बागडोर
- भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'
एक बाग का माली मर गया। उसके दो छोटे - छोटे बच्चे थे जो कि अनाथ हो गए। घर की स्थिति ऐसी नहीं कि बचे हुए लोग बिना मेहनत के बैठ कर खा सकें।
एक दिन सुबह - सुबह माली का लड़का जो करीब पन्द्रह साल का था। बाग में पौधों को पानी दे रहा था। टलहने आने वाले लोगों में से एक ने पूछा, "बेटे, पढ़ने - लिखने की उम्र में ये क्या कर रहे हो ?"
बच्चे ने बड़ी आत्मीयता से बात को समझते हुए बोला, "मेरे पिताजी नहीं
हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही उनका स्वर्गवास हो गया। हम तीन लोग हैं। मेरी
मां, मैं और मेरी बहन। बहन अभी बहुत छोटी है। पिताजी के रहते मां ने कभी
कोई काम घर के अलावा नहीं किया।
अब घर चलाने के लिए पैसे चाहिए और
मेरी पढ़ाई के लिए भी । मैं किसी कीमत पर पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहता। मेरे
पिता जी का लिहाज करते हुए सोसायटी के लोगों ने ये फैसला किया कि मेरे पिता
जी की जगह पर, मैं बाग की सिंचाई, निराई और गुड़ाई का काम करूं । काम के
एवज में जो पैसे मेरे पिताजी को मिलते थे।वह अब मुझे मिलेंगे । साथ में एक
आदमी को और रख लिया गया है जो मेरे अलावा इस पार्क की रखवाली और माली का
काम करेगा। इससे मेरी पढ़ाई का भी नुकसान नहीं होगा ।
वैसे भी पिता जी के बाद अब मुझे ही अपने घर की बागडोर संभालनी है ।"
वह व्यक्ति इतनी कम उम्र के बच्चे को अपने घर - परिवार की जिम्मेदारी समझते देख बहुत प्रभावित हुआ । बोला, "बेटे, मैं तुम्हारी कुछ मदद करना चाहता हूँ । बताओ, तुम्हें किस तरह की मदद चाहिए ? मैं उसे पूरी करने की कोशिश करूंगा ।"
बच्चे ने नम्रता से कहा, "धन्यवाद अंकल, बस, आप मुझे हौसला देते रहिएगा।"
और वह ट्यूबवेल का पाइप पकड़ पौधों में पानी देने लगा ।
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भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
२८८/२२ गली नंबर ६एच, नियर हनुमान मंदिर गांधी नगर, गुड़गांव हरियाणा:-१२२००२
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