भला अउ का कर सकहीं..। किसान के घर म बहू-बेटी के अइसन सोच ह समाज म होवइया बदलाव के तरफ इशारा करत हे।
    जेमन किसान नोहे उनकर बारे म हम का कही सकथन। ओ परिवार मन गाय के सेवा-जतन ल तो दूर गाय के बारे म चर्चा वाले पन्ना ल चर-चर ले चीरके फेंक देंथे। अउ ओमन कुकुर पोस के कुकर के प्रति अपन श्रद्धा  भाव ल भूॅंक-भूॅंक के सादर समर्पित करथें।
           गाय के नाम म नाक-कान कोचरइया मन के अपन पहिली पसंद ठेमना बेलाटी कुकर रहिथे।येमन कुकुर ल अपन गोदी म बइठार के चूमत-चाॅंटत ओ माई स्वीट हार्ट..,ओ माई क्यूटी..,ओ माई डियर बेबी कहत- कहत आत्मिक अउ परमात्विक खुशी महसूस करथें।पता नहीं येमन काकर हार्ट के स्वीट सवाद ल कब-कब चींख-चाॅंट डरे रहिथे ते। संग म अपन लइका ल नइ सुताहीं फेर कुकर ल छोड़ नइ सकें। अपन मन पारले, पतंजलि बिस्कुट म मन ल मड़ा लिहीं फेर कुकुर ल ब्रांडेड एनर्जी वाले बिस्कुट खवाहीं।अउ कुकर के गोबर-कचरा ल साफ करत असम्हार खुशी के अनुभो करथें कि धन्य भाग..., जे हमर काया ह लेड़ी बिने के काम अईस।शहर म पढ़े-लिखे मनखे के घर म गाय के जगा कुकुर जरूर मिल जही। कहुॅं कुकुर ह खोंची-खाॅंड़ दूध दे देतिस ते पता नहीं अउ का होतिस।
         पढ़ई-लिखई म थोरको डिस्टर्ब झन होय इही सोचके मां-बाप मन लइका मन ल गोसेवा करे बर नइ तियारें।उही माॅं-बाप मन जब सास -ससुर बन जाथे तब अपन बहू ले गोबर-कचरा करे के आशा रखथें। जब अपन बेटी ल नइ सिखा सकेन तब बहू (दूसर के बेटी) ले का आशा..।
     एती बहू रानी के सेती गोबरधन ल खुदे टिमारी करना पड़थे।ओ मने-मन म गदकत रहिथे कि चलो बछरू ढिलइस ते बने होइस, आज दूध-दूहे के कंझट ले छुटकारा तो मिलिस संग म पड़ोसी ल गुड मार्निंग करे के गरम-गरम मौका तो घलव मिलगे। कुल मिलाके आज गोबरधन बर बछरू के ढिलाना शुभ हे।
           खेत जोते बर ट्रैक्टर लुवे बर हार्वेस्टर ये मशीन मन के नाम लेके पैरा भूसा के हाल-बेहाल हे। किसान भाई मन पैरा म आगी ढील देथें, चारो मुड़ा धुॅंगियामय हो जथे तब अइसे लगथे जनो-मनो मछिंदर भाई मन ॲंटवा वाले आइटम ल खो-खो के भूॅंजी म कन्वर्ट करत हें। गांव होय चाहे शहर गली-खोर, सड़क-धरसा, पाई-परिया, भर्री-भाठा जइसे सार्वजनिक जगा मनके हालत पतली हे। जेकर जइसे मरजी, उही उठावत कुरिया-परछी। बरदी बर चरागन नइहे, जम्मो चरागन ल हुसियार अउ टोपी वाले नंबरदार मन चर डरिन। लमा-लमा के खइरखाडाॅंड़ (दईहान) म कोठार बनगे, बड़े-बड़े बिल्डिंग तनगे।गाय बर न बैठे के जगा न चरे के.., तब लगथे अब बहुते जल्दी बरदिहा मन लुप्त प्राणी के नाम ले जाने जाहीं। बाढ़त मॅंहगाई ल भला ते कम कर डारबे फेर बरदी चराय बर चरवाहा खोजई के बूता म तोर खून अउॅंट जही।
