- कवि डॉ. जय प्रकाश प्रजापति' अंकुश कानपुरी'
- तुम कितनी अच्छी हो!
- क्यों अब क्या हुआ? - रश्मि बोली
- तुमने मेरा दिल जीत लिया- भुवनीश ने कहा
- शादी के तीस साल हो गए, अब तक? - रश्मि बोली
- नही नही ऐसी बात न थी, मैंने तो हमेशा ही तुम्हें प्यार किया है- भुवनीश विद्रूप हँसी हँसते हुए बोला
- अब क्या हुआ? तुम्हारे और साथी कहाँ गए- रश्मि मुँह बनाती बोली
- अच्छा तो मैं समझ गई, अब कोई साथ देने वाले नही- थोड़ी देर रुक कर फिर वह बोली
- फिर तुमने वही राग सुनाना शुरू किया- भुवनीश बोला
- मैं क्या झूठ बोल रही हूँ- रश्मि गुस्से में बोली
- चलो जो कुछ हुआ मैं उसके लिए माफ़ी मांगता हूँ- भुवनीश ने नम्र होकर कहा
- हाँ !हाँ !अब बोलोगे ही, मेरी सारी जवानी यूँ ही गुजर गई- कभी तुमने मुझे अपना समझा ही कहाँ? - उसके अंदर की मार्मिकता उभर उठी थी।
- अरे यार छोड़ो सब बातें, सब कुछ अपने वश में नही होता, लोग कान भरते रहे, मैं उनकी बात मानता रहा, इसी लिए तो मुझे भी अफसोस है।
- तुम भी तो मेरी बात सुनने को तैयार न थी,चलो छोड़ो न, एक कप चाय बना लाओ- मुस्कराते हुए बोला- भुवनीश बोला
रश्मि मुस्करा पड़ी।
- ठीक है, चलो अब तो अच्छी लगी बुढ़ापे में- रश्मि हँस कर बोली और फिर रश्मि उठ कर चाय बनाने चली गई।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें