कुलदीप सिन्हा "दीप"
हरिश्चंद्र जब ले साधे हे मौन।
हे सच के इहाँ बोलइया कोन।
मस्त हवे गा सबो अपन में,
धरे हाथ मा मोबाईल फोन।
कोनो कखरो सुनय नहीं जी,
होगे हे ऊँचा अब सब के टोन।
करजा मा इहाँ सबो बूड़े हे,
ले के लोन के ऊपर लोन।
"दीप" सम्हल के हावय चलना,
हे आगू मा इहाँ खतरा जोन।
हे सच के इहाँ बोलइया कोन।
मस्त हवे गा सबो अपन में,
धरे हाथ मा मोबाईल फोन।
कोनो कखरो सुनय नहीं जी,
होगे हे ऊँचा अब सब के टोन।
करजा मा इहाँ सबो बूड़े हे,
ले के लोन के ऊपर लोन।
"दीप" सम्हल के हावय चलना,
हे आगू मा इहाँ खतरा जोन।
कुकरेल ( सलोनी ) धमतरी
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