पनही कोनोच ल नइ डर्राय,
खोचका-डबरा, जंगल-झाड़ी,
मेड़-पार, भाठा-पटपर
कोनोच ल नहीं।
काँटा-खूँटी ल रमंज देथे,
ढेला-पखरा ल रउंद देथे,
बजरी-गिट्टी ल कर देथे पिसान कस,
पहाड़ के घलो धुर्रा उड़ा देथे।
भोमरा तो ओला दूरिहच ले झझकथे,
नइ डर्राय पनही कोनोच ल।
पश्चिमी अमरिका ले शुरू होय
ये पनही के रेंगई चलत हे सरलग,
इतिहास के ऊबड़-खाबड़ पैडगरी म।
रेंगत हे ये पनही
दस हजार बछर ले
मुहाटी ले खोर,
गाँव ले शहर,
घर ले बजार,
भंडार ध्रुव ले रक्सहूँ ध्रुव तक,
उगती देशांतर ले बुड़ती देशांतर तक
पनही रेंगत हे।
धरती के अंग म गोदना कस उबके हे
पनही के चिनहा।
पनही ल आगी ले डर नइ लागय,
पानी ले डर नइ लागय,
मरनी-हरनी ले घलो डर नइ लागय,
पनही ल खाली
पाँव परइया मन ले डर लागथे।
- यशपाल जंघेल
तेंदुभाठा (खैरागढ़)
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
पनही
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