रविवार, 29 मई 2016

मई 2016 से जुलाई 2016 तक


शोध लेख 
घरेलू कामगार : अस्मिता का नियतिपरक प्रस्‍थान : अजय कुमार साव
गांधी जी के सामाजिक आर्थिक विचार की उपयोगिता : एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन -
थानसिंह वर्मा एवं पी.डी.सोनकर

समीक्षात्‍मक लेख
कुबेर के छत्‍तीसगढ़ी कहिनी के घेरा म एक फेरा  : डॉ.बिहारीलाल साहू

कहानी
भिखारिन : रवीन्‍द्रनाथ टैगोर
नहीं भूल पायी : भावसिंह हिरवानी
बहाना : डॉ. (श्रीमती ) अर्पणा शर्मा
वनवास : राजा सिंह ( राजाराम सिंह )
शहर में गांव : गोविन्‍द सेन
अंगना : दीनदयाल साहू


व्‍यंग्‍य
व्‍यंग्‍य लिखने का रोग : कांशीपुरी कुंदन
लुंगी पर एक शोध प्रबंध : प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव

गीत / गजल / कविता
गुलामी के गेरूवा गर म (छत्‍तीसगढ़ी गीत ) डॉ. पीसीलाल यादव
गरजत - घुमरत आबे रे बादर( छत्‍तीसगढ़ी गीत ) : सुशील भोले
अशोक ' अंजुम ' की दो हास्‍य व्‍यंग्‍य गज़लें
नवसंवत्‍सर आ गया ( गीत ) : मनोज कुमार शुक्‍ल '' मनोज ''
जिसके मन में उल्‍लास नहीं ( गज़ल ) श्‍याम '' अंकुर ''
अनजाना दर्द ( गज़ल ) जितेन्‍द्र '' सुकुमार ''


पुस्‍तक समीक्षा
तकरार अउ विद्रोह ( पिरकी हा घाव होगे ) : समीक्षा यशवंत मेश्राम
धान के कटोरा ' बीजहा धान ' : समीक्षा विनय शरण सिंह
बेईमान के मुड़ म पागा : वीरेन्‍द ' सरल '

साहित्यिक सांस्‍कृतिक गतिविधियां

राष्‍टीय ख्‍याति के अम्बिका प्रसाद दिव्‍य पुरस्‍कारों हेतु पुस्‍तकें आमंत्रित

व्‍यंग्‍य लिखने का रोग

     कांशीपुरी कुंदन

        कहा जाता है कि बुरा ही नहीे बहुत बुरा होता है, व्यंग्य लिखने का रोग, टीवी और दमा भी इस रोग के सामने बौने सिद्ध हो जाते है। एक बार जिसे यह रोग लग जाए मरने के बाद भी उसके व्यंग्य के कीटाणु पाठको को गुदगुदाने, तिलमिलाने के साथ सोचने के लिए मजबूर करता रहता है।
      कभी कभी यह रोग रोगत्व की पराकाष्ठा को पार करते हुए हाथ पैर की शहीदी पर उतर आता है। एक बार हमने डीओजी साहब यानि डाग की गोपनीय चरित्रावली पर व्यंग्य लिख मारा जो मेरा या तथाकथित उस नेता टाइप प्रतिष्ठाहीन सम्भ्रांत नागरिक का दुर्भाग्य था कि वे मेरे द्वारे डंडा लेकर दहाड़ने लगा- निकल बेटा बाहर अभी तेरे को विकलांग कोटे का मौलिक अधिकारी नही बनाया तो मेरा नाम श्री फाकेलाल नही मां की गाली भले नही दे रहा था। पर बेटा बार-बार कह रहा था। हमने लाख समझाने की कोशिश किया जैसे अटल जी ने मुर्सरफ को कि श्री मान मैने आपकी गोपनीय चरित्रावली को व्यंग्य लेकर नही लिखा। आपके पास चरित्र नाम की चीज रहें तब न हमने तो कुत्ते की कलेक्टर पर ईमानदारी पूर्वक प्रकाश डालने का प्रयास किया है क्योंकि इस व्यंग्य में ईमानदारी, वफादारी, खुददारी का जिक्र किया है, जो कुत्ते की खून में पैदाइशी रहता है। पर फांके लाल जी अपनी मुर्गी के एक टांग पर अड़ा धुआंधार शोले उगलते यह तर्क  देने लगा कि कुत्ते की खून में ईमानदारी, वफादारी, खुद्दारी रहता है, इसका मतलब देश के सारे नेताओं के खून में बेईमानी है, वे भ्रष्टाचारी खुदगर्ज हैं उनका खून नहीं पानी है पूज्य नेतागण ईमानदारी वफादारी को क्या माला की तरह खूंटी में टांग कर चलते है आखिर हम भी तो उन्हीं के बताए हुए सद्मार्ग पर चल रहें है तो क्या तुम्हारा व्यंग्य मुझ जैसे समाज सेवी नेताओं का अपमान नहीं है? मैंने बहुतेरे समझाने का प्रयास किया कि आप और कुत्ते में जमीं आसमां का फर्क है सबसे अहम् बात आप दोनों में नस्ल का अंतर है, पर श्री मान फांकेलाल मेरी शवयात्रा निकालने की ठान लिया था। बात को बिगड़ते देख श्रीमती ने बीच बचाव करते हुए जब हंटर वाली तेवर दिखाई तब वह समाजसेवी दुम दबाकर भागते-भागते यह धमकी देते गया कि अगली बार वार्ड मेम्बर का चुनाव जीता तो तुम्हें देख लूंगा।
      ऐसे ही एक और प्रसंग है जिसे स्मरण करना बुरे स्वप्न जैसा है हुआ यूं कि एक कवि सम्मेलन में हमने कविता पढ़ने के पहले यह कहा कि आदरणीय श्रोताओं कृपया शांति के साथ बैठ जाएं हमारा यह कहना गोया अक्ष्म्य अपराध हो गया। तत्काल एक आदमी टाइप गंजे व्यक्ति ने बंदर स्टाइल में छलांग लगाकर मंचासीन होकर चाकू उलहराते हुए दहाड़ने लगा कौन माई के लाल में दम है, जो मेरी पत्नी शांतिबाई के साथ बैठने का दु:साहस करेगा एक एक को फाड़कर नहीं रख दिया तो मैं दहाड़ सिंह घसीटा का जायज औलाद नहीं हमने जैसे मुखिया द्वारा असंतुष्ट नेता को समझाने की बहुतेरे कोशिश किया जाता है वैसे ही लाख प्रयास किया कि मेरे कहने का मतलब आपकी धर्मपत्नी शांतिदेवी से नहीं साइलेन्ट से था पर उस गंजे की बुद्धि तेल  लेने गई थी सो अन्ततोगत्वा मंचस्थ कवियों आयोजकों को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए जैसे रावण सीता जी को घसीटते हुए अपहरण कर लिया था ठीक उसी नक्शे कदम पर अपनी बीवी शांति देवी को घसीटते हुए पलायन कर गया।
      शांतिदेवी को उसके पूज्य पतिदेव अशांत कुमार घसीटा द्धारा घसीटा खाते देखकर महिलाओं पर अत्याचार अन्याय के विरूद्ध जेहाद छेड़ने की गरज से महिला उत्थान पर कु छ लिखना अपना परम कर्तव्य समझकर सरकार को एक अपीलनामा लिखा कि महिलाओं के हितार्थ तत्काल संविधान में संसोधन करके हमारी अपीलनामा को शामिल किया जाए मसलन सरकार महिला उत्थान की ओर ध्यान दें अत्याचार, अनाचार बंद हो। निन्दा पुराण में निपुण बहनों का नागरिक में अभिनन्दन हो साथ ही पति के जेबों की तलाशी लेने का मौलिक अधिकार प्रदान किया जाय जिससे पत्नियों के चेहरे की रंगत खिल उठे। पति घुट-घुट कर जीए या मरे मगर बच्चों तथा किचन की देखभाल करे। महिलाओं को बेचारी, अबला, अनभागन, जैसे सम्बोधन से सम्बोधित न किया जाए बल्कि उसके एवज् में गजगामिनी, बेलनधारिणी, रणचंडिका जैसे अलंकारों से अलंकृत किया जाए। उन्हेंं कभी भी दफतर स्कूल आने जाने, बच्चे या ब्याय फ्रेंड ले जाने की परम्परानुसार छूट दी जाए, पुलिस महिलाओं के साथ सज्जनता से पेश आए। सबसे अहं बात अंग प्रदर्शन के मामले में चाहे  खान दान या मर्यादा की नाक भले कटे मगर अल्प वस्त्र धारण करने की छूट दी जाए। उद्धमी बहनों को उनकी कर्मभूमि में स्वेटर बुनने, प्रेमपत्र लिखने गपशप तथा मेकअप करने की सुविधा घंटेदर घंटे उपलब्ध हो। जागरूक टाइप की देवियों को पड़ोस से लेकर मुहल्ले तक जासूसी करने के लिए विशेष भत्ता अविलम्ब प्रदान किया जाए। जैसे महत्वपूर्ण सुझाव लिख पाया था कि जैसे बाज झपट्टे मारकर शिकार को झपट लेता है वैसे ही श्रीमती जी झपट्टा मारकर अपीलनामा को झपट कर पकड़ने क्या लगी उसका तापमान बढ़ने लगा गठबंधनी सरकार की तरह दाम्पत्य रूपी गठबंधन को तोड़  देने की धमकी देने लगी।
    तुमने अपीलनामा बनाम महिला उत्थान के बहाने मुझ पर व्यंग्य लिखा है, मेरे आत्म सम्मान पर चोंट किया है, यह व्यंग्य नहीं मेरे वजूद पर प्रहार है, मैं कहती हूं यह सम्पूर्ण नारी जगत का अपमान है, मैं तुम्हारी  महिला आयोग के पास शिकायत करूंगी मैं तुमसे इसी वक्त दांपत्स रूपी गठबंधन को तोड़ती हँू। मैंने बड़े मनुहार से अपना विचार रखा प्रिये यह व्यंग्य महिला जाति पर नहीं विसंगति विडम्बना पर चोंट करके समाज में सुधार लाने का एक  सद्प्रयास है। व्यंग्य तो विदु्रपताओं यानि बुराईयों पर लिखा जाता है, तुम में तो मुझे कोई ऐसी अवगुण दृष्टिगोचर नहीं होता है जिस पर व्यंग्य लिखा जाए फिर भला मैं तुम्हारे ऊपर कैसे व्यंग्य लिख सकता हँू। पर वो मेरे अनमोल विचार से सहमत न होते हुए अपनी जिद्द पर अड़ी रही। अन्तत: बच्चों से किचन तक जिम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक निर्वहन करने तथा भविष्य में नारी जगत पर चोंट करने लायक कोई व्यंग्य न लिखने की शर्त पर हमारी सरकार दामपत्य रूपी गठबंधन को गति देने के लिए गतिमान हुई।
     इसीलिए किसी अनुभवी ने सच ही कहा है कि व्यंग्य लिखने का रोग बुरा होता है।

वनवास

राजा सिंह ( राजाराम सिंह )
 
