मनहरण घनाक्षरी- गर्रा धुँका
गर्रा धुँका आय हावै,धुर्रा ला उड़ाय हावै,
उड़ उड़ डारा पाना,खोल म पटाय हे।
घनघोर घटा घिरे,घड़ घड़ घड़ करे।
देख पानी बादर ला,बेंगवा टर्राय हे।
लहुका गरज बरे,लइका सियान डरे,
देख जी चिरई सबो,खोंधरा लुकाय हे।
झोर झोर पानी गिरे,खोल गली पानी भरे,
एती ओती चारों कोती चिखला मताय हे।
जलहरण घनाक्षरी- जयमाला
दाई ददा की पियारी,सिया जनक दुलारी,
राजी हे बिहाव बर, होही स्वयंबर अब।
राम लछिमन आये,फेरा नगर लगाये,
राम रूप देखें मुख,मया म मोहागें सब।
शिव के धनुष तोड़े,राम सिया गाँठ जोड़ें,
देख मिथिला नरेश, भाग सहरायँ तब।
सिया पग धीरे धरे,राम लला आघू खड़े,
धक धक छाती करे,डारे जयमाला जब।
रूप घनाक्षरी- चउमासा के साग
कुंदरू करेला फरे,मड़वा म नार चढ़े,
झुनकी-तरोई सेमी,छानी चढ़े तुमा नार।
कोंचई म कांदा परे,मखना के पाना बड़े,
येती वोती लहसे हे,रमकेलिया के डार।
सेमी फूल सादा फूले,घुल घुल फर झूले,
लमरी लमेरा खीरा,फरे हे जी मेड़ पार।
झुनगा बाढ़य झट,पड़ोरा ह टूटे पट,
साग लगा कोला बारी,फरही महीना चार।
~
इस अंक के रचनाकार
.
मंगलवार, 26 अगस्त 2025
वसन्ती वर्मा के घनाक्षरी छंद
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें