एक दिन धृतराष्ट्र अपन चुकचुकहा आँखी ल चपकत-लिबलिबावत कहिथे - ‘देख तो रे संजय ! मोर आँखी के पुतरी दुर्योधनमन का करत हे ?’
संजय टी.बी. के बटन ल दबावत कहिस - ‘आज कइसे उदुपहा राजमहल के सुरता आ गे कका ?’
‘का करबे रे ! चिखला म गदफदाए मनखे पानी ल नइ सोरियाही त अउ काला सोरियाही ?’
संजय मने मन गुनथे - ‘एक गोड़ हँ कबर म ओरमे हे। तभो खुरसी के पाया म दम अरझेच्च् हे।’
टी.बी. के समाचार चैनल म समाचार चले लगिस।
संजय बतावथे - ‘महराज ! जब ले दुर्योधन ल युवराज बनाए हस, तब ले देस के जनता त्राहि-त्राहि हो गे हे। तोर टूरामन सत्ती उप्पर बजनिया खेलत हे। उन ल गुण्डागर्दी, दलाली, जुआ-चित्ती अऊ मंद-मऊहा के छोड़ कुछु दिखबे-सूझबे नइ करत हे।
संजय के करू-करू गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के रूवाँ-रूवाँ ठढ़िया गे। भोभला मुँह के बाचे-खुचे दाँत ल हुँड़का कस किटकिटावत पूछथे - ‘का कहिथस संजय ? तोला बाय-बयरासू तो नइ धर ले हे। मोरे आघू म मोरे बेटामन के माँस बेचत हस।’
संजय हँ गाँधीछाप खादी के विनम्रता ल ओढ़के कहिथे - ‘गलत काहत होहूँ त पाँच पनही मार लौ महराज ! फेर अइसन चुगल-जुगलखोरी के लाँछन झन लगावव। येमा मोर का गलती हे ? जेन हे तेला बतावत हौं।’
बोले बर मुँहू तो नइ उलय-खुलय। फेर तोर लइकन के करनी हँ मुँह ल खोलवावथे। उन तो ठाड़ आगी म मूतत हे। अपन मुँह ल अतेक करिया कर डारे हे कि नीत-अनीत नइ चिन्हत-देखत हे। येमा तुँहरो कोनो दोस नइ हे महराज ! गँहू के रोटी टेड़गा राहय के कुबरा राहय, मीठे लगथे। तइसे अपन लइका चोरहा-ढोरहा रहय के अलाल-दलाल रहय नीके लगथे।
तभो ले अपन लइका ल सरू झन काहय। पीतल के लोटा ल चरू झन काहय। अइसन म अपन पेंदी खियाए के डर जादा रहिथे। इत-उत उलण्ड-घोलण्डके मान-मरजाद म बाधा-ब्याधा परथे, तेन हँ अलग।
तैं तो जानत रेहेस के दुर्योधन हँ मोर चिरई के एक गोड़ वाले लइका हरे कहिके। तभो आँखी म देखके माँछी ल खाए हस। नानपन के तोर सबके सब लइका मूत म दीया बरइया आय। तभो तैं जानबूझ के मुड़़ म पनही पहिरे हस। वोमन ल पंदोली देके रूख म चढ़ाए हस।
संजय के अतेक मुँह म थूँकई ल देख-सुनके धृतराष्ट्र के मुँह सिला गे। आँखी के कोन्टा-कोन्टा म छबड़ाए चिपरा ल अपन पिताम्बर म पोंछत कहिथे - ‘अभी कोन मेर हे ? का करत हे ?’