         आज अम्मा का खत आया है। अम्मा खत कभी - कभी ही लिखा करती है, जब लिखना मजबूरी हो जाता है। कहती है - एक तो हमें लिखना नहीं आता, फिर लिखाई कम रुलाई ज्यादा होती है। अम्मा खत लिखते - लिखते रोने लगती है फिर सम्हल कर लिखती है  फिर रोती है। अम्मा की लिखावट ऐसी है जैसे चींटा दवात से निकल कर कागज पर भाग रहा हो। आज वहीं चींटा कागज से उड़कर मेरे जेहन में घूम रहा है। दिल और दीमाग को कुतर - कुतर कर खा रहा है।
अम्मा ने लिखा है - रजुआ, तेरे दादा की तबियत अब मरणासन्न हो गयी है। उनकी आँखें तुम्हें खोजती रहती है। ये तू कौन जनम का बैर चुका रहा है कि उनकी बीमारी की खबर सुनकर भी तेरे खून में तड़पन नहीं होता है।
           मेरा खून .... दादा का खून .... ये खून की ही बात है कि मैं चार साल से घर नहीं गया हूं। दादा का खून बोल रहा है - अगर मेरे खून से पैदा हो तो मेरा मरा मुँह ही देखना ... मेरा खून सुन रहा है। आदेश मना रहा है ... नही, चुनौती स्वीकार कर रहा है। हर बार दीमाग समझाता है। आवेश निकली बात, हृदय की आवाज नहीं होती। मगर खून कुतर्क करता है, दशरथ ने भी राम को वनवास का आदेश हृदय से नहीं दिया था, मगर राम ने उसे निभाया। ओह, तो तुम राम हो ? एक ऐसे राम जिसने खुद को नहीं दशरथ को वनवास दिया है। अम्मा की बीमारी हो या दादा की। छोटी बहन की शादी हो या भतीजे का जन्म दिन, तुम नहीं गये। क्यों? क्योंकि तुम्हें दादा का जिन्दा मुँह नहीं देखना था। वाह, क्या पितृभक्ति है? नहीं, ऐसा नहीं है। मैं चाहता हूं कि दादा सिर्फ दादा एक बार कह दें आने के लिए। इसी इन्तजार में, मैं अभी तक दादा की गम्भीर बीमारी की खबर सुनकर भी अपने आप को रोक रखा है। मगर आखिर कब तक?
- क्यों मिस्टर, किस सोच में डूबे हो? सरो ने बालों में अंगुलियाँ चलाकर बाल बिखरा दिये। हल्की सी सरसराहट होती है, जो बालों से उतर कर दिल में समा जाती है। सरो जब हल्के मूड में होती है तो मुझे मिस्टर ही कहती है।
          मैं एक पल उसके चेहरे को देखता हूं। वही मुस्कुराती आँखें और संतुष्टि का भाव लिए चेहरा। अपनी पत्नी से काफी ईर्ष्या होती है। उसे कभी परेशान एवं बेचैन होते नहीं देखा। किसी काम में हड़बड़ी नहीं। कैसे अपने आप को बचा कर रख पाती है, भीतरी एवं बाहरी दबाओं से? ताज्जुब होता है।
          मैं बिना किसी भूमिका के अम्मा का खत उसकी ओर बढ़ा देता हूं। खुद बुरी तरह अनिर्णय की स्थिति में अपना सर थामें बैठा रहता हूं। सरिता पत्र एक सांस में पढ़ जाती है।
- क्या सोचा है राजी? सरो का चेहरा हल्के तनाव में लगता है। मैं अभी भी अनिर्णय की स्थिति से उबर नहीं पाया हूं। अपना प्रश्नवाचक चेहरा उसकी तरफ उठा देता हूं।
- सोचने का वक्त नहीं है, राजी। जिद उतनी ही अच्छी होती है, जितनी की अपने अहं को संतुष्टि मिलती हो। उसे  जिद से क्या फायदा जिससे न केवल दूसरों को कष्ट पहुंचे बल्कि अपनी आत्मा भी धिक्कारे। मैं तुम से पहले भी ...। धीमी, शांत एवं गहरी आवाज। जिससे निकलते हैं नपे - तुले एवं वजनी शब्द। जिनकी काट मेरे लिए काफी मुश्किल का काम होता है। ऐसे समय जबकि मैं काफी दुखी एवं पस्त था, उसका समझाना मेरे भीतर छायी अवसाद की काली छाया को और गहन करता और मुझे अपराध - बोध की ओर ले जा रहा था। मैं बीच में ही बोल पड़ा - ऐसी बात नहीं है सरो। मैं जाने की ही सोच रहा हूं। सोचकर हिम्मत नहीं होती है। कहीं कुछ वैसा दुबारा न घटित हो जाय। मेरे भीतर आँसुओं का रेला चला था जिसे मैंने जबरदस्ती आँखों से पहले ही रोक लिया था मगर चेहरा शायद मेरी यातना कह गया था।
          सरिता घुटने के बल फर्श में बैठ गयी। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। आँखों में दर्द की अनुभूति थी - राजी, अगर मैंने तुम्हें अपमानित एवं प्रताड़ित होते नहीं देखा तो क्या महसूस भी नहीं कर सकती हूं? मगर इस समय सब पुरानी बातों को भूल जाया जया तो बेहतर रहेगा। इस समय उन्हें हमारी जरुरत है और हमें जाना चाहिए। चलो, तैयार हो जावो।
          सरिता चली गयी थी। निश्चय ही मेरी यात्रा की तैयारी करने। मैं पलंग में निस्तेज पसरा हुआ था। अतीत चक्कर पर चक्कर लगा रहा था और मेरे अपनों से विमुख कर रहा था। वर्तमान कशिश बनकर मूर्तरुप में मेरे सामने खड़ा था और खींच रहा था मेरे अपनों की तरफ? रस्साकसी हो रही थी अतीत एवं वर्तमान के बीच।
- अरे, तुम अभी तक तैयार नहीं हुए। सरो को देखता हूं, देखता ही रह जाता हूं। शायद रोकर आयी है। आँसुओं से धुला हुआ चेहरा। शायद अपराध - बोध से ग्रसित होता उसका चेहरा। अपने को रोकता हूं। मेरे अंदर कहीं कुछ ऐसा नहीं है कि मुझे सरिता को लेकर कभी पछतावा हुआ हो। फिर सरिता ही ऐसी क्यों लग रही है?
          सरिता एक आवश्यकता है मेरे लिए। उससे बेहद प्रभावित हूं। उसके दो टूक निर्णय लेने की क्षमता का मैं कायल हूं। साफ और बेलाग विचारधारा और उसी अनुरुप उसका आचरण। कभी - कभी सोचता हूं - सरो में क्या कमी है? सोच नहीं पाता हूं। सरिता के विशाल व्यक्तित्व में समाता चला जाता हूं।
          मेरा नाम सरिता कोरी है। कालेज के दिनों में डंके की चोट पर अपना और अपनी जाति का परिचय  देती हुई दबंग लड़की। पढ़ाई में जहीन और कालेज के हर समारोह की जान। जिसके आस - पास मंडराने के लिए तथाकथित उच्च जाति के लड़के बहाना खोजा करते थे और उन्हें बुरी तरह लताड़ती एवं फटकारती सरिता कोरी। मेरी तो उसको देखते ही हालत खराब हो जाया करती थी। एक तो उसका बहुुमुखी मुखर व्यक्तित्व का रौब ऊपर से बेमिशा हुश्न, दोनों मिलकर मेरे भीतर दहशत पैदा किया करते थे। उसको देखकर काश ... सोचने वाला एवं आहें भरने वाला मैं भी था। आज वही मेरी पत्नी के रुप में मेरे साथ है। पता नहीं सरिता कोरी ने मेरे में क्या देखा की मेरे जैसे दब्बू से घुलती चली गयी और अंत में कुमारी सरिता कोरी से मिसेज राजीव सिंह बन गयी। एक दिन मैंने पूछा तो सरो ने बताया - राजी, तम्हीं ऐसे थे जो मेरे तलुवे सहलाने को आतुर नहीं रहते थे। स्वाभाविक है तुममें कुछ ऐसा अपना था, जो औरों में नहीं था। सरो, सरिता मुझे बिस्तर को छोड़ कर कभी - कभी पत्नी नहीं नजर आती है। सिर्फ एक सच्ची दोस्त ही लगती है।
- राजी एक बात कहूं? मैं तुम्हारे साथ चलना चाहती हूं।
- ऐं ... ये क्या कह रही है सरो? आवाक सा देखता रह जाता हूं। उसकी आँखों में टटोलने लग जाता हूं। उसकी कही बातों का अर्थ? सरो, उस घर में जाने को कह रही है जहां उसके साथ सम्बंध होने की वजह से ही अपने लड़के को पनाह नहीं लेने दी। सारे संबंध मृत हो गये थे। मेरे एक निर्णय से मेरे घर में भूचाल आ गया था। दादा की तानाशाही सत्ता को पहली बार चुनौती मिली थी।
          दादा बेचैनी से टहल रहे हैं। आँखों एवं पोर - पोर से चिनगारियाँ छूट रही है। बार - बार उनका हाथ लाठी की चांदी वाली मूठ पर चला जाता है मगर पता नहीं क्यों वापस हो जाता है? गालियों की अनवरत श्रृंखला जारी है। जिसका निशाना मैं कम, सरो ज्यादा बन रही है। मैं सामने दीवाल से टेक लगाये खड़ा हूं। अम्मा जमीन में बैठी है। पति और बेटे की हरकतों को सशंकित दृष्टि से निहारते हुए। किसी भावी आशंका से भयभीत उनका चेहरा सहमा सा लग रहा है। बाहर बरामदे में भइया भाभी एवं गुड़िया बैठी है। अपलक कमरे की ओर आँख और कान लगाये। जिनके लिए दादा की इच्छा के सामने सर झुका देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। घर के सभी लोग ये मानते हैं कि माँ - बाप जो कुछ करते हैं अपने बच्चों के भले के लिए ही करते हैं। भगवान जो कुछ करता है अच्छा ही करता है। इस बात से मुझे भी इन्कार नहीं है। मगर मैं ये भी मानता हूं कि हर मामले में माँ - बाप ही सही होगें, जरुरी नहीं है। बच्चे भी अपने लिए बेहतर सोच सकते हैं। कर सकते हैं।
          दादा गरज रहे हैं - रंडी, कुतिया के चक्कर में पड़ा है साला घोंचू। सरो, सरिता रंडी है। कुतिया है। शब्द कान में प्रवेश करते हैं और शरीर की धमनियाँ और शिराओ में फैलते चले जाते हैं। खून उबल - उबल कर निकलने लगता है और हाथों की पोरों में इकठ्ठा होने लगता है। ऐसा लगता है कि हाथ लोहे के हो गये हैं। दादा, दादा नहीं लगते हैं। सामने सिर्फ नजर आता है सरो, सरिता का दुश्मन। रोम - रोम से घृणा का सैलाब धकियाता है सामने खड़े व्यक्ति का गला घोंट देने के लिए। आंखें सामने गला देखती है फिर मुड़ती है। अम्मा का झक सफेद कपड़े के मानिंद चेहरा देखती है। शर्मिंदगी की एक लहर उठती है जो आँखों से प्रवेश करके शरीर में उतर जाती है। शरीर का सारा खून पानी बन जाता है। असहायता के बोझ के कारण शरीर दोहरा होता चला जाता है। मैं उसी कोने में लद्द सा गिर पड़ता हूं। अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपाये।
          दादा एक पल रुकते हैं। देखते हैं, फिर चालू हो जाते हैं- चोप्पा कहीं का? कुछ बोलता नहीं है और हरकतें ऐसी करता है कि बड़ों - बड़ों के कान काट ले। सूर्यवंशी ठाकुर की औलाद, चमार से शादी करेगें। हिस्स ... थूं ....और जमीन पर थूक देते हैं .... बदजात शर्म, हया सब मर गयी है।
- क्या चमारों में खून नहीं होता? या फिर उनका खून दोयम दर्जे का होता है? उनके संस्कार किसी उच्च जाति के लड़की से कम नहीं होते। मेरी आत्मा एवं पढ़ाई एक साथ बोल उठती है।
- मादर ... ज्ञान बघारता है। दादा रौद्र रुप में आ गये थे। उनकी एक लात उठी थी, मेरे शरीर को गड्ड - मड्ड कर देने के लिए कि बीच में अम्मा आ गयी। दादा की लात लहराती रह गयी और फिर वापस। भइया, भाभी एवं गुड़िया भाग कर कमरे में आ गये थे। किसी अनहोनी को टालने की गर्ज से। अब दादा की गालियों का प्रकोप अम्मा पर कहर बनकर टूट रहा था। सब मुझे घेरे बैठे थे। दादा कमरे से बाहर निकल गये थे ....।
- ऐं, क्या सोचने लगे ? सरो की आवाज आती है और दीमाग को झकझोर कर रख देती है। मैंने कहा - चाहता तो मैं भी हूं सरो कि तुम साथ चलो। कम से कम एक बार घर वाले तुम्हें देख ले, बात कर लें तो उनकी जातिगत वैशिष्टता का काला जाला साफ हो सके। मगर ...।
- अगर - मगर कुछ नहीं। मैं नहीं मानती तुम्हारे घर वाले तुमसे अलग नेचर के होगें। हमें उनका विश्वास जीतना चाहिए। फिर राजी, अगर उन लोगों ने हमारा तिरस्कार किया है तो हम लोगों ने भी उनकी घृणा एवं तिरस्कार का जवाब उसी भाषा में नहीं दिया है क्या ? सोचो और सोच कर देखो। क्या हम लोगों ने इस दिशा में कोई प्रयत्न किया है कि उनकी घृणा एवं तिरस्कार को कम किया जाय? नि:संदेह नहीं। राजी, बच्चे के पैदा होते ही मानव उससे अपेक्षायें एवं कल्पनाएं करने लगता है और उनसे जुड़ी सुख - सुविधाओं से अपने भविष्य को सजाता है। सदैव उसी के अनुरुप उनका प्रयास रहता है। इसलिये अपने एवं समाज के संस्कार लादने लगता है। जब कोई बच्चा उसकी अपेक्षाओं एवं कल्पनाओं के विपरीत आचरण करता है। उनके संस्कारों को ठोकर मारता है तो उस व्यक्ति का तिलमिलाना स्वाभाविक ही है। ये व्यक्ति विशेष एवं उसके संस्कारों पर निर्भर करता है कि उसकी अपने विद्रोही लड़के के प्रति क्या प्रतिक्रिया होती, कितनी गहरी एवं व्यापक ? फिर भी कोई व्यक्ति सदैव उसी तिक्तता से नहीं रह सकता जितनी भावनाओं के चोट पहुँचने के समय होती है। गैरों के साथ तो ये भी कुछ हद तक सम्भव है परन्तु अपन खून के प्रति ऐसा सम्भव नहीं हो पाता है। सरो अपनी बात कह चुकी थी और मुझे वर्षों पीछे ढकेल गई थी।
          मैं देख रहा हूं, दादा मेरी अँगुली थामें सारे गाँव में घूम रहे हैं। सबसे कह रहे हैं - रजुआ को मैं डाक्टर बनाऊंगा। एक ऊंचे दर्जे का डाक्टर। बड़कवा तो कुछ खास पढ़ नहीं पायेगा। कुछ दीमाग बोदा लगता है। उसके लिये खेती - बाड़ी ठीक रहेगी। आखिर कोई न कोई तो इस जायदाद को सम्हालने वाला चाहिए.. दादा मिठाई बाँट रहे हैं। उसके अच्छे नम्बरों से पास होने पर ... याद आता है ... रात - भर खुशी में रंडी का नाच होता रहा था।
          एक उमस - सी महसूस होती है। लगता है - इस उमस में मैं घुटकर मर जाऊंगा ... दादा कह रहे हैं - रजुआ की शादी अपने से भी ऊँचे खानदान में करुँगा और दहेज ... हंस पड़ते हैं। जिस साले की हजार दफे गरज होगी, देकर शादी करेगा। जी भर के लूंगा। मेरी रजुआ एकदम अंग्रेज लगता है। एकदम राजों - महराजों जैसा .....।
          दादा का अपने प्रति लगाव सालने लगता है। वही रजुआ आज उससे रुठा बैठा है। भावनाओं का ज्वार प्रबल हो उठता है। मैं एक झटके से उठ बैठता हूं। एक नजर सरो की तरफ देखता हूं और उसकी तौलती नजरों का शिकार हो जाता हूं।
          मैं हथियार डाल देता हूं। परन्तु आत्म - समर्पण करने वाले के दिल में जो भाव होते हैं वे फिर आखिरी क्षण प्रकट हो उठते हैं। मगर, सरों कहीं तुम्हारे कयाश झूठे पड़ गये और तुम्हारे साथ भी ऐसा - वैसा कुछ हो गया जिसकी मैं आशंका करता हूं तो मैं सह नहीं पाऊंगा। और कुछ गलत - सलत हो गया तो न मैं अपने आप को माफ कर पाऊंगा ना ही तुम अपने को।
- हौसला रखो राजी, ऐसा कुछ नहीं होगा जिसकी आशंका से तुम ग्रसित हो। जहां आपदायें डेरा डाली पड़ी हो वहां झूठी मानसिकतायें कहां टिकती है? फिर तुम मेरे लिये इतनी ताड़ना - प्रताड़ना सह सकते हो तो मैं क्यों नहीं? आखिर अनागत के प्रति विषाद क्यों?
          मेरे अंदर कुछ पिघलने लगा था। कड़ुवाहट घुल रही थी। सरो के प्रति कृतज्ञता का भाव भर आया था। उसके उदार दिल - दीमाग ने मेरी सारी नसें ढीली कर दी थी। हम दोनों गाँव जाने की तैयारी करने लगे थे...।
पता
एम - 1285, सेक्टर - आई
एल.डी.ए. कालोनी
कानपुर रोड, लखनऊ - 226012
मोबा. 09415200724
मेल :  raja.singh1312@gmail.com

शनिवार, 28 मई 2016

नव संवत्सर आ गया

मनोज कुमार शुक्‍ल '' मनोज ''

नव संवत्सर आ गया, खुशियाँ लाया द्वार ।
सभी लोग खुश हो रहे, दें बधाई उपहार ।।

ब्रम्हा ने जब सृष्टि की, रचना की प्रारम्भ ।
नव संवत्सर है गढ़ा, सतयुग से आरम्भ ।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को, आता है नव वर्ष।
धरा प्रकृति मौसम हवा, मन को करता हर्ष ।।

नवमी में जन्मे प्रभु ,अवध पुरी के राम ।
राजपाट कर बन गये, आदर्शों के धाम ।।

नगर अयोद्धा में रहा, हरषित हर पल छिन ।
राज तिलक प्रभु का हुआ, नव रात्रि शुभ दिन ।।
 
सूर्यवंश के राज्य से, रोशन हुआ जहान ।
चक्रवर्ती राजा बने, विक्रमादित्य महान ।।

राज्य सुरक्षा में निपुण, चर्चित रहे सम्राट ।
शक हूणों औ यवन से, रक्षित किया यह राष्ट्र।।

प्रजा पालक थे अमर, न्याय प्रिय सरताज ।
विक्रम सम्वत् नाम से, गणना का आगाज ।।

माँ देवी की अर्चना, वंदन औ फलाहार ।।
आज दिवस गुड़ि पाड़वा, चेटी चंड त्योहार ।

पता-
58, आशीष दीप उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर ( म.प्र.)

