श्रवण कुमार साहू, "प्रखर"
वक़्त का पहिया,घूमते रहता,
देखो हर पल,दिन और रात|
सदा एक सा कभी ना होते,
समझो जीवन में हालात||
कोई हँसता है उसी पल में,
तो कोई फुटकर रोता है|
कहीं मिलन की बेला होती,
तो कोई किसी को खोता है|
कितने रंग भरे हैं पटल पर,
तो कहीं खाली है जज्बात---
वक्त के फेर में राजा बन गए,
जो कभी,कहलाते थे रंक|
इसने किसी को शिखर दिया,
तो किसी को किया निरंक||
वक़्त बदलते देख लोगों के,
बदलते देखा है ख्यालात----
विधी का विधान बदल न सके,
स्वयं ही जगत का विधाता|
जीवन-मृत्यु,यश-अपयश,
उनके भी जीवन में है आता||
राम को वनवास मिला तो,
कन्हाई जन्में थे हवालात---
वक़्त के मारे कोई न बचता,
जरा समझो वक़्त की चाल|
सृजन वही है,प्रलय वही है,
वक़्त है साक्षात महाकाल||
समय का चुका काम न आवे,
ओह!क्या मानव,क्या बरसात---
लाख करवट बदले जिंदगी,
हर रूप में उसे स्वीकार करो|
अजी दुःख मिले या सुख मिले,
प्रभु इच्छा है अंगीकार करो||
चौरासी लाख योनि में उत्तम,
समझ लो हे! मानुष तेरा जात---
शिक्षक/साहित्यकार,राजिम,गरियाबंद
देखो हर पल,दिन और रात|
सदा एक सा कभी ना होते,
समझो जीवन में हालात||
कोई हँसता है उसी पल में,
तो कोई फुटकर रोता है|
कहीं मिलन की बेला होती,
तो कोई किसी को खोता है|
कितने रंग भरे हैं पटल पर,
तो कहीं खाली है जज्बात---
वक्त के फेर में राजा बन गए,
जो कभी,कहलाते थे रंक|
इसने किसी को शिखर दिया,
तो किसी को किया निरंक||
वक़्त बदलते देख लोगों के,
बदलते देखा है ख्यालात----
विधी का विधान बदल न सके,
स्वयं ही जगत का विधाता|
जीवन-मृत्यु,यश-अपयश,
उनके भी जीवन में है आता||
राम को वनवास मिला तो,
कन्हाई जन्में थे हवालात---
वक़्त के मारे कोई न बचता,
जरा समझो वक़्त की चाल|
सृजन वही है,प्रलय वही है,
वक़्त है साक्षात महाकाल||
समय का चुका काम न आवे,
ओह!क्या मानव,क्या बरसात---
लाख करवट बदले जिंदगी,
हर रूप में उसे स्वीकार करो|
अजी दुःख मिले या सुख मिले,
प्रभु इच्छा है अंगीकार करो||
चौरासी लाख योनि में उत्तम,
समझ लो हे! मानुष तेरा जात---
शिक्षक/साहित्यकार,राजिम,गरियाबंद
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