इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

-डॉ आर बी भण्डारकर - दो लघुकथाएं

संस्‍कार 
दूसरा काल खण्ड समाप्त हुआ;भूगोल के प्राध्यापक अपना अध्यापन समाप्त कर अपनी अगली कक्षा के लिए निकल गए। तीसरे काल खण्ड के लिए हिंदी के प्राध्यापक उपस्थित हुए।
हिंदी वाले प्राध्यापक अभी इस महाविद्यालय के लिए नवागत ही थे पर सभी  छात्रों को भलीभाँति मालूम हो गया था कि वे  प्रतिदिन उपस्थित होते हैं और समय पर उपस्थित होते हैं। यदि उन्हें कभी छुट्टी आदि पर जाना होता है तो वे कक्षा में पहले ही सूचित कर देते हैं।
आदत के अनुसार थोड़े ही अंतराल में छात्र भारी शोरगुल करने लगे थे। हिंदी वाले प्राध्यापक जी ने आते ही छात्रों को शांत कराया;पर एक छात्र शोर और शरारत करता ही रहा।
प्राध्यापक ने कहा थोड़ा खड़े हो जाइए श्रीमान। छात्र उद्दंडता पूर्वक खड़ा हो गया। वह सोचने लगा कि प्राध्यापक जी डांटेंगे या खड़े रहने की सजा देंगे या बाहर चले जाने के लिए कहेंगे पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। कहा,देख लिया सबने इनको?
हाँ, अब आप बैठ जाइए; अच्छा हुआ कि आज आपने केवल अपने ही नहीं,अपनी सात पीढ़ियों के संस्कार प्रकट कर दिए हैं।
छात्र पानी-पानी; पूरी कक्षा स्तब्ध। 

सुयश

बात उस समय की है जब आज की तरह व्हाट्सएप्प ग्रुप नहीं हुआ करते थे।
एक मित्र मंडली थी। उसमें खूब सारे भागीदार। खूब सारे ,तो तरह तरह के मिजाज के लोग। एक बात में सब एक जैसे।
सब एक जैसे ? भई ऐसी बात कौन सी है ?
परनिंदा।
एक बार चमत्कार हो गया। शाम को सब स्कूल के बाहर के चबूतरे पर बैठ कर गपशप कर रहे थे। गप्प यानी अंतहीन वार्ता;जिसका न ओर(आदि) होता है न छोर(अंत)। बात स्थानीय चर्चा से शुरू हुई। युवाओं की कमियाँ फिर आस-पास के कुछ पुरुषों, महिलाओं की बुराइयाँ फिर कर्मचारियों, अधिकारियों, मंत्रियों की कमियाँ ,फिर रूस, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड और न जाने कौन कौन देश के रीति-रिवाजों, नीतियों, योजनाओं की खामियाँ।
सुयश का प्रवेश। आते ही-भाइयो ! हम दूसरों की कमियाँ, बुराइयाँ गिनाने में अपना वक्त जाया करने की बजाय यदि कुछ सार्थक, प्रेरक, लोकहित कारी चर्चा करें तो कैसा रहे?
सब सुयश का मुँह ताकने लगते हैं।

 

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