जुरमिल के सब संग चलव।
बन सूरज संझा रोज ढलव।
राजा हरिश्चंद्र के जइसे संगी,
अब रद्दा सत के सबो धरव।
इहाँ गिरे परे जे मनखे हावे,
उन ला कोनो झन बिसरव।
अपन बिरान झन चिंहव जी,
सब के दुख ला गा सब हरव।
मिल बाँट के खाओ सब झन,
अपनेच पेट ला जी झन भरव।
फसल दूसर के खा खा के गा,
बन गोल्लर जी झन भूकरव।
मया मोह में पड़ के कभू "दीप"
कखरो खातिर कोनो मत मरव।
कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी
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