संजय टी.बी. के आवाज ल थोरिक अऊ बढ़ा दिस। आगू बतावत हे।
दुर्योधन हँ युवराज बनते साथ चउँक-चउँक म दारू भट्ठी खोल दे हे। अइसे कोनो चउँक नइ होही जिहाँ भट्ठी नइ होही। जिहाँ भट्ठी नइ हे, त समझ ले कि रिकार्ड के अनुसार वोहँ चउँक नोहय, समसान घाट हरे।
पांडो मन ल दारू पीया-पीयाके जुआ खेलावत हे, उचकावत हे। युधिष्ठिर हँ एक के बाद एक जम्मो दाँव ल हारत जात हे। जम्मो दाँव ल दुर्योधन हँ बइमानी ले खेलत हे। मुँह म भाँचा मन म खाँचावाले कपटी ममा सकुनी हँ ओला पंदोली देवत हे।
ममा-भाँचा मिलके अतेक माछी के पीत निकालत हे कि युधिष्ठिर के जम्मो राजपाट ल जीते के पाछू एकक करके पांडो मन ल घला दाँव म लगवा डरिस।
राजदरबार म माछी तको बइठे ल छोड़ दिस महराज ! उहाँ कोनो मरे रोवइया नइ हे। वोदे एक झन दुरपति बाचे रिहिसे। उहू दाँव म लग गे। पासा पर गे। ले अब ! दुरपति घलो दुर्योधन के दासी हो गे।
धृतराष्ट्र पूछिस - ‘संजय ! त का राजसभा म पितामह, द्रोनाचार्य, कृपाचार्य येमन कोनो नइ हे ?’
‘हावय महराज ! फेर वोमन तो मरे म मेंछा भर उपकारत हे। इन्कर राज-पाट आए के बाद उन मर-मरके जीयत हे। ये टूरामन तो जेने अँगरी ल धराके रेंगे बर सिखोए हे उन्करे लंगोट ल धर-धरके तीरत हे। उल्टा उही मन ल आँखी देखावत हे।
सावन के अँधरा ल हरियरे-हरियर दिखथे कहिथे । कोन जनी जनम के अंधरा मन ल काए दिखत होही ते ?
दुर्याधन हँ राजमहल के बरेण्डी म भुर्री बारके तापत हे। बाचे-खूचे कौरवमन चारो खूँट घूम-घूमके छीनत-झपटत बेंदरा बिनास करत हे। जिहाँ खुद राजा के मति छरिया जथे उहाँ मन कइच्चा, केंवची अउ केचहा हो जथे। अइसन राजपाट ले सबके मन उठ जथे। काँही उदीम कर लेवय। कोनो बेरा ककरो मन नइ गेदरावय।
समाचार सरलग चलते हे। दुरपति ल दुसासन हँ जबरन बोहिके सभा म ले लाने हे। सभा के हॉल हँ मुँड़ धरऊल हो गे हे। बिचारी दुखिया हँ कोनो ल मुँहू देखाए के लइक नइ रहि गे हे। ओकर दसा हँ मुड़भर के हो गे हे। वोदे अब परलोखियामन एकक करके वोकर पहिरन-ओढ़न ल घलो तीरत हावय। वोहँ मुड़ी ल गड़ियाए कल्हर-कल्हर के रोवत हे।
अतका गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के आँखी हँ अजब-गजब किसम ले लिबलिबाए लगिस, चमके लगिस। हाथ-गोड़ फरके लगिस। कोन जनी वोकर मन म कोन रस के संचारी भाव संचरे लगिस ते ? अंतस के झरत-पझरत चुहत -चुचुवावत रसा तो भीतरे-भीतर सपेटा गे फेर ओकर मुँह के कोर-कोर म ‘चपचप-ले’ पचपचावत गाजा हँ गजगजाए लगिस।
संजय समझे नइ सकिस।
संजय आगू बताथे के एती दुरपति के चीरहरन होवथे। मीडिया वालेमन कोन्टिया -कोन्टियाके पोण्डा देख-देखके फोटू खींचत हे। वीडियो बनावत हे।
धृतराष्ट्र बड़ अचंभो म पर गे। मुँह ल बीता भर फारके पूछथे - ‘वोमन फोटू काबर खींचत हे ?’
संजय कहिथे - ‘कोन जनी महराज। जेन देस-राज के मीडिया हँ चड्डी भर पहिरे सनी लियोन, पूनम पांडे सहीन चिपरी-चिपरी टूरी ल रातो-रात स्टारडम बना सकत हे। उन्कर ये फोटू उतारे के पीछू घलो कोनो न कोनो जबर कारन जरूर होही। ये मीडिया के सोनजुग हरे महराज ! माने हमर परजातं़त्र हँ स्वतंत्र अउ मजबूत हो गे हे। येमा कोनो दू मत के बात नइ हे।
धृतराष्ट्र मुड़ी ल पटकत कहिथे - ‘वो सभा म कोनो नर-नियाव हे, कि नहीं ?’
संजय कहिथे - ‘का नर-नियाव ल कहिबे। जिन्कर मुँह म नाक नइ होवय तिन्कर बर नारी अउ मरी दूनो बरोबर होथे महराज ! अउ कानून तो तुँहरे बनाए ये। उहू महारानी कस आँखी म टोपा बाँधे राजधरम निभावत हे।’
गँहू के रोटी ल जेती ले टोरबे तेती मुँह बन जथे। तइसे कानून ल जेती ले मोड़-तोड़, मुड़का-घुमा, लहुटा-पहुटाके देख ले। ओला तो सबूत चाही। साबूत सबूत ले ताबूत के मुरदा घलो उठके दऊड़े लगथे। कागज के भरोसा कोनो कोती रेंगा ले। गलत करे हस तभो वोला प्रमान चाही। सही करे हस तभो प्रमान चाही। कागज म जऊन लिखाए हे उहीच् ल तो असल प्रमान माने जाथे।
अब तो अपराधी अतका हुसियार हो गे हे कि करिया हाथी ल मारके घला हत्या आय के नोहय ओतके बर कानून ल दस साल घुमा देथे। अइसन कानून के का भरोसा करबे ? उहू खादी छाप कपड़ा अउ गाँधी छाप नोट के इसारा ल समझे-माने-चले लगे हे।
संजय के बात ल सुनके जनम के इरखाहा, अनदेखना अउ अटेलिहा धृतराष्ट्र के लहू अउँटे लगिस। मन तो हो गे रिहिसे कि संजय ल नक्सल प्रचार अउ आतंकी सहयोगी बता देववँ। जेल म ठुँसुवा-ठोंकवाके खेले खतम कर देववँ। गज्जब टाँय-टाँय करत हे।
उदुपहा फेर सोचथे - ‘अरे मैं मरवई देहूँ त जुवाब तो मुहीच् ल दे बर पर जही। तेकर ले मुखबीरी के बहाना नक्सलाइडे मन से धुँकुवा देथवँ। साँपो मर जही लाठियो नइ टूटही। हूँ उँ उँ......।’
फेर बूढ़त खानी अउ सिंघासन ले रिटायर होए के बाद कुछू तो मनोरंजन के साधन होना चाही। ये संजय रूपी टीबी ल फोर-फार देहूँ त मोर दिनो हँ तो नइ कटही। ये सब बात ल सोचके धृतराष्ट्र कट्ट-खाए चुप आँखी ल लिबलिबाके रहि गे।
पद जाए के बाद मनखे के काम आँखी लिबलिबाना अउ जीभ लपलपाना भर तो रहि जथे। अउ कोनो काम-बूता बर तो सक नइ चल सकय।
संजय ओकर अंतस के उमड़त-घुमड़त धुँध-धुँगिया ल अपन सीसी टीबी के कैमरा ले देख डरिस।
धमकावत कहिस - ‘ये मौन-मुक्का, भकुवाए अउ मनमोहना मुड़ी ल टेटका कस हलाना-डोलाना छोड़ दे कका ! तोर मन म का चलत हे ? सबके लेखा-जोखा मोला मिल गे हे। अभी स्टिंग आपरेसन चलाके तोर धनिया बो देहूँ। अतेक दिन ले पद म रहिके घाम म तपस्या भर नइ करे हौं।’
पद के प्रति निस्ठा, प्रतिस्ठा अउ गरिमा उही म होथे जब कद बढ़ाके गदफद गदर मचाए जाय। अउ अइसन करइया ही असल अधिकारी होथे।
धृतराष्ट्र सकपका गे। माने मीडिया के मार म महराजो मूतथे।
नंगा ले खुदा डरे।
संजय टी.बी. के बटन ल दबावत कहिस - ‘आज कइसे उदुपहा राजमहल के सुरता आ गे कका ?’
‘का करबे रे ! चिखला म गदफदाए मनखे पानी ल नइ सोरियाही त अउ काला सोरियाही ?’
संजय मने मन गुनथे - ‘एक गोड़ हँ कबर म ओरमे हे। तभो खुरसी के पाया म दम अरझेच्च् हे।’
टी.बी. के समाचार चैनल म समाचार चले लगिस।
संजय बतावथे - ‘महराज ! जब ले दुर्योधन ल युवराज बनाए हस, तब ले देस के जनता त्राहि-त्राहि हो गे हे। तोर टूरामन सत्ती उप्पर बजनिया खेलत हे। उन ल गुण्डागर्दी, दलाली, जुआ-चित्ती अऊ मंद-मऊहा के छोड़ कुछु दिखबे-सूझबे नइ करत हे।
संजय के करू-करू गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के रूवाँ-रूवाँ ठढ़िया गे। भोभला मुँह के बाचे-खुचे दाँत ल हुँड़का कस किटकिटावत पूछथे - ‘का कहिथस संजय ? तोला बाय-बयरासू तो नइ धर ले हे। मोरे आघू म मोरे बेटामन के माँस बेचत हस।’
संजय हँ गाँधीछाप खादी के विनम्रता ल ओढ़के कहिथे - ‘गलत काहत होहूँ त पाँच पनही मार लौ महराज ! फेर अइसन चुगल-जुगलखोरी के लाँछन झन लगावव। येमा मोर का गलती हे ? जेन हे तेला बतावत हौं।’
बोले बर मुँहू तो नइ उलय-खुलय। फेर तोर लइकन के करनी हँ मुँह ल खोलवावथे। उन तो ठाड़ आगी म मूतत हे। अपन मुँह ल अतेक करिया कर डारे हे कि नीत-अनीत नइ चिन्हत-देखत हे। येमा तुँहरो कोनो दोस नइ हे महराज ! गँहू के रोटी टेड़गा राहय के कुबरा राहय, मीठे लगथे। तइसे अपन लइका चोरहा-ढोरहा रहय के अलाल-दलाल रहय नीके लगथे।
तभो ले अपन लइका ल सरू झन काहय। पीतल के लोटा ल चरू झन काहय। अइसन म अपन पेंदी खियाए के डर जादा रहिथे। इत-उत उलण्ड-घोलण्डके मान-मरजाद म बाधा-ब्याधा परथे, तेन हँ अलग।
तैं तो जानत रेहेस के दुर्योधन हँ मोर चिरई के एक गोड़ वाले लइका हरे कहिके। तभो आँखी म देखके माँछी ल खाए हस। नानपन के तोर सबके सब लइका मूत म दीया बरइया आय। तभो तैं जानबूझ के मुड़़ म पनही पहिरे हस। वोमन ल पंदोली देके रूख म चढ़ाए हस।
संजय के अतेक मुँह म थूँकई ल देख-सुनके धृतराष्ट्र के मुँह सिला गे। आँखी के कोन्टा-कोन्टा म छबड़ाए चिपरा ल अपन पिताम्बर म पोंछत कहिथे - ‘अभी कोन मेर हे ? का करत हे ?’