बेईमान के मुड़ म पागा


वीरेन्‍द्र  ' सरल '
        इंटरनेट के माध्यम से राजभाषा छत्तीसगढ़ी को विश्व स्तर पर मान- सम्मान दिलाने के लिए सतत प्रयत्नशील सुप्रसिद्ध ब्लागर भाई संजीव तिवारी ने अपनी किताब बियंग के रंग के प्रकाशन के पूर्व दूरभाष पर सामान्य चर्चा करते हुए मुझसे पूछा कि आजकल हिन्दी व्यंग्य के क्षेत्र में आपका नाम चर्चा में आ गया है साथ ही साथ आप छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखन भी करते है क्या आप मुझे बताना चाहेंगे कि छत्तीसगढ़ी व्यंग्य में आप अपना प्रिय छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखक किसे मानते है। प्रश्न सुनकर मैं असमंजस में पड़ गया। मैने कहा संजीव भाई मैं छत्तीसगढ़ी साहित्य के विद्वानों से अपनी धृष्टता के लिए क्षमा चाहते हुए बहुत विनम्रतापूर्वक आपसे कहना चाहूंगा कि अभी मेरा अध्ययन का फलक बहुत छोटा और साहित्यिक अनुभव भी बहुत कम है। फिर भी परसाई, जोशी, त्यागी और घोंघी को पढ़ते हुए अब तक मैं व्यंग्य के भाव और भंगीमा को जितना समझ पाया हूँ उसके आधार पर अभी किसी को भी अपना प्रिय छत्तीसगढ़ी व्यंग्य लेखक कहने की स्थिति में नहीं हूँ। इसके लिए आप मुझे क्षमा करें। अभी तक मैंने जो भी छत्तीसगढ़ी व्यंग्य की रचना पढ़ी है उसमें अधिकतर को हास्य से ज्यादा करीब पाया है। विद्वान व्यंग्य लेखकों का कहना है कि व्यंग्य का मूल करूणा है। कभी भी दलित, शोषित, पीड़ित वर्ग पर व्यंग्य नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि व्यंग्य का उपयोग विसंगतियों और विद्रुपताओं पर प्रहार करने के लिए होना चाहिए। व्यंग्य किसी भी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधने का माध्यम नहीं बल्कि प्रवृतियों पर प्रहार करने का हथियार है। एक सुप्रसिद्ध व्यंगकार ने मेरी पहली किताब पढ़ने के बाद मुझे हास्य और व्यंग्य का अंतर समझाते हुए कहा है कि हास्य किसी फिल्म का कमेडियन होता है जो तात्कालीक मनोरंजन करता है पर व्यंग्य फिल्म के नायक के समान होता है जो बुराईयों से लड़ता है। समाज में चेतना का संचार करता है। मनुष्य को सोचने के लिए बाध्य करता है। व्यंग्य लेखन करना मतलब गुंगे की भावना को वाणी देना है। आम आदमी की पीड़ा को अभिव्यक्त करना है।
    मगर अभी-अभी मुझे काशीपुरी कुन्दन जी का छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह बेईमान के मुड़ी म पागा पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसे पढ़कर  हार्दिक प्रसन्नता हुई और लगने लगा है कि छत्तीसगढ़ी व्यंग्य में मैं अब तक जिन चीजों को तलाश रहा था वह इस संग्रह में पाया है। अब सोचता हूँ कि यदि संजीव भाई मुझे कभी फिर पूछे के छत्तीसगढ़ी व्यंग्य में आप अपना प्रिय लेखक किसे मानते है तो मैं भाई कांशीपुरी कुन्दन जी का नाम सम्मान से ले सकता हँू क्योंकि इस संग्रह की प्रत्येक रचना सोद्देश्य है और समाज की किसी न किसी विसंगति की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर उस पर चिंतन करने के लिए प्ररित करती है। वैसे भी कुन्दन जी का नाम हिन्दी व्यंग्य में काफी जाना-पहचाना नाम है। उनकी लेखनी निरन्तर चलकर साहित्य में व्यंग्य विधा को समृद्ध करती आ रही है। मुर्दो का प्रीति भोज हास्य व्यंग्य काव्य संकलन, दूल्हे बाजार की सैर व्यंग्य संकलन, भ्रष्टाचार के शलाका पुरूष व्यंग्य संकलन तथा बेईमान के मुड़ न पागा छत्तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह उनकी लेखनी की निरन्तरता का प्रमाण है।
    बेईमान के मुड़ी म पागा को आधुनिक समाज का एक्स-रे रिपोर्ट कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा। आज देश और समाज हर क्षेत्र में झूठे सब्जबाग दिखाकर नेतृत्व हथियाने की होड़ मची है। आम आदमी दिगभ्रमित हो गया है कि इसमें असली कौन और नकली कौन? इसी कारण से आज तक आम आदमी छला जा रहा है जिसको भी वह अपना हितैषी समझकर नेतृत्व की बागडोर सौपता है वहीं सिंहासन मिलते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेता है और वह ठगा रह जाता है। ठगा हुआ आम आदमी हाथ मलते और सिर धुनते हुए गहरी सांस लेकर जो पहला वाक्य बोलता है वह होता है फिर बेईमान के मुड़ी म पागा।
     इस संग्रह में अभिमन्यु कर तरह भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फँसे आदमी कर छटपटाहट है। आज भ्रष्टाचारियों के हौसले इतने बुलंद है कि वे छोटे-छोटे कार्यो के लिए भी वे आम आदमी से बेखौफ रूपये ऐंठ लेते हैं। ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी के लिए प्रताड़ित होना पड़ता है। चमचागिरी और पैसे के बल पर अयोग्य आदमी उच्च स्थान प्राप्त कर लेता है और योग्य आदमी अपनी लाचारी के कारण खून के आंसू रोने के लिए मजबूर हो जाता है। महापुरूषों के सपनों का भारत पता नहीं कहाँ खो गया है। तइहा के बात ला बइहा लेगे और गांधी चौक म भट्टी खुलगे इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति है। निबंधात्मक, पत्रात्मक और कथात्मक शैली में लिखे गये संग्रह के व्यंग्यों में  कहीं बेरोजगार की पीड़ा है, तो कहीं दहेज लोभियों के चंगुल में फँसे बाबुल की अपनी इज्जत बचाने की कवायद। कहीं ईमानदार शिक्षक की व्यथा है तो कहीं महंगाई की मार से अपनी कमर सहलाते हुए आम आदमी की कथा।
     वैसे तो संग्रह की प्रत्येक रचना में किसी न किसी समाजिक, राजनीतिक या धार्मिक विसंगतियों पर प्रहार है पर भिखमंगा शीर्षक से प्रकाशित व्यंग्य को मैं व्यक्तित्व के रूप से सर्वाधिक उल्लेखनीय रचना मानता हूँ क्योंकि अपने ही वर्ग का, अपने ही भाई- बान्धवों को आइना दिखाना, अपने समाज की कुरीतियों एवं रूढ़ियों की आलोचना करना दुश्कर और साहसिक कार्य है। कुंदन जी के भीतर के ईमानदार व्यंग्यकार ने इस साहसिक कार्य को इस व्यंग्य के माध्यम से कर दिखाया है। धर्म के आड़ लेकर लोगों को बेवकूफ बनाकर भिख मांगने वाले पंडो पर कटाक्ष करते हुए व्यंग्यकार जो लिखते है उनका आशय है कि अपने परिवार के भी मृत सदस्य की अस्थि विसर्जन के लिए किसी धार्मिक स्थल पर जाओ तो वहां पंडे  और पुजारी लोग किसी काटखाने वाले कुत्ते के समान घेर कर खड़े हो जाते है और कहते है कि तुम्हारे पूर्वज ऊपर में तड़प रहे है। बिना पिंडदान कराये उनकी आत्मा को शांति नहीं मिल सकती। इस तरह के धार्मिक भावनाओं के माध्यम से यजमानों को अपनी लूट का शिकार बनाते है। स्थिति यह हो जाती है कि अपने पितरों की मुक्ति के चक्कर में यजमान स्वयं को इनके हाथों इतना लूटा जाते है कि उनको स्वयं ही भिखमंगे की तरह जीवन यापन करने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है। यह तो केवल बानगी है। ऐसे ही व्यंग्य बाणों से यह संग्रह परिपूर्ण है। जो हमारी चेतना को झकझोर कर हमें सोचने के लिए बाध्य करता है। ईमानदारी व्यंग्य लेखन के लिए कुन्दन जी को हार्दिक बधाई।

पता
बोड़रा ( मगरलोड )
जिला - धमतरी ( छ.ग.)

गरजत.घुमरत आबे रे बादर

सुशील भोले

गरजत.घुमरत आबे रे बादर, मया.पिरित बरसाबे
मोर धनहा ह आस जोहत हेए नंगत के हरसाबे... रे बादर....
जेठ - बइसाख के हरर - हरर म, धरती ह अगियागे
अंग - अंग ले अगनी निकलत हे, छाती घलो करियागे
आंखी फरकावत झुमरत आके, जिवरा ल जुड़वाबे ... रे बादर...
तरिया - नंदिया अउ डबरी ह, सोक - सोक ले सुखागे हे
कब के छोड़े बिरहिन सही, निच्चट तो अइलागे हे
बाजा घड़कावत आके तैं हए फेर गाभिन कर देबे ... रे बादर....
जीव- जंतु अउ चिरई.चिरगुनए ताला - बेली होगे हें
तोर अगोरा म बइठे - बइठे, अधमरहा कस होगे हेंं
जिनगी दे बर फिर से तैं हए अमरित बूंद पियाबे ... रे बादर...
नांगर - बक्खर के साज - संवांगा, कर डारे हावय किसान
खातू पलागे गाड़ा थिरागे, अक्ती म जमवा डारे हे धान
अब तो भइगे आके तैं ह, अरा - ररा करवाबे... रे बादर...

