इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

थोड़ी सी पत्तियाँ

 

अनिता रश्मि

वे जब भी सब्जियाँ खरीदतीं, मुफ्त का धनिया, मिर्ची, अदरक लेने से कभी नहीं चूकतीं। उनकी कार या स्कूटी जैसे ही बाजार के किनारे लगती, सब्जीवालों के चेहरे पर दबी मुस्कान थिरक उठती। सभी की मंद मुस्कान में उनकी आदत का भेद छुपा था।
आज भी लाल कार बाजार के किनारे लगी। वे उतरीं। थैला संभालते हुए आगे बढ़ीं। बैंगन, तोरई, टमाटर, कद्दू के साथ वापस लौट पड़ीं। सब चौंके। एक की आवाज - मेमसाब! आप कुछ भूल रहीं हैं।
- नहीं! आज बस इतना ही।
- आज धनिया पत्ती या मिर्च मुफ्त।
  में नहीं लेंगी?
सब्जीवाले ने थोड़ी सी पत्तियाँ हाथ में उठा लीं। दूसरे ने मिर्च की ओर इशारा किया।
- नहीं!....
  सबके चेहरे पर छिपी मुस्कान नहीं, आश्चर्य था।
आगे कहा,
- .....मैं कल खेत पर गई थी। किसानों की अथक मेहनत देखी थी।

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