संजय टी.बी. के आवाज ल थोरिक अऊ बढ़ा दिस। आगू बतावत हे।
दुर्योधन हँ युवराज बनते साथ चउँक-चउँक म दारू भट्ठी खोल दे हे। अइसे कोनो चउँक नइ होही जिहाँ भट्ठी नइ होही। जिहाँ भट्ठी नइ हे, त समझ ले कि रिकार्ड के अनुसार वोहँ चउँक नोहय, समसान घाट हरे।
पांडो मन ल दारू पीया-पीयाके जुआ खेलावत हे, उचकावत हे। युधिष्ठिर हँ एक के बाद एक जम्मो दाँव ल हारत जात हे। जम्मो दाँव ल दुर्योधन हँ बइमानी ले खेलत हे। मुँह म भाँचा मन म खाँचावाले कपटी ममा सकुनी हँ ओला पंदोली देवत हे।
ममा-भाँचा मिलके अतेक माछी के पीत निकालत हे कि युधिष्ठिर के जम्मो राजपाट ल जीते के पाछू एकक करके पांडो मन ल घला दाँव म लगवा डरिस।
राजदरबार म माछी तको बइठे ल छोड़ दिस महराज ! उहाँ कोनो मरे रोवइया नइ हे। वोदे एक झन दुरपति बाचे रिहिसे। उहू दाँव म लग गे। पासा पर गे। ले अब ! दुरपति घलो दुर्योधन के दासी हो गे।
धृतराष्ट्र पूछिस - ‘संजय ! त का राजसभा म पितामह, द्रोनाचार्य, कृपाचार्य येमन कोनो नइ हे ?’
‘हावय महराज ! फेर वोमन तो मरे म मेंछा भर उपकारत हे। इन्कर राज-पाट आए के बाद उन मर-मरके जीयत हे। ये टूरामन तो जेने अँगरी ल धराके रेंगे बर सिखोए हे उन्करे लंगोट ल धर-धरके तीरत हे। उल्टा उही मन ल आँखी देखावत हे।
सावन के अँधरा ल हरियरे-हरियर दिखथे कहिथे । कोन जनी जनम के अंधरा मन ल काए दिखत होही ते ?
दुर्याधन हँ राजमहल के बरेण्डी म भुर्री बारके तापत हे। बाचे-खूचे कौरवमन चारो खूँट घूम-घूमके छीनत-झपटत बेंदरा बिनास करत हे। जिहाँ खुद राजा के मति छरिया जथे उहाँ मन कइच्चा, केंवची अउ केचहा हो जथे। अइसन राजपाट ले सबके मन उठ जथे। काँही उदीम कर लेवय। कोनो बेरा ककरो मन नइ गेदरावय।
समाचार सरलग चलते हे। दुरपति ल दुसासन हँ जबरन बोहिके सभा म ले लाने हे। सभा के हॉल हँ मुँड़ धरऊल हो गे हे। बिचारी दुखिया हँ कोनो ल मुँहू देखाए के लइक नइ रहि गे हे। ओकर दसा हँ मुड़भर के हो गे हे। वोदे अब परलोखियामन एकक करके वोकर पहिरन-ओढ़न ल घलो तीरत हावय। वोहँ मुड़ी ल गड़ियाए कल्हर-कल्हर के रोवत हे।
अतका गोठ ल सुनके धृतराष्ट्र के आँखी हँ अजब-गजब किसम ले लिबलिबाए लगिस, चमके लगिस। हाथ-गोड़ फरके लगिस। कोन जनी वोकर मन म कोन रस के संचारी भाव संचरे लगिस ते ? अंतस के झरत-पझरत चुहत -चुचुवावत रसा तो भीतरे-भीतर सपेटा गे फेर ओकर मुँह के कोर-कोर म ‘चपचप-ले’ पचपचावत गाजा हँ गजगजाए लगिस।
संजय समझे नइ सकिस।
संजय आगू बताथे के एती दुरपति के चीरहरन होवथे। मीडिया वालेमन कोन्टिया -कोन्टियाके पोण्डा देख-देखके फोटू खींचत हे। वीडियो बनावत हे।
धृतराष्ट्र बड़ अचंभो म पर गे। मुँह ल बीता भर फारके पूछथे - ‘वोमन फोटू काबर खींचत हे ?’
संजय कहिथे - ‘कोन जनी महराज। जेन देस-राज के मीडिया हँ चड्डी भर पहिरे सनी लियोन, पूनम पांडे सहीन चिपरी-चिपरी टूरी ल रातो-रात स्टारडम बना सकत हे। उन्कर ये फोटू उतारे के पीछू घलो कोनो न कोनो जबर कारन जरूर होही। ये मीडिया के सोनजुग हरे महराज ! माने हमर परजातं़त्र हँ स्वतंत्र अउ मजबूत हो गे हे। येमा कोनो दू मत के बात नइ हे।
धृतराष्ट्र मुड़ी ल पटकत कहिथे - ‘वो सभा म कोनो नर-नियाव हे, कि नहीं ?’
संजय कहिथे - ‘का नर-नियाव ल कहिबे। जिन्कर मुँह म नाक नइ होवय तिन्कर बर नारी अउ मरी दूनो बरोबर होथे महराज ! अउ कानून तो तुँहरे बनाए ये। उहू महारानी कस आँखी म टोपा बाँधे राजधरम निभावत हे।’
गँहू के रोटी ल जेती ले टोरबे तेती मुँह बन जथे। तइसे कानून ल जेती ले मोड़-तोड़, मुड़का-घुमा, लहुटा-पहुटाके देख ले। ओला तो सबूत चाही। साबूत सबूत ले ताबूत के मुरदा घलो उठके दऊड़े लगथे। कागज के भरोसा कोनो कोती रेंगा ले। गलत करे हस तभो वोला प्रमान चाही। सही करे हस तभो प्रमान चाही। कागज म जऊन लिखाए हे उहीच् ल तो असल प्रमान माने जाथे।
अब तो अपराधी अतका हुसियार हो गे हे कि करिया हाथी ल मारके घला हत्या आय के नोहय ओतके बर कानून ल दस साल घुमा देथे। अइसन कानून के का भरोसा करबे ? उहू खादी छाप कपड़ा अउ गाँधी छाप नोट के इसारा ल समझे-माने-चले लगे हे।
संजय के बात ल सुनके जनम के इरखाहा, अनदेखना अउ अटेलिहा धृतराष्ट्र के लहू अउँटे लगिस। मन तो हो गे रिहिसे कि संजय ल नक्सल प्रचार अउ आतंकी सहयोगी बता देववँ। जेल म ठुँसुवा-ठोंकवाके खेले खतम कर देववँ। गज्जब टाँय-टाँय करत हे।
उदुपहा फेर सोचथे - ‘अरे मैं मरवई देहूँ त जुवाब तो मुहीच् ल दे बर पर जही। तेकर ले मुखबीरी के बहाना नक्सलाइडे मन से धुँकुवा देथवँ। साँपो मर जही लाठियो नइ टूटही। हूँ उँ उँ......।’
फेर बूढ़त खानी अउ सिंघासन ले रिटायर होए के बाद कुछू तो मनोरंजन के साधन होना चाही। ये संजय रूपी टीबी ल फोर-फार देहूँ त मोर दिनो हँ तो नइ कटही। ये सब बात ल सोचके धृतराष्ट्र कट्ट-खाए चुप आँखी ल लिबलिबाके रहि गे।
पद जाए के बाद मनखे के काम आँखी लिबलिबाना अउ जीभ लपलपाना भर तो रहि जथे। अउ कोनो काम-बूता बर तो सक नइ चल सकय।
संजय ओकर अंतस के उमड़त-घुमड़त धुँध-धुँगिया ल अपन सीसी टीबी के कैमरा ले देख डरिस।
धमकावत कहिस - ‘ये मौन-मुक्का, भकुवाए अउ मनमोहना मुड़ी ल टेटका कस हलाना-डोलाना छोड़ दे कका ! तोर मन म का चलत हे ? सबके लेखा-जोखा मोला मिल गे हे। अभी स्टिंग आपरेसन चलाके तोर धनिया बो देहूँ। अतेक दिन ले पद म रहिके घाम म तपस्या भर नइ करे हौं।’
