दूजराम साहू 'अनन्य '
धंधा भ्रष्टाचार के, होगे हे आसान ।
माल मिले चोखा बने , होय खूब सम्मान ।।1।।
अफ़सर नेता मन मिले , बाबू देवय साथ ।
गड्डी मोटा देख के , पुलिस मिलावय हाथ ।।2।।
माल तोल के लेत हे , बिना तराजू तोल ।
रिश्वत के बाजार मा ,बिकत हवय बिन मोल ।। 3।।
नइ खावय जे घूस ला , करय न भ्रष्टाचार।
अइसन सिधवा जीव हा , पीड़ा सहे हजार ।।4।।
मानय बने तिहार वो, लेथे जेहर घूस ।
सत के रद्दा जे चले,करजा लेवय ठूस ।।5।।
हूम - धूप हर नेंगहा , भाव -भक्ति हे सार ।
करजा कर जोंगा करय ,माने तभे तिहार ।।6।।
भीख मंँगइया के घलो, होथे बड़ सम्मान ।
बाना सत के जे धरे, वो होवत हिनमान ।। 7।।
बाढ़त भ्रष्टाचार हे ,जिम्मा लेही कौन ।
अफ़सर आंँखी मूंँद लिन ,नेता मन हे मौन।। 8।।
निवास- भरदाकला (खैरागढ़)
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