संजय नगर, रायपुर ( छ.ग.)
मोबा. नं.  98269.92811, 80853.05931

नहीं भूल पायी

     भावसिंह हिरवानी

आफीस से लौटा नरेन्द्र अभी सोफे पर बैठा ही था कि दरवाजे पर लगी घंटी घनाघन उठी, जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने एक युवती को खड़ी देख हैरान रह गया।
   आशा, तुम,? अनायास ही उसके मुंह से निकला था।
 हां, मैं। क्या भीतर आने को भी नहीं कहोगे? स्मित हास्य बिखेरती आशा बोली थी।
  आओ, आओ न। वह हड़बड़ा कर दरवाजे से हट गया और आशा भीतर आ गई। उसकी इस अप्रत्याशित उपस्थिति से नरेन्द्र रोमांचित हो उठा था। वर्षो बाद मिलने की खुशी दोनों के चेहरों पर चमक रही थी। उसे बैठने का इशारा करके वह तत्काल खिड़की के पास पहुंच गया, जैसे ही उसने खिड़की खोली ताजा हवा का एक झोंका प्रवेश कर गया।
   आशा मन ही मन मुस्कुरा उठी, शुक्र है, नरेन्द्र को आज भी उसकी आदतें याद है।
   बाहर शाम का धुंधलका घिरने लगा था। वह स्वीच आन करके आशा के सामने बैठ गया। क्षण भर के लिए उन दोनों के बीच एक गहरा सन्नाटा पसर गया। वर्षो बाद मिले थे फिर भी शब्दों का टोटा हो गया था। दोनों एक दूसरे को अपलक निहारते मूक बैठे रहे। जहां आंखे बोलती है, शायद वहां शब्दों की अहमियत नहीं रह जाती।
    आशा के माथे पर बिन्दी चमक रही थी, पर मांग में सिंदूर नहीं था। तो क्या आशा उसकी प्रतीक्षा ही करती रह गयी, भीतर एक हूक- सा उठा और वह तड़फ कर रह गया। उसने देखा था, आशा के गालों की लालिमा फिकी पड़ गई है और होठों पर सदा मचलने वाली खनकती हंसी कहीं गुम हो गई है। इसके अतिरिक्त एक नैराश्य जन्य पीड़ा ने अपना अधिकार जमा लिया है। आंखो के नीचे दोनो ओर फैली हल्की स्याह निशानी उसके चिंताग्रस्त अव्यवस्थित जीवन की कहानी कह रही है।
      उसकी हालत देख नरेन्द्र स्वयं एक अपराध बोध की पीड़ा से छटपटा उठा। सब कुछ देख- सुन कर भी किस मुंह से कुशल क्षेम पूछे। फिर भी उसके विषय में सब कुछ जान लेने को मन व्याकुल था।
     कैसी हो आशा? व्यथित स्वर में पूछा था उसने।
     ठीक ही हूं, बाबू जी एम एम आई में भर्ती हैं। उन्हीं की सेवा टहल के लिए आयी हूं। तुम कैसे हो? और सब कहां है? आशा अपनी आतुरता छुपा नहीं पायी थी।
    तुमसे अलग होने के बाद इस जीवन की धारा में बहुत पानी बह गया आशा। इस अंतराल में मैंने पूरी जिंदगी जी ली। मुसाफिर की तरह जो भी मिले, बिछुड़ गये। बस, मैं हूं और मेरा अकेलापन है। मेरे साथ यहां कोई नहीं रहता। बोझिल और उदासी में डूबे शब्द उसके अंतस की पीड़ा को अनावृत कर गये थे, क्या हुआ है, बाबू जी को?
    अटैक आया है। मुझे लेकर हमेशा चिंतित रहते है, उसी का नतीजा है। बहुत कहा मेरी चिंता छोड़ दें, पर मानते ही नहीं। आशा चिंतित स्वर में बोली थी।
    आशा मैं बाबू जी से मिलना चाहता हूं। मेरे अपराध की सजा वे स्वयं को क्यों दे रहें है? और तुम भी क्यों नहीं भूल पायी मुझे? क्यों मुझे याद करके खुद को सजा देती रही? मैं तो अपने ही दुखों से दुखी था आशा। तुम सब के गुनहगार होने का बोझ कैसे बर्दास्त कर पाऊंगा? नरेन्द्र भीतर तक भीग गया था।
    हां नरेन्द्र, यह सच है। मैं तुम्हारा वादा नहीं भूल सकी।  न तुम्हारा वह थप्पड़ ही भूल पायी, जिसकर वजह से मैं तुम्हारे हाथों बिना मोल बिक गई थी। तुम्हारा वह जवाब कितना करारा और अचूक था नरेन्द्र, सीधे दिल की गहराई में उतर गया था। उसे अपने अंतस से कुछ टूट कर बिखरता- सा महसूस हुआ था।
    आशा उस घटना को याद दिलाकर क्यों लज्जित कर रही हो मुझे? नरेन्द्र ने संजीदगी से कहा था।
    नरेन्द्र वह तो मेरे जीवन की सबसे अहम घटना था। जब भी मेरी ओर कोई दूसरा हाथ बढ़ा, तुम्हारा वह थप्पड़  मेरी आंखो के आगे एक प्रश्न चिन्ह की तरह खड़ा हो गया। नरेन्द्र लौटकर आयेगा तो क्या जवाब दोगी? यही कि मैं परायी हो गयी। और मैं एक अटूट विश्वास लिए जीती रही कि मेरा नरेन्द्र एक दिन जरूर लौटेगा। पर तुम नहीं आए। उसने अपनी गीली हो गयी आंखों को पल्लू के छोर से पोंछ लिया था।
    पगली हो तुम, पगली। क्या कोई इस तरह सारी जिंदगी किसी के इंतजार में बैठा रह जाता है? माना मैंने वादा किया था, पर जिंदगी में प्यार ही सब कुछ नहीं होता। जब नहीं लौटा तो क्यों नहीं तुमने अपनी जिंदगी संवारने की कोशिश की, जैसे मैं वक्त के साथ चल पड़ा। यह अलग बात है कि मैं भी तुम्हें नहीं भूल पाया। सब कुछ तो आंखो के सामने जस का तस तैर जाता है, जैसे बीते कल की बात हो। नरेन्द्र ने कहा और दोनों स्मृति के भरोसे में झांकते हुए वर्षो पीछे पहुंच गये थे।
    यह जगदलपुर के दलपत सागर पारा की एक गली है। यहीं पर उन दोनों का प्यार परवान चढ़ा था। आमने- सामने खड़े उन दोनों मकानों में नरेन्द्र के पापा और आशा के माता पिता रहते थे। नरेन्द्र की मां रायपुर के एक हाईस्कूल में प्रिंसिपल होकर चली गई थी। नरेन्द्र अपने पापा के साथ ही रहता था। सहपाठी होने के साथ एक ही गली में रहने के कारण उन दोनों का मेल जोल काफी बढ़ गया। धीरे धीेरे उनकी घनिष्ठता बढ़ती चली गई और वे मन ही मन एक दूसरे को चाहने लगे। दोनों के परिवार वाले उनकी इस चाहत से बेखबर थे। तभी एक घटना घट गयी और उनका प्यार उजागर हो गया।
    यह उन दिनों की बात है, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सारा देश सिक्ख विरोधी दंगों की आग में झुलस रहा था। वह दिसंबर की एक शाम थी। छुट्टी के बाद आशा बाजार चली गई और नरेन्द्र स्कूूल से सीधा घर लौट आया। अभी उसे शापिंग करते कुछ ही समय बीता था कि दंगा भड़क जाने के कारण शहर में कर्फयू लग गया।
    पुलिस गाड़ी लाउडस्पीकर में एनाउन्स करती सारे शहर में दौड़ रही थी। देखते ही देखते चारों ओर अफरा- तफरी मच गई। लोग जान बचाकर बेतहाशा अपने-अपने घरों की ओर दौड़ने लगे। धड़ाधड़ सारी दुकाने बंद हो गई। डर और घबराहट के कारण उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। हताश, हक्की- बक्की वह बाजार के एक कोने में खड़ी रोने लगी।
    थोड़ी देर बाद वहां सायकल में उसे ढूंढता हुआ नरेन्द्र आ पहुंचा। उसने तुरंत हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा था, यहां मरने के लिए क्यों खड़ी है? चल जल्दी।
मगर तुम क्यों अपनी जान जोखिम में डालकर यहां आये हो? सिसकियों के बीच उसने पूछा था।
बकबक करने का वक्त नहीं है जल्दी चल। वह तैश में आ गया था।
 नहीं पहले बताओ आशा अड़ गई थी।
तो ले। जवाब में एक करारा तमाचा जड़ दिया था उसने। फिर उसे खींचकर सायकल में बैठाया था।
आशा घसीटती हुई सायकल के कैरियर पर बैठ गई थी। उसके दोनों आंखों में आंसम भर आये थे। कारण उसका थप्पड़ था, या उसके प्यार  की गहराई की अनुभूति, कहना मुश्किल है। वह दोनों हाथों में कसकर नरेन्द्र को पकड़ पूरे रास्ते उसकी पीठ पर सिर टिकाये बैठी रही। नरेन्द्र पुलिस के बीच से बचते- बचते तेजी से सायकल चलाकर उसे घर ले आया था। भीतर पहुंचते ही दोनों भावातिरेक में बिना कुछ बोले एक दूसरे से लिपट गये थे।
    मौन अभिव्यक्ति के आगे शब्द कितने बौने हो जाते हैं, इसका एहसास ऐसे ही क्षणों में होता है। मौत के साये से वापस लौटे बच्चों को देखकर आशा के माता- पिता विव्हल हो गये थे। उनके मन में नरेन्द्र के प्रति कृतज्ञता के साथ- साथ वात्सल्य का भाव उमड़ आया। मना करने के बावजूद नरेन्द्र कर्फयू के बीच आशा को ढूंढने निकल गया था।  लेकिन इस घटना के बाद नरेन्द्र के पापा की भृकुटी तन गई थी। मगर दोनों दिन दुनिया से बेखबर भविष्य के सपने संजोने लगे रहे।
   आखिर उनके बिछुड़ने का दिन भी आ गया।कुशाग्र बुद्धि नरेन्द्र का सिलेक्सन एरोनाटिक्स में ट्रेंनिंग के लिए हो जाने के कारण दोनों बेहद खुश थे। वहां से निकलते ही नौकरी पक्की थी। फिर हवाई जहाज में उड़ने की कल्पना ही अत्यंत रोमांचक और आल्हादकारी थी। फिर भी नरेन्द्र से बिछुड़ते हुए आशा अधीर हो उठी थी, नरेन्द्र, मुझे भूल तो नहीं जाओगे?
   ऐसा कहोगी, तो मैं फिर एक थप्पड़ जड़ दूंगा। नरेन्द्र ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा था, पोस्टिंग होते ही मैं आकर तुम्हें ले जाऊंगा। मेरी प्रतिक्षा करना। नरेन्द्र वादा करके चला गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
   अचानक दरवाजे की घंटी फिर बज उठी तो वे वर्तमान में लौट आये। उन्होंने देखा, धड़धड़ाती हुई अमृता भीतर आ गई थी, दीदी आप यहां है, मैं तो आपको ढूंढते- ढूंढते परेशान हो गई थी। क्या आप दोनों पूर्व परिचित है? एक ही सांस में बोल गई थी वह।
   हां, हम दोनों एक ही साथ, एक ही स्कूल में पढ़ते थे। नरेन्द्र ने मुस्कुराकर जवाब दिया था।
   अच्छा ़ ़ ़ दीदी, ये भैया कहीं वही तो नहीं ़ ़ ़। आश्चर्य मिश्रित खुशी से अमृता ने इशारा किया था।
    चुप्प। आशा के गालों पर लालिमा दौड़ गई थी।
   कोई बात नहीं दीदी, मैं तो आपको चाय के लिए ढूंढ रही थी। लेकिन अब आप यहीं चाय पीना। मैं जाती हूं। टिफिन तैयार होने के बाद फिर आऊंगी। आप और कहीं मत जाना। अमृता जैसे अयी थी वैसे ही हवा के झोंके की तरह बाहर चली गई। आशा ने कनखियों से नरेन्द्र की ओर देखा था। नरेन्द्र टकटकी बांधे उसे ही घूर रहा था। शायद अमृता के कहे शब्दों ने उसे उद्वेलित कर दिया था।
सचमुच आशा के व्यक्तित्व के आगे आज वह कितना बौना हो गया था? मम्मी- पापा की अवज्ञा करके भी वह अकेले जीने का निर्णय क्यों नहीं ले सका? सोचकर वह दुखी हो गया था।
 वह चाहता तो आज भी आगे बढ़कर आशा का हाथ थाम लेता, पर संकोच वश आत्म रक्षा की मुद्रा में बैठा अनुनय- सा करने लगा, मैं तुम्हारा अपराधी हूं आशा, चाहे जो सजा दो, ना नहीं कहूंगा।
  नहीं नरेन्द्र, तुम्हें सजा देकर मैं अपना दुख और नहंीं बढ़ाना चाहती। बस इतना बता दो कि ऐसी कौन- सी मजबूरी थी जिसके चलते तुमने मेरी सुधि नहीं ली। आशा तड़फ उठी थी।
  पोस्टिंग होते ही मैं तुम्हारी तलाश में जगदलपुर गया था। वहां पता चला कि तुम्हारे पापा का ट्रांसफर कोंटा के पास किसी देहात में हो गया था। फिर वहां से अम्बिकापुर तरफ जाने की सूचना मिली। कहां, किसी ने नहीं बताया। निराश, थक हार कर मैं घर लौट आया, फिर वहां से दिल्ली चला गया जहां मेरी पोस्टिंग थी। आशा मैं तुम्हें भूला नहीं था। पर तुमने मुझसे संपर्क करने की कोशिश क्यों नहीं की? कहते हुए नरेन्द्र उदास हो गया था।
  नरेन्द्र का जवाब सुन वह मर्माहत- सी हो उठी, लोग तो अनदेखे भगवान को ढूंढ लेते हैं नरेन्द्र, मैं तो जीती- जागती तुम्हारी प्रतिक्षा कर रहीं। मगर तुम कितनी जल्दी हारकर बैठ गये? आज जान सकी कितना चाहते थे तुम मुझे? ऊपर से यह तोहमत भी जड़ दिया कि मैंने तुमसे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की? सामाजिक मर्यादा और रिवाजों की जकड़न तोड़ना क्या इतना आसान है नरेन्द्र? क्या नहीं जानते हमारे समाज में लड़के वाले ही रिश्ते तलाशते है? लड़की वाले सिर्फ उनका इंतजार करते हैं।
  जवाब की प्रतिक्षा में आशा क्षण भर के लिए खामोश हो गयी थी। जब नरेन्द्र कुछ नहीं बोला तो वह फिर बोलने लगी, फिर भी बाबू जी गये थे तुम्हारे पापा से मिलने। पहले गांव गये, फिर रायपुर होते हुए आरंग गये, वहां उनसे मुलाकात हुई थी। अपने आने का मकसद बताया तो उन्होंने लगभग दुत्कार दिया था, आप क्या सोचकर आये है हैं गुरूजी? शादी -ब्याह बराबरी में होती है। नरेन्द्र अब सहायक एरोड्रम मास्टर है। उसकी मम्मी और मेरा ओहदा तो आप जानते ही हैं। बताइये कहीं से भी मेल बैठता है?
  बाबू जी कुछ नहीं कह पाये। सिर झुकाकर वापस लौट आये। घर आकर इतना ही बोले थे, आशा, नरेन्द्र आकाश की ऊंचाइयों में पहुंच गया है। और हम जमीन पर खड़े हैं। उसे पाने की चाह आकाश से तारे तोड़ना है।
   मैं खामोश भीतर चली गई थी। कहती भी तो क्या कहती? उन्होंने इशारों में बहुत कुछ कह दिया था। अपने प्रिय प्राणी- पदार्थों से विछोह का दर्द क्या होता है? उस दिन महसूस किया था मैंने। कई दिनों तक गुमसुम- सी बनी रहीं। मां- बाबूजी ने बहुत समझाया। कई रिश्ते भी आये, पर तुम्हारे जैसा प्यार कोई नहीं लगा। इसी बीच एक नीजी विध्यालय में बच्चों को पढ़ाने का काम मिल गया और मैं डोंगरगढ़ चली आई। आज भी वहीं हूं। अमृता भी उसी स्कूल में पढ़ाती है। बाबूजी की बिमारी का समाचार मिला तो वह भी मेरी सहायता के लिए आ गयी। तुम्हारे पड़ोस में रहने वाले भल्ला साहब उसके चाचा है। उन्हीं के यहां से हम लोगों का टिफिन जाता है। अचानक तुम्हारा नेेम प्लेट पढ़ा तो, चौंक उठी और हिम्मत करके घंटी का बटन दबा दिया।
   सुनती थी बड़े ठाठ की जिंदगी जी रहे हो तो मन में ईर्ष्या भी होती थी और सुकून भी मिलता था। बस, एक बार मिलने की हसरत थी, वह भी आज पूरी हो गई? मगर यहां तुम्हारी हालत देख हैरान हूं। यह सब कैसे और क्यों हुआ? जवाब की प्रतिक्षा में उसने नरेन्द्र पर अपनी दृष्टि गड़ा दी।
   सचमुच उसकी पत्नी योगिता और नरेन्द्र के बीच संबंध विच्छेद की खबर हर उस व्यक्ति के लिए आठवां आश्चर्य से कम नहीं था, जो उसे निकट से जानता था। नरेन्द्र रंग- रूप और डील डौल में जितना सुंदर था, उतना ही वह व्यवहार कुशल और मृदुभाषी था। घमंड तो उसे छू तक नहीं गया था।
   नरेन्द्र बहुत देर तक चुप सोचता रह, फिर बोला, मैं तो सदैव तुमसे मिलने को बेचैन रहा, पर कोई सूत्र हाथ नहीं आया। हां घर- परिवार और नीजी जिंदगी में संतुलन बनाये रखने के चक्कर में तुम तक नहीं पहुंच सका। ऊंची पद- प्रतिष्ठा के कारण मम्मी- पापा की आकांक्षा बहुत बढ़ गई थी। मैंने दबी- जबाने तुम्हारा जिक्र किया तो पापा अड़ गये थे, जो नहीं हो सकता उसके विषय में क्यों सोचते हो? भूल जाओ उसे। मेरा अपराध यही था कि मैं खुल कर विद्रोह नहीं कर सका। नरेन्द्र कुछ क्षण के लिये खामोश हो गया था।
   और तुमने एक आज्ञाकारी बालक की तरह उनकी बात मान कर शादी कर ली, है न? आशा के होठों पर एक व्यंग्य भड़ी मुस्कान तौर गई थी।
   ना, मैंने तीन साल तक उनको खूब छकाया। मैं जानता था उन्हें ऊंची मान- मर्यादा और ढ़ेर सारा दहेज लाने वाली कमाऊ बहू चाहिए। मैंने शर्त रख दी कि मैं नौकरी पेशा लड़की से शादी नहीं करूंगा। मेरी शर्त सुनकर मम्मी खूब बिगड़ी थी, इतने बड़े अफसर बन गये लेकिन बच्चों जैसी बाते करते हो। औरत को घर में नकेल डालकर रखने का भला क्या औचित्य है। कुछ कमाकर लायेगी तो वक्त जरूरत में काम ही आयेंगे।
    पर मैंने साफ कह दिया था- मम्मी, तुम्हारी नौकरी करने का दुख मैं भोग चुका हूं। जब मैं स्कूल से लौटकर आता था, तब तुम्हें घर में न पाकर मुझ पर क्या बीतती थी, तुम नहीं समझ सकती। भूख से अधिक तुम्हारे प्यार की तड़फ मुझे रूलाती थी। अस्त- व्यत घर देख मैं और पापा दोनों कुढ़ते थे। मुझे जीवन- साथी चाहिए, रूपये कमाने वाली मशीन नहीं।
  मम्मी मेरी बातों से कतई सहमत नहीं थी। उसने तो जगन्नाथ प्रिंसपल की बेटी योगिता को ही अपनी बहू बनाने का निश्चय कर लिया था। योगिता का सबसे बड़ा गुण यहीं था कि वह हाईस्कूल के लेक्चरर थी। लेकिन मैं अड़ गया था कि योगिता को मेरे साथ रहना है तो नौकरी छोड़नी पड़ेगी अन्यथा मैं शादी नहीं करूंगा।
    तो क्या योगिता नौकरी छोड़ने को राजी हो गई? आशा सब कुछ जान लेने को उतावली हो रही थी।
   हां, अपने पापा के कहने पर उसने तत्काल स्तीफा दे दिया। इस तरह मैं अपने ही बुने जाल में फंस गया था। शादी के बाद योगिता ने अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया। वह मेरी हर बात में मिन- मेख निकालती और बात-बात में झगड़ा करने पर उतारू हो जाती। दो साल बाद हमारी पहली संतान नेहा पैदा हुई तो हमें उम्मीद थी कि योगिता सुधर जायेगी। किन्तु वह पहले से अधिक उदंड और हठी हो गई थी। अब तो वह मम्मी पापा से भी दुर्व्यवहार करने से नहीं चूकती थी। मेरी इकलौती बहन आरती तो उसकी नम्बर एक की दुश्मन बन बयी। उसके रहन- सहन क्रिया- कलाप पर उसे घोर आपत्ति होती। उसके अनुसार इकलौती होने के कारण हम लोगों ने आरती को सिर पर चढ़ा रखा था। दोनों के बीच की लड़ाई इतनी बढ़ गई कि एक दिन बहन ने जहर खा लिया और आठ रोज तक उसे अस्पताल में रखना पड़ा।
   इसके बाद तो मम्मी- पापा भी उसके विरूद्ध गये। पर योगिता ने कभी किसी की परवाह नहीं की। वह घर छोड़कर अपने पिता के पास चली गई और महिला थाने में दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज करा दिया। बहुत भाग- दौड़  के बाद ले दे कर ही हमें जमानत मिली थी अन्यथा हम सब का जेल जाना तय था। नरेन्द्र की आवाज में निराशा और दुख दोनों थे।
    लगता है, उसे किसी बात का मलाल रहा होगा नरेन्द्र। आशा कुछ सोचती हुई बोली थी।
शायद नौकरी छोड़ने का गम वह बर्दाश्त नहीं कर पायी। धीरे- धीरे स्थिति निरंतर बदतर और बेकाबू होते चली गई और उसने अदालत में तलाक हेतु आवेदन लगा दिया। जब मेरे पास तलाक नामा आया तो मैं कई दिनों तक अनिर्णय की स्थिति में उलझा रहा। इसी बीच एक शाम जब मैं दफतर से घर लौटा ही था कि योगिता पहुंच गयी। पीछे- पीछे उसके बड़े भैया अजय और वकील भी आये थे।
  मैं उनके  इस तरह अचानक पहुंचने का सबब जानना चाहता था,फिर भी शिष्टाचार निर्वहन बात पूछ भी लिया था, कैसे आना हुआ भैया?
   इसलिये क्योंकि तुमने आज तक तलाकनामा पर साइन नहीं किया है।बेहद तल्ख एवं आक्रोशित स्वर में कहा था अजय ने।
   मैं नेहा के भविष्य को लेकर चिंतित हूं भैया। योगिता अपने व्यवहार सुधारने को तैयार हो तो इस अतीत को भूल कर फिर अपनी जिंदगी की शुरूआत कर सकते है। मैं पूरी तरह टूट चुका था फिर हृदय के किसी कोने में उम्मीद की किरण अब भी बाकी थी।
   नहीं, मैं तुम्हारे साथ अब एक पल भी नहीं रह सकती। समझ लो कि तुम्हारे लिए मैं मर गई और मेरे लिये तुम मर गये। साइन नहीं करोगे तो भी आज सारे सम्बन्ध सदा के लिए यहीं खत्म करके जाऊंगी। तुम्हारे सामने सुहाग की निशानी इन चूड़ियों को यहीं तोड़कर, माथे का सिंदूर पोंछ डालूंगी। योगिता जैसे पागल हो गई थी।
   यह सुनकर सब के सब दंग रह गये थे। योगिता सारी मर्यादा लांघकर इस हद तक चली जायेगी किसी ने सोचा नहीं था।
   इसकी कोई जरूरत नहीं है योगिता, लो अभी साइन कर देता हंू। तुम आजादी चाहती थी न, जाओ आज से आजाद हो गई। कहते हुए मैं उठ खड़ा हुआ। आलमारी से तलाकनामा निकाला और कांपते हाथों से साइन करके आगे बढ़ा दिया। इस तरह रही-रही उम्मीद भी पूरी खत्म हो गई थी।
आठ वर्ष के अंतराल में ही हमारा दांपत्य जीवन छिन्न- भिन्न हो गया। बहुत सोचने पर भी मैं समझ नहीं पाया था कि कहां चूक गया? कुछ समय बाद अदालत से भी हमारे तलाकनामा पर कानूनी मुहर लग गयी। नेहा, योगिता के अधिकार में चली गई। महीने में सिर्फ एक रविवार को मैं नेहा से मिल सकता था। कुछ दिन बाद योगिता ने मुझे इस हक से भी वंचित कर दिया। बाकी दिन तो किसी तरह कट ही जाते हैं लेकिन छुट्टी के दिन काटे नहीं कटते और मैं बौराया- सा यहां- वहां भटकता रहता हूं। नरेन्द्र की आवाज जैसे गले में ही फंस कर रह गयी थी।
  इसी समय दरवाजे की घंटी बजी थी। अमृता फिर आ गई थी, दीदी, अब चलो टिफिन तैयार हो गया है। वह उठने को हुई तो नरेन्द्र बोल पड़ा, आशा, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं।
 आशा असमंजस में डूबी कुछ देर सोचती रही फिर बोली, नहीं बाबू जी हमारे सम्बन्धों को लेकर बहुत इमोशनल हैं, पता नहीं तुम्हें अचानक सामने देख उन पर क्या बीते? नरेन्द्र मैं अपने तिनके का सहारा भी नहीं खोना चाहती। आशा भावना के आवेश में बह गयी थी।
 नरेन्द्र एक अपराधी- सा खड़ा देखता रह गया। आशा से ऐेसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। आशा के करीब पहुंचने का मुश्किल से एक सूत्र हाथ आया था, वह भी टूट गया। उसने टूटते स्वर में कहा था फिर कब आओगी?
 कह नहीं सकती, शायद कभी नहीं। आशा डूबती स्वर में बोली और उठ खड़ी हुई। अंतत: दोनों बड़े दुखी मन से अलग हो गये।
  दूसरे दिन वह आफीस से छुट्टी लेकर दिन भर आशा की प्रतिक्षा करता रहा, मगर वह नहीं आयी। जब व्याकुलता बढ़ गई तो शाम को स्वयं भल्ला साहब के घर पहुंच गया। वहां पता चला कि अमृता आकर टिफिन ले गई है। वह मायूस, चुपचाप घर लौट आया। लेकिन बार-बार मन उसे आशा के पास खींच ले जाता।
 सारी रात वह आशा को लेकर तरह-तरह के मनसूबे बांधता, टूटता- तड़फता रहा। आशा के अचानक आगमन से उसे लगा था, जैसे उसके जीवन में शुरू हुआ पतझड़ का मौसम खत्म होने के कगार पर है तथा ठूंठ हो गये मन में फिर नई उमंगों के कोपलें फूंटने लगे है।
 बार- बार वह यहीं सोचता, क्यों न एक बार फिर अतीत को भूल कर नई जिंदगी की शुरूआत की जाय। इसके बावजूद मन के किसी कोने में बैठी, आशा के इंकार की आशंका से वह लहूलुहान हो जाता। इसी उहापोह में रात बीत गई थी और वह देर तक सोता रहा। सबेरे जब फिर दरवाजे की घंटी बजी तो उसकी नींद टूटी थी।
 कौन हो सकता है? असमंजस में डूबा उसने दरवाजा खोला तो सामने आशा खड़ी थी। एक बारगी उसकी सारी सुप्त इन्द्रियां झंकृत होकर चैतन्य हो उठीं। मन मयूर होकर नाच उठा। खुशी के अतिरेक में उसके बोल न फूटते थे। उसका बांवरा पन देख आशा बोली थी, यह क्या हो गया है तुम्हें? कैसे अनजान की तरह हकबकाय घूर रहे हो?
 पता नहीं क्यों, मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि तुम मेरे सामने खड़ी हो।
 जवाब में आशा ने आगे बढ़कर जोर से उसकी बाहों में चिकोटी काटा तो वह बिलबिला उठा, अरे मर गया।
 आशा हसंती हुई बोली, अब तो विश्वास हो गया न?
 हो गया। लेकिन इतने सबेरे कैसे आ धमकी? नरेन्द्र अब भी सहज नहीं हो पा रहा था।
 चाय पीने, यह भी देखना चाहती थी कि तुम अकेले कैसे रह लेेेते हो? वह धीमे से हंसी।
 ठीक है, तुम बैठो, मैं अभी चाय बनाता हूं। नरेन्द्र के चेहरे से खुशी छलक रही थी। वह तुरंत किचन की ओर लपका। आशा स्वयं भी उसके पीछे-पीछे किचन में चली गई और नरेन्द्र को बाथरूम में ढकेलती हुई बोली, चलो हटो यहां से जल्दी हाथ- मुंह धोकर बाहर आओ।
 जब वह लौटा, आशा सोफे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। उसने चाय की एक चुस्की लेकर कहा, पता नहीं, क्यों, तुम्हारी बनायी चाय बहुत अच्छी लगती है, और है?
 लो,। हंसती हुई आशा ने उसे दूसरा कप थमा दिया था।
 बाबू जी कैसे है? तुमने बताया नहीं।
 काफी ठीक हैं, हम लोग जल्दी ही चले जायेंगे। संभव है कल ही। आशा की आंखे नरेन्द्र के चेहरे पर टिक गई थीं।
 यह तो बहुत अच्छी खबर है। पर तुमने क्या फैसला किया? नरेन्द्र के मुख मंडल पर तमाम तरह के विचार आपस में गड़मगड़ होने लगे।
 मैं तो पहले ही फैसला कर चुकी हूं नरेन्द्र, तुम नहीं मिले तो आजीवन अकेले रहूंगी। उसने अपनी पलकें झुका लीं।
 नरेन्द्र तत्काल उठकर आशा के करीब बैठ गया। फिर उसके हाथ को अपने हाथों में लेकर बोला, आशा, क्या तुम मुझे माफ नहीं कर सकती?
 जवाब में आशा कुछ नहीं बोली। उसकी आंखों में आंसू भर आये और उसने नरेन्द्र के कंधों पर अपना सिर रख दिया। इसके साथ ही वर्षों का अंतराल खत्म हो गया था।  
पता
ग्राम - कोलिहामार,पोष्‍ट- गुुरूर
जिला - बालोद ( छ.ग.)
मोबाईल : 09407732943

पानी और वृक्ष सब पर भारी, अब नहीं चेते तो पछताना पड़ेगा

        प्यास से आकुल - व्याकुल संतान कहेगी - माँ, अब तो प्यास सही नहीं जाती। कहीं से भी एक घूंट पानी की व्यवस्था कर दो।''
       माँ कहेगी - '' कुछ देर और ठहर। तेरे पिता कांवर लेकर नदी गये हैं। झिरिया खोदकर पानी लाएंगे फिर जी छकते तक पी लेना।''  माँ जानती है - वह संतान को मात्र दिलासा दे रही है। नदी - नाले सूख गए हैं। बोर और कुँए के पानी का जल स्तर एकदम नीचे जा चुका है। जिस नदी पर बीता भर खोदते ही पानी आ जाता था, अब कमर तक खोदने पर भी बूंद भर पानी नहीं आता। सिवाय बालू के। नल में घंटों प्रतीक्षा के बाद भी बूंद भर पानी नहीं टपकता। कुँए और बोर सूख गए हैं। माँ अपनी संतान को लाख कोशिशों के बावजूद बूँद भर पानी नहीं दे सकती। फिर छकते तक पानी, वह अपनी संतान को कहाँ से, कैसे पिला सकेगी ?
       यदि अब भी हम अपनी आँखों से पट्टी नहीं हटाये तो यह दुर्दिन आने में देर नहीं। आज जिस तरह धड़ल्ले से वृक्ष कट रहे हैं। वृक्षारोपण का दिखावा मात्र किया जा रहा है। इसके कारण अवर्षा - खंडवर्षा की स्थिति निर्मित हो रही है। धरती के पानी का हम दोहन की जगह, शोषण कर रहे हैं। जगह - जगह धरती को छेदकर पानी पाने प्रयासरत हैं। इन तमाम कृत्यों का दुखद परिणाम आगामी समय में आये इसमें आश्चर्य नहीं।
       आप हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये गिन रहे हैं। नोटों की गिनती करते - करते आप पसीना से तरबतर हो गये हैं। गला सूख गया हैं। आप ग्लास भर पानी हलक से उतारना चाहते हैं। गला तर करना चाहते हैं। पर यदि ग्लास भर पानी मिलना तो दूर, यदि जिव्हा भी तर करने बूँद भर पानी न मिले तो ऐसी स्थिति में आपकी क्या गति होगी,इसका सर्वेक्षण आप स्वयं करें।
      लगातार हम पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं। वातावरण दूषित और प्रदुषित होते जा रहा है। आज पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति हमारी लापरवाही, हमें दूषित -प्रदुषित वातावरण में जीने बाध्य कर रही है। स्वच्छ वातावरण से मनुष्य स्वस्थ रहेगा। स्वच्छ वातावरण से हमें जीवनदायिनी पानी मिलेगा वरन विषैला खाद्य पदार्थ तो खा ही रहे हैं, आगामी समय में विषैला पानी पीने की बाध्यता से कोई रोक नहीं सकेगा।
      फसल पर हम सब का जीवन टिका हुआ है। बरसात के पूर्व किसान खेतों में फसल बोने की तैयारी करता है। खेतों की साफ - सफाई करता है। बादल उमड़ते - घुमड़ते हैं तो कई किसान वर्षा होने के पूर्व खेतों की जुताई करते हैं ताकि बन दुबी खत्म हो जाये और अच्छी फसल हो। फिर किसानों को वर्षा होने की प्रतीक्षा रहती है। प्रकृति से लगातार खिलवाड़ के परिणाम, बादल उमड़ - घुमड़ कर लौट जाता है। अवर्षा से किसान हताश - परेशान - निराश हो जाता हैं। जिन खेतों में फसलें लहलहाती, वहां सूखे की मार होती है और धरती फटती चली जाती है। इत्तफाकन फसल बोने लायक वर्षा हो गयी। बीज अंकुरित हो गये फिर वर्षा रुक गई तब  धरती पर उगी फसलें, फसलें नहीं रह जाती। धरती में जगह - जगह दरारें पड़ती हैं। अवर्षा हरियाली छीन लेती है। अकाल की मार सिर्फ किसानों को ही नहीं, सबको पड़ती हैं।
       '' जल ही जीवन है '' '' जल है तो कल है '' पानी बचाने के उद्देश्य से ऐसे अनेक नारे लगाए जाते हैं। पर क्या इसे जमीनी हकीकत में उतारने हम ईमानदारी दिखाते हैं। जहाँ एक ओर एक - एक बूंद पानी पाने पूरे परिवार जुटे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पानी का भारी मात्रा में दुरुपयोग किया जाता है। नल की टोटियां खुली रहती हैं और लाखों लीटर पीने योग्य पानी बहकर नालियों में समाहित हो जाता है। पेयजल पाने कितना युद्ध करना पड़ता है यह देखना हो तो आप ऐसे क्षेत्र में जाइये जहां एक - दो सार्वजनिक नल हो, पेयजल आपूर्ति के लिए टैंकर आता हो।
       छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है। यहां के अधिकांश परिवार का जीवन कृषि पर टिका हुआ है। कृषि पूर्णता: पानी पर निर्भर होता है। और यदि कृषि कार्य के लिए पानी न मिले तो क्या होगा इस पर विचार करें। आज हम पानी संरक्षण - सवर्धन की बातें तो बहुत करते हैं। भाषणबाजी करते हैं। सलाह मश्विरा देते हैं पर स्वयं पानी के संरक्षण और संवर्धन के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वृक्षारोपण की बातें कागजों पर सिमट कर रह जाती है। कितने ऐसे पौधे हैं, जिसका रोपण किया गया। उसके साथ फोटो खिचाया गया। अखबारों में प्रकाशित हुआ, वे वृक्ष का रुप ले पाए और आज जीवित है ? मात्र वृक्षारोपण कर देने, अखबारों में फोटो छपवा लेने से पौधा वृक्ष नहीं जाएंगे। भले एक ही पौधा क्यों न हो, उसका रोपण करने के साथ यह भी संकल्प लें कि उसे वृक्ष बनते तक संरक्षण एवं सवर्धन करेंगें।
       मुझे अपना बचपना याद आ रहा है। गाँव में हमारी थोड़ी सी खेती है। एक दिन मेरे पिताजी सेठ की दूकान से '' पैरी '' बीज ले आये। उन्होंने मेरी माँ से कहा - '' इसे, खेत की मेड़ में बो आओ। ''
       मेरी माँ और चाची खेत में गये। दातारी से मेड़ों की जुताई की और लगे पैरी बीज बोने। गाँव के लोगों ने देखा तो हंसी उड़ाते हुए कहा -  '' नूतन गुरुजी ल घलक रिकम -  रिकम के सुझथे। बहू बिचारी मन ल पइरी बोये बर भेज दे हे। अरे, दुनिया लीम, आमा, जाम लगाथे ता ये ला बबूल बोये के सूझे हवे। ''
       मेरे पिता जी की दृष्टिकोण एकदम साफ थी। वे जानते थे, आम - जाम के वृक्ष लगाने के बाद उसके देख रेख की आवश्यकता बहुत पड़ती है। बबूल एक ऐसा वृक्ष है जिसके देख - रेख की आवश्यकता उतनी नहीं पड़ती, हां, बीच - बीच में उसे सीधा ले जाने के लिए कटाई - छंटाई की जरुरत होती है। मैंने देखा कुछ ही दिनों में माँ और चाची द्वारा बोये बबूल बीज अंकुरित हो गये और धीरे - धीरे वह वृक्ष का रुप लेने लगा। आज भी हमारी उस खेत की मेड़ पर जो बबूल के वृक्ष है वे मेरी माँ और मेरी चाची द्वारा बोये पैरी बीज का ही वृक्ष है।
       हर वर्ष वर्षा ऋतु में वृहद मात्रा में वृक्षारोपण का कार्यक्रम चलाया जाता है, पर सोचनीय तथ्य यह है कि जिस पौधा का रोपण किया गया क्या वह वृक्ष बन पाया ? हमें वृक्षारोपण के साथ उसके संरक्षण एवं सर्वधन के प्रति पूरी ईमानदारी बरतनी पड़ेगी तभी हमारा वृक्षारोपण का वृहद कार्यक्रम सफल माना जायेगा। यदि हम समय रहते नहीं चेते, जागरुक नहीं हुए तो वृक्ष और पानी से खिलवाड़ हमें बहुत ही भारी पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ के कवि एवं गीतकार मुकुन्द कौशल की पंक्तियाँ :-
       लीम डँगाली चघे हे करेला के नार
       इतरावथे लबरा बादर, घेरी - बेरी नाचै रे बीच बाजार
       ये मीठलबरा ह,
       ठगुवा कस पानी ह ठगै अऊ मूड़ धरे बइठे किसान -
       ये हो भइया गा मोर, कइसे बचाबो परान।
       ये बिधाता गा मोर, कइसे बचाबो परान।।

***
       कलपत खेत, गोहारत हे तोला, आके अगास ला छादे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।
                      तरिया सुखागै, नंदिया सुखागै
                      कूआँ अंउटगे, बारी लसागै
                      झरगे जम्मों पेड़ के पाना
                      गाय - गरुवा के सिरागे रे दाना
       आजा रे आजा बजावत बाजा, छल छल पानी बोहा दे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।

                                                                                                                            संपादक
                                                                                                                           सुरेश सर्वेद

धरती के बेटा


पाठक परदेशी

तन बर अन्न देवइया, बेटा धरती के किसान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
    सरदी, गरमी अऊ बरसा
    नई चिनहस दिन - राती।
    आठों पहर चिभिक काम म,
    हाथ गड़े दूनों माटी॥
मुंड म पागा, हाथ तुतारी, नांगर खांध पहिचान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
    कतको आगू सुरूज उवे के,
    पहुंच खेत मन म जाथस।
    सुरूज बुड़े के कतको पाछू,
    घर, कुरिया म आथस॥
तोरे मेहनत के हीरा - मोती चमके खेत खलिहान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
    जांगर टोर कमइयां तोर,
    बर नइये कभू अराम कहूं।
    लहलहावय पीके पछीना,
    कोदो कुटकी, धान गहूं॥
तोर तन तोर मन हे, थोरको नइये अभिमान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
    हाथ म देथस हाथ तहीं,
    जब कोनों सहकारी मांगय।
    तोरे उदिम, लोगन मन म,
    भाव सहकार के जागय॥
मुचमचाथे जिनगी, सोनहां होथे सांझ - बिहान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
कबीरधाम ( कवर्धा ) छत्‍तीसगढ़

धान के कटोरा के '' बीजहा धान ''


