मीरा शलभ
चंद्रकांत
जी चादर में मुँह लपेटे... घरवालों से नज़र बचा कर भीतर ही भीतर सिसक रहे
थे- रात जब से लड़के वालों के यहाँ से लौटे हैं... उनके घर का माहौल ही बदल
गया... घर में ऐसा भयावह सन्नाटा मानों यहाँ मौत हो गयी हो... हर आदमी एक
दूसरे से दृष्टि सी चुराए अपने को व्यस्त सा जता रहा है.
मृणाल की
आँखें रो-रोकर लाल सी हो गयीं थीं. आँखों के पपोटे बुरी तरह से सूज गए
लेकिन आँसुओं का वेग नहीं थम रहा था. बस कानों में पिता की कराहती हुई आवाज
गूंज रही थी... “क्या बताऊँ मृणाल की मां... उन्होंने जबान दे कर हमसे
नाता तोड़ लिया... मुझसे पहले वहाँ लड़के का मामा किसी दूसरी पार्टी को लिए
बैठा था... मैं गाड़ी से सगाई का सामान उतरवा ही रहा था कि लड़के के पिता
लगभग दौड़ते से मेरी ओर लपके ... बोले, बुरा न मानिए ठाकुर साहब... लड़की
की कुंडली न होने से हम विवाह न कर सकेंगे.... लेकिन ये बात तो पहले ही
आपसे साफ बतला दी गयी थी और लड़के को लड़की भी पसंद है... मैंने ये कहते
हुए लड़के की तरफ देखा ... मगर वो चुप सर झुकाए खड़ा रहा ... और यहाँ ऐसा
उतावला था कि मानों मृणाल को अभी ब्याह ले जाएगा... सब समझ आ गया मेरी...
सब समझ आ गया मृणाल की माँ... दूल्हा बिक चुका था...”
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