पद के प्रति निस्ठा, प्रतिस्ठा अउ गरिमा उही म होथे जब कद बढ़ाके गदफद गदर मचाए जाय। अउ अइसन करइया ही असल अधिकारी होथे।
धृतराष्ट्र सकपका गे। माने मीडिया के मार म महराजो मूतथे।
नंगा ले खुदा डरे।
संजय आगू कहिस - ‘सुन ! सरी दिन के भुईयाँ म पसीना ओगरइया पांडो मन ल दुर्योधन काहत हे।’
‘का काहत हे रे ?’ - धृतराष्ट्र बोहावत नाक ल सड़सड़ ले तीरत-सरमेटत पूछिस।
‘अब ये भुईयाँ म तुँहर अधिकार नइ हे। हमर राज ये। हम जब चाहन जइसे चाहन, ये भुईयाँ के उपयोग-उपभोग करन कि येमा अखारा खोलन। तुँहर पूछे -गउँछे के काम नइ हे। हम चाहन त राष्ट्रभक्त ल देसद्रोही कहिके फाँसी चढ़ा देवन। चाहन त देसद्रोही ल सर्वोच्च सम्मान दे देवन। चमत्कार ल बलत्कार काहन कि बलत्कार ल चमत्कार कहि देवन, हमर मरजी।’
कहिथे - ‘तुमन तो अब दास हो गेव रे ! एक ठो खुरसी के लाइक नइ रहि गेव। अब तो तुमन इहाँ बइठे-बोले घला नइ सकव। विरोध करई तो गजब दुरिहा के बात हो गे।’
ले, जेने मालिक ये उन्करे मुँह म पैरा गोंजके मुँह ल सीलत हे।
दुर्योधन के मुँह अउ चाल दूनो म कीरा पर गे हे। जम्मो दरबारी मुँह ओथराए कलेचुप बइठे हे। पांडो मन उठके रेंगत हे अब।
धृतराष्ट्र आधा खुसी आधा गम के रम ल ढरकावत-ढोंकत पूछथे - ‘कहाँ जावत हे पांडो मन रे ?’
‘महाभारत के तियारी करे बर जाथे महराज ! अउ कहाँ जाही !’
धर्मेन्द्र निर्मल
‘का काहत हे रे ?’ - धृतराष्ट्र बोहावत नाक ल सड़सड़ ले तीरत-सरमेटत पूछिस।
‘अब ये भुईयाँ म तुँहर अधिकार नइ हे। हमर राज ये। हम जब चाहन जइसे चाहन, ये भुईयाँ के उपयोग-उपभोग करन कि येमा अखारा खोलन। तुँहर पूछे -गउँछे के काम नइ हे। हम चाहन त राष्ट्रभक्त ल देसद्रोही कहिके फाँसी चढ़ा देवन। चाहन त देसद्रोही ल सर्वोच्च सम्मान दे देवन। चमत्कार ल बलत्कार काहन कि बलत्कार ल चमत्कार कहि देवन, हमर मरजी।’
कहिथे - ‘तुमन तो अब दास हो गेव रे ! एक ठो खुरसी के लाइक नइ रहि गेव। अब तो तुमन इहाँ बइठे-बोले घला नइ सकव। विरोध करई तो गजब दुरिहा के बात हो गे।’
ले, जेने मालिक ये उन्करे मुँह म पैरा गोंजके मुँह ल सीलत हे।
दुर्योधन के मुँह अउ चाल दूनो म कीरा पर गे हे। जम्मो दरबारी मुँह ओथराए कलेचुप बइठे हे। पांडो मन उठके रेंगत हे अब।
धृतराष्ट्र आधा खुसी आधा गम के रम ल ढरकावत-ढोंकत पूछथे - ‘कहाँ जावत हे पांडो मन रे ?’
‘महाभारत के तियारी करे बर जाथे महराज ! अउ कहाँ जाही !’
धर्मेन्द्र निर्मल
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