विनय शरण सिंह

        छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ी रचनाओं की बाढ़ सी आ गई है। इनमें से ज्यादातर रचनाएंछत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित किताबों में केवल संख्यात्मक वृद्धि करती हुई लगती है। इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ की माटी महतारी के प्रति प्रेम एवं यहाँ के लोक - जीवन के कार्य व्यवहारों की झलक तो है पर छत्तीसगढ़िया जीवन के संत्रास एवं पीड़ा को अभिव्यक्त करने में कम रचनाएं ही समर्थ दिखाई देती है इस दिशा में रचनाकारों के प्रयास अथवा प्रतिबद्धता में कही कोई कमी है, ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि बदलते समय के साथ लोक - जीवन की जटिलताओं की तह में पहुंचकर उसे माया में व्यक्त करने में बहुत से कलमकारों की लेखनी में वह पैनापन नहीं आ पाया है। ऐसे में जीवन यदु जी के छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह धान के कटोरा की कविताएं सुधी समीक्षकों एवं पाठकों को यह आश्वस्त करती है कि छत्तीसगढ़ी में भी ऐसी कविताएं लिखी जा रही है जैसी अन्य  समृद्धि भाषाओं में लिखी जा रही है।
         धान के कटोरा में जीवन यदु जी की प्रारंभिक रचनाओं से लेकर प्रकाशन पूर्व तक लिखी गई कविताएं संकलित है। जीवन यदु जी प्रगतिशील विचारधारा के कवि है। संकलन की कविताओं में उनकी इसी प्रगतिवादी चेतना के स्वर साफ - साफ सुनाई देते हैं। कवि को छत्तीसगढ़ के किसानों और मजदूरों के प्रति गहरी सहानुभूति है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी उनकी माली हालात में कोई खास सुधार नहीं आया है। अन्नदाता खुद आज भूखों मर रहा है। उसमें अपने आँसू पोंछने की भी सामर्थ्य नहीं रह गई है।
भूख के मुसुवा जिनगी ला खोले तरी - तरी भइया।
आँसू ला कामें पोंछय अँचरा लरी - लरी भइया।।
       
        भूखे किसान के सिर पर कर्ज का बोझ लदा हुआ है। उसे अपने भूखे पेट की जितनी चिंता नहीं है, उससे अधिक उसे कर्ज चुकाने की चिंता है। उसकी पीड़ा की सुध लेने वाला कोई नहीं है। बेबस किसान बादलों से प्रार्थना करता है कि वे इतना जल बरसाएॅ कि उसके गले से कर्ज का फँदा छूट जाए।
आसो अइसन बरस रे बादर, कुछ तो करजा छूटे रे।
मुड़ के बाझा उतरे तो कुछ, गर के फँदा छूटे रे।।

         कवि किसानों की इस स्थिति के लिए भ्रष्ट व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं। भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रुप धारण कर लिया है। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को पैतरेबाजी से फुरसत नहीं है। उन्हें आम जन की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं है।
गोल्लर मन के झगरा मा खुरखुँद होवत हे बारी।
चोर  हवँय रखवार तो बारी के कइसे रखवारी।।

         आजादी के लिए संघर्ष के दिनों में तब की पीढ़ी ने सपना देखा था कि आजादी के बाद देेश में रामराज्य आएगा। किन्तु यह सपना, सपना बनकर ही रह गया। निराश और हताश लोगों ने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी है। अब तो यह पीढ़ी - दर - पीढ़ी चलने वाली बीमारी जैसी लगने लगी है। कवि ने देशवासियों की इस मनोदशा का बखूबी चित्रण किया है।
हम देखत हन अउ पुरखा मन देखिन पारी - पारी।
रामराज के सपना लगथे पुरखउती बैमारी।

        यदु जी अपनी कविताओं के माध्यम से अपने समय को जीते हैं। उसके नब्ज को टटोलते हैं और जहाँ उन्हें विसंगतियाँ दिखाई देती है वहीं करारा व्यंग्य करते हैं। यह उनकी शैली की विशिष्टता उन्हें छत्तीसगढ़ी के रचनाकारों के बीच अलग पहचान देती है। आज के जनमानस के बाजारवाद के प्रभाव पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं-
बस्सावत बस्ती म टी.वी. खुसरगे।
सपना देखावत हे बस महर - महर के।

000
माल म खुसरबे त जेब ल टमर ले
हटरी झन खोज वो तो कब के नंदा गे।।

        दुनिया में प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बाद भी आज का मानव समाज वर्ग - भेद की पीड़ा से संत्रस्त है। छत्तीसगढ़िया समाज भी इससे अछूता नहीं है। एक ओर सुविधा सम्पन्न लोग है तो दूसरी ओर झोपड़ियों में रहने वाले साधन हीन आम जन। सुविधा भोगी वर्ग प्यास लगने पर मिनरल वाटर पीते हैं तो वंचित वर्ग को प्यास लगने पर नदी का पानी भी नसीब नहीं होता है। कवि अपनी कविता के माध्यम से प्रश्र उठाते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है।
तोर हे कुरिया - कुरिया काबर?
वो हे मोठ अउ तॅय काबर पातर?

000
तैँ हा पीथस मिनरल वाटर रोज गटागट,
हमला नोहर नदिया पानी जउँहर भइगे।
   
        इस वर्ग भेद से उपजी पीड़ा से मुक्ति पाने की छटपटाहट में कवि को लगता है कि छत्तीसगढ़ के माटी पुत्रों को जगाने की आवश्यकता है। दिन बादर को देखते हुए उन्हें शोषक वर्ग से सावधान रहने की जरुरत है। उन्हें उनका हक माँगने से नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए संघर्ष करने की जरुरत है। संकलन में ऐसे बहुत से प्रेरणा एवं जागरण के गीत संकलित है, जिनमें कवि मजदूरों और किसानों को सचेत, जागृत और प्रेरित करते दिखाई देते हैं। अपन मुड़ मा पागा बाँधव, रहिबे हुसियार भइया, सुटुर - सुटुर, चलो - चलो रे भइया, गीत मा अँजोर के आदि ऐसे ही गीत है।
        छत्तीसगढ़ की संस्कृति मूलत: कृषि कार्य में लगे हुए सीधे सरल लोगों के क्रिया - कलापों एवं उनसे जुड़ी भावनाओं की उपज है। संकलक की कविताओं में यहां की संस्कृति और यहां की मिट्टी के प्रति कवि का गहन प्रेम झलकता है।
सग भले सगा हो जावे छूटय नहीं जँवारा,
हवय भोजली गंगाजल हा सुख दुख के अधियारा।
कोनो बदथे फूल फूलवारी, कोनो बदय मितानी।
   
        संग्रह की कविताओं में एक ओर कवि ने जहाँ छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा का गान किया है तो दूसरी ओर दक्षिणी छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद उपद्रव से जूझते वनवासियों के दर्द का भी हृदय विदारक चित्रण किया है। मेरी दृष्टि में सिविर बनिस वनवास और बता कहाँ हम जावन कविताएँ बस्तर वासियों के अंतस के हाहाकार को बयान करने वाली छत्तीसगढ़ी की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ हैं।
        शिल्प विधान की दृष्टि से देखें तो संग्रह में गीत है, गजलें हैं, सवैया है और अतुकांत कविताएं भी। किसी छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह में काव्य - शिल्प के इतने विविध रुप, भाषा के पूरे सौंदर्य और सामर्थ्य के साथ पाठकों ने नहीं देखा होगा।
        छंद विधान और भाषा प्रयोग की दृष्टि से नि:संदेह जीवन यदुजी छत्तीसगढ़ी कवता के समर्थ कवि हैं।
पता
पानी टंकी के पास, गंजी पारा
खैरागढ़ (छ.ग.)
मोबा. -09406033489़

अशोक '' अंजुम '' की दो हास्‍य - व्‍यंग्‍य ग़ज़लें

अशोक '' अंजुम ''

खेल के परिणा सारे फिक्स हैं।
फिक्स है ईमान सारे फिक्स हैं।
आपकी बारी भी आएगी हुजूर,
मैकदे में जाम सारे फिक्स हैं।
किस तरह का चाहिए वर आपको,
बोलिये भी दाम सारे फिक्स हैं।
और बढ़कर एक भी तिनका नहीं,
दफ्तरों में काम सारे फिक्स हैं।
तू भले प्रैक्टिस दिन - रात कर,
नौकरी को नाम सारे फिक्स है।
फेंक कर मजनूं का खत लैला कहे,
क्या पढूँ पैगाम सारे फिक्स है।
आप मत इतनी सफाई दीजिये,
आप पर इल्जाम सारे फिक्स है।
                     2
प्यार है, इजहार है बाजार में।
इश्क का व्यापार है बाजार में।
कैद दफ्तर में रहे सप्ताह भर,
और अब रविवार है बाजार में।
देखकर विज्ञापनों का बाँकपन,
रोज कुल परिवार है बाजार में।
ये भी लें, हाँ ये भी लें, हाँ ये भी लें,
बस यही तकरार है बाजार में।
बिक रहा है आम जनता का सुकूँ
और हर सरकार बाजार में।
क्यों घरों में आज सन्नाटा लगे,
और हर त्यौहार है बाजार में।
एक जादू हर तरफ तारी हुआ,
खींचता हर बार है बाजार में।

पता
सम्पादक - अभिनव प्रयास
गली - 2, चन्द्र विहार कॉलोनी (नागला डालचन्द)
क्वारसी बाईपास, अलीगढ़ - 202001
मोबा. 09258779744
मेल : ashokanjumaligarh@gmail.com
 

अनजाना दर्द

जितेन्द्र '' सुकुमार '' 

वक़्त ने दिये हमें ज़ख्म कैसे - कैसे
है चश्म मुद्दतों से नम कैसे - कैसे
अपनो को अपना समझता रहा
दिल ने पाला था भरम कैसे - कैसे
बयाँ करुं भी तो किस लबों से मैं
ज़माने ने किया सितम कैसे - कैसे
कभी तड़पाता, कभी सुकूँ भी देता
न पूछों हैं ये अज़ीज गम कैसे - कैसे
हाथ भी पकड़ा और छोड़ भी दिया
मिले राहों पे हमें हमदम कैसे - कैसे
दर्द औ भी बढ़ता गया '' सुकुमार ''
मिले बाज़ारों में मरहम कैसे - कैसे
 साहित्यकार
'' उदय अशियाना ''
चौबेबाँधा (राजिम)
जिला - गरियाबंद (छ.ग.) 493885
मोबा: 09009187981

जिसके मन में उल्‍लास नहीं


श्याम '' अंकुर ''

काम नहीं जो करता कुछ उसका है मधुमास नहीं।
दुनिया को जो ठगता जी उस पर विश्वास नहीं।

मन में जिसके हिम्मत है पर्वत बौने मानो जी,
मंजिल का वह मालिक है बनता यारो दास नहीं।

रोना रोते रहते जी कर्म नहीं जो करते कुछ,
कर्म सदा जो करते हैं उनको दुख कुछ खास नहीं।

मान लिया है दौलत से मुठ्ठी में सब लोग रहे,
ठोकर जग में खाते वे दौलत जिनके पास नहीं।

फूल खिले हैं बागों में मौसम बहुत सुहाना सा,
अंकुर वह ही दुखिया है जिसके मन में उल्लास नहीं।

कुबेर के छत्तीसगढ़ी कहिनी के घेरा म एक फेरा

 डाॅ. बिहारीलाल साहू
      ( इक्कीसवीं सदी के देहरी म, छत्तीसगढ़-महतारी के चँउका-चँउरा म अपन कहिनी मन के अरध चघोइया अउ जागरन के जोत जगइया रचनाकार के नाव आय - कुबेर यानि कुबेर सिंह साहू (उन अपन नाव के संग न सिंग लगावंय अउ न पूँछी)। ए कुबेर ह कोनो यक्छ नोहय, निमगा मनखे आय, मनखे। ओ ह माटी महतारी के मान बर, छत्तीसगढ़ी मनखे के सनमान बर जब्बर जतन करइया, जूझे के जोम म कलम के कटार ले के आघू अवइया माई के लाल आय - रचनाकार कुबेर )
       छत्तीसगढ राज बनिस 01 नवम्बर 2000 के दिन। उही दिन सइघो छत्तीसगढ़ ह उमिहागे, के अब हमर दुख के दिन ह नंदाही अऊ छत्तीसगढ म सुख के सुरूज किरिन छरिया जाही। तब बहिराखू खड़बाज मन के बलमुस्टाही, सरबसोखहा मन के अनियाव, अतियाचार के अंत हो जाही। फेर आही ए भुइयाँ म  सच्चा सुराज, जेमा ’जे कमाही ते खाही’, इहाँ के पानी, इहाँ के बिजली जब घरोघर हबर जाही, तब सब्बो डहर जगर-मगर हो जाही। ए रतन भुइयाँ के खजाना ह जे खनि जम्मों जनता बर खुल जाही सब्बो के मरभुक्खई ह मेटा जाही। तब कोनो न पेचका रिही न पेटला। सब्बो एके बरोबर हो जाही, चारो मुड़ा सुमंगल सँचर जाही। गियान अऊ विवेक के अधार ले सुग्घर छत्तीसगढ़ के सपना ह पूरन हो जाही। एही तो सुराज होही न, सफल सुराज, छत्तीसगढ राज थापे के उदिम के परिपूरन होय के सफल काज।
       कुबेर ह छत्तीसगढ राज बने के बाद छत्तीसगढी कहिनी के बारी म दू गोछा कहिनी धर के अवइया कथाकार आय। ओकर पहिलावत गोछा के कहिनी किताब के नाव आय - ’’भोलापुर के कहानी’’ जेन ह मेघज्योति प्रकाशन, तुलसीपुर, राजनांदगाँव ले सन् 2010 म परकासित होइस। उनकर दूसर गोछा कहिनी किताब के नाव आय - ’’कहा नहीं’’ जेहर प्रयास प्रकाशन, बिलासपुर ले सन् 2011 म छपिस। ’’भोलापुर के कहानी’’ म चैदह अउ ’’कहा नहीं’’ म छय कहिनी मन संघराय हवय। अइसे लगथे दूनों गोछा के कहिनी मन के रचनाकाल निच्चट दुरिहा-दुरिहा नइये, फेर दूनो गोछा के कहिनी मन के भुइयाँ-भाठा अऊ सोर-संदेस मन ह अलगे-बिलगे हावंय। लेवव, अब दूनों कहिनी गोछा मन ला फरिया-फरिया के, निमार के परछो करे के उदिम करबो।
       चलव, पहिली भोलापुर के एक फेरा लगा लेइन। ए गाँव ह न सहर ले चपके हे न ओकर ले अब्बड़ दुरिहा हे। उहाँ के लोगन के सउदा-सुलुफ, कोरट-कछेरी के निमत अवई-जवई चलत रहिथे। फेर गाँव तो गाँव आय न, अऊ उहू ह भोलापुर यानि भोलवा मन ले अघात भरपूर। उही रूख-रई, तरिया-नरवा अऊ छप्पर-छानी के गाँव। हावा-पानी, आमा-अमली तो सब्बो जगा एके बरोबर, पन मनखे मन के चाल-चलन अउ माली हालत म बनेच फेर-फार हवय। कोनो मालिक आय त कोनो मजदूर, कोनो रानी त कोनो नौकरानी, कोनो मास्टर त कोनो डाक्टर अऊ कोनो दाऊ त कोनो सेठ। उहाँ भूख अऊ भोग के जबर जंग माते दिखथे। भोगहा मन भोगावत हवंय पट-पट ले अउ भुखहा मन चुटचुटाय रोटी बर, पेज-पसिया बर, बेटी मन ला बहँचाय घलो म लचार दिखथंय। उहाँ जोर-जबर अऊ पोंगवा पंडित मन के छल परपंच सब्बो एके रद्दा चलत दिखथंय - जइसे सब्बो अजाद हावंय - सढ़वा घलो, मेढ़वा घलो। एला का कहिबे, रामराज के रक्साराज?
       कुबेर के कहिनी मन भोलापुर के दरस म बहिनी बरोबर संगे-संग रेंगत हवंय। गाँव के महिलामंडल मा कहिनी म उतरे सब्बो भाई-बहिनी ठुलियाय हवंय। ओमा लछनी काकी, सुकारो दाई, नंदगहिन, देवकी अऊ फूलबासन के दरस अघातेच सुहावन हे। फेर फूलबासन ह अब्बड़ लजलजावत दिखत रहय। आगू बढ़ेन त रघ्घू, किसुन, जगत, लखन, फकीर, राजेस, रतनू, चंदू अउ मंगलू गाँव के मंझौत म बने चँउरा म हमला अगोरत संघराय रहंय। सब्बो ले जय-जुहार होइस। कुबेर के कहिनी के सब्बो पात्र पुतरी बरोबर सुमता के सुतरी अऊ बढ़ोतरी के बदना म बँधाय उमहात रहंय। उँकर तीर हाथ जोर के ठाढ़े रहंय - सुुंदरू, संपत, मुसवा, मरहा, मुरहा, घुरवा, नान्हें अऊ नानुक। चँउरा के जेवनी बाजू रामनामी चादर ओढ़े भसियावत रहंय - पेटला महराज, बिरिंदावनवाले महराज अऊ गाँव के मनहर महराज घलाक। सरपंच कका के तीर म झाड़ू गौंटिया अऊ उँकर समधी महराज मुचमुचावत दिखत रहंय। महंत रामा साहेब घला उही दिन भोलापुर आय रहंय अऊ सगरो गाँव ल उहाँ जुरे जान के आसन जमाय रहंय। फेर जोगेन्दर सेठ ह घेंच ल ओरमा के उहाँ बइठे रहय, अपन देसिया संगवारी सत्तू, राम अधीर, रामप्यारे अऊ अवधबिहारी मन के संग। तब्भे उहाँ प्रोफेसर वरमा के संग मरहाराम हबर गइन। लेवव उहाँ कतका सुंदर जुराव होगे, जइसे सइघो छत्तीसगढ़ ह उहाँ एके जगा संघरागे। हमला उनकर दरस-परस मिलगे अऊ उन सब्बों के गोठबात के गुनान के जउन सुखद सेवाद मिलिस ओला का कहिबे? कुबेर के कहिनी मन हमर आँखी अऊ कान होगे। सिरतोन कहन तो उन जम्मों छत्तीसगढ़ के जुबान होगे, हमर जाने-चीन्हे मीत-मितान होगे।
       ’भोलापुर के कहिनी’ म संघराय सबो कहिनी मन उहाँ के माटी अऊ बेटी मन के कहिनी आय। माटी ले जुरे हे रोटी अऊ बेटी ले जुरे हे मनखे के मान-मरजाद अऊ सामाजिक बेवहार। मतलब, भोलापुर के जीयत-जागत जिनगी अऊ जमीन के आरो लेवइया कहिनी मन अलगे-अलगे नाव धराय तो हावंय फेर सब्बो भोलापुर के धरती के मया के डोरी म बँधाय हवंय। चलव, पहिली भुइयाँ के पूछ-पछार कर लेइन अऊ अऊ जान लेइन के जमीन के मरम का हे, भरम का हे।
       भोलापुर के भुइयाँ म भूख भारी हे जइसे उहाँ गरीबी के गंगार गड़े हे। उहाँ नोहर हे रोटी। मनखे कतको जांगर टोरथे, मिहनत-मजदूरी करथे, फेर ओकर पेट ह पचकेच रहिथे, भरय नहीं, त का करय? बड़हर मन के बँधना ले रोटी ल मुक्ताय नइ सकय। ओला बेबस हो के मरहाराम बने बर परथे अऊ सहर के रद्दा धरे ल परथे। सुदरू के जोही फूलबासन ला धरम के धरसा ले उतार देथे। संपत अऊ मुसवा अनबूझ अँधियार के भुतवा मन सही भोलापुर ल मतालत रथिे, फूलबासन के चरित्तर-चोला म दाग के ऊपर दाग लगाथें। लछनी काकी जइसे मयारुक महतारी के ऊपर टोना-टोटका करे के लांछन लगाथें। घना मंडल उन सतियानासी मन के घेरा म घिरल जाथे, दुख पाथे, फेर ओला गियाने ह मुकति देवाथे जब रघ्घू ह ओकर लंग अंजोर बनके आथे, तब्भे अँधियार ह नसाथे।
        कहिथें न, ठलहा मनसे ह रक्सा सही रोग के, दोख के घर होथे। हमर गाँव-गँवई म जाँगर छँच्चा मनखे मन म नसा-पानी के रोग ह गझात हावय, जेकर सेती बेंदराबिनास मातत दिखथे। संपत अऊ मुसवा के संग गंजहा-मंदहा पारटी आ गइस हवय, पटवारी, नान्हे, नानुक, सब्बों माते हें, उन सरपंच के हाथ-हथियार बन गइन हावंय। नसापानी के चक्कर म खाली खेतखार, जमीन जहदादोच नइ बेचावय भलुक मनखे के जमीर घलो बेचा जाथे। तब थुकलू-जुठलू बने बर परथे। कथाकार ह अपन कहिनी मन म एकर ले छुटकारा देवाय के बदना करथे।
       छत्तीसगढ़ म धरम-करम के नाव ले जउन ढोंग-ढकोसला चलत हावय कहिनी लिखइया हा ओहू ला उजागर करथे। पेटला महराज के गड़बड़छाला ह मनखे ल डेरवाथे, अब्बड़ अऊ ओकर सकत ला सोख लेथे। धरम के नाव म महंत रामाजी साहेब के अहंकार ह अंगेरथे अऊ दूसर महराजो मन ल लोभ-लालच के खँचवा म चिभोर देथे। सिधवा मनखे मन के का दुरगत होत होही, एहर सोचे समझे अऊ गुनान के गोठ आय।
       छत्तीसगढ़ के रतन भुइयाँ के रकत चुँहकइया अब्बड़ हावंय। इहाँ के मनखे ला सिधवा मान के बहिरासू गुण्डा अऊ बैपारी मन बरपेली अमा गइन हावंय। कथाकार कहिथे - ’’छत्तीसगढ़ म लोटा धर के अवइया मन साल भर म हजारों सकल डारथें। दू साल नइ पूरे, लखपति बन जाथें। अऊ तीन पूरत करोड़पति बन जाथें। कार, टरक, बड़े-बड़े बंगला के मालिक बन जाथें। तुमन जस के तस।’’ (भोलापुर के कहनी, पृ. 90) जोगेन्दर सेठ अऊ ओकर कारिंदा मन घूसखोर सरकारी अमला ले साठ-गाँठ करके भुइयाँ हड़पे के धंधा करथें अऊ बाढ़ते जाथें। तब मरहाराम के मरन हो जाथे। मर-मर के जीथे, फेर जीथे, मरथे घेरबेरी।
       कहानीकार अपन छत्तीसगढ़ी ग्राम भोलापुर के भोलवा मन ल जगाय के जंग ला जारी रखथे। पहिली तो पढ़े-लिखे नवयुवक मन ला रघ्घू के अगुवई म संघराथे अऊ बदलाव लाने के बोलबम लगाथे। मरहाराम छत्तीसगढ़ी मनखे के चिन्हारी बन जाथे। ओ ह जूझे के जोम करथे। अपन मान बर परान देहे के परन करथे। फेर का हे, अनियावअऊ अतियाचार ले मुकति बर धिरलगहा गाँव संघराय लगथे। कथाकार के संकेत हवय के हमन सब्बो ल छत्तीसगढ़ के मुक्ति अभियान म जुरना परही अऊ सोसन के खिलाफ बिगुल बजाय बर परही। एहा ओकर आरो करे के आवाज आय। ओकर माटी के मया अऊ सही मनखे होय के परमान आय। भोलापुर के कहिनीमन चकमक के पथरा आय। एमा विदरोह के चिनगारी हवय त सामाजिक अंजोर बर मसाल बरे के संकेत। कथाकार ह धर्मांधता कोति चेताय हवय त ओकर राजनीतिकरन तरफ ले बँहचे के बरजना घलाव बताय हावय। पारिवारिक जिनगी म सुख-संपदा बर सब्बो ला जुरमिल के रहय के संदेस धलो कहिनीमन म दिये गइस हे। नवयुवक मन नवजागरन के धुरी बने हें। जुन्ना जाही तब तो नवा आही।
       कुबेर के दूसर कहिनी किताब के नाव आय - ’’कहा नहीं’’। एमा नारी मन के जिनगी अऊ अनकर कतरो रूप देखे के बरनन हवय। ’आज के सतवंतिन: मोंगरा’ म दहेज के मार झेलत बहुरिया के बिरतांत हे। मनखे के पसु-पक्छी मन लेे घलो नाता-रिस्ता, लाग-लगाव हो जाथे अऊ एक-दूसर के हितवा-मितवा  हो जाथें, एला कहानीकार बताय हे। ’बाम्हन चिरई’ म लेखक के जीव-जंतु ले मया दिखथे। ओकर मयारुक संसार के बिस्तार ह दिखथे। बिना परकीरति ले जुरे मनखे के मुकति नइये, ए बात ह कहिनी के सार-संदेस आय। ’बसंती’ म नारी सिक्छा अऊ ’दू रूपिया के चाँउर’ म जांगर के मान ह दरसाय गइस हे। ’कहा नहीं’ म नारी के मया अऊ ओकर मान के सनमान हे। ’फूलो’ - एमा अइसे कहिनी हावय जेमा नारी के सोसन के जब्बर सरलगहा रूप-रेख देखाय गइस हे। बड़हर मन गाँव-गँवई के दुख के कारक घलो आंय अऊ मरहम लगोइया घलो जइसे उन मारथें, त रोवन नइ देवंय - मनखे ल मर-मर के जीये बर बेबस कर देथें। ’कहा नहीं’ कहानी म मूल कहिनी के भीतर अंतरकहिनी घलो हवय जेन कहिनी के परभाव ल मजबूत करथे। एमा लेखक के सामाजिक सरोकार के अऊ कतरो दिरिस्टान्त हावय - जेखर ले ओकर कहिनी मन के जरूरी होय के परमान मिलथे। कहिथें ’’यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ फेर दाई-महतारी मन के का दुरदसा हावय हमर समाज म सब्बो जानथन। समाज म सुधार लाने के मंगल कारज ल कहिनी मन कर सकथें। दुखदई दुनिया ल रद्दा देखा सकथें। बढ़िया दुनिया बनय जेमा सबला सुख मिलय अऊ जिनगी के गुरतुर सेवाद मिलय, ए उदिम ल कहिनी अऊ कथाकारेच ह कर सकथे, हमला अइसे लगथे। ए कारज म कुबेर ह बहुतेच सफल हे।
       कुबेर ह छत्तीसगढ़ी कहिनी के मजबूत कथाकार आय। ओहर भासा के धनी आय। कल्पना सक्ती के ओ ह अपन लेखन म भरपूर बेवहार करथें। सही गोठ तो ए आय कि जउन रचना मन समाज, अऊ बढ़िया जिनगी के जतन करथे उही मन जुग-जुग जीथें अऊ जीये के बल बाँटथें। ए रद्दा म कुबेर सचमुच कुबेर आय। छत्तीसगढ़ी साहित्य म उनकर सनमान होही अऊ उन अवइया सम्मे म अउ नाम कमाहीं। हमला एकर बिसवास हावय। हम उनकर उज्जर भविस के मंगलकामना करत हन। जय छत्तीसगढ़, जय छत्तीसगढ़ी।
       पता
17, किरोड़ीमल कालोनी,
रायगढ़, (छ.ग.)
            मो. 9425250599, 7693050599

गुलामी के गेरवा गर म

डॉ.पीसीलाल यादव

बिरो पाही कइसे ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।
अंजोरी बर भटकट मूरख, सुरुज धरे मूठा म।।
        गुलामी के गेरवा गर म,
        सकीरन सोच विचार सेती।
        अवसर जिनगी ले निकलत,
        जइसे हाथ ले कुधरी रेती।।
छइंहा कइसे मिलही बतावव, कटे रुख के ठूँठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
        सभिमान ल सऊॅहे बेच के,
        हाथ उठा करे जी हुजुरी।
        तन - मन दूनो हे गहना,
        सइघो लास जीये मजबूरी।
आजादी कइसे पाही ओहा, जे जीयत पर के जुठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
        लोकतंत्र के भाव भर हे,
        लोक तो इहॉ बरबाद हे।
        तारा टोरय गुलामी के,
        मनखे तभे आजाद हे।
लोक के तन चिथरा - गोंदरा, तंत्र लदाये गहना गूँठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
                    पता
            साहित्य कुटीर
                 गंडई
      जिला - राजनांदगांव

शुक्रवार, 27 मई 2016

अंगना

दीनदयाल साहू 

        घर के इज्जत हा घर मा रहाय येकर बर मनखे काय काय उपाय नी करे। फेर कतको मनखे अइसे होथे जेनहा पइसा के आगू मा इज्जत ला घलो नी डर्राय। वोहा यहू भुला जथे कि पइसा के आगू मा बेवहार अउ कोनो जिनिस ला अपन बस मा नी करे जा सके। अइसन मन ल घर-परिवार म काकरो डर नी रहाय। भरमार धन दौलत के सेती अपन जीवन म अइसन मन कोनो उतार-चढ़ाव घलो देखे नी रहाय। पुरखौती धन-दौलत के घमंड रिथे तेन अलग। अपन हाथ में जेन मेहनत ले सबे जिनिस ल बिसाथे वोमन अपन जिनिस के इज्जत करे ल जानथें।
        अइसने धमतरी के तीर भंंडारपुर गांव म चैतू गौंटिया के एक ङान गंगा नोनी अउ दू ङान बाबू रहाय। गंगा ह सबो भाई-बहिनी ले बड़े रिहिस। पुरखौती धन के भंडार हा गौंटिया के दिनों-दिन बाढ़त जात रिहिस। ऐ गांव हा शहर तीर म होय के सेती अपन लोग लइका ल गौंटिया ह पढ़इस घलो। पंदरा बछर के उमर म नोनी गंगा ह बीमार परगे। येकर ले वोकर एक गोड़ काम करना बंद कर दिस। गौंटिया ह अब्बड़ इलाज पानी करइस फेर बने होबे नी करिस। बिचारी एक गोड़ ले अपंग बरोबर होगे।
        अपन एक ङान बेटी ल चैतू गौंटिया ह बड़ लाड़-प्यार ले रखिस। बेरा बितत गिस, ऐती नोनी ह बिहाव के लइक होगे। नोनी ह अपन पूरतीन बने पढ़-लिख के तियार घलो होगे रिहिस। बिहाव के गोठ चलिस त बने बने सगा सोदर आय फेर गोड़ के अपंग होय के सेती गंगा के बिहाव होवत नी रिहिस। देखत-देखत चैतू गौंटिया हतास होगे। बड़ कोसिस करे कि गरीब परिवार घलो कहूं बिहाव बर तियार हो जही ते जरूवत के सबे जिनिस अपन दमाद ल दूहूं जेकर ले दूनों सुख चैन ले रहीं।
         इही बीच दुरूग सहर ले एक ङान गरीबहा परिवार के सगा अइस। ऐ परिवार म घलो दू ङान भाई एक ङान बहिनी रिहिस। बहिनी बड़े होय के सेती बिहाव होगे रिहिस। भाई म बड़े जेकर बिहाव होवैय्या रिहिस तेकर नाव संतोष रिहिस। संतोष नानपन रिहिस तभे ऐकर ददा के इंतकाल होय के सेती महतारी ह पाल पोस के बड़े करिस। ऐकरे सेती जब ले होस संभालिस घर के जिम्मा संतोष उपर आगे। आज संतोष पढ़-लिख के धंधा पानी करत अपन गोड़ मा खड़ा होगे हे।
        संतोष अपन गरीबी ला सगा मन के आगू मा रखिस। चैतू गौंटिया ह अपन रूदबा के सेती संतोष ल बड़ लालच देके दमाद बनाय के गोठ करय। सुघ्घर विचार के सेती अपन होवैया गोसइन के रंग-रूप ल नी देखके नारी के सम्मान खातिर संतोष ह बिहाव बर तियार होगे। रीति के मुताबिक चैतू गौंटिया ल संतोष ह अपन नानुक कुटिया ल देखे बर बलइस। चैंतू गौंटिया केहे लगिस-हम लइका के सुभाव ल देखके अपन नोनी ल देवत हन, घर ला देखके नी देवत हन, कहिके हमन विचार ल रखत बिहाव भर राजी होगे।
        बिहाव के बाद गंगा ल अपन ससुरार म तालमेल बइठाय म दिक्कत होय लगिस। गंगा के सोच के मुताबिक रहन-सहन, खानपान नी होय ले दुखी रेहे लगिस। ससुरार के सरी बात ल गंगा ह अपन मइके म बतात जाय। जेन कमी गंगा ह अपन ससुरार के बताय तेला चैतू गौंटिया ह पूरा करत जाय। ऐती संतोष ह ठीक उल्टा कोनो काम म अपन ससुरार के सहयोग नी लेना चाहत रिहिस। दमाद हा धीरे धीरे अपन ससुरार के अहसान मा दबत गिस। येकर परिनाम ऐ होय लगिस के गंगा के मइके वाले मन अपन दमाद उपर पूरा हावी होय ल धर लिन। अब संतोष अउ गंगा के विचार म मेल नी होय के सेती ङागरा-लड़ई बाढ़त जात रिहिस। अपन मइके के बल मा गंगा ह संतोष ल घेरी बेरी नवाय के कोसिस करे। दूनों परानी के बीच दरार बाढ़े के चालू होगे।
        अब गंगा ह कोनो बूता होय संतोष ल पूछना छोड़के अपन मइके उपर सहारा लेके शुरू कर दिस। संतोष ल पता घलो नी चलत रिहिस। अपन मनखे ला बात बात म गंगा केहे लगिस कि ये घर मा जेन भी जिनिस हे वोहा तो मोर मइके के आय, तुंहर काय हरे तेला बताव? इही बात ह बड़ रूप लेवत चल दिस। सात आठ बछर मा इंकर ङागरा हा विकराल रूप ले डरिस। इही बीच गंगा के दूनो भाई मन के बिहाव होके लोग-लइका वाला होगे। अब चैतू गौंटिया सियाना होय के सेती बेटा बहू मन ल घर के सियानी के जिम्मा दे देहे।
        एक घांव अइसने ङागरा-लड़ई होइस तहाने ऐ घर हा मोर हरे कहात संतोष ल गंगा ह घर ले निकाल दिस। संतोष ह समङाात भर ले गंगा ल समङाइस नी मानिस त वोला वोकरे हाल म उहू घर ल छोड़के दिस। ऐती गंगा ह अपन घर ल बेचके मइके में अपन भाई मन ल पइसा ल धराके रेहे लगिस। गंगा ल मइके मा रहात दू तीन बछर बीतगे। बहू मन घर म अपन बेटी ल बइठार के ङान रखव कहिके अपन सास ससुर ल समङााय के कोसिस करें, फेर बेटी के मोह म अपन बहू मन के सुङााव म वोमन धियान देबे नी करिन। पइसा के रहात ले गंगा ल वोकर भाई मानिन। पइसा खतम होइस तहाने वोकर बर धमतरी म किराया के घर के बेवसथा कर दिन। ऐती गंगा के दाई दाद मन घलो अब बेटी ल छोड़ दिन तोला जइसन बने लगय वइसन कर कहिके।
        गंगा ह अब किराया के घर म रहात छोटे मोटे काम बूता करत अपन लइका मन ल पढ़ाय लगिस। अब गंगा ल अब पछतावा होवत हे। वोला बीच बीच म लगय कि संतोष मोला लेग जतिस ते बने होतिस कहिके। वोला समङा आगे कि-मेंहा अपन दाई ददा के बुध मा आके का कर परेंव! अब तो गंगा ल काकर अंगना म जांव? सोचे ल परत हे। ऐती संतोष सोच डरे हे तेहां अपन मन के गे हस, तोला आना हे त अपन मन के आ...। का करें अब... गलती काकरो होवय। येती घरो गे... परिवार गे...मनखे गे...घर द्वार गे...आखिर बांचिस का, बदनामी! कथें न, संसार म अइसे घलो मनखे हे जे मन काकरो दुख दरद ल देखके तरस खा जथें। अइसन मनखे मन गंगा ल समङाात किहिन-नोनी काकरो अंगना काम नी आय, टूटहा रहाय ते फूटहा अपने अंगना काम देथे। अब गंगा के आंखी खुलगे...। गंगा ह आधा डर अउ आधा बल ले जइसने संतोष घर के अंगना म पहुंचिस तहाने फफक फफक के रोए लगिस। वोला लगे लगिस, अब मोर ये जग के समाय अंधियारी ले निकल के अपन उजियारी के अंगना ल आज पहिली घांव देखत हंव। संतोष के मन म आज सहीच के संतोष होवत रिहिस, काबर कि वोकर परानी ल आज समङा तो आगे कि बिपत परथे त पइसा-कौड़ी, धन-दौलत, दाई-ददा, भाई-बहिनी कोनो काम नी आय। सुख रहाय ते दुख, काम आथे त खाली अपन घर के अंगना...।

