काखर तीर बताववँ मैहर, मोरो मन के बात।
हाँ हाँ मोरो मन के बात।
चारों कोती बइठे हावय, सबो लगावय घात।
हाँ हाँ सबो लगावय घात।
जेती जाबे तेती मनखे, मारत हावय लात,
हाँ हाँ मारत हावय लात।
दिन बीतत हे लाँघन भूखन, बितही कइसे रात,
हाँ हाँ बितही कइसे रा sss.. त जी हरि ...।
सोंच समझ जे चलय नहीं जी, वोहर धोखा खाय,
हाँ हाँ वोहर धोखा खाय।
चोरी बदमाशी ले जे बाँचय, वोहर नाम कमाय,
हाँ हाँ वोहर नाम कमाय।
जे मनखे हा ये सब करथे, हवा जेल के खाय,
हाँ हाँ हवा जेल के खाय।
बइठ सकय ना बीच म कखरो, मुँहु ला वोह लुकाय,
हाँ हाँ मुँहु ला वोह लुका sss ...य जी हरि।
धीर मा खीर होथे कहिथे, ऊतियइल मा बउली जान,
हाँ हाँ ऊतियइल मा बउली जान।
ज्यादा लाहव झन लेवव जी, देखत हे भगवान,
हाँ हाँ देखत हे भगवान।
काम बने जे मनखे करथे, पाथय वोहर मान,
हाँ हाँ पाथय वोहर मान।
जीवन में गा वोहर हरदम, भरथे जी मुस्कान,
हाँ हाँ भरथे जी मुस्का sss ..न जी हरि।
दया धरम तँय करले संगी, उही ह जाथे साथ,
हाँ हाँ उही ह जाथे साथ।
सबके रक्षक हावे कहिथे, जग मा भोलेनाथ,
हाँ हाँ जग मा भोलेनाथ।
जुरमिल गा चलना अब हावे, सबो मिलावव हाथ,
हाँ हाँ सबो मिलावव हाथ।
"दीप" सुझाये हावय रद्दा, चलो नवावव माथ,
हाँ हाँ चलो नवावव मा sss..थ जी हरि।
कुलदीप सिन्हा "दीप"
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी
इस अंक के रचनाकार
.
बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
एक प्रयास
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें