- वसन्ती वर्मा
( 1 )
ए ह बस्तर ए,
इहाँ जंगल म-
साल,सरई, तेंदू ,मौहा,अमली,
नीम,पीपर, लाख के पेड़
लहरावत हे,
अउ जुग-जुग ले,
जंगल के गीत गावत हे।
( 2 )
बस्तर म,
हिरन,मंजूर,कोलिहा, भालू-
के दिन अब लदागे,
बघवा ह नंदागे।
कइसे कहौं मैं-
बंदूक गोली के दिन आ गे!
इहाँ जंगल म अब,
बम बारूद के जोर हे।
कोनो डहर,
बारूद के कचरा,
कोनो डहर,
कचरा म बारूद के ढेर हे।
( 3 )
नक्सली, माओवादी-
चाहे जेन कह लेवा,
चाहत हें क्राँति,
एमा हे अड़बड़ भ्राँति।
इहाँ मनखे मन,
सोज्झे होवत हें शहीद।
न मारने वाला ल मालूम,
कि काबर,
बम गोली चलावत हे।
न मरने वाला ल मालूम,
कि काबर,
बारूद गोली खावत हे!
ए का सुराज ए,
ए का हे क्राँति?
जंगल होगे सुन्ना-सुन्ना,
हवा म गंध बारूदी।
जिहाँ गूंजय किलकारी,
ऊहाँ सुनाथे,
माँ के सिसकारी।
( 4 )
कोनो ल कइसे समझाओं आज,
बस्तर के फेर लुकागे भाग।
इहाँ सबो डहर, चारों पहर,
दीमक कस बगरे हे,
गोली बारूद के कचरा।
जेमा जरत हे,
छत्तीसगढ़ महतारी के अँचरा।
( 5 )
बस्तरिहा मरे,
या नक्सली,
या पुलिस अउ सेना के जवान।
होंही कोनो विधवा,
फेर होंही कोनो अनाथ।
बम बारूद के कचरा म,
छत्तीसगढ़ महतारी के,
फाटक हे छाती,
हाँसत हें नक्सली,
अउ कलजुगी क्राँतिकारी।
पता निही बस्तर म,
कइसे आही,
फेर सोनहा बिहान।
जिंहा सुनाही,
छत्तीसगढ़ महतारी के गान।
छत्तीसगढ़ महतारी के गान
वसन्ती वर्मा, बिलासपुर
मो- 98262 37770
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