चल असाढ़ तैं जाती - खानीख, बरस झमाझम पानी।
बखत बखत बड़कन करना हे, बाटुर -बुता किसानी।
परहा बर थरहा देना हे, दिन - दिन हे पछुवावत।
नट दे हे नलकूप तोर बिन, पानी नइ हे आवत।
सोयाबीन उरिद अउ राहर, कोदो ला हे बोना।
काम - बुता सब तोर भरोसा, तोर बिना का होना।
बरसे बर बादर ला कहि चल करय न आनाकानी।
बखत - बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
बादर बरसे बर लउहावय,अब झन देर लगावय।
गरमी गदक निचोवत हावय, जल्दी जीव जुड़ावय।
गरमी छुट्टी अउ झन बाढ़य, सुनव निवेदन हावय।
मोबाइल के मतरे लइका जल्दी इस्कुल जावय।
सुटुर - सुटुर झन रेंगव देखव, बादर के बयमानी।
बखत बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
खातू माटी बीज भात मा, लगत अजीरन खरचा।
टोंटा भर कर्जा काढ़े हन, लिखा -फँसा के परचा।
गरुवा-गाय गली के होगे, छुहनय खोजय पैरा।
चल तो आज बेड़ के लादवँ, कहय न लइका ऐ राख।
तोर असीस कृपा छत होगे, छाये छइहाँ छानी।
बखत - बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
नदिया नरवा ताल तलइया, कचरा ले भर गे हें।
मनखे मन सो अकताइस का बिन माँगे दे दे हें।
बीज बिचेतख² परे भुँइया मा जेठ जरोइस भारी।
रुखराई बर उम्हियाइन बड़, टँगिया आरा -आरी।
पा असाढ़ के आरोख जगथे, जीव जगत जिनगानी।
बखत -बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
देय तुँहर भर भरख पाये हन, जय हो असाढ़ राजा।
बादर ला तुम तियार जाहू, खूब बजाहय बाजा।
सावन सन तुँहरो गुण महिमा, गाबो बड़ सँहराबो।
रिमझिम असीस पाबो तब तो, खाबो घलो खवाबो।
आमा के अथान ले जाहव, चर -चर के हे चानी।
बखत -बखत बड़कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
इस अंक के रचनाकार
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शुक्रवार, 26 मई 2023
बाटुर - बुता किसानी
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