रविवार, 22 मई 2016

लुंगी पर एक शोध प्रबंध

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

        प्रस्तुत अंश देश के होनहार एवं प्रगतिशील विचारधारा वाले समाज शास्त्र के एक पी. एच. डी. के एक छात्र द्वारा प्रेषित शोध प्रबंध से लिया गया है। वह छात्र मेरे पास आया था एवं लुंगी पर लिखा यह अद्वितीय एवं अमूल्य शोध प्रबंध मुझसे जंचवाया था। मैंने अपनी तीसरी एवं सबसे तरोताजा प्रेमिका के सहयोग से राष्ट्रहित में लिखा गया एवं समकालीन पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता यह शोध प्रबंध ओ. के. कर दिया है पाठक गण भी इस उच्च कोटि के शोध प्रबंध को मुक्त कंठ् से स्वीकार करेंगे ऐसी आशा है।
        लुंगी राष्ट्रीय एकता की पहचान हैए क्योंकि वह जन्म से महान है। लुंगी शिव है, सुंदर है, सत्य है अन्य कोई भी वस्त्र गुलाम है, सेवक है, अंग्रेजों का भक्त है। लुंगी सौम्य है। सरल है। भारत की तरह अखंड है। कुरते की प्राणेश्वरी है। शक्ति में प्रचंड है।
          उत्तर से दक्षिण तक लुंगी का राज्य है। पूर्व से पश्चिम तक लुंगी का साम्राज्य है। लोग लुंगी पहनते हैं। ओढ़ते हैं। बिछाते हैं। रस्सी न हो तो लुंगी को बाल्टी में लगाते हैं। कामवाली बाई लुंगी का पोंछा बना लेती है। झाड़ू न हो तो लुंगी से झाड़ू लगा देती है। लुंगी अपनी और बच्चों की नाक पोंछने के काम आती है। लुंगी विवाह मंडप में गठजोड़ का भी काम कर जाती है। लुंगी में परिवार के लिये सब्जी बांधकर लाई जा सकती है। लुंगी पर बैठकर दाल रोटी खाई जा सकती है।
        फैली हुई लुंगी धूप में छाया का काम करती है। लुंगी को कुंडी बनाकर पनिहारन सिर पर घड़ा रखती है। लुंगी माननीय लालूजी की पहचान है। लुंगी सम्माननीय करुणानिधि का संविधान है। लुंगीवला बच्चों को खिलोने लाता है। लुंगीराम सुंदरियों को चूड़ी पहनाता है। लुंगी बेड रूम की शान होती है। लुंगी अच्छे पति की पहचान होती है।शहर के दादा लुंगी धारण कर सड़कों पर बेधड़क घूमते हैं। लुंगीधारी बेरोजगार बस स्टेंड पर कन्याओं को घूरते हैं।
        लुंगी पहनने वाला मरकर सीधे स्वर्ग जाता है। लुंगी विहीन नरक में ही जगह पाता है। लुंगी पहनकर लोग संसद में पहुंच जाते हैं। लुंगी के कारण ही वे टिकिट पाने में सफलता पाते हैं। साड़ी को फाड़कर लुंगी बनाई जा सकती है। तीन लुंगियों को मिलाकर एक साड़ी सिलवाई जा सकती है। लुंगी पहनने व उतारने में सरल होती है। लुंगी की गयी साधना सफल होती है। लुंगी संभालने में हाथ पैर सदा व्यस्त रहते हैं, इसलिये लुंगीधारी सदा स्वस्थ रहते हैं।
        लुंगी सस्ती होती है। सुंदर होती है। टिकाऊ होती है। किसी नेता के ईमान की तरह बिकाऊ होती है। लुंगी सर्वधर्म संभाव की हामी है। हिन्दू मुस्लिम सिख हर व्यक्ति लुंगी का अनुगामी है। लुंगी फैलाकर चंदा उगा सकते हैं। लुंगी से गले में फंदा लगा सकते हैं। लुंगी इंसान को एक अनुपम उपहार है। बूढ़े और जवान सभी को लुंगी से प्यार है। लुंगी पहनकर लोग राष्ट्रपति प्रधान तक बन जाते हैं। लुंगी विहीन संतरी पद पर ही सड़ जाते हैं। बड़े - बड़े लोग लुंगी को सलाम करते हैं, चोर उठाईगीर आतंकवादी तक प्रणाम करते हैं। लुंगी ब्रह्मा का दुर्लभ वरदान है। भरत वंशियों को लुंगी पर बड़ा अभिमान है। लुंगी पहनकर वीरप्पन ने देश में नाम कमाया। लुंगी लपेटकर लालूजी ने बिहार चलाया।
        लुंगी का राष्ट्रीकरण जरूरी है। समझ में नहीं आता सरकार को क्या मजबूरी है। लुंगीवाद को हम सरकारी मान्यता दिलायेंगे। यदि अनदेखी हुई तो हम हड़ताल पर बैठकर भूखे मर जायेंगे। अब हम घर घर जायेंगे लुंगीवाद चलायेंगे। बच्चे वृद्ध जवानोँ को हम लुगी पहनायेंगे और हर लुंगी धारी को राष्ट्रप्रेम सिखलायेंगे।
लुंगी जिन्दाबाद, लुंगीवाद जिंदाबाद।
        आपका ही पी.एच. डी. का तमगा प्राप्त करने का अभिलाषी एक योग्य उम्मीदवार लुंगीराम लुंगीवाला।

पता
12 शिवम् सुंदरम नगर 
छिंदवाड़ा ( म प्र.)

शनिवार, 21 मई 2016

बहाना

डॉ. अर्पणा शर्मा

: लेखिका परिचय :

डॉ. ( श्रीमती ) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम. फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी.एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक . भारतीय संवतों का इतिहास ;1994, एक कहानी संग्रह खो गया गाँव ;2010, एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे ;2014, एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार ;2014, तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ,लोककथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

'' माँ जी नमस्ते।'' कांता ने मुख्य द्वार से घर में प्रवेश करते हुए सामने बरामदे में व्हीलचेयर पर बैठी बुजुर्ग महिला को अभिवादन किया। उन्होंने सहर्ष उसका स्वागत किया और पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए शिकायत भी कर दी. - '' कभी बगैर बुलाए भी आ जाया करो कांता। क्या हमसे कोई नाराजगी है।
नहीं, नहीं आपसे कैसी नाराजगी। बस बच्चों के काम में पूरा दिन बीत जाता है। कहीं नहीं जा पाती।''
- कहीं जाओ न जाओ इनके पास जरूर आ जाया करो। चार छः रोज तुम्हारी खबर न मिले तो ये परेशान हो जाती हैं। '' कमरे से निकलते हुए बाबूजी बोले।
        कांता से माताजी का स्नेह कई कारणों से है। माताजी की दृष्टि में वह शिक्षित, सुगृहणी, धार्मिक और ब्राह्मण परिवार से है। वे अपने बड़ों के दिए संस्कारों के कारण इन गुणों का सम्मान करती हैं और कांता को खिलाकर उन्हें विशेष आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। कांता भी माताजी का आदर करती है। क्योंकि वे शरीर से अस्वस्थ और अस्सी वर्ष की आयु होने पर भी कितने सुचारू रूप से गृहस्थ की समस्याओं को सुलझा लेती है। भोर में स्नान, नियमित पूजन, ठाकुर जी का भोग लगाना वर्ष में कोई न कोई बड़ा धार्मिक अनुष्ठान पूरा करवाना और सभी रिश्तेदारों, पड़ौसियों व परिवार के सदस्यों का ख्याल रखना जैसे माताजी के गुण कांता के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। मौका पाते ही वह उनके पास बेझिझक चली आती है। आज माताजी ने उसे कुछ विशेष सलाह के लिए बुलाया है। इनके यहाँ कल दुर्गा पाठ है। बड़ा आयोजन होगा। सुबह हवन जिसे चार पण्डित मिलकर कराएंगे और शाम को करीब पाँच सौ लोगों का भोज। माताजी कांता को कल आने वाले मेहमानों के विषय में बता रही थीं। साथ ही राहुल को सामान इकट्ठा कर देने को कह रही थी। वे बता रही थीं कि कौन सामान कहाँ मिलेगा। क्या अभी बाजार से आना है और किसको निमंत्रण नहीं जा पाया है। राहुल दौड़ - दौड़ कर सामान जुटा रहा था। राहुल ने आवाज लगाकर पूछा - '' माँ जी पूजा का घी नहीं मिल रहा है। बाकी सब सामान रख दिया है।''
- घी आया तो था। देखो रसोई में न रखा हो।''
 - नहीं , वहाँ तो खाने वाला घी है। पूजा का नहीं है।''
        कांता का ध्यान बरबस ही उधर खिंच गया। उसकी समझ में न आया कि पूजा के घी से क्या तात्पर्य है। घी तो घी है और पूजा में शुद्ध घी के हवन की परम्परा है। तब पूजा के लिए अलग से घी कैसाघ् कुछ देर में उसे याद आया कि गौ घृत को हवन के लिए विशेष रूप से अच्छा माना गया है। माता जी ने निश्चय ही कहीं से गौ घृत की व्यवस्था की होगी। करें भी क्यों नए जिस प्रभु ने उन्हें इतनी समृद्धि और योग्यता दी है कि अस्सी की उम्र पार कर चुके बाबूजी आज भी करोडों के टेंडर भरते हैं। तब उसके अनुष्ठान में भला कमी क्यों,माताजी फिर कांता से बातें करने लगी। परन्तु कांता के मन में अभी भी पूजा के घी का अर्थ साफ नहीं हो पाया था। मन को समझाने के बाद भी उसकी जिज्ञासा बार.बार जोर पकड़ रही थी। बात मुँह तक आती और लौट जाती। तभी कांता का ध्यान घड़ी पर गया। दोपहर के दो बजने वाले थे। बच्चों का स्कूल से लौटने का समय हो गया था। वह एक साथ खड़ी हो गई और माताजी से आज्ञा मांगी। माताजी ने उसे कल आने का अपनी ओर से निमंत्रण दे दिया। परन्तु कांता के मन की जिज्ञासा ने फिर जोर पकड़ा और उसके मुँह से बरबस ही निकल गया - माताजी, पूजा का घी कहाँ से मंगाया आपने।''
- यहीं किराना से।''
- अच्छा, यहाँ गौ घृत मिलता है।''
- अरे नहीं। पूजा के लिए कुछ कम्पनियों ने सस्ता घी बनाया है। तुमने सुना नहीं था। कुछ दिनों पहले नकली घी का कारोबार चला था। तो लोग अब जान गए हैं। वे अपने खाने के लिए घर में घी निकालना ठीक समझते हैं या महंगा शुद्ध घी लेते हैं और सस्ता घी पूजा पाठ के लिए लेते हैं।''
- पर पण्डितजी एतराज नहीं करते।''
- अरे पगली, वे क्यों एतराज करेंगे। पिछली बार पण्डितजी ने ही बताया था कि पूजा का घी अलग आता है।''
        कांता घर लौट आई। बच्चे आ गए थे वही रोज की भागदौड़ शुरू हो गई। पूरा दिन बीत गया। कांता थक कर चारपाई पर लेटी तो पूजा के घी ने उसे घेर लिया। पूजा में नकली सस्ता घी... । करोड़ों की सम्पत्ति, लाखों का भोज, इतना बड़ा अनुष्ठान .... । बचपन में जब गर्मी में दूध की खपत बढ़ती थी और घर में गाएं दूध देना कम करती थीं तो माँ घी गर्माते समय पूजा का घी का डिब्बा भरकर अलग रख देती थी। वह कहती थी - तुम थोड़ा कम भी खा लो तो कोई बात नहीं। जोत बत्ती का घी जरूरी है। '' यही सब सोचते कांता सो गई।
        सुबह उठकर कांता घर का काम जल्दी  - जल्दी निबटाने लगी। अभी माताजी के यहाँ से कोई बुलाने आ गया और उसका काम न निबटा तो खराब लगेगा। यही सोचकर वह और तेजी से काम समटने लगी। उसने बच्चों को जल्दी नहला खिला दिया। स्वयं नहाकर तैयार हुई। जाने के कपड़े निकालने लगी कि तभी पूजा के घी ने उसके मन पर डेरा जमा लिया। कांता ने कपड़े जहाँ के तहाँ रख दिए। अचानक उसके मन ने फैसला लिया - जहाँ हवन की ही शुद्धता नहीं ऐसे धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने का क्या लाभ। प्रसाद मेवायुक्त और भोज मे चार मिठाई पर हवन में अशुद्ध घी। यह कैसा अनुष्ठान। कांता ने बच्चों को स्कूल भेज दिया। स्वयं एक साधारण साड़ी पहनकर तैयार हुई। वह जल्दी - जल्दी घर का ताला बंद करने लगी। तभी राहुल ने आवाज दी - दीदी चलो। माँ जी बुला रही हैं। '' कांता ने रिक्शे की ओर बढ़ते हुए राहुल से कहा - माँजी से कहना मेरी बहन की तबियत ठीक नहीं है। मैं उसे देखने जा रही हूँ। पूजा में शामिल नहीं हो पाऊंगी।''

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