कुलदीप सिन्हा "दीप"
दू अउ दू हा होथे चार।
पेलथस काबर मुड़ के भार।
चुप रेहे ले तोर कुछु नइ बिगड़े,
गली गली झन पार गोहार।
ज्यादा अतलंग जेन हा लेथे,
उही मन बोहाथे धारे धार।
भाई भाई के झगरा मा भइया,
परिया पर गे हे खेतिखार।
जेन हा भुंजथे छानी मा होरा,
जर जाथे वोखर घर-बार।
जेब ला टमर के खर्चा करबे,
कखरो कर झन हाथ पसार।
घर सबो के जे करथे अंजोर,
वोखरे तरी हा होथे अँधियार।
चतुरा ला केकरा नइ चाबे,
कोनो नइ पावे वोखर पार।
झूठ लबारी के पौबारा हे,
ईमान बेचागे बीच बाजार।
अउ आगू का होही "दीप"
हे सारी दुनिया करत विचार।
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कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी
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