शत्रुघन सिंह राजपूत
सुविख्यात मानस मनीषी डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र ने अपने शोध प्रबंध’ तुलसी दर्शन’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया है - ’ मानव समुदाय में सामान्यतः यही देखा जाता है कि लोग आम के फल खाते हैं, उसकी जड़ों का निरीक्षण नहीं करते, मधुर झरने का शीतल जल पीकर प्रसन्न होते हैं, उसके स्त्रोत की छानबीन नहीं करते। किसी सत्कवि की रचनाओं का सुरस चखना चाहते हैं परन्तु उसके व्यक्तित्व से अथवा उसकी जीवनी से वास्ता नहीं रखते’ यह उक्ति महाकवि तुलसीदास की जीवनी से संदर्भित है लोक - कलाकारों, लोक - कला साधकों और लोक संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों के प्रति भी यह कथन प्रासांगिक लगता है मड़ई उत्सव समिति आलीवारा डोंगरगाँव द्वारा सांस्कृतिक उत्सव ’ लोक मड़ई 2023’ के अवसर पर ’ स्मारिका ’ प्रकाशित की गई। इसमें अविभाजित राजनंदगांव जिला के लोक - कलाकारों, कला साधकों, लोक संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों के जीवन की संघर्षपूर्ण सांस्कृतिक यात्रा और उनकी उपलब्धियों का वर्णन है। स्मारिका वीरेन्द्र बहादुर सिंह के संपादन और राजेन्द्र यादव, मुन्ना बाबू के सह - संपादन में निकाली गई है। डोंगरगाँव विधानसभा क्षेत्र के लोक - कला प्रेमी विधायक दलेश्वर साहू अध्यक्ष लोक मड़ई उत्सव समिति आलीवारा जिला - राजनांदगांव इसके प्रकाशक हैं। पुस्तक में डेढ़ दर्जन लेखकों के लेखों को संग्रहित किया गया है। मुख पृष्ठ पर लोक कलाकारों और कला साधकों के चित्रों को समायोजित किया गया है जो पाठकों को आकर्षित करता है।
वैसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में कलाप्रेमी जनप्रतिनिधियों का भीषण अकाल है। इस विकराल अकाल में कला प्रेमी विधायक दलेश्वर साहू का प्रयास सावन के फुहारों की तरह आनंददायक है। वे साहित्यकारों और कलाकारों से सीधे जुड़े हैं। जिला भर के साहित्यकारों का विनम्र भाव से सम्मान कर चुके हैं। राजनीति की आपाधापी में भी ’ लोक - मंच ’ के लिए समय निकाल लेते हैं। यह प्रशंसनीय है। विगत 22 वर्षों से विभिन्न स्थानों में लोक मड़ई का आयोजन हो चुका हैं। अपने संपादकीय में वीरन्द्र बहादुर लिखते हैं - ’ लोक मड़ई के बीते वर्षों के आयोजन में पदम् विभूषण तीजन बाई, ऋतु वर्मा, उषा बारले, ( पंडवानी )देवदास बंजारे (पंथी नृत्य) श्रीमती ममता चंद्राकर ( लोकगीत) कविता वासनिक (लोकगीत) खुमानलाल साव ( चंदैनी गोंदा) दीपक चंद्राकर ( लोकरंग) जैसे दिग्गज कलाकार अपने साथियों सहित अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। नाचा, पंथी, कर्मा,पंडवानी,भरथरी, चंदैनी, देवार गीत, बांस गीत आदि छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की प्रमुख विधाएं हैं। उनकी पारंपरिक लोक शैलियाँ लोक मड़ई के मंच पर साकार हो चुकी हैं। स्मारिका में दाऊ मंदराजी, दाऊ रामचंद देशमुख, खुमानलाल साव और हबीब तनवीर की अगुवाई में ग्रामीण से शहरी परिवेश, फिर देश विदेश तक नाचा और लोकनाट्य यात्रा की विकास गाथा सांस्कृतिक लोक सेवा की राह पर बिखरे शूल अधिक हैं। इसमें दक्षता के लिए तपस्या और समर्पण अनिवार्य है। अधिकाँश कलाकार कम पढ़े - लिखे, आर्थिक रूप से संघर्षशील किन्तु अभावों के बावजूद कला के प्रति समर्पित हैं। स्मारिका कला - जीवन का दस्तावेज है। लेखों में विविधता है। कला जगत के ये अनमोल छत्तीसगढ़िया सितारे अपनी कलाओं से छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना करते प्रतीत होते हैं। अब उनकी परवाह करना ही पड़ेगा। लेख पठनीय हैं,चंदैनी गोंदा, सोनहा बिहान,नवा बिहान लोरिक चंदा, दूध मोंगरा आदि लोक सांस्कृतिक संगठनों का छत्तीसगढ़ के लोक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्मारिका में बेजोड़ नाचा कलाकार लालूराम, मदन निषाद, ठाकुरराम, गोविंदराम निर्मलकर, बाबूदास, फिदाबाई सहित भुलवाराम ( उत्कृष्ट गायक) एवं अन्य कलाकारों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। सुविख्यात लोक संगीतकार खुमानलाल साव और उनकी टीम ने अपने संगीत के जादू से करमा, ददरिया, सुआ, गौरा, विवाह गीत, बसदेवा - गीत, सोहर,भोजली, पंथी और देवी जस गीतों को प्राणवान कर दिया। ’ चंदैनी गोंदा’ के संगीत निर्देशक के रूप में उन्होंने अनेक गायक - गायिका कलाकारों की प्रतिभाओं में नई चमक पैदा की है। गिरजाकुमार सिन्हा को बेन्जो वादन में अद्भूत सिद्धि प्राप्त थी। उनका बहुमूल्य योगदान रहा है। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की स्वर कोकिला कविता वासनिक ने क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों में अपने गाए गीतों से ख्याति अर्जित की है। यह स्मारिका उन सभी कलाकारों का स्मरण चित्र है जिन्होंने देश - विदेश में अपनी कला का लोहा मनवाया है। हबीब तनवीर ने गाँव के गली कुचों के कलाकार्रों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। इससे उनका सम्मान बढ़ा। ’ छत्तीसगढ़ी नाचा के अनूठे साधक कलाकार मंदराजी’ शीर्षक लेख में लेखक जयप्रकाश ने छत्तीसगढ़ी नाचा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विवेचन किया है। वहीं देश दुनिया में रंगमंचीय सफलता का उल्लेख किया है। दाऊ मंदराजी के संबंध में उन्होंने लिखा है ’ मंदराजी दरअसल कला की कपट - दुनिया के स्वछंद नागरिक थे, सौन्दर्य और आनंद के अद्वितीय क्षणों के लिए सब कुछ लुटा देने को तैयार वे अनूठे कलाजीवी थे। विजय मिश्रा ’ अमित’ के लेख के अनुसार कविता वासनिक का मानना है - कलाकारों का सामाजिक सरोकार समाज को सब मिलकर और सुसंस्कृत बनाये रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। परंपराओं की हिफाजत भी एक इबादत है, मूल संस्कृति से दूर भागने की भूल समाज को गर्त में ले जा सकती है ... साधन आज बहुत बढ़ गए हैं पर साधना कम हो गई है। स्तुति बहुत हो रही है पर आराधना घट गई है। संगीत जगत में आने वाली नई पीढ़ी ऊर्जा से लबरेज है पर कठोर अभ्यास के मामले में कमतर लगती हैं। गौतमचंद जैन दूध मोंगरा गंडई के संस्थापक सदस्य हैं और वरिष्ठ लोक गायक हैं। डॉ. पीसीलाल के अनुसार वे विगत 45 वर्षों से लोक गीत गायन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ’ कनिहा म तोर करधन’ को धुरवा राम मरकाम और गौतमचंद जैन ने बारी - बारी से अपना स्वर दिया है। यह गीत प्रसिद्ध है। राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि मदन निषाद लोकनाट्य नाचा के दिग्गज कलाकार और अद्भूत अभिनेता थे। उन्होंने गम्मत ( कामेडी या प्रहसन) के माध्यम से नाचा शैली के पात्रों और चरित्रों को स्थापित किया। इसके अतिरिक्त स्व. ठाकुरराम, मंदराजी दाऊ, लालूराम, बाबूदास ने भी नाचा के कथ्य के कैनवास को विस्तार देने और लोचदार बनाने में योगदान दिया।
संजीव तिवारी ने पद्मश्री गोविन्दराम निर्मलकर को लोककला का ध्वजवाहक निरूपत करते हुए लिखा है कि. शुद्ध उच्चारण और मंच के लिए अपेक्षित लोचदार आवाज के व्दारा गोविन्दराम चरित्र से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में दक्ष थे। हबीब तनवीर के नया थियेटर में आते ही वे नायक की भूमिका में आ गए। वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने खुमानलाल साव को ’ चंदैनी गोंदा ’ के यशस्वी संगीत सर्जक लिखा है। सावजी निश्चय ही आजीवन लोक मंच पर संगीत निदेशक रहे। अनेक गायक गायिकाओं को उन्होंने तैयार किया। मुन्ना बाबू ने लिखा है कि भैयालाल हेड़ाऊ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। ’ चंदैनी गोंदा ’ के गायकों में वे अग्रगण्य थे। खुमान लाल साव एवं गिरिजा कुमार के निर्देशन में भैयालाल हेड़ाऊ ने अनेक कर्णप्रिय छत्तीसगढ़ी गीत गाए जो लोक मंच की धरोहर है। सुरेश यादव ने अपने लेख में फिदाबाई मरकाम को छत्तीसगढ़ी लोक मंच ’ नाचा’ की प्रथम महिला उत्कृष्ट गायिका और कुशल नर्तकी बताया है। अशोक चन्द्राकर ने देवी लाल नाग को नचकारी ’ नर्तकी’ या परी में सिद्धहस्त, कुशल हारमोनियम वादक, कुशल गायक और कुशल संगीत संयोजनकर्ता लिखा है। अरूण कुमार निगम ने गिरिजा कुमार सिन्हा को विलक्षण संगीतकार की संज्ञा दी है। उन्होंने लिखा है कि हारमोनियम में खुमानलाल साव, बांसुरी में संतोष टांक, इलेक्टि्रक बेन्जो में गिरिजा कुमार सिन्हा, मोहरी में पंचराम देवदास, तबला में महेश ठाकुर, ढोलक में केदार यादव सिद्धहस्त रहे हैं। इन सभी कलाकारों का संगम ’ चंदैनी गोंदा ’ में हुआ। गिरिजा कुमार सिन्हा बेन्जो वादन में इतने सिद्धहस्त थे कि प्यानों, गिटार और मेंडोलियन जैसे वाद्य यंत्रों की हूबहू धुन वे बेन्जों से ही निकाल लेते थे। उनका बेन्जो वादन अद्भूत और चमत्कारी था।
गंडई पंडरिया की दुखिया बाई को डॉ.पीसीलाल यादव स्वर कोकिला कहते हैं। दुखिया बाई निरक्षर थी। उसके गाए लोकगीत इतने लोकप्रिय हैं कि कोई भी ऐसा कला मंच नहीं, कोई भी ऐसा कलाकार नहीं जो दुखिया के गीतों को न गाता हो दुखिया बाई की यह प्रसिद्धि लोक की प्रसिद्धि है,लोक गीतों के खनकते स्वर की प्रसिद्धि है। आकाशवाणी रायपुर से बजने वाले गीतों में सर्वाधिक फरमाइश दुखिया बाई और धुरवा राम के गीतों की होती है। दीपक विराट बेजोड़ अभिनेता थे। डॉ.लोकेश शर्मा के लेख के अनुसार हबीब तनवीर के नया थियेटर में लगभग दो दशकों से जुड़े थे। एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार थे। अखिल भारतीय संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार 2017 से भारत के राष्ट्रपति महामहीम रामनाथ कोविंद से 6 फरवरी 2019 पुरस्कृत हुए। दीपक विराट ने अपनी रंगकर्मी पत्नी और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मंदराजी सम्मान से सम्मानित श्रीमती पूनम विराट के साथ मिलकर राजनांदगांव में ’ रंग छत्तीसा’ग्रुप बनाया। स्वयं पूनम विराट यशस्वी गायिका हैं। पूनम विराट, सुखीराम निषाद नाचा के प्रभावी कलाकार रहे हैं। मधुर संगीत, आकर्पक गीत नृत्य और गम्मत के कारण टिकटो में उनके चैरिटी - शो ’ नाचा’ होता था। विक्रम यादव को बांस गीत गायन में दक्षता हासिल है। न्यू थियेटर गु्रप से जुड़े रहे। राजेश मारू बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। हर्ष कुमार बिंदु ने अपने लेख में लिखा है कि राजेश मारू बैगा गु्रप के अध्यक्ष हैं। सांस्कृतिक जागरण में निरंतर जुटे हैं। छत्तीसगढ़ी लोककला और संस्कृति में आ रही विकृतियों को आडियो, वीडियो कैसेट के माध्यम से दूर करने प्रयासरत हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में पचास से अधिक आडियो, वीडियो कैसेट तैयार किया है। सुप्रसिद्ध गायिका कविता वासनिक समेत प्रमुख गायक गायिकाओं ने स्वर दिया है।
डॉ.नत्थू तोड़े ने लतमार दास चंदनिया पर लेख लिखा है। उसमें उल्लेख है कि आरंग क्षेत्र में राउत जाति में लोग बांस बजाकर शादी के अवसर पर लोक कथा चंदैनी का गायन करते हैं। चंदैनी लोक कथा मूलतः लोरिक और चंदा के प्रेम प्रसंग पर आधारित है। सभी पात्र मंच पर उपस्थित होकर इसे नाचा शैली में प्रस्तुत करते है। लतमार दास चंदनिया इसी लोक कथा के लोक गायक हैं। मुन्ना बाबू ने अपने लेख में पंडवानी गायक रेवाराम साहू के बारे में लिखा है कि प्रसिद्ध पंडवानी गायक झाडूराम देवांगन उनके प्रेरणा स्त्रोत थे। हबीब तनवीर उसके पंडवानी गायन से प्रभावित थे। डॉ.पीसीलाल यादव ने धुरूवाराम मरकाम के बारे में लिखा कि उसने संगीत की कोई शिक्षा नहीं ली थी। लोक और लोक कलाकारों को गुरू मानकर लोकसंगीत की साधना करते रहे। वे लोक गायक ही नहीं हैं बल्कि आशु कवि की तरह ’ ददरिया’ की रचना भी कर लेते हैं। उनके दर्जनों गीत लोक - मानस में प्रिय है। बरसाती भैया मूल नाम केशरी बाजपेयी ने रेडियो में जो चौपाल जमाया उसे घर - घर लोकप्रियता मिली। उन्होंने अनेकों कलाकारों को दिशा दी। जनता के ह्रदय में स्थान बनाया। अपने छत्तीसगढ़ी कार्यक्रम के बरसाती भैया बहुत ही लोकप्रिय हुए। लाल रामकुमार सिंह रंगकर्मी एवं आकाशवाणी के उद्घोषक रहे हैं। उनका छत्तीसगढ़ के लोक जीवन को बहुमूल्य योगदान मिला। दीपक विराट तिवारी एक मंजे हुए बहुमुखी प्रतिभा के धनी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कलाकार थे। उनकी पत्नी पूनम विराट के संबंध में सूर्यकांत मिश्रा लिखते हैं कि पूनम रंगमंच की बेजोड़ कलाकार है। नाचा और गम्मत दोनों में पारंगत है। कक्षा चार तक पढ़ी हैं, किन्तु गायन के क्षेत्र में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने में निपूर्ण है। ओमप्रकाश ’ अंकुर ’ ने लिखा है कि अभिनय कौशल में स्व. उदेराम श्रीवास ने नाचा के माध्यम देश विदेश में प्रमुख अभिनेता के रूप में ख्याति अर्जित की। प्रदेश स्तर पर उसे सरकार ने अनेक सम्मानों से सम्मानित किया। साकेत साहित्य परिषद, सुरगी, राजनंदगांव ने भी उसे सम्मानित किया। इस बेजोड़ कलाकार का समुचित सम्मान नहीं हो पाया। चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त स्वर्ण कुमार साहू कलाजीवी थे। उनकी नातिन उर्वशी साहू के अनुसार रवेली पार्टी का एक सुप्रसिद्ध गम्मत था ’ पोंगवा पंडित’ सन 1953 में रिंगनी पार्टी में विलय के बाद इसे खेला गया, जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। उनका लिखा गीता ’ महराज बता देहू तुंहर कउन घराना आय’ जनप्रिय हुआ था। अनुसार इस लोक गीतकार को आजीवन आर्थिक संघर्स करना पड़ा। वे हबीब तनवीर से जुड़े। बड़ी प्रसिद्धि मिली। उसकी सुपुत्री गिरीश साहू भी आर्केस्ट्रा व लोक कला मंचों की गायिका थीं। दूध मोंगरा, गंडई से जुड़ी थीं। उर्वशी साहू छत्तीसगढ़ी फिल्म अभिनेत्री हैं। मुन्ना बाबू मालाबाई को छत्तीसगढ़ की लता निरूपित करते हैं। मालाबाई महज तेरह साल की उम्र से गीत गाती थीं। वह अपनी जादुई आवाज श्रोताओं को मंत्र - मुग्ध कर देती थी। अभिनय कला में भी दक्ष थीं। देश विदेश में अनेक नाटकों में अभिनय की थी। शेखर कपूर की ’ बेंनडेट म्ीन’ में भी उसने काम किया। राजेन्द्र यादव ने दलेश्व्रर साहू को ’ लोक मड़ई ’ उत्सव के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में कार्य करने वाला बताया है। विगत तीन दशकों से वे इस कार्य में जुटे हैं। विशेष बात यह है कि वे प्रतिभाओं के पारखी हैं। स्व.खुमानलाल साव का एक लेख संग्रहित है जिसमें रवेली नाच पार्टी का सन 1928 से 1953 तक संक्षिप्त इतिहास है। रवेली नाच पार्टी स्व. दुलार सिंह मंदराजी के नेतृत्व में गठित नाच पार्टी का नाचा गम्मत की कला का महत्वपूर्ण इतिहास है। जो मंदराजी महोत्सव समिति,रवेली, राजनांदगांव द्वारा प्रकाशित ’ गम्मत’ संपादक- जयप्रकाश से साभार लिया गया है।

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