अनिता रश्मि
वे जब भी सब्जियाँ खरीदतीं, मुफ्त का धनिया, मिर्ची, अदरक लेने से कभी
नहीं चूकतीं। उनकी कार या स्कूटी जैसे ही बाजार के किनारे लगती, सब्जीवालों
के चेहरे पर दबी मुस्कान थिरक उठती। सभी की मंद मुस्कान में उनकी आदत का
भेद छुपा था।
आज भी लाल कार बाजार के किनारे लगी। वे उतरीं। थैला संभालते हुए आगे बढ़ीं।
बैंगन, तोरई, टमाटर, कद्दू के साथ वापस लौट पड़ीं। सब चौंके। एक की आवाज -
मेमसाब! आप कुछ भूल रहीं हैं।
- नहीं! आज बस इतना ही।
- आज धनिया पत्ती या मिर्च मुफ्त।
में नहीं लेंगी?
सब्जीवाले ने थोड़ी सी पत्तियाँ हाथ में उठा लीं। दूसरे ने मिर्च की ओर इशारा किया।
- नहीं!....
सबके चेहरे पर छिपी मुस्कान नहीं, आश्चर्य था।
आगे कहा,
- .....मैं कल खेत पर गई थी। किसानों की अथक मेहनत देखी थी।
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