लोको पायलट-संतोष मिरी 'हेम'
नव कोपल के उद्भव हेतु, स्वयं शाख से गिर जाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
जग में ना कोई स्थायी, समय सभी का आना है।
यह तन है माटी का ढेला, माटी में मिल जाना है।।
तरुवर को नव जीवन देने, तन का अर्पण कर जाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
यह तन है माटी का ढेला, माटी में मिल जाना है।।
तरुवर को नव जीवन देने, तन का अर्पण कर जाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
एक झड़े तब दूजा उगकर, जीवन चक्र चलाता है।
एक मिले माटी में तब ही, दूजा जीवन पाता है।।
जिसका भी आरंभ हुआ वह, नश्वरता को हैं पाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
एक मिले माटी में तब ही, दूजा जीवन पाता है।।
जिसका भी आरंभ हुआ वह, नश्वरता को हैं पाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
सहयोगी के भाव लिए नित, पत्ते बढ़ते जाते हैं।
पर्ण सूख जो गए शाख पर, संग पवन के गाते हैं।।
सत्य कर्म को लक्ष्य बनाकर, झड़के भी फर्ज निभाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
पर्ण सूख जो गए शाख पर, संग पवन के गाते हैं।।
सत्य कर्म को लक्ष्य बनाकर, झड़के भी फर्ज निभाते।
त्याग तपस्या और समर्पण, पत्ते हमको सिखलाते।।
कोरबा (छत्तीसगढ़)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें