अमिता रवि दुबे
पोरा हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।
उछाह के आधार हे, भादों महिना ज्ञान मा।।
पूजा बइला के हरे, आथे घर -घर नाँदिया।
रोटी -पीठा ठेठरी, गठरी बाँधव मूठिया।।
खन - खन घंटी बाँध दे, दउड़त हावय शान मा।
पोरा हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।।
समझन संस्कृति सार हे, बात ग्यान के रोट हे।
हो थे गर्भाधान हे, दाना भरथे पोट हे।।
खेती काम महान के, प्रतीक पुरुष महान मा।,
पोरा हमर तिहार हे, भरगे रस अब धान मा।।
लोढ़ा जाता सील मा,रंधना गुधना पीसना ।
नोनी मन के काम ला, कहिथें खेलत सीखना।।
अक्ती- भक्ति हे शक्ति के,जग भोले गुनगान मा।
पोरा हमर तिहार हे, भरथे रस अब धान मा।।
जतका रीति रिवाज हे, आपन गाँव समाज के।
मानत जुन्ना मन सबो,नवा नेवरिया आज के।।
धरती दाई देत हे,धन - दौलत खलिहान मा।।
पोरा हमर तिहार हे, भरथे रस अब धान मा।।
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