          आपरेशन व्हाइट रिवोल्यूशन के नारा ह खुद भूखमरी के शिकार होके चारा माॅंगत हे,श्वेत क्रांति ह दिनोदिन पटपटावत अश्वेत होवत हे। हालत इहाॅं तक पहुंच गेहे कि किसान मन अपन घरके गाय-गरू ल सुनसान जगा नइते बीच जंगल म बरोय (छोड़े ) के एकतरफा अभियान चलावत हें। किसान भाई मन के ब्लड म गाय-गरू पोसे के इच्छा खतम होगे हे त का डेयरी फारम के भरोसा म आपरेशन फ्लड ह सफल हो जही।
        सरकार ह जनता बर झउॅंहा म गोबर बीनत अउ गंजी म सू-सू झोंकत नवा-नवा योजना बनाके लावत हे..। जनता मन के रूझान के सेती गाॅंव-गाॅंव ह.. झोंकत, बीनत अउ नोट गीनत गोबरमय हे। कोठा म गाय के कीमत दूध दूहत ले,गोबर बीनत ले अउ सू-सू के झोंकत ले हवय। दूहानू गाय बर दाना-भूसा के वेवस्था दूहात ले.., फेर परम आदरणीय गोसान मन गाय ल नगर भ्रमण बर भेज देथें।तेकरे सेती माडर्न गाय-गरू के दिनचर्या म ये हाइटेक अउ विकास के हवा ह भारी उलटफेर करके रख देहे। ताजा उदाहरण के रूप म देखब म आथे कि  जम्मो गाय समाज ह बात-बात म धरना प्रदर्शन बर सड़क म रोम देथें।अउ रातकुन सड़क के बीचोंबीच बैठके भावी योजना के खाका खींचथें कि बजरहा झोला म हमला कइसे हमला (आक्रमण) करना हे, डिग्गी म थोथना ल कैसे खुसेरना हे।
          रद्दा रेंगइय्या मन कतको हार्न बजावत रहॅंय येमन टस ले मस नइ होंय भलुक बरन चढ़ाके कननखी देखत गारी देवत हे तइसे नजर आथें। इनकर समाज के बाउन्सर (गोल्लर) मन के बाते निराला हे रातभर खेतखार के बेंदराबिनास करहीं अउ बिहने ले बीच सड़क म कोलगेट कइसे घींसे जाथे ओकर प्रभाती प्रदर्शन करथे। अइसे भी येकर भूॅंकरई ले जनता मन कम परेशान नइ रहॅंय। गाय समाज डहर ले बीच सड़क म घेक्खरपना अउ धान-पान के चरई ल देखके अइसे लगथे जनो-मनो आजादी के अतना दिन बाद गौठान बने के खुशी म येमन स्वतंत्रता दिवस मनावत हें।
            अउ एती गौठान योजना ह गाय के सराय कम, पंच- सरपंच अउ सचिव के सेल्फी जोन ज्यादा लगथे ओ तो शुक्रगुजार हे बिहान वाले दीदी मन के जेन जैविक खाद बनाके थोरिक इज्जत के फालूदा बने ले बचावत हे।
              कभू-कभू सू-सू गोबर बेचइय्या मन चलाकी के चक्कर म गोबर म पानी मिलाके वजन बढाय बर सोच डरथें। त का तउलईया के दिमाग म थोरे गोबर भराय हे..., तोर चतुराई ल नी समझही..। तब चतुरामन के जवाब.., गाय ह पोंकही त हम का करबो,गाय जइसन करे हे तइसन ल लाय हन..।
         सू-सू मंडी के मनिज्जर मन के सूॅंघे के शक्ति ह बेलाटी कुकर ले घलव तेज रहिथे।वो मन सूॅंघ के बता देथें कते ह गाय के ओरिजिनल सू-सू आय..,तभे तो आज तक कोनो हितग्राही मन ओरिजिनल सू-सू म बैला के सू-सू ल मिलाय के हिम्मत नइ कर पाइन।
          अब तो जेन ल गोधन ले एलर्जी हे उही गोबरधन बनगे..,हमर देश म गोबरधन के कोई कमी हे का..।मॅंय चौकीदार..,मोर घर ह -तोर घर..जइसे नारा ले प्रेरित होके देश म एके नारा चलत हे महूॅं गोबरधन..। तेकरे सेती गरवा समाज के पदाधिकारी मन सड़क म आके बैठ गेहें। जनों मनो उनकर सियान गरवादेव ह उनला हूमेलासन अउ भड़कासन सीखोवत हें। अउ अवइय्या- जवइय्या मन के हाथ-गोड़ ल टोरके नवा ईबारत लिखत हें।
 इहाॅं ले उहाॅं सुबे ले साॅंझ तक जे डहर देखबे उही डहर सड़क ह अघोषित गौठान बनके रहि गेहे।तब लगथे ये सरकारी गौठान ह भूत बंगला तो नइ बन जही। कुलमिलाके जब कोठा म गायेच नइ रही तब बछरू ह कहाॅं ले ढिला जही...।

महेंद्र बघेल डोंगरगांव

मंगलवार, 30 अगस्त 2022

नवकरी वाली बहू

 प्रिया देवांगन "प्रियू"

 

       बिहनिया उठते साठ चमेली ल कोन जनी आज का होगे रिहिस। राहुल ल किहिस - "बेटा अब तो तोर सरकारी नौकरी लग गेहे; त मंँय सोचत हँव की तोर बर नवकरी वाली बहू ल लाबो।" राहुल अपन महतारी चमेली ल देखते रहिगे; थोरिक रुक के कथै-  "माँ...! आज तोला काय होगे हे ओ, बिहनियच ले नौकरी वाली बहू लाय के गोठ गोठियावत हस। का काहत हस, जानत घलो हस कि बस मुँहू म आये ऊपरे-ऊपर ल गोठियावत हस।  बबा ह जान डारही ही ते बड़ा अलकरहा हो जाही। चमेली कहिथे- "वो मोर ससुर आय, मँय उनला मना लेहूँ। तँय येकर फिकर झन कर।"
        घर म सास-ससुर रमोतिन-तिजऊ घलो जियत रिहिन। ओखर घर म चमेली के आदमी, सास-ससुर, दू झन बेटा अउ एक झन बहू नेहा रिहिन। अब नान्हे बेटा राहुल के बिहाव करई बाँचे रिहिस। चमेली अपन अंतस के बात ल जम्मो करा राखिस त सब्बोझन चमेली ल खिसियाये असन करिस। राहुल के बाबूजी प्रेमलाल कहिथे- "तोर दिमाग तो सही हे चमेली; काय गोठियात हस, जानत हस ना ? हम सब सक्छम हन । घर म कुछू जिनिस के कमी नइ हे, अउ आजकल के नवकरी वाली टूरी मन के पावर जादा रहिथे।" अपन सियनहिन रमोतिन कोती देखत तिजऊ कहिथे-  "समझा तो ओ.... बने अपन बहू चमेली ल। ओखर मति ल काय हर लेहे।"
       "बने तो काहत हे चमेली तोर ससुर ह ओ... हमर घर के नियम-धियम ल देख के नवकरी वाली बहू रह पाही कि नहीं। तोर ससुर ला तो जानथस न ?" रमोतिन समझाइस।
       "पर काय कहिबे,"नारी ले दुनिया हारी"। चमेली जिद्द पकड़ ले रिहिस कि मोर राहुल बर नवकरी वाली बहू लानहू कहिके।
ले दे के सब झन चमेली के बात ला मान के राहुल बर नवकरी वाली लड़की खोजई सुरु होइस। गाँव के ही एकझन रिस्तेदार ले स्वीटी के बारे मा पता चलिस। आखिर म पढ़े-लिखे स्वीटी ह महासमुंद ले किरवई म बहू बन के ससुरार आइस। नवकरी म घलो रिहिस। एकठिन सरकारी आफिस म क्लर्क रिहिस। तिजऊ के नातीबहू ह नवकरी म हे कहिके किरवई गाँव म सोर होगे। सब झन खुस रिहिन। समय के चक्का ढुलत रिहिस।
        एक दिन राहुल ह अपन कुरिया म खुसुर-फुसुर करत स्वीटी ल किहिस कि हमर घर म सबझन नियम-धियम वाले आँय। छोटे होय या बड़े सब के आदर करे बर परथे स्वीटी; अउ हाँ, सियनहा बबा, बूढीदाई, माँ-बाबूजी अउ बड़े भैया के आगू म तोला हमेसा मुँड़ ढाँके ला परही। 
      "ओह...हो... राहुल, मेरे को यहाँ आये एक ही दिन हुआ है, और तुने इतना सारा भाषण सुना डाला।" मुँहू मुरकेटत अँटियाये-अस किहिस।
      "ये भाषण-वाषण नोहे। घर के नियम ला बतावत हँव।"
     "अरे यार अब तुम तो कम से कम हिंदी से बात किया करो। घर के लोग तो देहाती हैं ही। इतना छत्तीसगढ़ी बोलते हैं; बाप रे !!! मुझे तो समझ ही नहीं आता"। 
             "हमर घर म अपन पति के नाँव लेवई, मतलब ओखर अपमान करई होथे। घर वाले के सामने मोर नाँव झन लेय कर...अँईं ?" 
       "ठीक है बाबा ! कोशिश करूँगी।" स्वीटी अपन तरुवा ल धरत कथै।
        महीना भर के गेय ले एक दिन बिहनिया बेरा स्वीटी ह नल म पानी भरत रिहिस त ओखर कुराससुर पारस हर स्वीटी ला देख के खोरोर-खोरोर खाँसे लागिस। तइहा जमाना के नियय-धियम ल आजकल के बहू-बेटी मन काय पखरा ले जानही। कुराससुर  मन ह बहू के आगू म जाये त खोरोर-खोरोर खाँसैं। खाँसी नइ आये तभो ले, जानो-मानो टीबी बीमारी होगे हे तइसे ठुरुर-ठारर करथैंच।
        पानी भरत स्वीटी ह मुँड़ नइ ढाँके राहै। स्वीटी समझ नइ पाइस, अउ सोचिस कि खाँसी आवत होही उनला। बने ढंग ले वो समझ नइ पाइस; अउ वो अपने म मस्त रिहिस। वतकी बेरा स्वीटी के बूढ़ीसास रमोतिन देख परिस। ताहन फेर काय पुछै.... "मूसर ल बाहना मिलगे"। तानिया-तनिया के रमोतिन चिल्लाये लागिस- "ये...ओ.... सीटी .... ! ये ओ.... सीटी! अई मुँड़ी ल तो ढांँक ले ओ। कुराससुर हर ठाढ़े हे। थोरिकिन तो कदर कर ओ...!"
        रमोतिन के गोठ ला सुनके स्वीटी के एँड़ी के रीस तरुवा म चढ़गे- "दादी मेरा नाम स्वीटी है स्वीटी। सीटी नहीं।" सुन के जम्मो झन हाँस डारिन।
रमोतिन कहिथे- "टार दई...! कइसे-कइसे नाँव राखथे आजकल के दाई-ददा मन घलो।"
"नाम लेने नहीं आता तो मत लिया करो।" कुछ भी बोलती रहती हो।" कुरबुरावत गुंडीभर मुँड़ म पानी बोहे स्वीटी घर कोती गिस।
        नहाखोर के खाइस-पियीस। जल्दी तइयार हो के ऑफिस निकलिस। ऑफिस म दिनभर ओकर मन अच्छा नइ लागत राहै। राहुल के बेवहार अउ रमोतिन के गोठ रही-रही सुरता आवत राहै। संझा बेरा पाँच बजे घर मा आइस। आते साठ मुँह-कान ल धोके खुरसी म हाथ-गोड़ लमा के बइठगे। तिजऊ अउ रमोतिन दूनों देखते रहिगें। देखत भर ले तिजऊ देखिस। नइ सही गिस। जोर से चिल्लाइस- "ये काय तरीका ये ओ.... हम सियान मन के आगू म अइसने बइठबे। कुछू लिहाज हे कि नहीं घर मा ?" सियनहा तिजऊ गोठ सुनके स्वीटी अकबकागे। कलेचुप अपन कुरिया म चल दिस।
         जइसे ही राहुल घर आइस। वोला संझा-बिहनिया के बात ल बताइस- "मैं थक जाती हूँ। यहाँ कितना नियम मानती रहूँगी और कितना काम करती रहूँगी। मेरे से नहीं हो पाता।"
"ठीक है; देखता हूँ।" राहुल बिचारा जादा नइ बोल पाइस। वइसे राहुल घलो स्वीटी ल कुछू बोले के पहिली पन्द्रा घाँव सोंचै। महतारी चमेली हर तो स्वीटी ल मुँड़ी म चढ़ाके राखबे करे रिहिस। थोरिक बेर के गेय ले स्वीटी अपन जेठानी नेहा ल कहिथे- "दीदी ! आज मैं खाना नहीं बना पाऊँगी। बहुत थक गयी हूँ। नेहा ह स्वीटी ल गुर्री-गुर्री देखत  हव.... किहिस की वो मेर ले चल दिस, काबर कि वो जानत रिहिस कि नवकरी वाली आय ये बाईजी ह, येखर रुतबा भारी हे। कुछू कही देहूँ त झगरा हे।" दिनोंदिन ओखर मनमानी बढ़त रिहिस। घर के सियान मन तंग आगे रिहिन स्वीटी के नखरा ले। 
        आज बोरसी के बजार राहै। चमेली ल ओखर परोसिन चम्पा किहिस- "कस ओ  चमेली दीदी काय करत हस ? आज तइयार नइ होय हस दीदी बजार जाये बर। चमेली कहिथे-  "बहू स्वीटी आही न ओ चम्पा बहिनी , ताहन ओखरे संग इस्कूटी म जाहूँ। अब रेंगे ला नइ भाय बहिनी।  काय करबे जांगर दिनोंदिन थकत हे।" रमोतिन के गोठ ल सुनके चम्पा ल हाँसी आगे-"बने हे दीदी तोर बहू ह। तभे तो हमर पारा-परोस म सबझन काहत रिहिन कि बने हे या... चमेली के बहू हा।"
       स्वीटी ऑफिस ले आइस त चमेली कहिथे- "चल ओ.... स्वीटी बजार जाबो। साग-पान नइ हे घर म। तुहीं ल अगोरत रेहेंव इस्कूटी म लेगही कहिके।" स्वीटी फट ले जवाब दिस -  "नहीं मम्मी जी ! मैं नहीं जाऊँगी बहुत थक गई हूँ।" तभे राहुल ह स्वीटी के गोठ सुन   हाँसत कहिथे- "झन जा माँ येखर संग ओ। गिरा दिही।"
        आखिर म स्वीटी अउ चमेली बजार चल दिन। बजार म चमेली मटक-मटक के रेंगत राहय। छाँट-छाँट के साग-पान लेवन लागय स्वीटी संग घूम-घूम के। तभे कहिथे कि टार दइ.....ई  अब्बड़ चिखला हे।" बजार ले लहुँटत खानी बादर घुमड़गे। देखते-देखत पानी बरसन लग गे। हुरहा इस्कूटी सिलिप खाके गिरगे। चमेली बनेच फेंकागे। जम्मो माइलोगिन मन हाँसे लगिन। स्वीटी कहिथे- "बैठने नहीं आता है तो शौक क्यों करती हो इस्कूटी बैठने का माँ जी।" अब कइसनो करके घर आइन।
        घर आय ले सबझन ल इस्कूटी ले गिरे के बात चलिस। राहुल हाँसन लागिस- बोले रेहेंव ना स्वीटी गिरा दिही कहिके। अउ सऊँख करबे माँ इस्कूटी म बइठे के।" अँचरा म आँसू पोछत-पोछत चमेली एकठिन कुरिया म निंगिस।
        एक दिन चमेली के काय जिनिस के बारे म गोठियावत हुरहा ओखर मुँह ले बुलक परिस- "स्वीटी कुछू काम नइ करय। सब ला बड़े बहू हर करथे।" ये गोठ स्वीटी के कान म परिस; त बनेच झर्रा दिस स्वीटी अपन सास ला।"
चमेली रोवत-रोवत घर के मुहाटी म चल दिस। चम्पा कहिथे, का होगे ओ चमेली काबर रोवत हस दीदी। का होगे ओ....। सब हाल ल चंपा ला बताये लागिस- "का करबे बहिनी, नवकरी वाली बहू लाने हन, बने दुनोझन कमाहीं ता सुख म रहिबों कर के। मरे बिहान होगे ओ। अब तो अपने गोड़ म घाव करेंव, तइसे लागथे। बोल देबे ता लइका ऊपर गुस्सा ला उतारथे। दम-दम मार देथे।" चंपा कहिथे- "का करबे वो दीदी, लोग-लइका के घर मा अइसने ताय, बोल देबे ता झगरा। सब ला सुनके रहा त बने हे चमेली दीदी। अब अलकरहा समै आगे हे ओ।" ओखर कारन हमन डोकरी-डोकरा कुछू नइ बोलन। मुंँहू बाँध के रथन कलेचुप। खाय ल देथे ता खा लेथन ओ दीदी; नहीं ते अपन मन हेर के घलो खा लेथन। कमाये ला जाथन कर के ताव देखाथे। हमन दूनों डोकरी-डोकरा चुप्पे मुँह लुकाये बइठे रहिथन।" चमेली मुँड़ी डोलावत कहिथे- "हव बहिनी हव। आजकल के बहू मन बात ल नइ मानय। सास-ससुर ला खाय ला दे बर छोड़, अपने पेट ला पहिली भरथे। हमर ससुर मोला टेचरी मारत अब्बड़ खिसियाथे बहिनी, अउ लानबे ओ चमेली नवकरी वाली बहू। काय करबे चुपचाप सुन लेथन ओ चम्पा; लाने ते हन।"
         चंपा अउ चमेली दूनों झन दुख-सुख ला गोठियावत राहैं। दस-पंदरा दिन के गेय ले एक दिन तो बनेच झगरा मात गे चमेली अउ स्वीटी मा। स्वीटी आज सुना दिस अपन सास-ससुर ला कि आज के बाद मैं इस घर में नहीं रहूंँगी। जब देखो नियम; ये करो वो करो। सर पर पल्लू नहीं रहेगा तो बोलेंगे। बैठ जाओगे तो बोलेंगे। खाना जल्दी खाओगे तो बोलेंगे। घर के बड़ों के सामने तो बैठना ही मना है। तंग आ गयी हूँ मैं इस घर के सारे नियमों से। स्वीटी अउ राहुल दूनोझन अपन लइका ल धर के घर ले निकलगे। सब के सब देखत रहिगें। सास-ससुर के आँखी ले तर-तर तर-तर आँसू बोहाय ला धर लिस। चमेली ह तरुवा ल धर के बइठगे। अपन-अपन घर के मुँहाटी म बइठे परोसिन मन दाँत गिजोरत काहन लागैं- "चमेली बाई के नवकरी वाली बहू लाय के सोसी बुझागे। ही...ही...ही...।"


राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़